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Monday, 20 July 2026

फीफा विश्व कप डायरी 27: फ़ाइनल

 



फाइनल मैच की पूर्व संध्या पर आयोजित एक विशेष प्रेस कार्यक्रम में स्पेन और अर्जेंटीना के कोच और कप्तानों के अलावा खेल शख्सियतें भी मंच पर थीं। उनमें से एनएफएल के दिग्गज टॉम ब्रैडी और एनबीए के दिग्गज खिलाड़ी केविन ड्यूरेंट के अलावा महानतम टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच भी थे। वे मेस्सी से सवाल पूछ रहे थे, ' इतने बड़े फाइनल से पहले के प्रेशर को वे कैसे संभालते हैं।'

दरअसल ये समस्या मंच साझा कर रहे अपने अपने खेल के दो महानतम खिलाड़ियों की साझा समस्या थी। वे दोनों हो गोट को दर्जा पा चुके हैं और अमरत्व को पा लेने की चाह में डूबे हैं। वे दोनों 39 बसंत पार 40वें साल में हैं। पर हार नहीं मान रहे हैं। वे खेल नहीं छोड़ रहे हैं और खेल उन्हें। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे   शानदार खेल दिखा रहे हैं।

अगर मेस्सी लगातार दो विश्व कप जीतकर अमर हो जाना चाहते थे, तो नोवाक अपना 25 वा ग्रैंड स्लैम जीतकर। नोवाक ने जनवरी 23 में अपना 24 वां ग्रैंड स्लैम जीता था। उसके बाद से वे ग्रैंड स्लैम के दो फाइनल और छह सेमीफाइनल हार चुके हैं। वे खिताब के करीब आते हैं और चूक जाते हैं। उधर मेस्सी भी अपने दूसरे खिताब से एक कदम की दूरी से चूक जाते हैं। दोनों खेलों के इतिहास में अमर होते-होते रह जाते हैं। ये विधि का विधान जो ठहरा। अमरत्व देवताओं का विशेषाधिकार है। माणुस की देवता बनने की चाह कहाँ पूरी होती है। मेस्सी और नोवाक अपनी समस्त मानवीय कमजोरियों के साथ सामान्य माणुस ही ठहरे। 

रविवार की शाम को अमेरिका के न्यूजर्सी में खेले गए फीफा विश्व कप फुटबॉल के फाइनल को जीतकर अर्जेंटीना की टीम मेस्सी की विश्व कप से विदाई को अविस्मरणीय बना देना चाहती थी। पर ऐसा हो ना सका। ये एक बेहद कठिन मुकाबला था। मैच 120 मिनट तक गया और एक गोल हुआ। तीसरा स्थान निर्धारित करने वाला फ्रांस और इंग्लैंड का मैच मनोरंजन से भरपूर था, जिसमें 10 गोल हुए। ये फुटबॉल का टी ट्वेंटी मैच था। जबकि फाइनल तनाव से भरा लेकिन कुछ हद तक नीरस मैच था। फुटबॉल का टेस्ट मैच।

ये फाइनल मैच दो महाद्वीप की फुटबॉल और उसकी श्रेष्ठता का द्वंद्व  भर नहीं था,बल्कि रक्षण और आक्रमण के बीच का द्वंद्व भी था। एक तरफ कोपा कप विजेता अर्जेंटीना का आक्रमण था जिसने फाइनल से पूर्व 19 गोल किए थे,तो दूसरी तरफ यूरो चैंपियन का रक्षण था जिसने अब तक केवल एक गोल खाया था। एक तरफ संयमित और अनुशासित टीम वर्क था, तो दूसरी तरफ कुछ उच्छृंखल और वैयक्तिक प्रतिभा और पराक्रम का उपक्रम था। ये एक बीती जाती पीढ़ी और नवागत पीढ़ी के बीच का द्वंद्व था। ये विदाई लेते मेस्सी और उदित होते नए सितारे यमल के बीच मुकाबला था। ये बार्सिलोना बनाम बार्सिलोना था।

स्पेन की टीम निर्विवाद रूप से तकनीकी रूप से श्रेष्ठ थी। ये उन्होंने पिछले सात मैचों में दिखाया था। अर्जेंटीना उनसे पार पा सकने में असमर्थ थी।@@ ये अर्जेंटीना की टीम जानती थी। उन्होंने पराग्वे वाली शैली को अपनाया। फ्रांस शानदार खेलकर और पूरे मैच पर अपना नियंत्रण रखते हुए भी बमुश्किल 1-0 से जीत पाई थी। पैराग्वे ने फिजिकल होना चुना, रफ टफ खेलना चुना। अर्जेंटीना के सामने और कोई रास्ता नहीं था। फाइनल पहुंचकर कोई हारना नहीं चाहता। उन्होंने भी पैराग्वे का रास्ता चुना। पूरे मैच पर स्पेन ने खेल पर पूरा नियंत्रण रखा। बस वे गोल करने में असमर्थ रहे। इसका कारण अर्जेंटीना की आक्रामक व फिजिकल टैक्लिंग के अलावा गोलकीपर मार्टिनेज भी रहे। मार्टिनेज़ ने इस मैच में कुल 11 सेव किए। जबकि गोल्डन ग्लव्स के विजेता स्पेन के गोलकीपर उनाई सिमोन ने पूरे टूर्नामेंट में 10 सेव किए। ये मैच उन्होंने अपने लिए अविस्मरणीय बना दिया। वे अर्जेंटीना के एकमात्र खिलाड़ी थे, जिन्होंने अंतिम समय तक संघर्ष किया।

स्पेन के दबदबे को इस बात से समझ जा सकता है कि स्पेन के गोल पर 20 अटेम्प्ट के मुकाबले अर्जेंटीना के कुल जमा दो अटेम्प्ट थे। उसकी स्थिति इतनी दयनीय हो गई थी कि वे रेगुलर समय में तो गोल पर एक अटेम्प्ट भी नहीं ले पाए।

 स्पेन ने फाइनल जीता। फीफा ट्रॉफी जीती। खेल जीता। श्रेष्ठता की लड़ाई जीती। उसने अपने सुंदर खेल से लोगों का दिल भी जीता। दरअसल स्पेन की ये जीत टीम की जीत है। टीम में ना कोई मेस्सी था,ना एम्बाप्पे था,ना अर्लिंग हॉलैंड था,ना केन था। ये एक टीम थी और उसके 11 सदस्य थे। जीत में सबका बराबरी का योगदान था। यमल का भी। जितना योगदान बेहतरीन गोलकीपर का था, उतना फुल बैक का,उतना ही मिडफील्ड का और उसी अनुपात में फॉरवर्ड का। यहां टीम पहले और खिलाड़ी की इमेज बाद में थी। स्पेन के लिए सबसे ज्यादा गोल करने वाले ओयरजाबल को 60 मिनट बाद ही रिप्लेस कर दिया गया।

 ये अनुशासन की जीत थी,धैर्य की जीत थी, आपसी तालमेल और समन्वय की जीत थी,एकता की जीत थी। ये एक टीम की जीत थी। ये फुटबॉल की जीत थी।

जिस तरह के दृश्य  मैच की समाप्ति के बाद आंखों के सामने आए,वे शर्मनाक थे। खेल हमें हार में भी विनत होना सिखाता है। शालीन होना सिखाता है। ग्रेसफुल होना सिखाता है। हार को भी गरिमामय तरीके से स्वीकार करने का साहस होना चाहिए। यहां खेल शर्मसार हुआ। 

 एक ऐसा फाइनल जिसे अर्जेंटीना से कहीं ज्यादा उसके समर्थक भूलना चाहेंगे। हार के कारण नहीं। खेल भावना से च्युत होने के कारण भी। 

और हां मेस्सी के आंसुओं के कारण भी।


फीफा विश्व कप डायरी 27: मेस्सी की विश्व कप से विदाई

 


दो आंखों से निकले पानी ने संसार भर में फैले करोड़ों प्रशंसकों को दुख और अवसाद के गहरे समंदर में डूबने के लिए छोड़ दिया।

दो आंखों से पानी निकला और असंख्य हृदय नम हो आए।

दो आंखों से बार बार पानी बहा। असंख्य मन पीड़ा से भर उठे।

ये विदाई की गहरी वेदना के आंसू थे। वो एक लक्षित उद्देश्य के सपने के बार बार टूटने से बच जाने का सुख और अंततः उस स्वप्न के टूट जाने की वेदना थी और उसका पानी था 

हली बार वे दो आँखें नम हुई तो वो एक पश्चाताप की अग्नि और अंत में एक स्वप्न को बचा पाने की खुशी का गीलापन था। इसमें दुख का नमक और सुख की मिठास का मिश्रण था।

दूसरी बार गीली हुईं तो ये हारी बाजी जीत लेने की ऊष्मा की आर्द्रता थी जिसमें अपने सबसे बड़े विपक्षी पर विजय और एक जिए जा रहे  स्वप्न को लगभग पा लेने के सुख की शहद सी मिठास थी।

र अंततः एक जिए जा रहे स्वप्न के तिड़क कर टूट जाने  की आह का खारा पानी था जिसमें ग़म छिपाए ना छुपता था। डुबाए ना डूबता था। 

ब समय को,नियति को उसके साथ होना था,उसका साथ छोड़ दिया।

क चाह अनचाही खत्म हुई।

क युग खत्म हुआ।

दो आँखें की विदाई हुई। निराशा के खारेपन के साथ। विश्व कप से हमेशा हमेशा के लिए।



Thursday, 16 July 2026

फीफा विश्व कप डायरी 26 : सेमीफ़ाइनल दो

 



अक्सर खेल केवल खेल के मैदान में ही नहीं खेले जाते बल्कि एक समानांतर खेल खिलाड़ियों के सीने में भी चल रहा होता है। कई बार फुटबॉल जितनी पैरों से खेली जाती उतनी ही मनोभावों और उद्वेगों से भी खेली जाती है। ऐसे मैचों में खिलाड़ियों की स्किल के ऊपर उसका आवेग हावी हो जाता है। इंटेंसिटी हद से ज्यादा बढ़ जाती है। और खेल है कि फिजिकल होने लगता है। और अगर मैदान में इंग्लैंड और अर्जेंटीना जैसे प्रतिद्वंदी आमने सामने हों तो फिर क्या ही बात है। इस बात की ताईद कल अटलांटा में खेला गया फीफा विश्व कप का दूसरा सेमीफ़ाइनल करता है।

जैसे जैसे अर्जेंटीना और इंग्लैंड की टीमें आगे बढ़ रही थीं,दोनों टीमों के मुकाबले की संभावनाएं बढ़ती जा रही थीं। और भावनाओं की तीव्रता भी। अर्जेंटीना के समर्थक जहाँ भी जाते वे अपना नया विश्व कप एंथम 'ला कुआर्ता एस्ट्रेला' द फोर्थ स्टार गाते कि "मैं जन्म से मृत्यु तक अर्जेंटीना का हूँ। माल्वीनास के लिए, डिएगो के लिए, लियो की आखिरी ट्रॉफी के लिए, अर्जेंटीना, मैं तुम्हें दो बार का चैंपियन देखना चाहता हूँ।" इस गाने में माराडोना और मेस्सी के साथ साथ माल्वीनास यानी फ़ॉकलैंड द्वीप समूह का भी जिक्र है। माल्वीनास की ग्रंथि अर्जेंटीना के सामान्य समर्थकों के मन में ही नहीं बल्कि खिलाड़ियों में भीतर भी किसी कोने में बैठी थी। मिस्र पर जीत के बाद अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने अपने ड्रेसिंग रूम में ये गाना गया। और उसके बाद ये मैच शुरू होने से पहले अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने अपने राष्ट्र गान को जिस जोश ओ जूनून और हाव भाव से गाया,उससे ये लग गया था कि टीम के लिए ये मैच सेमीफ़ाइनल से कुछ ज्यादा है।

स्कोलिनी ने अपने पुराने 4-4-2 के फॉर्मेशन से टीम उतारी। लेकिन टीम में एक बदलाव किया। मैदान के भीतर मेस्सी के बॉडी गार्ड कहे जाने वाले मिडफील्डर रोड्रिगो डी पॉल की जगह गुलियानी सिमोने को खिलाया। दूसरी और इग्लैंड ने अपनी टीम में तीन बदलाव किए। फुल बैक रीस जेम्स और जेड स्पेंस तथा विंगर मॉर्गन रोजर्स को टीम में शामिल किया।

कोच थॉमस ट्यूशेल ने 4-2-3-1 फॉर्मेशन के साथ शुरुआत की। इंग्लैंड की रणनीति मिडफील्ड को कंट्रोल करने और मेस्सी को रोकने की थी।

हले हॉफ के खेल की इंटेंसिटी बताती है कि भावनाओं ने प्राथमिकता ग्रहण कर ली थी। इस हॉफ में एक भी गोल नहीं हुआ। केवल तीन शॉट लिए गए। दो इंग्लैंड ने। एक अर्जेंटीना ने। कोई भी शॉट दोनों टीमों का टारगेट पर नहीं लगा। और 19 फाउल हुए। ये हॉफ भावनाओं के अतिरेक में खेला गया हॉफ था। खेल फिजिकल हुआ और दोनों में से कोई भी टीम लय नहीं पा सकी। कुछ हद तक ये हॉफ नीरस रहा। 

लेकिन पहले हॉफ के बाद मध्यांतर में खिलाड़ियों के दिमाग से भावनाओं का ज्वार उतरा,तो उन्हें फुटबॉल की याद आई। याद आई तो फुटबॉल का खेल आया और आई उसकी लय, उसकी गति, उसकी ताल और बाकी सब कुछ भी आया। खेल रोमांचक और संघर्षपूर्ण हो आया। 

डेडलॉक इंग्लैंड ने 55 वें मिनट में तोड़ा जब मॉर्गन रोजर्स ने दाहिनी ओर से शानदार क्रॉस डाला जिसे  एंथनी गॉर्डन ने पकड़ा और कुटी रोमेरो को चकमा देते हुए सटीक गोल दाग दिया। यहां पर खेल इंग्लैंड के नियंत्रण में था। और अर्जेंटीना बैकफुट पर थी।

स यहीं पर इंग्लिश कोच थॉमस ट्यूशेल और टीम चूक गई। यहां से टीम एकदम रक्षात्मक हो गई। वे एक और गोल के लिए गए ही नहीं। उस समय तक 35 मिनट और इंजरी टाइम का खेल बाकी था। इतने लंबे समय तक एक गोल की लीड को बचाना किसी भी रक्षा पंक्ति के लिए बहुत दुष्कर कार्य होता है। वो भी अर्जेंटीना जैसी टीम और मेस्सी के खिलाफ।

72वें मिनट में थॉमस ट्यूशेल ने गोल करने वाले एंथोनी गॉर्डन की जगह डिफेंडर एजरी कोंसा को मैदान में उतारकर लो ब्लॉक बनाकर अर्जेंटीना को रोकने का प्रयास किया। उसके दस मिनट बाद थॉमस ट्यूशेल एक और रक्षात्मक बदलाव किया और मिडफील्डर डेक्लान राइस की जगह डिफेंडर निको ओ'रेली को मैदान में उतारा। साथ ही रीस जेम्स की जगह डैन बर्न को भी।


सके विपरीत स्कोलिनी ने आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने पहले निकोलस गोंजालेज को और फिर 81वें मिनट में लेफ्ट-बैक निकोलस टैग्लियाफिको की जगह स्ट्राइकर लोटारो मार्टिनेज को मैदान में उतारा। इससे खेल पर पूरी तरह से नियंत्रण अर्जेंटीना का हो गया। गॉर्डन के 55वें मिनट में किए गए पहले गोल और लोटारो मार्टिनेज के 90+2वें मिनट में किए गए विजयी गोल के बीच, इंग्लैंड के पास केवल 12 प्रतिशत गेंद का कब्ज़ा रहा क्योंकि अर्जेंटीना ने इस बीच हमलों की झड़ी लगा दी। इसका परिणाम अर्जेंटीना को 85वें मिनट में मिला जब  मेस्सी के पास पर बॉक्स से बाहर से एंज़ो फर्नांडीज ने शानदार लांग रेंज शॉट लगाकर मैच बराबरी पर ला दिया। सात मिनट बाद ही इंजरी टाइम के दूसरे मिनट में मेस्सी ने  दाहिनी ओर से जेड स्पेंस को पछाड़ते हुए एक जादुई क्रॉस दिया जिस पर लोटारो मार्टिनेज ने हेडर से गोल कर दिया और टीम को फाइनल में पहुंचा दिया। ये शायद मेस्सी के खेल जीवन के सबसे सुंदर और जादुई क्रॉस में से एक होगा। ये अर्जेंटीना का नॉक आउट दौर का सबसे अच्छा और कन्विंसिंग खेल था जिसमें वो सही मायने में चैंपियन की तरह खेल रही थी।


ये अर्जेंटीना का लगातार चौथा नॉक आउट मैच था जिसमें बिल्कुल अंत समय में जादू सा खेल दिखाकर विपक्षी टीम को ना केवल हतप्रभ किया बल्कि पूरी तरह पछाड़ दिया। वे किसी सोए शेर की तरह उठते और कुछ ही समय में विपक्ष के पूरे खेल को तहस नहस कर देते। राउंड ऑफ 32 में कोबे वर्डे के खिलाफ 110वें मिनट तक 2-2 की बराबरी पर थे। राउंड ऑफ 16 में 78 वें मिनट मिस्र से 0-2 से पीछे थे। क्वार्टर फाइनल में स्विट्ज़रलैंड से 111 वें मिनट तक 1-1 की बराबरी पर थे और सेमीफाइनल में इंग्लैंड से 85 वें मिनट तक 0-1 से पीछे थे। अंतिम परिणाम हम सब जानते हैं।

र्जेंटीना की टीम ने बताया आखिरी समय तक हार नहीं माननी चाहिए और प्रयास करते रहना चाहिए। सफलता मिलती ही है। कोई हार जब तक अंतिम नहीं होती जब तक समाप्ति की व्हिस्ल ना बज जाए।

नॉकआउट मैचों में अर्जेंटीना की टीम एक रूपक गढ़ती है, उस बुझते दिए का जो बुझने से पहले जोरदार तरीके से फड़कता है। मैदान (दिए) में जब समय( तेल) खत्म होने को ही होता है तो अर्जेंटीना की टीम (बाती) अचानक से अपनी सारी ऊर्जा और काबिलियत से फड़फड़ा उठती है और विपक्ष को ध्वस्त करके उत्पन्न प्रकाश रूपी आनंद से अपने प्रशंसकों के दिलों को दीप्त कर देती है। और फिर अगले मैदान की खोज में चल देते हैं।

और अर्जेंटीना के समर्थक खुशी से झूमकर कह उठते हैं -वामोस मेस्सी। वामोस अर्जेंतीना।

Wednesday, 15 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 25 : सेमीफाइनल एक


 


फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल की बात करने से पहले समय को थोड़ा पीछे लिए चलते हैं और स्मृति बन चुके दो मैचों को एक बार फिर याद कर लेते हैं।

एक, बात 5 जून 2025 के यूएफा नेशंस लीग की है। इस का दूसरा सेमीफाइनल फ्रांस और स्पेन के बीच खेला गया था। इस बहुत ही रोमांचक और संघर्षपूर्ण मुकाबले में कुल नौ गोल हुए। ये मैच स्पेन ने 5-4 से जीता।

दो,समय को थोड़ा और पीछे लिए चलते हैं। तारीख आती है 9 जुलाई 2024। स्थान एलियांज स्टेडियम म्यूनिख। एक और सेमीफाइनल। इस बार यूएफा यूरो 2024 प्रतियोगिता का। प्रतिद्वंदी वही स्पेन और फ्रांस। नतीजा भी वही। एक बहुत ही संघर्षपूर्ण व रोचक मुकाबले में स्पेन ने फ्रांस को 2-1 से हरा दिया।

तिहास अपने को दोहराता है। एक बार नहीं बार बार।

स बार स्थान अमेरिका का डलास। एक बार फिर सेमीफाइनल। इस बार फीफा विश्व कप 2026 का। प्रतिद्वंदी वही फ्रांस और स्पेन। नतीजा भी वही। स्पेन ने फ्रांस को 2-0 से हरा दिया।

तिहास की घटनाओं से कुछ निष्कर्ष निकाले जाते हैं। कुछ सबक सीखे जाते हैं। कुछ प्रेरणाएं ले जाती हैं। लोगों ने और विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि ये इस विश्व कप का सबसे शानदार मैच होने जा रहा है। एक ऐसा मैच जो आगे के समय में उद्धृत किया जाता रहेगा। एक फाइनल जो फाइनल से पहले होने जा रहा है। एक ऐसा मैच जिसका हाइप क्रिएट हो गया था। लेकिन निष्कर्ष गलत भी साबित होते हैं। इस बार वहीं हुआ।

ये स्पेन की एकतरफा जीत थी। कई बार आंकड़े घटनाओं की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर पाते। इस मैच की स्कोरलाइन भी नहीं कर रही है। स्पेन ने फ्रांस को कहीं टिकने नहीं दिया। याद कीजिए 8 जुलाई 2014 को बेलो होराइजेंटो के मिनईराको स्टेडियम में फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल को। जर्मनी ने मेजबान ब्राजील को 7-1 से हराकर जिस तरह ह्यूमिलेट किया था, ये उससे कम ना था।

हीं पता स्पेन ने फ्रांस पर पहली दो जीत से सबक सीखे थे या नहीं। या फिर उससे कुछ सीखने की जरूरत थी भी या नहीं, क्योंकि वे विजेता थे। और विजेता की दृष्टि धुंधली हो जाती है। लेकिन वे उन जीतों से एक चीज अवश्य लेकर आए थे। वो था उनका आत्मविश्वास।

मैच से पहले स्पेन के स्टार खिलाड़ी लामिन यामाल से फ्रांस से होने वाले मुकाबले के बारे में पूछा गया। ये सवाल बनता था। फ्रांस की टीम लगातार तीसरे विश्व कप के सेमीफाइनल में थी और लगातार तीसरे फाइनल तथा एक और विश्व कप जीतने का सपना देख रही थी। ऐसा सपना देखना गैर वाजिब नहीं था। उन्होंने 2018 का विश्व कप जीता था। 2022 के विश्वकप फाइनल में पेनाल्टीशूट आउट में अर्जेंटीना से हारे थे। यानी तीन विश्व कप में वे रेगुलर समय में अजेय थे। और यहां अमेरिका में वे तो विपक्षी दल में भय उत्पन्न कर देने की हद तक शानदार खेल दिखा रहे थे। वे सभी मैच बहुत आसानी से और बहुत ही कन्विंसिंग अंतर के साथ जीतकर यहां तक पहुंचे थे।

लेकिन स्पेन की टीम और उसके खिलाड़ी इस सब से निश्चिंत थे। लामिन यामाल ने पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा था कि 'हम फ्रांस से नहीं डरते। हमने निकट अतीत में उन्हें कई बार हराया है।'  ये यामाल का दंभ या अहंकार नहीं था। ये जमीनी हकीकत थी। वे निकट अतीत में फ्रांस को दो बार हरा चुके थे। ये निकट अतीत की जीत से अपने साथ यहां विश्व कप में लाया गया आत्मविश्वास बोल रहा था। अपनी योग्यता, अपनी काबिलियत पर उन्हें भरोसा था। इसी भरोसे वे इस सेमीफाइनल में फ्रांस के मुकाबिल थे। निडर। निशंक। दृढ़ प्रतिज्ञ। स्थितप्रज्ञ।

रअसल फ्रांस और स्पेन के बीच का ये सेमीफाइनल दो टीमों के फाइनल में पहुंचने और अपने विश्व कप को जीत लेने के सपने को वास्तविकता के और करीब ले आने का रास्ता भर नहीं था,बल्कि यूरोपियन फुटबॉल में श्रेष्ठता स्थापित करने की लड़ाई भी थी। ये अपराजित रक्षण और अजेय आक्रमण के बीच का द्वंद्व था। ये वैयक्तिक हीरोइज़्म और सामूहिक सामंजस्य के मध्य की होड़ थी। ये दो टीमों के खिलाड़ियों के बीच का द्वंद्व भर नहीं था,बल्कि दो दिग्गज प्रशिक्षकों के बीच का,उनके विचारों का, उनकी रणनीतियों का, उनकी काबिलियत की परीक्षा भी थी। ये दिदियेर डेसचैम्प्स और लुइस दे ला फुएंते के बीच संघर्ष था। ये लेस ब्लेस और ला रोजा के बीच मुकाबला था। यहां लाल रंग नीले रंग से मुकाबिल था।

फ्रांस ने 4-2-1-3 के और स्पेन 4-1-2-3 के फॉर्मेशन से खेल शुरू किया। दोनों टीमों के इरादे साफ थे। दोनों अटैकिंग खेलना चाहते थे। लेकिन अलग अलग संभावनाओं के साथ। 

स पूरे विश्व कप में फ्रांस ने शानदार अटैकिंग खेल दिखाया था। उनके पास अनस्टॉपेबल फॉरवर्ड की चौकड़ी थी - एम्बाप्पे, डेम्बेले, ओलिसे और बारकोला। उन्होंने अर्जेंटीना के बाद सबसे ज्यादा 16 गोल बनाये थे। उनको अपनी आक्रमण पंक्ति पर पूरा भरोसा था। उस आक्रमण पंक्ति पर जिसे रोक पाना किसी भी डिफेंस के लिए अब तक तो नामुमकिन रहा था। लेकिन जितनी चर्चा उनके अटैक की थी, उतनी ही डिफेंस की थी। डिफेंस उनका कमजोर माना जा रहा था। उनकी सोच रही होगी कि भले ही एकाध गोल हो जाएं पर अटैक इतना पावरफुल है कि विपक्षी पर ज्याद गोल मार देंगे। वे अपनी स्ट्रेंथ पर खेल रहे थे।

दूसरी तरफ स्पेन की सोच उलट थी। इस प्रतियोगिता में उनका डिफेंस लगभग अजेय रहा है। चट्टान की तरह। जिसे भेद पाना विपक्ष के लिए लगभग नामुमकिन था। उन्होंने केवल एक गोल खाया था। पूरी प्रतियोगिता की दौरान उनके डिफेंस की चर्चा रही थी।जबकि आक्रमण उनका शांत सा रहा था। लामिन यामाल ने केवल एक गोल किया था। केवल मिकेल ओयारज़ाबल ने चार गोल किए थे। और कोई भी खिलाड़ी गोल्डन बूट की दौड़ में शामिल नहीं था। वे अटैकिंग इसलिए ही खेल रहे थे कि शुरुआत में ही एक बार बढ़त बना लें, तो फिर वे अपना किला विपक्षी को नहीं ही भेदने देंगे। वे अपनी कमजोरी पर खेल रहे थे। उसे एड्रेस कर रहे थे। अजेय आक्रमण के सामने  अभेद्य रक्षण खड़ा था।

स्पेन की टीम मैदान में उतरते ही बॉल पर ऐसे कब्जा जमाती है मानो बॉल केवल उसकी मिल्कियत हो। वो ज़्यादा से ज्यादा बॉल पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती है। इसके लिए उसकी छोटे-छोटे पासों वाली 'टिकी-टाका' खेल शैली सबसे मुफीद बैठती है। इस मैच  में भी ऐसा ही हुआ। स्पेन ने शुरू से ही गेंद पर अपना दबदबा बनाए रखा। डेडलॉक को तोड़ने में स्पेन को केवल 22 मिनट लगे, जब फ्रांस के पेनल्टी क्षेत्र में लुकास डिग्ने ने लामिन यामाल पर फाउल किया और ओयारजाबल ने पेनल्टी से गोल बनाया।

ये लुकास डिग्ने की इतने करीबी मैच की ऐसी लापरवाही भरी भूल थी, जो अक्षम्य है। डिग्ने का यामाल से कोई क्लोज कॉन्टैक्ट नहीं था। उन्होंने या तो यामाल को नोटिस नहीं किया या फिर उन्हें लगा कि वे पहले ही गेंद क्लियर कर देंगे। ये एक गलती मैच का टर्निंग प्वाइंट था। इस गोल के आते ही स्पेन दोगुनी उत्साहित हुई और आत्मविश्वास आसमान पर था। उसके बाद दूसरे हॉफ के शुरू में 58वें मिनट में ओल्मा के पास पर पोरो ने गोलकर मैच के निर्णय पर अंतिम मुहर लगा दी। ये गोल स्पेन के लंबे मूव का परिणाम था और उसकी 'टिकी-टाका' शैली का सबसे शानदार निर्देशन भी।

स्पेन का पूरे मैच पर दबदबा रहा। उन्होंने गेंद पर पूरा नियंत्रण रखा और खेल की गति को अपने अनुसार नियंत्रित किया। स्पेन के दबदबे को इस बात से समझा जा सकता है कि फ्रांस के केवल दो शॉट लक्ष्य पर लगे। उन्होंने फ्रांस की मजबूत अग्रिम पंक्ति को हमला करने का कोई मौका ही नहीं दिया। अब तक की फ्रांस की जीतों में माइकल ओलिसे की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। वे शानदार प्लेमेकर थे। लेकिन इस मैच में कुकुरेला ने उन्हें पूरी तरह से मार्क करके रखा। उन्होंने बार-बार गेंद का पजेशन खोया और एक भी ड्रिबल पूरा नहीं कर पाए। औस्मान डेम्बेले को गेंद लेने के लिए बार बार पीछे आना पड़ रहा था। और एम्बाप्पे को गेंद मिल ही नहीं पा रही थी। 

स मैच पर रॉयटर्स की रोचक टिप्पणी थी कि 'स्पेन ने फ्रांस को अनाकोंडा की तरह जकड़ लिया था।'  एक और रोचक कमेन्ट एक्स पर डॉ रमाकांत राय का है। उन्होंने लिखा 'स्पेन ने अपने गोलपोस्ट पर काला जादू कर रखा है।' हां निसंदेह ये जादू ही है। काला जादू। इसमें क्या शक हो सकता है कि स्पेन पर अब तक केवल एक गोल हुआ है। हां ये जरूर है कि ये जादू किसी तंत्र मंत्र से सिद्ध नहीं है,बल्कि उनकी उस अभेद्य रक्षापंक्ति से सिद्ध हुआ है जिसमें कहीं कोई दरार नहीं है। जो चट्टान की माफिक है। वो जादू जो कप्तान रोड्री,फेबियन रूइज, ओल्मो  के मिडफील्ड तथा कुकुरेला, कुबारसी, लेपोर्टे और पोरो के बैक लाइन से बना है।

ये स्पेन की एक शानदार जीत है जो वैयक्तिक प्रतिभा के ऊपर टीम की सामूहिकता,उनके खिलाड़ियों के बीच बेहतरीन सामंजस्य और तालमेल की जीत है। ये स्पेन की फ्रांस पर बड़ी प्रतियोगिताओं के लगातार तीसरे सेमीफाइनल में जीत थी।

हार के बाद एम्बाप्पे कह रहे थे "हमने वो प्रदर्शन नहीं किया जो हम चाहते थे, न तो सामरिक दृष्टि से, न तकनीकी दृष्टि से और न ही समग्र स्तर पर। जब आप विश्व कप के सेमीफाइनल में वो करने में विफल रहते हैं जो आपको करना चाहिए, तो आप जीत नहीं सकते। स्पेन अपनी योजना और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहा। हमारी प्रेसिंग में संवाद की कमी थी... यहां तक ​​कि जब हमने गेंद पर दोबारा कब्जा जमाया, तब भी हमारे पहले पास और पहले टच विश्व कप सेमीफाइनल के लायक नहीं थे।"

अब फाइनल में उनका मुकाबला इंग्लैंड और अर्जेंटीना के बीच के होने वाले विजेता से होगा। फाइनल मैच की प्रकृति क्या होगी ये इस बात पर निर्भर करेगा कि दूसरे सेमीफाइनल में कौन जीतता है। इंग्लैंड जीतता है तो ये यूरो 24 का रेप्लिका होगा और यूरोप में फुटबॉल की श्रेष्ठता के लिए संघर्ष  बन जाएगा। और अगर अर्जेंटीना जीतती है तो ये दो महाद्वीपों यूरोप और दक्षिण अमेरिका के बीच फुटबॉल की पारंपरिक प्रतिद्वंदिता, दो फुटबॉल परंपराओं का द्वंद्व होगा। 

तो कल का इंतजार करिए।



Monday, 13 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी_24: क्वार्टर फाइनल मैच

 



फीफा विश्व कप के तीन रोमांचक दिन और बीते। चार संघर्षपूर्ण मुकाबले संपन्न हुए। और वो सब इतिहास का हिस्सा बना जो रात रात भर जाग कर फुटबॉल देखने के लिए चाहिए होता है। शानदार गोल। बेहतरीन बचाव। रणनीतिक चातुर्य। खिलाड़ियों का अद्भुत कौशल। कमाल की टैक्लिंग। और मोहक ड्रिबलिंग। करीबी और कड़े मुकाबले। और विवादों का चोली दामन का साथ। जीत और हार,खुशी और गम,उम्मीद और निराशा के बीच से होते हुए अंततः विश्व कप अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचा। मैचों का शतक पूरा हुआ। और बची विश्व की श्रेष्ठ चार टीमें। ताज के लिए अंतिम चार मुकाबले। फुटबॉल का खेल। उसका रोमांच। और फुटबॉल की अतरंगी दुनिया। 

एक 

1992 में फीफा रैंकिंग की शुरुआत के बाद ये पहला अवसर है जबकि श्रेष्ठ चार टीमें सेमीफाइनल में पहुंची हैं। फ्रांस,अर्जेंटीना,स्पेन और इंग्लैंड। अब मुकाबला होगा नंबर 1और 3 के बीच और नंबर 2 और 4 के बीच। देखना ये है कि क्या इस में अब कोई क्रम व्यतिक्रम होता है या नहीं। आखिर इन चारों टीमों का अंतिम चार में पहुंचना क्या प्रदर्शित करता है। यही कि फीफा रैंकिंग काफी हद तक विश्वसनीय है या फिर ये कि टीमों ने अपनी रैंकिंग और प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रदर्शन किया है। शायद दोनों ही।

दो

पहले दो क्वार्टर फाइनल मैच दो अलग अलग दिन खेले गए। दोनों मैच रेगुलर टाइम में समाप्त हुए। फ्रांस ने मोरक्को को 2-0 से और स्पेन ने बेल्जियम को 2-1 से हराया। बाकी दो मैच एक ही दिन में संपन्न हुए और दोनों ही मैचों में निर्णय के लिए अतिरिक्त समय की तो आवश्यकता आन पड़ी,लेकिन पेनाल्टी शूट आउट तक नहीं जाना पड़ा। अर्जेंटीना ने स्विट्जरलैंड को 3-1 से और इंग्लैंड ने नॉर्वे को 2-1 से हराया। 

तीन

पहला क्वार्टर फाइनल बोस्टन में फ्रांस और मोरक्को के बीच हुआ। उसने 2-0 से आसान जीत हासिल की। अभी तक फ्रांस के सामने कोई भी बड़ी परेशानी सामने नहीं आई है। उसने सभी मैच अपेक्षाकृत आसानी से जीते हैं। ये इस विश्व कप की सबसे शक्तिशाली और शानदार टीम है,इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है। इसीलिए उसे जीत का सबसे प्रबल और बड़ा दावेदार माना जा रहा है। उसके पास शानदार अटैकर है। भरोसेमंद मिडफील्डर हैं। और मजबूत रक्षापंक्ति है।


इस मैच में मोरक्को के सबसे भरोसेमंद फॉरवर्ड इस्माइल सैबारी चोट लगने के कारण नहीं खेल रहे थे। लेकिन इस मैच का सबसे आश्चर्यजनक पहलू ये था कि मोरक्को ने अपनी फर्स्ट इलेवन में एक भी रेगुलर फॉरवर्ड नहीं खिलाया। उनके रेगुलर फॉरवर्ड 60वें मिनट में पहला गोल खाने के बाद आए। ये गोल एम्बाप्पे ने पेनाल्टी से किया। दूसरा गोल छह मिनट बाद ही उस्मान डैंबेले ने किया।

 चार

लॉस एंजिलिस में खेले गए दूसरे मैच में स्पेन ने अंतिम क्षणों में विजयी गोल दागकर बेल्जियम को हरा दिया। स्पेन ने 30वें मिनट में पहला गोल किया। लामिन यामल और पेड्रो पोरो ने दाहिनी ओर से शानदार तालमेल बिठाते हुए डैनी ओल्मो के लिए गोल का मौका बनाया। हालांकि कर्टोइस ने ओल्मो के पहले शॉट को रोक दिया, लेकिन फैबियान रुइज़ ने रिबाउंड पर सटीक शॉट लगाकर गोल कर दिया।


 इस मैच से पहले स्पेन ने लगातार पांच मैचों में एक भी गोल नहीं खाया था। यानी गोलकीपर उनाई सिमोन ने विश्व कप में रिकॉर्ड बनाते हुए 650 मिनट तक कोई गोल नहीं खाया। ये सिलसिला मैच के 41वें मिनट में तब टूटा जब बेल्जियम के चार्ल्स डी केटेलेरे ने क्यूबार्सी को पछाड़ते हुए टिमोथी कास्टाग्ने के सटीक क्रॉस पर हेडर से गोल किया। 

मैच का निर्णायक क्षण मेरिनो के मैदान में उतरने के दो मिनट बाद आया। 88वें मिनट में, पाउ कुबार्सी ने एक जोरदार लॉन्ग-रेंज शॉट लगाया। बेल्जियम के सब्स्टीट्यूट गोलकीपर सेने लैमेंस रिबाउंड को रोक नहीं पाए, जिससे आर्सेनल के फॉरवर्ड मरिनो ने मैच के अपने दूसरे ही टच में गेंद को गोल में डाल दिया। इससे पहले मेरिनो ने राउंड ऑफ 16 में पुर्तगाल के खिलाफ भी 91वें मिनट में विजयी गोल किया था। 

बेल्जियम के लिए यह बेहद निराशाजनक अंत था। 71वें मिनट में उनके स्टार गोलकीपर थिबाउट कर्टोइस के चोटिल हो जाने के कारण उनकी जगह लैमेंस को मैदान में उतारा गया था।

पांच

मियामी में खेले गए तनावपूर्ण मैच में इंग्लैंड ने अतिरिक्त समय के बाद नॉर्वे को हराकर जीत हासिल की। जूड बेलिंघम ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन किया।

पहला गोल  36वें मिनट में एंड्रियास शेल्डरुप के गोल ने नॉर्वे को बढ़त दिला दी। शेल्डरुप ने एक क्रॉस को गलत तरीके से हिट किया जो जॉर्डन पिकफोर्ड के पोस्ट से टकराकर ऊपरी कोने में जा लगा। लेकिन सामान्य समय के हाफ-टाइम से ठीक पहले बेलिंगहैम ने एंथनी गॉर्डन के शानदार पास पर गोल दागकर इंग्लैंड ने बराबरी कर ली।  

90 मिनट के रेगुलर समय के बाद 1-1 से बराबर रहने के बाद, अतिरिक्त आधे घंटे के खेल में तीसरे मिनट में ओरजान नाइलैंड की गलती से मिले रिबाउंड पर बेलिंगहैम ने निर्णायक गोल किया।

ये मैच जितना इंग्लैंड के सेमीफाइनल में पहुंचने और विश्व कप अभियान जारी रह जाने के लिए याद किया जायेगा उससे कहीं ज्यादा नॉर्वे के दूसरे गोल को रद्द किए जाने और बॉल के तार को छू जाने के विवाद के लिए याद किया जाएगा।

नॉर्वे को टोरब्योर्न हेगेम के गोल से 2-1 की बढ़त मिल सकती थी, लेकिन कॉर्नर किक पर एर्लिंग हालैंड द्वारा इलियट एंडरसन को धक्का देने के कारण इसे रद्द कर दिया गया। वहीं, इस बात पर भी विवाद रहा कि क्या इंग्लैंड के पहले गोल पर पिच के ऊपर लगे तारों का कोई असर पड़ा था। नॉर्वे के कोच स्टाले सोलबक्केन का मानना ​​था कि नॉर्वे की गोल किक किसी तार से छू गई जिससे गेंद सीधे आसमान से गिरी,लेकिन फीफा के बॉल सेंसर ने कोई संपर्क नहीं दिखाया।

छह

केन्सास में खेले गए आखिरी क्वार्टर फाइनल मैच में पिछली चैंपियन अर्जेंटीना ने स्विट्जरलैंड को 3-1 से हराकर लगातार दूसरी बार सेमीफाइनल में जगह बनाई।

जूलियन अल्वारेज़ और लौतारो मार्टिनेज़ ने अतिरिक्त समय में गोल करके अर्जेंटीना के विजय अभियान को जारी रखा। मैच नियमित समय के अंत में 1-1 से समाप्त हुआ। पहला गोल दसवें मिनट में लियोनेल मेस्सी के क्रॉस पर एलेक्सिस मैक एलिस्टर ने किया। लेकिन 67 वें मिनट में डैन दोये ने बराबरी का गोल कर दिया।


दोये के गोल के तुरंत बाद ही वीएआर निर्णय के बाद ब्रेल एम्बोलो को फाउल का नाटक करने के लिए मैदान से बाहर भेज दिया गया। ब्रील एम्बोलो को 'डाइव' लगाने के लिए पीला कार्ड दिखाया गया ।क्योंकि इस मैच का ये उनका दूसर पीला कार्ड थे जो स्वतः ही रेड कार्ड में तब्दील हो गया। विश्व कप की शुरुआत से ठीक पहले संशोधित किए गए 'गलत पहचान नियम' के कारण रेफरी के पास पीला कार्ड दिखाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। टूर्नामेंट के दौरान ऐसा निर्णय पहली बार नहीं लिया गया था। इससे पहले, अमेरिका और पैराग्वे के बीच समूह चरण के एक मैच में, अमेरिकी डिफेंडर टिम रीम को दिया गया पीला कार्ड वीएआर द्वारा मिगुएल अल्मियन की डाइव की समीक्षा के बाद रद्द कर दिया गया था, जिसके बाद अल्मियन को चेतावनी दी गई थी।

तो फुटबॉल जारी है। उसका रोमांच सब पर तारी है। यानी गेम ऑन है और उसका रोमांच फुल ऑन। बस थोड़ी सी नींद में खलल डालिए और फुटबॉल के खेल का आनंद लीजिए।



Wednesday, 8 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 22:रोनाल्डो विश्व कप से विदा

 


क्रिस्तियानो रोनाल्दो को आप पसंद करें या ना करें, ये व्यक्तिगत चॉइस हो सकती है। आप उनसे प्यार करें या घृणा,ये भी व्यक्तिगत पसंद हो सकती है। लेकिन ये तथ्य अटल सत्य है कि वो फुटबॉल खेल के महानतम खिलाड़ियों में से एक हैं, जिन्होंने फुटबॉल को फुटबॉल बनाया। इस बात से भी उनकी महानता पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने कोई विश्व कप जीता या नहीं।

नेमार ने विश्व कप नहीं जीता। अल्फ्रेडो डी स्टेफानो ने नहीं जीता,फेरेंक पुस्कास ने नहीं जीता,जोहान क्रूएफ ने नहीं जीता, मिशेल प्लातिनी ने नहीं जीता,रॉबर्टो बैजियो ने नहीं जीता। लेकिन क्या उनके महान होने में किसी तरह का कोई संदेह किसी को भी है।

ये बात इसलिए कि मौजूदा विश्व कप में स्पेन से हार के बाद उनकी एक सम्मानजनक विदाई बनती थी, जो उनके साथियों ने ही नहीं की। पूरी टीम उन्हें छोड़कर सीधे टनल में जा पहुंची,उनके साथियों से अधिक संवेदनशीलता तो स्पेन के खिलाड़ियों ने दिखाई। खुद लामिन यामाल उन्हें सांत्वना और सम्मान दे रहे थे। ये एक महानतम खिलाड़ी के साथ बेहद असंवेदनशील व्यवहार था। ये खेल भावना कतई नहीं हो सकती।

चाहे जो हो मेरे तईं तो मेस्सी दिल है तो रोनाल्दो दिमाग। दिल लियोनेस मेस्सी से प्यार करता है,पर दिमाग रोनाल्दो का सम्मान। मेस्सी कोई कलात्मक अभिव्यक्ति है, तो रोनाल्दो वैज्ञानिक सूत्र। मेस्सी किसी कृति का भाव पक्ष है तो रोनाल्दो उसका शिल्प। 

मेस्सी जिस खेल का महान खिलाड़ी है ना तुम उसके चैंपियन हो। और चैंपियन ही रहोगे। 

अदेउस दे रोनाल्दो दा कोपा मुंदो।

Tuesday, 7 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 21: पोएटिक जस्टिस




बेल्जियम की टीम द्वारा यूनाइटेड स्टेट्स की टीम को 4-1 से रौंद दिया जाना 'पोएटिक जस्टिस' है। बोस्निया के विरुद्ध मैच में यूएस के सबसे बड़े और मुख्य स्ट्राइकर बालोगन को रेड कार्ड मिला। रेड कार्ड मिलते ही उस खिलाड़ी का स्वतः ही अगला मैच ना खेलना तय हो जाता है। लेकिन बालोगन की ये सजा एक साल के लिए स्थगित कर दी गई। कमाल की बात है कि इस स्थगन के लिए फीफा की और से किसी भी तरह का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

सी विश्व कप अब तक 11 और खिलाड़ियों को भी रेड कार्ड मिले हैं और वे सस्पेंशन की सजा भुगत रहे हैं। इसमें कतर के असीम मडिबो भी शामिल हैं। इस फाउल में कनाडा के इस्माइल कोने के पैर में फ्रक्चर हो गया था। असीम मडिबो पर पांच मैचों का प्रतिबंध लगा है जबकि उनका टेकल उतना खतरनाक प्रकृति का नहीं था। चोट लगना कुछ हद तक संयोग था।

फीफा विश्व कप में अब तक लगभग 190 रेड कार्ड खिलाड़ियों को मिले हैं। बालोगन से पहले केवल एक खिलाड़ी ऐसे हैं जिनकी सज़ा सस्पेंड की गई हैं और वे है विश्व के महानतम खिलाड़ियों में एक ब्राजील के गरींचा जिन्हें ये इम्युनिटी 1962 के विश्व कप में मिली थी जब अनुशासनात्मक कमेटी ने उनकी सजा को स्थगित कर दी थी।

क्रिस्टियानो रोनाल्डो को आयरलैंड के खिलाफ विश्व कप क्वालीफायर मैच में सीधे रेड कार्ड के कारण 3 मैचों का प्रतिबंध मिला था। हालांकि यहां भी फीफा ने उनके शानदार ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए 2 मैचों का प्रतिबंध एक साल की अवधि के लिए निलंबित कर दिया था जिससे वह 2026 विश्व कप के शुरुआती मैचों में खेल पाए। फिलहाल वे भी विश्व कप से बाहर हो चुके हैं।

और हां, मूर्खाधिपति महाराज मुंह के बल औंधे पड़े हैं।

Saturday, 4 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 19: काबो वर्डे




अक्सर चीजें मृत्यु के बाद अधिक खूबसूरत लगने लगती हैं। अधिक प्रिय हो आती हैं। 

कई बार हार भी इतनी प्रभावशाली होती है जीत पृष्ठभूमि में चली जाती है। 

ये फीफा कप चाहे जो जीते। लेकिन इस विश्व कप का वो दृश्य क्रिएट हो चुका है जो अब फुटबॉल प्रेमियों के मानस से कभी नहीं मिटने वाला है। 

एक पल आकर हमेशा के लिए रुक गया है जिसे अब कभी नहीं बीतना है। 

वाह काबो वर्डे। 

आह काबो वर्डे।

आपने इस विश्व कप से विदा ली है। हमारे दिलों से नहीं।

"Bu ta fika gravadu na nos korason pa sempre. Un abrasu di dipidida."

Friday, 3 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 18

 


क्रिकेट खेल को सबसे ज्यादा अनिश्चितताओं का खेल कहा गया है कि जब तक आखिरी बॉल ना फेंक दी जाए तब तक कोई परिणाम तय नहीं समझना चाहिए।

लेकिन इन दिनों रात रात भर जागकर फुटबॉल देखने वाले कहेंगे ये बात तो फुटबॉल के खेल पर भी उतनी ही लागू होती। कि फुटबॉल का कोई भी परिणाम उस समय तक तय नहीं माना जा सकता जब तक कि मैच समाप्ति की व्हिस्ल ना बज जाए।

एक

बुधवार को फीफा विश्व कप के राउंड ऑफ 32 में अटलांटा स्टेडियम में इंग्लैंड का मुकाबला कांगो डीआर से था। मैच में इंग्लैंड फेवरिट था। लेकिन कांगो के खिलाड़ियों ने शुरूआत ही आक्रामक रुख अपनाया। सात मिनट बीतते बीतते बायन सिपेंगा को बॉक्स के बाएं फ्लैंक में एक पास मिला और उनका शानदार ग्राउंडेड शॉट इंग्लैंड के एक डिफेंडर और गोली की छकाते हुए गोल के जाल में जा धंसा। कांगो डीआर ने एक गोल की बढ़त से इंग्लैंड की टीम को ही नहीं पूरे स्टेडियम को सकते में डाल दिया। 

अगले 68 मिनट इंग्लैंड की आक्रामक पंक्ति का कांगो डीआर के गोलकीपर लियोनेल म्पासी के बीच मुकाबला था। इस दौरान इंग्लैंड विश्व कप के इतिहास में सबसे बड़ी अपमानजनक हार से बचने के लिए लगातार आक्रमण कर रही थी और गोलकीपर लियोनेल म्पासी कांगो की ऐतिहासिक जीत के लिए प्रतिबद्ध गोल के सामने अभेद्य दीवार बने खड़े थे। इस 68 मिनट के समय में उन्होंने इंग्लैंड को रोकने के लिए कई शानदार बचाव किए।

कांगो एक इतिहास रचने और इंग्लैंड एक अपमानजक हार से केवल 15 मिनट की दूरी पर थे कि कप्तान हैरी केन ने 75 वें मिनट में गार्डन के क्रॉस पर हेडर से गोलकर स्कोर 1-1 कर दिया। उसके बाद भी लगा कि मैच एकस्ट्रा टाइम में जा रहा है कि 86वें मिनट में हैरी केन ने मैच का एक और गोल दाग दिया। केन ने  बॉक्स के किनारे पर गेंद को अपने कब्जे में लिया, घूमे, आगे बढ़े और अपने दाहिने पैर से जोरदार शॉट लगाकर म्पासी को पछाड़ते हुए इंग्लैंड को बड़े संकट से उबार लिया।

बिल्कुल किनारे आकर कांगो डी आर की नाव डूब गई। एक सपना दुःस्वप्न में बदल गया। एक इतिहास बनते बनते रह गया।

अगर अभी भी फुटबॉल की अनिश्चितता में कोई संदेह हो तो फिर सिएटल में हुए बेल्जियम और सेनेगल के बीच हुए मैच को देखना चाहिए।

बेल्जियम अपने ग्रुप में शीर्ष पर रहा था,जबकि सेनेगल की टीम अपने ग्रुप में तीसरे स्थान पर रही थी और तीसरे स्थान पर रहने वाली शीर्ष आठ टीमों में होने के कारण नॉक आउट दौर में पहुंची थी।

मैच में बेल्जियम को संभावित विजेता माना जा रहा। था। लेकिन मैच में पहले बढ़त सेनेगल ने बनाई, हबीब डियारा के 25वें मिनट में किए गए गोल से। इसके बाद दूसरे हाफ के छह मिनट बाद इस्माइला सार ने टूर्नामेंट के सबसे बेहतरीन गोलों में से एक गोलकर सेनेगल की बढ़त को दोगुना कर दिया। 

सेनेगल ने मैच के अधिकांश हिस्से में दबदबा बनाए रखा और बेल्जियम का अप्रत्याशित रूप से टूर्नामेंट से बाहर होना तय लग रहा था। अब सेनेगल की जीत केवल चार मिनट दूर थी कि 86वें मिनट में स्थानापन्न  बेल्जियम के रोमेलु लुकाकू ने गोल करके अंतर कम किया। इस गोल के महज तीन मिनट बाद, 89वें मिनट में यूरी टिलेमैन्स ने बराबरी का गोल दागकर मैच को अतिरिक्त समय तक पहुंचा दिया। 

अब पेनल्टी शूटआउट से कुछ ही सेकंड पहले, अतिरिक्त समय के अंतिम क्षणों में टिलेमैन्स को पेनल्टी बॉक्स के अंदर गिरा दिया गया। वीएआर समीक्षा के बाद, रेफरी ने बेल्जियम को पेनल्टी दी। टिलेमैन्स ने अतिरिक्त समय के पांचवें मिनट में गोल दाग दिया। बेल्जियम ने ये मुकाबला 3-2 से जीत लिया।

बेल्जियम का ये तीसरा गोल फीफा विश्व कप के इतिहास में सबसे देर से किया गया गोल था और ये मुकाबला प्रतियोगिता के सबसे यादगार नॉकआउट मुकाबलों में से एक।

दो

ये सेनेगल के दुर्भाग्य का अकेला उदाहरण नहीं था। दुर्भाग्य है कि मानो उसका साया बन उसके साथ कदमताल कर रहा हो। 

इस वर्ष के अफ्रीका कप ऑफ नेशंस के फाइनल में सेनेगल ने मेज़बान मोरक्को को हरा दिया था। लेकिन बाद में कॉन्फेडरेशन ऑफ अफ्रीकी फुटबॉल के अपील बोर्ड ने सेनेगल से खिताब छीनकर मोरक्को को विजेता घोषित कर दिया। इसके पीछे का मुख्य कारण यह था कि मैच के अंतिम क्षणों में विवादास्पद पेनल्टी दिए जाने के विरोध में सेनेगल की टीम और कोच ने लगभग 15 मिनट के लिए मैदान छोड़ दिया था, जो कि नियमों के खिलाफ था।

इतना ही नहीं इससे भी पहले 2018 के विश्व कप में सेनेगल की टीम ग्रुप चरण के बाद 'फेयर प्ले' नियमों के आधार पर बाहर हो गई थी। ग्रुप में जापान और सेनेगल दोनों के चार चार अंक थे और गोल अंतर भी समान था। तो फैसला फेयर प्ले नियम के आधार पर हुआ जिसमें सेनेगल बाहर हो गया क्योंकि सेनेगल को जापान से अधिक येलो कार्ड मिले थे।

तीन

खेलों में भारत के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खराब प्रदर्शन के लिए अक्सर संसाधनों की कमी और सुविधाओं की कमी का रोना सुनाई देता है। लेकिन सेनेगल की टीम और उसका शानदार प्रदर्शन इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि परिश्रम,लगन, दृढ़ इच्छा शक्ति और पैशन हो तो संसाधनों की कमी भी आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।

सेनेगल की टीम को संसाधनों के अभाव में विश्व कप से पहले और विश्व कप के दौरान बहुत सारी कठिनाइयों से गुजरना पड़ा है। विश्व कप के दौरान सेनेगल की फुटबॉल टीम को समय पर वेतन न मिलने, घटिया होटल और खराब खाने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ा। कोच पापे थियाव बिना किसी आधिकारिक कॉन्ट्रैक्ट के काम कर रहे थे और उन्हें छह महीनों तक उनका वेतन नहीं दिया गया। इसके अलावा अफ्रीका कप ऑफ नेशंस के फाइनल मुकाबले में विरोध स्वरूप मैदान छोड़ने के कारण अनुशासनात्मक कार्रवाई का दंश भी टीम पर भारी पड़ा। कोच समेत कई मुख्य खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगाए जाने से टीम की तैयारी बुरी तरह प्रभावित हुई।

इतनी सारी समस्याओं से जुझते हुए जो शानदार प्रदर्शन टीम ने दिखाया वो कमाल का है।

चार

विश्व कप के दौरान विभिन्न टीमों के समर्थकों और प्रशंसकों के मैच से पहले और जीत के बाद शानदार जश्न मनाते देखा है और उनके खूबसूरत दृश्यों को भी। लेकिन जब ये जोश उन्माद में बदल जाता है तो कुछ बदरंग और भयावह तस्वीरें सामने आती हैं।

 पहले नॉक आउट मैच में सह मेजबान मेक्सिको की टीम ने इक्वेडोर पर 2-0 से ऐतिहासिक विजय दर्ज की और चालीस साल बाद प्री क्वार्टर फाइनल में पहुंचे। इसका जश्न मनाने के लिए एक साथ 14 लाख से ज्यादा लोग मेक्सिको सिटी की सड़कों पर आ गए। भीड़े दम घुटने से टीम के तीन प्रशंसकों की मृत्यु हो गई। 

फुटबॉल विश्व कप दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन है और इसे वैश्विक सांस्कृतिक एकता  का भी वाहक माना जाता है। लेकिन सबसे ज्यादा हिंसक घटनाएं भी फुटबॉल के खेल में ही होती हैं। दरअसल जब जोश उन्माद बदल जाता है,सह अस्तित्व की भावना विद्वेष में बदल जाता है,वैश्विक भावना संकीर्ण राष्ट्र वाद में बदल जाती है और आपसी भाई चारा नस्लवाद में बदल जाता है, तो हिंसक घटनाएं जन्म लेती ही हैं। ये विश्व कप भी ऐसी घटनाओं से अछूता नहीं रहा।

नॉक आउट दौर में जब मोरक्को ने नीदरलैंड को हराया तो हेग में कुछ हिंसक घटनाएं हुई। नीदरलैंड में  बड़ी संख्या में मोरक्को के प्रवासी हैं लगभग चार लाख। इसमें नीदरलैंड के हारने नीदरलैंड्स के कई शहरों में हिंसक झड़पें और उपद्रव हुए। मोरक्को की जीत के जश्न के दौरान हेग  जैसे शहरों में भारी हिंसा भड़क गई, जिसके कारण पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। 

ये निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

Wednesday, 1 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 16: ओरलैंडो गिल



ये विश्व कप जितना फॉरवर्ड्स का है,उतना ही गोलकीपर्स का भी है। जितना मेस्सी,क्रिश्चियनों रोनाल्डो,म्बापे,हॉलैंड,विनिसियस जूनियर, उस्मान डेंबेले,इस्माइल सैबारी, यामल का है,उतना ही वोजिन्हा, एलॉय रूम, अलिरेजा वेइरानवंद और ग्रेगोर कोबेल  का भी है। 

विश्व कप की प्रीमियर गोलकीपर्स की इस जमात में अब एक नाम ओरलैंडो गिल का नाम भी जुड़ गया जर्मनी के खिलाफ पैराग्वे की जीत के हीरो उनके  छह फीट छह इंच लंबे भारतीय मूल के गोलकीपर ओरलैंडो गिल थे जिन्होंने पेनाल्टी शूट आउट में  दो शानदार बचाव किए और पैराग्वे की ऐतिहासिक जीत को संभव बनाया। फिलहाल मैदान के अंदर शानदार रक्षण के अलावा वे इस बात को लेकर के लिए भी चर्चा में हैं कि अपनी खराब आर्थिक दशा के कारण अपने बेटे के जन्म के समय उन्हें अपनी अंडर 20 जर्सी,जूते और अपने अन्य उपकरण बेच दिए थे।

प्रसिद्धि का एक परिणाम ये होता है कि आपके जीवन के अनछुए, अनचिह्ने पहलू सार्वजनिक हो जाते हैं। और एक समय के बाद वे किंवदंतियों की तरह उद्धृत किए जाने लगते हैं।

फिलहाल ओरलैंडो दो गोल पोस्टों के बीच खड़े नए हीरो हैं।

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 15 : इस्माइल सैबारी

 


आज नीदरलैंड और मोरक्को के बीच मैच का निर्णय पेनाल्टी शूट आउट से हुआ। यहां भी चार-चार पेनाल्टी के बाद स्कोर 2-2 की बराबरी था। नीदरलैंड की तरफ से पांचवीं पेनाल्टी क्रिसेंसियो समरविले ने ली और बॉल बाहर मार दी। अब हार जीत का सारा दारोमदार एक खिलाड़ी पर था जो मोरक्को की पांचवीं पेनाल्टी ले रहा था। उसका नाम था इस्माइल सैबारी। उसने अपना संतुलन बनाए रखा। उसने शॉट लिया और बॉल नीदरलैंड के गोलकीपर की डाइव की विपरीत दिशा में गोल के बाएं ओर जाल में उलझा दी।

नीदरलैंड के विरुद्ध मोरक्को की इस जीत के नायक इस्माइल थे, इस्माइल सेबारी। वो इस्माइल सेबारी जो डच लीग के सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। जो डच फुटबॉल क्लब इंडोहोवेन से खेलते हैं। वो इस्माइल सेबारी जो बचपन में अस्थि संबंधी विकार के कारण ठीक से खड़े भी नहीं हो पाते थे। जिन्हें बचपन में चलने और खड़े होने के लिए 'ऑर्थोटिक ब्रेस' का प्रयोग करना पड़ता था। वो इस्माइल सेबारी जिसने तब भी हार नहीं मानी और फुटबॉल खेलना शुरू किया। और जब बेल्जियम की एंडरलेक्ट टीम के लिए ट्रायल दिया तो मोटापे की वजह से सिलेक्शन ना हो सका। उन्होंने तब भी हार नहीं मानी और खेलना जारी रखा। वही इस्माइल सेबारी आज राष्ट्र की उम्मीद है,टीम का नायक हैं, विश्व कप के सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों में शुमार हैं,फुटबॉल प्रेमियों का हीरो है।

अपने पहले विश्व कप में चार मैचों में चार गोल। पहले मैच में ब्राजील के विरुद्ध 1-1 से ड्रॉ में गोल, स्कॉटलैंड के विरुद्ध 1-0 से जीत में 71वें सेकंड में इस विश्व कप का दूसरा सबसे तेज गोल, हैती के विरुद्ध 4-2 से जीत में एक गोल,और नीदरलैंड के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण पेनाल्टी पर गोल।

क्या ही कमाल खिलाड़ी है। 

दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति के आगे हर बाधा बेमानी हो जाती है।



Tuesday, 30 June 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 14: उलटफेर का दिन



 फीफा विश्व कप फुटबॉल 2026 के नॉक आउट चरण के पहले दिन ही सोमवार को जो कुछ हुआ,उसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था। इसकी प्रस्तावना पिछले 18 दिनों से लिखी जा रही थी। कुराकाओ और केप वर्डे जैसी टीमों ने अपने खेल और अपने तेवर से ये स्पष्ट कर दिया था कि बड़ी से बड़ी टीम अपनी जीत को ग्रांटेड नहीं ले सकती। यहां हर जीत को अर्जित करना पड़ता है मेहनत, संघर्ष और हुनर से। ये पहले ही तय हो गया था कि अगला दौर किस इंटेंसिटी से खेला जाने वाला है। इंटेंसिटी इसलिए भी कि यहां से किसी भी टीम के लिए वापसी करने का कोई रास्ता नहीं है। अब सिर्फ और सिर्फ करो या मरो। ना कम ना ज्यादा। केवल दो परिणाम हार या जीत। दो रास्ते आगे बढ़ो या घर वापस हो लो।

नॉक आउट दौर के पहले दिन चार मुकाबले हुए। चार में से दो मैचों का निर्णय 120 मिनट के खेल के बाद पेनाल्टी शूट आउट से हुआ। बाकी दो मैचों का निर्णय भी 90 मिनट के बाद इंजरी टाइम में खेल समापन की आखिरी व्हिस्ल बजने से बस पहले। दो उलटफेर हुए और एक होते होते बचा तो मेजबान टीम के आगे बढ़ने का क्रम जारी रहा।

एक

पहले बात नीदरलैंड और मोरक्को के बीच हुए मैच की। मैच शुरू से संघर्षपूर्ण था। मैच का पहला गोल 71 वें मिनट में नीदरलैंड के स्टार खिलाड़ी कोडी गेपको ने किया। 90 मिनट तक ये बढ़त बरकरार रही। जब लगा कि रोनाल्ड कोमेन की टीम अगले दौर में जा रही है तो इंजरी टाइम में 91वें मिनट मोरक्को के ईसा डिओप के गोलकर स्कोर बराबर कर दिया। मैच एकस्ट्रा टाइम में गया पर स्कोर  1-1 ही रहा। 


अब निर्णय पेनाल्टी शूट आउट से होना था। पेनाटली शूट आउट में भी चार चार पेनाल्टी के बाद स्कोर 2-2 पर बराबर था। नीदरलैंड की तरफ से पांचवीं पेनाल्टी क्रिसेंसियो समरविले ने ली और बॉल बाहर मार दी। अब हार जीत का सार दारोमदार एक खिलाड़ी पर था जो मोरक्को की पांचवीं पेनाल्टी ले रहा था। उसका नाम था इस्माइल सैबारी। उसने अपना संतुलन बनाए रखा। उसने शॉट लिया और बॉल नीदरलैंड के गोलकीपर की डाइव की विपरीत दिशा में गोल के बाएं और जाल में उलझा दी।

मोरक्को पेनाल्टी शूटआउट 3-2 से जीत चुका था। उसने एक इतिहास रच दिया था। इस बार डच टीम को हरा कर। उसने बताया कि पिछले विश्व कप में सेमीफाइनल तक का उनका सफर कोई संयोग नहीं था। इस जीत के नायक इस्माइल थे इस्माइल सेबारी। वो इस्माइल सेबारी जो डच लीग के सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। जो डच फुटबॉल क्लब इंडोहोवेन से खेलते हैं। वो इस्माइल सेबारी जो बचपन में अस्थि संबंधी विकार के कारण ठीक से खड़े भी नहीं हो पाते थे। जिन्हें बचपन में चलने और खड़े होने के लिए 'ऑर्थोटिक ब्रेस' का प्रयोग करना पड़ता था। वो इस्माइल सेबारी जिसने तब भी हार नहीं मानी और फुटबॉल खेलना शुरू किया। और जब बेल्जियम की एंडरलेक्ट टीम के लिए ट्रायल दिया तो मोटापे की वजह से सिलेक्शन ना हो सका। उन्होंने तब भी हार नहीं मानी और खेलना जारी रखा। वही इस्माइल सेबारी आज राष्ट्र की उम्मीद है,टीम का नायक हैं, विश्व कप के सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों में शुमार हैं,फुटबॉल प्रेमियों का हीरो है। अपने पहले ही विश्व कप में चार गोल। अपने पहले मैच में ब्राजील के  खिलाफ 1-1 ड्रॉ में गोल,स्कॉटलैंड के खिलाफ 1-0 से जीत में 71वें सेकंड में गोल, हैती के विरुद्ध 4-2 से जीत में गोल और नीदरलैंड के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण पेनाल्टी पर गोल। कमाल का खिलाड़ी है।

दूसरी ओर नीदरलैंड्स के लिए वर्ल्ड कप का मैच अतिरिक्त समय में या पेनल्टी शूटआउट में हारना दुर्भाग्य या किसी शाप की बात है। ये अविश्वसनीय आ ही लगता है कि नीदरलैंड ने 2010 के बाद से विश्व कप का कोई भी मैच निर्धारित समय सीमा में नहीं हारा है। आज के मैच से पहले उसके नाम 10 जीत और पांच ड्रॉ दर्ज हैं। और वो जब भी हारी, एकस्ट्रा टाइम में ही हारी फिर चाहे वो 2014 के सेमीफाइनल और 2022 के क्वार्टरफाइनल में अर्जेंटीना से पेनल्टी शूटआउट में हार हो या फिर आज मोरक्को से हार हो।

दो

एशिया ओशियाना क्षेत्र से दो टीमें नॉक आउट में पहुंची थीं - जापान और ऑस्ट्रेलिया। कल जापान का  सफर खत्म हुआ और एशिया की आधी उम्मीद भी। आधी इसलिए कि अभी ऑस्ट्रेलिया बाकी है। ब्राजील और जापान के बीच एक बेहद रोमांचक और कड़ा मुकाबला हुआ। जापान हारे जरूर लेकिन कड़े संघर्ष के बाद। एक सम्मानजनक हार। कि हारे जरूर पर दिल जीत लिया।

पहला गोल जापान ने 29वें मिनट में किया। जापानी मिडफील्डर काइशु सानो ने मध्य मैदान से एक पास बहुत ही शानदार तरीके से इंटरसेप्ट किया और शानदार गोल दाग कर जापान को एक गोल से बढ़त दिला दी। हॉफ टाइम तक यही स्कोर रहा। दूसरे हॉफ में ब्राजील की टीम बदली दिखाई दी। उसने जापानी गोल पर आक्रमणों की झाड़ी लगा दी। जल्द ही इसका लाभ मिला और कशमीरो ने शानदार गोलकर स्कोर बराबर कर दिया। उसके बाद  90 मिनट तक कोई भी टीम गोल नहीं कर सकी। जब ये लगने लगा कि मैच एक्स्ट्रा टाइम में जाएगा तो इंजरी टाइम में 95वें मिनट में मार्टीनेली ने गोलकर ब्राजील को 2-1 से जीत दिला दी। 

ये निश्चित है मैच अतिरिक्त समय में जाता या फिर पेनाल्टी से निर्णय होता, तो कुछ भी हो सकता था। ब्राजील ने बहुत करीबी जीत हासिल की और एक अपसेट वाले दिन में खुद को बड़े अपसेट से बचा लिया।

तीन

दिन का सबसे बड़ा उलटफेर पैराग्वे ने किया। उसने जर्मनी की टीम को पेनाल्टी शूट में 4-3 से हराकर पहली बार प्री क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई। ये पैराग्वे के फुटबॉल इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर था।

समय-समय की बात है। कोई एक समय होता था जब जर्मनी से प्रतियोगिता को जीत लेने की उम्मीद की जाती थी। वो आठ बार विश्व कप के फाइनल में पहुंच चुका है और चार बार जीत चुका है। वो यूरोपीय चैंपियनशिप के भी छह फाइनल खेल चुका हैं जिसमें से तीन उसने जीते हैं। प्रतियोगिता के शुरू होने के समय पैराग्वे की विश्व रैंकिंग 41वीं थी और जर्मनी 10 वें पायदान पर था। लेकिन पहले चरण ने एक बात स्पष्ट कर दी थी कि बड़ी टीम होना,फेवरिट होना या  जीत का समृद्ध इतिहास होना जीत की गारंटी नहीं है।

गेंद पर 75 प्रतिशत नियंत्रण के बावजूद पहला गोल 42वें  मिनट में पैराग्वे के स्ट्राइकर जूलियो एनसिसो ने किया। जबकि सुव्यवस्थित आक्रमण के बावजूद जर्मनी की टीम गोल नहीं कर पाई। जर्मनी की तरफ से बराबरी का गोल काई होवर्ट्ज ने 54 वें मिनट में हेडर से किया। मैच के अतिरिक्त समय में भी गोल ना होने के कारण पेनाल्टी शूट से निर्णय हुआ। यहां भी इतिहास जर्मनी के साथ था। जर्मनी ने विश्व कप के अब तक हुए अपने चारों पेनाल्टी शूट जीते थे। लेकिन यहां पैराग्वे ने पैनल्टी शूट में 4-3 से हारकर विश्व कप का सबसे बड़ा उलटफेर कर दिया।

चार

तीनों सह मेजबान देशों के लिए प्रतियोगिता अभी तक बेहतरीन रही है। मेक्सिको,यूएस और कनाडा तीनों ही देशों ने नॉक आउट के लिए क्वालीफाई कर लिया है। और अब नॉक आउट के पहले मैच में मेजबान कनाडा ने दक्षिण अफीका को हराकर प्रीक्वार्टर फाइनल प्रवेश कर लिया है,जहाँ उसका मुकाबला मोरक्को से होगा।

ये भी एक संघर्षपूर्ण और रोमांचक मैच था। लेकिन कोई भी टीम पूरे समय में गोल करने में सफल नहीं हो सकी। जब ये लगने लगा कि मैच अतिरिक्त समय में जाएगा,तब इंजरी टाइम में 92 वें मिनट में कनाडा के कप्तान स्टीफन यूस्टाक्वियो ने गोलकर टीम को जीत दिला दी।

तो अब प्री क्वार्टर फाइनल की चार टीमें निश्चित हो चुकी हैं - कनाडा,पैराग्वे,मोरक्को और ब्राजील। इसके साथ ही एक मैच भी निश्चित हो चुका है-कनाडा और मोरक्को का। पहले दिन के मैचों के परिणाम ये उदघोष कर रहे हैं 'पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त'।


Monday, 29 June 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 13:प्रथम चरण



 किसी भी प्रतियोगिता के दौरान अनेक ऐसे दृश्यों और क्षणों की निर्मिति होती है जो लोगों की स्मृति का एक बड़ा हिस्सा घेर लेते हैं। वे इतने प्रभावशाली होते हैं कि लोगों की स्मृति में हमेशा के लिए चस्पां हो जाते हैं। और जीत से निर्मित दृश्य या क्षण पृष्ठभूमि में चले जाते हैं या खो जाते हैं। अगर आप फीफा विश्व कप का इतिहास उठाकर देखेंगे तो पता लगेगा कि विश्व कप के सबसे यादगार पल वे शायद ही कभी होते हों जिनमें कोई टीम ट्रॉफी उठाती है। विश्व कप 2026 भी शायद ही इसका अपवाद बने। 

1950 में माराकांजो त्रासदी, 1994 में रॉबर्टो बैजियो द्वारा ब्राजील के खिलाफ चूका गया पेनल्टी शॉट,1986 में माराडोना का हैंड ऑफ गॉड गोल और गोल ऑफ सेंचुरी,2006 में जिनेदिन ज़िदाने का हेड बट,2014 में ब्राजील की सेमीफाइनल में जर्मनी से 1-7 हार जैसे कितने ही क्षण हैं, जो जीत से ज्यादा स्मृति में जगह घेरते हैं,और कहीं गहरे पैठ जाते हैं।

प्रतियोगिता का पहला चरण लीग स्टेज समाप्त हो चुका है। 48 में से 12 टीमें घर वापस जा चुकी हैं। और नॉक आउट स्टेज की 32 टीमें और उनके 16 मुकाबले तय हो चुके हैं। फीफा विश्व कप के इस पहले चरण (लीग स्टेज) के समाप्त होते ना होते खूबसूरत और शक्तिशाली दृश्यों की निर्मिति हो चुकी है, जो लोगों के जेहन में उतर चुके हैं, और स्थायी जगह बना चुके हैं।

एक

प्रतियोगिता शुरू होने से पहले इसकी सफलता पर कई प्रश्नचिह्न लगे थे। अनेक विवादास्पद मुद्दे,उनका विरोध और प्रतियोगिता के बायकाट की अपील,कड़े आव्रजन नियम,टिकट घोटाला व टिकटों के बेतहाशा बढ़े हुए दाम और उत्तरी अमेरिका की भीषण गर्मी जैसे कुछ ऐसे कारण थे जिनकी वजह से इसकी सफलता को संदेह की नजर से देखा जा रहा था। लेकिन फुटबॉल की लोकप्रियता ने इन सभी कारणों को बहुत पीछे छोड़ दिया और अमेरिका में इस आयोजन ने लोकप्रियता के नए मानक स्थापित किए।

 16 जून को विश्व कप के इतिहास में किसी एक दिन में स्टेडियम में उपस्थित दर्शकों की संख्या का एक नया रिकॉर्ड बना,32 साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़कर। उस दिन उपस्थित दर्शकों की संख्या 2 लाख 81 हज़ार थी। उसके 6 दिन बाद 22 जून को चार स्टेडियमों में दर्शकों की कुल संख्या 2 लाख 88 हज़ार तक पहुंच गई। ये इस महा आयोजन की सफलता के सबसे प्रामाणिक प्रतिमान हैं।

स्टेडियमों के भीतर ही नहीं बाहर भी इसी तरह के दृश्य बने। टीमों के समर्थकों ने मैच के आयोजन शहरों में शानदार मार्च के अद्भुत दृश्यों की निर्मिति की। इन शहरों की सड़कों के दौड़ती भागती जिंदगी के नीरस उबाऊ दृश्यों को इन भाग लेने वाली टीमों के समर्थकों ने उत्साह,उमंग और जोश के रंगीन नजारों में बदल दिया। फीफा अधिकारियों के अनुसार केवल पहले चरण की समाप्ति के बाद इन फ़न फेस्टवलों में भाग लेने वाले समर्थकों की संख्या 20 लाख के पार हो गई है। ये एक आश्चर्यचकित कर देने वाला आंकड़ा है।

दो

मैदान से बाहर जो दृश्य दर्शक अपने उत्साह और ज़ुनून से बना रहे थे, मैदान में वही काम खिलाड़ी अपने खेल से कर रहे थे। इस बार पहली बार इतनी बड़ी संख्या में टीमें विश्व कप फाइनल्स में भाग ले रही हैं। 32 के मुकाबले इस बार 48 टीमें भाग ले रहीं हैं। आशंका थी कि इससे बहुत सारी कमजोर टीमों की भागीदारी होगी और इसका असर खेल की गुणवत्ता और प्रतियोगिता की साख और स्तर पर पड़ेगा। पर ये आशंका निर्मूल सिद्ध हुई।

इस विश्व कप की अब तक की सबसे सुंदर कहानी केप वर्डे की टीम ने लिखी। केप वर्डे अटलांटिक महासागर में अफ्रीका के पश्चिमी तट से लगभग 600 किलोमीटर दूर 10 सोलोमन द्वीप एक खूबसूरत देश। आबादी केवल पांच लाख। उसने अपने पहले ही मैच में स्पेन के साथ गोलरहित ड्रॉ खेलकर दुनिया को विस्मित कर दिया। 40 साल के गोलकीपर वोज़िन्हा गोल के सामने चट्टान की तरह खड़े हो गए कि स्पेन की एक ना चली। उन्होंने सात बचाव किए। वे राष्ट्रीय हीरो बन गए और पूरी दुनिया उनकी फैन। इंस्टा पर उनके फॉलोअर्स की संख्या अब  50 हजार से बढ़कर 17 मिलियन हो गई है।

दुनिया को लगा शायद ये एक संयोग हो। तब अगला मैच उरुग्वे के खिलाफ 2-2 से ड्रॉ खेला। केविन पिना ने भी 31 मीटर की दूरी से शानदार फ्री किक लगाकर देश का पहला विश्व कप गोल दागा और हेलियो वारेला ने बेंच से आकर दूसरे हाफ में बराबरी का गोल दागा। और उसके बाद सऊदी अरब से गोल रहित ड्रॉ। अपने ग्रुप में दूसरा स्थान और पहले ही विश्व कप में नॉक आउट में दौर में। ये छोटे से देश द्वारा लिखी गई फुटबॉल की एक बड़ी सी कहानी है।

एक और केवल डेढ़ लाख की आबादी और 444 किलोमीटर वर्ग में फैले छोटे से खूबसूरत कैरेबियन द्वीप कुराकाओ ने भी खेल के सुंदर दृश्य रचे। कुराकाओ ने टूर्नामेंट की शुरुआत जर्मनी से 1-7 से हार के साथ की थी। उस मैच में ही पहले हॉफ में स्कोर 1-1 था। उसने विश्व कप के पहले ही मैच में अपना पहला विश्व कप गोल किया। उसके बाद इक्वेडोर से अपना मैच गोलरहित ड्रॉ खेला। लेकिन कुराकाओ के लिए यह ड्रॉ भी ऐतिहासिक था। विश्व कप का पहला अंक अर्जित किया। ये उनके गोलकीपर एलॉय रूम का मैच था। एलोय रूम ने अपने खेल से कुराकाओ को मैच में बनाए रखा और टीम को ड्रॉ हासिल करने में मदद की। उन्होंने रिकॉर्ड 15 बचाव किए।

मिस्र ने न्यूजीलैंड को 3-1 से हराया। मिस्र की ये जीत इस मायने में ऐतिहासिक थी कि देश को विश्व कप में पहली जीत हासिल करने के लिए 92 साल इंतजार करना पड़ा था। इस जीत में लिवरपूल के मोहम्मद "मो" सलाह ने अहम भूमिका निभाई थी।

पहले दौर में ईरान के प्रदर्शन की चर्चा जरूर की जानी चाहिए। वे शत्रु देश में बहुत ही कठिन परिस्थितियों में खेल रहे थे जिन्हें फीफा से कोई मदद नहीं मिल रही थी। वे भले ही अगले दौर के लिए क्वालीफाई ना कर पाए हों लेकिन इतनी कठिन और होस्टाइल परिस्थितियों में उनका प्रदर्शन अच्छा ही कहा जाएगा। उन्होंने बेल्जियम से गोलरहित ड्रॉ खेला। इसके अलावा मिस्र से 1-1 से और न्यूजीलैंड से 2-2 से ड्रॉ खेला। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि ईरान को एक भी मैच न हारने के बावजूद ग्रुप स्टेज में ही टूर्नामेंट से बाहर होना पड़ा। यह उस टीम के लिए एक दुखद अंत था जिसने बहादुरी से संघर्ष किया। कभी कभी भाग्य भी बहादुरी का साथ नहीं देता है।

ईरान की टीम को मैक्सिको के तिजुआना में बेस कैंप बनाना पड़ा था क्योंकि अमेरिका ने अपने यहां रुकने की अनुमति नहीं दी थी। जबकि उसके सारे मैच अमेरिका में थे और मैचों के लिए उसे लंबी यात्राएं करनी पड़ रही थी। कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों के देश में प्रवेश पर कथित तौर पर रोक लगा दी गई है। 

स सबके बावजूद सोफी स्टेडियम में बेल्जियम के साथ 0-0 से ड्रॉ के बाद ईरान ने अपने व्यवहार से प्रशंसकों का दिल जीत लिया। रवाना होने से पहले ईरान ने लॉस एंजिल्स के आतिथ्य सत्कार के लिए और अपने प्रशंसकों को धन्यवाद देते हुए लॉकर रूम में एक  हस्तलिखित नोट छोड़ा "हम गर्व के साथ लॉस एंजिल्स आए, सम्मान के साथ प्रतिस्पर्धा की और गरिमा के साथ विदा हो रहे हैं।" इसी खेल भावना से खेल खेल रह पाते हैं।

विश्व कप के शुरुआत में एशियाई देशों ने अच्छा खेल दिखाया। पहले कई दिन कोई भी एशियाई टीम अपना मैच नहीं हारी। लेकिन जैसे जैसे प्रतियोगिता आगे बढ़ी एशियाई टीम पिछड़ती गईं। एशियाई फुटबॉल महासंघ से नौ टीमें ने विश्व कप के लिए क्वालीफाई किया था लेकिन केवल जापान और ऑस्ट्रेलिया ही नॉकआउट चरण में पहुंचने में सफल रहे। ग्रुप स्टेज में जापान एशियाई फुटबॉल का सबसे सकारात्मक पक्ष रहा। कोच हाजिमे मोरियासु की जापानी टीम ने ग्रुप एफ में 5 अंकों के साथ दूसरा स्थान हासिल किया। उसने ट्यूनीशिया को 4-0 हराया और नीदरलैंड के साथ 2-2 से और स्वीडन से 1-1 से ड्रॉ खेला। अब राउंड ऑफ 32 में "ब्लू समुराई" का मुकाबला ब्राजील से होगा। दूसरी टीम ऑस्ट्रेलिया की है।

एशियाई टीमों के विपरीत अफ्रीकी टीमों ने शानदार प्रदर्शन किया है और 10  अफ्रीकी टीमों में से 9 टीमें अगले दौर में पहुंच गई हैं। दक्षिण अमेरिका की 6 में से 5 टीमें, यूरोप की 16 में से 13 टीमें और CONCACAF क्षेत्र की 6 में से 3 टीमों ने नॉकआउट दौर में पहुंची हैं। यहां उल्लेखनीय है कि तीनों सह मेजबान देश अमेरिका,कनाडा और मेक्सिको अगले दौर में पहुंच गए हैं।

तीन

अगर विश्व का सबसे बड़ा खेल आयोजन हो रहा है और इसमें विश्व की सबसे बेहतरीन टीमें भाग ले रही हैं तो ज़ाहिर है कि दुनिया भर के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी और प्रतिभाओं का जमावड़ा भी वहां होगा ही। सारी दुनिया की निगाहें इन पर और इनके  प्रदर्शन पर लगी रहेंगी। ये सिर्फ अपने राष्ट्र की उम्मीदों का बोझ लिए ही यहाँ नहीं आते हैं,बल्कि दुनिया भर के प्रशंसकों की उम्मीदों का भार भी अपने कंधों पर धरे  आते हैं। लेकिन ये दबाव उन्हें और अधिक अच्छा करने की प्रेरणा देता है। वे इस बोझ तले दब नहीं जाते। यही बात उन्हें महान बनाती हैं। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी उम्मीदों और दबाव के बोझ तले नहीं दबते, बल्कि वे इसका भरपूर आनंद लेते हैं।

इस प्रतियोगिता में शामिल सभी महान खिलाड़ी यथा लियोनेल मेस्सी , क्रिस्टियानो रोनाल्डो, किलियन म्बाप्पे , एर्लिंग हालैंड , हैरी केन , विनीसियस जूनियर , लामिन यामल , माइकल ओलिस ऐसा ही कर रहे हैं। ये सारे सितारे यहां जबदस्त खेल का प्रदर्शन कर रहे हैं। कुछ ने शानदार शुरुआत की। कुछ की शुरुआत थोड़ी फीकी रही। और कुछ को कड़ी मेहनत करनी पड़ी। 


बसे पहले बात मेस्सी की। वे अपना छठवां विश्व कप खेल रहे हैं। यूँ तो उनका पिच पर होना भर ही उनके चाहने वालों के लिए पर्याप्त होता,क्योंकि उनको लोग इस प्रतियोगिता में अंतिम बार देख रहे हैं। लेकिन फुटबॉल का ये जादूगर अविश्वसनीय रूप से कमाल दर कमाल किए जा रहा है। मेस्सी ने 2026 के विश्व कप में अपने अभियान की शुरुआत अल्जीरिया के खिलाफ एक शानदार हैट्रिक के साथ की। फिर मजबूत ऑस्ट्रियाई टीम के खिलाफ दो गोल दागे। दो मैचों में पांच गोल। जॉर्डन के विरुद्ध वे पूरे समय खेल कर अपने आंकड़ों को और अधिक अविश्वसनीय बना सकते थे। लेकिन मेस्सी अपने आप में अकेले हैं। उन्होंने युवा खिलाड़ियों को तरजीह दी। वे साठ मिनट के बाद पिच पर आए और फ्री किक से एक शानदार गोल कर पुनः अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की। वे इस इस विश्व कप में अब तक तीन मैचों में छह गोल कर चुके हैं। विश्व कप में कुल 19 गोल। विश्व कप के लगातार सात मैचों में गोल। उनकी ये एक बेमिसाल शुरुआत है। याद रखें कि मेस्सी 39 साल के हैं और वे विश्व के सबसे बड़े मंच पर अपने खेल का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं।

शानदार शुरुआत करने वाले अन्य सितारे हैं किलियन म्बाप्पे, एर्लिंग हालैंड और हैरी केन। इन सभी ने अपने शुरुआती मैचों में दो-दो गोल दागे। घाना के खिलाफ इंग्लैंड के गोल रहित ड्रॉ में केन गोल करने में नाकाम रहे, वहीं म्बाप्पे और हालैंड ने इराक और सेनेगल के खिलाफ अपनी-अपनी जीत में दो-दो गोल दागकर शानदार प्रदर्शन जारी रखा। लेकिन ओलिसे ने अभी तक गोल नहीं किया है,पर निसंदेह वे फ्रांस के लिए शानदार खेल दिखाया है। वे फ्रांसीसी आक्रमण की सबसे मजबूत कड़ी हैं। डेंबेले ने भी नॉर्वे के खिलाफ शानदार हैट्रिक की।

दूसरी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लामिन यामल ने पहले मैच में कमजोर शुरुआत के बाद वापसी की। डीआर कांगो से मैच 1-1 से ड्रॉ के बाद रोनाल्डो आलोचनाओं का शिकार हुए। लेकिन अगले मैच में दो गोल दाग कर आलोचकों के मुंह बंद कर दिए। इसी तरह यामल ने भी केप वर्डे के खिलाफ कमजोर शुरुआत कर अगले मैच में अच्छा प्रदर्शन किया।

मोरक्को के खिलाफ 1-1 से ड्रॉ में विनीसियस जूनियर ने शानदार प्रदर्शन से गोल कर एक महत्वपूर्ण अंक दिलाया। इसके बाद विनी ने हैती के खिलाफ भी उसी लय को बरकरार रखा और एक गोल करने के साथ-साथ एक बेहतरीन असिस्ट भी किया।

इस पहले चरण में स्टार खिलाड़ी अपने रंग में आ चुके हैं। और अगले दौर के लिए अपने पैरों का जादू दिखाने को तैयार हो रहे हैं।

चार


ये चरण गुलाबी रंग में रंगा नजर आया। गुलाबी रंग को सामान्यतः लड़कियों के साथ जोड़ा जाता है। लेकिन इस विश्व कप में ये रंग अपना जलवा बिखेर रहा है। अब इसे अघोषित रूप से इसे विश्व कप का आधिकारिक रंग माना जा रहा है। जूते बनाने वाले सभी प्रमुख कंपनियों नाइकी, एडिडास, प्यूमा सभी ने इस विश्व कप में अपने नए कलेक्शन लॉच किए हैं और सभी ने खिलाड़ियों को गुलाबी रंग के जूते उपलब्ध कराए हैं। यही कारण है कि इस समय ज्यादातर टीमों के खिलाड़ी चमकीले गुलाबी रंग के जूतों में नजर आ रहे हैं। और फुटबॉल मैदान गुलाबी रंग में रंगे नज़र आ रहे हैं।  इन टीमों में इंग्लैंड, जापान, अर्जेंटीना,पुर्तगाल,फ्रांस और मेजबान यूएस की टीम भी शामिल हैं। हालांकि मेस्सी सफेद रंग के जूतों में ही नजर आ रहे हैं। 

दरअसल बरसों के शोध और मार्केटिंग अनुभव के बाद लगभग सभी जूते बनाने वाली कंपनियां इस निष्कर्ष पर पहुँची हैं कि फुटबॉल मैदान पर ब्राइट पिंक अन्य किसी भी रंग के मुकाबले अधिक प्रभावी होते हैं। क्योंकि घास के हरे रंग के कंट्रास्ट में पिंक कलर टीवी,मोबाइल पर हर जगह अधिक चमकता और ध्यान खींचता है।

बस अब देखना है कि नॉक आउट में ये पिंक किसे सूट करता है। कौन जीत की पिंकी आभा लिए आगे बढ़ता है और किसके चेहरे हार की टीस से मलिन हो अपनी गुलाबी आभा खो बैठेंगे।

पांच

विश्व कप का सबसे विवादास्पद नियम हाइड्रेशन ब्रेक विश्व कप के इस पहले चरण में फुटबॉल खिलाड़ियों और विशेषज्ञों के बीच सबसे चर्चित विषय बना रहा। इस बार दोनों हॉफ में एक हाइड्रेशन ब्रेक का प्रावधान किया गया है। दरअसल इसके पीछे असल मकसद विज्ञापनों के लिए समय निकालना है। लेकिन इस ब्रेक का सबसे बड़ा नुकसान ये है कि इससे खेल की रिदम, उसकी लय भंग होती है। खिलाड़ियों की भी और दर्शकों की भी। विवाद का विषय ये इसलिए बना कि इस ब्रेक को वहां भी दिया जा रहा है जहां इसकी  जरूरत नहीं है। जहां मौसम अपेक्षाकृत काफी ठंडा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले तो इसे दिया ही नहीं जाना चाहिए। अगर दिया भी जाए तो वहां जहां मौसम काफी गर्म है। यानी , जब मौसम और परिस्थितियां इसकी मांग करती हैं तो ही हाइड्रेशन ब्रेक लेना समझदारी भरा कदम है। लेकिन वैंकूवर जैसे स्थानों पर जहाँ  तापमान 17 डिग्री के आस पास रहता है, इस ब्रेक का क्या ही औचित्य हो सकता है।

खेलों के बारे में नेल्सन मंडेला का एक बहुत प्रसिद्ध कथन है "खेलों में लोगों को इस तरह एकजुट करने की शक्ति है जैसी शायद ही किसी और चीज में हो।” स्टेडियमों के अंदर और बाहर से जिस तरह की खूबसूरत तस्वीरें आ रही हैं, वे मंडेला के कथन की पुष्टि करती प्रतीत होती हैं। दुनिया के कोने कोने से अपनी टीमों के समर्थन में लोग इन तीन मेजबान देशों में आ रहे हैं जिसमें हर धर्म,नस्ल, देश और उम्र के लोग शामिल हैं। यहां वे मेजबान देशों की सांस्कृतिक विशेषताओं का आनंद उठा रहे हैं है,आत्मसात कर रहे है, जश्न मना रहे हैं। आज की युद्धग्रस्त और विभाजित दुनिया में इसी की सबसे ज्यादा जरूरत है।

फिलहाल फीफा विश्व कप के 17 दिन के इस पहले चरण ने भविष्य की पीठ पर शानदार फुटबॉल खेल की इबारत लिख दी है। जिसे अगले चरण में एक महाकाव्य में बदल जाना है।



Sunday, 28 June 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 12: उभरता सितारा यान डियोमांडे




अफ्रीका के और अफ्रीकी मूल के खिलाड़ियों ने दुनिया में फुटबॉल खेल और फुटबॉल खेल की दुनिया बदल दी है। भौगोलिक दुश्वारियां, उपनिवेशीय शासन द्वारा छोड़ी गई बदगुमानिया,सैन्य शासकों और तानाशाहों के बदमग्जियां,उनसे छुटकारा पाने के लिए अनवरत गृहयुद्ध और इन सब के चलते घोर अव्यवस्था और भयावह निर्धनता के बीच जीने के लिए दुर्दमनीय जिजीविषा और अंतिम सांस तक हार ना मानने के धैर्य और हौसले की जरूरत होती है। और अफ्रीकी खिलाड़ी जब इन्हीं खूबियों और जीवट के साथ खेल के मैदान में उतरते हैं,तो वे दुनिया के सबसे बेहतरीन एथलीट बन जाते हैं। शायद यही कारण है कि मध्यम और लंबी दूरी के दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली व प्रसिद्ध धावक और दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली फुटबॉलर अफ्रीका से ही आते हैं।

प्रतिभाएं जो डार्क कॉन्टिनेंट रह जाती हैं,उनमें से कुछ के नाम रोशन हो बुलंदियों के आसमान में सितारे से टंक जाते है, बाकी गुमनामियों के अंधेरे में खो जाते हैं। लेकिन उनमें से भी बहुत सारे एक बेहतर जीवन और सुंदर भविष्य का सपना लिए,जीवन का जोखिम उठाए, अपनी धरती से बहुत-बहुत दूर दुनिया के खुशहाल मुल्कों में जा पहुंचते हैं। जीवन के एक नए सफर पर। इनमें से भी कुछ केवल खुशहाल जीवन तक सीमित रह आते हैं और कुछ शोहरत की बलंदी पर जा पहुंचते हैं। ऐसी ही बलंदी पर पहुंचने वाला एक अफ्रीकी सितारा है आइवरी कोस्ट का 19 साल का विंगर यान डियोमोंड़े।

अमेरिका में चल रहे 23वें फीफा कप में 15 जून को फिलाडेल्फिया में आइवरी कोस्ट और इक्वेडोर का मुकाबला था। इसमें आइवरी कोस्ट ने इक्वेडोर को 1-0 से हरा दिया। इस पूरे मैच में यान डियोमोंड़े ने अपनी शानदार ड्रिबल और गति से इक्वेडोर की रक्षापंक्ति को दबाव में रखा। उन्हें 'मैन ऑफ़ द मैच' घोषित किया गया। 19 साल के युवा का ये फीफा विश्व कप में स्वप्निल आगाज़ था। इससे पहले उन्होंने बुंदेसलीगा में आरबी लीपजिग की और से खेलते हुए शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने 13 गोल और 9 असिस्ट की। इस प्रदर्शन के आधार पर उन्हें 'रूकी ऑफ द ईयर' का खिताब भी मिला। अब वे मौजूदा ट्रांसफर विंडो में एक सबसे चर्चित खिलाड़ी हैं जिन्हें लीवरपूल और सेंट जर्मन जैसे फुटबॉल क्लब साइन करना चाहते हैं।

यान डियोमोंड़े का कैरियर इस समय जितना चमकदार है,उससे कहीं अधिक कड़े संघर्ष और कठिनाइयों का उनका यहां तक पहुंचने का सफर रहा है। उनकी इन ऊंचाइयों तक पहुंचने और सफलता की कहानी दरअसल गरीबी,संसाधनों की कमी,परिवार से विछोह,कड़े परिश्रम और संघर्ष की कहानी है। ये कहानी एक बहन के एक अटूट विश्वास को बनाए रखने की कहानी भी है और उससे किए गए वायदे को निभाने की कहानी भी है। ये खुली आंखों से देखे गए सपनों को हकीकत में बदलने की कहानी है।

एक कहानी जो आइवरी कोस्ट के सबसे बड़ी आबादी वाले शहर आबिदजान के गरीब और बाहरी इलाके सिकोजी में सन 2006 से शुरू होती है। जहाँ यान का जन्म होता है और बचपन शहर की भीषण गर्मी और धूल भरी तेज़ हवाओं के बीच कच्ची पक्की सड़कों पर नंगे पैर फुटबॉल की सरगम गाते बीतता है। फुटबॉल एक ऐसा खेल जो गरीब से गरीब की मन की भाषा पढ़ लेता है। एक ऐसा खेल जिसकी लय की भाषा हर कोई सीख लेता है।

एक तरफ यान डियोमोंड़े का फुटबॉल प्रेम और उसकी बहन रोक्सेन का उसकी प्रतिभा में अटूट विश्वास है। तो दूसरी तरफ एक छोटे से घर में 25 सदस्यों के साथ रहवास है। गरीबी है। संसाधनों को अभाव है। पर फुटबॉल का प्रेम ऐसा है कि रात को सबके सो जाने के बाद धीमी आवाज में टीवी पर फुटबॉल देखते हुए फुटबॉल के हुनर को जानने की,सीखने की कोशिश करते बड़ा होता है।

दरअसल वो एक द्वैत को जीते हुए बड़ा हो रहा होता है। एक तरफ कठोर यथार्थ है। दूसरी तरफ रोमानी स्वप्न। लेकिन उसका दृढ़ संकल्प और उसमें उसकी बहन का विश्वास ऐसा है कि रूक्ष यथार्थ भी उसके सपनों को जला नहीं पाता। वो सीआर सेवन का दीवाना है। अपनी जर्सी पर नंबर सात अंकित कर लेता है,पर उसकी स्टाइल है कि दोस्त उसे रॉबर्टो कार्लोस कह कर पुकारते है। पर इससे फर्क क्या ही पड़ना था। दोनों भाई बहन फ्रांस जाने,सीआर सेवन जैसा सबसे बड़ा फुटबॉलर बनने, एक कार, एक बड़ा सा घर और एक लग्जरी जीवन जीने के सपने संजोते रहते हैं जिसमें बहन को कोई चिंता नहीं करनी थी।

उधर वे सपने देखते हुए बड़े हो रहे होते हैं और इधर उनके पिता परिवार का साथ छोड़ देते हैं। वे परिवार को छोड़कर फ्रांस चले जाते हैं। यान डियोमोंड़े का लक्ष्य और दुष्कर हो आता है। लेकिन वो हार नहीं मानता। अब वो घर परिवार से दूर घाना सीमा के समीप एक फुटबॉल अकादमी में प्रवेश लेता है। उस समय उसकी उम्र नौ वर्ष होती है। इस उम्र में परिवार से दूर जाना  आपसे बड़े त्याग की अपेक्षा रखता है। वो ऐसा करने सफल होता है। जीवन की दुश्वारियां वहां भी कम ना थी। वे और उनके साथी अक्सर पेट भरने के लिए खेतों से आलू चुराया करते थे। जिसे वे आज बैंक लूट की संज्ञा देते हैं।

इन्हीं दुश्वारियों में वे फुटबॉल के गुर सीखते बड़े हो रहे थे। और फिर 15 साल की उम्र में उनकी असाधारण प्रतिभा उन्हें यूएस के फ्लोरिडा स्थित डीएमई फुटबॉल अकादमी ले आती है। घर से हजारों किमी दूर जाना और रहना एक किशोर के लिए बहुत कठिन था। यहां बिल्कुल अलग दुनिया थी। उन्हें अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी। सांस्कृतिक अलगाव था। लेकिन कोई भी कठिनाई इतनी बड़ी नहीं होने वाली थी जो उन्हें उनके संकल्प से डिगा सके। वे राह में आने वाली हर कठिनाई से और ज्यादा निखरते चले गए। यहां वे एक खिलाड़ी के रूप में ही परिपक्व हो रहे थे,बल्कि एक व्यक्ति के रूप भी अनुभवी हो रहे थे।

अब उन्होंने यूरोप के क्लबों में अपना भविष्य तलाश करने की कोशिश की। उन्होंने बोर्नमाउथ,चेल्सी,रेंजर्स, ओलंपियाकोस और क्रिस्टल पैलेस जैसे क्लबों में ट्रायल दिया और समय बिताया। लेकिन अभी भी कठिनाइयाँ खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं। सब जगह उनकी प्रतिभा की प्रसंशा तो खूब होती लेकिन कोई अनुबंध उन्हें ना मिल पाता। इधर उनके वीजा की अवधि समाप्त हो गई और अंततः उन्हें वापस अपने देश लौटना पड़ा। बिना सफलता के घर लौटना उनके लिए बड़े दुख का वायस था। उनका विश्वास डगमगा रहा था। लेकिन उनकी बहन का उनकी प्रतिभा में अटूट विश्वास था।

और तब जनवरी 2025 में उन्हें स्पेनिश क्लब लेगनेस से उनका करार हुआ। लेकिन उनका करार पूरा होने से पहले ही उनकी बहन का निधन हो गया। ये उनके लिए सबसे बड़ा दुख था। उन्होंने वो बहन खो दी थी जिसने उनकी प्रतिभा को उस समय पहचान लिया था और उस पर आंख मूंदकर विश्वास किया था जब दुनिया भर के कोच,मैनेजर और उनके प्रसंशक उनका नाम तक नहीं जानते थे। लेकिन उन्होंने अपने सबसे बड़े दुख को प्रेरणा में बदल दिया। उसके बाद से उनका हर गोल अपनी बहन के लिए था।

उस बसंत जब उन्होंने एस्पियोनल के खिलाफ अपने पेशेवर करियर का पहला गोल किया तो उनकी आंखों से पानी बरस पड़ा। ये उनकी बहन की याद थी। उन्होंने कहा कि "मेरा सपना था कि मैं उसे खुश और गौरवान्वित करूँ।"

उनकी बहन का जाना उनके लिए उनके एक हिस्से का  अलग हो जाना था। अब उनके लिए खेल के मायने बदल गए हैं। भौतिक सुख उनके लिए अब महत्वहीन हो गए हैं जिसके सपने उन्होंने कभी बहन के साथ देखे थे। अब उनका हर मूव,हर पास,हर गोल बहन की स्मृति बचाए रखने का, उनमें बहन के विश्वास को बनाए रखने का जरिया भर रह गया है।

यान डियोमोंड़े का आबिदजान की डामर वाली कठोर,उष्णता और धूल भरी गलियों से फिलाडेल्फिया के एयरकंडीशंड स्टेडियम और मखमली हरी घास के मैदान तक का सफर एक तिलस्मी कथा सी प्रतीत होती है। वे अब एक फुटबॉल जगत का चमकता सितारा हैं जिसका भविष्य उज्जवल है। 

उनकी सफलता की कहानी युवा फुटबॉलर के लिए प्रेरणास्रोत का काम करती रहेगी। ऐसी अद्भुत अनगिनत कहानियां मिलकर फुटबॉल खेल का महाकाव्य रचती हैं और उसे अधिक सगीतात्मक,खूबसूरत और स्वीकार्य बनाती है।


फुटबॉल नर्सरी मिनर्वा अकादमी और रंजीत बजाज

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