Monday, 14 September 2026

सब्र का फल मीठा होता है




ये 14 सितंबर 2020 की तारीख थी। न्यूयॉर्क के फ्लशिंग मीडोज पर यूएस ओपन का पुरुष एकल फाइनल जर्मनी के अलेक्जेंडर ज्वेरेव और ऑस्ट्रिया के डोमिनिक थिएम के बीच खेला जा रहा था। ज्वेरेव पहले दो सेट 6-2, 6-4 से जीतकर कर अपनी पहली ग्रैंड स्लैम जीत से केवल एक सेट की दूरी पर थे। लेकिन अगले दो सेट थिएम ने 6-4, 6-3 से जीतकर मैच को बहुत रोचक बना दिया। ज्वेरेव ने फाइनल सेट में एक बार फिर बेहतरीन खेल दिखाया और 5-3 की बढ़त के साथ अपनी सर्विस पर 30-0 के स्कोर से आगे थे और केवल जीत से केवल दो अंक दूर थे। लेकिन वे मैच हार गए। 

अब उनकी आँखों में दुख और पश्चाताप के आंसुओं के सिवा कुछ ना था। ट्रॉफी प्रेजेंटेशन सेरेमनी में बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए ज्वेरेव अपनी टीम को संबोधित करते हुए कह रहे थे "मुझे उम्मीद है कि एक दिन हम सब मिलकर उस ट्रॉफी को उठाएंगे।"

इस बात को छह साल बीत गए। 13 सितंबर 2026 को ज्वेरेव एक बार फिर आर्थर ऐश एरीना में फाइनल खेल रहे थे। इस बार वे चैंपियन की मानसिकता से खेल रहे थे और बेन शेल्टन को 6-3, 7-6 (7-2), 5-7,6-4 से हराकर छह साल पहले अपने खेल करियर की सबसे खराब मेमोरी को डिलीट करते हुए अपनी टीम को संबोधित करते हुए कह रहे थे “हमने 30 साल तक कोई ग्रैंड स्लैम खिताब नहीं जीता था, और अब हमने तीन महीने के भीतर दो खिताब जीत लिए हैं। मुझे लगता है कि भगवान ने हमारी मेहनत, हमारे कष्ट और हमारे दर्द को देखा है। मुझे लगता है कि 2026 उन सभी वर्षों का परिणाम है जो इससे पहले हुए हैं, इसलिए आप सभी का धन्यवाद। आप लोग सचमुच अद्भुत हैं, और आप लोगों के बिना मैं यहाँ नहीं हो सकता था।”

इस जीत के साथ वे अपना दूसरा ग्रैंड स्लैम ही नहीं जीत रहे थे बल्कि उस लोकप्रिय कहावत को कुछ और वजन भी प्रदान कर रहे थे जो कहती है 'सब्र का फल मीठा होता है।'

अपनी पहली ग्रैंड स्लैम फाइनल हार के बाद इस साल अप्रैल तक वे दो और ग्रैंड स्लैम फाइनल खेले,लेकिन जीत नहीं पाए। वे 1995-2000 के बीच जन्मे 'नेक्स्ट जेन पीढ़ी' के मेदवेदेव,सिटसिपास,डोमिनिक थिएम, रूबलेव, बेरेटिनी और कैस्पर रुड में सबसे प्रतिभाशाली थे। ये एक ऐसी पीढ़ी थी जो दो पीढ़ियों के बीच सैंडविच बन गई और जिसे बहुत सारी उपलब्धियों से महरूम कर दिया गया। एक तरफ उम्र की सीमा के पार जाकर भी बिग थ्री के राफा,नोवाक और फेडरर ने इस पीढ़ी को अपना स्थान बनाने के लिए कोई स्पेस नहीं दिया। और जब ये तीनों कुछ निस्तेज होते, उससे पहले ही इनके बाद वाली पीढ़ी की प्रतिभा ने उन्हें कोई स्पेस क्रिएट नहीं करने दिया जिसकी नुमाइंदगी यानिक सिनर और अलकराज जैसे खिलाड़ी कर रहे हैं। 

जिस समय इन दो पीढ़ियों के खिलाड़ियों की प्रतिभा के बीच इस नेक्स्ट जेन पीढ़ी के खिड़कियों की प्रतिभा फेड हो रही थी,उस समय में अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने धैर्य के साथ अपने समय की प्रतिक्षा की। संयम रखा। अपनी प्रतिभा की धार पर सान चढ़ाई। संघर्ष जारी रखा। अपनी ऊर्जा बनाए रखी। परिणाम सामने था।

2026 तक आते आते राफा और फेडरर इतिहास बन चुके थे। नोवाक इतिहास बनने के कगार पर थे। नई पीढ़ी अपनी चोटों से जूझ रही थी। ये ज्वेरेव के लिए मौका था। उनका समय आ गया था। ऑस्ट्रेलिया ओपन के वे सेमीफाइनल में हार गए। लेकिन फ्रेंच ओपन जीतकर अपने ग्रैंड स्लैम खिताब का खाता खोला। विंबलडन में वे चैंपियन की तरह खेले। फाइनल तक पहुंचे। यहां वे चूक गए। लेकिन न्यूयॉर्क में वे इस बार एक चैंपियन की ऊर्जा और मानसिकता के साथ पहुंचे थे और वैसा ही उन्होंने खेला। जहां छह साल पहले उनके हाथों से ट्रॉफी छीन ली गई थी, वो उनके हाथों की शोभा बढ़ा रही थी। उनके अधर उसे स्पर्श कर रहे थे।

कोई भी जीत ऐसे ही किसी का दामन नहीं थामती। वे खेल में इंतिहाई तरीके से खेल में इन्वॉल्व थे। वे खेल पर और हरेक अंक पर इस कदर फोकस्ड थे कि उन्हें अपनी जीत का पता ही नहीं चला। वे चैंपियनशिप अंक जीतकर अगली सर्विस के लिए बेसलाइन पर पहुंच गए थे। तब उनकी टीम से इशारा हुआ कि वे जीत चुके हैं। उनके चेहरे पर हल्का सा विस्मय फैला। मुस्कुराहट उनके चेहरे का आवरण बन गई। उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला दिए। सारा आकाश उन्होंने अपने अंक में समेट लिया। खुशी ने अपना स्पेस आंखों में ढूंढा। खुशी तरल हो आंखों में समा गई। 

एक खिलाड़ी जिसके लिए चैंपियन बनना 29 साल तक केवल एक सपना भर रह गया था। तीन महीनों के अंतराल में वो दो बार चैंपियन बन गया था। सपनों से परे। असल जिंदगी में।

अलेक्जेंडर ज्वेरेव के लिए सब्र का फल मीठा था।



पर बेन शेल्टन का क्या!

उनका क्या जिनके लिए प्रतीक्षा समाप्त नहीं होती।  वो बेचैनी पैदा करती है। कसक काँटे की तरह दिल में कचोटती है। प्रतीक्षा कुछ और लंबी होती जाती है। जैसे बेन के लिए। अमेरिका के लिए। अमेरिका के टेनिस प्रेमियों के लिए। अश्वेत अमेरिकन्स के लिए।

बेन शेल्टन स्टेडियम में बैठे उन 24 हजार अमेरिकन्स की उस उम्मीद के लिए खेल रहे थे जो कहती थी कि इस मैदान पर 2003 में एंडी रोडिक के बाद एक नया अमेरिकन खिलाड़ी चैंपियन बनेगा। वे उन अश्वेत अमेरिकन्स की उम्मीदों का बोझ लिए खेल रहे थे जो प्रतीक्षा कर रहे थे कि 1968 में आर्थर ऐश के बाद कोई अमेरिकन अश्वेत यूएस चैंपियन बनेगा। शेल्टन खुद के पहले ग्रैंड स्लैम खिताब जीत लेने के सपने को पूरा करने के लिए खेल रहे थे। 

इस उम्मीद के लिए उन सभी के पास एक वाजिब कारण था। एक स्मृति थी। एक चार महीने पहले हुए अंतहीन प्रतीक्षा की समाप्ति की स्मृति। उनकी स्मृति में एक ऐसी जीत थी जो 53 साल बाद संभव हुई थी। न्यूयॉर्क निक्स ने 1973 के बाद अपना कोई एनबीए खिताब जीता था। 13 जून को पांचवें गेम में सान एंटोनियो स्पर्स को हराकर 4-1 से। इससे पहले चौथे गेम में इसी शहर के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन एरीना में न्यूयॉर्क निक्स की टीम तीसरे क्वार्टर तक 29 अंकों से पिछड़ चुकी थी। लेकिन निक्स ने 107-106 से ये मुकाबला जीत लिया था। एनबीए के फाइनल्स के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। अमेरिकन्स जानते थे,चमत्कार होते हैं। इसी शहर में चार महीने पहले की स्मृति उनके पास थी।

पर चमत्कार हमेशा नहीं होते। उन सब के लिए प्रतीक्षा अधूरी रही।

शेल्टन उम्मीदों के बोझ तले दब गए। पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने के तनाव को ठीक तरह से हैंडल करने से चूक गए। विपक्षी के अनुभव से पिछड़ गए। 

वे हार गए क्योंकि आंकड़े और अनुभव दोनों ही ज्वेरेव के पक्ष में थे। ज्वेरेव ने शुरु से ही इसका फायदा उठाया। उनकी सर्विस इतनी जोरदार थी कि पहले दो सेटों में अपनी पहली सर्व पर केवल तीन अंक गंवाए। कोई ब्रेक प्वाइंट शेल्टन को नहीं दिया। हां,तीसरे सेट के 12वें गेम में ज़्वेरेव की सर्विस शेल्टन ने ब्रेक की और सेट जीतकर अपनी उम्मीदें जिंदा रखीं। लेकिन इससे परिणाम नहीं बदलना था। नहीं ही बदला। ज़्वेरेव ने चौथे सेट के शुरु में ही शेल्टन की सर्विस ब्रेक की और फिर सातवें गेम में दूसरी बार सर्विस ब्रेक कर साढ़े तीन घंटे के संघर्ष को विराम दिया।

यूएस ओपन को एक नया चैंपियन मिल गया था।

ये अलेक्जेंडर साशा ज्वेरेव थे।

चैंपियनशिप साशा को मुबारक।

Sunday, 13 September 2026




शनिवार की दोपहर न्यूयार्क के फ्लशिंग मीडोज के आर्थर ऐश एरीना में खेला गया 2026 के यूएस ओपन का महिला एकल फाइनल अपने आप में कमाल का था। कमाल का इसलिए कि ये मैच योग्यता में एकदम समान दोनों नंबर एक लेकिन व्यक्तित्व में एकदम विपरीत स्वभाव वाली खिलाड़ियों के बीच मुकाबला था।

एक समान स्तर पर खेला गए बेहद संघर्षपूर्ण मैच। जो दो घंटे तेरह मिनट और तीन सीटों तक चला। जिसे अंततः रायबाकिना ने 6-4,5-7,6-2 से जीत लिया। और जीतकर ना केवल सबालेंका को लगातार 99 सप्ताह तक नुमाबरपर रहने के बाद उससे पदच्युत कर दिया बल्कि यूएस ओपन की चैंपियन होने के गौरव से भी वंचित कर दिया।

सबालेंका एक लंबी और मजबूत कद काठी की खिलाड़ी हैं जो अपने उग्र और आक्रामक स्वभाव के लिए जानी जाती हैं। अपने स्वभाव के अनुरूप ही उनकी पोशाक गहरे लाल रंग की थी। फाइनल में जब वे कोर्ट में प्रवेश कर रहीं थीं तो उनकी जैकेट भी वैसी ही गहरे लाल रंग की थी। उनके ठीक विपरीत रायबाकिना दुबली-पतली छछहरी काया वाली सौम्य सी खिलाड़ी हैं। शांत और गंभीर स्वभाव की। बर्फ की मानिंद अपनी भावनाओं को फ्रीज़ किए हुए। जब वे फाइनल में कोर्ट में प्रवेश कर रही थीं तो उनकी सफेद जैकेट उनके स्वभाव से के अनुरूप ही थी। वे इस बार पीले रंग के टॉप में खेल रही थीं। मानो उन्हें अपने नंबर एक बन जाने और ये खिताब जीत लेने का आभास हो गया था और वे अपनी जीत के बसंत का उत्सव मनाने मैदान में उतरी हों। उनका पीला टॉप और काली स्कर्ट बीच मैदान मधुमक्खी का एक शानदार रूपक प्रस्तुत कर रही होती थीं जो अपने शानदार खेल के डंक से विपक्षी खिलाड़ी की उम्मीदों के मकरंद को चुरा लेती और उसे अपनी जीत के आनन्द के मधु में परिवर्तित कर देती।

सबालेंका पिछले 99 हफ्तों से नंबर एक की पोजीशन पर हैं। औपचारिक रूप से फाइनल खेले जाने तक वे नंबर एक हैं। लेकिन जैसे ही एलिना रायबाकिना ने यहां सेमीफाइनल में प्रवेश किया,वे अनौपचारिक रूप से नंबर एक खिलाड़ी हो गई थीं। ये क्या ही मज़ेदार स्थिति थी कि शनिवार को जिस समय दो खिलाड़ी अपना फाइनल खेल रही थीं तो उस समय औपचारिक रूप से सबालेंका नंबर एक और रायबाकिना नंबर दो थीं। जबकि अनौपचारिक रूप से स्थित इसके एकदम विपरीत थी। इतना ही नहीं वे इससे पहले दो ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल चुकी थीं। और दोनों ने एक-एक बार एक दूसरे को हराकर ऑस्ट्रेलिया ओपन जीता था। सबालेंका ने 2023 में और रायबाकिना ने 2026 में। इस साल दोनों चार बार एक दूसरे के साथ खेली थीं और दोनों ने बराबर जीत हासिल की थीं। रायबाकिना ने ऑस्ट्रेलिया ओपन और डब्ल्यूटीए टूर्स फाइनल में जीत हासिल की तो सबालेंका ने मियामी ओपन के सेमीफाइनल और इंडियन वेल्स ओपन के फाइनल में रायबाकिना को हराया। इतना ही नहीं दोनों पावर खेल की चैंपियन खिलाड़ी हैं। और तेज सर्विस के लिए और बेसलाइन के शानदार खेल के लिए जानी जाती हैं।

ये रायबाकिना का दृढ़ संकल्प और इच्छा शक्ति ही थी कि वे यहां लगभग असंभव जीत हासिल करती हैं। वे यूएस ओपन में पैर की चोट के साथ आती थीं और एक हफ्ते तक तो टेनिस खेल तक नहीं पातीं। वे यूएस ओपन से पहले होने वाले सिनसिनाटी ओपन के क्वार्टर फाइनल में इगा स्वीयेक के खिलाफ चोट के चलते हट गई थी। लेकिन एक बार जब उन्होंने प्रतियोगिता में अपना विजयी अभियान शुरु किया तो मुड़कर नहीं देखा। वे बिना एक भी सेट गंवाए क्वार्टर फाइनल में पहुंचती हैं। और फिर क्वार्टर फाइनल में नाओमी ओसाका और सेमीफाइनल में ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता झेंग के विरुद्ध एक सेट से पिछड़ने के बावजूद जीत हासिल करती हैं।

ये एक संयोग ही कहा जायेगा कि पूर्व सोवियत यूनियन के दो संघटक देशों बेला रूस और कज़ाकिस्तान से दो बालाएं  हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका आती हैं और सबालेंका पेगुला को और रायबाकिना कोको गफ को सेमीफाइनल में हराकर अमेरिकी उम्मीदों को मटियामेट कर देती हैं। 

रायबाकिना की ये जीत उन्हें विश्व महिला टेनिस परिदृश्य पर अब सबसे मजबूत और शानदार खिलाड़ी के रूप में ही स्थापित नहीं करती,बल्कि महिला टेनिस की नंबर एक खिलाड़ी के रूप में भी स्थापित करती है। इतना ही नहीं ये महिला टेनिस की एक और शानदार प्रतिद्वंदिता की नींव भी रखती है। सबालेंका बनाम रायबाकिना।

रायबाकिना को ये शानदार जीत मुबारक।






नुवाद विधा अपने पाठकों को दूसरी भाषाओं और उसके साहित्य संसार में आवा जाही की सुविधा प्रदान करती है। इन दिनों अन्य भाषाओं से और विशेष रूप से अंग्रेजी से हिंदी में खूब अनुवाद हो रहा है। इधर अंग्रेजी में लिखी गई चार पुस्तकें और उनका हिंदी अनुवाद खूब चर्चा में रहा।

नेहा दीक्षित एक प्रसिद्ध पत्रकार हैं, जिन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं और इन दिनों फ्रीलांसिंग कर रही हैं। उन्होंने नौ साल के गहन रिसर्च और लगभग नौ सौ लोगों से साक्षात्कार करने के बाद एक पुस्तक लिखी 'द स्टोरी ऑफ अननोन इंडियन : द मैनी लाइव्स ऑफ सईदा एक्स '। इसका हिंदी में 'कोई एक सईदा' के नाम से अनुवाद आया। दूसरी किताब जानी मानी अंग्रेजी लेखिका और बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय की आत्म कथा 'मैरी कम्स टू मी' है जिसका हिंदी अनुवाद 'मेरी मां गैंगस्टर' शीर्षक से आया। रस्किन बॉन्ड अपनी तरह के अनोखे और सुप्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक हैं। उनकी आत्मकथा 'लोन  फॉक्स डांसिंग:माई ऑटो बायोग्राफी' का हिंदी अनुवाद 'अपनी धुन में'  शीर्षक से आया। चौथी किताब जाने माने पत्रकार मार्क टली की 'अपकंट्री टेल्स:वंस अपऑन अ टाईम इन द हर्ट ऑफ़ इंडिया'  है जिसका अनुवाद 'धीमी वाली फास्ट पैसेंजर' के नाम से आया है। 


1.कोई एक सईदा

नेहा दीक्षित की किताब 'कोई एक सईदा' बहुत शानदार है। ये नामालूम सी महिला श्रमिक सईदा (बदला नाम) की बायोग्राफी और डॉक्यूमेंट्री है। सईदा बनारस के एक बुनकर परिवार की महिला है जो साल 1992 में 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों से उत्पन्न परिस्थितियों के कारण बनारस से विस्थापित होकर परिवार सहित दिल्ली में शरण लेती है। यहां उसके सामने सबसे बड़ा संकट अपना और अपने परिवार के सर्वाइवल का आता है क्योंकि उसके पास सर ढंकने के लिए ना कोई छत है, ना ही कोई नौकरी या रोजगार। पूंजी के नाम पर कुल जमा तीन हजार रुपए। 

अब उसका संघर्ष शुरू होता है। यहां जो वो पहला काम शुरू करती है वो है लांड्री का। होटल में विदेशी सैलानियों के कपड़े धोने का। जल्द ही आशियाना बदलता है और काम भी। दूसरा काम मसालों को साफ करने का मिलता है। और फिर जिदगी को ढर्रे पर लाने की जद्दोजहद में कभी वो खुद काम छोड़ देती है और कभी छूट जाता है। इस तरह उसे हर बार एक अलग काम पकड़ना पड़ता है जिसमें किशमिश की डंठल बीनना,नमकीन बनाना,बादाम गिरी निकालना,जींस के धागों की तुरपाई,जरी का काम शादी के कार्ड बनाना,अगरबत्ती,सॉफ्ट टॉय,गजक, अगरबत्ती बनाने जैसे काम शामिल हैं। इस दौरान वो केवल अपने परिवार के अस्तित्व की लड़ाई ही नहीं लड़ती बल्कि मजदूरों के हक़ और हुकूक की लड़ाई भी लड़ती है। 

ज़री,किशमिश,गजक, डोर नॉब,बादाम,सॉफ्ट टॉय, अगरबत्ती,तिरंगा और शादी के कार्ड नाम से नौ भागों में लिखी गई ये किताब एक अत्यंत साधारण महिला की एक ऐसी असाधारण कहानी कहती है कि जो 1990 के बाद के तीन दशकों के उत्तर भारत के राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज बन जाती है। 1992 के बाबरी मस्जिद के बाद हुए दंगे और 2020 के दिल्ली दंगों के बीच किस तरह भारतीय समाज और  हिन्दू-मुस्लिम संबंध विकसित हुए,उसकी सूक्ष्म और गहरी पड़ताल भी इस किताब में है। ये निम्न वर्ग की एक महिला के अपने जीवन और अपने परिवार के जीवन को चलाने और सरवाइव करने के लिए किए गए संघर्षों का उम्मीद से भरा बयान है। विस्थापन की मार्मिक कहानी भी है कि किस तरह परिस्थितियां लोगों को अपनी भूमि से उजड़ कर दूसरी जगह पलायित होने को मज़बूर करती हैं और अपने जीवन संघर्षों में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि वापसी की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। विडंबना ये कि अगर कोई वापस लौटना भी चाहे तो खुद उसके परिवार वाले ही उसे असंभव बना देंगे क्योंकि जीवन की खुरदुरी वास्तविकता उन्हें परिजन नहीं प्रतिस्पर्धी बना देती है। आर्थिक उदारीकरण के बाद वाले इस दौर में जीवन यापन किस कदर कठिन हो गया है कि बनारस से दिल्ली पलायन के बाद सईदा को अपनी जीविका के लिए कितने ही काम करने पड़ते हैं। उसे बार बार अपना काम बदलना होता है। इसमें एक तरफ बनारस के बुनकर समाज की झलक है तो दूसरी और दिल्ली आउटसोर्सिंग से काम कराए जाने की पद्धति के ब्यौरे भी हैं। इसमें अगर दिल्ली के बाहरी इलाकों में औद्योगिक विकास का कुरूप चेहरा है तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्या और बदहाली भी अपनी विद्रूपता के साथ उपस्थित होती है। 


2. मेरी माँ गैंगस्टर

जानी मानी अंग्रेजी लेखिका अरुंधति रॉय की आत्मकथा है। इस किताब के हाथ में आते ही उसके हिंदी शीर्षक से दो सवाल मन में उठते हैं। पहला, क्या ये किताब उनकी माँ के बारे में है। और दूसरा, क्या गैंगस्टर शब्द का प्रयोग रुचिकर है। दूसरे सवाल के बारे में क्या ही कहा जा सकता है लेकिन, हां, आत्मकथा में माँ  केंद्र की तरह उपस्थित हैं जिसके इर्द गिर्द लेखिका की जिंदगी अपना रास्ता बनाती है। मां को केंद्र में रखकर लिखी गई ये आत्मकथा दरअसल उनके अपनी माँ के साथ प्रेम और बेरुखी के बीच झूलते संबंध का बेबाक बयान है। माँ बेटी का ये सम्बन्ध बहुत ही जटिल है। एक तरफ उनकी माँ उनके साथ एक डिक्टेटर की तरह व्यवहार करती है और उन्हें गाली तक देती है। संबंधों में इतनी कटुता है कि वे अठारह साल की उम्र में घर छोड़ देती हैं तो सात आठ साल तक माँ से मिलती तक नहीं हैं और ना ही माँ इस दौरान उनकी कोई खोज खबर लेती हैं। दूसरी और वे माँ से बहुत प्रभावित हैं और अपने में उनका अक्स देखती हैं और अपने व्यक्तिव के निर्माण में माँ के योगदान को स्वीकृति हैं। वे सीरियाई ईसाई समाज के उत्तराधिकार नियम में बदलाव के लिए माँ के संघर्ष,उनके अनोखे स्कूल की स्थापना और सिंगल पेरेंट के रूप दो बच्चों की परवरिश का विस्तार से ना केवल वर्णन करती हैं बल्कि उससे बहुत मुत्तासिर भी होती हैं। 

लेकिन ये आत्मकथा केवल अपने और माँ के जटिल संबंधों पर ही बात नहीं करती बल्कि इसमें खुद के जीवन निर्मिति की बेबाक और यथार्थ आत्म स्वीकृति भी है। स्त्री गरिमा और अस्मिता का आख्यान भी है। साथ ही नर्मदा बचाव आंदोलन जैसे तमाम सामाजिक राजनीतिक आंदोलन में भागीदारी और उस पर बेबाक राय भी है।


3.अपनी धुन में 

जहां अरुंधति की आत्मकथा रूक्ष भूमि पर लिखी गई है,वहीं अंग्रेजी के प्रसिद्ध  लेखक रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा कोमल भूमि पर लिखी गई है। एंग्लो इंडियन रस्किन अपनी तरह के अनूठे और बहुत ही लोकप्रिय लेखक हैं। ये आत्मकथा अपने आप में एक सुरीली धुन है जिसे एक बार सुनना शुरू किया तो इसमें इस कदर डूब जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कब खत्म हो आती है। इसमें आजादी से पहले और बाद का,दोनों भारत उपस्थित हैं। इसमें जामनगर है।देहरादून है। शिमला है। मसूरी है। दिल्ली है। लंदन और वेल्स भी है। उन्हें पहाड़ से प्रेम है और पहाड़ इसमें अनिवार्यतः आते हैं। वे अविवाहित हैं। इसलिए अकेलेपन की एक उदास अनुगूंज उनकी इस जीवन धुन की पृष्ठभूमि में अंतर्निहित है। 

चार खंडों में लिखी गयी आत्मकथा के पहले खंड में जन्म से लेकर पिता की मृत्यु तक की कहानी है। दूसरे खंड में पिता की मृत्यु के बाद से उनके इंग्लैंड जाने तक के जीवन का वृतांत है। तीसरे खंड में अपने इंग्लैंड प्रवास और वापसी पर एक पूर्णकालिक लेखक के रूप में स्थापित होने के वृतांत हैं और अंतिम भाग में उनके बाद के जीवन का आत्मकथ्य है। हां, जितनी मार्मिक और सुंदर कथा अपने जीवन के पूर्वार्ध की कही है,वैसी उत्तरार्ध की नहीं कह पाये। शायद दूर का जीवन अधिक सूक्ष्म से दिखाई देता रहा होगा और निकट भूत ने उन्हें उस तरह से कहने लायक ना लगा हो। 

निसंदेह एक उम्दा आत्मकथा है।


4.धीमी वाली तेज पैसेंजर 

सभी जानते हैं कि मार्क टली एक प्रख्यात पत्रकार थे। वे भारत में बीबीसी के प्रतिनिधि की हैसियत से आए थे। हालांकि बाद में बहुत समय तक फ्रीलांसिंग भी की। वे लंबे समय तक भारत में रहे और यहां से उनका गहरा लगाव था। उन्होंने भारत को,यहाँ के जीवन को बहुत गहराई से समझा था। धीमी वाली पैसेंजर की कहानियां इस बात की पुष्टि करती प्रतीत होती हैं। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश  का सामाजिक राजनीतिक जीवन अपने पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित है।  ये कहानियां पिछली सदी के अस्सी के दशक के पूर्वी उत्तर प्रदेश के कस्बाई जीवन का आइना हैं।

इसमें कुल मिलाकर सात कहानियां हैं। इस संग्रह का शीर्षक संग्रह की छठी कहानी के नाम पर जिसमें एक सांसद अपनी फैक्ट्री चलने के लिए पैसेंजर ट्रेन को बंद कराना चाहता है और जनता उसके खिलाफ संघर्ष करती है। पहली कहानी टीले वाले मंदिर की है जिसमें दलित बुधराम द्वारा गांव में संत रैदास के मंदिर बनवाने,उसमें अगड़ों के अड़ंगे और उनसे संघर्ष की कहानी है। दूसरी कहानी मिलन पुर में क़त्ल ग्रामीण जीवन में पुलिस और सीआईडी जैसी संस्थाओं की भूमिका और भ्रष्टाचार की कहानी कहती है। हलवाहे का संताप शीर्षक वाली कहानी उस दौर की कहानी है जब किसान के लिए बैंक से लोन लेना महाभारत था।किसान अपनी इज्ज़त के लिए कर्जदार होता जाता और अंततः कोर्ट कचहरी के चक्कर में सब कुछ गंवा देता है। खानदानी धंधा बाहर पढ़े लिखे एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो अपने पिता की राजनीतिक विरासत से अपना करियर बनाना चाहता है लेकिन हवा हवाई ख्याल और जमीनी हक़ीकत की जानकारी के अभाव में मुँह की खाता है। वो समझ पाता है कि राजनीति खानदानी पेशा नहीं है। दो अन्य कहानियां हैं  एक गांधवादी की प्रेम कथा और किस्सा एक भिक्षु का।

ये कहानियां बताती हैं उन्होंने यहां रहकर केवल अपना काम भर नहीं किया बल्कि इसे जिया भी है।

ये चारों किताबें अलग अलग जॉनर की किताबें हैं। लेकिन इनमें कुछ समानताएं हैं। ये चारों किताबें अंग्रेजी में लिखी गईं और इन चारों का हिंदी अनुवाद जाने माने छायाकार,पत्रकार, लेखक-अनुवादक प्रभात सिंह ने किया है। ये चारों ही शानदार अनुवाद हैं। बहुत ही सहज और सरल। प्रवाहमान। लगता है आप मूल हिंदी में लिखी किताब ही पढ़ रहे हैं। हां आज हिंगलिश के ज़माने में उर्दू शब्दों का खूब प्रयोग किसी को खल सकता है क्योंकि हमने उर्दू के सामान्य शब्दों का उपयोग करना भी बंद कर दिया है। लेकिन ये शब्द सही मायने में गद्य के स्वाभाविक प्रवाह को बनाए रखते हैं। इन किताबों के अनुवाद के लिए प्रभात सर को साधुवाद कहना तो बनता है।



(अक्षत पत्रिका के लिए फिर से लिखा गया आलेख)




Friday, 11 September 2026

 



पिछले सप्ताह चार पुस्तकें पढ़कर पुस्तकें समाप्त की। नेहा दीक्षित की 'कोई एक सईदा', अरुंधति रॉय की 'मेरी मां गैंगस्टर', रस्किन बॉन्ड की अपनी धुन में' और मार्क टली की किताब 'धीमी वाली फास्ट पैसेंजर'।

नेहा दीक्षित की किताब शानदार है। ये एक नामालूम सी महिला श्रमिक सईदा (बदला नाम) की बायोग्राफी और डॉक्यूमेंट्री है। ये किताब एक अत्यंत साधारण महिला की एक ऐसी असाधारण कहानी कहती है कि ये 1990 के बाद के तीन दशकों के उत्तर भारत के राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज बन जाती है। 1992 के बाबरी मस्जिद ढहने के बाद हुए दंगे और 2020 के दिल्ली दंगों के बीच किस तरह भारतीय समाज और  हिन्दू-मुस्लिम संबंध विकसित हुए,उसकी सूक्ष्म और गहरी पड़ताल इस किताब में है। ये निम्न वर्ग की एक महिला के अपने जीवन और अपने परिवार के जीवन को चलाने और सरवाइव करने के लिए किए गए संघर्षों का बयान है। ये विस्थापन की मार्मिक कहानी भी है कि किस तरह परिस्थितियां लोगों को अपनी भूमि से उजड़ कर दूसरी जगह पलायित होने को मज़बूर करती हैं और फिर वे अपने जीवन संघर्षों में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि वापसी की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। विडंबना ये कि अगर कोई वापस लौटना भी चाहे तो खुद उसके परिवार वाले ही उसे असंभव बना देंगे क्योंकि जीवन की खुरदुरी वास्तविकता उन्हें परिजन नहीं प्रतिस्पर्धी बना देती है। इस आर्थिक उदारीकरण के बाद वाले दौर में जीवन यापन किस कदर कठिन हो गया है कि बनारस से दिल्ली पलायन के बाद सईदा अपनी जीविका के लिए अलग अलग पचास से अधिक काम करती है। उसे बार बार अपना काम बदलना होता है। इसमें एक तरफ बनारस के बुनकर समाज की झलक है तो दूसरी और दिल्ली आउटसोर्सिंग से काम कराए जाने की पद्धति के ब्यौरे भी हैं। इसमें अगर दिल्ली के बाहरी इलाकों में औद्योगिक विकास का कुरूप चेहरा है तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्या और बदहाली भी अपनी विद्रूपता के साथ उपस्थित होती है।

'मेरी मां गैंगस्टर' जानी मानी अंग्रेजी लेखिका अरुंधति रॉय की आत्मकथा है। अपनी मां को केंद्र में रखकर लिखी गई इस आत्मकथा में अपनी मां के साथ प्रेम और बेरुखी के बीच झूलते सम्बंधों का बेबाक बयान ही नहीं है, बल्कि भारत के सीरियाई ईसाई समाज और खुद के जीवन निर्मिति की बेबाक और यथार्थ आत्म स्वीकृति भी है।

जहां अरुंधति की आत्मकथा रूक्ष भूमि पर लिखी गई हैं,वहीं अंग्रेजी के प्रसिद्ध  लेखक रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा 'अपनी धुन में' कोमल भूमि पर लिखी गई है। एंग्लो इंडियन लेखक रस्किन बॉन्ड अपनी तरह के अनूठे और बहुत ही लोकप्रिय लेखक हैं। ये आत्मकथा अपने आप में एक सुरीली धुन है जिसे एक बार सुनना शुरू किया तो इसमें इस कदर डूब जाते हैं कि पता ही नहीं चलता खत्म हो जाती है। इसमें आजादी से पहले और बाद का,दोनों भारत उपस्थित हैं। इसमें जामनगर है। देहरादून है। शिमला है। मसूरी है। दिल्ली है। लंदन और वेल्स भी है। उन्हें पहाड़ से प्रेम है और इसलिए पहाड़ इसमें अनिवार्यतः आते हैं। वे अविवाहित हैं। इसलिए अकेलेपन की एक उदास अनुगूंज उनकी इस जीवन धुन की पृष्ठभूमि में अंतर्निहित है। हां, जितनी मार्मिक और सुंदर कथा अपने जीवन के पूर्वार्ध की कही है,वैसी उत्तरार्ध की नहीं कह पाए। शायद दूर का जीवन अधिक सूक्ष्म से दिखाई देता रहा होगा और निकट भूत ने उन्हें उस तरह से कहने लायक ना लगा हो। निसंदेह एक उम्दा आत्मकथा है।

सभी जानते हैं कि मार्क टली एक प्रख्यात पत्रकार थे। वे भारत में बीबीसी के प्रतिनिधि की हैसियत से आए थे। हालांकि बाद में बहुत समय तक उन्होंने फ्रीलांसिंग भी की। वे लंबे समय तक भारत में रहे और यहां से उनका गहरा लगाव था। उन्होंने भारत को   यहाँ के जीवन को बहुत गहराई से समझा था। 'धीमी वाली पैसेंजर' की कहानियां इस बात की पुष्टि करती प्रतीत होती हैं। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश  का सामाजिक राजनीतिक जीवन अपने पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित है। ये कहानियां बताती हैं उन्होंने यहां रहकर केवल अपना काम भर नहीं किया,बल्कि इसे जिया भी है। 

ये चारों किताबें अलग अलग समय पर खरीदी गईं और अब जाकर एक साथ ही पढ़ी गईं,ये संयोग ही है।  लेकिन इन चारों किताबों में समानता ये है कि ये चारों ही किताबें मूलतः अंग्रेजी में लिखी गईं और ये इन चारों के हिंदी अनुवाद हैं। इन चारों ही किताबें का अनुवाद जाने माने छायाकार,पत्रकार, लेखक प्रभात सिंह ने किया है। ये चारों ही शानदार अनुवाद हैं। बहुत ही सहज और सरल। प्रवाहमान। लगता है आप हिंदी में लिखी किताब ही पढ़ रहे हैं। हां आज हिंगलिश के ज़माने में कुछ उर्दू शब्दों का प्रयोग किसी को खल सकता है,क्योंकि हमने उर्दू के सामान्य शब्दों का उपयोग करना भी बंद कर दिया है। लेकिन ये शब्द सही मायने में गद्य के स्वाभाविक प्रवाह को बनाए रखते हैं।

इन किताबों के अनुवाद के लिए प्रभात सर को साधुवाद कहना तो बनता है।


Monday, 7 September 2026





जाने माने फुटबॉल कोच पेप गार्डियोला ने एक बार मेस्सी के बारे में कहा था “उनके बारे में मत लिखो। उनका वर्णन करने की कोशिश मत करो। उन्हें खेलते हुए देखो।”

कुछ खिलाड़ी खेल मैदान में खेल नहीं रहे होते हैं,वे एक जादू की निर्मिति कर रहे होते हैं और दर्शक उसके सम्मोहन में होते हैं। उन खिलाड़ियों की अपने विरोधियों से नहीं बल्कि समय से मुठभेड़ हो रही होती है। शमशेर बहादुर सिंह की पंक्तियां हैं "काल, तुझसे होड़ है मेरी। अपराजित तू— तुझमें अपराजित मैं वास करूँ। "

कुछ खिलाड़ियों को मैदान में खेलते हुए देखकर लगता है मानो ये पंक्तियां उनके लिए ही लिखी गई हों।
चालीस की उम्र में लेब्रान जेम्स जिस तरह की बास्केटबॉल खेल रहे हैं, लगता है, वे समय के विपरीत दिशा में दौड़ रहे हों। वे समय के सीने पर सफलता के नए मानक गढ़ रहे होते हैं। नोवाक जोकोविक भी लगभग इतनी ही उम्र में उस को चुनौती देते हुए सफलताओं के नए पैमाने तय कर रहे होते हैं। और उन्तालीस साल के मेस्सी का क्या। मेस्सी ने इस साल के फीफा विश्व कप में  दिखाया कि मानवीय क्षमता की सीमा को कहां तक विस्तारित किया जा सकता है।

भौतिक रूप से हर किसी को समय से पराजित हो जाना होता है। चाहे लेब्रान हों,नोवाक हों या मेस्सी हों। उन्हें समय के सामने नतमस्तक हो जाना है। मेस्सी ने भी समय के सामने सिर झुकाया और राष्ट्रीय टीम को विदा कहा। लेकिन बात इतनी भर नहीं है। काल से होड़ के इन इक्कीस सालों में वे काल के कपाल पर जीत की कहानी लिख चुके होते हैं। अपनी प्रतिभा और क्षमता से सफलता की उन अनंत ऊंचाइयों को नाप चुके होते हैं, जहां समय के हाथ नहीं पहुंचने वाले हैं। वे प्रसिद्धि की इबारत इतनी गाढ़ी रोशनाई से लिख चुके होते हैं कि इसे मिटा पाना अब किसी के बस की बात कहां। अपराजित वे काल की आत्मा में समा चुके होते हैं। 

अब जब तक फुटबॉल का खेल है,तब तक मेस्सी हैं। उनका नाम है। उनके खेल के जादू का सम्मोहन है।

आप इसे नियति कहिए या काल या फिर समय,उनकी बार बार उससे मुठभेड़ होती है। वे बार-बार उदास होते हैं। पानी उनकी आंखों में तैरता है। उनके कांधे झुकते हैं। पर वे हारते नहीं है। वे बार बार नियति से द्वंद्व में लौटते हैं। सफलता के नए प्रतिमान गढ़ते हैं। और अंततः एक महानायक की छवि के साथ अपने फुटबॉल खेल का ही नहीं बल्कि काल के साथ आंख मिचौली के खेल का भी समापन करते हैं।

मेस्सी की उम्र उस समय लगभग दस वर्ष रही होगी। वे तब तक ग्रैंडोली क्लब से नेवेल्स ओल्ड बॉयज क्लब में शामिल हो चुके थे। वे अपनी प्रतिभा के वहां झंडे गाड़ रहे थे और सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों में शुमार हो गए थे कि लियो को अपनी एक बीमारी का पता चलता है-ग्रोथ हार्मोन्स डेफिशिएंसी का। खर्चा बड़ा था जिसे ना परिवार उठा सकता था और ना क्लब। लगा एक शानदार प्रतिभा का अंत है ये।

ऐसे में बार्सीलोना के खेल निदेशक कार्ल रिक्सेस ने लियो की प्रतिभा को पहचाना,उसके साथ अनुबंध किया और उसके इलाज का प्रबंध भी। परिवार यूरोप आ गया। ये वर्ष 2000 था। बार्सिलोना अकादमी ने उस बालक की नैसर्गिक प्रतिभा को निखार दिया। और तब वर्ष 2005  में नीदरलैंड में आयोजित फीफा अंडर-20 विश्व कप जीतने में मेस्सी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने टूर्नामेंट में सबसे अधिक छह गोल किए जिसमें नाइजीरिया के खिलाफ 2-1 से फाइनल में जीत में किए गए दोनों गोल भी शामिल थे। इसके लिए उन्हें गोल्डन बूट और गोल्डन बॉल से सम्मानित किया गया।

लेकिन काल से द्वंद्व बना रहा। कुछ समय बाद ही 17 अगस्त 2005 को सीनियर टीम में उनका पदार्पण बेहद खराब रहा। हंगरी के खिलाफ दोस्ताना मैच में वे 63वें मिनट में स्थानापन्न खिलाड़ी के रूप में अर्जेंटीना के लिए मैदान में उतरे। एक मिनट से भी कम समय में उन्हें सीधा लाल कार्ड दिखाया गया,जब उन्होंने अपना हाथ घुमाया और उनकी कोहनी फुल-बैक विल्मोस वैन्ज़ाक से टकरा गई।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद खराब और कठिन शुरुआत के बावजूद, अंततः मेस्सी सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में से एक बन गए। और बहुत सारे लोगों के लिए महानतम।

उनके 21 साल के अंतरराष्ट्रीय करियर के दो मुख्तलिफ हिस्से हैं। पहला, 2005 से 2016 तक। इसमें वे और बार्सिलोना क्लब एक दूसरे का पर्याय बन जाते हैं। इस समय वे विश्व फुटबॉल परिदृश्य पर छा जाते हैं और उनकी गणना फुटबॉल इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में की जाने लगती है। अब एक तरफ मेस्सी और रोनाल्डो के बीच प्रतिद्वंदिता स्थापित होती है,तो दूसरी तरफ 'दूसरे माराडोना' के रूप में अपने पूर्वज फुटबॉलर की विरासत के वाहक बन जाते हैं। माराडोना कहते थे कि 'उन्हें मेस्सी के शरीर में अपनी आत्मा का आभास होता है।' 

इस समय में उन्होंने बार्सिलोना के लिए और अपने लिए कोई ऐसा खिताब नहीं था,जो ना जीता हो। उन्होंने ला लीगा के आठ,यूईएफए चैंपियंस लीग के चार,कोपा डेल रे के चार,फीफा क्लब वर्ल्ड कप के तीन खिताब जीते। इतना ही नहीं,एक ही सीजन में ला लीगा, कोपा डेल रे और चैंपियंस लीग तीनों जीतकर दो बार 'ट्रेबल' हासिल किया। इस समय में पांच बार 'बैलोन डी'ओर' पुरस्कार और तीन बार यूरोपियन गोल्डन शू अवार्ड जीते। 2012 में एक कैलेंडर वर्ष में  सर्वाधिक गोल 91 गोल का विश्व रिकॉर्ड भी मेस्सी ने हासिल किया।

लेकिन जिस समय वे बार्सिलोना के लिए खिताबों का अम्बार लगा रहे थे,उस समय वे अर्जेंटीना को कोई भी खिताब नहीं दिला सके। इस दौरान एकमात्र उपलब्धि 2008 में ओलंपिक गोल्ड रहा।  

2016 में एक बार फिर वे नियति के समक्ष नतमस्तक हुए। अपने 29वें जन्मदिन के ठीक दो दिन बाद कोपा अमेरिका कप के फाइनल में चिली के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में अर्जेंटीना की हार गया। स्वयं मेस्सी चूक गए थे। हार के बाद मेस्सी की आँखें नम थीं और वे कह रहे थे 'मेरे लिए राष्ट्रीय टीम का सफर खत्म हो गया है। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। चैंपियन न बन पाना दुखद है।'

ये निराशा स्वाभाविक थी। अर्जेंटीना 2014 विश्व कप के फाइनल में हार चुका था। साथ ही 2007, 2015 और अब 2016 के कोपा अमेरिका कप फाइनल में भी हार गया था। एक खिलाड़ी जो दुनिया का महानतम खिलाड़ी माना जाता हो,वो उन मौकों पर असफल रहा जो उसके लिए सबसे ज्यादा मायने रखते थे।

2016 में राष्ट्रीय टीम से विदा के अपने फैसले को अंततः उन्हें बदलना पड़ा। आखिर उन्हें अपने और अपने देश के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियां पानी बाकी जो थी। 

अब उनके खेल करियर का दूसरा हिस्सा शुरू होता है। 2016 से 2026 तक का। वे बार्सिलोना से अलग होते हैं। ये उनके लिए सबसे उदास कर देने वाली बात थी। और उन के लिए भी जिन्हें मेस्सी को नीली लाल धारियों वाली टी शर्ट से अलगाना मुश्किल था। उसके बाद वे सेंट जर्मेन पेरिस और इंटर मियामी के लिए खेले जरूर। पर उस तरह मन नहीं रमा पाए जैसे बार्सिलोना में रमा था। उनके सामने अब विकल्प के तौर पर राष्ट्रीय टीम थी। उनके पास सब कुछ था सिवाय राष्ट्रीय टीम के साथ कोई बड़े खिताब के। ये उनके खेल का अधूरापन था जिसे उन्हें मुकम्मल करना था। और कमाल है कि वे ऐसा कर पाते हैं। अब वे क्लब से कहीं ज्यादा राष्ट्रीय उपलब्धियों को हासिल करते हैं। वे उपलब्धियां जो उनकी सबसे बड़ी चाहना थीं और जो उनसे लगातार दूर भाग रही थीं।


मेस्सी की राष्ट्रीय टीम में वापसी से अर्जेंटीना टीम की  किस्मत रातों रात बदल गई हो,ऐसा नहीं था। 2018 के विश्व कप में अर्जेंटीना एक बार फिर राउंड ऑफ़ 16 से बाहर हो गई और 2019 के कोपा अमेरिका कप में उसे तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। लेकिन उसके बाद अर्जेंटीना और मेस्सी ने 2021 और 2024 में दो बार कोपा अमेरिका कप जीता। और फिर कतर में 2022 का फीफा विश्व कप जीता। हर फुटबॉलर का सबसे बड़ा सपना। मेस्सी का अपना खुद का अधूरा सपना। इतना ही नहीं,फिर 39 साल की उम्र में अमेरिका में आयोजित फीफा विश्व कप में अर्जेंटीना को अकेले दम पर लगातार दूसरी बार फाइनल तक पहुंचाया। उनके प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि उम्र के साथ मेस्सी की गोल करने की क्षमता में कोई कमी नहीं आई है। टूर्नामेंट में उनके आठ गोल केवल म्बाप्पे से कम थे। साथ ही मेस्सी ने चार असिस्ट भी किए।

और तब नियति को मेस्सी ने एक बार फिर अपने रास्ते में खड़ा पाया। जिस शानदार विदाई की वे और उनके चाहने वाले उमीद कर रहे थे,उससे वे वंचित रह गए। अर्जेंटीना फाइनल में स्पेन से हार गई। एक बार फिर मेस्सी की आँखें नम थीं। दो दिन बाद समय के समक्ष वे नतमस्तक हुए। नियति के सम्मान में उन्होंने अपने हाथों से तीन पन्नों का एक समर्पण पत्र लिखा। लेकिन उस समय तक नियति के कपाल पर अपना नाम हमेशा हमेशा के लिए अंकित कर चुके थे। स्वर्णाक्षरों में।

आखिर वो क्या चीज थी जो मेस्सी को मेस्सी बनाती है। वे एक नैसर्गिक खिलाड़ी थे जिनमें  प्रतिभा जन्मजात 'इन बिल्ट' थी। उसे उन्होंने अर्जित नहीं किया था। वे छोटे कद के थे। पांच फुट सात इंच के। कद काठी में भी वैसे मजबूत नहीं थे जैसे कि आज के खेल में एक खिलाड़ी को होना होता है। जैसे माराडोना थे। रोनाल्डो हैं। अर्लिंग हॉलैंड हैं। एमबापे हैं। दरअसल वे आधुनिक पावर खेल को अपनी कलात्मकता से स्थानापन्न कर देते हैं। और अपनी गति से भी। वे अपने पैरों से गेंद को ठीक उसी तरह से बरतते हैं जैसे ध्यान चंद अपनी हॉकी से गेंद को। वे खूबसूरत ड्रिबलिंग करते। माराडोना की तरह। उनकी विरासत को और आगे ले जाते हुए। गेंद उनके पैरों से ऐसे चिपकी रहती मानो वो उनसे विछोह सह ही नहीं सकती। उनमें कम लंबे होने के कारण अतिरिक्त चपलता थी। वे एक ऐसे खिलाड़ी थे जो गेंद ड्रिबल करते हुए बिना गेंद के दौड़ने से अधिक तेजी से दौड़ते थे। 

वे गेंद को बहुत कोमलता से बरतते। उनके खेल में एक खास तरह की कोमलता थी। उनके खेल में वो निर्ममता नदारद थी,जैसी माराडोना में थी। रोनाल्डो में है। या फिर एम्बाप्पे और हॉलैंड में है। 

 उनके खेल में सहजता थी। सरलता थी। कलात्मकता थी। गति थी। कमाल का नियंत्रण था। अगर कुछ ना था तो कठोरता नहीं थी। निर्ममता नहीं थी। ताकत का गर्वीला एहसास नहीं था। हां,एक मानवीय अनुभूति का गहरा अहसास था। वे दिल से खेलते लगते थे। उनके खेल में एक अद्भुत लय थी। वे गोल करते समय अपनी कला से विज्ञान के नियमों को धता बताते लगते।

वे मैदान में एक साथ कई भूमिका निभाते। वे एक शानदार फॉरवर्ड तो थे ही जो असंभव से गोल करते। लेकिन वे एक बेहतरीन प्लेमेकर भी थे। एक शानदार टीम प्लेयर जो अपने साथियों को तीव्र गति से,सही समय पर,अचूकता के साथ गेंद पहुंचाते कि विपक्षी खिलाड़ी हैरान-परेशान, भ्रमित और असहाय से रह जाते। उनमें एक विशेष गुण ये था कि वे विपक्षी रक्षण की उन दरारों को पहली नजर में ही भांप लेते थे जो बाकी खिलाड़ी सोच भी नहीं सकते थे। बार्सिलोना में पैप गार्डियोला ने उनके लिए एक साथ कई भूमिकाएं तय की। वे एक ही समय में स्ट्राइकर, विंगर और फैसिलिटेटर की तरह खेलते। ये फुटबॉल में नया प्रयोग था। 

उनके खेल के ये गुण उनके व्यक्तित्व का अविभाज्य हिस्सा हैं। वे एक शर्मीले और सहज व सरल व्यक्ति थे। मेस्सी की छवि उनके दिल, उनकी ईमानदारी और उनकी विनम्रता से बनती है। एक पत्रकार ने एक बार लिखा था कि 'रोनाल्डो अपनी ईमानदारी में इतने बुरे हैं कि लोग उनका मजाक उड़ाते हैं, जबकि मेस्सी अपनी अच्छाई में इतने अच्छे हैं कि लोग उनका मजाक उड़ाते हैं।' वे एक इंसान के रूप में उनका व्यक्तित्व शानदार था। 

उनके भीतर का एक उम्दा इंसान और उनके भीतर का एक अद्भुत खिलाड़ी दोनों मिलकर मेस्सी की एक ऐसी खूबसूरत छवि बनाते हैं जो लाखों करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में हमेशा के लिए चस्पां हो गई है। अब वे खेलें या ना खेलें,ये छवि अमिट है।

उनके संन्यास पर इंग्लैंड के महान फुटबॉलर गैरी लिनेकर से खूबसुरत और क्या ही कहा जा सकता है कि "फुटबॉल आगे बढ़ता रहेगा, जैसा कि हमेशा होता है, लेकिन अर्जेंटीना और दुनिया को आपने जो यादें दी हैं, वे कभी नहीं मिटेंगी। धन्यवाद, लियो।"

हां, 

धन्यवाद लियो।

विदा लियो।

Thursday, 30 July 2026

ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल 2026

एक : फीके फीके से खेल

इस बार के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ खेल बहुत फीके फीके से हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया द्वारा मेजबानी  से पीछे हट जाने के बाद  किसी तरह से ये खेल बहुत कम समय और बजट में ग्लासगो ने आयोजित किए हैं। 2022 में बर्मिंघम में आयोजित खेलों के मुकाबले लगभग आधी स्पर्धाएं और खिलाड़ी भाग ले रहे हैं।

फिलहाल अभी तक भारत की लड़कियां और लड़कों ने 5-5 पदक जीते हैं। लेकिन लड़कियां दो स्वर्ण,एक रजत और दो कांस्य पदक जीतकर लड़कों को पीछे धकेलकर पहले स्थान पर बनी हुई हैं।

और हां लड़कियों के पदकों की चमक के बीच भारतीय उम्मीदों का बोझ उठाए दो भारोत्तोलक मीराबाई चानू और ज्ञानेश्वरी यादव की तिरंगे रंगों की हेयरक्लिप और हेयरबैंड भी ना केवल दर्शकों के दिलों को छू रहे हैं बल्कि आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

दो : गुमनामी से शोहरत तक की लंबी दौड़ 


ज़िंदगी की जद्दोजहद की दौड़ें अक्सर गुमनामी के अंधेरों में दम तोड़ देती हैं। लेकिन वैसी ही कोई एक दौड़ शोहरत और बलंदी की रोशन दुनिया अता कर जाती है। अलीगढ़ जिले के सिरसा गांव के गुलबीर सिंह से बेहतर इसे और कौन जान सकता है।

गुलबीर जब अपने गांव की पगडंडियों पर सेना में सिपाही की भर्ती के लिए दौड़ का अभ्यास कर रहे थे,तो वो घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने की जद्दोजहद भर थी। लेकिन 2018 में 18 वर्ष की उम्र में जब खेल कोटे में वे ग्रेनेडियर रेजिमेंट में भर्ती हो रहे थे,तो एथलेटिक्स ट्रैक उनकी प्रतीक्षा में खड़ा था और शोहरत उनकी आगवानी कर रही थी।

अरुणाचल में अंतर यूनिट स्पर्धाओं के दौरान आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट पुणे के कोच यूनुस खान ने उनकी प्रतिभा को लक्षित किया और उन्हें इंस्टीट्यूट ले आए। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

हांगजू एशियाई खेल 2023 में 10 हज़ार मीटर का कांस्य पदक जीता। उसके बाद वे अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग स्थित हाई परफॉर्मेंस सेंटर में हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग लेने गए। वहां से जब वे भारत वापस आए,तो एक नए अवतार में लौटे। अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने भारत के कई दशकों पुराने 3,000 मीटर, 5,000 मीटर और 10,000 मीटर के राष्ट्रीय  रिकॉर्ड्स को एक-एक करके तोड़ दिया।

उसके बाद आए ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल। यहां वे अपने शानदार प्रदर्शन से जगी उम्मीदों का बोझ साथ लेकर आए। लेकिन वे उस बोझ तले दबे नहीं,उससे और ज्यादा निखरे। उन्होंने यहां 10 हजार मीटर दौड़ का रजत पदक जीता। समय था 27:49.78। ये रजत भी एक बड़ी उपलब्धि की तरह आया। इसलिए कि ये इस प्रतियोगिता की इस स्पर्धा का 90 साल में पुरुषों का पहला भारतीय पदक था। बड़ी बात ये कि ये कारनामा अफ्रीकी धावकों के बीच किया था। इस स्पर्धा में वे डेनियल एबेनयो जैसे कई नामचीन अफ्रीकी धावकों के मुकाबिल थे। कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में 1986 के बाद ये पहला अवसर था कि इस स्पर्धा में कोई अफ्रीकी धावक पोडियम पर नहीं खड़ा था।  

वे मात्र .85 सेकेंड के अंतर से ऑस्ट्रेलिया के धावक से स्वर्ण पदक चूक गए। आज उनका रजत पदक एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन आगे आने वाले समय में रजत की खुशी से ज्यादा स्वर्ण चूक जाने की टीस सालती रहेगी।

ग्लासगो में वे उम्मीदों का बोझ लेकर आए थे। लेकिन वे उसके तले दबे नहीं,उससे और ज्यादा निखरे। उन्होंने यहां 10 हजार मीटर दौड़ का रजत पदक जीता। ये इस प्रतियोगिता की इस स्पर्धा का 90 साल में पहला भारतीय पदक था। सबसे बड़ी उपलब्धि ये कारनामा अफ्रीकी धावकों के बीच किया था। इस स्पर्धा में वे डेनियल एबेनयो जैसे कई नामचीन अफ्रीकी धावकों के मुकाबिल थे। कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में 1986 के बाद ये पहला अवसर था कि कोई अफ्रीकी धावक पोडियम पर नहीं खड़ा था। 

वे मात्र .85 सेकेंड के अंतर से ऑस्ट्रेलिया के धावक के. रॉबिन्सन से स्वर्ण पदक चूक गए। आज उनका रजत पदक एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन आगे आने वाले समय में रजत की खुशी से ज्यादा स्वर्ण चूक जाने की टीस सालती रहेगी

तीन : ऊंचाई का नया नाम सर्वेश अनिल कुशारे



भारतीय एथलीट अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता की जो रोमानी कहानियां लिखते हैं,वे अपनी निर्मिति में उतनी रोमानी होती नहीं हैं। वे अक्सर ग्रामीण पृष्ठभूमि,अभावों,संघर्षों,कठिनाइयों और खेल प्रशासन की निष्क्रियता,उदासीनता और बेईमानी के खुरदुरे धरातल पर कठोर परिश्रम,लगन,धैर्य और दृढ़ इच्छाशक्ति जैसी क्रियाओं से लिखी जाती हैं

सर्वेश अनिल कुशारे एक ऐसे ही एथलीट हैं। वे नासिक के देवरगांव में एक प्याज की खेती करने वाले साधारण किसान के घर जन्म लेते हैं,कृषि अपशिष्ट के लैंडिंग पिट बनाकर ऊंची उड़ान का अभ्यास करते हैं और विश्व के सर्वश्रेष्ठ लैंडिंग पिटों पर अपनी प्रतिभा की उड़ान से सबको चमत्कृत कर देते हैं।

दो वर्ष की बेटी के 31 वर्षीय पिता सर्वेश इस समय शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। 27 जून को अंतर राज्य एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 2.31 मीटर ऊंची उड़ान के साथ आठ साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड ही नहीं बनाते हैं,बल्कि 2.30 मीटर के मनोवैज्ञानिक बैरियर को भी पार कर जाते हैं। फिर 11 जुलाई को 2.26 मीटर की छलांग के साथ मोनाको में आयोजित  डायमंड लीग में अपने पहले ही प्रतिभाग में कांस्य पदक जीतकर पहले भारतीय हाई जम्पर बनकर इतिहास लिखते हैं। उल्लेखनीय ये है कि कुशारे ने यहां टोक्यो ओलंपिक के संयुक्त चैंपियन जियानमार्को टैम्बेरी और मुताज़ बरशिम जैसे सितारों को पीछे छोड़ देते हैं।

और फिर ग्लासगो में 28 जुलाई को 2.25 मीटर की छलांग के साथ अपना पहला राष्ट्रमंडल खेलों का रजत पदक जीतते हैं। ये उनका दुर्भाग्य कि वे काउंटबैक के आधार पर स्वर्ण पदक चूक जाते हैं। स्वर्ण पदक विजेता जमैका के रोमेन बैकफोर्ड भी कुशारे की तरह 2.28 मीटर की ऊंचाई पार करने में असफल रहते हैं, लेकिन 2.25 की ऊंचाई पहले प्रयास में पार कर जाते हैं और कुशारे अपने तीसरे प्रयास में।

31 साल की उम्र में जब एथलीट रिटायरमेंट ले रहे होते हैं, उस समय कुशारे सफलता के नए मानदंड तय कर रहे हैं। गांव में कृषि अपशिष्ट से बने लैंडिंग पिट से अंतरराष्ट्रीय मंच पर इतिहास रचने की ये यात्रा जितनी रोमानी है उतनी ही प्रेरणादायी भी।




Thursday, 23 July 2026

फुटबॉल नर्सरी मिनर्वा अकादमी और रंजीत बजाज

 


एक बड़ी चकाचौंध में छोटी सी कोई गहमागहमी अनदेखी रह जाती है। बड़े इवेंट के बीच छोटा सा इवेंट अनचिह्ना रह जाता है। बड़े बड़े संघर्षों के बीच एक छोटी सी लड़ाई बिला जाती है। बड़े बड़े सपनों के बीच उम्मीद की एक छोटी सी किरण अनचाही सी रह जाती है। जैसे बड़े लोगों के बीच बच्चे उपेक्षित रह जाते हैं। कि बच्चों की प्रतिभा के घर्षण से पैदा हुई कोई चिंगारी आँखो का नूर बनने से रह जाती है।

जिस समय उत्तरी अमेरिका के 16 शहरों में फुटबॉल के सितारे अपनी चमक बिखेर रहे थे,ठीक उसी समय यूरोप के हेलसिंकी में भारत की किशोर प्रतिभाएं फुटबॉल के ही खेल में अपनी प्रतिभा से एक ऐसा स्पार्क' एक चिंगारी पैदा कर रहे थे,जिसे देश में भले ही व्यापक रूप से लक्षित ना किया जा सका,मगर जिसने उम्मीद की लौ जला दिभाई। अगर इस स्पार्क को भारतीय खेल सिस्टम बचा कर रख सका, तो इसके बड़ी आग में तब्दील हो जाने और देश की प्रतिष्ठा को रोशन किए जाने की उम्मीद तो बनती ही है। एक बड़ी उम्मीद। 

हते हैं कई बार जो काम बड़े नहीं कर पाते वो अक्सर छोटे बच्चे कर दिखाते हैं। जिस समय भारतीय फुटबॉल टीम की प्रतियोगिता जीतना तो दूर की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति तक दर्ज नहीं करा पा रही है(इस समय सीनियर भारतीय मेंस टीम की फीफा रैंकिंग 136वीं है),उस समय हमारे छोटे बच्चे दुनिया के प्रतिष्ठित टूर्नामेंट जीत रहे हैं। 




बीती 11 जुलाई को फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में यूरोप के तीसरे सबसे बड़े और प्रतिष्ठित युवा फुटबॉल प्रतियोगिता 'हेलसिंकी कप' को चंडीगढ़ स्थित मिनर्वा क्लब की अंडर 12 टीम फिनलैंड की सबसे सफल और दो बार की मौजूदा चैंपियन टीम एच जे के हेलसिंकी टीम को हराकर जीत रही थी। पिछली बार ये प्रतियोगिता वो जीतते-जीतते रह गई थी। वो फाइनल में इसी मेजबान टीम से हार गई थी। 

स भारतीय टीम ने पूरी प्रतियोगिता में शानदार खेल दिखाया। उसने  भाग लेने वाली 125 टीमों में सबसे ज्यादा 50+ गोल किए। मिनर्वा अकादमी की टीम ने प्री क्वार्टर फाइनलमें 'हेलसिंघिन पोनिसटस' को रिकॉर्ड 19–0 से करारी हराया। भारतीय टीम यहीं नहीं रुकी। क्वार्टर फाइनल में एचजेके को 6–0 और सेमीफाइनल में कप्यलान पल्लो को 9–0 से हराया। वांगशेम कोन्याक और टी. किपगेन  जैसे युवा खिलाड़ियों ने शानदार खेल दिखाया।

सके तुरंत बाद 12 से 18 जुलाई तक स्वीडन के गोथनबर्ग शहर में आयोजित 'गोथिया कप' भी लगातार दूसरी बार जीत रहे थे। जिस दिन न्यूजर्सी में स्पेन विश्व कप जीत रहा था उससे एक दिन पहले भारत के ये बच्चे ब्राजील के आरएस स्पोर्ट्स क्लब की टीम को 2-1 से हराकर अपना यूरोपीय डबल पूरा कर रहे थे। टीम ने इस प्रतियोगिता में भी शानदार खेल दिखाया और कुल नौ मैचों में 87 गोल किए।


भारतीय टीम की इस सफलता के पीछे एक शख़्स खड़ा है, और वो है रंजीत बजाज। एक ऐसा उद्यमी, एक ऐसा खेल मैनेजर, एक ऐसा खेल प्रशासक जो भारतीय फुटबॉल खेल प्रबंधन को,उसकी खामियों को चुनौती देने का साहस रखता है। उसे ठीक करने का खम ठोंकता है। और खुद एक उदाहरण बन कर सामने आता है।

भारतीय फुटबॉल खेल प्रबंधन में उन्हें एक 'रिबेल', एक 'विद्रोही'  के रूप में देखा और जाना जाता है। वे भारतीय फुटबॉल महासंघ की गलत नीतियों,खराब प्रबंधन और दरकते बुनियादी ढांचे के आलोचक रहे हैं। उनका मानना रहा है कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है,बल्कि सही विजन और एक सही सिस्टम की कमी है। भारत में फुटबॉल के विकास के लिए उनका मूलमंत्र है ग्रासरूट स्तर पर मेहनत की जाए। 

पने विजन को हकीकत में बदलने के लिए ही उन्होंने चण्डीगढ़ में मिनर्वा अकादमी की स्थापना की। इसके माध्यम से ही वे देशभर के गांवों और कस्बों से प्रतिभाओं को लक्षित कर उन्हें एक मंच प्रदान कर रहे हैं और तराशकर वैश्विक एक्सपोजर देने का काम कर रहे हैं। उनकी अकादमी में बहुत सारे बच्चे पूर्वोत्तर राज्यों से हैं। उनकी अकादमी ने 250 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी देश को दिए हैं। 2017 में भारत में आयोजित अंडर 17 फीफा विश्व कप में शामिल भारतीय टीम के नौ खिलाड़ी इसी अकादमी से थे। मिनर्वा एकेडमी की अंडर-15 टीम स्पेन के एमआईसी कप में लिवरपूल एफसी की अंडर-15 टीम को 6-0 से हरा चुकी है। मिनर्वा एकेडमी की अंडर 14 टीम ने अपराजित रहते हुए यूरोप के तीन प्रतिष्ठित खिताब—गोथिया कप, डाना कप और नॉर्वे कप जीतकर ट्रेबल पूरा किया है। और इसी साल अंडर 12 टीम ने हेलसिंकी और गोथिया कप जीतकर डबल पूरा किया।

वे फुटबॉल को लेकर इस हद तक जुनूनी हैं कि जब उनकी टीम को यूरोपीय दौरे के लिए कोई स्पॉन्सरशिप नहीं मिली तो व्यक्तिगत रूप से ऋण लेकर टीमों का दौरा सुनिश्चित किया।

 वे देश के हर ज़िले में अकादमी खोले जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनका सपना और उनका लक्ष्य भारत को 2034 फीफा विश्व कप के लिए क्वालीफाई कराना है। वे निरंतर युवा खिलाड़ियों का एक बड़ा पूल तैयार करने और आधुनिक, विज्ञान-आधारित प्रशिक्षण को लागू करने में व्यस्त हैं।

एक जूनून का नाम है रंजीत बजाज और उसका परिणाम है मिनर्वा अकादमी। बस  देखना है अपनी भीतर की ये आग वे कब तक बचाए रखते हैं।



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