Tuesday 16 July 2024

ये रोमांच से भरा खेल रविवार था





14 जुलाई 2024, रविवार का दिन। एक ऐसा दिन जिसे नियति ने मानो खेल और केवल खेल के लिए निर्धारित किया हो। मानो उसने कहा हो इस दिन बस खेल होंगे और कुछ नहीं। यूरोप से लेकर अमेरिका तक खेल थे,खिलाड़ी थे और रोमांच में डूबते उतराते दुनिया भर में फैले लाखों या फिर करोड़ों दर्शक थे। कहां और कब ऐसा संयोग हुआ होगा जब दुनिया की तीन इतनी बड़ी और लोकप्रिय प्रतियोगिताओं के फाइनल आधे दिन के भीतर सम्पन्न होने जा रहे हों। ये दिन जीत-हार और बनते टूटते रिकॉर्डों के अलावा इसलिए भी याद रखा जाना चाहिए और खेल इतिहास में दर्ज़ होना चाहिए।

ये दो खेलों की तीन प्रतियोगिताएं थीं और उनके फाइनल थे। दुनिया के दो सबसे लोकप्रिय खेल-टेनिस और फुटबॉल।

टेनिस-सबसे एलीट खेलों में एक। अभी भी बहुत कुछ सामंती हनक लिए हुए। और उसकी सबसे प्रतिनिधि प्रतियोगिता विंबलडन। एक ऐसी प्रतियोगिता जिसे देखने के लिए दुनिया भर के सितारे दर्शक दीर्घाओं में दिखाई देते हैं। प्रतियोगिता जो अभी भी अपनी परम्पराओं को संजोए हुए। प्रतियोगिता जिसका अपना ड्रेस कोड है। और जिसका पूरी कड़ाई और निष्ठा से पालन होता है। खिलाड़ी केवल और केवल सफेद पोशाक पहनेंगे। पिछले साल लड़कियों को केवल इतनी छूट की वे रंगीन इनरवियर पहन सकती हैं। शाही संरक्षण प्राप्त। कल इस प्रतियोगिता का पुरूष एकल फाइनल खेला गया। 

दूसरा खेल था फुटबॉल। टेनिस के एकदम विपरीत आम जन का खेल। दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल। ये टेनिस की तरह सिर्फ शौकिया खेल भर नहीं है। ये बहुतेरों की दुनिया है,उनका जीवन है। उनके दुखों और संघर्षों में समय की आश्रयस्थली है। टेनिस का ऐसा कौन सा खिलाड़ी आपको याद है जिसने गुरबत में रहते हुए दुनिया में नाम कमाया। लेकिन फुटबॉल तो ऐसे ही लोगों से बना है। ये ऐसे लोगों की ही दुनिया है। ऐसे लोगों की भी दुनिया है। पेले और माराडोना से लेकर सदियो माने,एम बापे, निको विलियम्स और लामीने यमाल तक ऐसे ही खिलाड़ी हैं जिन्होंने घोर अभावों और गुरबत की गलियों से लाखों करोड़ों लोगों के दिल तक का लंबा रास्ता तय किया है। स्लम्स में खेलते खेलते दुनिया के विश्व प्रसिद्ध खेल मैदानों तक पहुंचते हैं और दुनिया की आंख के तारे बन जाते हैं।

कल ऐसे ही दुनिया के लोकप्रिय खेल फुटबॉल की दो सबसे लोकप्रिय प्रतियोगिताओं के फाइनल भी खेले गए। एक, विश्व कप फुटबॉल के बाद दूसरी सबसे लोकप्रिय प्रतियोगिता यूरो कप का फाइनल और दो, कोपा कप प्रतियोगिता का फाइनल। यूरो कप का फाइनल जर्मनी की राजधानी बर्लिन के ओलम्पियास्टडियन मैदान पर खेला गया तो कोपा कप का फाइनल अमेरिका में मियामी के हार्ड रॉक स्टेडियम में।

यूं तो ये फुटबॉल की दो सबसे बड़ी और लोकप्रिय प्रतिगोगिता थीं। लेकिन ये दोनों अलग अलग मिज़ाज की,अलग अलग शैली की फुटबॉल है। एक गति,शक्ति,लंबे पास,हिट एंड रन वाली परिणामोन्मुखी तो दूसरी छोटे छोटे पास,ड्रिबल और कलात्मकता लिए आनंदोन्मुखी फुटबॉल। नितांत विपरीत शैली की दो फुटबॉल और उनकी प्रतियोगिताएं हैं ये।

आखिर ये विभाजन आता कहां से है। ज़ाहिरा तौर पर जातीय और नस्लीय विशेषताओं, भौगोलिक संरचनाओं के प्रभाव और सामजिक व सांस्कृतिक विशेषताओं की विभिन्नताओं और स्थानिकता के आधार पर। खेलों का एक बहुत ही प्रचलित सिद्धांत है जो कहता है कि टीमों की विशेषता उनके राष्ट्रीय चरित्र के अनुरूप ही होती हैं। 

लेकिन आज के इस आधुनिक युग में विश्व एक ग्लोबल विलेज बन गया है। माइग्रेशन की प्रकिया चरम पर है। किसी एक देश की टीम में अनेक देशों के और अलग अलग नस्लों के खिलाड़ी शामिल होते हैं। इस हद तक विभिन्न पहचान वाले खिलाड़ी कि वे एक राष्ट्रीय टीम न होकर सार्वभौमिक टीम लगती है। फ्रांस और स्पेन सहित यूरोप के अनेक देशों में अलग-अलग राष्ट्रीय पहचान वाले और नस्ल के खिलाड़ी खेलते हैं। ऐसे में क्षेत्रीय या स्थानीयता के आधार पर खेल शैली का विभाजन मायने नहीं रखता। खेल शैली और टेक्नीक का अधिक तार्तिक आधार कोच और उसकी प्रबंधन टीम की रणनीति है। उदाहरण के तौर पर शक्ति और गति के लिए जाने जाने वाले यूरोप के ही देश स्पेन छोटे छोटे पासों वाला कलात्मक खेल की रणनीति अपनाता है।


रविवार के इन तीन फाइनल्स में सबसे पहले शुरू हुआ विम्बलडन। ये सर्बिया के 24 ग्रैंड स्लैम विजेता 37 वर्षीय अनुभवी नोवाक जोकोविच और स्पेन के 21 वर्षीय युवा कार्लोस अलकराज के बीच था। दरअसल 2023 का फाइनल एक बार फिर अपने को दोहरा रहा था। पिछली बार 5 सेटों के संघर्षपूर्ण मुकाबले में कार्लोस अलकराज ने नोवाक को हराकर उनकी जीत के अश्वमेध यज्ञ के अश्व को थाम लिया था। 

पिछली बार की तरह द्वंद्व का स्थान भी वही था, पात्र भी वही थे और नतीजा भी वही रहा। अलकराज ने नोवाक को 6-2,6-2,7-6(7-4) हरा  दिया। बस मैच की गति बदल गई थी। पिछले साल का एक संघर्षपूर्ण मुकाबला एकतरफा मुकाबले में बदल गया था। एक बढ़ते बिरवै ने विशाल वट वृक्ष की छाया से निकलकर अपना स्वतंत्र आकार ग्रहण कर लिया था। इतना बड़ा कि वो वट वृक्ष के अस्तित्व को सफलतापूर्वक चुनौती दे सके।

इस फाइनल मैच में नोवाक के बस दो मौके थे। एक, मैच का पहला गेम। टॉस जीतकर अलकराज ने अप्रत्याशित रूप से सर्विस रिसीव करना चुना। नोवाक की सर्विस वाला ये गेम लगभग 14 मिनट तक चला और और सात बार ड्यूस हुआ। इस गेम में अंततः अलकराज ने नोवाक की सर्विस ब्रेक कर मैच की टोन सेट कर दी थी। 

नोवाक का एक महीने पहले ही टखने का ऑपरेशन हुआ था और शायद वे सौ फीसदी फिट नहीं थे। वे अलकराज के बेसलाइन के खेल का मुकाबला करने में खुद को असमर्थ पा रहे थे। इसमें उन्हें अधिक कोर्ट कवर करना पड़ रहा था और अधिक परिश्रम भी। उन्होंने रैलीज को छोटा करना चाहा और इसके लिए उन्होंने नेट पर खेलने का प्रयास किया। लेकिन अलकराज ने शानदार पासिंग शॉट्स से उनकी रणनीति असफल कर दी। नोवाक ने पहले दो सेट आसानी से गंवा दिए।

दो,उनका एक और मोमेंट तीसरे सेट में तब आया जब अलकराज 5-4 की बढ़त और 40-0 पर तीन पर तीन चैंपियनशिप पॉइंट के साथ सर्विस कर रहे थे तो नोवाक ने ना केवल ड्यूस किया बल्कि अलकराज की सर्विस ब्रेक भी की। सेट टाई ब्रेक में गया और अलकराज ने अपना संतुलन बनाये रखकर नोवाक को कोई मौका नहीं दिया। उन्होंने टाई ब्रेक 7-4 से जीतकर एक और ऐतिहासिक जीत अपने नाम की।

पिछले एक साल में अलकराज कुछ अधिक अनुभवी हो चुके थे। और फ्रेंच ओपन की जीत का उत्साह उनके साथ था। अपनी गति,शक्ति और मानसिक दृढ़ता,शानदार सर्विस और शक्तिशाली पासिंग और ग्राउंड स्ट्रोक्स के बल पर अर्जित की गई ये जीत उम्रदराज होते नोवाक पर शायद ये उनकी निर्णायक जीत साबित हो। 

ये युवा जोश की अनुभव पर जीत थी। अलजराज की ये जीत फेबुलस फोर के युग की समाप्ति की घोषणा भी सिद्ध हो सकती है। फेबुलॉस फोर के वे एकमात्र स्तंभ बचे हैं जो अभी भी चुनौती पेश कर रहे हैं। अपने कंधे पर ये बोझ कब तक उठा पाएंगे,ये देखना निसंदेह रोचक होगा। वे नए के आगमन का रास्ता आखिर कब तक रोक पाएंगे। नया पानी की तरह अपना रास्ता बना ही लेता है। शायद उसने बना लिया है।

स्पेन के अलकराज मेड्रिड फुटबॉल क्लब के दीवाने हैं। प्रेजेंटेशन सेरेमनी के उद्बोधन में जब उनसे पूछा गया कि यूरो कप के फाइनल में आप किसी जीतते देखना चाहेंगे,तो उनका स्वाभाविक उत्तर स्पेन था।

अब यूरो कप का फाइनल उनका इंतजार कर रहा था।


यूरो कप का ये फाइनल बर्लिन में स्पेन और इंग्लैंड के मध्य खेला जाना था। इस मैच में स्पेन की साख दांव पर थीं तो इंग्लैंड की उम्मीदें दान। स्पेन चौथी बार जीतकर एक नए रिकॉर्ड के साथ अपनी साख बनाए रखना चाहता था,तो इंग्लैंड पिछले यूरो के फाइनल की हार को जीत में बदलकर ना केवल 1966 के गौरव को पुनरप्रतिष्ठित करना चाहता था जब उसने विश्व कप जीता था,बल्कि 58 साल के जीत के सूखे को भी खत्म करना चाहता था। ये मुकाबला अलग अलग शैली और रणनीति का भी था। स्पेन ने पूरी प्रतियोगिता के दौरान छोटे छोटे वन टच पासों के साथ कलात्मक और सुंदर फुटबॉल खेली थी,जबकि इंग्लैंड ने नीरस लेकिन शक्तिशाली फुटबॉल का प्रदर्शन किया था।

ये मैच भी बिल्कुल ऐसे ही खेला गया। स्पेन ने शानदार और सुंदर खेल दिखाया और मैच 2-1 से जीत लिया। इसमें कोई शक नहीं है कि इंग्लैंड बहुत ही प्रतिभाशाली खिलाड़ियों वाली टीम है जो साउथगेरेट  के निर्देशन में बेहतरीन करती रही है। वे बैक टू बैक दो यूरो कप के फाइनल में पहुंचे। इसके अलावा एक विश्व कप के क्वार्टर फाइनल और एक के सेमीफाइनल में पहुंची। इंग्लैंड की टीम के साथ समस्या ये है कि वो प्रतिभाशाली खिलाड़ियों का एक ऐसा समूह है जिसे एक टीम के रूप में संगठित होना बाकी है। जिस दिन ऐसा होगा वो एक अजेय टीम बन सकती है।

लेकिन स्पेन ने इस पूरी प्रतियोगिता में शानदार और सुंदर खेल का प्रदर्शन किया। वे जीत के हकदार थे और जीते।



जिस समय यूरोप में फुटबॉल की ताकतों की ज़ोर आजमाइश खत्म हुई,उसके कुछ समय बाद ही वहां से दूर एक दूसरे महाद्वीप की धरती पर एक और फाइनल खेला जाने वाला था। ये कोपा कप का फाइनल था। यहां मुकाबला केवल कोलंबिया और अर्जेंटीना के बीच भर नहीं था बल्कि अर्जेंटीना के मार्टिनेज और अकेले अपने दम पर अपने देश कोलंबिया को फाइनल तक पहुंचाने वाले के जेम्स रोड्रिग्स के बीच मुकाबला भी था।

मैच रेगुलर समय में गोलरहित रहने पर अतिरिक्त समय मे गया। जब ये लगा कि मैच पेनाल्टी शूट आउट में जाने वाला है तभी मार्टिनेज के बूट से एक और गोल आया। अर्जेंटीना रिकॉर्ड 16 वीं बार कोपा कप जीत रही थी।

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खेलों की सबसे खूबसूरती उसकी अनिश्चितता में है। कमजोर पक्ष के या जिनकी जीतने की कम संभावना होती है वे भी जीत सकते हैं। इन तीनों फाइनल में एक बात समान थी कि जिनके पहले से जीतने की संभावना अधिक थी,जो बेहतर पक्ष थे,वे ही जीते। वे चाहे अलकराज हों, स्पेन हो या अर्जेंटीना। ऐसा नहीं है कि नोवाक या इंग्लैंड या कोलंबिया नहीं जीत सकते थे। वे भी जीत दर्ज़ करने में सक्षम थे। लेकिन ऐसा हो ना सका। जो भी हो तीनों ही फाइनल में बेहतर पक्ष की जीत हुई।

अलकराज,टीम स्पेन और टीम अर्जेंटीना को जीत मुबारक।




Sunday 14 July 2024

विम्बलडन की नई मल्लिका:बारबोरा क्रेसीकोवा






दो हफ़्तों तक लगातार शानदार खेल,कड़े संघर्ष,अब तक अर्जित सारी काबिलियतों के बल पर दो बालाएं बीते शनिवार को एक आखिरी द्वंद्व के लिए विंबलडन अरीना के सेन्टर कोर्ट पर आमने सामने थीं,ताकि वे विंबलडन की नई मल्लिका कहला सके और उनके वे दो हाथ जिनसे अब तक रैकेट पकड़कर अपने खेल के जौहर दिखा रही थीं,चमचमाती वीनस रोजवॉटर डिश पकड़ सकें, उसे अपने होंठों से लगा सकें,उस पर अपना नाम लिखवा सकें।

ये दो बालाएं चेक गणराज्य की बारबोरा क्रेसीकोवा और इटली की जैस्मीन पाओलिनी थीं।

 दोनों एक उम्र की,लेकिन अलग अलग कद काठी की। पांच फुट चार इंच की दूसरी सबसे छोटी फाइनलिस्ट पाओलिनी के मुकाबले उनसे आधे फुट लंबी क्रेसीकोवा। एक सातवीं सीडेड तो दूसरी 31वीं सीडेड। एक के हिस्से एक भी ग्रैंड स्लैम नहीं तो दूसरी के हिस्से एक सिंगल सहित 11 ग्रैंड स्लैम।दोनों करीब एक तरह की खेल सलाहियत वाली खिलाड़ी। दोनों के पास कड़ी मेहनत और संघर्ष करने का जज़्बा,तीव्र गति,शानदार कोर्ट कवरेज,शक्तिशाली ग्राउंड स्ट्रोक्स और ड्राप शॉट्स भी। हां, क्रेज़ीकोवा के पास बैकहैंड स्लाइस के साथ साथ फोरहैंड स्लाइस करने की अतिरिक्त योग्यता जो नए जमाने की टेनिस और खिलाड़ियों में शायद ही पाई जाती हो और जिसका मुज़ाहायरा इस मैच में भी उन्हें करना था।

 क्रेसीकोवा एक एक सेट की बराबरी, लेकिन पांच के मुकाबले चार गेम की बढ़त के साथ  चैंपियनशिप के लिए सर्व कर रहीं थीं। ये मैच के सबसे संघर्षपूर्ण गेम में से एक था जो ये बताने के लिए पर्याप्त था कि दोनों ही खिलाड़ियों के लिए जीत के क्या मायने हैं और जीत के लिए वे दोनों ही किस हद तक संघर्ष कर सकती हैं। दोनों ही खिलाड़ी थीं कि हार मानने के लिए तैयार ना थीं और अपनी सारी स्किल,सारी योग्यता इस गेम को जीतने के लिए झोंक रही थीं।

ये गेम ड्यूस में गया और कुल चार बार ड्यूस हुआ। दो बार पाओलिनी को सर्विस ब्रेक कर बराबरी करने और मैच को और आगे ले जाने मौका मिला,तो क्रेसीकोवा को तीन बार चैंपियन बनने का। दो चैंपियनशिप अंक पाओलिनी ने बचा लिए और अपने लिए सर्विस ब्रेक के मौके भी बनाए। लेकिन अपने तीसरे चैंपियनशिप पॉइंट पर क्रेसीकोवा ने 108 मील प्रतिघंटे की रफ़्तार से झन्नाटेदार सर्विस की जिसका पाओलिनी के पास कोई जवाब नहीं था। 

क्रेसीकोवा ने मैच 6-2, 2-6, 6-4 से जीत लिया था। विंबलडन की एक नई मल्लिका का उदय हो चुका था। क्रेज़ीकोवा हरे घास के मैदान की नई चैंपियन बन चुकी थीं। ये लगातार आठवां साल था कि विम्बलडन को नई चैंपियन मिली।



क्रेसीकोवा ने जीतते ही ऊपर आसमान की और देखा और हाथ से एक 'किस' आसमान की और किया। ये निश्चित रूप से ईश्वर के लिए नहीं था। ये उनकी अपनी फ्रेंड,फिलॉसफर,गाइड,उनकी कोच रहीं जाना नोवोतना के लिए था। उनका आभार प्रकट करने के लिए। ये उस व्यक्ति के लिए उनका प्रेम और आदर था जिसने उनके जीवन की दिशा बदल थी। जिसने उनमें ये विश्वास भरा कि वे ये प्रतिगोगिता जीत सकती हैं जिसे खुद नोवोतना ने 1998 में जीता था।

जाना नोवोतना लगातार उनके जेहन में रहीं। सदा उनके साथ रहीं। सेमी फाइनल में 2022 की विजेता रिबाकिना के विरूद्ध तीन सीटों में संघर्षपूर्ण जीत के बाद भी उन्होंने नोवोतना को शिद्दत से याद किया। उनके लिए आंसू बहाए।

ये दोनों ही खिलाड़ी चेक गणराज्य के शहर ब्रनो से हैं। जिस तरह से दो नदियों स्वितवा और स्वरात्का का संगम ब्रनो शहर की निर्मिति करता है, वैसे ही ही इन दो खिलाड़ियों का मिलन टेनिस का एक ऐसा संसार निर्मित करता है जिसमें टेनिस है, प्रेरणा है,सफलताएं हैं, दोस्ती है और गुरु शिष्य का संबंध तो है ही।

बारबोरा क्रेसीकोवा और जैस्मिन पाओलिनी दोनों पहली बार विम्बलडन के फाइनल में खेल रहीं थी। दोनों एक ही मिशन पर थी। पहली बार वीनस रोजवॉटर डिश पर अपना नाम लिखवाना। संघर्ष जोरदार होना ही था। और हुआ भी। दोनों ने अपने तरकश के सारे तीरों का इस्तेमाल इस मैच में किया। मैच में शानदार रैलीज हुईं। शानदार खेल का मुजाहायरा हुआ। 

पूरे मैच के तीन फेज थे। शुरुआत क्रेज़ीकोवा ने की। पाओलिनी की पहली ही सर्विस ब्रेक की। क्रेसीकोवा की सटीक फर्स्ट सर्व,बैक हैंड व फोरहैंड स्लाइस और जोरदार ग्राउंड स्ट्रोक्स का पाओलिनी के पास कोई जवाब नहीं था। क्रेसीकोवा ने पहला सेट 6-2 से Sand लिया।

दूसरा सेट पहले के उलट था। इस सेट में ना केवल बेहतरीन सर्विस पाओलिनी ने की बल्कि तेज तर्रार शॉट्स और प्लेसिंग से क्रेसीकोवा को हतप्रभ कर दिया। हतप्रभ होने की बारी ही क्रेसीकोवा की थी। ये सेट पाओलिनी ने 6-2 से जीता।

निर्णायक सेट बराबरी का था। दोनों के लिए ये जीने मरने का प्रश्न था। दोनों ने अपनी सर्विस को ब्रेक नहीं होने दिया। स्कोर 3-3 की बराबरी पर था। तभी पाओलिनी एक गलती कर बैठी। सेट के सातवें गेम में वे ब्रेक पॉइंट पर डबल फाल्ट कर बैठी। इस डबल फाल्ट से उन्होंने ये गेम ही नहीं हारा, बल्कि सेट और चैंपियनशिप भी हार गईं।
क्रेसीकोवा ने ना केवल अपनी अगली दो सर्विस सुरक्षित  रखी बल्कि अपने लिए चैंपियनशिप भी सुरक्षित कर ली।

अब विम्बलडन को नई चैंपियन मिल चुकी थी। पिछले सात सालों की तरह। 

इगा स्वियातेक,रिबाकिना,सबलेंका जैसी खिलाड़ियों के होते हुए शायद ही किसी ने सोचा हो कि क्रेसीकोवा जीत सकती हैं। मैच उपरांत अपने उद्बोधन में वे सच ही कह रहीं थीं 'निश्चित रूप से ये दिन मेरे टेनिस कैरियर का सबसे अच्छा दिन था और मेरे जीवन का भी। मेरा विचार है कि किसी को विश्वास नहीं था मैं फाइनल में पहुंच सकती हूँ और किसी को ये विश्वास नहीं है कि मैंने विम्बलडन जीत लिया है। मैं अभी तक विश्वास नहीं कर पा रही हूँ।'

ये एक ईमानदार आत्माभिव्यक्ति थी।

जो भी हो वे अब विंबलडन चैंपियन हैं। वे महिला एकल के दो ग्रैंड स्लैम फाइनल में पहुंची और दोनों में जीत हासिल की। इससे पहले वे 2021 का फ्रेंच ओपन भी जीत चुकी हैं। साथ ही वे डबल्स में भी 10 ग्रैंड स्लैम खिताब जीत चुकी हैं। सात महिला युगल और तीन मिश्रित युगल। वे मुख्यतः डबल्स की खिलाड़ी मानी जाती रही हैं। लेकिन ये दो एकल ग्रैंड स्लैम जीतने के बाद वे सिंगल खिलाड़ी के रूप में भी समादृत हो सकेंगी।
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तो फिर पाओलिनी का क्या? वे निश्चित ही हार के बाद दुखी थीं। वे दो महिनों के भीतर अपना दूसरा ग्रैंड स्लैम फाइनल हार रही थीं। लेकिन वे हार में भी उतनी ही शालीन थीं और ग्रेसफुल भी। वे प्रेजेंटेशन स्पीच में कह रहीं थी'आज मैं थोड़ा उदास हूँ। मैं मुस्कुराहट बनाए रखने की कोशिश में हूँ क्योंकि मुझे याद रखना चाहिए कि आज का दिन भी अच्छा दिन है। मैं विम्बलडन के फाइनल में खेली हूं।'

खेल ऐसे ही होते हैं। जीवन की तरह। कभी जीत कभी हार। खुशी भी तो ग़म भी। कहकहे भी और उदासी भी। खेल यही तो सिखाते हैं।

फिलहाल तो विम्बलडन की नई मल्लिका क्रेसीकोवा को बधाई।




Saturday 13 July 2024

तेज गेंदबाजी का मैराथन धावक : जेम्स एंडरसन




इंग्लिस्तान की राजधानी लंदन को तीन विश्व प्रसिद्ध खेल स्टेडियमों - वेम्बले, लॉर्ड्स और विम्बलडन के कारण फुटबॉल,क्रिकेट और टेनिस का मक्का माना जाता है। ये तीन खेल ब्रिटेन के सबसे लोकप्रिय खेल हैं।

क्या ही संयोग है  कि एक सप्ताह के भीतर इन तीनों ही खेलों में इंग्लिस्तान के खेल इतिहास की तीन अविस्मरणीय घटनाएं घट रही थीं,जो सिर्फ इंग्लिस्तान के लिए ही नहीं बल्कि विश्व के खेल जगत के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जा सकती हैं।

एक,सर एंड्रयू बैरन मारे का टेनिस से सन्यास,इंग्लिश फुटबॉल टीम का यूरो कपके फाइनल में प्रवेश और सर जेम्स एंडरसन का आखिरी टेस्ट मैच खेलना।

6 जुलाई को विम्बलडन अरीना टेनिस स्टार एंडी मरे,जिसने ना केवल इंग्लिस्तान की टेनिस को बदल दिया बल्कि वर्तमान सदी के पहले ढाई दशक के टेनिस इतिहास में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया,को टेनिस कोर्ट से विदा कर रहा था।

उधर 10 जुलाई को जर्मनी के शहर डॉर्टमंड के सिग्नल एडुना पार्क में हैरी केन की अगुआई में इंग्लिस्तान की टीम नीदरलैंड को 2-1 से हराकर यूरो कप के फाइनल में ही नहीं पहुंच रही थी बल्कि 1966 में वेम्बले मैदान में अर्जित प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने के प्रयास में अंतिम पायदान पर भी पहुंच रही थी।

और इस बीच लॉर्ड्स का मैदान 12 जुलाई को इंगलिस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया के महानतम तेज गेंदबाजों में एक जेम्स एंडरसन को गार्ड ऑफ ऑनर के साथ मैदान से भावभीनी विदाई दे रहा था। उसके साथी खिलाड़ी मैच के तीसरे दिन ही वेस्टइंडीज पर पारी और 114 रनों की जीत से शानदार तोहफा और क्या दे सकते थे। 

जी हां ये जेम्स एंडरसन हैं जो क्रिकेट मैदान को अब अलविदा कह रहे हैं। ये किसी अजूबे से कमतर कैसे हो सकता है कि क्रिकेट में एक तेज गेंदबाज लगातार 21 साल तक 188 टेस्ट मैच खेलकर 42 साल में चंद दिन कम की उम्र में खेल मैदान से विदा ले।


आप जानते हैं ना 21 साल क्रिकेट के तेज गेंदबाज के लिए कितना बड़ा वक़्फा होता है। उन्होंने इसी लॉर्ड्स के मैदान से 2003 में ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ अपने कैरियर की शुरुआत की थी। तब से लेकर आज तक उनकी अपनी टीम के आठ कप्तान बदले। उनके देश के आठ प्रधानमंत्री बदले और उनके साथ कुल 109 खिलाड़ी खेले।और इनमें से कुछ तो उनके डेब्यू के समय जन्मे भी नहीं थे। 

इस बीच टेम्स नदी से ना जाने कितना पानी बह गया होगा। बस अगर इन सबके के बीच कुछ नहीं बदला तो जेम्स एंडरसन,उनकी लाजवाब गेंदबाजी और क्रिकेट के लिए उनकी दीवानगी नहीं बदली।

इस दौरान उन्होंने टेस्ट मैच में चालीस हजार से ज़्यादा गेंदे फेंकी और 704 विकेट लिए। ये एक तेज गेंदबाज द्वारा फेंकी गई सब से अधिक गेंदे हैं और, लिए गए सबसे अधिक विकेट और कुल मिलाकर मुरलीधरन और शेन वार्न के बाद सबसे अधिक।

आखिर उन्होंने इन 21 सालों के लंबे करियर से क्रिकेट को क्या दिया?

 निसंदेह इंग्लैंड को अनेक यादगार जीत दीं जिसमें  दो एशेज भी शामिल हैं और विशेष रूप से 2010/11 की एशेज जो 24 सालों के लंबे अंतराल के बाद इंग्लैंड को नसीब हुई थी। ऐसा नहीं है कि उनके हिस्से सब जीत ही आईं। असफताएँ भी उनके भाग्य का हिस्सा रहीं। उनके पहले कप्तान नासिर हुसैन सही ही कह रहे थे 'आप सबसे अच्छे समय में भी हमारे साथ रहे और सबसे बुरे वक्त में भी।'

लेकिन देश के लिए जीतना और उसमें योगदान तो हर खिलाड़ी करता है। सही मायने में तो वे क्रिकेटर्स को और विशेष रूप से गेंदबाजों को अपनी फिटनेस से अचंभित कर रहे थे। वे अपने इतने लंबे कैरियर में शायद ही कभी चोटिल हुए हों। और ये फिटनेस उनकी कठोर अनुशासन और स्वयं पर नियंत्रण से आती है। उनके लंबे करियर का राज ही उनकी फिटनेस में छुपा है। ये उनकी फिटनेस  और उनका अनुशासित जीवन है जिस के लिए उनका अनंत काल तक अनुकरण किया जा सकता है।

उनका उससे भी  बड़ा योगदान क्रिकेट के क्लासिक फॉर्म के प्रति उनका प्रेम है। जिस समय वे अपने करियर की शुरुआत कर रहे थे,उस समय टी-20 फॉर्मेट आकार ग्रहण कर रहा था। हर खिलाड़ी इस फॉर्मेट का दीवाना हुआ जाता था। खिलाड़ी उसकी तरफ भाग रहे थे। टेस्ट क्रिकेट से मोहभंग का काल था ये। सभी उसे  छोड़ एक दिवसीय और टी-20 को अपना रहे थे। बहुत से खिलाड़ियों ने तो अपनी खेल लाइफ बढ़ाने के लिए टेस्ट मैच छोड़ छोटे फॉर्मेट को वरीयता दी। लेकिन जेम्स एंडरसन को ये छोटे और विशेष रूप से टी-20 फॉर्मेट रास नहीं आया। उन्होंने केवल 21 टी-20 मैच खेले और 2009 में ही इस फॉर्मेट को विदा कह दिया।

एक दिवसीय मैच ज़रूर 172 खेले और फिर 2015 के मार्च में उससे भी किनारा कर लिया। लेकिन टेस्ट मैच के लिए उनका लगाव,उनकी दीवानगी  शिद्दत से साथ बनी रही। क्रिकेट के मूल फॉर्मेट के प्रति ये उनका लगाव ही था कि एक दिवसीय क्रिकेट को विदा कहने के बाद नौ साल तक वे टेस्ट क्रिकेट खेलते रहे।

और उससे भी बड़ी बात ये कि तेज गेंदबाजी का उन्होंने एक अलग मुकाम बनाया। उसको एक अलग पहचान दी। जो तेज गेंदबाजी की परंपरागत छवि से अलग थी। उन्होंने अपने लिए एक अलग छवि गढ़ी,जो कई स्थापित छवियों को तोड़ती थी। उन्होंने अपनी तेज गेंदबाजी से खौफनाक और संहारक तिलिस्म नहीं बनाया, बल्कि तेज गेंदबाजी का एक लयात्मक संसार निर्मित किया। उनकी गेंदबाजी में रफ्तार थी,पैनापन था,मारक क्षमता थी,वो सब कुछ था जो एक तेज गेंदबाज में होता है, ना था तो बस ख़ौफ़ ना था। बल्लेबाजों में उनकी गेंदबाजी की तेजी का ख़ौफ़ ना था बल्कि उसके हुनर का ख़ौफ़ था। उनकी सीम,उनकी स्विंग,उनकी गेंद की लंबाई को एडजस्ट करने की क्षमता और चमकती गेंद से लेकर धूसर होती गेंद तक के ख़ूबसूरत इस्तेमाल का भय था। 


उनका बोलिंग एक्शन बहुत ही सहज, सरल और आकर्षक था। इतना सहज कि लगता ही नहीं कि एक तेज गेंदबाज बोलिंग कर रहा है। वे 140 किमी प्रति घंटा या उससे भी अधिक की गति से गेंद फेंकते। पर उन्हें देखते कभी ये आभास होता ही नहीं कि वे ज़रा भी शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं। इस मामले में सिर्फ एक ही खिलाड़ी उनसे प्रतिस्पर्धा कर सकता है। वे हैं मोहिंदर अमरनाथ। लेकिन यहां उल्लेखनीय है कि मोहिंदर माध्यम गति के गेंदबाज थे। 

एंडरसन का खूबसूरत चेहरा,एक जेंटलमैन छवि,आकर्षक और सहज बॉलिंग एक्शन सब के सब  एकाग्र होकर उनकी बॉलिंग को परले दर्ज़े का लयात्मक और आकर्षक बनाते थे। उनकी गेंदबाजी तेज गेंदबाजी की सिहरन पैदा नहीं करती,बल्कि स्पिन गेंदबाजी जैसी कलात्मक लगती, उसी की तरह आंखों को सुकून से भर देती।

आप जानते हैं खेलों में सबसे ज़्यादा लय आइस हॉकी में होती है। उससे अधिक लय आइस स्केटिंग में होती है और लयात्मक जिम्नास्टिक में उससे भी ज़्यादा। उनकी गेंदबाजी अपनी लयात्मकता में इन सब प्रतिस्पर्धा करती प्रतीत होती है।

 दरअसल वे तेज गेंदबाजी की एक नई भाषा गढ़ते  हैं। उसे एक नई परिभाषा देते हैं और एक अलहदा छवि निर्मित करते हैं। यही उनका क्रिकेट को सबसे बड़ा दाय है।

जेम्स एंडरसन की टेस्ट क्रिकेट से इस विदाई को उनके पहले कप्तान नासिर हुसैन से अधिक सुंदर और सटीक शब्दों के ज़्यादा क्या ही कहा जा सकता है कि 'आप (एंडरसन)  सही मायने में इंग्लिश क्रिकेट हो'।

क्रिकेट मैदान से विदा एंडरसन।




Sunday 7 July 2024

सर एंड्रयू बैरन मरे






           गुरुवार की रात को आंखें सिर्फ एंडी मरे की नहीं भरी थीं,बल्कि विम्बलडन के सेंटर कोर्ट में मौजूद बहुत से लोगों की आंखें नम थीं। ये इक्कीसवीं सदी के टेनिस खेल के 'फेबुलस फोर' के एक और नगीने की कोर्ट से विदाई की उदास शाम थी। दिल की उदासी थी कि आंखों में नमी के रूप में रह रहकर बाहर आती जाती थी।

             एंडी मरे अपने भाई  जेमी मरे के साथ विम्बलडन के सेंटर कोर्ट पर अपना मैच खेल रहे थे। इस मैच में ऑस्ट्रेलियाई जोड़ी जॉन पीअर्स और रिंकी हिजीकाता से 7-6(8-6),6-3 से हरा दिया था। अब एंडी मरे अपने लंबे शानदार कैरियर का समापन कर रहे थे। उनकी आंखें आसुओं से भरी थीं। 

       वे अपने विदाई वक्तव्य में कह रहे थे-'ये(सन्यास)कठिन है। मैं जीवन भर खेलना  चाहता हूँ। मुझे इस खेल से प्यार है। इस खेल ने मुझे इतना कुछ दिया है। साल दर साल इतने पाठ पढ़ाए हैं जिनका मैं शेष सारे जीवन में प्रयोग कर सकता हूँ। क्योंकि मैं रुकना नहीं चाहता, इसलिए ये बहुत कठिन है।'

               और ये उनके उनके जीवन का सच था। टेनिस  उनके लिए खेल भर नहीं था,बल्कि बचपन की त्रासदियों से बचने का एक माध्यम भी था। बचपन में उन्होंने ना केवल अपने परिचित द्वारा उनके स्कूल में नरसंहार को अपनी आंखों से देखा जिसमें उनके 16 साथी और एक शिक्षक मारा गया था बल्कि माता पिता का अलगाव भी देखा था।

              बात साल 2012 की है। इंगलैंड में यही बसंत था। यही सीजन था। यही हरी घास थी। यही विम्बल्डन प्रतियोगिता थी। उस दिन भी मरे की आंख में ऐसे ही पानी भरा था। वे अपना पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल हार जो गए थे। 

                लेकिन यहीं से एक नए सितारे का उदय हुआ था जिसने इंग्लिश टेनिस को बदल देना था। एंडी मरे उस साल फाइनल में चार सेटों में फेडरर से हार गए थे। लेकिन एक महीने बाद ही उन्होंने उन्हीं फेडरर को हराकर लंदन ओलंपिक 2012 का स्वर्ण पदक जीत लिया। ये एक स्वीट रिवेंज भर ही नहीं था, बल्कि 'बिग थ्री' को फेबुलस फोर में बदलने और अपने शानदार कैरियर को शिखर पर पहुंचाने का आगाज़ भी था।

               उसी साल यूएस ओपन के फाइनल में  अपने कैरियर का पहला ग्रैंड स्लैम जीता। यहां उन्होंने फाइनल में  नोवाक जोकोविच को पांच सेटों हराकर शानदार जीत हासिल की। 2013 में पुनः लंदन आए और इस बार सीधे तीन सेटों में नोवाक जोकोविच को हराकर पहला विम्बलडन और कैरियर का दूसरा ग्रैंड स्लैम जीता। ये एक ऐतिहासिक जीत थी जिसने इंग्लैंड का 77 सालों का इंतज़ार खत्म किया था। वे 1936 में फ्रेड पैरी के बाद पहले ब्रिटिश विजेता थे।

                उन्होंने अपने खेल कैरियर में तीन ग्रैंड,दो ओलंपिक गोल्ड, 2015 में डेविस कप,और कुल 46 ए टी पी खिताब जीते। फेड,राफा और नोल ने मानक इतने ऊंचे कर दिए हैं कि ये उपलब्धियां साधारण लग सकती हैं। लेकिन इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि इन तीन के होते हुए भी अपने कैरियर की इन ऊंचाइयों पर मरे जैसा खिलाड़ी ही पहुंच सकता था। और ये भी  कि उसे अगर कूल्हे और कमर की चोट ने परेशान नहीं किया होता, तो उपलब्धियां कुछ और ज़्यादा होती और निश्चित ही नोल,राफा और फेड की उपलब्धियों की कीमत पर।

                      वे मूलतः बेसलाइन के डिफेंसिव खिलाड़ी थे जो शानदार ग्राउंड स्ट्रोक्स लगाते। लेकिन उतने ही शानदार ड्राप शॉट्स भी खेलते। मैदान को बहुत ही चपलता से कवर करने वाला ये खिलाड़ी बेहतरीन पूर्वानुमान कर तीव्र गति से रिटर्न कर प्रतिद्वंदी को हतप्रभ कर देता। यही उनके खेल की विशेषता थी।

                       क्रिकेट और फुटबॉल के दीवाने देश में टेनिस की किस्मत बदल देने और 21वीं सदी पहले ढाई दशक के टेनिस इतिहास में बिग थ्री फेड,राफा और नोल के वर्चस्व को सफल चुनौती देने वाले एकमात्र खिलाड़ी के रूप में वे टेनिस इतिहास में हमेशा याद किया जाता रहेगा।

खेल मैदान से विदा।

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(पुनश्च वे मिक्स्ड डबल्स में रादुकाने के साथ खेलकर अपने कैरियर का समापन करेंगे)



Tuesday 2 July 2024

ये जीत भी कमतर तो नहीं


तीव्र गूंजती आवाजों के नेपथ्य में कुछ मद्धम स्वर इस गूंज में विलीन हो जाते हैं, चाहे वे कितने ही मधुर क्यूं ना हों। 

जिस समय भारतीय लड़के क्रिकेट में अपनी विजय का डंका बजा रहे थे,ऐन उसी समय भारतीय लड़कियां क्रिकेट में ही अपनी सफलता के तराने लिख रही थीं। लेकिन उनकी जीत के गिद्दा की लय लड़कों की विश्व कप की जीत के भांगड़ा की लय में रल मिल कर खो गई।

स समय दक्षिण अफ्रीका की महिला क्रिकेट टीम भारतीय दौरे पर है। भारतीय बालाएं अपने खेल की उच्चतर सीमा पर हैं। अभी तक उन्होंने दक्षिण अफ्रीका का सफाया कर दिया है। पहले  एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों की सीरीज 3-0 से जीत ली। दक्षिण अफ्रीका दूसरे अंतरराष्ट्रीय मैच को छोड़कर कहीं मुकाबले में भी नहीं दिखी। भारत ने Close मैच 143 रनों से जीता। हां, दूसरे मैच में भारत द्वारा रखे गए 325 रनों के लक्ष्य को दक्षिण अफ्रीका ने पा ही लिया था कि 4 रन कम रह गए। तीसरा मैच 56 गेंदे शेष रहते 6 विकेट से भारत ने आसानी से जीता। इस वन डे सीरीज में स्मृति मंधाना ने शानदार बल्लेबाजी की और दो शतक लगाए और एक इनिंग 90 रनों की खेली।









सके बाद एकमात्र टेस्ट में भी भारत ने 10 विकेट से जीत दर्ज़ की। शेफाली वर्मा ने इसमें सबसे तेज दोहरा शतक लगा
या तो स्नेहा राना ने मैच में 10 विकेट लेकर भारत की जीत सुनिश्चित की। अब 3 टी-20 मैच और खेले जाने बाकी हैं।

भारतीय लडकियों ने क्रिकेट जगत में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज़ कराई है। लेकिन अभी भी महिला क्रिकेट उतना लोकप्रिय नहीं हो पाया है, जितना पुरुष क्रिकेट है जो जुनून की तरह लोगों के सिर चढ़कर बोलता है। क्रिकेट के ठीक विपरीत बैडमिंटन और टेनिस से लेकर शूटिंग,आर्चरी,एथलेटिक्स यहां तक कि कुश्ती और मुक्केबाजी में महिला खिलाड़ियों को कहीं अधिक दर्शक और प्रशंसक मिल रहे हैं।
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ये एक विडंबना ही है और इसके कारणों की तहकीकात की जानी चाहिए जिस तरह महिला बैडमिंटन या टेनिस जैसे खेल दर्शकों को अपील करते हैं उस तरह महिला क्रिकेट क्यों नहीं




Sunday 30 June 2024

टी-20क्रिकेट विश्व कप और भारत की जीत





कल रात खेल मैदान के दो सबसे पसंदीदा युग्म टूट रहे थे। एक दुःख का बायस दूसरा सुख का। एनबीए की गोल्डन स्टेट वॉरियर्स टीम सबसे पसंदीदा और स्टीफन करी व क्ले थॉमसन का युग्म सबसे प्रिय। क्ले थॉम्पसन अब वॉरियर्स छोड़ रहे हैं। एक शानदार जोड़ी टूट रही है। एक जादू खत्म हो रहा है। वॉरियर्स के लिए एक युग का समापन हो रहा है। इस जोड़ी ने बीते सालों में वॉरियर्स को चार बार चैंपियन बनाने में अहम भूमिका अदा की।

 लेकिन सुख की इस बेला में दुःख की बात क्यों। आज बात सबसे पहले विराट और रोहित के युग्म की,लेकिन अलग अलग। क्योंकि ये दोनों दो अलग अलग शैली और अप्रोच वाले खिलाड़ी हैं जो मिलकर एक असाधारण योग्यता वाला युग्म बनाते हैं। 

एक, कहावत है 'फॉर्म अस्थायी होती है, स्थायी होती है क्लास'। ये विराट ने एक बार फिर सिद्ध किया। विराट ने कल विश्व कप के फाइनल में एक शानदार पारी खेली। ये परिस्थिति के अनुरूप खेली गई अव्वल दरजे की पारी थी। दी गई परिस्थिति में इससे बेहतर पारी हो ही नहीं सकती थी। चाहे कितना भी टी-20 का खेल हो,आप हर बार दो सौ की स्ट्राइक रेट से रन नहीं बना सकते। खेल में गेंदबाज भी होते हैं और वे 'मिट्टी के माधो' तो नहीं ना होते। 












दरअसल विराट की ये पारी इसलिए भी हमेशा याद रखी जाएगी कि उन्होंने कोई लप्पेबाजी नहीं की,बल्कि शानदार क्लासिक क्रिकेटिंग शॉट्स खेल कर पूरी की। उनकी इस पारी ने बताया कि टी-20 के खेल में भी क्रिकेटिंग शॉट्स लगाकर पारी बिल्ट अप की जा सकती है और मैच जिताए जा सकते हैं। 

बेतरतीब लप्पेबाज़ी और हिटिंग से मरते क्रिकेट खेल वाले समय में विराट की क्रिकेटिंग शॉट्स और सेंस से बनी ये पारी किसी मधुर संगीत की तरह आने वाले लंबे समय तक कानों में गूंजती रहेगी और किसी शास्त्रीय नृत्य की तरह आंखों और मन को तृप्त करती रहेगी। भले ही आज के टी-20 फॉर्मेट के लिहाज से विराट का खेल अप्रासंगिक हो गया हो लेकिन इस फॉर्मेट में भी क्रिकेट की शास्त्रीयता और कलात्मकता बचाने के लिए विराट को लंबे समय तक याद किया जा सकता है।

और उनका टी 20 को विदा कहने का इससे शानदार अवसर और क्या हो सकता था। वे एक विश्व कप के फाइनल में जिताऊ मैन ऑफ मैच पारी खेलकर टी 20 को विदा कह रहे थे। ऐसा सौभाग्य कितने खिलाड़ियों के भाग्य में होता है। कितने खिलाड़ियों पर ईश्वर की ऐसी इनायत होती है। 

अब हम भी अब इस फॉर्मेट में विराट रखी गईं अपनी अपेक्षाओं को विदा करते हैं। लेकिन हमारी अपेक्षाएं जानती हैं और इसलिए सलामत भी हैं कि क्रिकेट के बाकी फॉर्मेट में विराट के बल्ले से अभी भी बहुत कुछ चमकीला,सरस,दर्शनीय और यादगार आना बाकी है।


दो, कहावत है पैसे से बहुत कुछ खरीदा जा सकता है लेकिन सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता। पैसे से क्रिकेट टीम खरीदी जा सकती है,लेकिन क्रिकेटिंग सेंस नहीं खरीदा जा सकता। योग्यता का सम्मान करना नहीं सीखा जा सकता। सद्व्यवहार नहीं खरीदा जा सकता। दरअसल जिंदगी में कुछ चीजें खरीदी नहीं जाती बल्कि अर्जित की जाती हैं। और अर्जित करना हर के बूते की बात कहां होती है।

रोहित ने बताया वे एक शानदार नेतृत्वकर्ता करता हैं,लीडर हैं,नायक हैं। वे खुद आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेते हैं और खिलाड़ियों को प्रेरित करते हैं। आइपीएल में भी वे मुंबई इंडियंस को चेन्नई सुपर किंग के समानांतर सबसे सफल टीम के रूप में खड़ा करते हैं और धोनी जैसे महान कप्तान की आंखों में आंखें डालकर बात करने का माद्दा रखते हैं। इसके बावजूद उन्हें कप्तानी से हटाने की बात मायोपिक सोच रखने वाला धनपशु ही सोच सकता है। दरअसल पैसा अक्ल की आंख पर पड़ी कैटरेक्ट की वो झिल्ली है जिससे लोगों को बड़े बड़े अक्षरों में लिखी इबारत भी साफ नहीं दीखती।

रोहित को कप्तानी से हटाकर उन्हीं के नायब को कप्तान बनाकर उन्हें बेइज्जत करने की कोशिश करने वाले रोहित को विश्व कप हाथ में उठाए देखकर अपने दुष्कर्म पर पानी-पानी जरूर हो रहे होंगे। और अगर नहीं हो रहे होंगे तो उन्हें होना चाहिए।

इस जीत ने रोहित को भी कपिल पाजी और धोनी भाई जैसे लीजेंड्स की श्रेणी में ला खड़ा किया है। ऐसी जीत किसी को भी अविस्मरणीय बना देती है। रोहित भी अब इतिहास के पन्नों पर सजे मिलेंगे। इस जीत के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। वे टीम के खिलाड़ी हैं। टीम के लिए खेलते हैं। हर स्वार्थ से परे। ये उन्हें औरों से अलगाती है। विशिष्ट बनाती है। सुंदर बनाती है। 

रोहित को एक विश्व विजेता टीम के कप्तान के रूप में तो याद किया ही जाना है। लेकिन इससे अधिक उन्हें एक दूसरी वजह से याद किया जाना चाहिए। उनके खिलंदड़ेपन के लिए। उनकी एमेच्योर अप्रोच के लिए। आज के खेल इस कदर फिटनेस फ्रीक, सिस्टेमेटिक, वैज्ञानिक अप्रोच वाले और तकनीकी हो गए हैं कि रोहित जैसे शरीर वाले खिलाड़ी अजूबे लगते हैं। 

 रोहित और उनके खेल की यही खूबसूरती है कि खेलों के प्रोफेशनल युग में एमेच्योर खिलाड़ी की तरह खेलते हैं। उनकी स्मित मुस्कान और खिलंदड़ापन ताजी हवा के झोंके का अहसास देती है। उनकी प्रयास रहित और स्वाभाविक बल्लेबाजी आंखों और मन के लिए किसी ट्रीट के कम नहीं। उनका एमेच्योर लुक और एफर्टलेस खेल सिक्स पैक वाली फिटनेस फ्रीक और शुष्क तकनीकी और वैज्ञानिक अप्रोच से विशाल रेगिस्तान बने खेल मैदान में किसी नखलिस्तान की तरह नमूदार होते हैं। वे डेविड बून और इंजमाम उल हक की परंपरा में आते हैं।


तीन
,जिस समय रोहित को ह्यूमिलेट करने का प्रयास किया जा रहा था ऐन उसी वक्त एक खिलाड़ी खेल और रोहित के चाहने वालों द्वारा हकीकत में ह्यूमीलेट हो रहा था। ये हार्दिक पांड्या थे। इस साल के पूरे आईपीएल सीजन में मुंबई के दर्शकों का शिकार बने रहे। उन्हें दर्शकों द्वारा लगातार बू किया जाता रहा। लेकिन मजाल उसके चेहरे पर शिकन आई हो। अपेक्षाओं के दबाव और ह्यूमिलेशन में ना तो उसका बल्ला चला और ना गेंद। पर योग्यता स्थायी होती है।      
इस विश्व कप में उनका बल्ला भी चला और गेंद भी बोली। जीत में उनका योगदान भी कम नहीं। आईपीएल के दौरान रोहित और हार्दिक के मनमुटाव की खबरें आ रही थीं। दरअसल चंडूलखाने की खबरों पर कान नहीं धरने चाहिए। रोहित ने सबसे ज्यादा भरोसा हार्दिक पर किया और सेमीफाइनल और फाइनल में आखरी ओवर कराया और वे उस भरोसे पर खरे उतरे। विश्व कप जीतने के बाद जब हार्दिक की आंखों से पानी बह रहा था उसमें जीत की खुशी की मिठास भर नहीं बह रही थी,बल्कि आईपीएल के दौरान मिले ह्यूमिलेशन का खारापन भी बह रहा था। उन्हें इस तरह देखना एक अनोखा अहसास था।

और हां याद आया, जिस समय  हार्दिक अपने कैरियर की उठान पर थे,उस समय लेखक पत्रकार अनुराग शुक्ल ने  हार्दिक को कपिल देव का वारिस बताते हुए उनकी प्रसंशा में एक पोस्ट लिखी थी। तब मैंने उनकी कटु आलोचना करते हुए एक लंबी टिप्पणी उनके कमेंट बॉक्स में लिखी थी कि 'कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली'। दरअसल ये दो अलग नजरिए की बात थी। वे हार्दिक की योग्यता की बात कर रहे थे और मैं कपिल के भारतीय क्रिकेट को समूचे योगदान की बात कर रहा था। आज जब हार्दिक ने अपने को एक शानदार ऑल राउंडर के रूप में स्थापित कर लिया है और इस विश्व कप को जिताने में बहुमूल्य योगदान किया है तो मुझे बरबस ही उस कठोर टिप्पणी पर खेद होता है। लेकिन सबसे उल्लेखनीय है ये है कि सोशल मीडिया पर फैली नकारात्मकता और असहिष्णुता के बावजूद भी अनुराग भाई ने  उस टीप को ना केवल बहुत ही सकारात्मकता से लिया बल्कि उस लंबी टीप को प्रसंशा के साथ एक स्वतंत्र पोस्ट के रूप में लगाई थी। ये एक बेहद सुखद अहसास था और है।


चार, भारत की ये जीत उस देवतुल्य खिलाड़ी की बात किए बिना कहां पूरी होगी जिसने चौकों छक्कों और रनों की बरसात वाले फॉर्मेट में रनों की अतिवृष्टि से टीम इंडिया को  अपनी गोवर्धन पर्वत सरीखी गेंदबाजी से ना केवल टीम को हार से बचाया बल्कि उसे उसके मुकाम तक पहुंचाया। ये जसप्रीत बुमराह हैं। वैसे तो पूरा क्रिकेट ही और विशेष रूप से टी-20 फॉर्मेट,उसके नियम और उसका पूरा एनवायरमेंट बल्लेबाजों का खुल्लमखुल्ला समर्थन करता है। और ऐसे विपरीत माहौल में कोई गेंदबाज अगर महफिल लूट ले जाता है और मैन ऑफ द टूर्नामेंट का खिताब उड़ा ले जाता है तो समझा जा सकता है उसने क्या कमाल किया है और जीत में उसका क्या योगदान है। जसप्रीत ने ना केवल फाइनल में शानदार गेंदबाजी की और क्रिटिकल समय पर विकेट निकाला बल्कि पूरे टूर्नामेंट में 4.2 रन प्रति ओवर की दर से गेंदबाजी की। आधुनिक क्रिकेट में इस औसत से गेंदबाजी करना वन डे तो क्या टेस्ट मैच में भी मुश्किल होता है। लेकिन बूमराह ऐसे ही खिलाड़ी हैं जो अपनी गेंद से अपने चाहने वालों के लिए एक सिंफनी रचते हैं और बल्लेबाजों के लिए एक दुस्वप्न बुनते हैं।

पांच,आपने एक कहावत सुनी होगी सौ सुनार की एक लुहार की। दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाजों के चौकों छक्कों की ढेर सारी चोटों पर सूर्याकुमार यादव ने अपने एक अविश्वसनीय और अद्भुत कैच से ऐसी चोट की जो लुहार की चोट साबित हुई। उन्होंने पूरी प्रतियोगिता के दौरान शानदार बल्लेबाजी की लेकिन फाइनल में वो नहीं चला। पर एक कैच भर से एक हार को जीत में बदल दिया। 360 डिग्री शॉट्स से ए बी डीविलियर होने का खिताब उन्हें मिल चुका है। ये कैच लेकर उन्होंने अपने को जोंटी रोड्स भी सिद्ध किया। क्या ही विडंबना है या संयोग है या फिर दुर्योग है कि विपक्षी टीम के दो लीजेंड्स के खिताब पाकर वे उन्हें ही परास्त कर देते हैं।

छह, बात ऋषभ पंत की वापसी की। उनकी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी किसी चमत्कार से कम नहीं।  एक इतनी भीषण सड़क दुर्घटना से जिससे जीवन की वापसी भी चमत्कार से कम नहीं था,वहां खेल के मैदान में शानदार वापसी उनकी दुर्धुष जिजीविषा तो है ही, बहुतों के लिए प्रेरणा भी और जिंदगी की एक खूबसूरत शै भी। उनकी इस वापसी को टीम इंडिया की इस जीत से ख़ूबसूरत और अविस्मरणीय और क्या हो सकती है।

सात, और ये भी कि हर सफलता के पीछे खिलाड़ियों की अपनी योग्यता के साथ साथ एक गुरु का परिश्रम,लगन और उसका ज्ञान होता है। टीम द्वारा कोच राहुल द्रविड़ को इस विदाई बेला में इससे शानदार गुरु दक्षिणा और कुछ हो भी नहीं सकती थी।


ये वैयक्तिक कसीदे  इस बात की ताईद ना समझे जाएं कि ये जीत कुछ खिलाड़ियों के व्यक्तिगत प्रयासों की जीत है। ये एक टीम की, टीम के प्रयास की जीत है। उनके सामूहिक एफर्ट की जीत है। एकजुटता की जीत है। उनके ज़ज्बे की जीत है। जिस किसी ने भी रोहित को मैच के बाद मैदान से गुफ्तगू करते देखा सुना होगा,जिस किसी ने भी खिलाड़ियों की आंख से बहते आंसू देखे होंगे, वे समझते होंगे कि खिलाड़ी के जीवन में एक जीत क्या मायने रखती है। यहां 'कैप्टन कूल' के बरस्क 'कैप्टन इमोशनल' को देखिए। कौन सा अंदाज आपको भाता है।

जिस तरह एक जीत खिलाड़ियों के लिए मायने रखती है। एक हार भी खिलाड़ियों के लिए बिल्कुल वैसी ही तीव्रता वाली लेकिन विपरीत संवेदना और जज्बात वाली होती है। ये एक तयशुदा तथ्य है। ये वो समय होता है जब मन के भीतर मिश्रित भावनाओं का उद्रेक होता है। कभी खुशी कभी ग़म।
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दरअसल खेल ऐसे ही होते हैं। खेल अगर उसके दीवानों की भावनाओं से खिलवाड़ ना करें तो वे काहें के खेल।  (क्षमा केशव भाई)। खेल इतिहास को इस बात की सहूलियत देते हैं कि वो हारने वाले और जीतने वाले दोनों की गाथाएं लिखे। 

और तब इतिहास हारने वाले के आंसुओं पर नज़्म लिखता है, निराशाओं की आंधियों पर त्रासदी रचता है और खामियों पर पोथी। और ठीक उसी समय जीतने वालों की खूबियों पर आल्हा रच रहा होता है। उनकी जीत की खुशियों पर समंदर की लहरों से झूम झूम कर गाए जाने वाले तराने लिख रहा होता है और प्रशंसा में महाकाव्य। 

अब गाथाएं दोनों की लिखी जाएंगी। भारत की भी और दक्षिण अफ्रीका की भी। दोनो की झोली में कुछ आएगा ही। भारत को विश्व विजेता का तमगा मिलेगा और दक्षिण अफ्रीका के हिस्से चोकर्स होने का कलंक।

लेकिन है तो ये खेल का मैदान ही। तो क्यों ना हम किसी की हार में उतने ही सहभागी हैं जितने वे खुद। हम उनकी हार में उतने ही गमगीन हों जितने किसी की जीत से उल्लसित।

फिलवक्त जीत मुबारक।

Saturday 29 June 2024

यूरो कप 02



कल यूरो कप 2024 का चौथा दिन। 

पहला मैच विश्व नंबर दो फ्रांस और ऑस्ट्रिया के मध्य था। फ्रांस की टीम 2022 के विश्व कप में एक रोमांचक फाइनल में अर्जेंटीना से हारकर विश्व चैंपियन बनने से चूक गई थी। लेकिन यहां सबसे फेवरिट टीम के रूप आई हैं जिसकी अगुवाई विश्व के सबसे तेजतर्रार स्ट्राइकर किलियन बापे कर रहे हैं और निर्देशन कोच डेशचैंप्स। वे एक खिलाड़ी और कोच के रूप में विश्व कप जीतने के बाद यूरो कप भी जीतने की चाहत लिए हुए हैं।

 दूसरी ओर ऑस्ट्रिया की टीम  इस समय विश्व रैंकिंग में 25वीं पायदान पर है। लेकिन वो अपने लगातार पिछले 070मैच जीतकर सातवें आसमान पर है और किसी भी अपसेट के लिए तैयार। उसके कोच राल्फ रेंगनिक ने टीम को मजबूत बनाया है और आत्मविश्वास से भर दिया है।

कई बार दूसरे हमें नहीं हरा पाते। हम खुद से हार जाते हैं। बेल्जियम स्लोवेनिया से इसलिए हार गया कि उसके अपने खिलाड़ी ड्यूका ने एक गलत पास के रूप स्लोवेनिया को गोल ही नहीं परोसा बल्कि उसको एक अप्रत्याशित जीत भी परोस दी। फ्रांस ऑस्ट्रिया मैच में भी ऐसा ही कुछ हुआ। फ्रांस कहां जीता। ऑस्ट्रिया हारा खुद से। फ्रांस बढ़िया खेला। पर ऑस्ट्रियाई रक्षण को नहीं भेद पाया। तब पहले हाफ के 37वें मिनट में कप्तान बापे ने बहुत तेज मूव बनाया और बाएं फ्लैंक से एक समानांतर पास बॉक्स में अपने साथी को देना चाहा। बीच में ऑस्ट्रिया का मैक्समिलियन वोबर ने हेडर से बॉल को क्लियर करना चाहा और बाल नेट ने उलझा दी। ये मैच का एकमात्र गोल था। इसके बाद फ्रांस ने बढ़त को दुगुना करने की भरसक कोशिश की। पर नतीजा कोई नहीं निकला। हां इस प्रयास में बापे अपनी नाक तुड़वा बैठे और कम से कम अगले दो मैच नहीं खेल पाएंगे। इतना ही नहीं यूरो कप में अपना पहला गोल करने के लिए कुछ और ज्यादा इंतजार करना पड़ेगा।

ये रोमांच से भरा खेल रविवार था

14 जुलाई 2024, रविवार का दिन। एक ऐसा दिन जिसे नियति ने मानो खेल और केवल खेल के लिए निर्धारित किया हो। मानो उसने कहा हो इस दिन बस खेल होंगे ...