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Monday, 26 January 2026

शाइनिंग साइना




हर उड़ान की एक मंजिल होती है। कि एक चमकीला दिन शाम में घुल जाता है। कि पूनम का चांद सूरज की आगवानी में स्वाहा होता जाता है। कि रात के जगमग सितारे सुबह के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। कि जैसे अभी जो बसंत है उसे ग्रीष्म में पिघल जाना है। कि प्रसिद्धि के आकाश में अनंत ऊंचाइयों वाली एक उड़ान अंततः पूर्ण विराम की अवस्था में आ जाती है। कि एक समय आता है जब खिलाड़ी को अंततः खेलों को अलविदा कहना ही होता है। कि उसके खेल जीवन की यवनिका का पटाक्षेप होना होता है और उसका खेल जीवन दैनंदिन जीवन में समाहित हो जाता है। जैसे कि साइना नेहवाल स्वीकारती हैं कि हां,उनके असाधारण उपलब्धियों वाले लंबे करियर का समापन हो चुका है। अभी नहीं,दो साल पहले ही।

वो साल 1990 का बसंत था। तारीख 17 मार्च । हिसार में एक लड़की जन्मती है। बसंत में जन्मी लड़की खुद बसंत हो जाना चाहती है। लेकिन दिक्कत ये है कि पितृसत्ता अपने हिस्से से अधिक पर काबिज हुआ चाहती है। उसे लड़कियों के एक हिस्से को भी अपनी शक्ति के साए में रखना है। कि उन लड़कियों की चाहतों के पंख को उनकी परवाज से पहले ही काट दिया जाता है। कि उनको जन्मने से बहुत बहुत पहले ही होम कर दिया जाता हैं।

पर हर क्रिया की समान प्रतिक्रिया होती है। दबाव जितना ज्यादा होता है उतना ही ज्यादा प्रतिरोध होता है। दुनिया की खूबसूरती ही इस बात में है कि हर एक समान नहीं है। बहुत से माता-पिता पितृसत्ता के साए में मुक्त हैं। उन्हें अपनी छोरियों और उनकी काबिलियत में तनिक संदेह नहीं होता। वे मानते हैं 'कि म्हारी छोरियां छोरों सुं कम हं के।' फिर उन्हें योग्य गुरुओं का वरदहस्त प्राप्त होता है जो उनकी योग्यता को पहचानकर उसे तराशते है। तब कई दैदीप्यमान नक्षत्रों का उदय होता है। उनमें से एक का नाम साइना नेहवाल है।

साइना अपने माता पिता की दूसरी संतान थी। उनकी एक बड़ी बहन थी। अपनी आत्मकथा में साइना लिखती हैं कि 'उनकी दादी लड़का चाहती थीं। इसीलिए जब साइना पैदा हुई, तो वे एक माह तक उन को देखने नहीं आईं।' उनके पिता हिसार में कृषि वैज्ञानिक थे। अपने पिता की पदोन्नति पर जब साइना परिवार के साथ हैदराबाद आईं,तो पितृसत्ता के प्रतिकार के लिए और खुद को साबित करने के लिए खेल चुना, जैसा कि हरियाणा की तमाम लड़कियां चुनती हैं। खेलों में उनके सामने दो विकल्प थे। या तो वे बॉक्सिंग,कुश्ती या निशानेबाजी जैसे उन खेलों खेलों में महारत हासिल करें जो सामान्यतः पुरुषों के 'हलके' माने जाते हैं या फिर पावर के इस खेल से इतर अपनी खुद की इच्छा के दूसरे खेलों के आकाश में अपने पंखों को हौसलों की उड़ान दें। 

पहले उन्होंने मार्शल आर्ट कराटे को चुना और ब्राउन बेल्ट हासिल की। लेकिन जल्द ही उस खेल को चुन लिया जिसमें उनके माता-पिता ने महारत हासिल की हुई थी। वो खेल जो उनकी नियति था। वो खेल जो बल्ले और चिड़िया का खेल था। वो खेल जिसमें चिड़िया को मन मुताबिक उड़ान दी जा सकती थी। वो खेल जो उसके सपनों की उड़ान का रूपक था। ये खेल बैडमिंटन था।


जिस समय उन्होंने बैडमिटन खेल को चुना या नियति ने इस खेल के लिए उनको चुना,उस समय उनकी उम्र आठ साल थी। और जब एक बार उन्होंने हाथ में रैकेट पकड़ा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा जब तक कि उसने प्रतिस्पर्धात्मक खेल से विदा लेकर रैकेट को रख नहीं दिया।

वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस समय जानी गईं जब साल 2008 में वे विश्व जूनियर चैंपियन बनीं। उसी साल बीजिंग ओलंपिक में बैडमिंटन के महिला एकल के क्वार्टर फाइनल में पहुंची। ऐसा करने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं। अगले ही वर्ष उन्होंने इंडोनेशिया ओपन जीतकर बीडब्ल्यूएफ सुपर सीरीज का खिताब जीतकर पहली भारतीय बनने का गौरव हासिल किया और एक साल बाद साल 2010 में वे राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन बनीं। लंदन ओलंपिक 2012 में कांस्य पदक जीतकर वे बैडमिंटन में भारत की पहली ओलंपिक पदक विजेता बनीं। साल 2015 में उन्होंने एकल बैडमिंटन रैंकिंग में विश्व नंबर 1 बनकर एक और इतिहास रचा। ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला और प्रकाश पादुकोण के बाद शिखर पर पहुंचने वाली देश की दूसरी शटलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। उसी वर्ष  बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाली देश की पहली शटलर भी बनीं। हालांकि कैरोलिना मारिन से हार कर रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा। साल 2014 उबेर कप में उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी की और अपराजित रहीं जिससे भारत को उबेर कप में पहला कांस्य पदक जीतने में मदद मिली। उन्होंने कुल मिलाकर 24 अंतर्राष्ट्रीय खिताब जीते जिसमें 10 सुपर  सीरीज खिताब हैं। 

साइना का कोर्ट कवरेज कमाल का था। वे जिस सहजता और सरलता से और ज्यामितीय गुणा भाग से शटल का अनुसरण करतीं और कोर्ट को नापतीं, वो किसी लयकारी को देखने या फिर किसी धुन को सुनने से कम ना था। वे बैक कोर्ट की उस्ताद खिलाड़ी थीं और रक्षण उनका फोर्टे। पावर और स्टेमिना उनमें अपार था और किलिंग इंस्टिक्ट कूट कूटकर भरी। जोखिम उठाना उन्होंने सीखा था। वे खेल के शुरुआती क्षणों से ही आक्रमण कर विपक्षी को हतप्रभ कर देतीं और उन पर बढ़त बना लेतीं। उनमें विपक्षी के खेल को समझकर रणनीति बनाने की कमाल की चतुराई थी। हां, नेट पर खेल में पकड़ ना होना उनके खेल को वल्नरेबल बनाता और उनकी चोटें उनकी सफलता की सबसे बड़ी बाधा बनतीं।

लेकिन उनकी असाधारण उपलब्धियां उन्हें भारत की महानतम बैडमिंटन खिलाड़ी बनाती हैं। आप कह सकते हैं कि पीवी सिंधु उनसे बड़ी खिलाड़ी हैं, क्योंकि उनकी उपलब्धियां साइना से कहीं ज्यादा हैं। उन्होंने दो ओलंपिक पदक जीते और विश्व चैंपियनशिप भी। लेकिन किसी खिलाड़ी का इतिहास में स्थान निर्धारण केवल उसकी उपलब्धियों भर से नहीं होता,बल्कि इस बात से भी होता है कि किसने खेल को और आने वाली पीढ़ी को किस तरह और कितना प्रभावित किया। उनका खेल पर इंपैक्ट कैसा और कितना था। साइना का प्रभाव उनके आंकड़ों और पदकों से कहीं अधिक व्यापक है। वह लाखों लोगों के लिए आदर्श और प्रेरणास्रोत बन गईं। 

जिस समय साइना खेल परिदृश्य पर उभरीं,उस समय पुरुषों में तो प्रकाश पादुकोण,सैयद मोदी और पुलेला गोपीचंद जैसे बड़े नाम थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियां हासिल की थीं।लेकिन महिलाओं में ऐसा कोई नाम ना था। अमी घिया या अमिता कुलकर्णी जैसे दो एक नाम थे जो लोकल सर्किट में तो बड़ा नाम थे,लेकिन उनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी पहचान ना थीं। ये वो समय था जब विश्व बैडमिंटन पर चीन का दबदबा था। चीन की दीवार खिलाड़ियों के लिए अभेद्य थी। साइना ने अपने असाधारण खेल से चीन इस अभेद्य दीवार को लांघा ही नहीं उसे ध्वस्त किया। साइना ने चीनी खिलाड़ियों की जमात के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वे बड़ी सफलताएं प्राप्त की,जो किसी भी खिलाड़ी का सपना हो सकती थीं,और उस समय तक भारतीय महिला खिलाड़ियों से लगभग असंभव दूरी पर अवस्थित थी। साइना का महत्व इस दूरी को मिटाकर असंभव को संभव बनाने में है।

दरअसल उन्होंने अपने खेल और उपलब्धियों से एक ऐसा रास्ता बनाया जिस पर चलकर आगे के खिलाड़ियों ने सफलता प्राप्त की। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने की उम्मीद की लौ भी जगाई और ये हिम्मत,हौसला और विश्वास भी भरा कि चीन की दीवार या कोई भी बाधा पार की जा सकती है,अगर आपने हौसला,जज्बा,लगन और कठिन परिश्रम करने का माद्दा है तो।

उनकी करीब करीब हर उपलब्धि से पहले लगा 'पहली'  विशेषण या फिर 'पहली भारतीय खिलाड़ी' और 'पहली भारतीय महिला खिलाड़ी' संज्ञा  बैडमिंटन खेल और भारतीय खेल परिदृश्य पर उनके इंपैक्ट की कुंजी है। वे एकमात्र भारतीय हैं जिन्होंने बीडब्ल्यूएफ के प्रत्येक प्रमुख व्यक्तिगत स्पर्धा में कम से कम एक पदक जीता है, यानी बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप,बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक पदक@। वह ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय हैं और बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय हैं। 2006 में नेहवाल फोर स्टार टूर्नामेंट जीतने वाली पहली भारतीय महिला और सबसे कम उम्र की एशियाई खिलाड़ी बनीं। वह सुपर सीरीज खिताब जीतने वाली पहली भारतीय भी हैं। वे राष्ट्रमंडल खेलों में दो एकल स्वर्ण पदक (2010 और 2018) जीतने वाली पहली भारतीय भी बनीं । 

भारतीय क्रिकेट टीम ने कई विश्व प्रतियोगिताएं और वर्ल्ड कप जीते हैं, लेकिन जो प्रभाव और महत्व 1983 के विश्व कप जीतने का है, वैसा किसी और का नहीं। यही बात साइना के साथ है। साइना जैसा महत्व और इंपैक्ट किसी और का कहां। 

2012 के लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर और खेल जगत से परे जाकर सुपर स्टारडम हासिल करके भारत में बैडमिंटन को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने साबित किया कि भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय खेलों के उच्चतम स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं और जीत हासिल कर सकती हैं। उनकी सफलता ने पीवी सिंधु सहित भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों की एक पूरी पीढ़ी को पेशेवर रूप से इस खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

दरअसल वे पी टी उषा के बाद भारतीय खेल जगत की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली आईकन हैं। जिस तरह से 1984 के बाद पीटी उषा हर घर का जाना पहचाना नाम बन गई थी,ठीक उसी तरह से 2012 के बाद साइना नेहवाल भी। उन्होंने साबित किया कि 'छोरी छोरी स कम ना सै'।

साइना के खेल खेल मैदान से सक्रिय अनुपस्थिति भारतीय  बैडमिंटन में एक ऐसा निर्वात बनाती है जिसकी भरपाई अगर असंभव नहीं तो बहुत बहुत कठिन जरूर है। 

खेल मैदान से विदा साइना।

Wednesday, 18 May 2022

'पहली जीत' की त्रयी



ऐसा कई बार होता है कि कोई खास क्षण, कोई दिन या फिर समय का कोई खास काल खंड खास आप के लिए बना होता है। आज का तो हर क्षण, आज का पूरा दिन और 09 से 15 मई,2022 का काल खंड केवल और केवल भारतीय पुरुष बैडमिंटन टीम के लिए ही बना था। एक ऐसा क्षण,एक ऐसा दिन और एक ऐसा काल खंड जिसने भारतीय खेल पटल पर एक नए इतिहास को


लिख देना था। नहीं तो 09 मई से पहले किसने सोचा था कि टीम इंडिया 'टीम चैंपियन' बनने जा रही है।

थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक के उपनगर नॉनताबूरी के इम्पैक्ट अरीना में थॉमस कप में आज पहली बार फाइनल खेल रहा भारत, 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया पर 2-0 की बढ़त बना चुका था। अब तीसरे मैच में भारत के. श्रीकांत इंडोनेशिया के जोनाथन क्रिस्टी के विरुद्ध दूसरे गेम में 22-21 के स्कोर पर चैंपियनशिप के लिए सर्विस कर रहे थे। उन्होंने सर्विस की। एक छोटी रैली हुई। क्रिस्टी के एक डीप हाई रिटर्न पर श्रीकांत ने ऊंची छलांग लगाई और शानदार क्रॉस कोर्ट स्मैश लगाया। इस स्मैश का क्रिस्टी के पास कोई जवाब नहीं था। दरअसल श्रीकांत का ये  स्मैश ना केवल बैडमिंटन की चैंपियन टीम का मानमर्दन कर रहा था बल्कि पूर्व विजेता इंडोनेशिया पर  3-0 की जीत दिला कर भारत को नया चैंपियन भी बना रहा था। श्रीकांत की ये छलांग सही मायने में भारतीय टीम की बैडमिंटन के आसमां पर शोहरत की नई उड़ान थी जिससे भारत के बैडमिंटन को नई बलन्दी पर पहुंच जाना है।

जैसे ही किदाम्बी श्रीकांत ने विजयी स्मैश लगाया,सबसे पहले दौड़कर लक्ष्य सेन कोर्ट पर आए और किदाम्बी से लिपट गए। उसके पूरी टीम कोर्ट पर थी। वे जीत का जश्न मना रहे थे। तिरंगा लहरा रहे थे। भारत की जीत और खुशियों के रंग से पूरा इम्पैक्ट अरीना सराबोर था। 

इस बार भारत की टीम सफेद और काले रंग की पोशाक में खेल रही थी। मानो वे इस बार ये निश्चय करके आएं हो कि या तो चैंपियन बनना है या तो हार जाना है। कोई आधी अधूरी जीत नहीं। श्वेत या स्याह। बीच का कोई ग्रे शेड नहीं। खिलाड़ियों के जोश,जज़्बे और हुनर से उनके हिस्से सुफेद रंग आया जिसमें जीत के चमकीले रंग भर जाने थे,तिरंगे के रंग बिखर जाने थे।

ऐसा नहीं है कि भारतीय बॅडमिंटन का ये कोई पहला स्वर्णिम क्षण था। प्रकाश पादुकोण, सैय्यद मोदी,पुलेला गोपीचंद,साइना नेहवाल,पीवी सिंधु और के. श्रीकांत ने विश्व पटल पर भारत को स्वर्णिम उपलब्धियां दिलाईं हैं। भारत को एक पहचान दी। लेकिन ये सब खिलाड़ियों की वैयक्तिक उपलब्धियां थी। एक टीम के रूप में भारत कहां ठहरता था। ये पहली बार है टीम में इतनी गहराई है कि भारत के नंबर एक खिलाड़ी लक्ष्य सेन के क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल मैच हारने के बाद भी टीम पहली बार फाइनल में पहुंचती है और जीत हासिल करती है।

आज फाइनल में पहला मैच लक्ष्य सेन और एंथोनी जिनटिंग के बीच था। पहला गेम वे 08- 21 से हार गए। लगा सेन अपने पहले दो मैच का परफॉर्मेंस दोहराने वाले हैं। लेकिन बड़ा खिलाड़ी वही होता जो ऐन बड़े मौके पर परफॉर्म करता है। आज लक्ष्य ने ऐसा ही किया। उन्होंने अगले दो गेम 21-17 और 21-16 से जीतकर भारत को 1-0 की बढ़त दिला दी। ये मैच 65 मिनट चला। अगला युगल मैच  भारतीय नंबर एक जोड़ी चिराग शेट्टी और सात्विकसाइराज रैंकिरेड्डी का इंडोनेशियाई जोड़ी अहसान और सुकोमुलजो से था। भारतीय जोड़ी इस समय ज़रबर्दस्त फॉर्म में थी और इस बार भी उसने निराश नहीं किया। 70 मिनट चले संघर्षपूर्ण मैच मैच में भारतीय जोड़ी ने 18-21, 23-21 और 21-19 से जीत हासिल कर भारत को 2-0 की बढ़त दिला दी। अब भारत का खिताब लगभग तय हो गया था। क्योंकि अगला मैच किदाम्बी श्रीकांत का था  जो इस समय शानदार फॉर्म में थे और अभी तक अजेय थे। उन्होंने केवल 48 मिनट में जोनाथन क्रिस्टी को 21-15 और 23-21 से सीधे सेटों में हराकर भारत को अविस्मरणीय जीत दिला दी।

भारत की इस जीत में एक नाम और लिया जाना बाकी है जिनकी फिनाले में ज़रूरत ही नहीं पड़ी। और वो नाम है एच एस प्रनॉय का। सेमीफाइनल में भारत ने डेनमार्क को 3-2 से हराया था। पहला मैच लक्ष्य सेन हार गए। इसके बाद चिराग और सात्विक की जोड़ी और किदाम्बी ने अपने मैच जीतकर भारत को 2-1 की बढ़त दिला दी। लेकिन भारत की दूसरी युगल जोड़ी कृष्णा प्रसाद और विष्णुवर्धनमैच हार गए। अब निर्णायक मैच में सारा दारोमदार प्रनॉय पर था। प्रनॉय ने रासमस गेमके को 13 -21,21-9,21-12 से हराकर फाइनल में पहुंचाया। ठीक यही परफॉर्मेंस प्रनॉय ने क्वार्टर फाइनल में दी थी। लक्ष्य और  प्रसाद कृष्णा की जोड़ी अपने मैच हार गए। जबकि किदाम्बी और चिराग सात्विक की जोड़ी ने अपने मैच जीते थे। 2-2 की बराबरी पर प्रनॉय ने निर्णायक मैच लोंग जुन हाओ को 21-13 और 21-08 से हराकर भारत को सेमीफाइनल में पहुंचाया।

इस प्रतियोगिता में भारत को चीनी ताइपे ,जर्मनी और कनाडा के साथ ग्रुप सी में रखा गया था। ग्रुप स्टेज में भारत ने कनाड़ा और जर्मनी को 5-0 से हराया, जबकि चीनी ताइपे से करीबी मुकाबले में 2-3  से हार गया। इस प्रकार भारत ने अपने ग्रुप में दूसरे स्थान पर रहकर क्वार्टर फाइनल के लिए क्वालीफाई किया।

यदि भारतीय खेलों में टीम गेम की बात की जाए तो हॉकी में ओलंपिक में स्वर्णिम जीत के अलावा उसके खाते में केवल दो अविस्मरणीय जीत हैं। एक,1975 में कुआलालंपुर में फाइनल में एक बेहद संघर्षपूर्ण मैच में पाकिस्तान को 3-2 से हराकर पहली बार हॉकी विश्व कप जीतना। दो, 1983 में लॉर्डस, इंग्लैंड में दो बार की विश्व चैंपियन लगभग अजेय टीम वेस्टइंडीज को 43 रन से हराकर पहली बार क्रिकेट विश्व कप जीतना। अब बॅडमिंटन टीम ने पहली बार थॉमस कप जीतकर 'पहली जीत' की त्रयी की निर्मिति की है।

यदि हॉकी और क्रिकेट में पहली  विश्व कप जीत की बात करें तो जीत के प्रभाव की दृष्टि से ये दोनों जीत भारतीय खेलों के लिए एकदम विपरीत प्रभाव वाली परिघटनाएं सिद्ध हुईं। हॉकी की ये जीत अभी हाल के हॉकी के पुनरुत्थान से पहले की आखरी बड़ी जीत साबित हुई। इस जीत के बाद का भारतीय हॉकी का सफर गर्त में जाने का सफर था। जो  2008 में ओलंपिक में क्वालीफाई ना कर सकने पर पूर्ण हुआ। दूसरी तरफ  क्रिकेट में जीत  भारतीय क्रिकेट की प्रगति और लोकप्रियता के शिखर पर जाने की कहानी है।

तो बैडमिंटन में इस पहली जीत का भारतीय बैडमिंटन में क्या प्रभाव होगा ये देखा जाना रोचक और ज़रूरी होगा। ये इसलिए भी ज़रूरी है कि प्रभाष जोशी के शब्दों में कहें तो 'खेल केवल खेल नहीं होते।' भारत के बैडमिंटन में बढ़ते प्रभाव को अन्य महारथी खेल शक्तियां इसे किस रूप में लेती हैं और आगे खेल नियमों में किस तरह के बदलाव होंगे और भारत किस तरह से इस पर प्रतिक्रिया करेगा,ये सबसे महत्वपूर्ण होगा। हॉकी की तरह या क्रिकेट की तरह।

खैर इस प्रश्न को भविष्य पर छोड़ देना बेहतर। फिलहाल ये जीत सेलिब्रेट करने का समय है। ये जो पहली जीत की खुश्बू है ,उसका रोमांच है ,उसका रोमान है,उसका नशा है बिल्कुल पहले प्यार का सा होता है।

०००००

तो भारतीय बैडमिंटन टीम को ये पहली जीत,ये रोमांच,ये रोमान और ये नशा बहुत बहुत मुबारक।

Sunday, 5 July 2020

गाथा बैडमिंटन के 'सुपर डान' की



एक ऐसे समय में जब अपने पड़ोसी मुल्क के विरुद्ध भावनाएं बहुत तीव्र और विरोधी हों तो उससे संबंधित  किसी के बारे में भी लिखने के अपने खतरे हैं। लेकिन जब आप प्रेम में होते हैं,वो भी खेल के प्रेम में,तो उसके खिलाड़ियों के प्रेम में भी आप होते हैं और उनके लिए ऐसे खतरे उठाए जा सकते हैं।

तो आज बात बैडमिंटन के 'सुपर डान' लिन डान के बारे में।

लिन डान खेल के बाहर जिन चीजों के लिए जाने गए उनमें एक है उनके शरीर पर गुदे टैटू। 2012 के ओलंपिक के दौरान उनके शरीर के अलग अलग भागों पर 5 टैटू दीख रहे थे। उनके दाएं हाथ के ऊपरी भाग पर एक टैटू था 'until the end of world' यानि 'दुनिया के खत्म होने तक'। बाद में उसी वर्ष इसी नाम से उनकी आत्मकथा आई। शायद उन्हें ये पदबंध बहुत प्रिय था और वे ये अच्छी तरह समझते थे कि इस जीवन में स्थायी कुछ भी नहीं होता। यहां हर चीज़ नश्वर है जिसे अनिवार्यतः समाप्त होना है। फिर वो चाहे जीवन हो या खिलाड़ी का खेल जीवन हो। और ये भी कि इसके अंत तक इसे भरपूर जियो,शिद्दत से जियो और कुछ ऐसा करो जो इस जीवन के पार पहुंचे,इस नश्वरता से परे की चीज हो,जो जीवन के खत्म होने पर भी बची रह जाए। 

तो उनका खेल जीवन भी खत्म होना था। चार जुलाई को उन्होंने खेल को अलविदा कह दिया। इस घोषणा के साथ ही 2000 से 2020 तक का 20 वर्ष का अंतरराष्ट्रीय कॅरियर अपने अंजाम को प्राप्त हुआ। पिछले कुछ दिनों से अपनी बढ़ती उम्र और चोटों के चलते वे खेल के ढलान पर थे। हांलाकि वे 2020 में होने वाले टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे। पर कोरोना के संकट चलते जब ये खेल एक साल के लिए टल गए तो उन्होंने खेल से सन्यास लेने का फैसला किया। इसका सीधा सा अर्थ है कि बैडमिंटन का जादूगर अब कभी भी बैडमिंटन के मंच पर नहीं दिखाई देगा। अब ना तो उसका जादू सरीखा खेल मैदान में देखा जा सकेगा और ना ही उसके द्वारा रैकेट और शटल कॉक से निर्मित संगीत कोर्ट के कंसर्ट में सुना जा सकेगा। पर इन 20 वर्षों को उन्होंने भरपूर जिया और उत्कृष्टता के नए पैमाने और निशान स्थापित किए। ये निशान खेल के शरीर पर समय के पार जाकर हमेशा के लिए चस्पां हो गए हैं जिसे आने वाली पीढ़ी हमेशा देखती रहेगी। इस दौरान उन्होंने इस खेल के संगीत के ऐसे उत्कृष्ट पैमाने बनाए जिनसे निसृत संगीत की गूंज आने वाली पीढ़ियों के कानों में गूंजती रहेंगी।

14 अक्टूबर 1983 में चीन के लोगियान,फुजियान में जन्मे लिन के माता-पिता चाहते थे कि वे  पियानो बजाना सीखे और संगीत में प्रशिक्षित हों। लेकिन लिन ने हाथ में पियानो के बजाय  बैडमिंटन का रैकेट थामा क्योंकि इस बालक को आगे चलकर पियानो के की-बोर्ड पर सात सुरों को साधने के बजाए स्मैशेज,प्लेसिंग, क्रोसकोर्ट,फोरहैंड, बैकहैंड जैसे  शॉट्स के सुरों को अपनी पावर और स्टेमिना की साधना से  रैकेट और शटलकॉक के वाद्ययंत्रों से जीत के कालजयी संगीत की रचना जो करनी थी। और निसन्देह उन्होंने जीत की जो बंदिशें रची उस तरह की बंदिशें रचना किसी और के लिए शायद ही संभव हो। उन्होंने 2008 और 02012 में दो ओलंपिक गोल्ड,2005 और 2006 के विश्व कप में गोल्ड, 2006,2007,2009,2011,2013 की विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड सहित कुल 66 एकल खिताब जीते। उन्होंने अपने खेल कॅरियर में कुल 666 जीत हासिल की। वे खेल इतिहास के पहले और एकमात्र खिलाड़ी हैं जिन्होंने विश्व की सभी 9 बड़ी प्रतियोगिताएं- ओलंपिक,विश्व कप,विश्व चैंपियनशिप, थॉमस कप,सुदीरमन कप,एशियन गेम्स और एशियन चैंपियनशिप,सुपर सीरीज फाइनल्स और आल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीतकर 28 वर्ष की उम्र में ही सुपर ग्रैंड स्लैम पूरा किया। इतना ही नहीं खेल के वे एकमात्र खिलाड़ी हैं जिन्होंने बैक टू बैक दो ओलंपिक गोल्ड जीते।

व्यक्ति स्वभावतः अतीतजीवी होता है। वो हमेशा अतीत की ओर ताकता है। उसका सर्वश्रेष्ठ अतीत में हो चुका होता है। अतीत की स्मृतियां उसके मानस पटल पर इतनी गहरी खुदी होती हैं जो भविष्य की किसी भी चकाचौंध से धुँधली नहीं होतीं। रूड़ी हार्तोनो का खेल जीवन 1979 के आसपास समाप्त होता है और लिएम स्वि किंग का 1986 के आसपास। ये बैडमिंटन के सार्वकालिक महानतम खिलाड़ियों में से हैं। इनके खेल के जादू की स्मृतियां मन में बहुत गाढ़ी थीं जो बचपन से युवावस्था के दौरान अपना आकार गढ़ रही थीं। इन दो महान खिलाड़ियों ने स्मृतियों का इतना बड़ा स्पेस घेर लिया था कि किसी और के लिए जगह नहीं बचती थी। इस खेल में उनके बाद कोई ऐसा जादूगर नहीं हुआ जो इसको रिप्लेस कर सके। लेकिन अजूबे होते हैं। आपका बेस्ट आपके अतीत के बजाय आपके वर्तमान में हो जाता है। लिन डान जो आता है। 2004 से 2012 का समय ऐसा है जब लिन अपने सर्वोच्च पर होते हैं। उसके खेल का सम्मोहन आपकी सारी स्मृतियों को ओवरपॉवर कर लेता है। आपकी स्मृतियों की इबारत को धुंधला कर देता है। रूडी हार्तोनो और लिएम स्वि किंग जैसे खेल के मिथक सरीखे पात्रों के स्पेस को सिकोड़ कर अगर कोई छोटा कर दे और अपने लिए एक बड़ा स्पेस बना ले तो आप समझ सकते हैं कि खिलाड़ी कितना बड़ा और शानदार है। लिन डान ऐसे ही खिलाड़ी हैं।

वे लेफ्टी थे। लेफ्टी के खेल में एक एलिगेंस होता है जो उसके खेल को बेहद दर्शनीय बना देता है। उस एलिगेंस के कारण उस खिलाड़ी को खेलते देखना एक ट्रीट होता है। वो एलिगेंस पावर की रुक्षता को एक लय प्रदान करती है। उसमें एक संगीत बहता सा प्रतीत होता है। आप उसके खेल के साथ बहे चले जाते हैं जैसे किसी नदी में उसके बहाव के साथ कोई तैराक। लिन के साथ भी ऐसा ही था। 

एक खिलाड़ी के रूप में पावर और स्टेमिना उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। और लेफ्टी की एलिगेंस उनके खेल की एक लय बनाती थी। वे बेहद आक्रामक खिलाड़ी थे जो विपक्षी को अपने ताबड़तोड़ स्मैशेज से हतप्रभ कर देते थे। लेकिन उनके खेल की ये विशेषता भी थी और ताकत भी कि वे खेल को नियंत्रित करना जानते थे। वे आक्रामक खेल कर लगातार कई अंक अर्जित कर लेते और उसके बाद अचानक खेल के पेस को धीमा कर देते। उनका फुटवर्क और कोर्ट में मूवमेंट गजब का था। वे किसी भी स्थान से शटल को रिटर्न करने के बाद बहुत ही तीव्र गति से अपनी बेसिक पोजिशन पर लौट आते और विपक्षी के रिटर्न को फिर से आसानी से खेलने की पोजिशन में होते। खेल में जीत के लिए आपका नेट का खेल बहुत अच्छा होना चाहिए। वे नेट पर भी कमाल खेलते थे। वे नेट पर तेजी से आते और बहुत जल्द ही शटल को टैप कर अंक हासिल कर लेते। उनके खेल की एक बड़ी विशेषता उनके शॉट्स की गूढ़ता होती। उनके शॉट्स बेहद डिसेप्टिव होते थे। विपक्षी उनके शॉट्स की दिशा का अनुमान नहीं लगा सकते थे। वे एक निश्चित दिशा में शटल तक आते और अंतिम क्षण में अपने शॉट की दिशा बदल देते। दूसरी तरफ उनके अनुमान करने की अद्भुत क्षमता थी। वे विपक्षी का दिमाग पढ़ने में सक्षम थे। इसीलिए शटल पर उनकी पहुंच बहुत आसान होती और मनचाहे रिटर्न और प्लेसिंग में वे सक्षम होते। दरअसल 20×44 फ़ीट के बैडमिंटन कोर्ट में वे जब भी प्रवेश करते वो उनकी जागीर बन जाता जिसमें उनकी मर्जी से परिंदा(शटल कॉक)पर भी नहीं मार सकता था। वे अतिरिक्त ऊंचाई हासिल करने के लिए एक ऊंची जम्प लगाते और जोरदार स्मैशेज मारते। वे कहते थे 'हर ज़ोरदार पावरफुल छलांग जीत की महत्वाकांक्षा से भरी होती है'।

हर महान खिलाड़ी के खेल जीवन में कुछ महान प्रतिद्वंद्विताएँ होती हैं। दरअसल ये प्रतिद्वंद्विताएँ एक दूसरे के खेल को समृद्ध करती चलती है और ये दोनों मिलकर अंततः खेल को समृद्ध करती हैं। खेलों की कुछ महान प्रतिद्वंद्विताओं को देखिए।मुक्केबाजी में मोहम्मद अली बनाम जो फ्रैजियर,टेनिस में मार्टिना नवरातिलोवा बनाम क्रिस एवर्ट या फेडरर बनाम राफेल नडाल,गोल्फ में अर्नाल्ड पामर बनाम जैक निकलस या फिर बास्केटबॉल में लॉरी बर्ड बनाम मैजिक जॉनसन।ऐसी और भी हैं। व्यक्तिगत भी और दलगत भी। ठीक इसी तरह लिन डान और ली चोंग वेई की प्रतिद्वंदिता भी बैडमिंटन इतिहास की सबसे बड़ी और जग प्रसिद्ध प्रतिद्वंदिता थी जिसने ना केवल एक दूसरे के खेल को समृद्ध किया बल्कि खेल को भी समग्र रूप में। वे दोनों 40 बार एक दूसरे से भिड़े लेकिन 28 के मुकाबले 12 जीत से पलड़ा लिन का भारी रहा। इनमें से वे 22 बार फाइनल में और 15 बार सेमीफाइनल में खेले। लेकिन इस तीव्र प्रतिद्वंदिता के बावज़ूद उनमें कोई कटुता नहीं थी।वे एक दूसरे का मुकाबला करने के लिए लगातार अपने खेल अपनी नीतियों में परिवर्तन करते रहे और खेल को समृद्ध। लेकिन महत्वपूर्ण बात ये कि खेल मैदान की ये प्रतिद्वंद्विता व्यक्तिगत जीवन में नहीं आई। वे एक दूसरे का सम्मान करते थे। जब लिन ने अपने सन्यास की घोषणा की तो सबसे मार्मिक ट्वीट उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी ली ने ही किया कि

'हम जानते थे कि ये दिन आएगा
हमारे ज़िन्दगी का एक भारी क्षण
आपने बहुत ही औदार्य से पर्दा गिराया है
आप वहां के राजा थे जहां हम गर्व से लड़े थे
आपकी ये विदाई की अंतिम लहरें 
शुष्क आंसुओं की खामोशी में
विलुप्त हो जाएंगी।'

और ये प्रतिद्वंदी ही अभी कुछ दिन पहले लिन के बारे में कहता है कि 'लिन डान लीजेंड है। उसके खिताब उसकी कहानी स्वयं कहते हैं। हमें उसका आदर करना ही पड़ेगा।'

निःसंदेह लिन डान हमारे समय के महानतम खिलाड़ी हैं। उनकी मैदान से विदाई उनके खेल से निर्मित जादुई उल्लासमय संगीत को एक उदास धुन में परिवर्तित कर देगी। उनके खेल जीवन की समाप्ति घोषणा दरअसल बैडमिंटन के सबसे चमकदार युग की समाप्ति की घोषणा है।
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खेल के मैदान से अलविदा बैडमिंटन के  'सुपर डान' लिन डान।

Sunday, 25 August 2019

हौंसलों की ये उड़ान बरकरार रहे


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भारतीय समाज की एक बहुत ही सुस्थापित परंपरा है किसी भी विशेष अवसर अपने निकटस्थ लोगों को स्वर्णाभूषण भेंट करने की। और आज जब अपनी माँ के जन्मदिन पर पुसरला वेंकट सिंधु   विश्व विजेता बनकर अपनी मेहनत से अर्जित सोने के तमगे को मां के माथे सजा रहीं थीं तो किसी खिलाड़ी द्वारा मां को दी गई इससे खूबसूरत
भेंट और कुछ नहीं हो सकती थी।
  
स्विट्ज़रलैंड की खूबसूरत वादियों में  बसे बासेल शहर में सिंधु जब विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में जापान की नोजोमी ओकुहारा को 21-7 और 21-7  हरा रही थीं तो हौंसलों,संघर्ष,लगन,परिश्रम और प्रतिभा से लिखी जा रही एक लंबी कथा की अनेक उपकथाओं में से सबसे महत्वपूर्ण उपकथा का एक खूबसूरत उपसंहार लिख रही थीं। दरअसल ये उपकथा 2017 में ग्लासगो में शुरू हुई थी और वाया नानजिंग बासेल पहुंची थी। और इस खूबसूरत उपसंहार के लिए राइन नदी के किनारे बसे बासेल जैसी खूबसूरत जगह से बेहतर जगह और कौन सी हो सकती थी।

2017 की विश्व चैंपियनशिप ग्लासगो में हुई थी और फाइनल सिंधु और ओकुहारा के बीच खेला गया था। ये ऐतिहासिक और अद्भुत मैच था। 111 मिनट चला ये मैच अब तक का सबसे लंबा मैच था जिसमें बैडमिंटन खेल अपनी संपूर्णता में उपस्थित था। इसमें दोनों खिलाड़ियों के कौशल,प्रतिभा,क्षमता,तकनीक,स्टेमिना,धैर्य का श्रेष्ठ निदर्शन था। उस मैच में एक रैली 73 शॉट्स की थी। इतने शॉट्स में तो कई बार पूरा गेम ही खत्म हो जाता है। एक अन्य रैली 53 शॉट्स की थी। उस मैच का स्कोर ओकुहारा के पक्ष में था 21-19,20-22 और 22-20। तकनीकी रूप से वहां ओकुहारा जीती ज़रूर थीं,लेकिन अगर आप स्कोर पर एक नज़र डालें तो समझ आएगा कि दरअसल ये एक अनिर्णीत संघर्ष था जिसे आगे जाकर खत्म होना था। उसके बाद 2018 में नानजिंग एक बार फिर सिंधु  कारोलिना मारन से फाइनल में हार गईं। और तब 2019 में बासेल आया। यहां का फाइनल 2017 के ग्लास्गो के फाइनल का रेप्लिका था। पुसरला वेंकट सिंधु और नोजोमी ओकुहारा के मध्य। ये मैच बिल्कुल वहीं से शुरू हुआ जहां ग्लास्गो में खत्म हुआ था या यूं कहें अनिर्णीत छूटा था। यहां पहले ही पॉइंट के लिए 22 शॉट्स की रैली हुई। ये अंक जीता ओकुहारा ने। लगा यहां भी ग्लास्गो दोहराया जाने वाला है। लेकिन सिंधु कुछ और ही तय करके आईं थीं। ओकुहारा को अगला अंक जीतने के लिए 8 अंकों तक इंतज़ार करना पड़ा। तब स्कोर हुआ 8-2 और उसके बाद 16-4 और फिर 21-7 सिंधु के पक्ष में। दूसरे गेम की कहानी भी अलग नहीं थी।दूसरा गेम भी 21-7 से जीत कर सिंधु ने  बताया कि मैच कैसे खत्म किया जाता है।5 फुट 11 इंच लंबी सिंधु ने अपने कद की भांति खेल के स्तर को भी इतना ऊंचा उठा दिया कि प्रतिपक्षी एकदम बौना होकर रह गया। सिंधु ने पूरे मैच में बहुत ही आक्रामक खेला। उन्होंने ओकुहारा को डीप थर्ड में खिलाया और बीच कोर्ट से पूरे खेल को नियंत्रित किया। ओकुहारा ने नेट पर सिंधु की कमज़ोरी का फायदा उठाने की कोशिश की। पर सिंधु ने नेट पर भी कोई मौका प्रतिद्वंदी को नहीं दिया। और अपने तमगे के  रुपहले रंग को सुनहरे रंग में तब्दील कर दिया। ये 2017 के अनिर्णीत मैच का निर्णायक अंत था। 

दरअसल खेल में या तो आप अपनी मेहनत से दक्षता अर्जित करते हैं या आपमें जन्मजात प्रतिभा होती है। अर्जित दक्षता वाले खिलाड़ी के प्रदर्शन में एक निरंतरता रहती है।उसके प्रदर्शन में ऊंच नीच कम रहती है। लेकिन जन्मजात प्रतिभावान खिलाड़ी के प्रदर्शन निरंतरता की कमी होती है। सिंधु एक ऐसी ही प्रातिभावान खिलाड़ी हैं। वे अक्सर शानदार प्रदर्शन करते करते अचानक से महत्वपूर्ण मौके पर चूक जातीं।
लेकिन इस समय वे खेल के चर्मोत्कर्ष पर हैं।आपको याद होगा इससे पहले इंडोनेशिया ओपन के क्वार्टर फाइनल में ओकुहारा को 21-14,21-7 से और सेमी फाइनल में चेन यू फेई को 21-19,21-10 से रौंद दिया था,हालांकि वे फाइनल में यामुगुची से हार गई। जो शानदार प्रदर्शन उन्होंने इंडोनेशिया में किया था वो उन्होंने यहां जारी रखा। यहां सेमी फाइनल में चेन युफेई को 21-7,21-14 से और फाइनल में ओकुहारा को 21-7,21-7 से निर्ममता से रौंद डाला।

दरअसल ये सिंधु की प्रतिभा का विस्फोट है जिसमें चीन और जापान की इस खेल में बादशाहत,महानऔर समृद्ध परंपरा और दर्प चूर चूर होकर बिखर गया और धूल धुसरित हो गया। और उसके विध्वंस पर भारतीय बैडमिंटन के  नए युग का आरंभ होगा। और बासेल और स्विट्जरलैंड के लिए सिर्फ इतना ही कि उन्होंने ये सोचा और समझा कि सिंधु के पास रुपहला रंग पहले से बहुतायत में है और खुद उनके यहां भी पहाड़ों पर बर्फ की चादर पर पसरा रुपहला रंग भी बहुतायत में है तो क्यों ना उस रुपहली चादर पर सूर्य की किरणों से जो सुनहरा रंग छिटका छिटका फिरता है,उसे बटोर कर अपने इस खूबसूरत मेहमान को भेंटकर विदा किया जाय।
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सिंधु को ये अविस्मरणीय जीत मुबारक!

Tuesday, 23 July 2019

सिंधु


पुसरला वेंकट सिंधु निसंदेह भारतीय बैडमिंटन की एक  बड़ी उपलब्धि हैं जिन्होंने बैडमिंटन को नई ऊँचाई तक पहुंचाया है। लेकिन अपनी तमाम खूबियों और विशेषताओं के बावजूद वे एक अपूर्ण खिलाड़ी हैं। उनके खेल में निरंतरता की बेहद कमी हैं। वे पैचेज में बेहतरीन खेलती हैं। वे एक दिन बहुत अच्छा खेलेंगी और अगले दिन उतना ही बुरा। वे अक्सर ही महत्वपूर्ण मुक़ाबले में हार जाती हैं। आप चाहें तो उन्हें चोकर कह सकते हैं।

अभी हाल ही में सम्पन्न इंडोनेशिया ओपन इसका बड़ा उदाहरण है। पहले दो मुक़ाबलों में अनसीडेड खिलाड़ियों के विरुद्ध संघर्ष करती दिखाई दीं।पहले राउंड में ओहोरी को 11-21,21-15,21-15से जीतीं तो दूसरे राउंड में ब्लिचफेल्ट को 21-19,17-21,21-11 से जीतीं। उसके बाद वे गज़ब का शानदार खेलीं। क्वार्टर फाइनल में उन्होंने तीसरी सीड नोजोमो ओकुहारो को 21-14,21-7 से रौंद डाला। इतना ही नहीं उसके बाद सेमीफाइनल में भी उन्होंने दूसरी सीड चेन युफेई को भी आसानी से 21-19,21-10 से हरा दिया। और जब ये लगाने लगा कि अब वे इस साल का पहला खिताब जीत लेंगी तो फाइनल में बहुत ही आसानी से 15-21,14-21 से अकाने यामागुची से  हार गईं जिनसे  पिछले 4 मैच लगातार जीते थे।

शायद ये अपूर्णता ही सिंधु के खेल की खूबसूरती है कि तकनीकी के इस युग में वे मशीन नहीं बन सकीं।


नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...