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Thursday, 15 August 2024

खेलों की प्रेम कहानियां

 



खेल मैदान खिलाड़ियों के कौशल और प्रतिभा प्रदर्शन के मंच होते हैं। और इसका सबसे बड़ा मंच है ओलम्पिक खेल। ओलम्पिक खेलों का लक्ष्य ही सिटियस,अल्टियस,फोर्टियस है। क्या ही कमाल है कि और तेज़,और ऊँचा,और मजबूत बनने के इस यज्ञ में आहुति देते हुए भी खिलाड़ियों के हृदय में बहती प्रेम की धारा सूखती नहीं है।

फिर ये खेल 'प्रेम के शहर' पेरिस में हो रहे हों तो बात ही क्या है। एक ऐसा शहर जिसकी प्रेम की एक ऐतिहासिक परंपरा रही हो। एक ऐसा शहर जिसका साहित्य, कला, वास्तु, संस्कृति सब मिलकर शहर में अदभुत रोमान पैदा करते हों। एक ऐसा शहर जो अनगिनत रोमांटिक  उपन्यासों,कहानियों और फिल्मों का बैकड्रॉप रहा हो। शहर जो एमिल जोला का है। शहर जो  फ्रेडरिक बैरन का है। शहर जो क्लेयर कीटो का है। शहर जो मेरी एंटोनेट और लुई चौदहवे के प्रेम का है। शहर जिसमें प्रेम का प्रतीक बन चुका एफिल टावर हो। शहर जिसमें  प्रेम का पुल पोंट डेस आर्ट्स हो जिस पर खड़े होकर प्रेमी अपने प्रेम को ताला लगाकर हमेशा के लिए सुरक्षित रखने की कामना करते हों और जिसका नाम ही 'लव लॉक ब्रिज' पड़ गया हो। शहर जिसमें मोंटमार्टे जैसा कोई रोमानी इलाका हो और उसके केंद्र में एक प्रेम की दीवार 'ले मूर डेस जे टाइमे' हो जिस दुनिया की अढ़ाई सौ से भी ज्यादा भाषाओं में तीन शब्दों को ही बार बार लिखा गया हो 'आमी तोमाको भालोबाशी'। 

एक ऐसा शहर ए मोहब्बत जहां दुनिया भर के प्रेमी अपनी मोहब्बत का इजहार करने आते हों। उस शहर में दुनिया के कोने कोने से सद्भाव और मैत्री का संदेश लाए खिलाड़ियों को अगर प्यार ना हो जाता तो फिर क्या होता। और क्या वजह रही होगी कि इस शहर में इन खेलों के दौरान एक नहीं, दो नहीं, बल्कि दुनिया भर के खिलाड़ियों के सात जोड़ों ने अपने साथियों को प्रपोज किया। 

क्या ही खूबसूरत वे दृश्य रहे होंगे जो खेलों की दुनिया को रोमान के रंगों से सराबोर कर रहे थे।

दृश्य एक

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

                                      जिगर मुरादाबादी।

ये जुलाई की चौबीसवीं तारीख थी। अभी भी ओलंपिक खेलों के औपचारिक उद्घाटन में दो दिन बाकी थे। हां कुछ खेलों के मुकाबले जरूर शुरू हो गए थे। फुटबॉल और रग्बी के। अगले दिन हैंडबॉल के मुकाबले भी शुरू होने थे। 

समय शाम गौधूली। जगह पेरिस का खेल गांव। अर्जेंटीना की पुरुष हैंडबाल टीम और महिलाओं की हॉकी टीम के खिलाड़ी एक जगह इकट्ठे हैं। अचानक पाब्लो सिमोनेट घुटने के बल बैठते हैं और अपनी फियांसे हॉकी खिलाड़ी मारिया कैंपॉय का हाथ पकड़ विवाह प्रस्ताव रखते हैं। मारिया चौकती हैं और फिर इस प्रताव का स्वीकार कर लेती हैं। वातावरण में प्रेम की नमी घुल जाती है। आठ सालों से पल रही प्रेम कथा के रंग कुछ और गाढ़े हो जाते हैं।

खेलों से पहले प्रेम का उत्सव शुरू हो जाता है। खेलों के उत्साह और उमंग पर प्रेम का रंग भी चढ़ जाता है।


दृश्य दो

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का 

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले                                      

                                         मिर्ज़ा ग़ालिब

तारीख दो अगस्त की। समय गहराती रात। स्थान ला चैपल अरीना। चीन की बैडमिंटन खिलाड़ी हुआंग या क्वॉन्ग अपने साथी झेंग सिवेई के साथ दक्षिण कोरिया की किम वोन हो और जियांग ना यून के विरुद्ध मिश्रित युगल का फाइनल मैच आसानी से 21- 08,21- 11 से जीत लेती हैं। दर्शकों में हुआंग या क्वांग के फियोंसे बैडमिंटन खिलाड़ी चीन के लियू यू चेन मैच देख रहे होते हैं। वे अपनी जगह से उठते हैं और अपनी मित्र हुआंग के सामने पहुंचते हैं। बधाई के लिए पहले फूलों का गुलदस्ता भेंट करते हैं और फिर घुटनों के बल बैठकर उन्हें प्रस्तावित करते हुए इंगेजमेंट रिंग उनकी अंगुली में पहना देते हैं। पूरा अरीना खुशियों से भर जाता है। प्रेम के रंग और गाढ़े होते जाते हैं।

प्रेम में डूबी हुआंग स्वर्ण पदक के साथ साथ इंगेजमेंट रिंग को भी लेकर घर वापस लौटती हैं।


दृश्य तीन

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है 

सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है 

                                                   जिगर मुरादाबादी

तारीख 10 अगस्त। स्थान पोर्ते दे ला चैपल अरीना जहां चीन के लियू यू चेन ने हुआंग को प्रस्तावित किया था। बस फ्लोर बदला हुआ था। ये बैडमिंटन कोर्ट की जगह लयबद्ध जिमनास्ट का फ्लोर था।

इटली की लयबद्ध जिमनास्ट एलेसिया मौरेली का वो सपना पूरा हो रहा था जिसे वे बचपन से देखा करती थीं और उसके चित्र बनाया करती थीं। बचपन में उनसे उनके सबसे बड़े सपने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने ओलंपिक रिंग्स के अंदर स्प्लिट्स करते हुए खुद की एक तस्वीर बनाई थी। 

हो भी क्यों ना जो तस्वीर वे खुद बनाया करती थीं,उन्हें आज दुनिया भर के फोटोग्राफर जो उतार रहे थे। उन्होंने लयबद्ध जिम्नास्टिक का कांस्य पदक जीता था। उनका सपना पूरा हुआ था। लेकिन तस्वीर अभी भी पूरी नहीं थी। इसमें प्रेम के रंग भरे जाने थे। और उनके कांसे के धूसर रंग को चमकीला जो बनाया जाना था।

जैसे ही वे पोडियम से उतरी। उनके फियोंसे मास्सिमो बर्टेलोनी ने उनके समक्ष प्रस्ताव रखा और मौरेली की उंगली पर एक चमकदार हीरे की सगाई की अंगूठी। अब वे एक पदक के अलावा चमकदार अंगूठी के साथ विदा हो रही थीं। उनका चेहरा जीत की खुशी से ही नहीं दमक रहा था बल्कि प्रेम के रंग से सुर्ख भी हुआ जाता था।

वे कह रही थीं "यह अंगूठी और यह पदक भविष्य की खुशबू है और मैं अपने सबसे अच्छे दोस्तों, टीम के साथियों और अपने भावी पति के साथ इसे जीकर बहुत खुश हूं।"

दृश्य चार

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा 

मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा 

                                                  बशीर बद्र

तारीख  पांच अगस्त। दिन सोमवार। दिन का उजला समय। स्थान खूबसूरत सीन का किनारा।बैकड्रॉप एफिल टावर। 

अमेरिका के जस्टिन बेस्ट ने 01 अगस्त को अपने साथियों निक मीड,माइकल ग्रैडी और लियाम कॉरिगन के साथ मिलकर रोइंग की पुरुषों की कॉक्सलेस फोर स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता था। ये 64 वर्षों में इस स्पर्धा में अमेरिका का पहला स्वर्ण पदक था।

इस खूबसूरत जगह पर अपने दोस्तों और पारिवारिक सदस्यों के साथ इससे बेखबर प्रेमिका को लैनी डंकन को 2738 पीले गुलाबों के साथ प्रपोज किया। इतने गुलाब इसलिए कि वे इतने दिनों से स्नैपचैट पर एक दूसरे से प्रेम का इजहार कर रहे थे और पीले इसलिए कि स्नैपचैट के नोटिफिकेशन का बिंदु पीले रंग का होता है।

सीन नदी के किनारे 2738 दिनों की एक प्रेम यात्रा अब अपने अंजाम को प्राप्त हो चुकी थी। सीन नदी के किनारे एक और धारा बहने लगी थी प्रेम की और गुलाबों की खुशबू में घुल कर प्रेम महकने लगा था।


दृश्य पांच

बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम 

जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई 

                                         फ़िराक़ गोरखपुरी

तारीख छह अगस्त। दिन मंगलवार। स्थान स्टेड डी फ्रांस।  स्थानीय धावक 33 वर्षीया 

एलिस फिनोट एक रोमानी अंदाज में खुद से किया गया एक वादा पूरा कर रही थीं।

वे पहली बार ओलंपिक में भाग ले रही थीं। स्पर्धा थी महिलाओं की 3,000 मीटर स्टीपलचेज़। वे उसमें चौथे स्थान पर रही। केवल तीन सेकंड से पदक चूक गईं। हालाँकि उन्होंने 8:58.67 के समय के साथ यूरोपीय स्टीपलचेज़ रिकॉर्ड तोड़ दिया था।

लेकिन दौड़ से पहले उन्होंने स्वयं से भी एक वादा किया था कि "नौ मेरा भाग्यशाली अंक है और हमारे साथ के भी नौ वर्षों हो चुके हैं। (अगर) मैं नौ मिनट से कम समय में ये दौड़ पूरी कर लूं तो मैं प्रपोज करूंगी।"

और खुद से किए गए वादे को पूरा करने के लिए  दौड़ के कुछ ही क्षणों बाद फिनोट ट्रैक पर एक घुटने के बल बैठी और पानी भरी आंखें लिए  अपने स्पेनी प्रेमी ब्रूनो मार्टिनेज बार्गीला को, जो ट्रायथलीन के खिलाड़ी हैं,एक पिन भेंट की। इस पर लिखा था "प्यार पेरिस में है।" बाद में उन्होंने वो पिन बारगीता शर्ट में टांक दिया मानो ये पिन ना हो उनका दिल हो कि अब दो दिल एक साथ धड़कने लगे थे।


दृश्य छह

दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं 

लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं 

                                         क़तील शिफ़ाई

तारीख 30 जुलाई। दिन मंगलवार। पेरिस में कोई जगह। अमेरिका की महिला रग्बी सेवन खिलाड़ी अलेव केल्टर ने अपनी स्पर्धा में कांस्य पदक जीतने के बाद साथी खिलाड़ी कैथ ट्रेडर के सामने घुटनों के बल बैठी और अपनी 96 साल की दादी की मौजूदगी में शादी का प्रताव रखा।

एलेव केल्टर तीसरी बार ओलंपिक खेलने पेरिस आई थीं। उनका पदक जीतने का सपना तब पूरा हुआ जब उन्होंने कांस्य पदक मैच में 30 जुलाई को ऑस्ट्रेलिया को 14-12 से हराकर एक इतिहास रचा। अमेरिकी सेवन्स स्क्वाड के लिए ये अब तक का पहला पदक था। इस जीत में केल्टर ने अहम भूमिका निभाई। उन्होंने अमेरिका की ओर से पहला स्कोर किया। 

इस जीत के बाद वे सीधे अपनी दोस्त ट्रेडर के पास पहुंचीं और उन्हें प्रपोज किया। ट्रेडर उसी अमेरिकी महिला XVs टीम के लिए खेलती हैं, जिसके लिए केल्टर भी खेलती हैं और यहीं पर इनके बेवच प्रेम की नींव पड़ी। 

ये प्रपोजल अन्य प्रपोजल से अलग बहुत ही वैयक्तिक रहा और इसका पता तब चला जब 06 अगस्त को उन्होंने एक वीडियो के जरिए इस बात को साझा किया।

एक और प्रेम कहानी अपनी मंजिल  पर पहुंची अमेरिका से बहुत दूर सिटी ऑफ लव पेरिस में।

दृश्य सात

मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है 

कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता 

                                                 बशीर बद्र

तारीख चार अगस्त। दिन रविवार। समय एक चमकीला दिन। स्थान सुप्रसिद्ध एफिल टावर का बैकड्रॉप। इस दिन एक और खिलाड़ी प्रेमी घुटनों के बल झुका और प्रेम निवेदन किया।

ये अमेरिका के शॉट पटर पेटन ऑटरडल थे। वे शॉट पुट में भाग लेने वाले तीन अमेरिकियों में से एक थे। वे बहुत मामूली से अंतर से जमैका के आर कैंपबेल से पीछे रह कर पदक से चूक गए। पहले दो स्थानों पर अमेरिकी खिलाड़ी रहे।

अगले दिन ही एफिल टावर के बैकड्रॉप में उन्होंने अपनी प्रेमिका मेडी नील्स के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। वे उनके साथ इन दिनों पेरिस में ही हैं। एक बार फिर सीन नदी के किनारे दो दिल मिले, प्रेम की ऊष्मा से पिघले, और सीन के समानांतर प्रेम की एक और धारा बह निकली।


यों प्रेम के इस शहर में प्रेम की कुछ कहानियां अपने अंजाम को पहुंची। कहने को तो इनकी गिनती एक दर्जन तक पहुँचती हैं। पर कुछ सामने आईं, कुछ पर्दे में रह गईं। 

पर कहते हैं ना प्यार के दुश्मन हज़ार। इन प्रस्तावों के चर्चा में आते ही इनकी आलोचना शुरू हो गयी कि इनकी सुर्खियों ने ओलंपिक में महिलाओं की वास्तविक उपलब्धियों को पृष्ठभूमि में धकेल दिया।

जो हो इस प्रेम नगर में कितनी ही प्रेम कहानियाँ पूरी हुई। लेकिन  ऐसा भी हुआ होगा कि इन सोलह दिनों में और ना जाने कितनी नई प्रेम कहानियों ने जन्म लिया होगा। जो कहीं और उनके अपने प्रेमनगर में, अपने सपनों के शहर में पूरी होंगी।

और ये भी कि पेरिस में बने इन सुंदर दृश्यों की तरह ऐसे ना जाने कितने दृश्य आगे भी आने वाले समय में बनते रहेंगे और लोगों की स्मृति का हिस्सा भी कि बकौल मिर्ज़ा ग़ालिब

इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश 'ग़ालिब'

कि लगाए न लगे और बुझाए न बने !

अभावों की आभा



विस्थापन मानव जीवन में किसी भयानक त्रासदी की तरह आता है। विशेष रूप से तब जब ये विस्थापन जबरन कराया गया हो या मजबूरी में करना पड़ा हो। ये किसी अभिशाप की तरह जीवन को दुख देता है। अपनी जड़ ज़मीन से अलग हुआ विस्थापित पेड़ से टूटे पत्ते की तरह समय के थपेड़ों के हाथों पिटता हुआ अपने अस्तित्व और गरिमा की तलाश में भटकता रहता है। दुनिया में इस समय सौ मिलियन से अधिक लोग जबरन विस्थापित हैं जो जीवन यापन और मानवीय गरिमा से रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ये साल 2016 था। रियो ओलंपिक के आयोजन का साल। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी के अध्यक्ष थॉमस बॉक ने एक पहल की। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की मदद से ओलंपिक कमेटी और ओलंपिक शरणार्थी फाउंडेशन द्वारा एक  शरणार्थी ओलंपिक टीम का गठन किया गया ताकि दुनिया भर में शरणार्थियों की तरह रह रहे लोगों में से खेल प्रतिभाओं को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन हेतु खेल का उच्चतम मंच प्राप्त हो सके।

तब पहली 2016 के रियो ओलंपिक में पहली बार शरणार्थी ओलंपिक दल ने भाग लिया। इसमें कुल 10 खिलाड़ी शामिल थे। इसके बाद 2021 के टोक्यो ओलंपिक में कुल 29 खिलाड़ियों ने भाग लिया। लेकिन वहां ये एक भी पदक नहीं जीत सके थे। इस बार पेरिस ओलंपिक में इस दल के कुल 37 लोगों ने भाग लिया और शानदार प्रदर्शन किया। 



इसमें सबसे शानदार प्रदर्शन सिंडी एनगाम्बा का  था। 75 किग्रा भार वर्ग की मुक्केबाज़ी स्पर्धा में 25 वर्षीय सिंडी एनगाम्बा ने एक  कांस्य पदक जीत कर इतिहास रचा। उन्होंने क्वार्टर फाइनल में मेजबान फ्रांस की डेविना मिचेल को सर्व सम्मति से 5-0 से हराकर सेमीफ़ाइनल में प्रवेश कर अपना कांस्य पदक पक्का कर लिया था। ये शरणार्थी ओलंपिक दल का इन खेलों में पहला पदक था। हालांकि वे सेमीफ़ाइनल में अपना मैच पनामा की एथीना बैलोन से हार गईं लेकिन तब तक पोडियम पर खड़े होने का हक़ प्राप्त कर इतिहास रच चुकी थीं।

सिंडी का जन्म 1998 में कैमरून में हुआ था।  11 वर्ष की अवस्था में वे एक आव्रजक के रूप में ग्रेट ब्रिटेन आईं। लेकिन जब उनके चाचा वापस कैमरून जाने लगे तो उनके वैध दस्तावेज चाचा द्वारा खो दिए गए। समस्या तब आईं जब स्कूल से कॉलेज में भर्ती होने का समय आया। उस समय उनके वीसा का नवीनीकरण होना था। लेकिन उनके पास वैध दस्तावेज नहीं होने के कारण उन्हें देश में अवैध शरणार्थी माना गया। तब से कानूनी लड़ाई लड़ रहीं हैं। वे लेस्बियन हैं और इसीलिए वे अपने देश वापस नहीं जाना चाहती हैं क्योंकि कैमरून में समलैंगिकता अपराध की श्रेणी में आता है और उन्हें पांच साल की सजा हो सकती है। उनका कहना है वे ब्रिटेन में बचपन से रह रही हैं और उन्हें कभी नहीं लगा कि वे यहां आव्रजक हैं।

उन्होंने अपने खेल कैरियर की शुरुआत फुटबॉल से की। लेकिन जल्द ही उन्हें ये लग गया कि उनका सच्चा पैशन फुटबॉल नहीं बॉक्सिंग है। फिर 15 वर्ष की उम्र में बॉक्सिंग शुरू की। वे तीन अलग अलग भार वर्ग में ब्रिटेन की राष्ट्रीय चैंपियन हैं और ब्रिटिश बॉक्सिंग टीम के साथ अभ्यास करती हैं। वे ब्रिटिश टीम की और से ही भाग लेना चाहती थीं। लेकिन उनके पास ना तो ब्रिटेन का पासपोर्ट है और ना दीर्घकालीन वीसा। इन्हीं प्रपत्रों के अभाव में उन्हें उनके भाई के साथ एक बार अवैध प्रवासी होने की बिना पर गिरफ्तार करके डिटेंशन सेन्टर भेज दिया गया और वापस कैमरून भेजे जाने का खतरा भी उन पर मंडराने लगा। लेकिन इसी बीच उनके अंकल जो वहीं काम कर राजे हैं,के हस्तक्षेप से उन्हें 2021 में शरणार्थी का दर्जा प्राप्त हो गया।अभी भी ब्रिटेन में उनका दर्जा शरणार्थी का है। इसलिए उन्होंने शरणार्थी ओलंपिक टीम के लिए आवेदन किया और उन्हें टीम में चुन लिया गया।

उन्होंने पदक जीतकर दिखाया कि विस्थापित लोगों को अगर अवसर मिले तो वे अपने को सिद्ध कर सकते हैं और अपनी काबिलियत भी।

हालांकि शरणार्थी टीम से पदक जीतने वाली वे अकेली खिलाड़ी हैं, लेकिन उनके साथियों ने भी इस ओलंपिक में शानदार और उम्मीद जगाने वाला प्रदर्शन किया है। एथलेटिक्स में डोमिनिक लोकिन्योमो लोबालू  पुरुषों की 5,000 मीटर दौड़ स्पर्धा के फ़ाइनल में सेकेंड के शतांश से भी कम अंतर से पदक से चूक गए और चौथे स्थान पर रहे।

 इसके अलावा पेरिना लोकुरे नाकांग ने महिलाओं की 800 मीटर दौड़ स्पर्धा में और जमाल अब्देलमाजी  पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय निकाला। साथ ही तीन खिलाड़ी फर्नांडो दयान और जॉर्ज एनरिकेज़ की टीम व सईद फज़लौला, समन सोलतानी  कैनो स्प्रिंटर्स क्वार्टर फाइनल में पहुंचे। 

ये प्रदर्शन इस मामले में असाधारण और विशिष्ट कहे जा सकते हैं कि ये उन खिलाड़ियों द्वारा किए गए हैं जो अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे न्यूनतम मानवीय सुविधाओं के साथ रहकर, केवल अपने दृढ़ संकल्प, अपने साहस, अपनी कड़ी मेहनत और अपनी प्रतिभा के बल पर ऐसा कर पा रहे हैं। 

ये शरणार्थी ओलंपिक दल के सदस्यों द्वारा किए गए ये चमकीले प्रदर्शन मानवीय जिजीविषा और  साहस के उच्चतर बिंदु है। ये इस बात का प्रमाण हैं कि अगर व्यक्ति ने ठान लिया है तो तमाम बाधाओं और त्रासदियों से गुजर कर भी जीवन में बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है।मानव जीवन में किसी भयानक त्रासदी की तरह आता है। विशेष रूप से तब जब ये विस्थापन जबरन कराया गया हो या मजबूरी में करना पड़ा हो। ये किसी अभिशाप की तरह जीवन को दुख देता है। अपनी जड़ ज़मीन से अलग हुआ विस्थापित पेड़ से टूटे पत्ते की तरह समय के थपेड़ों के हाथों पिटता हुआ अपने अस्तित्व और गरिमा की तलाश में भटकता रहता है। दुनिया में इस समय सौ मिलियन से अधिक लोग जबरन विस्थापित हैं जो जीवन यापन और मानवीय गरिमा से रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ये साल 2016 था। रियो ओलंपिक के आयोजन का साल। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी के अध्यक्ष थॉमस बॉक ने एक पहल की। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की मदद से ओलंपिक कमेटी और ओलंपिक शरणार्थी फाउंडेशन द्वारा एक  शरणार्थी ओलंपिक टीम का गठन किया गया ताकि दुनिया भर में शरणार्थियों की तरह रह रहे लोगों में से खेल प्रतिभाओं को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन हेतु खेल का उच्चतम मंच प्राप्त हो सके।

तब पहली 2016 के रियो ओलंपिक में पहली बार शरणार्थी ओलंपिक दल ने भाग लिया। इसमें कुल 10 खिलाड़ी शामिल थे। इसके बाद 2021 के टोक्यो ओलंपिक में कुल 29 खिलाड़ियों ने भाग लिया। लेकिन वहां ये एक भी पदक नहीं जीत सके थे। इस बार पेरिस ओलंपिक में इस दल के कुल 37 लोगों ने भाग लिया और शानदार प्रदर्शन किया।

इसमें सबसे शानदार प्रदर्शन सिंडी एनगाम्बा का  था। 75 किग्रा भार वर्ग की मुक्केबाज़ी स्पर्धा में 25 वर्षीय सिंडी एनगाम्बा ने एक  कांस्य पदक जीत कर इतिहास रचा। उन्होंने क्वार्टर फाइनल में मेजबान फ्रांस की डेविना मिचेल को सर्व सम्मति से 5-0 से हराकर सेमीफ़ाइनल में प्रवेश कर अपना कांस्य पदक पक्का कर लिया था। ये शरणार्थी ओलंपिक दल का इन खेलों में पहला पदक था। हालांकि वे सेमीफ़ाइनल में अपना मैच पनामा की एथीना बैलोन से हार गईं लेकिन तब तक पोडियम पर खड़े होने का हक़ प्राप्त कर इतिहास रच चुकी थीं।

सिंडी का जन्म 1998 में कैमरून में हुआ था।  11 वर्ष की अवस्था में वे एक आव्रजक के रूप में ग्रेट ब्रिटेन आईं। लेकिन जब उनके चाचा वापस कैमरून जाने लगे तो उनके वैध दस्तावेज चाचा द्वारा खो दिए गए। समस्या तब आईं जब स्कूल से कॉलेज में भर्ती होने का समय आया। उस समय उनके वीसा का नवीनीकरण होना था। लेकिन उनके पास वैध दस्तावेज नहीं होने के कारण उन्हें देश में अवैध शरणार्थी माना गया। तब से कानूनी लड़ाई लड़ रहीं हैं। वे लेस्बियन हैं और इसीलिए वे अपने देश वापस नहीं जाना चाहती हैं क्योंकि कैमरून में समलैंगिकता अपराध की श्रेणी में आता है और उन्हें पांच साल की सजा हो सकती है। उनका कहना है वे ब्रिटेन में बचपन से रह रही हैं और उन्हें कभी नहीं लगा कि वे यहां आव्रजक हैं।

उन्होंने अपने खेल कैरियर की शुरुआत फुटबॉल से की। लेकिन जल्द ही उन्हें ये लग गया कि उनका सच्चा पैशन फुटबॉल नहीं बॉक्सिंग है। फिर 15 वर्ष की उम्र में बॉक्सिंग शुरू की। वे तीन अलग अलग भार वर्ग में ब्रिटेन की राष्ट्रीय चैंपियन हैं और ब्रिटिश बॉक्सिंग टीम के साथ अभ्यास करती हैं। वे ब्रिटिश टीम की और से ही भाग लेना चाहती थीं। लेकिन उनके पास ना तो ब्रिटेन का पासपोर्ट है और ना दीर्घकालीन वीसा। इन्हीं प्रपत्रों के अभाव में उन्हें उनके भाई के साथ एक बार अवैध प्रवासी होने की बिना पर गिरफ्तार करके डिटेंशन सेन्टर भेज दिया गया और वापस कैमरून भेजे जाने का खतरा भी उन पर मंडराने लगा। लेकिन इसी बीच उनके अंकल जो वहीं काम कर राजे हैं,के हस्तक्षेप से उन्हें 2021 में शरणार्थी का दर्जा प्राप्त हो गया।अभी भी ब्रिटेन में उनका दर्जा शरणार्थी का है। इसलिए उन्होंने शरणार्थी ओलंपिक टीम के लिए आवेदन किया और उन्हें टीम में चुन लिया गया।

उन्होंने पदक जीतकर दिखाया कि विस्थापित लोगों को अगर अवसर मिले तो वे अपने को सिद्ध कर सकते हैं और अपनी काबिलियत भी। हालांकि शरणार्थी टीम से पदक जीतने वाली वे अकेली खिलाड़ी हैं, लेकिन उनके साथियों ने भी इस ओलंपिक में शानदार और उम्मीद जगाने वाला प्रदर्शन किया है। 


एथलेटिक्स में डोमिनिक लोकिन्योमो लोबालू  पुरुषों की 5,000 मीटर दौड़ स्पर्धा के फ़ाइनल में सेकेंड के शतांश से भी कम अंतर से पदक से चूक गए और चौथे स्थान पर रहे।

 इसके अलावा पेरिना लोकुरे नाकांग ने महिलाओं की 800 मीटर दौड़ स्पर्धा में और जमाल अब्देलमाजी  पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय निकाला। साथ ही तीन खिलाड़ी फर्नांडो दयान और जॉर्ज एनरिकेज़ की टीम व सईद फज़लौला, समन सोलतानी  कैनो स्प्रिंटर्स क्वार्टर फाइनल में पहुंचे। 

ये प्रदर्शन इस मामले में असाधारण और विशिष्ट कहे जा सकते हैं कि ये उन खिलाड़ियों द्वारा किए गए हैं जो अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे न्यूनतम मानवीय सुविधाओं के साथ रहकर, केवल अपने दृढ़ संकल्प, अपने साहस, अपनी कड़ी मेहनत और अपनी प्रतिभा के बल पर ऐसा कर पा रहे हैं। 

ये शरणार्थी ओलंपिक दल के सदस्यों द्वारा किए गए ये चमकीले प्रदर्शन मानवीय जिजीविषा और  साहस के उच्चतर बिंदु है। ये इस बात का प्रमाण हैं कि अगर व्यक्ति ने ठान लिया है तो तमाम बाधाओं और त्रासदियों से गुजर कर भी जीवन में बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है।




Wednesday, 14 August 2024

बुनना सुंदर सपने को




 घटनाएं बीत जाती हैं। उनकी स्मृतियां बाकी रह जाती हैं। पेरिस ओलम्पिक का भी समापन हो गया। लेकिन इसमें भाग ले रहे खिलाड़ियों द्वारा इसके भीतर बनी संवेगों की रंग बिरंगी छवियां और उनके जुनून,साहस,ताकत व कौशल से किए गए हैरतंगेज और रोमांचक कारनामों की बेहद खूबसूरत तस्वीरें हमेशा के लिए हृदय पटल पर अंकित हो चुकी हैं।

टॉम डेली जाने माने ब्रिटिश डाइवर हैं जिन्होंने पेरिस ओलम्पिक से पहले एक स्वर्ण और तीन कांस्य पदक जीते थे। इस बार उन्होंने डाइविंग की  10 मीटर सिंक्रोनाइज्ड प्लेटफार्म स्पर्धा में अपने जोड़ीदार नोआह विलियम्स के साथ मिलकर रजत पदक जीता।

वे हवा में अपने शरीर के साथ शानदार कलाबाजियां करते हैं और डाइव करते हैं किसी बहुत ही दक्ष नर्तक की तरह। लेकिन कमाल की बात ये है कि वे जितनी दक्षता के साथ हवा और पानी में अपने शरीर से कलाबाजी दिखाते हैं उतनी ही दक्षता से और खूबसूरती से क्रोशिए और धागे के साथ अपनी उंगलियों से करामात दिखाते हैं। वे शायद दुनिया के एक प्रसिद्ध एथलीट होने के साथ एक सिद्धहस्त बुनाई करने वाले हैं। वे बुनाई के क्षेत्र में स्त्रियों को मात देते हैं। डाइविंग के बाद बुनाई उनका दूसरा पैशन है।




अपनी बुनाई के लिए वे पहली बार टोक्यो ओलम्पिक में चर्चा में आए। वहां उन्होंने अपनी स्पर्धा के दौरान बैठे बैठे अपने पदक रखने के लिए एक सुंदर पाउच बना दिया था।

लेकिन इस बार तो वे और भी दो हाथ आगे निकल गए। अपना इवेंट खत्म करने के बाद उन्होंने अधिकांश समय अपने साथियों को प्रोत्साहित करने और अपने दूसरे पैसाइयों को पूरा करनेए दिया। इस बार तो उन्होंने बाकायदा अपना पूरा पुलोवर ही बुन दिया। सफेद,लाल और नीले रंग के इस पुलोवर का पहले उन्होंने एक स्केच बनाया और फिर उसको साकार रूप दे डाला।

 लाल रंग की पृष्ठभूमि के इस पुलोअर में सफेद रंग से सामने चेस्ट पर एफिल टावर पेरिस 2024 लिखा है और नीचे लाल और सफेद रंग से ब्रिटेन का राष्ट्रीय ध्वज बनाया है। एक आस्तीन पर अंग्रेजी के अक्षर टी डी हैं जो उनके नाम के आरंभिक अक्षर है और एक आस्तीन पर 5 है जो उनके ओलम्पिक में पांचवे मेडल का प्रतीक है।

वो क्या ही सुंदर दृश्य रहा होगा जब एक खिलाड़ी पवेलियन में दर्शकों के बीच बहुत ही चपलता और कुशलता से अपनी उंगलियों से कुछ धागों के साथ एक खूबसूरत सपना बुन रहा होगा। और ये भी प्रतिभा स्त्री पुरुष के बीच कोई भेदभाव नहीं करती।



Monday, 5 August 2024

संघर्षों के आगे शोहरत का एक पूरा जहां है

 


पेरिस ओलंपिक में इस बार जिम्नास्टिक की व्यक्तिगत ट्रैम्पोलिन स्पर्धा के महिला और पुरुष वर्ग के स्वर्ण पदक विजेता विशिष्ट हैं। प्रेरक हैं। अनुकरणीय हैं।

ये विजेता हैं ब्रिटेन की ब्रायोनी पेज और बेला रूस के इवान लिट्विनोविच।


महिला वर्ग स्वर्ण पदक ग्रेट ब्रिटेन की ब्रायोनी पेज ने जीता है। उन्होंने 2016 के रियो में ओलंपिक डेब्यू किया था और ब्रिटेन के लिए पहला ट्रैंपोलिन पदक जीता। ये रजत पदक था। उसके बाद 2021 के टोक्यो में कांस्य पदक जीता। पेरिस में स्वर्ण पदक जीतकर अपने पदकों के संग्रह को पूरा किया। 

लेकिन उनकी ये खेल जीवन की यात्रा डर के आगे जीत की कहानी है। 

उन्होंने बचपन में अपने लिए जिम्नास्टिक को चुना और ट्रैम्पोलिन का अभ्यास करने लगीं। लेकिन शीघ्र ही वे लॉस्ट मूव सिंड्रोम का शिकार हो गईं। इसमें व्यक्ति लगातार हवा में भ्रमित हो जाता है और बेतरतीब और अक्सर डरावने कौशल करता है। और अपनी काबिलियत का सही प्रदर्शन नहीं कर पाता। अब ब्रोयोनी पेज को भी अपनी क्षमताओं पर भरोसा खो बैठी। वे हवा में छलांग लगाने से डराने लगीं। वे हवा में अपने मूव भूल जाती। हवा में कलाबाजी करने में डरती। स्थिति बाद से बदतर होती चली गईं।वे उदास और परेशान रहने लगीं। ये एक ऐसी जीग ठिंकिसासे वे सबसे ज्यादा प्यार करती थीं और उससे दूर होती जा रही थीं।

तब उनके जीवन में कोच मार्टिन पेरी आए। उन्होंने ब्रायोनी में आत्मविश्वास भरा,फिर से ट्रेनिंग शुरू की। जल्द ही उन्होंने अपने दृढ़ संकल्प और परिश्रम से लॉस्ट मूव सिंड्रोम पर ना केवल काबू पाया बल्कि ब्रिटेन के सीनियर टीम में शामिल कर ली गईं। 

ये बात 2009 की है। उन्होंने उस साल विश्व कप भाग लिया और 24वें स्थान पर आईं। 2010 के बेल्जियम विश्व कप में 15वें स्थान पर रही और यूरोपीय चैंपियनशिप में 15वें स्थान पर रही। तब साल 2013 आया। उन्होंने ना केवल ब्रिटिश चैंपियनशिप जीती बल्कि विश्व चैंपियनशिप भी जीती। 

अब वे ना केवल दो बार की विश्व चैंपियन हैं बल्कि व्यक्तिगत स्पर्धा में तीन तीन ओलंपिक की पदक विजेता भी हैं।


और इस बार की ट्रैंपोलिन के पुरुष वर्ग स्पर्धा स्वर्ण पदक इवान लिट्विनोविच ने लगातार दूसरी बार जीता। वे पेरिस ओलंपिक में न्यूट्रल प्लेयर के रूप में गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले एथलीट बन गए है। वे बेलारूस के हैं। और बेलारूस रूस यूक्रेन युद्ध में रूस का सहयोगी। इन दोनों देशों के  खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग नहीं लेने दिया जा रहा है। वे निराश थे। 

उन्हें इस बार पुनः ओलंपिक में भाग लेने की अनुमति तो मिल गई। परंतु न्यूट्रल  पहचान के रूप में। एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में जिसकी कोई राष्ट्रीय पहचान नहीं थी। वे जिस समय प्रतियोगिता में प्रतिस्पर्धा कर रहे थे उन्हें पता था कि उनके द्वारा जीता गया मेडल उनके देश के खाते में नहीं जुड़ेगा। इतना ही नहीं वे ये भी जानते थे कि मेडल लेते समय ना तो उनके देश का झंडा फहराया जाएगा और ना ही राष्ट्रगान बजेगा। 

राष्ट्रीय पहचान एक खिलाड़ी के लिए खेल मैदान में सबसे बड़ी प्रेरणा होती है। इस प्रेरणा के अभाव में उन्होंने भाग लिया और पिछले ओलंपिक का स्वर्णिम सफलता को दोहराया।

दरअसल खेल केवल खेल नहीं होते। ये खिलाड़ियों के अपने अपने संघर्षों के आईने भी होते हैं। वे दिखाते हैं खिलाड़ी किन कठिनाइयों,परेशानियों और संघर्षों के बाद यहां तक पहुंचा है। वे यहां तक अपने कठोर परिश्रम,दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के सहारे यहां तक पहुंचते हैं। क्योंकि वे जानते हैं इन संघर्षों के आगे शोहरत का एक पूरा जहां उनके स्वागत के लिए खड़ा है।

Saturday, 3 August 2024

उगते सूरज के देश से शहर ए मोहब्बत तक






पूरा होने का समय कभी एक सा नहीं रहता। ये बदलता रहता है। चीजें फिर फिर लौट कर जीवन में आती हैं। अगर ऐसा ना होता तो अंग्रेजी का सुप्रसिद्ध कवि पी बी शैली क्योंकर लिखता कि 'अगर सर्दियां आईं हैं तो बसंत भी जरूर खिलेगा'। जीवन का ये सच खेल का भी सच है। खेल व्यक्ति की जिंदगी का ही हिस्सा तो है। तो फिर जिंदगी के खेल और खेलों की जिंदगी क्योंकर ना एक सी होगी। 

इस लड़की की कहानी कुछ ऐसा ही खेल तो करती है।

ये साल 2021 था। 19 साल की एक लड़की के भाग्य का सूरज उगते हुए सूरज के देश में उगने से पहले डूब जाता है। जिस जगह वो सूरज डूबा वो जगह टोक्यो कहलाती है। वहां एक टीन ऐजर की प्रसिद्धि के सूरज के उगने की राह बन पाती कि उस राह को बनाने का उसका औजार ही रहस्यमय ढंग से भोंथरा गया। अब उसके जीवन में निराशा और अवसाद की गहरी रात थी। 

लेकिन जरूर उसने अपनी जिंदगी में उस अंग्रेज कवि को पढ़ा होगा,गुना होगा। उसने अपने अंधेरों में ही अपने सपनों को फिर से बुनना शुरू किया। वे सपने जो उगते सूरज के देश में टूट चुके थे,वे  सपने अब सपनों के शहर में पूरे होने थे। वे सपने जो उन्हीं हथियारों से पूरे होने थे जिन्होंने उसके सपनों को तोड़ा था। उसने उन हथियारों  पर फिर से सान चढ़ानी शुरू की क्योंकि वो जानती थी कि डूबा सूरज फिर उगेगा। उसे उगना ही है।

फिर एक और सुबह आई। उसने खुली आंखों से सपने देखे और उन्हें सच किया! आखिर ये सपनों का शहर जो था। यहां वो सपने ना देखती तो क्या करती! ये प्रेम का शहर भी तो था ना। यहां उन सपनों से प्रेम ना करती तो क्या करती! ये उम्मीदों को पूरा करने का शहर भी तो था। यहां उसके सपने पूरे ना होते तो फिर कहां होते! प्रेम के शहर में सपने भी कहीं टूटा करते हैं क्या!

वो अब सीन नदी के किनारे खड़े हो खूबसूरत सूरज को उगते देख रही थी। उस सूरज को जो आज से तीन साल पहले टोक्यो के क्षितिज पर कहीं डूब गया था। 

उसकी आंखों में पानी उस दिन भी था। उसकी आंखों में पानी आज भी है। तब उसने अपने भीतर की सारी मिठास उन आंसुओं में भर दी थी कि वो सारे अहंकार,अहम और अव्यवस्थाओं के खारेपन को कम कर सके। और आज उसने उन आंसुओं में सारी कड़वाहटों के खारेपन को बहा दिया,जो उसे मिली थी कि वो अपनी आंखों में भरे सपनों का मीठापन बचा सके।

उसने केवल अपने अरमानों को ही पूरा नहीं किया था बल्कि अपने देश के ना जाने कितने युवाओं के अरमानों को पंख दे दिए। समय का एक चक्र पूरा हो रहा था।



टोक्यो की 19 साल की टीन ऐजर पेरिस में 22 साल की युवा है। उसके ख्वाब अब पक कर पदकों के सच में तब्दील हो गए हैं। उसने भारत के लिए दो पदक जीते हैं। उन पदकों का रंग भले ही धूसर हो। पर उनसे ऐसी आभा फूटती है कि आंखें चौधिया जाती हैं। सपनों को पदकों में बदलने वाली उस लड़की को हम मनु भाकर के नाम से जानते हैं।

मनु भाकर ने 1.4 बिलियन लोगों को गर्व से भरा है। अब ये 1.4 बिलियन लोग मनु पर गर्व करते हैं।

आपको सलाम मनु।




Friday, 2 August 2024

स्वैग और कूल लुक

 





28 जुलाई को महिलाओं का 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा का स्वर्ण पदक दक्षिण कोरिया की 16 वर्षीया टीनएजर हो ये जिन ने ओलंपिक रिकॉर्ड के साथ जीता,लेकिन सुर्खियों में आईं रजत पदक विजेता दक्षिण कोरिया की ही 31 वर्षीया किम ये जिन।

30 जुलाई को मिश्रित 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा  के रोचक और संघषपूर्ण मुकाबले में स्वर्ण पदक जीता सर्बिया के ज़ोराना अरुनोविच और दामिर मिकेच ने,लेकिन दर्शकों के चहेते बने रजत पदक जीतने वाली तुर्की टीम के यूसुफ देकिक।

आखिर दो स्वर्ण पदक विजेताओं के स्थान पर रजत पदक विजेता दर्शकों और सोशल मीडिया पर इस कदर प्रसंशित और लोकप्रिय हो रहे हैं तो क्यों?


दरअसल ये इन खिलाड़ियों की देहभाषा और उनका स्वैग है जो उन्हें इस कदर चर्चित और लोकप्रिय बनाता है।  खेल इस कदर तकनीकी, शक्ति युक्त और स्पर्धात्मक हो गये हैं और खिलाड़ियों पर जीत का दबाव इतना ज्यादा हावी हो गया कि खिलाड़ियों के चेहरे बहुत अधिक गंभीर और तनावयुक्त रहते हैं। उनके शरीर के मूवमेंट इस कदर मशीनी हो गए कि उनके चेहरों पर और उनकी देह भाषा में कोई सहजता दिखाई देती ही नहीं। 

जब किम ये जिन शूटिंग रेंज में निशाना साधती हैं तो उनकी देह भाषा में एक खास तरह का स्वैग होता है। चेहरे पर सहज आत्म विश्वास होता है और एटीट्यूड में अजब सी लापरवाही। यूसुफ  देकिक एक कदम और आगे बढ़ जाते हैं। उनका स्वैग एक अलग स्तर पर पहुंच जाता है। वे एक खेल में प्रयुक्त होने वाले आधुनिक सुरक्षा उपकरणों यथा स्पेशल लैंस, आई गार्ड और ईयर प्रोटेक्टर तक का प्रयोग नहीं करते। उनको देखकर ऐसा लगता है मानो वे सुबह घूमने आए हों और शूटिंग करने लगे हों। एकदम सहज और स्वाभाविक। बिना किसी तनाव के।

दरअसल ऐसे ही खिलाड़ी खेल की आत्मा को पकड़ते हैं। वे खेलों के मशीनी और यांत्रिक होने और मानवीय तत्व की कमी से जो रिक्तता उत्पन्न होती है वे अपने स्वैग से उस रिक्तता का भरते हैं। 

इसीलिए वे दर्शकों को बेहद आकृष्ट भी करते हैं और एक दीर्घावधि के लिए उनकी स्मृति का हिस्सा भी बन जाते हैं।





Wednesday, 31 July 2024

पोडियम पर दो नहीं तीन खिलाड़ी थे

 






खेलों की कोई भी तस्वीर केवल खेलों से कहां मुकम्मल होती है,जब तक कि इसमें खेलों से इतर किस्से कहानियों के रंग ना भरे जाएं। किस्से कहानियां जो इन खेलों के संघर्ष की कठोर धरातल को मुलामियत देती हैं। उसकी शुष्क भूमि को तरल कर देती है। उसके परिश्रम के स्वेद को सुकून की मंद बयार से आवृत्त कर देती हैं। खेल की भूमि को बहुरंगी बना देती है।

पेरिस ओलंपिक में मिस्र की फेंसर(तलवार बाज) हादा हाफिज तीसरी बार ओलंपिक खेलों में भाग ले रही थीं। वे चिकित्सा में स्नातक हैं और 2019 के अफ्रीकी खेलों में व्यक्तिगत और टीम स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। महिला एकल सेबर स्पर्धा में उन्होंने पहले दौर का मैच 10वीं वरीयता प्राप्त खिलाड़ी यूएसए की एलिजाबेथ टार्टाकोवस्की के खिलाफ म15/17 से जीत लिया। लेकिन अगले दौर के  मैच में दक्षिण कोरिया की जियोन हायोंग से 07/15 से हार गईं। इसके बाद इंस्टा पर उन्होंने लिखा-

 'आपको पोडियम पर दो खिलाड़ी दिखलाई दे रहे थे,असल में वे तीन थे। मैं,मेरी प्रतिद्वंदी और मेरा दुनिया में आने वाला छोटा बच्चा। मेरे और मेरे बच्चे के सामने कई चुनौतियां थीं,चाहे शारीरिक हो या मानसिक।...मैं ये पोस्ट यह कहने के लिए लिख रही हूं कि राउंड ऑफ 16 में अपनी जगह पक्की करने पर मुझे गर्व महसूस हो रहा है।'

यानी वे इस प्रतियोगिता में अकेले भाग नहीं लिया बल्कि उनके साथ था उनका सात माह का गर्भस्थ शिशु।

ये खेल की दुनिया में कुछ अस्वाभाविक सी बात थी। पूरा खेल जगत उनके खुलासे चकित था। पर इन सबसे अलग वे एक साथ मातृत्व सुख और अपने खेल के पैशन को एंजॉय कर रहीं थीं। मातृत्व सुख के साथ अपने पैशन का आनंद उनके साहस का बायस है। 

एक खिलाड़ी के खेल के प्रति प्यार और जुनून का खूबसूरत निदर्शन हैं। एक खिलाड़ी का ऐसा साहस वो ज़ुनून भरा जेस्चर कितने ही किताबी स्त्री विमर्शों पर भारी है।

ऐसे किस्से ही तो खेलों की दुनिया में कुछ गाढ़े रंग भर देते हैं उसे थोड़ा और खूबसूरत कर जाये हैं।




Tuesday, 30 July 2024

प्रतिभा उम्र की मोहताज कहां





 हम अपने जीवन में कितनी बार कहते हैं कि उम्र एक नंबर मात्र है। और कितनी बार इसको सच होते भी देखा है। अब इन बालाओं को देखिए ना।

कल पेरिस ओलंपिक में महिलाओं की स्ट्रीट स्केटबोर्डिंग स्पर्धा में पदक जीतने वाली तीनों प्रतिभागी टीन एजर हैं और उनकी टोटल उम्र 45 वर्ष है। इस स्पर्धा का स्वर्ण जापान की 14 वर्षीय कोको योशीजावा ने,रजत पदक जापान की ही 15 वर्षीय लिज अलामा ने और कांस्य पदक ब्राजील की 16 वर्षीय रायसा लील ने जीता। 


उधर 10 मीटर एयर राइफल की महिला स्पर्धा में  स्वर्ण जीतने वाली दक्षिण कोरिया की बान ह्यू जिन मात्र 16 वर्ष की हैं और चीन की रजत पदक जीतने वाली हुआंग यूतिंग मात्र 17 वर्ष की। पदक के रंग का फैसला टाई ब्रेक से हुआ। दोनों ने ओलंपिक रिकॉर्ड ब्रेक किया।

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प्रतिभा उम्र की मोहताज कहां होती है।




नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...