Monday 29 March 2021

अकारज_7

 


उस दिन डूबते सूरज को देखते हुए उसने पूछा 'तुम्हें सूरज अच्छा लगता है ना?'

मैंने कहा 'हां,देखो ना,सूरज आदमी के जीवन का कितना सुंदर रूपक गढ़ता है। सुबह का सूरज बचपन सा मासूम,दोपहर का युवावस्था सा ओजस्वी और शाम का वृद्धावस्था सा निस्तेज।'

'और तुम्हें?' मैंने उससे पूछा

उसने एक बार फिर डूबते सूरज को देखा और बोली'लड़कियों का सूरज कहां लड़कों के सूरज सा होता है।'

'दो सूरज?' मैं अचकचाया

वो बोली 'लड़कियों के सूरज की दोपहर कहां होती है। वे दोपहर के सूरज होने से पहले ही नैहर से विदा जो कर दी जाती हैं ढलते सूरज सी। फिर कहां उसके जीवन में सूरज आता है। वे चांद हो जाती हैं। कुछ के हिस्से पूर्णिमा,कुछ के हिस्से अमावस।

पास ही कुछ चिड़िया एक सुर में चहचहाने लगीं। शायद वे उसकी बात की ताईद कर रही थीं।


Saturday 20 March 2021

अकाराज_6













उसने खिलखिलाकर कहा 'अहा!कितने सुंदर हरसिंगार के फूल'।

 मैंने कहा 'अपने से बिछड़ने के दुःख से टपके कुछ आंसू। 


उसने चहककर कहा 'देखो कितना सुंदर गुलाब'। 

मैंने कहा 'दर्द की चुभन के बावजूद मुस्कुराता  कोई चेहरा'। 


उगते सूरज को देख वो मुस्कुराते हुए बोली 'स्वर्णिम आभा लिए  कितना भला भला सा सूरज'।

मैंने कहा 'अपनों के विछोह के ग़म में पीला पड़ा चेहरा'।


उसने खाली सुनसान सड़क को देखा और कहा 'कितनी सुकून भरी है ना सड़क।'

मैंने कहा 'आने वाली विपत्ति के बोझ की आशंका से सहमा उदास चेहरा।'


उसने मेरी आँखों मे झांका और बोली 'दुःख बांचता आदमी कितना सुंदर होता है ना'

मैंने कहा 'और प्यार डूबा आदमी कितना निश्छल और पवित्र'।

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आत्मीय मौन चारों और पसर गया था जिससे होकर दो 'मन' गुज़र रहे थे।




Monday 15 March 2021

सड़क पार का खेत



घर की एक बालकनी मुख्य सड़क की ओर है। ये सड़क शहर की दो मुख्य सड़कों को जोड़ने के लिए एक संपर्क मार्ग है। लेकिन अब इसने खुद मुख्य सड़क का रूप ले लिया है। काफी ज्यादा आवाजाही रहती है इस सड़क पर। सड़क के उस पार बालकनी के ठीक सामने एक 'खेत' है। 

खेत में अभी भी फसल उगाई जा रही है। साल में एक आध महीने को छोड़कर हरे रंग की अलग अलग छवियाँ उसमें बिखरी रहती हैं। हर सुबह बालकनी से उस हरियाली को निहारना किसी के लिए भी एक 'ट्रीट' हो सकता है। आप घंटों के हिसाब से उसे निहारते रह सकते हैं। विशेष तौर पर उस स्थिति में जब कंक्रीट का पूरा एक जंगल आपके चारों और उगा हो और चारों तरफ ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं नज़र आती हों।

दरअसल  ये खेत कंक्रीट के रेगिस्तान में नखलिस्तान सरीखा है। बेचैनी के महासागर में सुकून का दरिया है। भागते दौड़ते हांफते शहर के बीच सुस्ताने वाली सराय है। अंधे विकास के कठोर पत्थरों से लड़ता प्रकृति का निहत्था योद्धा है। बस यही डर है कि ना जाने किस दिन अचानक ये योद्धा खेत खेत हो जाएगा। इस खेत को देखकर मैं हमेशा अचरज में पड़ जाता हूँ। अचरज कि ईंट-पत्थरों और रेत-सीमेंट की इस कठोर और निष्ठुर दुनिया के बीचों बीच ये कोमल नरम मुलायम छोटा सा खेत कैसे अभी तक अपना अस्तित्व बनाए हुए है।

पहले ऐसा नहीं था। उस समय ये अकेला खेत नहीं था। बताते हैं कि यहां कभी एक भरा पूरा गांव हुआ करता था। बस एक दिन शहर की नज़र पड़ी। नज़र क्या पड़ी गांव को तो जैसे उसकी नज़र ही लग गई। ये जो शहर हैं ना,पिछली आधी सदी से उनकी भूख बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। उन्हें देखकर लगता है कि वे मानो सदियों से भूखे हैं। जो कुछ भी उनकी उनकी जद में आता है अपनी भूख मिटाने को गड़प करते जाते हैं। नदी,पहाड़,जंगल,बाग,  बगीचे,गांव सब कुछ। तभी तो शहर इतने बेडौल हो गए हैं। एक दो नहीं सारे ही शहर। कोई अपवाद हो तो हो। कैसी बनिए की सी तोंदें हैं इन शहरों की। इस शहर का भी यही हाल है। तमाम गांव की तरह ये शहर एक दिन इस गांव को भी गड़प गया। देखते ही देखते धूसर रंग तेज कृत्रिम रंगों में तब्दील हो जाता है, मिट्टी और ईंटों की कोमलता कंक्रीट की कठोरता में गुम हो जाती है,धैर्य अधीरता में परिवर्तित होती जाता है और सुकून अब बेचैनी का रूप धारण कर लेता है। एक गांव शहर में जो तब्दील हो जाता है।

पर ये 'एकला खेत' अजूबा है ना। अभी भी बना हुआ है वैसे का वैसा ही। वैसा ही सहज सरल कोमल सा जैसे पहले कभी बहुत सारे हुआ करते थे। पर आज एक दम अकेला। आज भी अपने दामन को हरे रंग से सजाए हुए। अब देखिए ना इस समय गेहूँ की फसल लहलहा रही है। मानो इस फसल पर सवार हो वसंत नृत्य करता सा अपनी उपस्थिति की घोषणा कर रहा हो। उधर ठंड धीरे धीरे अपने पांव पीछे खींच रही है। सूर्य अपना ताप हौले हौले बढ़ा रहा है। इस अतिरिक्त ऊष्मा से हरा रंग पिघलने लगा है। हल्का हल्का पीला रंग चढ़ने लगा है। खेत फगुनाया सा लगता है। जैसे कह रहा हो फागुन आ गया। होली के रंगों का सुरूर छाने लगा है। होली के बाद गेंहू की फसल की कच्ची कोमल काया पककर कंचन सी हो जाएगी। कंचन सी? ना ना कंचन ही हो जाएगी। उस किसान से तो पूछो एक बार। जिसने इसे पाल पोस कर इतना बड़ा किया। उसके घर में खुशियों का पीला रंग बिखर बिखर जाएगा जब ये फसल उसके बखारों में जाएगी। आखिर दुनिया में खाली पेट से ज़्यादा स्याह और भरे पेट से ज़्यादा सुनहरा रंग किस चीज का होता है।

 मैं जब भी चारों और से अट्टालिकाओं से घिरे, फसल से लहलहाते झूमते इस खेत को देखता हूँ तो वो गाता सा प्रतीत होता है। मधुर संगीत का रस कानों में घुलता सा महसूस होता है। मानो वो अकेला होकर भी पूरी निर्भयता के साथ,अपने सारे गमों को भुलाकर,अपने अस्तित्व को खत्म करने की शहर की साज़िशों को  चुनौती दे रहा हो और गा रहा हो 'एकला चलो रे,एकला चलो रे...'।

फसल कट जाने के बाद भी बाद भी कितने दिनों तक उसका रंग पीला ही रहता है। एक स्वर्णिम आभा उस पर पसरी नज़र आती है। खुशी चारों और फैली सी लगती है। लगता है खुशी का वो खुमार उस पर अब भी छाया है जो उसने किसान के बखारों को भरकर किसान के पूरे परिवार के चेहरों को दी है। 

अब जेठ का महीना आ गया है। पता ही ना चला। सूरज ने रौद्र रूप धारण कर लिया है। शायद किसी बात पर कुपित हो। क्रोध से उसका ताप बढ़ गया है। इस ताप से खेत की खुशी का पीला रंग पिघलने है। वो उघाड़े बदन जो है। फसल बखारों में है और वो निपट अकेला। खुशी का पीला रंग उदासी के धूसर रंग में गल रहा है। 

अब वो उदासी के साथ हैरान परेशान भी लगने लगा है। बहुत ही बेचैन सा। घबराया सा। आपने देखा होगा कि चींटियां हमेशा एक पंक्ति में चलती हैं। सबसे आगे चलने वाली रानी चींटी फेरोमेन्स नाम का दृव्य छोड़ती जाती जाती है और उसकी गंध पहचान कर बाकी चींटियां उसके पीछे चलती जाती हैं। पर कभी कभी कोई चींटी भटक जाती है। उस चींटी की छटपटाहट देखिए। वो लाइन को ढूंढने  को अपने साथियों से जुड़ने को किस कदर इधर से उधर भटकती है,उसकी घबराहट,उसकी बेचैनी किस तरह से आदमी को भी द्रवित कर देती है। इस माह खेत किसी भटकती चींटी सा दीखने लगता है। वही छटपटाहट, बेचैनी,घबराहट।

छटपटाहट से उसकी उदासी का रंग गहराता जाता है। बीते दिनों की याद में खेत भीतर ही भीतर गलता जाता है,गलता जाता है। धूसर रंग मटमैला होकर स्याह होने लगता है। उसका चेहरा क्या पूरा शरीर कुम्हला जाता है। अकेलापन शायद उसे खाए जा रहा है। अट्टालिकाओं के अट्टहास से उसका दुख घनीभूत होता जाता है। उसका शरीर अब स्याह हो चला है।

अषाढ़ लग गया है। खेत के इतने दुख से आसमान भी द्रवित होने लगता है। भावुक होकर आसमां के आंसू बारिश बनकर अविरल बहने लगते है। बूंदों की शीतलता से उसके दुखों का ताप कम होने लगता है। खेत की शुष्कता फिर से तरल होने होने लगती है, मुरझाई हिम्मत हरी होने लगती है। किसान भी खुशी के खुमार से बाहर आकर फिर से खेत के पास लौट आता है। अब वो चारा बोता है। इतना साथ पाकर खेत खुशी से हरा भरा होने लगता है। वो स्याह हरे रंग से रंग जाता है। खेत फिर अट्टालिकाओं के सामने सिर तानकर खड़ा सा प्रतीत होता है। 

अचानक 'मणिपुर की लौह महिला' शर्मिला चानू इरोम की याद आती है। उसका एकल संघर्ष याद आता है। बिल्कुल ऐसा ही तो इस खेत का संघर्ष है। निपट अकेला है। पर सीना ताने खड़ा है अट्टालिकाओं और उनके मालिकों के सामने। उनके हर अतिक्रमण का प्रतिरोध करते हुए ना केवल अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयास कर रहा है बल्कि कंक्रीट होती दुनिया में थोड़ी सी कोमलता को भी बचाने की लगातार कोशिश कर रहा है। वो भी निपट अकेले। अपनी बालकनी से उसे निहारते हुए पता नहीं कितनी बार अट्टालिकाओं के बीच फसल के साथ लहराते इस खेत में इरोम की छवि नज़र आती है।

पता नहीं क्यों इधर कुछ दिनों से हरी भरी लहराती फसल के बावजूद उदास उदास सा है वो। उसके तमाम प्रयास, तमाम प्रतिरोध के बावजूद कुछ फसल उजाड़ दी गयी है। उसके सीने को सरिया,ईंटें,रेत,सीमेंट,बजरी से पाट दिया गया है। उस पर एक और अट्टालिका का निर्माण होने लगा है। वो कराह रहा है। उसके कराहने की,उसकी सिसकियां कानों को बेध बेध जाती हैं। बचपन की  एक कहानी याद आ रही है। उस डायन की जिसकी जान तोते में बसती थी। यहां  उसके उलट है। प्रकृति की जान खेती किसानी में बसती है। और इसका नियंत्रण विकास डायन को मिल गया है। वो जब चाहे खेत के किसी एक हिस्से को उससे अलगा देती है। प्रकृति कराहती रहती है। खेत सिसकता रहता है। आगे निकलने की अंधी दौड़ दौड़ती बहरी दुनिया और दुष्ट विकास डायन को कुछ सुनाई नहीं देता। प्रकृति ऐसे ही तिल तिल मरती जाती है।

एक दिन आएगा कि मैं सुबह उठूंगा,बालकनी में आऊंगा। पर ना खेत होगा,ना फसल होगी और ना आंखों का,मन का सुकून होगा। होगी तो बस एक बेचैनी होगी,छटपटाहट होगी। और कंक्रीट के जंगल का कुछ और विस्तार हो गया होगा।

उस खेत को निहारते हुए कई बार ऐसा लगता है कि उसके और आम आदमी के जीवन में कितनी समानता है। फिर क्यों वे उसके दुश्मन बन बैठे हैं। क्या कभी दोस्त बन कर साथ नहीं रह सकते।

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आज मैं बेचैन हूँ। उसकी उदासी देखी नहीं जा रही है। मैं बालकनी से भीतर कमरे में आ गया हूँ।

Saturday 13 March 2021

'राज' मिताली का


         2006 में दुनिया के सबसे अमीर और प्रोफ़ेशनल क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई ने भारतीय महिला क्रिकेट की बागडोर अपने हाथ में थामी और 'वूमेन्स क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया' का बीसीसीआई में विलय कर दिया गया। इस उम्मीद के साथ कि जिस तरह भारतीय पुरुषों ने क्रिकेट के महासागर में महारत और शोहरत की अनंत गहराई नापी है,ठीक उसी तरह भारतीय बालाएं क्रिकेट के आकाश में प्रसिद्धि की बलन्दी को छु पाएंगी। ये उम्मीद कितनी पूरी हुई और बीसीसीआई का इसमें कितना योगदान रहा,ये सवाल बहसतलब है। पर ये बात जरूर है कि भारतीय बालाओं ने खुद पर भरोसा करना सीख लिया है और उन्होंने अपने भरोसे,अपनी योग्यता के बूते अपने पंखों को इतना मजबूत बना लिया है कि वे अपनी स्वच्छंद उड़ान भर सकें और नित नए मुकाम हासिल कर सकें।

        12 मार्च को दक्षिण अफ्रीका के साथ लखनऊ के इकाना स्टेडियम में खेली जा रही वर्तमान सीरीज के तीसरे एक दिवसीय मैच में मिताली दुराई राज एक ऐसा मील का पत्थर स्थापित कर रहीं थीं जिस पर महिला खिलाड़ी तो क्या पुरुष खिलाड़ी भी रश्क कर उठें। भारतीय इनिंग का 28वां ओवर चल रहा था। ऐनी बॉश के सामने मिताली राज थीं। वे अपने 32 रन के व्यक्तिगत स्कोर पर थीं। उनके 10 हज़ार अंतरराष्ट्रीय रन में सिर्फ 03 की कमी थी। उन्होंने एक चौका लगाया और 10 हज़ार रन पूरे किए। अब  वे 10 हज़ार रन बनाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी और इंग्लैंड की चार्लोट एडवर्ड्स के बाद विश्व की दूसरी खिलाड़ी बन गई हैं। 10 हज़ार अंतरराष्ट्रीय रन बनाना निसन्देह एक असाधारण उपलब्धि है।

       वे एक गेंद पर चौका लगाकर एक असाधारण उपलब्धि हासिल करती हैं और ठीक अगली गेंद पर आउट होकर वापस पवैलियन लौट जाती हैं। ये दो गेंद ज़िन्दगी का और विशेष रूप से महिला ज़िन्दगी का रूपक गढ़ती हैं। ज़िन्दगी पल में तोला पल में माशा। ज़िन्दगी चाहे जैसी ही लेकिन मिताली राज की क्रिकेट यात्रा तो कम से कम ऐसी नहीं है। उन्होंने 1999 में एक बार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे कदम दर कदम प्रसिद्धि के शिखर पर चढ़ती गई और अब तक शिखर पर पहुंच कर ठहर गई हैं। और वे अब उस  ऊंचाई पर हैं जिस पर पहुंच पाना किसी और के लिए नामुमकिन नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है।

         मिताली ने 16 साल की उम्र में पहला अन्तर्राष्ट्रीय मैच आयरलैंड के विरुद्ध एकदिवसीय मैच था जिसमें उन्होंने नॉट आउट 114 रन बनाए। पहला टेस्ट मैच 2002 में इंग्लैंड के विरुद्ध और पहला टी20 मैच 2006 में इंग्लैंड के विरुद्ध खेला था। उन्होंने कुल 10 टेस्ट मैच खेले जिसमें 01 शतक और चार अर्धशतकों की सहायता से 51 की औसत से 663 रन बनाए। उन्होंने 89 टी20 मैचों में 17 अर्धशतकों की सहायता से 37.52 की औसत से 2364 रन और 211 टेस्ट मैच में 6974 रन बनाए हैं। वे 7हज़ार एकदिवसीय रन बनाने से केवल 26 रन दूर हैं और जब आप ये पढ़ रहे होंगे तो सकता है ये माइलस्टोन भी उन्होंने प्राप्त कर लिया हो। महिला क्रिकेट इतिहास की वे ऐसा करने  वाली एकमात्र खिलाड़ी होंगी। साथ ही दो एकदिवसीय  विश्व कप के फाइनल में टीम को पहुंचाने वाली एकमात्र भारतीय कप्तान। 

        वे अपनी उपलब्धियों के लिए  'लेडी सचिन'के नाम से जानी जाती हैं। पर वे भारतीय महिला क्रिकेट की गावसकर ठहरती हैं। वे गावस्कर की तरह अपनी असाधारण खेल और उपलब्धियों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होने वाली और प्रसिद्धि पाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। हरमनप्रीत कौर उनके बाद आईं।अपनी कॉपी बुक स्टाइल,शानदार स्ट्रोक्स और एक छोर से पारी को थामे रखने में गावस्कर सरीखी ही लगती हैं। सिर्फ इतना भर ही नहीं। जिस तरह का पुराने के जाने और नए के आने के दो कालों का, दो महान व्यक्तित्वों की टकराहट का और खेल की दो शैलियों के  बीच का द्वंद और संघर्ष पुरुष क्रिकेट में गावस्कर और कपिल रचते हैं,उसका प्रतिरूप महिला क्रिकेट में मिताली और हरमनप्रीत कौर रचती हैं।

        वे एक वायुसैनिक की पुत्री हैं। उन्होंने बचपन से आसमान में उड़ते वायुयानों को देखा होगा। बहुत करीब से देखा होगा। निसन्देह वे उससे प्रभावित होती होंगी। उससे एक आत्मीयता बनी होगी। अवचेतन में ऊंचाइयों को छूने की चाह जन्मी होगी। इस चाह को पूरा करने के लिए नीला आसमां ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है। क्रिकेट का हरा मैदान तो था। रनवे ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है,22 ग़ज़ की पिच तो थी ना। और कोई यान ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है,एक अदद बल्ला तो था ना। बस चाहना और होंसला के पंख होने चाहिए होते हैं। वे मिताली के पास थे। हां,उन पंखों को कोई खोलने वाला चाहिए था। वो भी मिला। उन पंखों को खोला संपत कुमार ने। उन्हें असीमित उड़ान भरने की काबिलियत दी। दरअसल संपत कुमार कमाल के  पारखी थे।उन्होंने पहली नज़र में हीरे को पहचान लिया था। फिर मेहनत से उसको तराश दिया। आज वो हीरा भारतीय महिला क्रिकेट के माथे सजा है। 

         पर जीवन में कुछ दुर्योग भी आते हैं। बात 1997 की है। 14 साल की उम्र ही मिताली को विश्व कप के संभावितों में चुना लिया गया था। उस के कुछ समय बाद ही संपत कुमार की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। शायद उनका काम पूरा हो गया था। कहते हैं शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे। ताकि कोई दूसरा ताजमहल ना बन सके। तो क्या यहां ईश्वर को लगा कि एक नायाब हीरा तराशा जा चुका है। और ऐसा कोई दूसरा हीरा नहीं होना चाहिए। शायद हां। शायद ना। पर संपत चले गए।

        इसे एक संयोग ही मानना चाहिए कि एक  लड़की नर्तकी बनते बनते क्रिकेटर बन गई। दरअसल मिताली भरतनाट्यम में प्रशिक्षित हैं। पहले वे डांसर बनना चाहती थीं। पर वे क्रिकेटर बन गईं। उनके खेल में लय है,गति है,नियमों की बंदिश है और सबसे ऊपर खेल में कमाल का ग्रेस है। वे एक क्लासिक नृत्य की गति,लय, शास्त्रीयता और ग्रेस को खेल में समाविष्ट कर देतीं हैं और खेल को नृत्य की तरह दर्शनीय और मोहक बना देती हैं। 

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दरअसल वे क्रिकेट की रुक्मणि देवी हैं। एक असाधारण उपलब्धि के लिए उनको  बधाई और अगली के लिए शुभकामनाएं।

Monday 8 March 2021

6मार्च,1971 याद करते हुए

              


                     50 सालों का वक्फा एक आदमी के जीवन में बहुत बड़ा काल खंड होता है। एक नवजात बच्चा अधेड़ावस्था में पहुंच जाता है और एक युवा वृद्धावस्था में। तमाम गांव शहरों में तब्दील हो जाते हैं और कुछ शहर महानगरों में। देशों में कई कई निज़ाम बदल जाते हैं। कोई एक देश अनेकों आज़ाद पहचानों में बदल जाता है तो बांटे गए दो देश एक पहचान में तब्दील हो जाते हैं। 10 ग्राम सोने की कीमत या फिर सेंसेक्स दहाई और सैकड़ों से होते हुए 50 हज़ार के अंकों को पार कर जाता  है।

                  इतने समय में कोई एक खेल अपना पूरा चरित्र ही बदल लेता है। पांच दिन वाला खेल तीन घंटों के खेल में सिमट कर अपार लोकप्रियता प्राप्त कर लेता है और 'भद्रजनों के खेल' के रूप में जाने जाना वाला ये खेल आम लोगों के 'धर्म' में परिवर्तित हो जाता है। उस खेल की साफ शफ्फाक सफेद पोशाक घास और मिट्टी के दाग धब्बों से सजती हुई रंगीन पोशाक में बदल जाती है और इस खेल की महारथी टीम पिछड़ कर पिद्दी बन जाती हैं तथा पिद्दी टीम आगे बढ़कर अपनी कीर्ति का परचम लहराने लगती हैं। ये खेल इस कदर बदल जाता है कि पहले फटाफट क्रिकेट टेस्ट मैचों की तरह खेली जाती थी और बाद में टेस्ट मैच फटाफट क्रिकेट की तरह होने लग जाते हैं।

                  और इन सबके बीच अगर कुछ नहीं बदलता तो बस इस खेल के एक 'भद्र पुरुष' की अक्षुण्ण कीर्ति नहीं बदलती। उस की कीर्ति खेल जगत के आसमान में चमकते अनगिनत सितारों के बीच ध्रुव तारे की तरह अटल रहती है। अक्षय कीर्ति वाला ये सितारा 'लिटिल मास्टर' सुनील मनोहर गावस्कर है।

                      6 मार्च 1971 को  अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण करने वाले गावस्कर के अंतरराष्ट्रीय खेल जीवन के 50 वर्ष हो चुके हैं। इस बीच तमाम सितारे आए और गए,पर गावस्कर की जगह कोई नहीं ले पाया और ना ले सकता है।

                  बांस का कोई टुकड़ा उसमें कुछ छेद कर देने से भर से बांसुरी नहीं बन जाता बल्कि ये बांसुरी तब बनता है जब ये टुकड़ा सुर साधकों के होठों का स्पर्श पाता है और जब उनकी साँसें लयबद्ध गति से उन छिद्रों से होती हुई संगीत बनकर निकलती है। ऐसे ही गेंद बल्ले का कोई खेल क्रिकेट का खेल यूं ही नहीं बन जाता। ये गेंद और बल्ला एक खेल बनता है उसके असाधारण साधकों के उसे साधने से। सुनील गावस्कर उन खिलाड़ियों में शुमार है जिन्होंने क्रिकेट को क्रिकेट बनाया और उसे बलंदी पर पहुँचाया।

                         1971 में अजीत वाडेकर के नेतृत्व में जो टीम वेस्टइंडीज के दौरे पर गई थी उसमें एक 21 साल का नवयुवक भी शामिल था जिसे अभी अपना पहला टेस्ट मैच खेलने था। ये सुनील गावस्कर थे। अंगुली की चोट के कारण वो पहला टेस्ट मैच नहीं खेल पाए। लेकिन पोर्ट  ऑफ स्पेन में खेले गए दूसरे मैच से उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय जीवन की शुरुआत की। अपने उस पहले मैच में उन्होंने 65 और 67 रन बनाए। अगला और सीरीज का तीसरा मैच जार्जटाउन गुयाना में हुआ जिसमें उन्होंने अपना पहला शतक जमाया। उस मैच में उन्होंने 116 और 64 रन बनाए।  ब्रिजटाउन बारबोडास में खेले गए चौथे मैच  में 01 और नॉट आउट 117 रन और अंतिम मैच में एक बार फिर वे त्रिनिदाद वापस आये। यहाँ पर उन्होंने पहली पारी में 124 और दूसरी पारी में 220 रन बनाए। ऐसा करने वाले वे डग वाल्टर्स के बाद दूसरे खिलाड़ी थे। इस तरह से गावस्कर और दिलीप सरदेसाई के शानदार प्रदर्शन के बल पर वेस्टइंडीज जैसी टीम को उसकी धरती पर भारत पहली बार हरा सका। इस सीरीज में चार शतकों की सहायता से उन्होंने 154.80 की औसत से 774 रन बनाए। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर उस समय तक नहीं देखा जब 1987 में पाकिस्तान के विरुद्ध आखरी टेस्ट मैच नहीं खेल लिया।

                       अपने 16 साल के लंबे कॅरियर के दौरान वे रिकॉर्ड दर रिकॉर्ड बनाते चले गए। उन्होंने कुल 125 टेस्ट मैच खेले जिसमें  उन्होंने 34 शतकों और 45 अर्धशतकों की सहायता से 51.12 की औसत से 10122 रन बनाए। उन्होंने 108 एकदिवसीय मैच भी खेले जिसमें उन्होंने  01 शतक और 27 अर्द्ध शतकों की सहायता से 35.13 औसत से 3092 रन बनाए। टेस्ट मैच में डॉन ब्रेडमैन के 29 शतकों के रिकॉर्ड को तोड़कर 34 शतकों का रिकॉर्ड बनाया जो लगभग 20 वर्षों तक अजेय रहा जब तक कि सचिन ने उनका ये रिकॉर्ड तोड़ नहीं दिया। वे टेस्ट क्रिकेट में 10 हज़ार रन बनाने वाले पहले खिलाड़ी थे।

            लेकिन उनकी महानता उनके आंकड़ों या उनके रिकार्ड्स से नहीं बनती, भारतीय क्रिकेट को और क्रिकेट खेल को उनके योगदान से बनती है। जिस समय गावस्कर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिदृश्य पर आए उस समय तक कोई भी भारतीय खिलाड़ी वैयक्तिक रूप से विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना पाया था,ना कोई बड़ी छाप छोड़ पाया था। और ना ही टीम के रूप में भारत की कोई साख थी। 1971 के वेस्टइंडीज दौरे तक भारत ने उस समय तक खेले 117 मैचों में से कुल 16 जीते थे और विदेशी धरती पर खेले 47 मैच से केवल 3 जीते थे। लेकिन गावस्कर ने अपनी पहली सीरीज में ही शानदार खेल दिखाया और अपनी पहचान स्थापित की। वो भी दुनिया के सबसे कठिन और मारक आक्रमण के सामने। वे जल्द ही दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ओपनिंग बल्लेबाज़ और दुनिया के महानतम बल्लेबाजों में शुमार हो गए। वे विश्व पटल पर वैयक्तिक रूप से पहले स्थापित भारतीय खिलाड़ी थे। उनकी तुलना डॉन ब्रेडमैन से की जाने लगी। इसने भारतीय क्रिकेट को एक नई पहचान दी। उन्होंने भारतीय खिलाड़ियों में एक ज़ज्बा और आत्मविश्वास भरा। वे भारतीयों के लिए एक उम्मीद बनकर ,एक हीरो बनकर और एक प्रेरणास्रोत बनकर उभरे थे। उन्होंने बताया कि भारतीय खिलाड़ियों में प्रतिभा और योग्यता की कमी नहीं है और आने वाला समय भारत का होगा।

          वे क्रिकेट की शास्त्रीयता के सबसे आदर्श नमूना थे। वे स्वयं में क्लासिक क्रिकेट की किताब थे जिन्हें देखकर क्रिकेट के हर स्ट्रोक को सीखा जा सकता था। वे ड्राइव और कट के मास्टर थे। उनके स्ट्रेट और कवर ड्राइव्स बला के खूबसूरत होते थे। वे शानदार कट किया करते। वे लेट कट भी इतनी ही  खूबसूरती से खेलते। जब गेंद विकेटकीपर के हाथों में जाने को होती तो वे गेंद को कट कर  बाउंड्री की राह दिखा देते। उनकी टेक्नीक एकदम परफेक्ट थी। अपने सिर को निशाना बनाकर फेंकी गई बाउंसर को इतने सीधे बल्ले से खेलते कि वो गेंद उनके पैरों के पास गिरकर डेड हो जाती और क्लोज इन फील्डर को भी उसे उठाने के लिए पिच पर आना पड़ता। उनका खुद का मानना था कि उनकी टेक्नीक इतनी परफेक्ट थी कि वेस्टइंडीज के सबसे खूँखार आक्रमण के सामने भी उन्हें हेलमेट जैसे सुरक्षा कवच की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। 

            दरअसल वे जादूगर थे। ऐसे जादूगर जो काठ के बल्ले में जान फूंक देते और उसे सजीव बना देते। उनके हाथों में आकर बल्ला वैसे बात करता जैसे कोई कठपुतली उसके खेल दिखाने वाले के हाथों  में सजीव हो जाती और बतियाती,बोलती सी लगती। उनके हाथों में आकर बल्ला 'डांस मास्टर' सरीखा हो जाता जिसके इशारों पर गेंद नाचने लगती।

                    काठ का कोई बल्ला यूं ही क्रिकेट का बल्ला नहीं बनता,वो बनता है जब साधक बल्लेबाज़ अपनी कलात्मकता और टेक्नीक से गेंद और बल्ले के मिलन की एक लयात्मक घटा की निर्मिति करते हैं और फिर उस से होने वाली कभी रनों की फुहार,तो कभी रनों की रिमझिम बरसात खेल के चाहने वालों को सराबोर कर उनको अनिवर्चनीय आनंद की अनुभूति से भर देती हैं। गावस्कर बल्ले के ऐसे ही असाधारण साधक थे जिन्होंने अपने बल्ले से गेंद की लय को साधकर क्रिकेट प्रेमियों को अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति कराई।

                 उन्हें सचिन की तरह भगवान का दर्जा भले ही ना मिला हो पर वे क्रिकेट की दुनिया के सार्वकालिक महान बल्लेबाज में से एक और बिला शक सर्वश्रेष्ठ आरंभिक बल्लेबाज़ थे। शास्त्रीयता में वे क्रिकेट के भीमसेन जोशी या कुमार गंधर्व या पं जसराज ठहरते हैं। वे उनकी रचनाओं की तरह ही अपने क्लासिक स्ट्रोकों से अपने खेल का कोमल,सुदर्शन और लयबद्ध संसार रचते जिसे  देखकर देखने वालों को संगीत सा आनंद मिलता। उनके खेल में रक्षण और आक्रमण का कमाल का मिश्रण था। उनके खेल को देखकर लगता मानो उनमें तुलसी और कबीर की आत्मा एक साथ समा गई हो। गेंदबाज की बेहतरीन गेंदों को सम्मान देने के लिए वे अपने डिफेंस में तुलसी की विनयपत्रिका की रचनावली की तरह विनत हो जाते और खेल व खिलाड़ी की लय तथा समरसता को तोड़ने वाली गेंदों को सबक सिखाने के लिए उनके आक्रामक स्ट्रोक्स कबीर की वाणी से हो जाते। पर दोनों ही दशा में तुलसी और कबीर की रचनाओं की गेयता की तरह उनके खेल की लय कभी नहीं टूटती।

                 त्रिनिदाद और टोबेगो दरअसल कैलिप्सो संगीत का देश है। कैलिप्सो एफ्रो कैरेबियन लोक गीत संगीत है जिसका मूल स्वर उपहास और व्यंग्य का है। क्या ही कमाल है कि गावस्कर वेस्टइंडीज में अपने शानदार क्लासिक खेल से कैलिप्सो की मूल भावना के अनुरूप खेल के मास्टर्स को चेतावनी देते हैं कि इस खेल की श्रेष्ठता अब किसी की बपौती नहीं रहने वाली है। ये वेस्टइंडीज से ज़्यादा शायद इंग्लैंड के लिए थी जिसे आगामी गर्मियों में हराकर भारत को एक ऐतिहासिक जीत जो

 हासिल करनी थी। उनके क्लासिक खेल के प्रभाव को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि अपने खेल से वे कैलिप्सो रचने की प्रेरणा बनते हैं और लार्ड रेलातोर उनके खेल से प्रभावित होकर 'गावस्कर कैलिप्सो' रचते हैं जिसका भावार्थ  है-

'ये गावस्कर था

 सच्चा मास्टर

 एक दीवार के सदृश

 हम गावस्कर को बिल्कुल भी आउट नहीं कर सके

 हां बिल्कुल भी

 तुम जानते हो 

 वेस्टइंडीज गावस्कर को आउट नहीं कर सका 

 बिल्कुल भी'

                दरअसल यही गावस्कर की महानता है। उनके खेल से उनके विपक्षी भी उतने ही प्रभावित हुआ करते हैं जितने उनके प्रशंसक। महान खिलाड़ी वही होता है जो अपने विपक्षी की योग्यता के अनुरूप अपने खेल के स्तर को ऊंचा कर ले। गावस्कर ने सबसे शानदार प्रदर्शन वेस्टइंडीज के विरुद्ध ही किया जो उस समय की सबसे मजबूत और शानदार टीम मानी जाती थी। उन्होंने 34 में से 13 शतक वेस्टइंडीज के खिलाफ ही लगाए। 

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निसन्देह गावस्कर लिविंग लीजेंड हैं। उनकी कीर्ति 50 साल तो क्या आने वाले सैकड़ों 50 सालों तक यूं ही अक्षुण्ण रहने वाली है।

अलकराज

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