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Saturday, 11 January 2025

अकारज 23




वे दो एकदम जुदा। 

क गति में रमता,दूजा स्थिरता में बसता। एक को आसमान भाता,दूजे को धरती सुहाती। एक भविष्य के कल्पना लोक में सपने देखता,दूजा वर्तमान की धरती पर यथार्थ के चित्र उकेरता। एक बाल सुलभ चंचलता से चहकता, दूजे अनुशासन की डोर से हनकता। 

क बसंत की बहार,दूजा शिशिर का ठहराव। एक अमावस की सांवली रात, दूजा पूर्णिमा का उजला चांद।

वे दो एक दूजे का प्रतिपक्ष।

लेकिन ये जो वैभिन्य है ना,दरअसल यही दोनों के बीच संबंधों का सबसे मजबूत पुल है। सबसे जरूरी संवाद सूत्र।

वे दो जैसे दो धड़कते दिलों की एक धड़कन।❤️❤️


Thursday, 19 December 2024

अकारज_22



से विरल होते गरम दिन रुचते। मैं सघन होती सर्द रातों में रमता। उसे चटकती धूप सुहाती। मुझे मद्धिम रोशनी। लेकिन इन तमाम असंगतियां के बीच एक संगति थी। दोनों को सर्द रातों की चांदनी रात में बैठे रहना खूब भाता।

दिसंबर की सघन होती एक रात में टहलते हुए उसने कहा 'ये सर्द रातें इस कदर ढीठ हो आती हैं कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेतीं।'

मैंने कहा 'नहीं, ये ढीठ कहां होती हैं। ये सर्द कोमल छुवन से 'राग' हो आती हैं और विलंबित में बजती रहती हैं जैसे गर्मियों में दिन।' 

से इस तरह के जवाब सुनने की आदत हो चली थी। वो हौले से मुस्कुराई और कहा 'रात का तो ठीक है,पर दिसंबर तो इतनी तेजी से भागता है कि हाथ ही नहीं आता।'

मैंने उसी लय में कहा 'ये समय भी तो राग हो आता है। शुरू में विलंबित में इस कदर मग्न होता है कि उसे खुद के बीत जाने का अहसास ही कहां हो पाता है और जब साल का अंत होने को आता है तो सम को लांघकर सीधे द्रुत में बीतने लगता है।'

सके चेहरे पर मुस्कान कुछ गहरी हुई और प्रेम के रंग से निखर आई। उसने कहा 'जानते हो तुम भी मेरे अस्तित्व में संगीत की तरह घुल मिल गए हो और राग की तरह बजते हो।'

मैंने उसकी आंखों में देखा। शरारत मचल कर होठों पर आ गई 'जानती हो, जीवन अब साठ पार हो चला है। जीवन राग भी द्रुत में सांसे लेने लगा है। द्रुत में अक्सर समय कम होता है और राग यकायक खत्म हो आता है। जीवन - समय सब राग की तरह तो होते हैं।'

अब मौन इस कदर सघन हो चला था कि सांसों की लय को सुना जा सकता था। दिल में उमड़ते घुमड़ते भाव कुछ विलंबित में और कुछ द्रुत में गाने लगे थे। और दो धड़कते दिल थे कि तबले की तरह उनकी संगत कर रहे थे।



Thursday, 5 September 2024

अकारज_21







'मैं?'

'एक स्मृति!'

'अब भी स्मृति में शेष हूँ!'

'हाँ,दिल की किसी शिरा में घास के तिनके पर सुब्ह की शबनम की तरह!''

'शबनम की उम्र कहां होती है?'

'तरलता ज़िंदगी से कहां खत्म होती है!'

'ऐसा क्या?' 

'ज़िंदगी की दोपहर में व्यस्तताओं की ऊष्मा से मिटती थोड़े ही ना है। तरल हो स्मृति वाष्प हो जाती है बस। और यकीन मानो ज़िंदगी की सांझ की शीतलता में स्मृति संघनित हो फिर शबनम में ढल जाती है।'

वो ज़ोर से हंसी। मन चांदनी के से उजाले से भर उठा। कुछ बातें और ढेर सारी यादें हरसिंगार के फूलों सी बरस पड़ीं। दिल में प्यार मोगरे की सी खुश्बू सा फैल गया।

'चल झूठे'

'ओह, तुम्हें प्यार का नाम आज भी याद है!'

'शब्द ब्रह्मनाद जो होते हैं। दिल के ब्रह्मांड से कहां मिटते हैं।'

दो दिल थे कि धड़कनों के शोर में अब सिर्फ एक शब्द 'झूठे' से मचल मचल जा रहे थे।


Thursday, 6 July 2023

अकारज_19

 


उस दिन किशोर प्रेमी युगल को देखते हुए उसने कहा 'आजकल का प्रेम भी कोई प्रेम होता है! आज प्रेम,कल ब्रेकअप। प्रेम तो हमारे ज़माने में होता था।'

मैंने उसकी ओर शरारत भरी दृष्टि से देखा और पूछा 'तुम्हारा ज़माना!'

उसने भी शरारतन कहा 'हाँ, तुम्हारे बैलगाड़ी वाले समय के बाद साइकिल वाला ज़माना।'

मेरे ओंठ मुस्कुराहट से फैल गए। मैंने फिर पूछा 'और कैसा था वो तुम्हारा साइकल वाला ज़माना!'

'हमारा ज़माना आज के मल्टीप्लेक्स,मोबाइल,ओटीटी,बाइक वाला फटाफट इंस्टा ज़माना थोड़े ही ना था। वो तो रेडियो वाला 'हौले हौले चलो रे बालमा' वाला ज़माना था।' कहते कहते उसकी आवाज़ अतीत में धंस गईं और आंखें यादों से चमक उठीं।

उसकी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं खुद अतीत में गहरे उतर आया था। मैंने कहा 'यानि तुम्हारे  समय का प्रेम धीमे धीमे सींझते हुए परिपक्व होता था। जैसे गांवों में हारे पर धीमी धीमी आंच में पकती दाल या औटता हुआ दूध।'

उसने उत्साह से भरते हुए कहा 'और क्या ! तब प्रेम खतो-किताबत से धीमे धीमे परवान चढ़ता था। क्या समय हुआ करता था वो भी। क्या प्रेम पत्र लिखे जाते थे उन दिनों। दरअसल वो समय ही 'प्रेम पत्रों' का समय था।'

फिर उसने बाल सुलभ उत्सुकता से पूछा 'तुम्हें याद है तुमने अपने पहले पत्र में क्या लिखा था?'

अब यादें अतीत के गलियारे तय करने लगीं। और फिर यादों ने उन शब्दों को अतीत की भूलभुलैया से ढूंढ निकाला। मैंने कहा 'हां वो एक लाइन की पाती थी- 'लिखे जो खत तुझे'

उसने खिलखिलाकर कहा 'और उसके बाद तुम तीन दिन कॉलेज नहीं आए थे।'

मैंने ठहाका लगाया 'तुम्हारी याददाश्त कमाल है।'

'और तुम्हें वो वाली चिठ्ठी भी याद है ना जो तुमने घर जाते हुए लिखी थी।' उसने फिर पूछा।

यादें एक बार फिर छटपटाईं और स्थिर हो गईं। मैंने मुस्कुराते हुए कहा 'वो भी वन लाइनर ही था कि 'तुम भी खत लिखना'।'

अब शरारत उसकी आँखों से उतर कर उसके ओंठों पर ठहर गई। उसने शोखी से पूछा - 'तो खत आया क्या!' इसमें  सवाल कम उत्तर अधिक था।

मैंने कहा 'हां उसमें बस इतना ही लिखा था- 'इन दिनों यहां बादल खूब बरस रहे हैं। और आंखें भी।'

वो फिर अतीत में डूब गई। एक बार प्रेम फिर आंखों से बरसने लगा। वो प्रेम की नमी से गल चुकी थी। 'तो तुमने जवाब भेजा!' उसने तरल हुई रेशम सी आवाज़ में पूछा।

 मैंने यादों के हवाले से कहा 'केवल एक शब्द लिखा था '....तुम्हारा'

वो जवाब सुन खिलखिला उठी कि पास के खिले फूलों का रंग कुछ और गहरा हो उठा। पत्तियां कुछ और हरी हो गईं। चिड़िया कुछ और चहक उठीं। घास के तिनको पर ठहरी ओस की बूंदें उसकी ऊष्मा से सुध बुध खोकर अपना अस्तित्व ही खो बैठी। सूरज कुछ और तेजस्वी हो उठा और सुबह कुछ और जवान। 

उसके स्वर में बरसों से ठहरी जिज्ञासा मुखर हो आई - 'ये तुम्हारे 'प्रेम पत्र' वन लाइनर क्यूं होते थे।'

'उन दिनों मौन अधिक वाचाल जो होता था।अनलिखा ही सब कह जो देता था।' मैंने  हँसते हुए कहा।

°°°°°°

अब पूछने को कुछ बाकी रहा भी हो तो पूछा ना गया। शब्दों ने मौन जो धारण कर लिया था। 

 मौन के बीच एक धड़कता दिल 'पाती' हुआ जाता था, दूसरा 'कलम'। कलम से शब्द शब्द प्रेम पाती पर रिसता जाता।

उधर मौन था कि 'कलम' से लिखी जा रही इस 'प्रेम पाती' को बांच रहा था। 

और 

और यादों की आंख से निकले आंसू थे कि अतीत की पीठ को भिगो भिगो जाते थे।



Monday, 12 December 2022

अकारज _ 18

 


अकारज_18

दिन भर की भाग दौड़ के बाद वो थकी सी क्लांत बैठी थी। दिन था कि अब सांझ हो चला था।

कुछ देर बाद उसने जुम्हाई ली और नींद में गुम हो गई। सांझ गहरी रात में बदल गई।

सकी आँखों में कुछ सपने आए। आसमां में तारे टिमटिमाने लगे।

सने नींद में करवट बदली। आसमां में चांद उग आया और आसमां चांदनी से भर उठा।

वो जगने ही वाली थी। उसने अंगड़ाई ली। रात सुब्ह में तब्दील हो गई।

सने आंखें खोली। सूरज उसकी खिड़की पर हाज़िर हुआ।

सने अब धीमे से मुझे पुकारा 'कहां हो तुम'। चिड़िया चहचहा उठीं।

मैंने उसके माथे पर एक बोसा और हाथ पर चाय का प्याला धरा। स्मित मुस्कान उससे होंठों पर फैल गई। कमरा  गुलाबी रंग से भर उठा। 

वो थी। मैं था। मौन भंग करती चाय की चुस्कियां थीं।

गुलाबी रंग सुर्ख हुआ ही चाहता था कि उसके मन में दिन भर की जिम्मेदारियों का एक पहाड़ उग आया और उसका शरीर पहाड़ के बीच बहती नदी होने लगा।

कि मेरे मन की नीरवता उसके भीतर बहती नदी के शोर में घुल रही थी और उसके भीतर बहती नदी का शोर मेरी नीरवता में।

कि दो मन अब एक दूसरे में घुले जाते थे।


Sunday, 4 December 2022

अकाराज_17



अकाराज_17
०००

 हारा थका दिन सांझ हुआ उनींदा हुआ जाता है।

कि वो रात के सीने पर सर रख कर सो जाता है।

चांद-तारों की मद्धम रोशनी से अपना दामन सजा रात किसी प्रेमिका सी उसके जागने की प्रतीक्षा करती रहती है।

र प्रतीक्षा है कि बेचैनी का सबब हुई जाती हैं और अधूरी रहने को अभिशप्त भी।

ये जानते हुए भी कि एक का जीवन दूसरे की मृत्यु है,रात है कि खुद को प्रतीक्षा में गलाती जाती है या कि सुब्ह में विलीन हुई जाती है।

वो खुश थी कि खत्म भी हुई तो क्या हुआ उसने दिन को नया जीवन तो दिया।

धर सुब्ह हुआ दिन है कि रात को भूला जाता है।



Friday, 18 March 2022

अकारज_18

 


उसे रंगों से प्यार था। वो रंगों से खेला करती। ज़हीन चित्रकार जो ठहरी।

मैंने उसके गालों पर गुलाल लगाया और कहा 'रंग मुबारक'।

उसने प्यार से मुझे देखा कि गुलाबी रंग मेरे मन पर बिखर गया।

फिर वो हौले से मुस्कराई कि बासंती रंग फ़िज़ा में घुल गया।

अब उसने दिलकश आवाज में मुझसे कहा कि आत्मा का रंग सुर्ख हो चला।

उसने मुझसे कहा 'ये जो रंग तुम देख रहे हो ना ये तो फीके पड़ जाते हैं। असल रंग तो वही होते हैं जो तुम महसूस रहे हो।'

मैंने उसकी और देखा।

वो बोली 'जानते हो सुख का रंग इतना चमकीला होता है कि आपके मन की आखों को बंद कर देता है और आप सिर्फ अपने स्वार्थ के काले रंग में रंग जाते हो।'

'और दुख का' मैंने पूछा।

'दुख से निर्मल रंग किसका होगा जो आत्मा को निष्कलुष कर देता है। जैसे मिलन का रंग इतना सुर्ख होता है कि सभी संवेगों के रंग उसमें घुलकर विलीन हो जाते हैं। और...'

अचानक वो चुप हो गई। मैंने पूछा 'और क्या'

'जानते हो सबसे कारुणिक लेकिन गहरा रंग जुदाई का होता है। समय का कोई भी रंग जुदाई की स्मृति के इस रंग को नहीं फीका कहाँ कर पाता है। उलट रंग और गहराता जाता है।

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अब मौन का सुफेद रंग वातावरण में फैल गया था। अनगिनत संवेगों के मिश्रित रंग से दो मन भीज रहे थे




Tuesday, 15 February 2022

अकारज 15




पहाड़ उसे हमेशा बहुत लुभाते हैं। वो जब भी पहाड़ देखती उसके भीतर का बालमन जाग जाता।

उस दिन पहाड़ पर घूमते हुए उसने उल्लसित स्वर में कहा 'पहाड़ अपनी ऊंचाई में कितने प्रभावशाली लगते हैं।'

मैं बुदबुदाया था 'हां,जैसे तुम्हारे विचार।'

उसने फिर कहा 'और ये घाटियां अपनी गहराई में कितनी मनोरम लगती हैं।'

 मैंने धीरे से कहा 'हां जैसे तुम्हारी भावनाएं।'

उसने मुझे अनसुना किया। वो बह रही थी। उसने अपनी रौ में बहते हुए कहा 'और वो देखो कितनी सुंदर नदी। अपने बहाव में कितनी सजीव होती हैं ये पहाड़ी नदियां।'

मैंने कहा 'हाँ जैसे तुम्हारे भीतर कल कल बहती खुशियां।'

वो कह रही थी और मैं सुन रहा था। उसने कहा 'ये चारों तरफ फैली हरियाली कितनी खूबसूरत है।'

मैंने कहा 'हां जैसे तुम्हारी मासूमियत।'

अचानक वो थोड़ी उदास हुई और बोली 'इतने सब के बावजूद भी कितनी नीरवता है इस वातावरण में।'

मैंने कहा 'हमारा जीवन भी तो ऐसा ही होता है। बहुत कुछ होते भी कहीं कुछ कमी रह ही जाती है। जीवन कहां कभी पूर्ण हो पाता है।'
००००००००
अब पुलक पुलक रहे दो मन सन्नाटे से भर गए थे। मन का सन्नाटा फैली नीरवता से होड़ कर रहा था।

 बस धड़कनें थीं जो उस सन्नाटे को चुनौती दे रहीं थी।




Sunday, 16 January 2022

अकारज 14

 

वो आज अपने घर जा रही थी।

मैंने विदा करते हुए हुए कहा- 'घर पहुंचकर फोन करना।'

उसका चेहरा प्रेम से प्रदीप्त हो उठा। उसने शोख नज़रों से देखा और बोली- 'ज़रूर, गर पहुंच सकी तो।'

मैंने प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी ओर देखा।

उसने कहा-'जबसे तुम्हारे साथ हूँ,कहां कहीं जा पाती हूँ। सारी की सारी तो तुम्हारे पास रह जाती हूँ।'


अब

सारे शब्द अर्थहीन हो रहे थे।

ध्वनियां मौन में घुल रही थीं।

और जज़्बात थे कि मौन के सागर में ज्वार भाटे से मचले  जा रहे थे।

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समय भी जो हमारे साथ हो लेता है वो कहां हमसे विदा लेता है। 

फिर भी औपचारिकताऐं तो निभानी ही पड़ती है ना। 

अलविदा 2021 !


अकारज 13

 

ये एक बेहद सर्द सुबह थी। वो अब भी सोई हुई थी। रोज की तरह मैंने हौले से उसे छुआ और कहा-

'चाय'

उनींदी सी अधखुली आंखों से उसने मेरी ओर देखा। फिर बोली-

'तुम्हारी चाय पर सारी अपनी नींद वारी'

मुस्कुराहट ने मेरे होठों का विस्तार किया और आंखों का भी। वो हर सुबह कुछ ऐसा कहती रही है। फिर भी मैंने प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी ओर देखा।

उसकी आँखें में सुकून घुल आया था। 

अब उसने मेरा हाथ अपनी ओर खींचा और अपने सर के नीचे रख कर आंखें बंद कर ली। उसके चेहरे पर असीम निश्चिंतता पसर  गई थी और सुकून की रोशनी से चेहरा दमक उठा।

उसे देख खिड़की से झांकता सूरज शर्म से लाल हो चला।  

चाय का प्याला उसके होंठों के स्पर्श के लिए बेचैन हो उठा।

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और उस ठहरे हुए समय में दो दिल थे 

कि धड़कनें उनमें संगीत सी प्रवाहित हो रही थीं।







Sunday, 5 December 2021

अकारज_12




 ये एक गहरी सर्द सुबह थी।

वो अब भी सोई हुई थी।

मैंने हौले से उसे छुआ और कहा

'चाय'


उनींदी सी अधखुली आंखों से उसने मेरी देखा।

फिर बोली 'तुम्हारी चाय पर सारी नींद वारी'


मैंने प्रश्नवाचक नज़रों से देखा। वो ऐसा कहती रही थी। गर्मियों भर गुनगुना नींबू पानी पीते हुए भी कुछ ऐसा ही कहती थी।

उसकी आँखों सुकून की मुलायमियत से भर उठी थी। वो कह रही थी 'तुम्हारी हर चीज पर ज़िंदगी कुर्बान जो मुझे मेरे होने का अहसास कराती है'

अब उसने मेरा हाथ अपनी ओर खींचा और अपने सर के नीचे रख कर आंखें बंद कर ली।

उसके चेहरे पर असीम निश्चिंतता पसर  गई थी। चेहरा सुकून की रोशनी से दमक उठा था।


समय था कि मानो ठहर गया।


खिड़की से झांकता सूरज था

कि शर्म से लाल हो चला।


पक्षी थे 

कि प्यार से गुनगुनाने लगे।


शबनम की बूंदें थी

कि प्यार की ऊष्मा से पिघलने लगीं।


चाय का प्याला था 

कि उसके होंठों के स्पर्श के लिए बेचैन हो चला।


और दो दिल थे 

कि अरमान उनमें मचलने लगे।

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Monday, 21 June 2021

अकारज _11

 


उस रात टेरेस पर उसे बूंदों से अठखेलियाँ करते देख मैंने हौले से उससे पूछा 'तुमने प्रेम पत्र लिखे क्या?'

वो खिलखिला उठी। अंधेरी रात में उसके हास का उजाला फैल गया।
वो चहक कर बोली 'हाँ लिखे ना। उन दिनों हम प्रेम में दरिया-ए-चिनाब हुआ करते थे। सपनों से बूंद बूंद दरिया भरता रहता और दरिया समंदर-ए महबूब की और बहता रहता। और फिर.....'
'और फिर क्या'मैंने पूछा
उसके स्वर में एक हल्की उदासी घुल गयी। बोली 'फिर अनहोनी का जलजला आया। इश्क़ का दरिया ए चिनाब सूख कर धरती में समा गया और दरिया-ए-सरस्वती हो गया।'
फिर उसने धीमे से पूछा 'और तुमने'
एक डूबी आवाज़ कहीं गहरे भीतर से निकली 'हां हमने भी। जब हम प्रेम में आवारा बादल थे। बूंद बूंद धरती पर बरसते। प्रेम का हरा रंग गहराता जाता और बदले में बादल फिर फिर उष्मा से भर भर जाता।'
'हूँ! तो फिर ?'
'फिर क्या! हरी भरी धरती बंजर हो गयी। और..और बादल हवा हो गए।'
अब मौन से यादों का मौसम उग आया था।
एक मन दरिया बन कल कल बहने लगा। एक मन बादल बन बूंद बूंद बरसने लगा।
ये पानियों का मौसम था
और प्रेम बरस रहा था।

Wednesday, 26 May 2021

अकारज_10

 




उस रात छत पर लेटे हुए वो देर तक आसमाँ को देखती रही। फिर सहसा उसने कहा ' कितने सुंदर झिलमिलाते तारे!'

मैंने कहा 'हमारी इच्छाएं। सुंदर तो बहुत हैं पर हाथ नहीं आतीं।'

उसने पूछा 'और ये जुगनू ?

मैंने कहा 'हमारी उम्मीद। हर पल जलती बुझती। जिस पल जले ज़िन्दगी रोशन,जिस पल बुझे ज़िन्दगी अंधेरा।

उसने कहा 'अच्छा छोड़ो। पूर्णिमा का चांद देखो। कितना सुंदर। वो तो चांद ही है ना?

मैंने कहा 'हमारा जीवन। हर रोज घटता जाएगा और फिर अमावस आ जाएगी।'

चारों और सन्नाटा था,हम थे और दो धड़कनें एक साथ कदमताल करते हुए सन्नाटे से लड़ रही थीं।


Tuesday, 11 May 2021

अकारज_09


     बहुत दिनों से उससे कोई संवाद ना हुआ था। लगा मौन उसे रास आ गया।

 फिर एक दिन अचानक उदास स्वर में बोली 'तुम्हें पता है पहले बहुत दिनों तक आसमान में बादल छाए रहते थे। उनसे रिमझिम पानी बरसता रहता था। वो पानी नहीं ज़िन्दगी होता था जिसे धरती धीमे धीमे अपने भीतर सींझती रहती थी।'

मुझे संवाद का एक सूत्र मिला। मैंने कहा 'है तो आज भी कुछ वैसा ही। देखो ना ज़िन्दगी के आसमान पर कितने दिनों से दुख के स्याह बादल छाए है। फर्क़ सिर्फ इतना कि इनसे ज़िन्दगी नहीं मौत बरस रही है।'

वो कुछ और उदास हुई। उसने कहा 'पता है उस पानी में लगातार काम करते करते माँ बाबा के पैर की उंगलियों के बीच खार हो जाते'

मैंने कहा 'हां पर आज तो बरसते दुखों से दिलों पर ही खार हुए जा रहे हैं।'

उसके चेहरे पर उदासी और गहरी हुई। वो बोली 'पता है उस लगातार बारिश से घर सील जाते'

मैंने कहा 'पर दुख की इस बरसात से घर ही नहीं आत्माएं भी सील सील जा रही हैं। बेबसी की उमस से आत्मा पर फफोले हो रहे हैं।'

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अब उसकी आँखों से गंगा जमुना बह रही है। इससे वो आसमाँ से बरस रहे मौत के तेजाब को जीवन के अमृत में बदल देना चाहती है।

अकारज_08


'मुझे मौन मधुर लगता। उसे मौन बोरिंग सा लगता। मौन मुझे अन्यतम अभिव्यक्ति लगता, उसे मौन संवादहीनता की पराकाष्ठा। मौन मुझे असीम शांति से भर देता,उसे मौन उदासी का सबब लगता। वो कहती शब्दों से मधुर क्या हो सकता है, मैं कहता शब्दों से गैर जरूरी क्या! 

और जब भी हम मिलते तो

मैं अपने शब्दों से मिलन का मधुर गीत लिखता और वो अपने मौन से उस गीत की सुरीली धुन रचती।

यकीनन जुदा जुदा थे हम। पर एक ही नींद के दो ख़्वाब थे हम।



Tuesday, 6 April 2021

अकारज_10


हारा थका दिन सांझ हुआ उनींदा हुआ जाता है।

कि वो रात के सीने पर सर रख कर सो जाता है।

रात किसी प्रेमिका सी चांद-तारों की मद्धम रोशनी में उसके जागने की प्रतीक्षा करती रहती है।

प्रतीक्षाएँ हैं कि बेचैनी का सबब हुई जाती हैं और अधूरी रहने को अभिशप्त।

 ये जानते हुए भी कि एक का जीवन दूसरे की मृत्यु है,रात है कि खुद को प्रतीक्षा में गलती जाती है और सुब्ह में विलीन हुई जाती है।

वो खुश थी कि खत्म भी हुई तो क्या हुआ उसने दिन को नया जीवन तो दिया।

उधर सुब्ह हुआ दिन है कि रात को भूला जाता है।


Monday, 29 March 2021

अकारज_7

 


उस दिन डूबते सूरज को देखते हुए उसने पूछा 'तुम्हें सूरज अच्छा लगता है ना?'

मैंने कहा 'हां,देखो ना,सूरज आदमी के जीवन का कितना सुंदर रूपक गढ़ता है। सुबह का सूरज बचपन सा मासूम,दोपहर का युवावस्था सा ओजस्वी और शाम का वृद्धावस्था सा निस्तेज।'

'और तुम्हें?' मैंने उससे पूछा

उसने एक बार फिर डूबते सूरज को देखा और बोली'लड़कियों का सूरज कहां लड़कों के सूरज सा होता है।'

'दो सूरज?' मैं अचकचाया

वो बोली 'लड़कियों के सूरज की दोपहर कहां होती है। वे दोपहर के सूरज होने से पहले ही नैहर से विदा जो कर दी जाती हैं ढलते सूरज सी। फिर कहां उसके जीवन में सूरज आता है। वे चांद हो जाती हैं। कुछ के हिस्से पूर्णिमा,कुछ के हिस्से अमावस।

पास ही कुछ चिड़िया एक सुर में चहचहाने लगीं। शायद वे उसकी बात की ताईद कर रही थीं।


Saturday, 20 March 2021

अकाराज_6













उसने खिलखिलाकर कहा 'अहा!कितने सुंदर हरसिंगार के फूल'।

 मैंने कहा 'अपने से बिछड़ने के दुःख से टपके कुछ आंसू। 


उसने चहककर कहा 'देखो कितना सुंदर गुलाब'। 

मैंने कहा 'दर्द की चुभन के बावजूद मुस्कुराता  कोई चेहरा'। 


उगते सूरज को देख वो मुस्कुराते हुए बोली 'स्वर्णिम आभा लिए  कितना भला भला सा सूरज'।

मैंने कहा 'अपनों के विछोह के ग़म में पीला पड़ा चेहरा'।


उसने खाली सुनसान सड़क को देखा और कहा 'कितनी सुकून भरी है ना सड़क।'

मैंने कहा 'आने वाली विपत्ति के बोझ की आशंका से सहमा उदास चेहरा।'


उसने मेरी आँखों मे झांका और बोली 'दुःख बांचता आदमी कितना सुंदर होता है ना'

मैंने कहा 'और प्यार डूबा आदमी कितना निश्छल और पवित्र'।

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आत्मीय मौन चारों और पसर गया था जिससे होकर दो 'मन' गुज़र रहे थे।




Tuesday, 14 April 2020

अकारज_5




उस दिन सुबह टेरेस पर चाय पीते हुए उसने कहा 'कितनी खूबसूरत नरम नरम सी सुबह है ये'मैं  बुदबुदाया था'हां बिल्कुल वैसी जैसी तुम्हारे हौले से स्पर्श से मन में होती है गुदगुदाहट।' सर्दियों में उस दोपहर छत पर लेटे हुए उसने कहा 'कितनी मीठी मीठी चमकीली सी है धूप।'मैने हौले से कहा 'हाँ जैसे तुम्हारे गले से फूटते  आलाप कीमिठास।' फिर उस शाम सड़क पर टहलते हुए मेरा हाथ पकड़कर उसने कहा था 'कुछ उदास सी है आज की ये शाम।' मैंने मन ही मन कहा था 'जैसे तुम्हारे बिना मन में कैसे हो सकता है भला उजास।' उस रात पूरे चाँद को देखकर वो चहकी थीं 'वाह कितनी झिलमिलाती है ये चांदनी रात।' मैंने कहा था 'हाँ जैसे मेरे कानों में घुलती तुम्हारी खनकती हँसी की मिठास।' और उस दिन वापस घर लौटते समय अचानक आई बारिश में भीगते हुए गुलाबी सी आवाज़ में सिर्फ इतना ही तो कहा था उसने 'उफ्फ ये बरसात भी ना'। बूंदों के साथ तुम्हें अठखेलियाँ करते देख तब मैं बुदबुदाया था 'ये बारिशें भी तो तुम्हारी शरारतों जैसी ही हैं ना।'
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और आज जब वो एक बार फिर बाहर से बारिश की बूंदों में भीग रही थी, मैं अंदर से यादों की बूंदों से गीला हो रहा था।


अकारज_4

संवाद
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'हाय! कितनी नर्म मुलायम सी सुबह!'
''तुम्हारी मुस्कान'

'अहा! कैसी सोने सी धूप!'
' तुम्हारा रूप'

'ओह! एक अलसाई सी शाम!'
'तुम्हारी अंगड़ाई'

'ओहो! कैसा रूपहला चाँद'
'तुम्हारी हँसी'

'आह! कितनी अंधेरी रात'
'तुम्हारी उदासी भरी कोई बात'

फिर इक दिन उसने कहा 'आज कुछ तुम कहो'
वो गुनगुनाई 'दो दिल, बहती उमंगें और एक    
मंज़िल'           



फीफा विश्व कप 2026 डायरी 16: ओरलैंडो गिल

ये विश्व कप जितना फॉरवर्ड्स का है,उतना ही गोलकीपर्स का भी है। जितना मेस्सी,क्रिश्चियनों रोनाल्डो,म्बापे,हॉलैंड,विनिसियस जूनियर, उस्मान डेंब...