Friday, 11 September 2026

 



पिछले सप्ताह चार पुस्तकें पढ़कर पुस्तकें समाप्त की। नेहा दीक्षित की 'कोई एक सईदा', अरुंधति रॉय की 'मेरी मां गैंगस्टर', रस्किन बॉन्ड की अपनी धुन में' और मार्क टली की किताब 'धीमी वाली फास्ट पैसेंजर'।

नेहा दीक्षित की किताब शानदार है। ये एक नामालूम सी महिला श्रमिक सईदा (बदला नाम) की बायोग्राफी और डॉक्यूमेंट्री है। ये किताब एक अत्यंत साधारण महिला की एक ऐसी असाधारण कहानी कहती है कि ये 1990 के बाद के तीन दशकों के उत्तर भारत के राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज बन जाती है। 1992 के बाबरी मस्जिद ढहने के बाद हुए दंगे और 2020 के दिल्ली दंगों के बीच किस तरह भारतीय समाज और  हिन्दू-मुस्लिम संबंध विकसित हुए,उसकी सूक्ष्म और गहरी पड़ताल इस किताब में है। ये निम्न वर्ग की एक महिला के अपने जीवन और अपने परिवार के जीवन को चलाने और सरवाइव करने के लिए किए गए संघर्षों का बयान है। ये विस्थापन की मार्मिक कहानी भी है कि किस तरह परिस्थितियां लोगों को अपनी भूमि से उजड़ कर दूसरी जगह पलायित होने को मज़बूर करती हैं और फिर वे अपने जीवन संघर्षों में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि वापसी की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। विडंबना ये कि अगर कोई वापस लौटना भी चाहे तो खुद उसके परिवार वाले ही उसे असंभव बना देंगे क्योंकि जीवन की खुरदुरी वास्तविकता उन्हें परिजन नहीं प्रतिस्पर्धी बना देती है। इस आर्थिक उदारीकरण के बाद वाले दौर में जीवन यापन किस कदर कठिन हो गया है कि बनारस से दिल्ली पलायन के बाद सईदा अपनी जीविका के लिए अलग अलग पचास से अधिक काम करती है। उसे बार बार अपना काम बदलना होता है। इसमें एक तरफ बनारस के बुनकर समाज की झलक है तो दूसरी और दिल्ली आउटसोर्सिंग से काम कराए जाने की पद्धति के ब्यौरे भी हैं। इसमें अगर दिल्ली के बाहरी इलाकों में औद्योगिक विकास का कुरूप चेहरा है तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्या और बदहाली भी अपनी विद्रूपता के साथ उपस्थित होती है।

'मेरी मां गैंगस्टर' जानी मानी अंग्रेजी लेखिका अरुंधति रॉय की आत्मकथा है। अपनी मां को केंद्र में रखकर लिखी गई इस आत्मकथा में अपनी मां के साथ प्रेम और बेरुखी के बीच झूलते सम्बंधों का बेबाक बयान ही नहीं है, बल्कि भारत के सीरियाई ईसाई समाज और खुद के जीवन निर्मिति की बेबाक और यथार्थ आत्म स्वीकृति भी है।

जहां अरुंधति की आत्मकथा रूक्ष भूमि पर लिखी गई हैं,वहीं अंग्रेजी के प्रसिद्ध  लेखक रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा 'अपनी धुन में' कोमल भूमि पर लिखी गई है। एंग्लो इंडियन लेखक रस्किन बॉन्ड अपनी तरह के अनूठे और बहुत ही लोकप्रिय लेखक हैं। ये आत्मकथा अपने आप में एक सुरीली धुन है जिसे एक बार सुनना शुरू किया तो इसमें इस कदर डूब जाते हैं कि पता ही नहीं चलता खत्म हो जाती है। इसमें आजादी से पहले और बाद का,दोनों भारत उपस्थित हैं। इसमें जामनगर है। देहरादून है। शिमला है। मसूरी है। दिल्ली है। लंदन और वेल्स भी है। उन्हें पहाड़ से प्रेम है और इसलिए पहाड़ इसमें अनिवार्यतः आते हैं। वे अविवाहित हैं। इसलिए अकेलेपन की एक उदास अनुगूंज उनकी इस जीवन धुन की पृष्ठभूमि में अंतर्निहित है। हां, जितनी मार्मिक और सुंदर कथा अपने जीवन के पूर्वार्ध की कही है,वैसी उत्तरार्ध की नहीं कह पाए। शायद दूर का जीवन अधिक सूक्ष्म से दिखाई देता रहा होगा और निकट भूत ने उन्हें उस तरह से कहने लायक ना लगा हो। निसंदेह एक उम्दा आत्मकथा है।

सभी जानते हैं कि मार्क टली एक प्रख्यात पत्रकार थे। वे भारत में बीबीसी के प्रतिनिधि की हैसियत से आए थे। हालांकि बाद में बहुत समय तक उन्होंने फ्रीलांसिंग भी की। वे लंबे समय तक भारत में रहे और यहां से उनका गहरा लगाव था। उन्होंने भारत को   यहाँ के जीवन को बहुत गहराई से समझा था। 'धीमी वाली पैसेंजर' की कहानियां इस बात की पुष्टि करती प्रतीत होती हैं। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश  का सामाजिक राजनीतिक जीवन अपने पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित है। ये कहानियां बताती हैं उन्होंने यहां रहकर केवल अपना काम भर नहीं किया,बल्कि इसे जिया भी है। 

ये चारों किताबें अलग अलग समय पर खरीदी गईं और अब जाकर एक साथ ही पढ़ी गईं,ये संयोग ही है।  लेकिन इन चारों किताबों में समानता ये है कि ये चारों ही किताबें मूलतः अंग्रेजी में लिखी गईं और ये इन चारों के हिंदी अनुवाद हैं। इन चारों ही किताबें का अनुवाद जाने माने छायाकार,पत्रकार, लेखक प्रभात सिंह ने किया है। ये चारों ही शानदार अनुवाद हैं। बहुत ही सहज और सरल। प्रवाहमान। लगता है आप हिंदी में लिखी किताब ही पढ़ रहे हैं। हां आज हिंगलिश के ज़माने में कुछ उर्दू शब्दों का प्रयोग किसी को खल सकता है,क्योंकि हमने उर्दू के सामान्य शब्दों का उपयोग करना भी बंद कर दिया है। लेकिन ये शब्द सही मायने में गद्य के स्वाभाविक प्रवाह को बनाए रखते हैं।

इन किताबों के अनुवाद के लिए प्रभात सर को साधुवाद कहना तो बनता है।


Monday, 7 September 2026





जाने माने फुटबॉल कोच पेप गार्डियोला ने एक बार मेस्सी के बारे में कहा था “उनके बारे में मत लिखो। उनका वर्णन करने की कोशिश मत करो। उन्हें खेलते हुए देखो।”

कुछ खिलाड़ी खेल मैदान में खेल नहीं रहे होते हैं,वे एक जादू की निर्मिति कर रहे होते हैं और दर्शक उसके सम्मोहन में होते हैं। उन खिलाड़ियों की अपने विरोधियों से नहीं बल्कि समय से मुठभेड़ हो रही होती है। शमशेर बहादुर सिंह की पंक्तियां हैं "काल, तुझसे होड़ है मेरी। अपराजित तू— तुझमें अपराजित मैं वास करूँ। "

कुछ खिलाड़ियों को मैदान में खेलते हुए देखकर लगता है मानो ये पंक्तियां उनके लिए ही लिखी गई हों।
चालीस की उम्र में लेब्रान जेम्स जिस तरह की बास्केटबॉल खेल रहे हैं, लगता है, वे समय के विपरीत दिशा में दौड़ रहे हों। वे समय के सीने पर सफलता के नए मानक गढ़ रहे होते हैं। नोवाक जोकोविक भी लगभग इतनी ही उम्र में उस को चुनौती देते हुए सफलताओं के नए पैमाने तय कर रहे होते हैं। और उन्तालीस साल के मेस्सी का क्या। मेस्सी ने इस साल के फीफा विश्व कप में  दिखाया कि मानवीय क्षमता की सीमा को कहां तक विस्तारित किया जा सकता है।

भौतिक रूप से हर किसी को समय से पराजित हो जाना होता है। चाहे लेब्रान हों,नोवाक हों या मेस्सी हों। उन्हें समय के सामने नतमस्तक हो जाना है। मेस्सी ने भी समय के सामने सिर झुकाया और राष्ट्रीय टीम को विदा कहा। लेकिन बात इतनी भर नहीं है। काल से होड़ के इन इक्कीस सालों में वे काल के कपाल पर जीत की कहानी लिख चुके होते हैं। अपनी प्रतिभा और क्षमता से सफलता की उन अनंत ऊंचाइयों को नाप चुके होते हैं, जहां समय के हाथ नहीं पहुंचने वाले हैं। वे प्रसिद्धि की इबारत इतनी गाढ़ी रोशनाई से लिख चुके होते हैं कि इसे मिटा पाना अब किसी के बस की बात कहां। अपराजित वे काल की आत्मा में समा चुके होते हैं। 

अब जब तक फुटबॉल का खेल है,तब तक मेस्सी हैं। उनका नाम है। उनके खेल के जादू का सम्मोहन है।

आप इसे नियति कहिए या काल या फिर समय,उनकी बार बार उससे मुठभेड़ होती है। वे बार-बार उदास होते हैं। पानी उनकी आंखों में तैरता है। उनके कांधे झुकते हैं। पर वे हारते नहीं है। वे बार बार नियति से द्वंद्व में लौटते हैं। सफलता के नए प्रतिमान गढ़ते हैं। और अंततः एक महानायक की छवि के साथ अपने फुटबॉल खेल का ही नहीं बल्कि काल के साथ आंख मिचौली के खेल का भी समापन करते हैं।

मेस्सी की उम्र उस समय लगभग दस वर्ष रही होगी। वे तब तक ग्रैंडोली क्लब से नेवेल्स ओल्ड बॉयज क्लब में शामिल हो चुके थे। वे अपनी प्रतिभा के वहां झंडे गाड़ रहे थे और सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों में शुमार हो गए थे कि लियो को अपनी एक बीमारी का पता चलता है-ग्रोथ हार्मोन्स डेफिशिएंसी का। खर्चा बड़ा था जिसे ना परिवार उठा सकता था और ना क्लब। लगा एक शानदार प्रतिभा का अंत है ये।

ऐसे में बार्सीलोना के खेल निदेशक कार्ल रिक्सेस ने लियो की प्रतिभा को पहचाना,उसके साथ अनुबंध किया और उसके इलाज का प्रबंध भी। परिवार यूरोप आ गया। ये वर्ष 2000 था। बार्सिलोना अकादमी ने उस बालक की नैसर्गिक प्रतिभा को निखार दिया। और तब वर्ष 2005  में नीदरलैंड में आयोजित फीफा अंडर-20 विश्व कप जीतने में मेस्सी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने टूर्नामेंट में सबसे अधिक छह गोल किए जिसमें नाइजीरिया के खिलाफ 2-1 से फाइनल में जीत में किए गए दोनों गोल भी शामिल थे। इसके लिए उन्हें गोल्डन बूट और गोल्डन बॉल से सम्मानित किया गया।

लेकिन काल से द्वंद्व बना रहा। कुछ समय बाद ही 17 अगस्त 2005 को सीनियर टीम में उनका पदार्पण बेहद खराब रहा। हंगरी के खिलाफ दोस्ताना मैच में वे 63वें मिनट में स्थानापन्न खिलाड़ी के रूप में अर्जेंटीना के लिए मैदान में उतरे। एक मिनट से भी कम समय में उन्हें सीधा लाल कार्ड दिखाया गया,जब उन्होंने अपना हाथ घुमाया और उनकी कोहनी फुल-बैक विल्मोस वैन्ज़ाक से टकरा गई।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद खराब और कठिन शुरुआत के बावजूद, अंततः मेस्सी सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में से एक बन गए। और बहुत सारे लोगों के लिए महानतम।

उनके 21 साल के अंतरराष्ट्रीय करियर के दो मुख्तलिफ हिस्से हैं। पहला, 2005 से 2016 तक। इसमें वे और बार्सिलोना क्लब एक दूसरे का पर्याय बन जाते हैं। इस समय वे विश्व फुटबॉल परिदृश्य पर छा जाते हैं और उनकी गणना फुटबॉल इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में की जाने लगती है। अब एक तरफ मेस्सी और रोनाल्डो के बीच प्रतिद्वंदिता स्थापित होती है,तो दूसरी तरफ 'दूसरे माराडोना' के रूप में अपने पूर्वज फुटबॉलर की विरासत के वाहक बन जाते हैं। माराडोना कहते थे कि 'उन्हें मेस्सी के शरीर में अपनी आत्मा का आभास होता है।' 

इस समय में उन्होंने बार्सिलोना के लिए और अपने लिए कोई ऐसा खिताब नहीं था,जो ना जीता हो। उन्होंने ला लीगा के आठ,यूईएफए चैंपियंस लीग के चार,कोपा डेल रे के चार,फीफा क्लब वर्ल्ड कप के तीन खिताब जीते। इतना ही नहीं,एक ही सीजन में ला लीगा, कोपा डेल रे और चैंपियंस लीग तीनों जीतकर दो बार 'ट्रेबल' हासिल किया। इस समय में पांच बार 'बैलोन डी'ओर' पुरस्कार और तीन बार यूरोपियन गोल्डन शू अवार्ड जीते। 2012 में एक कैलेंडर वर्ष में  सर्वाधिक गोल 91 गोल का विश्व रिकॉर्ड भी मेस्सी ने हासिल किया।

लेकिन जिस समय वे बार्सिलोना के लिए खिताबों का अम्बार लगा रहे थे,उस समय वे अर्जेंटीना को कोई भी खिताब नहीं दिला सके। इस दौरान एकमात्र उपलब्धि 2008 में ओलंपिक गोल्ड रहा।  

2016 में एक बार फिर वे नियति के समक्ष नतमस्तक हुए। अपने 29वें जन्मदिन के ठीक दो दिन बाद कोपा अमेरिका कप के फाइनल में चिली के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में अर्जेंटीना की हार गया। स्वयं मेस्सी चूक गए थे। हार के बाद मेस्सी की आँखें नम थीं और वे कह रहे थे 'मेरे लिए राष्ट्रीय टीम का सफर खत्म हो गया है। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। चैंपियन न बन पाना दुखद है।'

ये निराशा स्वाभाविक थी। अर्जेंटीना 2014 विश्व कप के फाइनल में हार चुका था। साथ ही 2007, 2015 और अब 2016 के कोपा अमेरिका कप फाइनल में भी हार गया था। एक खिलाड़ी जो दुनिया का महानतम खिलाड़ी माना जाता हो,वो उन मौकों पर असफल रहा जो उसके लिए सबसे ज्यादा मायने रखते थे।

2016 में राष्ट्रीय टीम से विदा के अपने फैसले को अंततः उन्हें बदलना पड़ा। आखिर उन्हें अपने और अपने देश के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियां पानी बाकी जो थी। 

अब उनके खेल करियर का दूसरा हिस्सा शुरू होता है। 2016 से 2026 तक का। वे बार्सिलोना से अलग होते हैं। ये उनके लिए सबसे उदास कर देने वाली बात थी। और उन के लिए भी जिन्हें मेस्सी को नीली लाल धारियों वाली टी शर्ट से अलगाना मुश्किल था। उसके बाद वे सेंट जर्मेन पेरिस और इंटर मियामी के लिए खेले जरूर। पर उस तरह मन नहीं रमा पाए जैसे बार्सिलोना में रमा था। उनके सामने अब विकल्प के तौर पर राष्ट्रीय टीम थी। उनके पास सब कुछ था सिवाय राष्ट्रीय टीम के साथ कोई बड़े खिताब के। ये उनके खेल का अधूरापन था जिसे उन्हें मुकम्मल करना था। और कमाल है कि वे ऐसा कर पाते हैं। अब वे क्लब से कहीं ज्यादा राष्ट्रीय उपलब्धियों को हासिल करते हैं। वे उपलब्धियां जो उनकी सबसे बड़ी चाहना थीं और जो उनसे लगातार दूर भाग रही थीं।


मेस्सी की राष्ट्रीय टीम में वापसी से अर्जेंटीना टीम की  किस्मत रातों रात बदल गई हो,ऐसा नहीं था। 2018 के विश्व कप में अर्जेंटीना एक बार फिर राउंड ऑफ़ 16 से बाहर हो गई और 2019 के कोपा अमेरिका कप में उसे तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। लेकिन उसके बाद अर्जेंटीना और मेस्सी ने 2021 और 2024 में दो बार कोपा अमेरिका कप जीता। और फिर कतर में 2022 का फीफा विश्व कप जीता। हर फुटबॉलर का सबसे बड़ा सपना। मेस्सी का अपना खुद का अधूरा सपना। इतना ही नहीं,फिर 39 साल की उम्र में अमेरिका में आयोजित फीफा विश्व कप में अर्जेंटीना को अकेले दम पर लगातार दूसरी बार फाइनल तक पहुंचाया। उनके प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि उम्र के साथ मेस्सी की गोल करने की क्षमता में कोई कमी नहीं आई है। टूर्नामेंट में उनके आठ गोल केवल म्बाप्पे से कम थे। साथ ही मेस्सी ने चार असिस्ट भी किए।

और तब नियति को मेस्सी ने एक बार फिर अपने रास्ते में खड़ा पाया। जिस शानदार विदाई की वे और उनके चाहने वाले उमीद कर रहे थे,उससे वे वंचित रह गए। अर्जेंटीना फाइनल में स्पेन से हार गई। एक बार फिर मेस्सी की आँखें नम थीं। दो दिन बाद समय के समक्ष वे नतमस्तक हुए। नियति के सम्मान में उन्होंने अपने हाथों से तीन पन्नों का एक समर्पण पत्र लिखा। लेकिन उस समय तक नियति के कपाल पर अपना नाम हमेशा हमेशा के लिए अंकित कर चुके थे। स्वर्णाक्षरों में।

आखिर वो क्या चीज थी जो मेस्सी को मेस्सी बनाती है। वे एक नैसर्गिक खिलाड़ी थे जिनमें  प्रतिभा जन्मजात 'इन बिल्ट' थी। उसे उन्होंने अर्जित नहीं किया था। वे छोटे कद के थे। पांच फुट सात इंच के। कद काठी में भी वैसे मजबूत नहीं थे जैसे कि आज के खेल में एक खिलाड़ी को होना होता है। जैसे माराडोना थे। रोनाल्डो हैं। अर्लिंग हॉलैंड हैं। एमबापे हैं। दरअसल वे आधुनिक पावर खेल को अपनी कलात्मकता से स्थानापन्न कर देते हैं। और अपनी गति से भी। वे अपने पैरों से गेंद को ठीक उसी तरह से बरतते हैं जैसे ध्यान चंद अपनी हॉकी से गेंद को। वे खूबसूरत ड्रिबलिंग करते। माराडोना की तरह। उनकी विरासत को और आगे ले जाते हुए। गेंद उनके पैरों से ऐसे चिपकी रहती मानो वो उनसे विछोह सह ही नहीं सकती। उनमें कम लंबे होने के कारण अतिरिक्त चपलता थी। वे एक ऐसे खिलाड़ी थे जो गेंद ड्रिबल करते हुए बिना गेंद के दौड़ने से अधिक तेजी से दौड़ते थे। 

वे गेंद को बहुत कोमलता से बरतते। उनके खेल में एक खास तरह की कोमलता थी। उनके खेल में वो निर्ममता नदारद थी,जैसी माराडोना में थी। रोनाल्डो में है। या फिर एम्बाप्पे और हॉलैंड में है। 

 उनके खेल में सहजता थी। सरलता थी। कलात्मकता थी। गति थी। कमाल का नियंत्रण था। अगर कुछ ना था तो कठोरता नहीं थी। निर्ममता नहीं थी। ताकत का गर्वीला एहसास नहीं था। हां,एक मानवीय अनुभूति का गहरा अहसास था। वे दिल से खेलते लगते थे। उनके खेल में एक अद्भुत लय थी। वे गोल करते समय अपनी कला से विज्ञान के नियमों को धता बताते लगते।

वे मैदान में एक साथ कई भूमिका निभाते। वे एक शानदार फॉरवर्ड तो थे ही जो असंभव से गोल करते। लेकिन वे एक बेहतरीन प्लेमेकर भी थे। एक शानदार टीम प्लेयर जो अपने साथियों को तीव्र गति से,सही समय पर,अचूकता के साथ गेंद पहुंचाते कि विपक्षी खिलाड़ी हैरान-परेशान, भ्रमित और असहाय से रह जाते। उनमें एक विशेष गुण ये था कि वे विपक्षी रक्षण की उन दरारों को पहली नजर में ही भांप लेते थे जो बाकी खिलाड़ी सोच भी नहीं सकते थे। बार्सिलोना में पैप गार्डियोला ने उनके लिए एक साथ कई भूमिकाएं तय की। वे एक ही समय में स्ट्राइकर, विंगर और फैसिलिटेटर की तरह खेलते। ये फुटबॉल में नया प्रयोग था। 

उनके खेल के ये गुण उनके व्यक्तित्व का अविभाज्य हिस्सा हैं। वे एक शर्मीले और सहज व सरल व्यक्ति थे। मेस्सी की छवि उनके दिल, उनकी ईमानदारी और उनकी विनम्रता से बनती है। एक पत्रकार ने एक बार लिखा था कि 'रोनाल्डो अपनी ईमानदारी में इतने बुरे हैं कि लोग उनका मजाक उड़ाते हैं, जबकि मेस्सी अपनी अच्छाई में इतने अच्छे हैं कि लोग उनका मजाक उड़ाते हैं।' वे एक इंसान के रूप में उनका व्यक्तित्व शानदार था। 

उनके भीतर का एक उम्दा इंसान और उनके भीतर का एक अद्भुत खिलाड़ी दोनों मिलकर मेस्सी की एक ऐसी खूबसूरत छवि बनाते हैं जो लाखों करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में हमेशा के लिए चस्पां हो गई है। अब वे खेलें या ना खेलें,ये छवि अमिट है।

उनके संन्यास पर इंग्लैंड के महान फुटबॉलर गैरी लिनेकर से खूबसुरत और क्या ही कहा जा सकता है कि "फुटबॉल आगे बढ़ता रहेगा, जैसा कि हमेशा होता है, लेकिन अर्जेंटीना और दुनिया को आपने जो यादें दी हैं, वे कभी नहीं मिटेंगी। धन्यवाद, लियो।"

हां, 

धन्यवाद लियो।

विदा लियो।

Thursday, 30 July 2026

ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल 2026

एक : फीके फीके से खेल

इस बार के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ खेल बहुत फीके फीके से हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया द्वारा मेजबानी  से पीछे हट जाने के बाद  किसी तरह से ये खेल बहुत कम समय और बजट में ग्लासगो ने आयोजित किए हैं। 2022 में बर्मिंघम में आयोजित खेलों के मुकाबले लगभग आधी स्पर्धाएं और खिलाड़ी भाग ले रहे हैं।

फिलहाल अभी तक भारत की लड़कियां और लड़कों ने 5-5 पदक जीते हैं। लेकिन लड़कियां दो स्वर्ण,एक रजत और दो कांस्य पदक जीतकर लड़कों को पीछे धकेलकर पहले स्थान पर बनी हुई हैं।

और हां लड़कियों के पदकों की चमक के बीच भारतीय उम्मीदों का बोझ उठाए दो भारोत्तोलक मीराबाई चानू और ज्ञानेश्वरी यादव की तिरंगे रंगों की हेयरक्लिप और हेयरबैंड भी ना केवल दर्शकों के दिलों को छू रहे हैं बल्कि आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

दो : गुमनामी से शोहरत तक की लंबी दौड़ 


ज़िंदगी की जद्दोजहद की दौड़ें अक्सर गुमनामी के अंधेरों में दम तोड़ देती हैं। लेकिन वैसी ही कोई एक दौड़ शोहरत और बलंदी की रोशन दुनिया अता कर जाती है। अलीगढ़ जिले के सिरसा गांव के गुलबीर सिंह से बेहतर इसे और कौन जान सकता है।

गुलबीर जब अपने गांव की पगडंडियों पर सेना में सिपाही की भर्ती के लिए दौड़ का अभ्यास कर रहे थे,तो वो घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने की जद्दोजहद भर थी। लेकिन 2018 में 18 वर्ष की उम्र में जब खेल कोटे में वे ग्रेनेडियर रेजिमेंट में भर्ती हो रहे थे,तो एथलेटिक्स ट्रैक उनकी प्रतीक्षा में खड़ा था और शोहरत उनकी आगवानी कर रही थी।

अरुणाचल में अंतर यूनिट स्पर्धाओं के दौरान आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट पुणे के कोच यूनुस खान ने उनकी प्रतिभा को लक्षित किया और उन्हें इंस्टीट्यूट ले आए। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

हांगजू एशियाई खेल 2023 में 10 हज़ार मीटर का कांस्य पदक जीता। उसके बाद वे अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग स्थित हाई परफॉर्मेंस सेंटर में हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग लेने गए। वहां से जब वे भारत वापस आए,तो एक नए अवतार में लौटे। अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने भारत के कई दशकों पुराने 3,000 मीटर, 5,000 मीटर और 10,000 मीटर के राष्ट्रीय  रिकॉर्ड्स को एक-एक करके तोड़ दिया।

उसके बाद आए ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल। यहां वे अपने शानदार प्रदर्शन से जगी उम्मीदों का बोझ साथ लेकर आए। लेकिन वे उस बोझ तले दबे नहीं,उससे और ज्यादा निखरे। उन्होंने यहां 10 हजार मीटर दौड़ का रजत पदक जीता। समय था 27:49.78। ये रजत भी एक बड़ी उपलब्धि की तरह आया। इसलिए कि ये इस प्रतियोगिता की इस स्पर्धा का 90 साल में पुरुषों का पहला भारतीय पदक था। बड़ी बात ये कि ये कारनामा अफ्रीकी धावकों के बीच किया था। इस स्पर्धा में वे डेनियल एबेनयो जैसे कई नामचीन अफ्रीकी धावकों के मुकाबिल थे। कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में 1986 के बाद ये पहला अवसर था कि इस स्पर्धा में कोई अफ्रीकी धावक पोडियम पर नहीं खड़ा था।  

वे मात्र .85 सेकेंड के अंतर से ऑस्ट्रेलिया के धावक से स्वर्ण पदक चूक गए। आज उनका रजत पदक एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन आगे आने वाले समय में रजत की खुशी से ज्यादा स्वर्ण चूक जाने की टीस सालती रहेगी।

ग्लासगो में वे उम्मीदों का बोझ लेकर आए थे। लेकिन वे उसके तले दबे नहीं,उससे और ज्यादा निखरे। उन्होंने यहां 10 हजार मीटर दौड़ का रजत पदक जीता। ये इस प्रतियोगिता की इस स्पर्धा का 90 साल में पहला भारतीय पदक था। सबसे बड़ी उपलब्धि ये कारनामा अफ्रीकी धावकों के बीच किया था। इस स्पर्धा में वे डेनियल एबेनयो जैसे कई नामचीन अफ्रीकी धावकों के मुकाबिल थे। कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में 1986 के बाद ये पहला अवसर था कि कोई अफ्रीकी धावक पोडियम पर नहीं खड़ा था। 

वे मात्र .85 सेकेंड के अंतर से ऑस्ट्रेलिया के धावक के. रॉबिन्सन से स्वर्ण पदक चूक गए। आज उनका रजत पदक एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन आगे आने वाले समय में रजत की खुशी से ज्यादा स्वर्ण चूक जाने की टीस सालती रहेगी

तीन : ऊंचाई का नया नाम सर्वेश अनिल कुशारे



भारतीय एथलीट अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता की जो रोमानी कहानियां लिखते हैं,वे अपनी निर्मिति में उतनी रोमानी होती नहीं हैं। वे अक्सर ग्रामीण पृष्ठभूमि,अभावों,संघर्षों,कठिनाइयों और खेल प्रशासन की निष्क्रियता,उदासीनता और बेईमानी के खुरदुरे धरातल पर कठोर परिश्रम,लगन,धैर्य और दृढ़ इच्छाशक्ति जैसी क्रियाओं से लिखी जाती हैं

सर्वेश अनिल कुशारे एक ऐसे ही एथलीट हैं। वे नासिक के देवरगांव में एक प्याज की खेती करने वाले साधारण किसान के घर जन्म लेते हैं,कृषि अपशिष्ट के लैंडिंग पिट बनाकर ऊंची उड़ान का अभ्यास करते हैं और विश्व के सर्वश्रेष्ठ लैंडिंग पिटों पर अपनी प्रतिभा की उड़ान से सबको चमत्कृत कर देते हैं।

दो वर्ष की बेटी के 31 वर्षीय पिता सर्वेश इस समय शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। 27 जून को अंतर राज्य एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 2.31 मीटर ऊंची उड़ान के साथ आठ साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड ही नहीं बनाते हैं,बल्कि 2.30 मीटर के मनोवैज्ञानिक बैरियर को भी पार कर जाते हैं। फिर 11 जुलाई को 2.26 मीटर की छलांग के साथ मोनाको में आयोजित  डायमंड लीग में अपने पहले ही प्रतिभाग में कांस्य पदक जीतकर पहले भारतीय हाई जम्पर बनकर इतिहास लिखते हैं। उल्लेखनीय ये है कि कुशारे ने यहां टोक्यो ओलंपिक के संयुक्त चैंपियन जियानमार्को टैम्बेरी और मुताज़ बरशिम जैसे सितारों को पीछे छोड़ देते हैं।

और फिर ग्लासगो में 28 जुलाई को 2.25 मीटर की छलांग के साथ अपना पहला राष्ट्रमंडल खेलों का रजत पदक जीतते हैं। ये उनका दुर्भाग्य कि वे काउंटबैक के आधार पर स्वर्ण पदक चूक जाते हैं। स्वर्ण पदक विजेता जमैका के रोमेन बैकफोर्ड भी कुशारे की तरह 2.28 मीटर की ऊंचाई पार करने में असफल रहते हैं, लेकिन 2.25 की ऊंचाई पहले प्रयास में पार कर जाते हैं और कुशारे अपने तीसरे प्रयास में।

31 साल की उम्र में जब एथलीट रिटायरमेंट ले रहे होते हैं, उस समय कुशारे सफलता के नए मानदंड तय कर रहे हैं। गांव में कृषि अपशिष्ट से बने लैंडिंग पिट से अंतरराष्ट्रीय मंच पर इतिहास रचने की ये यात्रा जितनी रोमानी है उतनी ही प्रेरणादायी भी।




Thursday, 23 July 2026

फुटबॉल नर्सरी मिनर्वा अकादमी और रंजीत बजाज

 


एक बड़ी चकाचौंध में छोटी सी कोई गहमागहमी अनदेखी रह जाती है। बड़े इवेंट के बीच छोटा सा इवेंट अनचिह्ना रह जाता है। बड़े बड़े संघर्षों के बीच एक छोटी सी लड़ाई बिला जाती है। बड़े बड़े सपनों के बीच उम्मीद की एक छोटी सी किरण अनचाही सी रह जाती है। जैसे बड़े लोगों के बीच बच्चे उपेक्षित रह जाते हैं। कि बच्चों की प्रतिभा के घर्षण से पैदा हुई कोई चिंगारी आँखो का नूर बनने से रह जाती है।

जिस समय उत्तरी अमेरिका के 16 शहरों में फुटबॉल के सितारे अपनी चमक बिखेर रहे थे,ठीक उसी समय यूरोप के हेलसिंकी में भारत की किशोर प्रतिभाएं फुटबॉल के ही खेल में अपनी प्रतिभा से एक ऐसा स्पार्क' एक चिंगारी पैदा कर रहे थे,जिसे देश में भले ही व्यापक रूप से लक्षित ना किया जा सका,मगर जिसने उम्मीद की लौ जला दिभाई। अगर इस स्पार्क को भारतीय खेल सिस्टम बचा कर रख सका, तो इसके बड़ी आग में तब्दील हो जाने और देश की प्रतिष्ठा को रोशन किए जाने की उम्मीद तो बनती ही है। एक बड़ी उम्मीद। 

हते हैं कई बार जो काम बड़े नहीं कर पाते वो अक्सर छोटे बच्चे कर दिखाते हैं। जिस समय भारतीय फुटबॉल टीम की प्रतियोगिता जीतना तो दूर की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति तक दर्ज नहीं करा पा रही है(इस समय सीनियर भारतीय मेंस टीम की फीफा रैंकिंग 136वीं है),उस समय हमारे छोटे बच्चे दुनिया के प्रतिष्ठित टूर्नामेंट जीत रहे हैं। 




बीती 11 जुलाई को फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में यूरोप के तीसरे सबसे बड़े और प्रतिष्ठित युवा फुटबॉल प्रतियोगिता 'हेलसिंकी कप' को चंडीगढ़ स्थित मिनर्वा क्लब की अंडर 12 टीम फिनलैंड की सबसे सफल और दो बार की मौजूदा चैंपियन टीम एच जे के हेलसिंकी टीम को हराकर जीत रही थी। पिछली बार ये प्रतियोगिता वो जीतते-जीतते रह गई थी। वो फाइनल में इसी मेजबान टीम से हार गई थी। 

स भारतीय टीम ने पूरी प्रतियोगिता में शानदार खेल दिखाया। उसने  भाग लेने वाली 125 टीमों में सबसे ज्यादा 50+ गोल किए। मिनर्वा अकादमी की टीम ने प्री क्वार्टर फाइनलमें 'हेलसिंघिन पोनिसटस' को रिकॉर्ड 19–0 से करारी हराया। भारतीय टीम यहीं नहीं रुकी। क्वार्टर फाइनल में एचजेके को 6–0 और सेमीफाइनल में कप्यलान पल्लो को 9–0 से हराया। वांगशेम कोन्याक और टी. किपगेन  जैसे युवा खिलाड़ियों ने शानदार खेल दिखाया।

सके तुरंत बाद 12 से 18 जुलाई तक स्वीडन के गोथनबर्ग शहर में आयोजित 'गोथिया कप' भी लगातार दूसरी बार जीत रहे थे। जिस दिन न्यूजर्सी में स्पेन विश्व कप जीत रहा था उससे एक दिन पहले भारत के ये बच्चे ब्राजील के आरएस स्पोर्ट्स क्लब की टीम को 2-1 से हराकर अपना यूरोपीय डबल पूरा कर रहे थे। टीम ने इस प्रतियोगिता में भी शानदार खेल दिखाया और कुल नौ मैचों में 87 गोल किए।


भारतीय टीम की इस सफलता के पीछे एक शख़्स खड़ा है, और वो है रंजीत बजाज। एक ऐसा उद्यमी, एक ऐसा खेल मैनेजर, एक ऐसा खेल प्रशासक जो भारतीय फुटबॉल खेल प्रबंधन को,उसकी खामियों को चुनौती देने का साहस रखता है। उसे ठीक करने का खम ठोंकता है। और खुद एक उदाहरण बन कर सामने आता है।

भारतीय फुटबॉल खेल प्रबंधन में उन्हें एक 'रिबेल', एक 'विद्रोही'  के रूप में देखा और जाना जाता है। वे भारतीय फुटबॉल महासंघ की गलत नीतियों,खराब प्रबंधन और दरकते बुनियादी ढांचे के आलोचक रहे हैं। उनका मानना रहा है कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है,बल्कि सही विजन और एक सही सिस्टम की कमी है। भारत में फुटबॉल के विकास के लिए उनका मूलमंत्र है ग्रासरूट स्तर पर मेहनत की जाए। 

पने विजन को हकीकत में बदलने के लिए ही उन्होंने चण्डीगढ़ में मिनर्वा अकादमी की स्थापना की। इसके माध्यम से ही वे देशभर के गांवों और कस्बों से प्रतिभाओं को लक्षित कर उन्हें एक मंच प्रदान कर रहे हैं और तराशकर वैश्विक एक्सपोजर देने का काम कर रहे हैं। उनकी अकादमी में बहुत सारे बच्चे पूर्वोत्तर राज्यों से हैं। उनकी अकादमी ने 250 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी देश को दिए हैं। 2017 में भारत में आयोजित अंडर 17 फीफा विश्व कप में शामिल भारतीय टीम के नौ खिलाड़ी इसी अकादमी से थे। मिनर्वा एकेडमी की अंडर-15 टीम स्पेन के एमआईसी कप में लिवरपूल एफसी की अंडर-15 टीम को 6-0 से हरा चुकी है। मिनर्वा एकेडमी की अंडर 14 टीम ने अपराजित रहते हुए यूरोप के तीन प्रतिष्ठित खिताब—गोथिया कप, डाना कप और नॉर्वे कप जीतकर ट्रेबल पूरा किया है। और इसी साल अंडर 12 टीम ने हेलसिंकी और गोथिया कप जीतकर डबल पूरा किया।

वे फुटबॉल को लेकर इस हद तक जुनूनी हैं कि जब उनकी टीम को यूरोपीय दौरे के लिए कोई स्पॉन्सरशिप नहीं मिली तो व्यक्तिगत रूप से ऋण लेकर टीमों का दौरा सुनिश्चित किया।

 वे देश के हर ज़िले में अकादमी खोले जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनका सपना और उनका लक्ष्य भारत को 2034 फीफा विश्व कप के लिए क्वालीफाई कराना है। वे निरंतर युवा खिलाड़ियों का एक बड़ा पूल तैयार करने और आधुनिक, विज्ञान-आधारित प्रशिक्षण को लागू करने में व्यस्त हैं।

एक जूनून का नाम है रंजीत बजाज और उसका परिणाम है मिनर्वा अकादमी। बस  देखना है अपनी भीतर की ये आग वे कब तक बचाए रखते हैं।



Monday, 20 July 2026

फीफा विश्व कप डायरी 27: फ़ाइनल

 



फाइनल मैच की पूर्व संध्या पर आयोजित एक विशेष प्रेस कार्यक्रम में स्पेन और अर्जेंटीना के कोच और कप्तानों के अलावा खेल शख्सियतें भी मंच पर थीं। उनमें से एनएफएल के दिग्गज टॉम ब्रैडी और एनबीए के दिग्गज खिलाड़ी केविन ड्यूरेंट के अलावा महानतम टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच भी थे। वे मेस्सी से सवाल पूछ रहे थे, ' इतने बड़े फाइनल से पहले के प्रेशर को वे कैसे संभालते हैं।'

दरअसल ये समस्या मंच साझा कर रहे अपने अपने खेल के दो महानतम खिलाड़ियों की साझा समस्या थी। वे दोनों हो गोट को दर्जा पा चुके हैं और अमरत्व को पा लेने की चाह में डूबे हैं। वे दोनों 39 बसंत पार 40वें साल में हैं। पर हार नहीं मान रहे हैं। वे खेल नहीं छोड़ रहे हैं और खेल उन्हें। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे   शानदार खेल दिखा रहे हैं।

अगर मेस्सी लगातार दो विश्व कप जीतकर अमर हो जाना चाहते थे, तो नोवाक अपना 25 वा ग्रैंड स्लैम जीतकर। नोवाक ने जनवरी 23 में अपना 24 वां ग्रैंड स्लैम जीता था। उसके बाद से वे ग्रैंड स्लैम के दो फाइनल और छह सेमीफाइनल हार चुके हैं। वे खिताब के करीब आते हैं और चूक जाते हैं। उधर मेस्सी भी अपने दूसरे खिताब से एक कदम की दूरी से चूक जाते हैं। दोनों खेलों के इतिहास में अमर होते-होते रह जाते हैं। ये विधि का विधान जो ठहरा। अमरत्व देवताओं का विशेषाधिकार है। माणुस की देवता बनने की चाह कहाँ पूरी होती है। मेस्सी और नोवाक अपनी समस्त मानवीय कमजोरियों के साथ सामान्य माणुस ही ठहरे। 

रविवार की शाम को अमेरिका के न्यूजर्सी में खेले गए फीफा विश्व कप फुटबॉल के फाइनल को जीतकर अर्जेंटीना की टीम मेस्सी की विश्व कप से विदाई को अविस्मरणीय बना देना चाहती थी। पर ऐसा हो ना सका। ये एक बेहद कठिन मुकाबला था। मैच 120 मिनट तक गया और एक गोल हुआ। तीसरा स्थान निर्धारित करने वाला फ्रांस और इंग्लैंड का मैच मनोरंजन से भरपूर था, जिसमें 10 गोल हुए। ये फुटबॉल का टी ट्वेंटी मैच था। जबकि फाइनल तनाव से भरा लेकिन कुछ हद तक नीरस मैच था। फुटबॉल का टेस्ट मैच।

ये फाइनल मैच दो महाद्वीप की फुटबॉल और उसकी श्रेष्ठता का द्वंद्व  भर नहीं था,बल्कि रक्षण और आक्रमण के बीच का द्वंद्व भी था। एक तरफ कोपा कप विजेता अर्जेंटीना का आक्रमण था जिसने फाइनल से पूर्व 19 गोल किए थे,तो दूसरी तरफ यूरो चैंपियन का रक्षण था जिसने अब तक केवल एक गोल खाया था। एक तरफ संयमित और अनुशासित टीम वर्क था, तो दूसरी तरफ कुछ उच्छृंखल और वैयक्तिक प्रतिभा और पराक्रम का उपक्रम था। ये एक बीती जाती पीढ़ी और नवागत पीढ़ी के बीच का द्वंद्व था। ये विदाई लेते मेस्सी और उदित होते नए सितारे यमल के बीच मुकाबला था। ये बार्सिलोना बनाम बार्सिलोना था।

स्पेन की टीम निर्विवाद रूप से तकनीकी रूप से श्रेष्ठ थी। ये उन्होंने पिछले सात मैचों में दिखाया था। अर्जेंटीना उनसे पार पा सकने में असमर्थ थी।@@ ये अर्जेंटीना की टीम जानती थी। उन्होंने पराग्वे वाली शैली को अपनाया। फ्रांस शानदार खेलकर और पूरे मैच पर अपना नियंत्रण रखते हुए भी बमुश्किल 1-0 से जीत पाई थी। पैराग्वे ने फिजिकल होना चुना, रफ टफ खेलना चुना। अर्जेंटीना के सामने और कोई रास्ता नहीं था। फाइनल पहुंचकर कोई हारना नहीं चाहता। उन्होंने भी पैराग्वे का रास्ता चुना। पूरे मैच पर स्पेन ने खेल पर पूरा नियंत्रण रखा। बस वे गोल करने में असमर्थ रहे। इसका कारण अर्जेंटीना की आक्रामक व फिजिकल टैक्लिंग के अलावा गोलकीपर मार्टिनेज भी रहे। मार्टिनेज़ ने इस मैच में कुल 11 सेव किए। जबकि गोल्डन ग्लव्स के विजेता स्पेन के गोलकीपर उनाई सिमोन ने पूरे टूर्नामेंट में 10 सेव किए। ये मैच उन्होंने अपने लिए अविस्मरणीय बना दिया। वे अर्जेंटीना के एकमात्र खिलाड़ी थे, जिन्होंने अंतिम समय तक संघर्ष किया।

स्पेन के दबदबे को इस बात से समझ जा सकता है कि स्पेन के गोल पर 20 अटेम्प्ट के मुकाबले अर्जेंटीना के कुल जमा दो अटेम्प्ट थे। उसकी स्थिति इतनी दयनीय हो गई थी कि वे रेगुलर समय में तो गोल पर एक अटेम्प्ट भी नहीं ले पाए।

 स्पेन ने फाइनल जीता। फीफा ट्रॉफी जीती। खेल जीता। श्रेष्ठता की लड़ाई जीती। उसने अपने सुंदर खेल से लोगों का दिल भी जीता। दरअसल स्पेन की ये जीत टीम की जीत है। टीम में ना कोई मेस्सी था,ना एम्बाप्पे था,ना अर्लिंग हॉलैंड था,ना केन था। ये एक टीम थी और उसके 11 सदस्य थे। जीत में सबका बराबरी का योगदान था। यमल का भी। जितना योगदान बेहतरीन गोलकीपर का था, उतना फुल बैक का,उतना ही मिडफील्ड का और उसी अनुपात में फॉरवर्ड का। यहां टीम पहले और खिलाड़ी की इमेज बाद में थी। स्पेन के लिए सबसे ज्यादा गोल करने वाले ओयरजाबल को 60 मिनट बाद ही रिप्लेस कर दिया गया।

 ये अनुशासन की जीत थी,धैर्य की जीत थी, आपसी तालमेल और समन्वय की जीत थी,एकता की जीत थी। ये एक टीम की जीत थी। ये फुटबॉल की जीत थी।

जिस तरह के दृश्य  मैच की समाप्ति के बाद आंखों के सामने आए,वे शर्मनाक थे। खेल हमें हार में भी विनत होना सिखाता है। शालीन होना सिखाता है। ग्रेसफुल होना सिखाता है। हार को भी गरिमामय तरीके से स्वीकार करने का साहस होना चाहिए। यहां खेल शर्मसार हुआ। 

 एक ऐसा फाइनल जिसे अर्जेंटीना से कहीं ज्यादा उसके समर्थक भूलना चाहेंगे। हार के कारण नहीं। खेल भावना से च्युत होने के कारण भी। 

और हां मेस्सी के आंसुओं के कारण भी।



फीफा विश्व कप डायरी 27: मेस्सी की विश्व कप से विदाई

 


दो आंखों से निकले पानी ने संसार भर में फैले करोड़ों प्रशंसकों को दुख और अवसाद के गहरे समंदर में डूबने के लिए छोड़ दिया।

दो आंखों से पानी निकला और असंख्य हृदय नम हो आए।

दो आंखों से बार बार पानी बहा। असंख्य मन पीड़ा से भर उठे।

ये विदाई की गहरी वेदना के आंसू थे। वो एक लक्षित उद्देश्य के सपने के बार बार टूटने से बच जाने का सुख और अंततः उस स्वप्न के टूट जाने की वेदना थी और उसका पानी था 

हली बार वे दो आँखें नम हुई तो वो एक पश्चाताप की अग्नि और अंत में एक स्वप्न को बचा पाने की खुशी का गीलापन था। इसमें दुख का नमक और सुख की मिठास का मिश्रण था।

दूसरी बार गीली हुईं तो ये हारी बाजी जीत लेने की ऊष्मा की आर्द्रता थी जिसमें अपने सबसे बड़े विपक्षी पर विजय और एक जिए जा रहे  स्वप्न को लगभग पा लेने के सुख की शहद सी मिठास थी।

र अंततः एक जिए जा रहे स्वप्न के तिड़क कर टूट जाने  की आह का खारा पानी था जिसमें ग़म छिपाए ना छुपता था। डुबाए ना डूबता था। 

ब समय को,नियति को उसके साथ होना था,उसका साथ छोड़ दिया।

क चाह अनचाही खत्म हुई।

क युग खत्म हुआ।

दो आँखें की विदाई हुई। निराशा के खारेपन के साथ। विश्व कप से हमेशा हमेशा के लिए।



Thursday, 16 July 2026

फीफा विश्व कप डायरी 26 : सेमीफ़ाइनल दो

 



अक्सर खेल केवल खेल के मैदान में ही नहीं खेले जाते बल्कि एक समानांतर खेल खिलाड़ियों के सीने में भी चल रहा होता है। कई बार फुटबॉल जितनी पैरों से खेली जाती उतनी ही मनोभावों और उद्वेगों से भी खेली जाती है। ऐसे मैचों में खिलाड़ियों की स्किल के ऊपर उसका आवेग हावी हो जाता है। इंटेंसिटी हद से ज्यादा बढ़ जाती है। और खेल है कि फिजिकल होने लगता है। और अगर मैदान में इंग्लैंड और अर्जेंटीना जैसे प्रतिद्वंदी आमने सामने हों तो फिर क्या ही बात है। इस बात की ताईद कल अटलांटा में खेला गया फीफा विश्व कप का दूसरा सेमीफ़ाइनल करता है।

जैसे जैसे अर्जेंटीना और इंग्लैंड की टीमें आगे बढ़ रही थीं,दोनों टीमों के मुकाबले की संभावनाएं बढ़ती जा रही थीं। और भावनाओं की तीव्रता भी। अर्जेंटीना के समर्थक जहाँ भी जाते वे अपना नया विश्व कप एंथम 'ला कुआर्ता एस्ट्रेला' द फोर्थ स्टार गाते कि "मैं जन्म से मृत्यु तक अर्जेंटीना का हूँ। माल्वीनास के लिए, डिएगो के लिए, लियो की आखिरी ट्रॉफी के लिए, अर्जेंटीना, मैं तुम्हें दो बार का चैंपियन देखना चाहता हूँ।" इस गाने में माराडोना और मेस्सी के साथ साथ माल्वीनास यानी फ़ॉकलैंड द्वीप समूह का भी जिक्र है। माल्वीनास की ग्रंथि अर्जेंटीना के सामान्य समर्थकों के मन में ही नहीं बल्कि खिलाड़ियों में भीतर भी किसी कोने में बैठी थी। मिस्र पर जीत के बाद अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने अपने ड्रेसिंग रूम में ये गाना गया। और उसके बाद ये मैच शुरू होने से पहले अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने अपने राष्ट्र गान को जिस जोश ओ जूनून और हाव भाव से गाया,उससे ये लग गया था कि टीम के लिए ये मैच सेमीफ़ाइनल से कुछ ज्यादा है।

स्कोलिनी ने अपने पुराने 4-4-2 के फॉर्मेशन से टीम उतारी। लेकिन टीम में एक बदलाव किया। मैदान के भीतर मेस्सी के बॉडी गार्ड कहे जाने वाले मिडफील्डर रोड्रिगो डी पॉल की जगह गुलियानी सिमोने को खिलाया। दूसरी और इग्लैंड ने अपनी टीम में तीन बदलाव किए। फुल बैक रीस जेम्स और जेड स्पेंस तथा विंगर मॉर्गन रोजर्स को टीम में शामिल किया।

कोच थॉमस ट्यूशेल ने 4-2-3-1 फॉर्मेशन के साथ शुरुआत की। इंग्लैंड की रणनीति मिडफील्ड को कंट्रोल करने और मेस्सी को रोकने की थी।

हले हॉफ के खेल की इंटेंसिटी बताती है कि भावनाओं ने प्राथमिकता ग्रहण कर ली थी। इस हॉफ में एक भी गोल नहीं हुआ। केवल तीन शॉट लिए गए। दो इंग्लैंड ने। एक अर्जेंटीना ने। कोई भी शॉट दोनों टीमों का टारगेट पर नहीं लगा। और 19 फाउल हुए। ये हॉफ भावनाओं के अतिरेक में खेला गया हॉफ था। खेल फिजिकल हुआ और दोनों में से कोई भी टीम लय नहीं पा सकी। कुछ हद तक ये हॉफ नीरस रहा। 

लेकिन पहले हॉफ के बाद मध्यांतर में खिलाड़ियों के दिमाग से भावनाओं का ज्वार उतरा,तो उन्हें फुटबॉल की याद आई। याद आई तो फुटबॉल का खेल आया और आई उसकी लय, उसकी गति, उसकी ताल और बाकी सब कुछ भी आया। खेल रोमांचक और संघर्षपूर्ण हो आया। 

डेडलॉक इंग्लैंड ने 55 वें मिनट में तोड़ा जब मॉर्गन रोजर्स ने दाहिनी ओर से शानदार क्रॉस डाला जिसे  एंथनी गॉर्डन ने पकड़ा और कुटी रोमेरो को चकमा देते हुए सटीक गोल दाग दिया। यहां पर खेल इंग्लैंड के नियंत्रण में था। और अर्जेंटीना बैकफुट पर थी।

स यहीं पर इंग्लिश कोच थॉमस ट्यूशेल और टीम चूक गई। यहां से टीम एकदम रक्षात्मक हो गई। वे एक और गोल के लिए गए ही नहीं। उस समय तक 35 मिनट और इंजरी टाइम का खेल बाकी था। इतने लंबे समय तक एक गोल की लीड को बचाना किसी भी रक्षा पंक्ति के लिए बहुत दुष्कर कार्य होता है। वो भी अर्जेंटीना जैसी टीम और मेस्सी के खिलाफ।

72वें मिनट में थॉमस ट्यूशेल ने गोल करने वाले एंथोनी गॉर्डन की जगह डिफेंडर एजरी कोंसा को मैदान में उतारकर लो ब्लॉक बनाकर अर्जेंटीना को रोकने का प्रयास किया। उसके दस मिनट बाद थॉमस ट्यूशेल एक और रक्षात्मक बदलाव किया और मिडफील्डर डेक्लान राइस की जगह डिफेंडर निको ओ'रेली को मैदान में उतारा। साथ ही रीस जेम्स की जगह डैन बर्न को भी।


सके विपरीत स्कोलिनी ने आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने पहले निकोलस गोंजालेज को और फिर 81वें मिनट में लेफ्ट-बैक निकोलस टैग्लियाफिको की जगह स्ट्राइकर लोटारो मार्टिनेज को मैदान में उतारा। इससे खेल पर पूरी तरह से नियंत्रण अर्जेंटीना का हो गया। गॉर्डन के 55वें मिनट में किए गए पहले गोल और लोटारो मार्टिनेज के 90+2वें मिनट में किए गए विजयी गोल के बीच, इंग्लैंड के पास केवल 12 प्रतिशत गेंद का कब्ज़ा रहा क्योंकि अर्जेंटीना ने इस बीच हमलों की झड़ी लगा दी। इसका परिणाम अर्जेंटीना को 85वें मिनट में मिला जब  मेस्सी के पास पर बॉक्स से बाहर से एंज़ो फर्नांडीज ने शानदार लांग रेंज शॉट लगाकर मैच बराबरी पर ला दिया। सात मिनट बाद ही इंजरी टाइम के दूसरे मिनट में मेस्सी ने  दाहिनी ओर से जेड स्पेंस को पछाड़ते हुए एक जादुई क्रॉस दिया जिस पर लोटारो मार्टिनेज ने हेडर से गोल कर दिया और टीम को फाइनल में पहुंचा दिया। ये शायद मेस्सी के खेल जीवन के सबसे सुंदर और जादुई क्रॉस में से एक होगा। ये अर्जेंटीना का नॉक आउट दौर का सबसे अच्छा और कन्विंसिंग खेल था जिसमें वो सही मायने में चैंपियन की तरह खेल रही थी।


ये अर्जेंटीना का लगातार चौथा नॉक आउट मैच था जिसमें बिल्कुल अंत समय में जादू सा खेल दिखाकर विपक्षी टीम को ना केवल हतप्रभ किया बल्कि पूरी तरह पछाड़ दिया। वे किसी सोए शेर की तरह उठते और कुछ ही समय में विपक्ष के पूरे खेल को तहस नहस कर देते। राउंड ऑफ 32 में कोबे वर्डे के खिलाफ 110वें मिनट तक 2-2 की बराबरी पर थे। राउंड ऑफ 16 में 78 वें मिनट मिस्र से 0-2 से पीछे थे। क्वार्टर फाइनल में स्विट्ज़रलैंड से 111 वें मिनट तक 1-1 की बराबरी पर थे और सेमीफाइनल में इंग्लैंड से 85 वें मिनट तक 0-1 से पीछे थे। अंतिम परिणाम हम सब जानते हैं।

र्जेंटीना की टीम ने बताया आखिरी समय तक हार नहीं माननी चाहिए और प्रयास करते रहना चाहिए। सफलता मिलती ही है। कोई हार जब तक अंतिम नहीं होती जब तक समाप्ति की व्हिस्ल ना बज जाए।

नॉकआउट मैचों में अर्जेंटीना की टीम एक रूपक गढ़ती है, उस बुझते दिए का जो बुझने से पहले जोरदार तरीके से फड़कता है। मैदान (दिए) में जब समय( तेल) खत्म होने को ही होता है तो अर्जेंटीना की टीम (बाती) अचानक से अपनी सारी ऊर्जा और काबिलियत से फड़फड़ा उठती है और विपक्ष को ध्वस्त करके उत्पन्न प्रकाश रूपी आनंद से अपने प्रशंसकों के दिलों को दीप्त कर देती है। और फिर अगले मैदान की खोज में चल देते हैं।

और अर्जेंटीना के समर्थक खुशी से झूमकर कह उठते हैं -वामोस मेस्सी। वामोस अर्जेंतीना।

  पिछले सप्ताह चार पुस्तकें पढ़कर पुस्तकें समाप्त की। नेहा दीक्षित की 'कोई एक सईदा', अरुंधति रॉय की 'मेरी मां गैंगस्टर' , ...