पिछले सप्ताह चार पुस्तकें पढ़कर पुस्तकें समाप्त की। नेहा दीक्षित की 'कोई एक सईदा', अरुंधति रॉय की 'मेरी मां गैंगस्टर', रस्किन बॉन्ड की अपनी धुन में' और मार्क टली की किताब 'धीमी वाली फास्ट पैसेंजर'।
नेहा दीक्षित की किताब शानदार है। ये एक नामालूम सी महिला श्रमिक सईदा (बदला नाम) की बायोग्राफी और डॉक्यूमेंट्री है। ये किताब एक अत्यंत साधारण महिला की एक ऐसी असाधारण कहानी कहती है कि ये 1990 के बाद के तीन दशकों के उत्तर भारत के राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज बन जाती है। 1992 के बाबरी मस्जिद ढहने के बाद हुए दंगे और 2020 के दिल्ली दंगों के बीच किस तरह भारतीय समाज और हिन्दू-मुस्लिम संबंध विकसित हुए,उसकी सूक्ष्म और गहरी पड़ताल इस किताब में है। ये निम्न वर्ग की एक महिला के अपने जीवन और अपने परिवार के जीवन को चलाने और सरवाइव करने के लिए किए गए संघर्षों का बयान है। ये विस्थापन की मार्मिक कहानी भी है कि किस तरह परिस्थितियां लोगों को अपनी भूमि से उजड़ कर दूसरी जगह पलायित होने को मज़बूर करती हैं और फिर वे अपने जीवन संघर्षों में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि वापसी की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। विडंबना ये कि अगर कोई वापस लौटना भी चाहे तो खुद उसके परिवार वाले ही उसे असंभव बना देंगे क्योंकि जीवन की खुरदुरी वास्तविकता उन्हें परिजन नहीं प्रतिस्पर्धी बना देती है। इस आर्थिक उदारीकरण के बाद वाले दौर में जीवन यापन किस कदर कठिन हो गया है कि बनारस से दिल्ली पलायन के बाद सईदा अपनी जीविका के लिए अलग अलग पचास से अधिक काम करती है। उसे बार बार अपना काम बदलना होता है। इसमें एक तरफ बनारस के बुनकर समाज की झलक है तो दूसरी और दिल्ली आउटसोर्सिंग से काम कराए जाने की पद्धति के ब्यौरे भी हैं। इसमें अगर दिल्ली के बाहरी इलाकों में औद्योगिक विकास का कुरूप चेहरा है तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्या और बदहाली भी अपनी विद्रूपता के साथ उपस्थित होती है।
'मेरी मां गैंगस्टर' जानी मानी अंग्रेजी लेखिका अरुंधति रॉय की आत्मकथा है। अपनी मां को केंद्र में रखकर लिखी गई इस आत्मकथा में अपनी मां के साथ प्रेम और बेरुखी के बीच झूलते सम्बंधों का बेबाक बयान ही नहीं है, बल्कि भारत के सीरियाई ईसाई समाज और खुद के जीवन निर्मिति की बेबाक और यथार्थ आत्म स्वीकृति भी है।
जहां अरुंधति की आत्मकथा रूक्ष भूमि पर लिखी गई हैं,वहीं अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा 'अपनी धुन में' कोमल भूमि पर लिखी गई है। एंग्लो इंडियन लेखक रस्किन बॉन्ड अपनी तरह के अनूठे और बहुत ही लोकप्रिय लेखक हैं। ये आत्मकथा अपने आप में एक सुरीली धुन है जिसे एक बार सुनना शुरू किया तो इसमें इस कदर डूब जाते हैं कि पता ही नहीं चलता खत्म हो जाती है। इसमें आजादी से पहले और बाद का,दोनों भारत उपस्थित हैं। इसमें जामनगर है। देहरादून है। शिमला है। मसूरी है। दिल्ली है। लंदन और वेल्स भी है। उन्हें पहाड़ से प्रेम है और इसलिए पहाड़ इसमें अनिवार्यतः आते हैं। वे अविवाहित हैं। इसलिए अकेलेपन की एक उदास अनुगूंज उनकी इस जीवन धुन की पृष्ठभूमि में अंतर्निहित है। हां, जितनी मार्मिक और सुंदर कथा अपने जीवन के पूर्वार्ध की कही है,वैसी उत्तरार्ध की नहीं कह पाए। शायद दूर का जीवन अधिक सूक्ष्म से दिखाई देता रहा होगा और निकट भूत ने उन्हें उस तरह से कहने लायक ना लगा हो। निसंदेह एक उम्दा आत्मकथा है।
सभी जानते हैं कि मार्क टली एक प्रख्यात पत्रकार थे। वे भारत में बीबीसी के प्रतिनिधि की हैसियत से आए थे। हालांकि बाद में बहुत समय तक उन्होंने फ्रीलांसिंग भी की। वे लंबे समय तक भारत में रहे और यहां से उनका गहरा लगाव था। उन्होंने भारत को यहाँ के जीवन को बहुत गहराई से समझा था। 'धीमी वाली पैसेंजर' की कहानियां इस बात की पुष्टि करती प्रतीत होती हैं। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश का सामाजिक राजनीतिक जीवन अपने पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित है। ये कहानियां बताती हैं उन्होंने यहां रहकर केवल अपना काम भर नहीं किया,बल्कि इसे जिया भी है।
ये चारों किताबें अलग अलग समय पर खरीदी गईं और अब जाकर एक साथ ही पढ़ी गईं,ये संयोग ही है। लेकिन इन चारों किताबों में समानता ये है कि ये चारों ही किताबें मूलतः अंग्रेजी में लिखी गईं और ये इन चारों के हिंदी अनुवाद हैं। इन चारों ही किताबें का अनुवाद जाने माने छायाकार,पत्रकार, लेखक प्रभात सिंह ने किया है। ये चारों ही शानदार अनुवाद हैं। बहुत ही सहज और सरल। प्रवाहमान। लगता है आप हिंदी में लिखी किताब ही पढ़ रहे हैं। हां आज हिंगलिश के ज़माने में कुछ उर्दू शब्दों का प्रयोग किसी को खल सकता है,क्योंकि हमने उर्दू के सामान्य शब्दों का उपयोग करना भी बंद कर दिया है। लेकिन ये शब्द सही मायने में गद्य के स्वाभाविक प्रवाह को बनाए रखते हैं।
इन किताबों के अनुवाद के लिए प्रभात सर को साधुवाद कहना तो बनता है।
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