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Monday, 14 September 2026

सब्र का फल मीठा होता है




ये 14 सितंबर 2020 की तारीख थी। न्यूयॉर्क के फ्लशिंग मीडोज पर यूएस ओपन का पुरुष एकल फाइनल जर्मनी के अलेक्जेंडर ज्वेरेव और ऑस्ट्रिया के डोमिनिक थिएम के बीच खेला जा रहा था। ज्वेरेव पहले दो सेट 6-2, 6-4 से जीतकर कर अपनी पहली ग्रैंड स्लैम जीत से केवल एक सेट की दूरी पर थे। लेकिन अगले दो सेट थिएम ने 6-4, 6-3 से जीतकर मैच को बहुत रोचक बना दिया। ज्वेरेव ने फाइनल सेट में एक बार फिर बेहतरीन खेल दिखाया और 5-3 की बढ़त के साथ अपनी सर्विस पर 30-0 के स्कोर से आगे थे और केवल जीत से केवल दो अंक दूर थे। लेकिन वे मैच हार गए। 

अब उनकी आँखों में दुख और पश्चाताप के आंसुओं के सिवा कुछ ना था। ट्रॉफी प्रेजेंटेशन सेरेमनी में बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए ज्वेरेव अपनी टीम को संबोधित करते हुए कह रहे थे "मुझे उम्मीद है कि एक दिन हम सब मिलकर उस ट्रॉफी को उठाएंगे।"

इस बात को छह साल बीत गए। 13 सितंबर 2026 को ज्वेरेव एक बार फिर आर्थर ऐश एरीना में फाइनल खेल रहे थे। इस बार वे चैंपियन की मानसिकता से खेल रहे थे और बेन शेल्टन को 6-3, 7-6 (7-2), 5-7,6-4 से हराकर छह साल पहले अपने खेल करियर की सबसे खराब मेमोरी को डिलीट करते हुए अपनी टीम को संबोधित करते हुए कह रहे थे “हमने 30 साल तक कोई ग्रैंड स्लैम खिताब नहीं जीता था, और अब हमने तीन महीने के भीतर दो खिताब जीत लिए हैं। मुझे लगता है कि भगवान ने हमारी मेहनत, हमारे कष्ट और हमारे दर्द को देखा है। मुझे लगता है कि 2026 उन सभी वर्षों का परिणाम है जो इससे पहले हुए हैं, इसलिए आप सभी का धन्यवाद। आप लोग सचमुच अद्भुत हैं, और आप लोगों के बिना मैं यहाँ नहीं हो सकता था।”

इस जीत के साथ वे अपना दूसरा ग्रैंड स्लैम ही नहीं जीत रहे थे बल्कि उस लोकप्रिय कहावत को कुछ और वजन भी प्रदान कर रहे थे जो कहती है 'सब्र का फल मीठा होता है।'

अपनी पहली ग्रैंड स्लैम फाइनल हार के बाद इस साल अप्रैल तक वे दो और ग्रैंड स्लैम फाइनल खेले,लेकिन जीत नहीं पाए। वे 1995-2000 के बीच जन्मे 'नेक्स्ट जेन पीढ़ी' के मेदवेदेव,सिटसिपास,डोमिनिक थिएम, रूबलेव, बेरेटिनी और कैस्पर रुड में सबसे प्रतिभाशाली थे। ये एक ऐसी पीढ़ी थी जो दो पीढ़ियों के बीच सैंडविच बन गई और जिसे बहुत सारी उपलब्धियों से महरूम कर दिया गया। एक तरफ उम्र की सीमा के पार जाकर भी बिग थ्री के राफा,नोवाक और फेडरर ने इस पीढ़ी को अपना स्थान बनाने के लिए कोई स्पेस नहीं दिया। और जब ये तीनों कुछ निस्तेज होते, उससे पहले ही इनके बाद वाली पीढ़ी की प्रतिभा ने उन्हें कोई स्पेस क्रिएट नहीं करने दिया जिसकी नुमाइंदगी यानिक सिनर और अलकराज जैसे खिलाड़ी कर रहे हैं। 

जिस समय इन दो पीढ़ियों के खिलाड़ियों की प्रतिभा के बीच इस नेक्स्ट जेन पीढ़ी के खिड़कियों की प्रतिभा फेड हो रही थी,उस समय में अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने धैर्य के साथ अपने समय की प्रतिक्षा की। संयम रखा। अपनी प्रतिभा की धार पर सान चढ़ाई। संघर्ष जारी रखा। अपनी ऊर्जा बनाए रखी। परिणाम सामने था।

2026 तक आते आते राफा और फेडरर इतिहास बन चुके थे। नोवाक इतिहास बनने के कगार पर थे। नई पीढ़ी अपनी चोटों से जूझ रही थी। ये ज्वेरेव के लिए मौका था। उनका समय आ गया था। ऑस्ट्रेलिया ओपन के वे सेमीफाइनल में हार गए। लेकिन फ्रेंच ओपन जीतकर अपने ग्रैंड स्लैम खिताब का खाता खोला। विंबलडन में वे चैंपियन की तरह खेले। फाइनल तक पहुंचे। यहां वे चूक गए। लेकिन न्यूयॉर्क में वे इस बार एक चैंपियन की ऊर्जा और मानसिकता के साथ पहुंचे थे और वैसा ही उन्होंने खेला। जहां छह साल पहले उनके हाथों से ट्रॉफी छीन ली गई थी, वो उनके हाथों की शोभा बढ़ा रही थी। उनके अधर उसे स्पर्श कर रहे थे।

कोई भी जीत ऐसे ही किसी का दामन नहीं थामती। वे खेल में इंतिहाई तरीके से खेल में इन्वॉल्व थे। वे खेल पर और हरेक अंक पर इस कदर फोकस्ड थे कि उन्हें अपनी जीत का पता ही नहीं चला। वे चैंपियनशिप अंक जीतकर अगली सर्विस के लिए बेसलाइन पर पहुंच गए थे। तब उनकी टीम से इशारा हुआ कि वे जीत चुके हैं। उनके चेहरे पर हल्का सा विस्मय फैला। मुस्कुराहट उनके चेहरे का आवरण बन गई। उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला दिए। सारा आकाश उन्होंने अपने अंक में समेट लिया। खुशी ने अपना स्पेस आंखों में ढूंढा। खुशी तरल हो आंखों में समा गई। 

एक खिलाड़ी जिसके लिए चैंपियन बनना 29 साल तक केवल एक सपना भर रह गया था। तीन महीनों के अंतराल में वो दो बार चैंपियन बन गया था। सपनों से परे। असल जिंदगी में।

अलेक्जेंडर ज्वेरेव के लिए सब्र का फल मीठा था।



पर बेन शेल्टन का क्या!

उनका क्या जिनके लिए प्रतीक्षा समाप्त नहीं होती।  वो बेचैनी पैदा करती है। कसक काँटे की तरह दिल में कचोटती है। प्रतीक्षा कुछ और लंबी होती जाती है। जैसे बेन के लिए। अमेरिका के लिए। अमेरिका के टेनिस प्रेमियों के लिए। अश्वेत अमेरिकन्स के लिए।

बेन शेल्टन स्टेडियम में बैठे उन 24 हजार अमेरिकन्स की उस उम्मीद के लिए खेल रहे थे जो कहती थी कि इस मैदान पर 2003 में एंडी रोडिक के बाद एक नया अमेरिकन खिलाड़ी चैंपियन बनेगा। वे उन अश्वेत अमेरिकन्स की उम्मीदों का बोझ लिए खेल रहे थे जो प्रतीक्षा कर रहे थे कि 1968 में आर्थर ऐश के बाद कोई अमेरिकन अश्वेत यूएस चैंपियन बनेगा। शेल्टन खुद के पहले ग्रैंड स्लैम खिताब जीत लेने के सपने को पूरा करने के लिए खेल रहे थे। 

इस उम्मीद के लिए उन सभी के पास एक वाजिब कारण था। एक स्मृति थी। एक चार महीने पहले हुए अंतहीन प्रतीक्षा की समाप्ति की स्मृति। उनकी स्मृति में एक ऐसी जीत थी जो 53 साल बाद संभव हुई थी। न्यूयॉर्क निक्स ने 1973 के बाद अपना कोई एनबीए खिताब जीता था। 13 जून को पांचवें गेम में सान एंटोनियो स्पर्स को हराकर 4-1 से। इससे पहले चौथे गेम में इसी शहर के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन एरीना में न्यूयॉर्क निक्स की टीम तीसरे क्वार्टर तक 29 अंकों से पिछड़ चुकी थी। लेकिन निक्स ने 107-106 से ये मुकाबला जीत लिया था। एनबीए के फाइनल्स के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। अमेरिकन्स जानते थे,चमत्कार होते हैं। इसी शहर में चार महीने पहले की स्मृति उनके पास थी।

पर चमत्कार हमेशा नहीं होते। उन सब के लिए प्रतीक्षा अधूरी रही।

शेल्टन उम्मीदों के बोझ तले दब गए। पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने के तनाव को ठीक तरह से हैंडल करने से चूक गए। विपक्षी के अनुभव से पिछड़ गए। 

वे हार गए क्योंकि आंकड़े और अनुभव दोनों ही ज्वेरेव के पक्ष में थे। ज्वेरेव ने शुरु से ही इसका फायदा उठाया। उनकी सर्विस इतनी जोरदार थी कि पहले दो सेटों में अपनी पहली सर्व पर केवल तीन अंक गंवाए। कोई ब्रेक प्वाइंट शेल्टन को नहीं दिया। हां,तीसरे सेट के 12वें गेम में ज़्वेरेव की सर्विस शेल्टन ने ब्रेक की और सेट जीतकर अपनी उम्मीदें जिंदा रखीं। लेकिन इससे परिणाम नहीं बदलना था। नहीं ही बदला। ज़्वेरेव ने चौथे सेट के शुरु में ही शेल्टन की सर्विस ब्रेक की और फिर सातवें गेम में दूसरी बार सर्विस ब्रेक कर साढ़े तीन घंटे के संघर्ष को विराम दिया।

यूएस ओपन को एक नया चैंपियन मिल गया था।

ये अलेक्जेंडर साशा ज्वेरेव थे।

चैंपियनशिप साशा को मुबारक।

Sunday, 13 September 2026




शनिवार की दोपहर न्यूयार्क के फ्लशिंग मीडोज के आर्थर ऐश एरीना में खेला गया 2026 के यूएस ओपन का महिला एकल फाइनल अपने आप में कमाल का था। कमाल का इसलिए कि ये मैच योग्यता में एकदम समान दोनों नंबर एक लेकिन व्यक्तित्व में एकदम विपरीत स्वभाव वाली खिलाड़ियों के बीच मुकाबला था।

एक समान स्तर पर खेला गए बेहद संघर्षपूर्ण मैच। जो दो घंटे तेरह मिनट और तीन सीटों तक चला। जिसे अंततः रायबाकिना ने 6-4,5-7,6-2 से जीत लिया। और जीतकर ना केवल सबालेंका को लगातार 99 सप्ताह तक नुमाबरपर रहने के बाद उससे पदच्युत कर दिया बल्कि यूएस ओपन की चैंपियन होने के गौरव से भी वंचित कर दिया।

सबालेंका एक लंबी और मजबूत कद काठी की खिलाड़ी हैं जो अपने उग्र और आक्रामक स्वभाव के लिए जानी जाती हैं। अपने स्वभाव के अनुरूप ही उनकी पोशाक गहरे लाल रंग की थी। फाइनल में जब वे कोर्ट में प्रवेश कर रहीं थीं तो उनकी जैकेट भी वैसी ही गहरे लाल रंग की थी। उनके ठीक विपरीत रायबाकिना दुबली-पतली छछहरी काया वाली सौम्य सी खिलाड़ी हैं। शांत और गंभीर स्वभाव की। बर्फ की मानिंद अपनी भावनाओं को फ्रीज़ किए हुए। जब वे फाइनल में कोर्ट में प्रवेश कर रही थीं तो उनकी सफेद जैकेट उनके स्वभाव से के अनुरूप ही थी। वे इस बार पीले रंग के टॉप में खेल रही थीं। मानो उन्हें अपने नंबर एक बन जाने और ये खिताब जीत लेने का आभास हो गया था और वे अपनी जीत के बसंत का उत्सव मनाने मैदान में उतरी हों। उनका पीला टॉप और काली स्कर्ट बीच मैदान मधुमक्खी का एक शानदार रूपक प्रस्तुत कर रही होती थीं जो अपने शानदार खेल के डंक से विपक्षी खिलाड़ी की उम्मीदों के मकरंद को चुरा लेती और उसे अपनी जीत के आनन्द के मधु में परिवर्तित कर देती।

सबालेंका पिछले 99 हफ्तों से नंबर एक की पोजीशन पर हैं। औपचारिक रूप से फाइनल खेले जाने तक वे नंबर एक हैं। लेकिन जैसे ही एलिना रायबाकिना ने यहां सेमीफाइनल में प्रवेश किया,वे अनौपचारिक रूप से नंबर एक खिलाड़ी हो गई थीं। ये क्या ही मज़ेदार स्थिति थी कि शनिवार को जिस समय दो खिलाड़ी अपना फाइनल खेल रही थीं तो उस समय औपचारिक रूप से सबालेंका नंबर एक और रायबाकिना नंबर दो थीं। जबकि अनौपचारिक रूप से स्थित इसके एकदम विपरीत थी। इतना ही नहीं वे इससे पहले दो ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल चुकी थीं। और दोनों ने एक-एक बार एक दूसरे को हराकर ऑस्ट्रेलिया ओपन जीता था। सबालेंका ने 2023 में और रायबाकिना ने 2026 में। इस साल दोनों चार बार एक दूसरे के साथ खेली थीं और दोनों ने बराबर जीत हासिल की थीं। रायबाकिना ने ऑस्ट्रेलिया ओपन और डब्ल्यूटीए टूर्स फाइनल में जीत हासिल की तो सबालेंका ने मियामी ओपन के सेमीफाइनल और इंडियन वेल्स ओपन के फाइनल में रायबाकिना को हराया। इतना ही नहीं दोनों पावर खेल की चैंपियन खिलाड़ी हैं। और तेज सर्विस के लिए और बेसलाइन के शानदार खेल के लिए जानी जाती हैं।

ये रायबाकिना का दृढ़ संकल्प और इच्छा शक्ति ही थी कि वे यहां लगभग असंभव जीत हासिल करती हैं। वे यूएस ओपन में पैर की चोट के साथ आती थीं और एक हफ्ते तक तो टेनिस खेल तक नहीं पातीं। वे यूएस ओपन से पहले होने वाले सिनसिनाटी ओपन के क्वार्टर फाइनल में इगा स्वीयेक के खिलाफ चोट के चलते हट गई थी। लेकिन एक बार जब उन्होंने प्रतियोगिता में अपना विजयी अभियान शुरु किया तो मुड़कर नहीं देखा। वे बिना एक भी सेट गंवाए क्वार्टर फाइनल में पहुंचती हैं। और फिर क्वार्टर फाइनल में नाओमी ओसाका और सेमीफाइनल में ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता झेंग के विरुद्ध एक सेट से पिछड़ने के बावजूद जीत हासिल करती हैं।

ये एक संयोग ही कहा जायेगा कि पूर्व सोवियत यूनियन के दो संघटक देशों बेला रूस और कज़ाकिस्तान से दो बालाएं  हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका आती हैं और सबालेंका पेगुला को और रायबाकिना कोको गफ को सेमीफाइनल में हराकर अमेरिकी उम्मीदों को मटियामेट कर देती हैं। 

रायबाकिना की ये जीत उन्हें विश्व महिला टेनिस परिदृश्य पर अब सबसे मजबूत और शानदार खिलाड़ी के रूप में ही स्थापित नहीं करती,बल्कि महिला टेनिस की नंबर एक खिलाड़ी के रूप में भी स्थापित करती है। इतना ही नहीं ये महिला टेनिस की एक और शानदार प्रतिद्वंदिता की नींव भी रखती है। सबालेंका बनाम रायबाकिना।

रायबाकिना को ये शानदार जीत मुबारक।



Sunday, 8 September 2024

यूएस ओपन की नई चैंपियन

 





रंग खुद में अभिव्यक्ति का शक्तिशाली माध्यम हैं। उतने ही शक्तिशाली जितने उच्चरित शब्द हो सकते हैं या लिखित शब्द। हर रंग एक कहानी कहता है,एक अर्थ ध्वनित करता है और एक प्रभाव की निर्मिति करता है। रंग दृश्यों को पूरी तरह से बदल देते हैं। टेनिस प्रेमी जानते होंगे कि समय का थोड़ा सा अंतराल,भौगोलिक सीमाओं की दूरी और रंग मिलकर टेनिस की पूरी दुनिया ही बदल देते हैं।

जब जुलाई सितंबर में बदल जाता है, लंदन न्यूयार्क में आ मिलता है, शालीन सफेद रंग शोख चंचल चटक रंगों में तब्दील हो जाता है और एक परंपरागत समाज खुले और उन्मुक्त समाज में बदल जाता है, तो टेनिस का खेल अपनी काया,अपना स्वभाव ना बदले, ये कैसे हो सकता है।

विंबलडन से यूएस ओपन तक आते आते टेनिस का मानो कायाकल्प हो जाता है। बंधन से मुक्त हो निर्द्वंद सा लगने लगता है। एक गंभीर शालीन प्रौढ़ मानो उम्र को पीछे धकेलते हुए किसी चपल चंचल युवा सा हुआ जाता है। 

विंबलडन और यूएस ओपन देखना टेनिस देखने के दो अलहदा अहसास हैं। कोर्ट के भीतर टेनिस के संघर्ष का अहसास भले ही एक हो, लेकिन टेनिस को समग्रता में देखना एक अलग अहसास है। सफेद कपड़ों में देखना और रंगीन कपड़ों में देखना। हरी घास पर देखना और कृत्रिम नीली सतह पर देखना। यानी टेनिस की दो अलग दुनिया से होकर गुजरना है। 

बीते शनिवार यूएस ओपन का महिलाओं का फाइनल मैच खेला गया। इस सीजन की दो सबसे ज्यादा इन फॉर्म खिलाड़ी विश्व नंबर दो बेलारूस की अलीना सबालेंका और विश्व नंबर छ खिलाड़ी अमेरिका की जेसिका पेगुला आमने सामने थीं। 

दोनों पहली बार यूएस ओपन के फाइनल में खेल रही थीं और दोनों अपने दीर्घ प्रतीक्षित सपने को पा लेने की चाहत लिए फ्लशिंग मीडोज के आर्थर ऐश अरीना के सेंटर कोर्ट में आमने सामने थीं। फ़र्क बस इतना था कि सबालेंका अपने तीसरे ग्रैंड स्लैम खिताब के लिए खेल रही थीं और पेगुला पहले खिताब के लिए। 

यूएस ओपन की अब तक की यात्रा दोनों खिलाड़ियों के लिए निराशा से भर देने वाली थी। पैगुला इससे पहले छ बार क्वार्टर फाइनल में हारकर अपने सपने को पूरा करने से चूक गई थीं तो सबालेंका अपने सपने को पूरा करने के और भी करीब आकर चूक गई थीं। वे पिछली बार फाइनल हार गई थीं और उससे पहले के साल 2021 और 2022 के दो सत्रों में उनकी राह सेमीफाइनल में आकर रुक गई थी।

ये फाइनल इस अर्थ में साल 2023 की पुनरावृति था कि सबालेंका के सामने इस बार भी स्थानीय खिलाड़ी प्रतिद्वंदी के रूप में थी। पिछली बार कोको गफ ने उन्हें फाइनल में हरा दिया था। लेकिन उससे भी अधिक ये फाइनल तीन सप्ताह पूर्व के सिनसिनाती ओपन के फाइनल का पुनरावृति था। उस फाइनल में सबालेंका ने पेगुला को 6-3, 7-5 से हरा दिया था। 

नीली सतह पर पेगुला नीले और सफेद रंग की ड्रेस में कोर्ट पर आईं। कोर्ट की सतह के रंग से एकाकार होती हुईं वे इस बात की घोषणा कर रही थीं कि वे मेजबान हैं और स्वाभाविक है मेजबान हैं तो दर्शक उनके साथ होंगे ही। दूसरी ओर सबालेंका फ्यूशिया पर्पल रंग की ड्रेस में थीं। एक विशिष्ट और जीवंत रंग जो बैंगनी रंग की गहराई और गुलाबी रंग की चमक से मिलकर बनता है। रंग जो बोल्डनेस के लिए जाना जाता है। रंग जो भले ही कोर्ट की सतह से एकाकार ना हुआ जाता हो पर सबालेंका के स्वभाव और उनके खेल से जरूर एकाकार हुआ जाता था।

उनके बाईं बांह पर टाइगर का टैटू खुदा है। वे मैदान में टाइगर की तरह फुर्तीली और शक्तिशाली होती हैं। वे अक्सर खुद को टाइगर बताती भी हैं। वे सेरेना और विलियम्स के बाद सबसे पावरफुल खिलाड़ी हैं जो दो सौ किमी की रफ्तार से सर्विस कर सकती हैं और शक्तिशाली ग्राउंड स्ट्रोक्स लगाती हैं। फ्यूशिया रंग उनके खेल और व्याहार का मानो प्रतीक हो।

दूसरी ओर पेगुला बहुत ही संपन्न परिवार से आती हैं। उनके पिता अमेरिकी बेसबॉल और फुटबॉल लीग की दो टीम के मालिक हैं। सबालेंका और पेगुला दोनों का लक्ष्य एक था। मकसद एक था। लेकिन दोनों की मोटिवेशनल फोर्स और कारक अलग अलग थे। मुकाबला कड़ा होना था।

मुकाबला कड़ा ही हुआ। हालांकि सबालेंका ने पेगुला को 7-5,7-5 से सीधे सेटों में हराकर अपना पहला और कुल तीसरा ग्रैंड स्लैम जीता और पेगुला के पहले ग्रैंड स्लेम खिताब के इंतजार को कुछ और लंबा कर दिया।

ये मैच भले ही दो सेटों में खत्म हुआ हो। लेकिन ये एक संघर्षपूर्ण मैच था। यह मुकाबला एक घंटा 53 मिनट तक चला। पहले ही गेम में पेगुला ने सबालेंका की सर्विस ब्रेक की। लेकिन अगले गेम में पेगुला अपनी सर्विस नहीं बचा पाई। इसके बाद सबालेंका ने 5-2 की बढ़त ले ली। पर पेगुला ने ना केवल स्कोर 5-5 की बराबरी पर किया। इसके बाद सबालेंका ने दोनों गेम जीतकर पहला सेट 7-5 से जीत लिया। दूसरे सेट में भी 3-0 की बढ़त ले ली। यहां पर पेगुला ने फिर वापसी की और 5-4 के स्कोर पर सर्विस कर रही थीं। लगा कि पिछले साल का इतिहास तो नहीं दोहराया जाने वाला है। पिछले साल भी सबालेंका पहला सेट जीत गई थी और उसके बाद दोनों सेट हारकर खिताब गंवा दिया था। लेकिन इस बार सबालेंका मजबूत इरादों के साथ आई थीं। उन्होंने ना केवल अगले दो गेम जीते बल्कि फाइनल भी जीत लिया।

इस प्रकार एक बार फिर यूएस ओपन के महिला एकल में एक नई चैंपियन बनी। विलियम्स बहनों के बाद महिला टेनिस एकदम खुल गया है और कोई भी खिलाड़ी किसी खास दिन जीत सकती है। इस बात का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दस सालों में यूएस ओपन की ये नवीं महिला एकल चैंपियन है। केवल नाओमी ओसाका इसे दो बार 2018 और 2020 में जीत सकी हैं।

फिलहाल यूएस ओपन की नई चैंपियन अरीना सबालेंका को बहुत बधाई।

Tuesday, 15 September 2020

नए के आगमन आहट

 



बात अगस्त 2017 की है। ग्लासगो के एमिरेट्स एरीना में बैडमिंटन विश्व कप का फाइनल भारत की पीवी सिंधु और जापान की नोजोमी ओकुहारा के बीच खेला गया था। इस मैच में नोजोमी ने सिंधु को 21-19,20-22,22-20 से हरा दिया। लेकिन जो भी ये मैच देख रहा था उसे लगा था कि इसमें कोई हारा तो है ही नहीं,निर्णय हुआ ही कहाँ कि कौन श्रेष्ठ तो फिर ये ख़त्म क्यों हो गया,क्यों दो खिलाड़ी हाथ मिलाते हुए मैदान से विदा ले रहे हैं,एक मुस्कुराते चहरे और शहद से मीठे पानी से डबडबाई आँखों के साथ तो दूसरा उदास चहरे और खारे पानी में डूबी आँखें लिए। सच में,कुछ मैचों में कोई हारता नहीं है। ऐसे में या तो दोनों खिलाड़ी जीतते हैं या फिर खेल जीतता है।

बीते रविवार को फ्लशिंग मीडोज़ में बिली जीन किंग टेनिस सेंटर के आर्थर ऐश सेन्टर कोर्ट में यूएस ओपन 2020 के पुरुष एकल के फाइनल में 27 साल के ऑस्ट्रिया के डोमिनिक थियम ने जर्मनी के 23 वर्षीय अलेक्जेंडर ज्वेरेव को 2-6,4-6,6-4,6-3,7-6(8-6)से हरा कर अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीत लिया। चार घंटे चार मिनट की हाड़तोड़ मेहनत के बाद दोनों की ही आंखों में पानी था। फर्क सिर्फ जीत की मिठास और हार के खारेपन का था। और जिसने ग्लासगो के बाद ये मैच देखा होगा उसने यही सोचा होगा ऐसे हार-जीत थोड़े ही ना होती है। और ऐसा दर्शक क्या खुद थियम भी बिल्कुल ऐसा ही सोच रहे थे। मैच पश्चात वक्तव्य में उन्होंने कहा 'काश दो विजेताओं का प्रावधान होता। दोनों ही जीत के हकदार थे।' दरअसल ये शानदार मैच उन लोगों के लिए एक झलक है जो यह बात जानना चाहते हैं कि 'अद्भुत तिकड़ी '(फेडरर,नडाल,जोकोविच) के बाद का विश्व टेनिस का परिदृश्य कैसा होगा।
एक स्पोर्ट्स न्यूज़ पोर्टल ने लिखा 1990 के बाद जन्मे खिलाड़ी द्वारा जीता गया ये पहला ग्रैंड स्लैम है। ये बताता है कि यह कितनी बड़ी बात है। दरअसल 21वीं शताब्दी के पहले दो दशकों का और विशेष रूप से पिछले 15 वर्षों का विश्व टेनिस का पुरुषों का इतिहास केवल तीन खिलाड़ियों-फेडरर,नडाल और जोकोविच के रैकेट से लिखा गया है। इनको विस्थापित करने खिलाड़ी आए और चले गए पर ये तीनों चट्टान की तरह जमे रहे। समय और उम्र से बेपरवाह कालजयी। इस समय फेडरर 39 साल के, राफा 34 साल के और नोवाक 33 साल के हैं। इस यूएस ओपन से पहले के 13 ग्रैंड स्लैम खिताब इन तीनों ने जीते हैं. यानी पिछले तीन साल से इन तीनों के अलावा कोई और ग्रैंड स्लैम नहीं जीत पाया है. यहां उल्लेखनीय ये भी है कि पिछले 67 ग्रैंड स्लैम ख़िताबों में से 56 इन तीनों ने जीते हैं. यह अद्भुत है,अविश्वसनीय है. थिएम,ज्वेरेव,सिटसिपास, मेदवेदेव,रुबलेव और किर्गियोस जैसे युवा खिलाड़ी लगातार हाथ पैर मार रहे हैं,छटपटा रहे हैं, पर इन तीनों से पार नहीं पा पा रहे हैं। यहां उल्लेखनीय यह भी है कि फेडरर ने अपना पहला ग्रैंड स्लैम केवल 22वें साल में,नडाल ने 19वें साल में और जोकोविच ने 21वें साल में जीत लिया था।
इस साल यूएस ओपन में फेडरर ने अपने घुटने के आपरेशन के कारण और नडाल ने कोरोना के चलते सुरक्षा कारणों से भाग नहीं लिया और ये लगभग तय माना जा रहा था कि जोकोविच के लिए यह वॉक ओवर जैसा है जो इसे जीतकर अपने ग्रैंड स्लैम खिताबों की संख्या 18 तक पहुंचा देंगे और ग्रैंड स्लैम की रेस को कड़ा और रोचक कर देंगे। पर नियति को यह मंज़ूर नहीं था। नहीं तो जोकोविच यूं प्रतियोगिता से बाहर ना होते। प्री क्वार्टर फाइनल में वे अनजाने में लाइन जज को गेंद मार बैठे और डिसक्वालिफाई हो गए। अब युवा खिलाड़ियों के लिए प्रतियोगिता पूरी तरह खुल गयी थी। कोई भी बाजी मार सकता था। बाज़ी मारी अलेक्जेंडर ज्वेरेव और डॉमिनिक थियम ने और दोनों फाइनल में पहुंचे।
जोकोविच के प्रतियोगिता से बाहर हो जाने के बाद युवा खिलाड़ियों का संघर्ष अलग स्तर पर पहुंच गया जिसका चरम फाइनल था। इससे पहले थियम तीन ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलकर हार चुके थे,दो बार फ्रेंच ओपन में नडाल से और इस साल ऑस्ट्रेलिया ओपन में एक मैराथन मैच में जोकोविच से। थियम के पास ना केवल तीन ग्रैंड स्लैम फाइनल का अनुभव था बल्कि इस प्रतियोगिता में अब तक उनका शानदार खेल रिकॉर्ड भी था। वे अभी तक खेले गए 6 मैचों में केवल एक सेट हारे थे और उनके खेल में एक निरंतरता और स्थायित्व (consistency)था। दूसरी और ज्वेरेव का यह पहला ग्रैंड स्लैम था। शानदार सर्विस,पावरफुल और नियंत्रित बैकहैंड शॉट और लंबी रैली के लिए जाने जाने वाले 6फ़ीट 6इंच लंबे ज्वेरेव के खेल में खासा अस्थायित्व है। वे पैचेज में बहुत अच्छा खेलते हैं तो बहुत खराब भी। इसे उनके इस प्रतियोगिता में फाइनल तक के सफर को देखकर अच्छी तरह से समझा जा सकता है।
रविवार को अपने पहले ग्रैंड स्लैम फाइनल में अपनी बेहतर सर्विस के बूते ज्वेरेव ने शानदार शुरुआत की। पहला सेट 6-1 से और दूसरा 6-4 से जीत लिया। लगा उनका जितना महज़ औपचारिकता है। पर ऐसा था नहीं। जब स्कोर दूसरे सेट में 5-1 ज्वेरेव के पक्ष में था तब थियम ने वापसी की हालांकि उनकी वापसी देर से हुई और वे दूसरा सेट 4-6 से हार गए। लेकिन वे लय पा चुके थे और अगले दो सेट थियम ने 6-4 और 6-3 से जीत लिए। अब लगा थियम की जीत जाएंगे। पर असली संघर्ष अब होना था। एक बार फिर बढ़त ज्वेरेव ने लेली 5-3 से। और चैंपियनशिप के लिए सर्व कर रहे थे। लेकिन वे दबाव में अपनी सर्विस बरकरार नहीं रख सके। थियम ने सर्विस ब्रेक की और सेट अंततः टाईब्रेक में पहुंचा। दरअसल यहां ज्वेरेव की सर्विस भर ब्रेक नहीं हुई थी उनका सपना भी ब्रेक हुआ था और मंज़िल तक के सफर पर ब्रेक भी लगा था। थियम ने टाईब्रेक 8-6 से जीतकर ना केवल अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीता बल्कि यूएस ओपन को एक नया चैंपियन दिया। यूएस ओपन को 2014 में क्रोशिया के मारिन सिलिच के 6 साल बाद थिएम के रूप में एक नया चैंपियन मिल रहा था।
तो क्या डोमिनिक थियम की इस जीत को टेनिस इतिहास में एक नए युग की शुरुआत मानी जाए, नए युग की दस्तक,उसकी आहट। जाने माने वरिष्ठ खेल पत्रकार मैथ्यू फुटरमैन लिखते है 'टेनिस में कभी कभी ऐसे अप्रत्याशित चैंपियन आते हैं,विशेष रूप से दो युगों के बीच के संक्रमण काल में जब महान खिलाड़ियों के एक समूह का अवसान हो रहा होता है और नए खिलाड़ियों के दूसरे समूह का उदय होना बाकी होता है। ऐसे में जो खिलाड़ी एक बार ग्रैंड स्लैम जीत लेता है वो दोबारा कभी नहीं जीत पाता। 2002 में ऑस्ट्रेलियन ओपन स्वीडन के थॉमस जॉनसन ने जीता था जब आंद्रे अगासी अवसान की ओर थे और फेडरर का आगमन नहीं हुआ था,नडाल के क्ले के बादशाह बनने से एकदम पहले अर्जेंटीना के गस्टोन गौडीओ ने फ्रेंच ओपन जीता था,फेडरर के लगातार 5 बार चैंपियन बनने से एकदम पहले 2001 में गोरान इवनोसेविच और 2002 में लेटिन हेविट ने विंबलडन जीता था और फेडरर द्वारा लगातार 5 बार जीतने से एकदम पहले 2003 में एंडी रोडिक ने यूएस ओपन जीता था। तो यह (थियम की जीत)नए के आगमन का प्रतीक भी हो सकती है और एक असामान्य वर्ष में फेडरर,नडाल व जोकोविच की अनुपस्थिति से उपजा महज एक संयोग भी। ये डोमिनिक थिएम बताएंगे।'
लेकिन निकट भविष्य में कुछ बदलेगा ,ऐसा लगता नहीं। 39 साल की उम्र में भी फेडरर युवाओं की तरह खेल रहे हैं। उनका सन्यास लेने का कोई मन अभी नहीं है। वे भले ही जोकोविच और नडाल को नहीं हरा पा रहे हो पर अभी भी नए खिलाड़ियों के लिए उनसे पार पा पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है और वे किसी भी उदीयमान खिलाड़ी की पार्टी खराब करने का माद्दा रखते हैं। अगले दो ग्रैंड स्लैम हैं इस महीने के अंत में होने वाला फ्रेंच ओपन और जनवरी में ऑस्ट्रेलियन ओपन। इस समय नडाल लाल बजरी के बेताज बादशाह हैं और जोकोविच नीली सतह पर अजेय लगते हैं। ये दोनों प्रतियोगिता बहुत कुछ तय करेंगी टेनिस का आसन्न भविष्य।
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फिलहाल तो इंतज़ार कीजिए और नए चैंपियन को बधाई दीजिए। तो हमारी भी बहुत बधाई डोमिनिक थिएम को।

Tuesday, 10 September 2019

राफा द ग्रेट



रविवार की रात को न्यूयॉर्क के आर्थर ऐश स्टेडियम में  33 साल के राफेल नडाल और उनसे 10 साल छोटे 23 साल के डेनिल मेडवेदेव जब यूएस ओपन के फाइनल में आमने सामने थे तो ये केवल एक फाइनल मैच भर नहीं था बल्कि समय के दो अंतरालों के बीच द्वंद था,बीतते जाते और और आने वाले के बीच रस्साकशी थी, पुराने और नए के बीच संघर्ष था,दरअसल ये अनुभव और युवा जोश के बीच का महासंग्राम था। आने वाले नए के पास पर्याप्त समय होने से उपजी बेपरवाही तो है पर स्वयं को स्थापित करने की आतुरता भी है लेकिन बीतते जाते पुराने में मुट्ठी से समय रेत की तरह फिसलते जाने के अहसास से उपजी अधीरता है। उसमें बीतते समय के साथ चीज़ों को दोनों हाथों से समेटते जाने की लालसा है और वो हर चीज़ को पूरे जोश और जूनून से समेट लेने की  चाहना है,लालसा है। दरअसल  एक खिलाड़ी के जीवन में 30 साल की उम्र एक ऐसी विभाजक रेखा है जहां से उसकी ढलान शुरू हो जाती है। और तब खिलाड़ी के भीतर शीघ्रातिशीघ्र बहुत कुछ सिद्ध करने का एक आग्रह पैदा होता है। कुछ खिलाड़ियों के भीतर का ये आग्रह आग बन जाती है और तब राफेल नडाल और रोजर फेडरर और हां जोकोविच जैसे खिलाड़ी खेल दुनिया को मिलते हैं।

जोकोविच(32साल),राफा(33साल)और फेडरर(38साल) तीनों ने मिलकर इस शताब्दी के 19 सालों में 55 ग्रेंड स्लैम अपने नाम किये हैं और इनमें से 13 खिताब 30 साल की उम्र के बाद। पिछले 12 ग्रैंड स्लैम इन तीनों ने ही जीते। इन 12 फाइनल मुक़ाबलों में केवल चार बार 1990 के बाद जन्मे खिलाड़ी फाइनल में चुनौती देने में सक्षम हुए पर हर बार उन्हें मुँह की खानी पड़ी। दरअसल इन तीनों खिलाड़ियों की प्रतिभा और अनुभव का आभामंडल इतना प्रकाशवान है कि जो भी उनकी तरफ नज़र भरकर देखता है उसकी आंखें इस कदर चुंधिया जाती हैं कि उसे कोई रास्ता ही नहीं सूझता और असफलता के बियावान में भटक जाता है।

तो बात कल के मैच की। ये फाइनल ग्रैंड स्लैम के सबसे शानदार मैचों में एक था। 4 घंटे 52 मिनट चले इस मैच की अवधि ही इस संघर्ष की तीव्रता और गहनता का वक्तव्य है। ये यूएस ओपन के फाइनल का दूसरा दूसरा सबसे लंबा मैच था। मेडवेदेव ने पहले ही गेम में ब्रेक पॉइंट लेकर अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए थे और तीसरे गेम में राफा की सर्विस ब्रेक भी कर दी। लेकिन अगले ही गेम में राफा ने मेडवेदेव की सर्विस ब्रेक कर दी तो लगा कि दर्शकों को कैसा शानदार मैच मिलने जा रहा है। हालांकि जब राफा ने पहले दो सेट जीत लिए तो लगा कि यहां भी कनाडा ओपन की कहानी दोहराई जाने वाली है जहाँ राफा ने फाइनल में मेडवेदेव को 6-3,6-0 से हरा दिया था। मैच समाप्ति के पश्चात इंटरव्यू में मेडवेदेव ने कहा कि कि इस स्टेज (दो सेट से पिछड़ने के बाद)पर आकर वे रनर्स अप स्पीच के बारे में सोचने लगे थे।यानी उस समय उन्हें लग गया था कि अब उनके पास कुछ खोने के लिए कुछ नहीं है और शायद इस निश्चिंतता ने ही उनके खेल को एक उचांई की और ले जाने में मदद की होगी और अगले दो सेट उन्होंने जीतकर बताया कि एक महीने के अंदर सेंट लॉरेंस नदी से लेकर हडसन नदी तक बहुत पानी बह चुका है और अब अब वे वो नहीं रहे जो मांट्रियल में थे।वे बेहतर तैयारी के साथ और हार्डकोर्ट पर 22-2 के इस साल के सबसे सफल खिलाड़ी के रूप में फ्लशिंग मीडोज पहुंचे थे। तभी तो 5वें और अंतिम सेट में 5-2 से पिछड़ने के बाद भी उन्होंने हार नही मानी और 5-4 के स्कोर के बाद 10वें गेम में ब्रेक पॉइंट लेकर स्कोर 5-5 कर ही दिया था कि राफा का अनुभव काम आया और अभी तक एकदम बराबरी को अपने पक्ष में मोड़ दिया। अंततः राफा ने 7-5,6-3,5-7,4-6,6-4 से मैच जीतकर एक इतिहास की निर्मिति की। हां इस मैच ने पुराने को बताया कि नए का आगमन बस कुछ समय का फेर है तो पुराने ने नए से कहा देखा पुराने को खारिज किया जाना कितना कठिन होता है।


जो भी हो 33 वर्ष की उम्र में राफा की 19वीं ग्रैंड स्लैम जीत अविस्मरणीय है जो फेडरर की सर्वाधिक 20 जीतों से एक कम है। जिस तरह से राफा अभी खेल रहे हैं आने वाले समय में वे कई और ग्रैंड स्लैम जीतने वाले हैं,ये तय है। दरअसल उन्होंने अपने खेल में समयानुरूप परिवर्तन किए हैं। समय की शानदार शिड्यूलिंग की है। और चोटों से उबर कर शानदार वापसी की है। 

जो भी हो राफा, फेडरर और जोकोविच ऐसे विशाल वटवृक्ष हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा और अनुभव की छांव से पूरे टेनिस जगत को इस तरह से घेर रखा है कि नवोदित खिलाड़ियों को उनकी छाया से बाहर आने और स्वयं को मजबूत दरख़्त बनाने में  लंबी जद्दोजहद करनी पड़ेगी।

फिलहाल तो राफा को 19वीं जीत मुबारक और ये भी कि जीत की संख्या की ये बाली (टीन)उम्र खत्म होने को है और इस संख्या को युवावस्था में पहुंचाने की अग्रिम शुभकामनाएं कबूल हों।

Friday, 14 September 2018

चैम्पियन नाओमी ओसाका






       पत्रकार-साहित्यकार नीलाभ लिखते हैं कि ‘जैज संगीत एफ़्रो-अमेरिकंस के दुःख-दर्द से उपजा चट्टानी संगीत है’. फ्लशिंग मीडोज़ का बिली जीन किंग टेनिस सेंटर और विशेष रूप से आर्थर ऐश सेन्टर कोर्ट मुझे एक ऐसा स्थान लगता है, जहां ये संगीत नेपथ्य में हर समय बजता रहता है क्योंकि हर बार कोई एक अश्वेत खिलाड़ी मानो उस समुदाय के दुख-दर्द के किसी तार को हौले से छेड़ देता हो और फिर उसकी अनुगूंज बहुत दूर तक और बहुत देर तक सुनाई देती रहती है.

                ये एक ऐसा सेन्टर है जहां खेल के साथ-साथ इस समुदाय के लिए गौरव भरे क्षण उपस्थित होते रहते हैं. याद कीजिए, 2017 का महिला फ़ाइनल. ये दो एफ़्रो-अमेरिकन खिलाड़ियों के बीच मुक़ाबला था. स्लोअने स्टीफेंस ने मेडिसन कीज को 6-3, 6-0 से हराकर अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीता और मैच पूरा होते ही ये दो प्रतिद्वंद्वी लेकिन दोस्त एक-दूसरे को इस तरह से जकड़े थीं मानो अब जुदा ही नहीं होना है और दोनों की आँखों से अश्रुओं की ऐसी अविरल धारा बह रही थी जैसे सावन बरस रहा हो. वह एक अद्भुत दृश्य भर नहीं था बल्कि टेनिस इतिहास की और एफ़्रो-अमेरिकन इतिहास के एक अविस्मरणीय क्षण की निर्मिति भी थी. उस दिन से ठीक साठ बरस पहले 1957 में पहली बार एफ़्रो-अमेरिकन महिला खिलाड़ी एल्थिया गिब्सन द्वारा यूएस ओपन जीतने की 60वीं वर्षगाँठ का पहले एफ़्रो-अमेरिकी पुरुष एकल यूएस ओपन विजेता आर्थर ऐश कोर्ट पर दो एफ़्रो-अमेरिकी खिलाड़ी फ़ाइनल खेल कर जश्न मना रही थीं.

                 अगले साल 2018 के फ़ाइनल में एकदम युवा खिलाड़ी ओसाका नाओमी और उनके सामने उनकी रोल मॉडल टेनिस इतिहास की महानतम खिलाड़ियों में से एक 37 वर्षीया सेरेना विलियम्स थीं. अम्पायर के एक फ़ैसले से नाराज़ होकर सेरेना ने वो मैच अधूरा छोड़ दिया था और अम्पायर पर भेदभाव करने का आरोप लगाया. उनका ये आक्रोश जितना अपनी सन्निकट आती हार से उपजा था, उतना ही अपने साथ हुए भेदभाव को लेकर बनी मनःस्थिति को लेकर भी था. अब टेनिस और खेल जगत में पुरुषों के बरक्स महिलाओं से भेदभाव को लेकर एक बहस शुरू हो गई थी. और टेनिस जगत को एक नई स्टार खिलाड़ी मिली थी जो न केवल उसी समुदाय से थी बल्कि हूबहू अपने आदर्श की तरह खेलती थी. बिल्कुल उसी की तरह का पावरफुल बेस लाइन खेल और सर्विस.

                          2019 में एक बार फिर सेरेना फ़ाइनल में थीं. अपना रिकॉर्ड 24वां ग्रैंड स्लैम जीतकर सर्वकालिक महिला खिलाड़ी बनने की राह पर. पर एक बार वे फिर चूक गईं. इस बार एक दूसरी टीनएजर कनाडा की एंड्रेस्क्यू ने उनका सपना तोड़ दिया. जैज संगीत फिर सुना गया पर कुछ ज़्यादा उदास था. सेरेना के खेल के आसन्न अवसान की ध्वनि से गूंजता ये संगीत कम कारुणिक नहीं था.

                       यूएस ओपन में साल दर साल यही होता आ रहा है. तो 2020 का यूएस ओपन अलग कैसे हो सकता था. कोरोना के साए में बड़े खिलाड़ियों और दर्शकों की अनुपस्थिति में शुरुआत कुछ नीरस-सी थी,पर प्रतियोगिता ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती गयी, रोचक होती गई. इस बार यह प्रतियोगिता वैसे भी माओं के नाम रही. महिला वर्ग में नौ खिलाड़ी ऐसी थीं, जो मां बन चुकी थीं. इनमें से तीन सेरेना, अजारेंका और पिरेन्कोवा क्वार्टर फ़ाइनल तक पहुंची. दो सेरेना और अजारेंका सेमीफ़ाइनल तक पहुंची. यहां 39 वर्षीया सेरेना का 24 वां ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने का सपना अजारेंका ने तोड़ा. और तब एक खिलाड़ी जो माँ थी, फ़ाइनल में पहुंची वो अजारेंका थीं. बेलारूस की अजारेंका अब 31 साल की हो चुकी थी और 2012 में नम्बर वन खिलाड़ी थीं और दो बार ऑस्ट्रेलियाई ओपन के साथ साथ 21 एटीपी ख़िताब जीत चुकी थीं. उनके पास पर्याप्त अनुभव था. वे गुलागोंग, मार्गरेट कोर्ट और किम क्लाइस्टर्स के बाद चौथी ऐसी खिलाड़ी बन एक इतिहास की निर्मिति के बिल्कुल क़रीब थीं, जिसने माँ बनने के बाद ग्रैंड स्लैम जीता हो.

                       दूसरे हॉफ से 2018 की चैंपियन हेतीयन पिता और जापानी माँ की संतान 22 वर्षीया नाओमी उनके सामने थीं. वे अदम्य ऊर्जा और जोश से लबरेज खिलाड़ी थीं. लेकिन उल्लेखनीय यह है कि वे खिलाड़ी भर नहीं हैं बल्कि सोशल एक्टिविस्ट भी हैं. उन्होंने अश्वेत समुदाय के विरुद्ध हिंसा के विरोध में हुए प्रदर्शनों में सक्रिय प्रतिभाग किया और यहां बिली जीन किंग टेनिस सेन्टर में भी वे मैदान में अपने प्रतिद्वंद्वियों से दो-दो हाथ नहीं कर रहीं थी बल्कि अश्वेत समुदाय के विरुद्ध हिंसा का प्रतिरोध भी कर रहीं थीं. इसके लिए हर मैच में हिंसा के शिकार एक अश्वेत का नाम लिखा मास्क पहन कर कोर्ट पर आतीं. फ़ाइनल में उनके मास्क पर 12 वर्षीय अश्वेत बालक तमीर राइस का नाम था, जो 2014 में क्लीवलैंड में एक श्वेत पुलिस अफ़सर के हाथों मारा गया था. उन्होंने सात मैच खेले और हर बार हिंसा के शिकार अश्वेत के नाम का मास्क लगाया. अन्य छह नाम थे – फिलैंडो कास्टिले ,जॉर्ज फ्लॉयड, ट्रेवॉन मार्टिन, अहमोद आरबेरी,एलिजाह मैक्लेन और ब्रेओना टेलर. नाओमी की स्मृति में 2018 का मुक़ाबला भी ज़रूर रहा होगा जब उनके पहले ख़िताब के जश्न और जीत को बीच में अधूरे छूटे मैच ने और दर्शकों की हूटिंग ने अधूरेपन के अहसास को भर दिया था. यहां वे एक मुक़म्मल जीत चाहती होंगी और अपने सामाजिक उद्देश्य के लिए भी जीतना चाहती होंगी. और निःसन्देह इन दोनों का ही उन पर अतिरिक्त दबाव रहा होगा.

                     जो भी हो, इसमें कोई शक नहीं कि मुक़ाबला नए और पुराने के बीच था, द्वंद्व, जोश और अनुभव का था, आमना-सामना युवा शरीर का अनुभवी दिमाग से था, उत्साह का संयम से मुक़ाबला था. मुक़ाबला कड़ा था, टक्कर बराबरी की थी. पर जीत अंततः नए की, जोश की, युवा शरीर की, उत्साह की हुई.

                     जीत नाओमी की हुई. नाओमी ने अजारेंका को 1-6, 6-3,6-3 से हरा दिया. पहले सेट में नाओमी दबाव में दिखी. उन्होंने बहुत सारी बेजा ग़लती की. और पहला सेट 1-6 से गंवा बैठीं. दरअसल अजारेंका ने पहले सेट में शानदार सर्विस की और बढ़िया फोरहैंड स्ट्रोक्स लगाए. उन्होंने पूरा दमख़म लगा दिया. एक युवा शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी के ख़िलाफ़ आपको उस समय तक स्टेमिना और ऊर्जा चाहिए होती है जब तक मैच न जीत जाएं. अपनी सीमित ऊर्जा का मैनेजमेंट चतुराई से करना होता है. यहीं पर अजारेंका चूक गईं. उन्होंने सारी ऊर्जा पहले सेट में लगा दी. नाओमी ने दूसरे सेट में कमबैक किया. अपनी पावरफुल सर्विस और बेसलाइन स्ट्रोक्स से न केवल दूसरा सेट 6-3 से जीत लिया बल्कि तीसरे और निर्णायक सेट में भी 4-1 से बढ़त बना ली. एक बार फिर अजारेंका ने ज़ोर लगाया और अपनी सर्विस जीतकर नाओमी की सर्विस ब्रेक भी की और स्कोर 3-4 कर दिया. लगा मुक़ाबला लंबा खींचेगा. पर ये छोटा-सा पैच दिए की लौ की अन्तिम भभक साबित हुआ. अगले दो गेम जीतकर अपना तीसरा ग्रैंड स्लैम नाओमी ने अपने नाम कर लिया. ये उनका तीसरा ग्रैंड स्लैम फ़ाइनल था और तीनों में जीत.

                       बड़े लोगों की बातें भी न्यारी होती हैं. खिलाड़ी जैसे ही अंतिम अंक जीतता है वो उस धरती का आभार प्रकट करने के लिए भी और उस जीत के पीछे की मेहनत को महसूसने के लिए अक्सर पीठ के बल मैदान पर लेट जाते हैं. नाओमी ने अपना अपना अंतिम अंक जीतकर अजारेंका को सान्त्वना देने के लिए रैकेट से रैकेट टकराया (नया सामान्य हाथ मिलाने या गले लगने की जगह) और उसके बाद आराम से मैदान पर लेट गईं और आसमान निहारने लगीं. उन्होंने मैच के बाद अपने वक्तव्य में में कहा कि ‘मैं देखना चाहती थी बड़े खिलाड़ी आख़िर आसमान में क्या देखते हैं’. ये तो पता नहीं कि उन्होंने क्या समझा होगा कि बड़े खिलाड़ी क्या देखते हैं,पर निश्चित ही उनकी आंखों ने आसमान की अनंत ऊंचाई को महसूस किया होगा और उनके इरादे भी उस ऊंचाई को छूने के लिए कुछ और बुलंद हुए होंगे.

                   हमारे समय के प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी की एक पुस्तक का नाम है – ‘खेल केवल खेल नहीं हैं’ और वे लिखते हैं कि ‘खेल के जरिए आप खेलने वाले के चरित्र, उसके लोगों की ताक़त और कमज़ोरियों को समझ सकते हैं’. तो इस बार नाओमी ने बिली जीन किंग टेनिस सेन्टर में अश्वेतों के दुख-दर्द के जिस तार को छेड़ा, उससे निःसृत संगीत की अनुगूंज अतिरिक्त दूरी और अतिरिक्त समय तय करेगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव का साल भी है.

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नाओमी ओसाका को जीत मुबारक! 

Monday, 10 September 2018

चाँद दाग़दार है तो हुआ करे खूबसूरत तो है



चाँद दाग़दार है तो हुआ करे खूबसूरत तो है
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                        आदि काल से लेकर आज तक चाँद कवियों का सबसे खूबसूरत और पसंदीदा उपमान रहा है। तो क्या ही ताज्जुब कि एक बीस साला खिलाड़ी जो अभी अभी अपनी टीन ऐज से बाहर आई हो,के लिए अपना पहला ग्रैंड स्लैम खिताब चाँद जैसा ना रहा होगा। लेकिन जब कवि चाँद के लिए कहता है 'मगर उसमें भी दाग़ है' तो ये विडम्बना ही है कि उस खूबसूरत उपमान को उस दाग़ के साथ ही स्वीकारना पड़ता है। और स्वीकारें भी क्यों ना उस दाग़ से उसकी खूबसूरती पर क्या फर्क़ पड़ता है। ठीक ऐसे ही जापान की युवा खिलाड़ी ओसाका के लिए उसका पहला ग्रैंड स्लैम खिताब यू एस ओपन हमेशा ही चाँद जैसा रहेगा क्या फ़र्क पड़ता है कि उसके साथ सेरेना-रामोस विवाद दाग़ के रूप में हमेशा जुड़ा रहेगा।
                    आज फ्लशिंग मीडोज स्थित बिली जीन किंग नेशनल टेनिस सेंटर के आर्थर ऐश सेंटर कोर्ट पर महिला टेनिस की महानतम खिलाड़ियों में से एक सेरेना विलियम्स और जापान की युवा खिलाड़ी नाओमी ओसाका जब आमने सामने हुईं तो दो खिलाड़ी ही एक दूसरे से मुख़ातिब नहीं हो रहे थे बल्कि एक विशाल अनुभव से एक युवा जोश मुक़ाबिल हो रहा था। 36 वर्षीया सेरेना का ये 30वां ग्रैंड स्लैम फाइनल था तो उनसे 16 साल छोटी 20 वर्षीया ओसाका अपना पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल रही थीं। जीतता कोई भी एक नया इतिहास बनना तय था। देखना ये था कि सेरेना 24वां ग्रैंड स्लैम जीत कर मारग्रेट कोर्ट की बराबरी करती हैं या फिर ओसाका ग्रैंड स्लैम जीत कर ऐसा करने वाली पहली जापानी खिलाड़ी बनती हैं। यहां जोश ने अनुभव को हरा दिया। इतिहास ओसाका ने रचा। जब वे सेरेना को 6-2 और 6-4 से हरा रहीं थीं तो वे केवल एक मैच भर नहीं जीत रही थीं वे बंद आँखों से देखे अपने सपने को फ्लशिंग मीडोज के मैदान पर साकार कर रहीं थीं,अपनी कल्पनाओं में बनाये चित्र में यथार्थ के रंग भर रहीं थीं,अपने बचपन में पढ़ी किसी परी कथा को मैदान पर जी रही थीं।उन्होंने बताया कि नज़्म हरूफ से सफ़े पर ही नहीं लिखी जाती है बल्कि खेल के बीच मैदान पर भी रची जाती है।

              आज जब उनके सामने सेरेना खड़ी थीं तो वे महज़ एक प्रतिद्वंदी नहीं थीं बल्कि उनका आदर्श भी थीं और उनका सपना भी। जब सेरेना अपना पहला ग्रैंड स्लैम रही थीं तब नोआमी कुछ महीने थीं।सेरेना को देखकर ही उन्होंने टेनिस खेलना शुरू किया और किसी दिन किसी ग्रैंड स्लैम में उनके खिलाफ खेलने के सपने को मन में समाए बड़ी हुईं। वे सेरेना से इस कदर प्रभावित थीं कि उनके ग्राउंड स्ट्रोक्स तक सेरेना की तरह हैं। और क्या ही विडम्बना है अपने आदर्श के हथियार से ही उन्होंने उनको मात दी।

                ओसाका शुरू से ही आत्म विश्वास भरी थीं। उन्होंने ना केवल कुछ महीने पहले मियामी ओपन में सेरेना को हराया था बल्कि इस प्रतियोगिता में ज़बरदस्त फॉर्म में थीं और यहां तक के सफर केवल एक सेट खोया था। दूसरी ओर सेरेना पास ना केवल लंबा अनुभव था बल्कि 14 महीने बाद वापसी करने के पश्चात बैक टू बैक दूसरा मेजर फाइनल था।इससे पहले वे विंबलडन के फाइनल में पहुँच चुकी थी और इस प्रतियोगिता में भी शानदार खेल रही थीं।जिस तरह से उन्होंने सेमी फाइनल में सेवस्तोवा के विरुद्ध नेट पर खेल दिखाया था और 6-3,6-0 जीतीं उससे भी लग रहा था कि वे अपनी पुरानी रंगत में लौट आई हैं।लेकिन आज ओकासा का दिन था।उन्होंने शुरू से ही खेल पर नियंत्रण रखा।उन्होंने शानदार सर्विस की और बेसलाइन से खेल पर नियंत्रण रखते हुए ज़बरदस्त फोरहैंड पासिंग शॉट्स लगाए।दूसरी ओर सेरेना ने बेज़ा गलतियां की और हर सर्विस गेम में डबल फाल्ट किए।पहले सेट में ओकासा ने दो बार सर्विस ब्रेक की और सेट आसानी से 6-2 से जीत लिया।लेकिन दूसरे सेट में सेरेना ने वापसी की और 3-1 की बढ़त ले ली।ऐन इसी समय वो हुआ जो नहीं होना चाहिए था।अंपायर रामोस ने खेल संहिता के उल्लंघन के लिए पहली चेतावनी दी कि बॉक्स से उनके कोच उन्हें इशारा कर उन्हें सहायता पहुंचा रहे हैं ।इस से सेरेना भड़क गयी और इस बात से इंकार किया।अगले ही गेम में एक अंक पर हताशा में रैकेट पटका तो रामोस ने खेल संहिता के दूसरे उल्लंघन के लिए ओकासा को एक अंक दे दिया।इस पर सेरेना और ज़्यादा भड़की और ना केवल रामोस को चोर कहा बल्कि माफी मांगने को कहा।इस पर तीसरे उल्लंघन के लिए एक गेम ओकासा को दे दिया।अब स्कोर 5-3 ओकासा के पक्ष में हो गया ।ओकासा ने धैर्य बनाये रखा और आखिरी गेम जीत कर फाइनल अपने नाम किया।ये क्या ही विरोधाभास था कि एक अनुभवी और सीनियर खिलाड़ी जिससे और अधिक संयम और समझदारी की उम्मीद थी उसने अधिक उग्र रूप दिखाया इसके विपरीत ओकासा ने ग़ज़ब की परिपक्वता और संयम का परिचय दिया।उनपर ना तो सेरेना के विशाल व्यक्तित्व का असर पड़ा और न इस असाधारण घटनाक्रम का। उसने खेल पर अपना फोकस रखा और इतिहास निर्मिति का सबब बनीं।

                              दरअसल इस घटनाक्रम ने अगर सबसे बड़ा नुक्सान किया तो खेल का किया।अगर ये ना हुआ होता तो हो सकता है एक शानदार मैच देखने को मिलता।पर ऐसा हो ना सका।पर जो हो यू एस ओपन को एक नई चैंपियन मिली और जापान को नयी खेल आइकॉन।
                             बहुत बधाई ओसाका!
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[सेरेना पर कुछ अलग से ।और हाँ डेल पोत्रो और जोकोविच के बीच होने वाले पुरुष फाइनल मैच पर कुछ नहीं क्योंकि अपना एक फेवरिट पहले ही हार चुका है और दूसरा फेवरिट रिटायर हर्ट । अस्तु ।]

नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...