Wednesday, 15 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 25 : सेमीफाइनल एक

 


फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल की बात करने से पहले समय को थोड़ा पीछे लिए चलते हैं और स्मृति बन चुके दो मैचों को एक बार फिर याद कर लेते हैं।

एक, बात 5 जून 2025 के यूएफा नेशंस लीग की है। इस का दूसरा सेमीफाइनल फ्रांस और स्पेन के बीच खेला गया था। इस बहुत ही रोमांचक और संघर्षपूर्ण मुकाबले में कुल नौ गोल हुए। ये मैच स्पेन ने 5-4 से जीता।

दो,समय को थोड़ा और पीछे लिए चलते हैं। तारीख आती है 9 जुलाई 2024। स्थान एलियांज स्टेडियम म्यूनिख। एक और सेमीफाइनल। इस बार यूएफा यूरो 2024 प्रतियोगिता का। प्रतिद्वंदी वही स्पेन और फ्रांस। नतीजा भी वही। एक बहुत ही संघर्षपूर्ण व रोचक मुकाबले में स्पेन ने फ्रांस को 2-1 से हरा दिया।

तिहास अपने को दोहराता है। एक बार नहीं बार बार।

स बार स्थान अमेरिका का डलास। एक बार फिर सेमीफाइनल। इस बार फीफा विश्व कप 2026 का। प्रतिद्वंदी वही फ्रांस और स्पेन। नतीजा भी वही। स्पेन ने फ्रांस को 2-0 से हरा दिया।

तिहास की घटनाओं से कुछ निष्कर्ष निकाले जाते हैं। कुछ सबक सीखे जाते हैं। कुछ प्रेरणाएं ले जाती हैं। लोगों ने और विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि ये इस विश्व कप का सबसे शानदार मैच होने जा रहा है। एक ऐसा मैच जो आगे के समय में उद्धृत किया जाता रहेगा। एक फाइनल जो फाइनल से पहले होने जा रहा है। एक ऐसा मैच जिसका हाइप क्रिएट हो गया था। लेकिन निष्कर्ष गलत भी साबित होते हैं। इस बार वहीं हुआ।

ये स्पेन की एकतरफा जीत थी। कई बार आंकड़े घटनाओं की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर पाते। इस मैच की स्कोरलाइन भी नहीं कर रही है। स्पेन ने फ्रांस को कहीं टिकने नहीं दिया। याद कीजिए 8 जुलाई 2014 को बेलो होराइजेंटो के मिनईराको स्टेडियम में फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल को। जर्मनी ने मेजबान ब्राजील को 7-1 से हराकर जिस तरह ह्यूमिलेट किया था, ये उससे कम ना था।

हीं पता स्पेन ने फ्रांस पर पहली दो जीत से सबक सीखे थे या नहीं। या फिर उससे कुछ सीखने की जरूरत थी भी या नहीं, क्योंकि वे विजेता थे। और विजेता की दृष्टि धुंधली हो जाती है। लेकिन वे उन जीतों से एक चीज अवश्य लेकर आए थे। वो था उनका आत्मविश्वास।

मैच से पहले स्पेन के स्टार खिलाड़ी लामिन यामाल से फ्रांस से होने वाले मुकाबले के बारे में पूछा गया। ये सवाल बनता था। फ्रांस की टीम लगातार तीसरे विश्व कप के सेमीफाइनल में थी और लगातार तीसरे फाइनल तथा एक और विश्व कप जीतने का सपना देख रही थी। ऐसा सपना देखना गैर वाजिब नहीं था। उन्होंने 2018 का विश्व कप जीता था। 2022 के विश्वकप फाइनल में पेनाल्टीशूट आउट में अर्जेंटीना से हारे थे। यानी तीन विश्व कप में वे रेगुलर समय में अजेय थे। और यहां अमेरिका में वे तो विपक्षी दल में भय उत्पन्न कर देने की हद तक शानदार खेल दिखा रहे थे। वे सभी मैच बहुत आसानी से और बहुत ही कन्विंसिंग अंतर के साथ जीतकर यहां तक पहुंचे थे।

लेकिन स्पेन की टीम और उसके खिलाड़ी इस सब से निश्चिंत थे। लामिन यामाल ने पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा था कि 'हम फ्रांस से नहीं डरते। हमने निकट अतीत में उन्हें कई बार हराया है।'  ये यामाल का दंभ या अहंकार नहीं था। ये जमीनी हकीकत थी। वे निकट अतीत में फ्रांस को दो बार हरा चुके थे। ये निकट अतीत की जीत से अपने साथ यहां विश्व कप में लाया गया आत्मविश्वास बोल रहा था। अपनी योग्यता, अपनी काबिलियत पर उन्हें भरोसा था। इसी भरोसे वे इस सेमीफाइनल में फ्रांस के मुकाबिल थे। निडर। निशंक। दृढ़ प्रतिज्ञ। स्थितप्रज्ञ।

रअसल फ्रांस और स्पेन के बीच का ये सेमीफाइनल दो टीमों के फाइनल में पहुंचने और अपने विश्व कप को जीत लेने के सपने को वास्तविकता के और करीब ले आने का रास्ता भर नहीं था,बल्कि यूरोपियन फुटबॉल में श्रेष्ठता स्थापित करने की लड़ाई भी थी। ये अपराजित रक्षण और अजेय आक्रमण के बीच का द्वंद्व था। ये वैयक्तिक हीरोइज़्म और सामूहिक सामंजस्य के मध्य की होड़ थी। ये दो टीमों के खिलाड़ियों के बीच का द्वंद्व भर नहीं था,बल्कि दो दिग्गज प्रशिक्षकों के बीच का,उनके विचारों का, उनकी रणनीतियों का, उनकी काबिलियत की परीक्षा भी थी। ये दिदियेर डेसचैम्प्स और लुइस दे ला फुएंते के बीच संघर्ष था। ये लेस ब्लेस और ला रोजा के बीच मुकाबला था। यहां लाल रंग नीले रंग से मुकाबिल था।

फ्रांस ने 4-2-1-3 के और स्पेन 4-1-2-3 के फॉर्मेशन से खेल शुरू किया। दोनों टीमों के इरादे साफ थे। दोनों अटैकिंग खेलना चाहते थे। लेकिन अलग अलग संभावनाओं के साथ। 

स पूरे विश्व कप में फ्रांस ने शानदार अटैकिंग खेल दिखाया था। उनके पास अनस्टॉपेबल फॉरवर्ड की चौकड़ी थी - एम्बाप्पे, डेम्बेले, ओलिसे और बारकोला। उन्होंने अर्जेंटीना के बाद सबसे ज्यादा 16 गोल बनाये थे। उनको अपनी आक्रमण पंक्ति पर पूरा भरोसा था। उस आक्रमण पंक्ति पर जिसे रोक पाना किसी भी डिफेंस के लिए अब तक तो नामुमकिन रहा था। लेकिन जितनी चर्चा उनके अटैक की थी, उतनी ही डिफेंस की थी। डिफेंस उनका कमजोर माना जा रहा था। उनकी सोच रही होगी कि भले ही एकाध गोल हो जाएं पर अटैक इतना पावरफुल है कि विपक्षी पर ज्याद गोल मार देंगे। वे अपनी स्ट्रेंथ पर खेल रहे थे।

दूसरी तरफ स्पेन की सोच उलट थी। इस प्रतियोगिता में उनका डिफेंस लगभग अजेय रहा है। चट्टान की तरह। जिसे भेद पाना विपक्ष के लिए लगभग नामुमकिन था। उन्होंने केवल एक गोल खाया था। पूरी प्रतियोगिता की दौरान उनके डिफेंस की चर्चा रही थी।जबकि आक्रमण उनका शांत सा रहा था। लामिन यामाल ने केवल एक गोल किया था। केवल मिकेल ओयारज़ाबल ने चार गोल किए थे। और कोई भी खिलाड़ी गोल्डन बूट की दौड़ में शामिल नहीं था। वे अटैकिंग इसलिए ही खेल रहे थे कि शुरुआत में ही एक बार बढ़त बना लें, तो फिर वे अपना किला विपक्षी को नहीं ही भेदने देंगे। वे अपनी कमजोरी पर खेल रहे थे। उसे एड्रेस कर रहे थे। अजेय आक्रमण के सामने  अभेद्य रक्षण खड़ा था।

स्पेन की टीम मैदान में उतरते ही बॉल पर ऐसे कब्जा जमाती है मानो बॉल केवल उसकी मिल्कियत हो। वो ज़्यादा से ज्यादा बॉल पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती है। इसके लिए उसकी छोटे-छोटे पासों वाली 'टिकी-टाका' खेल शैली सबसे मुफीद बैठती है। इस मैच  में भी ऐसा ही हुआ। स्पेन ने शुरू से ही गेंद पर अपना दबदबा बनाए रखा। डेडलॉक को तोड़ने में स्पेन को केवल 22 मिनट लगे, जब फ्रांस के पेनल्टी क्षेत्र में लुकास डिग्ने ने लामिन यामाल पर फाउल किया और ओयारजाबल ने पेनल्टी से गोल बनाया।

ये लुकास डिग्ने की इतने करीबी मैच की ऐसी लापरवाही भरी भूल थी, जो अक्षम्य है। डिग्ने का यामाल से कोई क्लोज कॉन्टैक्ट नहीं था। उन्होंने या तो यामाल को नोटिस नहीं किया या फिर उन्हें लगा कि वे पहले ही गेंद क्लियर कर देंगे। ये एक गलती मैच का टर्निंग प्वाइंट था। इस गोल के आते ही स्पेन दोगुनी उत्साहित हुई और आत्मविश्वास आसमान पर था। उसके बाद दूसरे हॉफ के शुरू में 58वें मिनट में ओल्मा के पास पर पोरो ने गोलकर मैच के निर्णय पर अंतिम मुहर लगा दी। ये गोल स्पेन के लंबे मूव का परिणाम था और उसकी 'टिकी-टाका' शैली का सबसे शानदार निर्देशन भी।

स्पेन का पूरे मैच पर दबदबा रहा। उन्होंने गेंद पर पूरा नियंत्रण रखा और खेल की गति को अपने अनुसार नियंत्रित किया। स्पेन के दबदबे को इस बात से समझा जा सकता है कि फ्रांस के केवल दो शॉट लक्ष्य पर लगे। उन्होंने फ्रांस की मजबूत अग्रिम पंक्ति को हमला करने का कोई मौका ही नहीं दिया। अब तक की फ्रांस की जीतों में माइकल ओलिसे की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। वे शानदार प्लेमेकर थे। लेकिन इस मैच में कुकुरेला ने उन्हें पूरी तरह से मार्क करके रखा। उन्होंने बार-बार गेंद का पजेशन खोया और एक भी ड्रिबल पूरा नहीं कर पाए। औस्मान डेम्बेले को गेंद लेने के लिए बार बार पीछे आना पड़ रहा था। और एम्बाप्पे को गेंद मिल ही नहीं पा रही थी। 

स मैच पर रॉयटर्स की रोचक टिप्पणी थी कि 'स्पेन ने फ्रांस को अनाकोंडा की तरह जकड़ लिया था।'  एक और रोचक कमेन्ट एक्स पर डॉ रमाकांत राय का है। उन्होंने लिखा 'स्पेन ने अपने गोलपोस्ट पर काला जादू कर रखा है।' हां निसंदेह ये जादू ही है। काला जादू। इसमें क्या शक हो सकता है कि स्पेन पर अब तक केवल एक गोल हुआ है। हां ये जरूर है कि ये जादू किसी तंत्र मंत्र से सिद्ध नहीं है,बल्कि उनकी उस अभेद्य रक्षापंक्ति से सिद्ध हुआ है जिसमें कहीं कोई दरार नहीं है। जो चट्टान की माफिक है। वो जादू जो कप्तान रोड्री,फेबियन रूइज, ओल्मो  के मिडफील्ड तथा कुकुरेला, कुबारसी, लेपोर्टे और पोरो के बैक लाइन से बना है।

ये स्पेन की एक शानदार जीत है जो वैयक्तिक प्रतिभा के ऊपर टीम की सामूहिकता,उनके खिलाड़ियों के बीच बेहतरीन सामंजस्य और तालमेल की जीत है। ये स्पेन की फ्रांस पर बड़ी प्रतियोगिताओं के लगातार तीसरे सेमीफाइनल में जीत थी।

हार के बाद एम्बाप्पे कह रहे थे "हमने वो प्रदर्शन नहीं किया जो हम चाहते थे, न तो सामरिक दृष्टि से, न तकनीकी दृष्टि से और न ही समग्र स्तर पर। जब आप विश्व कप के सेमीफाइनल में वो करने में विफल रहते हैं जो आपको करना चाहिए, तो आप जीत नहीं सकते। स्पेन अपनी योजना और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहा। हमारी प्रेसिंग में संवाद की कमी थी... यहां तक ​​कि जब हमने गेंद पर दोबारा कब्जा जमाया, तब भी हमारे पहले पास और पहले टच विश्व कप सेमीफाइनल के लायक नहीं थे।"

अब फाइनल में उनका मुकाबला इंग्लैंड और अर्जेंटीना के बीच के होने वाले विजेता से होगा। फाइनल मैच की प्रकृति क्या होगी ये इस बात पर निर्भर करेगा कि दूसरे सेमीफाइनल में कौन जीतता है। इंग्लैंड जीतता है तो ये यूरो 24 का रेप्लिका होगा और यूरोप में फुटबॉल की श्रेष्ठता के लिए संघर्ष  बन जाएगा। और अगर अर्जेंटीना जीतती है तो ये दो महाद्वीपों यूरोप और दक्षिण अमेरिका के बीच फुटबॉल की पारंपरिक प्रतिद्वंदिता, दो फुटबॉल परंपराओं का द्वंद्व होगा। 

तो कल का इंतजार करिए।



Monday, 13 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी_24: क्वार्टर फाइनल मैच

 



फीफा विश्व कप के तीन रोमांचक दिन और बीते। चार संघर्षपूर्ण मुकाबले संपन्न हुए। और वो सब इतिहास का हिस्सा बना जो रात रात भर जाग कर फुटबॉल देखने के लिए चाहिए होता है। शानदार गोल। बेहतरीन बचाव। रणनीतिक चातुर्य। खिलाड़ियों का अद्भुत कौशल। कमाल की टैक्लिंग। और मोहक ड्रिबलिंग। करीबी और कड़े मुकाबले। और विवादों का चोली दामन का साथ। जीत और हार,खुशी और गम,उम्मीद और निराशा के बीच से होते हुए अंततः विश्व कप अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचा। मैचों का शतक पूरा हुआ। और बची विश्व की श्रेष्ठ चार टीमें। ताज के लिए अंतिम चार मुकाबले। फुटबॉल का खेल। उसका रोमांच। और फुटबॉल की अतरंगी दुनिया। 

एक 

1992 में फीफा रैंकिंग की शुरुआत के बाद ये पहला अवसर है जबकि श्रेष्ठ चार टीमें सेमीफाइनल में पहुंची हैं। फ्रांस,अर्जेंटीना,स्पेन और इंग्लैंड। अब मुकाबला होगा नंबर 1और 3 के बीच और नंबर 2 और 4 के बीच। देखना ये है कि क्या इस में अब कोई क्रम व्यतिक्रम होता है या नहीं। आखिर इन चारों टीमों का अंतिम चार में पहुंचना क्या प्रदर्शित करता है। यही कि फीफा रैंकिंग काफी हद तक विश्वसनीय है या फिर ये कि टीमों ने अपनी रैंकिंग और प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रदर्शन किया है। शायद दोनों ही।

दो

पहले दो क्वार्टर फाइनल मैच दो अलग अलग दिन खेले गए। दोनों मैच रेगुलर टाइम में समाप्त हुए। फ्रांस ने मोरक्को को 2-0 से और स्पेन ने बेल्जियम को 2-1 से हराया। बाकी दो मैच एक ही दिन में संपन्न हुए और दोनों ही मैचों में निर्णय के लिए अतिरिक्त समय की तो आवश्यकता आन पड़ी,लेकिन पेनाल्टी शूट आउट तक नहीं जाना पड़ा। अर्जेंटीना ने स्विट्जरलैंड को 3-1 से और इंग्लैंड ने नॉर्वे को 2-1 से हराया। 

तीन

पहला क्वार्टर फाइनल बोस्टन में फ्रांस और मोरक्को के बीच हुआ। उसने 2-0 से आसान जीत हासिल की। अभी तक फ्रांस के सामने कोई भी बड़ी परेशानी सामने नहीं आई है। उसने सभी मैच अपेक्षाकृत आसानी से जीते हैं। ये इस विश्व कप की सबसे शक्तिशाली और शानदार टीम है,इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है। इसीलिए उसे जीत का सबसे प्रबल और बड़ा दावेदार माना जा रहा है। उसके पास शानदार अटैकर है। भरोसेमंद मिडफील्डर हैं। और मजबूत रक्षापंक्ति है।


इस मैच में मोरक्को के सबसे भरोसेमंद फॉरवर्ड इस्माइल सैबारी चोट लगने के कारण नहीं खेल रहे थे। लेकिन इस मैच का सबसे आश्चर्यजनक पहलू ये था कि मोरक्को ने अपनी फर्स्ट इलेवन में एक भी रेगुलर फॉरवर्ड नहीं खिलाया। उनके रेगुलर फॉरवर्ड 60वें मिनट में पहला गोल खाने के बाद आए। ये गोल एम्बाप्पे ने पेनाल्टी से किया। दूसरा गोल छह मिनट बाद ही उस्मान डैंबेले ने किया।

 चार

लॉस एंजिलिस में खेले गए दूसरे मैच में स्पेन ने अंतिम क्षणों में विजयी गोल दागकर बेल्जियम को हरा दिया। स्पेन ने 30वें मिनट में पहला गोल किया। लामिन यामल और पेड्रो पोरो ने दाहिनी ओर से शानदार तालमेल बिठाते हुए डैनी ओल्मो के लिए गोल का मौका बनाया। हालांकि कर्टोइस ने ओल्मो के पहले शॉट को रोक दिया, लेकिन फैबियान रुइज़ ने रिबाउंड पर सटीक शॉट लगाकर गोल कर दिया।


 इस मैच से पहले स्पेन ने लगातार पांच मैचों में एक भी गोल नहीं खाया था। यानी गोलकीपर उनाई सिमोन ने विश्व कप में रिकॉर्ड बनाते हुए 650 मिनट तक कोई गोल नहीं खाया। ये सिलसिला मैच के 41वें मिनट में तब टूटा जब बेल्जियम के चार्ल्स डी केटेलेरे ने क्यूबार्सी को पछाड़ते हुए टिमोथी कास्टाग्ने के सटीक क्रॉस पर हेडर से गोल किया। 

मैच का निर्णायक क्षण मेरिनो के मैदान में उतरने के दो मिनट बाद आया। 88वें मिनट में, पाउ कुबार्सी ने एक जोरदार लॉन्ग-रेंज शॉट लगाया। बेल्जियम के सब्स्टीट्यूट गोलकीपर सेने लैमेंस रिबाउंड को रोक नहीं पाए, जिससे आर्सेनल के फॉरवर्ड मरिनो ने मैच के अपने दूसरे ही टच में गेंद को गोल में डाल दिया। इससे पहले मेरिनो ने राउंड ऑफ 16 में पुर्तगाल के खिलाफ भी 91वें मिनट में विजयी गोल किया था। 

बेल्जियम के लिए यह बेहद निराशाजनक अंत था। 71वें मिनट में उनके स्टार गोलकीपर थिबाउट कर्टोइस के चोटिल हो जाने के कारण उनकी जगह लैमेंस को मैदान में उतारा गया था।

पांच

मियामी में खेले गए तनावपूर्ण मैच में इंग्लैंड ने अतिरिक्त समय के बाद नॉर्वे को हराकर जीत हासिल की। जूड बेलिंघम ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन किया।

पहला गोल  36वें मिनट में एंड्रियास शेल्डरुप के गोल ने नॉर्वे को बढ़त दिला दी। शेल्डरुप ने एक क्रॉस को गलत तरीके से हिट किया जो जॉर्डन पिकफोर्ड के पोस्ट से टकराकर ऊपरी कोने में जा लगा। लेकिन सामान्य समय के हाफ-टाइम से ठीक पहले बेलिंगहैम ने एंथनी गॉर्डन के शानदार पास पर गोल दागकर इंग्लैंड ने बराबरी कर ली।  

90 मिनट के रेगुलर समय के बाद 1-1 से बराबर रहने के बाद, अतिरिक्त आधे घंटे के खेल में तीसरे मिनट में ओरजान नाइलैंड की गलती से मिले रिबाउंड पर बेलिंगहैम ने निर्णायक गोल किया।

ये मैच जितना इंग्लैंड के सेमीफाइनल में पहुंचने और विश्व कप अभियान जारी रह जाने के लिए याद किया जायेगा उससे कहीं ज्यादा नॉर्वे के दूसरे गोल को रद्द किए जाने और बॉल के तार को छू जाने के विवाद के लिए याद किया जाएगा।

नॉर्वे को टोरब्योर्न हेगेम के गोल से 2-1 की बढ़त मिल सकती थी, लेकिन कॉर्नर किक पर एर्लिंग हालैंड द्वारा इलियट एंडरसन को धक्का देने के कारण इसे रद्द कर दिया गया। वहीं, इस बात पर भी विवाद रहा कि क्या इंग्लैंड के पहले गोल पर पिच के ऊपर लगे तारों का कोई असर पड़ा था। नॉर्वे के कोच स्टाले सोलबक्केन का मानना ​​था कि नॉर्वे की गोल किक किसी तार से छू गई जिससे गेंद सीधे आसमान से गिरी,लेकिन फीफा के बॉल सेंसर ने कोई संपर्क नहीं दिखाया।

छह

केन्सास में खेले गए आखिरी क्वार्टर फाइनल मैच में पिछली चैंपियन अर्जेंटीना ने स्विट्जरलैंड को 3-1 से हराकर लगातार दूसरी बार सेमीफाइनल में जगह बनाई।

जूलियन अल्वारेज़ और लौतारो मार्टिनेज़ ने अतिरिक्त समय में गोल करके अर्जेंटीना के विजय अभियान को जारी रखा। मैच नियमित समय के अंत में 1-1 से समाप्त हुआ। पहला गोल दसवें मिनट में लियोनेल मेस्सी के क्रॉस पर एलेक्सिस मैक एलिस्टर ने किया। लेकिन 67 वें मिनट में डैन दोये ने बराबरी का गोल कर दिया।


दोये के गोल के तुरंत बाद ही वीएआर निर्णय के बाद ब्रेल एम्बोलो को फाउल का नाटक करने के लिए मैदान से बाहर भेज दिया गया। ब्रील एम्बोलो को 'डाइव' लगाने के लिए पीला कार्ड दिखाया गया ।क्योंकि इस मैच का ये उनका दूसर पीला कार्ड थे जो स्वतः ही रेड कार्ड में तब्दील हो गया। विश्व कप की शुरुआत से ठीक पहले संशोधित किए गए 'गलत पहचान नियम' के कारण रेफरी के पास पीला कार्ड दिखाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। टूर्नामेंट के दौरान ऐसा निर्णय पहली बार नहीं लिया गया था। इससे पहले, अमेरिका और पैराग्वे के बीच समूह चरण के एक मैच में, अमेरिकी डिफेंडर टिम रीम को दिया गया पीला कार्ड वीएआर द्वारा मिगुएल अल्मियन की डाइव की समीक्षा के बाद रद्द कर दिया गया था, जिसके बाद अल्मियन को चेतावनी दी गई थी।

तो फुटबॉल जारी है। उसका रोमांच सब पर तारी है। यानी गेम ऑन है और उसका रोमांच फुल ऑन। बस थोड़ी सी नींद में खलल डालिए और फुटबॉल के खेल का आनंद लीजिए।



Sunday, 12 July 2026

नई चैंपियन नोस्कोवा और चेक वर्चस्व

 



निवार की रात 2026 के विंबलडन ग्रैंड स्लैम में महिला एकल का फाइनल कैरोलिना मुचोवा और लिंडा नोस्कोवा के बीच खेला गया। ये दोनों बालाएं चेक गणराज्य की थीं और दोनों को अपने पहले ग्रैंड स्लैम की तलाश थी। 

 न दोनों के बीच साम्यता यहीं आकर रुक जाती है। उसके बाद ये मुकाबला दो अलग उम्र,खेल शैली,अनुभव और टेंपरामेंट के मध्य था। अगर मुचोवा 29 साल की परिपक्व खिलाड़ी हैं, तो नोस्कोवा 21 साल की युवा। पहली कलात्मक टेनिस की आइकन हैं, तो दूसरी शक्ति का पर्याय। पहली पर्याप्त अनुभव के साथ मैदान में उतरी थीं,तो दूसरी के पास जोश उसकी ताकत। एक धैर्य से जड़ी,तो दूसरी पैशन से तारी। एक अपना दूसरा ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल रही थी, तो दूसरी कभी क्वार्टर फाइनल से आगे नहीं बढ़ी। एक अपने पूरे करियर में लगातार चोटों से जूझती रही है,तो दूसरी इनसे बेपरवाह,बिंदास।

ज जब टेनिस का खेल भी पावर का पर्याय हो गया हो तो ऐसे में सर्व और वाली, शानदार ड्रॉप्स और साथ ही ट्वीनर में माहिर होना बहुत ही दुर्लभ होता जा रहा है। खेल विशेषज्ञ मुचोवा को इन विशेषताओं से युक्त टेनिस की खिलाड़ी से ज्यादा 'कलाकार' मानते हैं जिनका खेल विविधाओं और तकनीकी से परिपूर्ण है। उन्हें खेलते देखना किसी ट्रीट से कम नहीं। तो दूसरी और नोस्कोवा पावर और आक्रामक खेल की प्रतिनिधि खिलाड़ी। शक्तिशाली तेज गति की सर्विस जिनके खेल का मुख्य हथियार है और बेसलाइन से शक्तिशाली शॉट्स जिनके खेल का मुख्य अवयव।

स बार का विंबलडन का फाइनल एक ही देश की इन दो खिलाड़ियों के बीच एक रोमांचक मुकाबला था। ये तीन सीटों का हाई वोल्टेज ड्रामा था। इस पूरे मैच को तीन भागों में बांट कर देखा जा सकता है। इनमें से पहला और आखिरी भाग नोस्कोवा के हक में और बीच वाला भाग मुचोवा के हिस्से रहा। 


ससे पूर्व ग्रैंड स्लैम में ये दोनों खिलाड़ी केवल एक बार आमने सामने थीं 2025 के यूएस ओपन में। इस संघर्षपूर्ण मुकाबले में मुचोवा ने जीत हासिल की थी। लेकिन कल विंबलडन की हरी घास के मैदान पर पहली किसी भी हार और प्रतिद्वंदी के अनुभव से बेपरवाह नोस्कोवा ने शक्तिशाली सर्विस और जबरदस्त फोरहैंड के बल पर केवल 31 मिनट में पहला सेट जीत लिया 6-2 से। और दूसरे सेट में भी 5-2 की बढ़त बना ली। नोस्कोवा अब चैंपियन बनने ही वाली थीं। वे चैंपियनशिप के लिए सर्व कर रही थीं कि अचानक नर्वस हो उठी। उधर मुचोवा जैसे सोते से जागी हों। मुचोवा के अपने अगले सर्विस गेम में पांच ड्यूस हुए। इस दौरान उन्होंने अपनी सर्विस को ब्रेक होने से ही नहीं बचाया, बल्कि तीन चैंपियनशिप प्वाइंट भी बचाए। इसके बाद नोस्कोवा के अगले सर्विस गेम में आठ ड्यूस हुए। नोस्कोवा द्वारा सात ब्रेक प्वाइंट बचाने के बाद अंततः मुचोवा ने नोस्कोवा की सर्विस ब्रेक की। और लगातार पांच गेम जीतकर सेट 7-5 जीत लिया। इस दौरान उन्होंने अपने शानदार ड्रॉप शॉट्स का इस्तेमाल किया और नोस्कोवा को लगातार गलती के लिये मजबूर किया। अब रोमांच अपने चरम पर था। लगा मुचोवा अपनी लय पा चुकी हैं और जीत की और अग्रसर हैं। इससे पहले सेमीफाइनल में मुचोवा ऐसा कर चुकी थीं,जब उन्होंने कोको गफ के विरुद्ध मैच प्वाइंट बचाकर अंततः मैच जीत लिया था। 

दूसरी तरफ लगातार पांच गेम हारकर सेट गंवाने के बाद नोस्कोवा दोनों तर्जनी उंगलियों को कानों में डाले कुछ उदास,कुछ निराश, अपनी कुर्सी पर जा बैठीं। वे दर्शकों के उस शोर को अनसुना करने की कोशिश कर रही थीं, जो मुचोवा के शानदार खेल,उनके पांच मैच प्वाइंट बचाने और मैच में वापसी के बाद उठा था। लेकिन 21 वर्षीय नोस्कोवा को उस समय उस शोर को नहीं बल्कि कि अपनी निराशा और हताशा को अनसुना करने और उसे दूर करने की जरूरत थी। और उन्होंने ऐसा किया।

 नोस्कोवा के लगातार पांच गेम हारने व  पांच मैच प्वाइंट गंवाकर 6-2, 5-2 की आसान बढ़त खत्म करने के बाद उनके पहले ग्रैंड स्लैम जीतने की उम्मीदें लगभग खत्म हो चली थीं। वहाँ उपस्थित पंद्रह हजार दर्शकों को लगने लगा था कि अब मुचोवा ही जीतेंगी। लेकिन नोस्कोवा जानती थीं कि अगर जीतना है तो अपनी निराशा और घबराहट और नर्वसनेस से उबरना होगा। उन्होंने एक बाथरूम ब्रेक लिया। वहां उन्होंने अपने को शांत किया और सारी ऊर्जा समेटकर कोर्ट पर वापसी की। अब वे बिल्कुल वैसी ही दीख रही थीं जैसे मैच के आरम्भ में । उन्होंने अपने खेल की लय जल्द ही प्राप्त कर ली। तीसरे सेट के दूसरे ही गेम में मुचोवा की सर्विस ब्रेक की और 3-0 की बढ़त ले ली। और फिर 6-3 से सेट जीतकर विंबलडन की हरी घास पर सफलता की नई इबारत लिख रही थीं। इस जीत में उनको जरूर ही तीसरे दौर में 17वीं वरीयता प्राप्त सोराना सिर्स्टिया के खिलाफ जीत ने संबल प्रदान किया होगा जिसमें वे तीसरे व निर्णायक सेट में 4-5, 40-Ad से पिछड़ने के बावजूद  टाई-ब्रेक में 11-9 से जीत गईं थीं।

जीत का ये क्षण उनके लिए बहुत विशेष था। बहुत ही भावुक। दो साल पहले विंबलडन के शुरू होने से एक दिन पहले ही उनकी माँ का कैंसर से देहांत हो गया था। प्रेजेंटेशन सेरेमनी में वे कह रही थीं "एक और व्यक्ति हैं जिन्हें मैं धन्यवाद देना चाहती हूं,और वो हैं मेरी मां। आपके बिना मैं निश्चित रूप से यहां नहीं खड़ी होती, इसलिए धन्यवाद।" वे ये कहती हैं, और आसमान की ओर एक चुंबन भेजती हैं। 

क अद्भुत दृश्य बनता है जिसमें जितना सुख है उतना ही दुख भी। उनकी आँखें पानी से नम हैं। शायद एक आंख जीत की मिठास लिए,दूसरी दुख का नमक लिए। या फिर दोनों में ही कुछ कुछ मीठा और कुछ कुछ खारा सा। 

र उनकी इस जीत को उनकी हमवतन और दोस्त कैरोलिना मुचोवा एंडोर्स करते हुए कह रही थीं "आप बहुत युवा हैं, यह आपका पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल है, जिस तरह से आपने इसे संभाला और जिस तरह से आपने खेला वह वाकई अविश्वसनीय है। इसके अलावा आप एक बेहद दयालु हैं, इसलिए आपको और आपकी टीम को बहुत-बहुत बधाई। आप इसकी हकदार हैं।" 

 लिंडा नोस्कोवा रोजवाटर डिश जीतकर एक खिताब भर नहीं जीत रही थीं,बल्कि वे अपने देश की पुरखिनों द्वारा विंबलडन टेनिस के इतिहास में स्थापित जीत की परम्परा को आगे बढ़ा रही थीं जिसे टेनिस की महानतम खिलाड़ियों में शुमार मार्टिना नवरातिलोवा ने शुरू किया था और पेत्रा क्वितोवा, मार्केटा वोंद्रोसोवा,बारबोरा क्रेज्सिकोवा जैसी खिलाड़ियों ने आगे बढ़ाया था। ये पिछले चार सालों में तीसरा विंबलडन महिला एकल का खिताब था जिसे चेक गणराज्य की खिलाड़ी ने जीता है। और ये सफलता कोई संयोग नहीं है बल्कि देश की उच्च गुणवत्ता वाली  प्रशिक्षण सिस्टम का परिणाम है, जिसमें कैटरीना सिनियाकोवा, मैरी बोज़कोवा और कोवाकोवा बहनों जैसी उभरती प्रतिभाएं शामिल हैं।

टेनिस जगत को अपनी नई स्टार लिंडा नोस्कोवा के उदय की और लिंडा नोस्कोवा को इस जीत की बधाई।


Thursday, 9 July 2026

खेल डायरी_01: उम्र


 कुछ लोगों पर उम्र इस खूबसूरती से गिरती है उनका व्यक्तित्व और अधिक उभरकर आता है। उनके लिए उम्र एक गिनती भर रह जाती है।

कल रात दुनिया के दो अलग अलग कोनों में उम्र के 39वें पड़ाव पर उम्र को धता बताते हुए दो खिलाड़ी सफलता की एक सी लेकिन अलग अलग खूबसूरत कहानी लिख रहे थे। 

मेस्सी अटलांटा में अपने पैरों की कलम को फुटबॉल की रोशनाई में डुबोकर जो इबारत फुटबॉल की पीठ पर लिख रहे थे,वैसी ही इबारत नोवाक जोकोविक विंबलडन में अपने रैकेट के कलम से बॉल की रोशनाई में डुबोकर टेनिस कोर्ट के वक्ष पर लिख रहे थे।

मेस्सी  केवल 15 मिनट में एक असिस्ट और गोल से एक हारी बाजी को जीत में बदल देते हैं। 79 मिनट तक मिस्र से 0-2 से पिछड़ने के बाद 3-2 से जीत असंभव को संभव बनाना था। ये मेस्सी के अनुभवी नेतृत्व,संयम और परिपक्वता की कहानी है।


उधर लन्दन में उम्र के ठीक इसी पड़ाव पर नोवाक जोकोविच विंबलडन के इतिहास का सबसे लंबा क्वार्टर फाइनल जीतकर विंबलडन के अपने 15वें सेमीफाइनल में जगह पक्की कर इतिहास रचते है। जोकोविच ने 05 घंटे और 15 मिनट तक चले असाधारण मैच में फेलिक्स ऑगर-एलियासिमे को 7-6 (12-10), 3-6, 6-3, 6-7 (4-7), 7-6 (10-4) से हराया। 

बढ़ती उम्र भी ना कितनी खूबसूरत रंगों में सामने आती है।


Wednesday, 8 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 23: राउंड ऑफ 16

 



फीफा विश्व कप 2026 का एक और दौर समाप्त हुआ। प्री क्वार्टर फाइनल के आठ मैच पूरे हुए। इस तरह कुल 104 मैचों में से 96 मैच इतिहास में दर्ज़ हुए। अपने टूटे सपनों को बटोरे 40 टीमें इस महासमर से विदा हुईं। शेष बचे सात मैचों में फुटबॉल का नया इतिहास रचने के लिए आठ टीमें खम ठोंके मैदान में अभी भी जमी हैं।

बीते चार दिनों में 16 टीमों ने वो वायदा शिद्दत से निभाया जो पहले दो चरणों की जीत में इन टीमों ने अपने खेल के माध्यम से अपने समर्थकों और फुटबॉल के चाहने वालों से किया था। इन चार दिनों और आठ मैचों में वो सब कुछ था जो जिसकी पूर्व पीठिका पहले दो चरणों के खेल ने लिखी थी।  

हां गोलों की रिमझिम बरसात थी। चूकों की गहरी शीत थी। एकस्ट्रा टाइम का खेल था। पेनाल्टी शूटआउट था। रेड कार्ड थे। वीएआर था। उससे उपजे विवाद थे। कुछ सितारों का विश्व कप के आसमान से अस्त हो जाना था।  कुछ सितारों की चमक अभी भी आँखें चौंधियाती थी। नए सितारों का उदय भी हुआ चाहता था। कुछ टीमें थीं कि अपने खेल से प्रशंसकों के मन में  ही घर कर लेना चाहती थीं। तो कुछ टीमें थीं कि फुटबॉल चाहने वाले दिल से बाहर किए जाते थे। आगे बढ़ने की उमंग थी। विदाई की उदासी भी। कुछ की आंखों में सपनों के टूटने से बच जाने से उपजे आंसू थे। कुछ की आंखों में सपने किरच किरच हो जाने का पानी था। इन सबके बीच फुटबॉल का खेल था और उसका रोमांच अपने उरूज पर था।

एक

इस दौर के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण और इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज़ हो जाने वाले दृश्य फुटबॉल के सबसे बड़े सितारों की आंखों के पानी से बने थे। कुछ की आंख विछोह से भीगी थीं,कुछ की सपनों के टूट जाने से और कुछ की सपनों के टूटने टूटते बच जाने से। ये फुटबॉल के इतिहास की सबसे गाढ़ी स्मृतियां हैं।


पहला दृश्य, मेस्सी की आंखों का नम होना। उनकी आंखों में ये आंसू खुशी से उपजे थे। एक अप्रत्याशित हार और विश्व कप को बचाने के सपने के टूटते टूटते रह जाने की खुशी से उपजे आंसू। अर्जेंटीना ने मिस्र को 3-2 से हराकर क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया।मिस्र की टीम इस बार ग़ज़ब हौसले और मजबूती के साथ आई थी। उसने न्यूजीलैंड को हराकर विश्व कप की अपनी पहली जीत हासिल की। पहली बार नॉक आउट में प्रवेश किया। और उसके बाद चैंपियन अर्जेंटीना को  हराकर इस प्रतियोगिता का सबसे बड़ा उलटफेर किया ही चाहती थी कि एक दूसरा इतिहास रचा गया।

अटलांटा स्टेडियम में खेले गए इस ऐतिहासिक मुकाबले में मौजूदा चैंपियन अर्जेंटीना 78 वें  मिनट तक 0-2 से पीछे चल रही थी। लेकिन मैच के आखिरी मिनटों में अविश्वसनीय वापसी करते हुए जीत दर्ज की। इस दौरान मेस्सी अपनी उम्र से संघर्ष करते हुए एक साधारण खिलाड़ी की तरह लगते रहे, जो गोलपोस्ट पर जगह बनाने और विपक्षी डिफेंडरों की भीड़ में गोल के अवसर बनाने की असफल कोशिश करता दिखा। लेकिन वे शानदार नेतृत्वकर्ता हैं। उन्होंने अंतिम समय तक हार नहीं मानी। अंततः 79 वें मिनट में एक शानदार पास रोमियों को दिया जिसने हेडर से गोलकर अर्जेंटीना के लिए मोमेंटम बना दिया। उसके बाद मेस्सी का बाएं पैर का सिगनेचर शॉट आया और 83 वें मिनट में बराबरी हुई। इंजरी टाइम में  एंजो फर्नांडीज ने हेडर से गोलकर जीत पक्की कर दी। आखिरी 15 मिनट में मेस्सी ने बताया कि वे क्यों गोट हैं। 

दृश्य दो,आंखों में पानी सिर्फ मेस्सी के नहीं था। ये पानी नेमार की आंखों में भी था। नॉर्वे ने पांच बार की चैम्पियन ब्राजील को 2-1 से हराकर बड़ा उलटफेर किया। इसमें तीनों गोल दो बड़े सितारों ने किए। गोल मशीन एर्लिंग हालैंड ने 79 और 90वें मिनट में गोलकर नॉर्वे को अजेय बढ़त दिला दी। जबकि इंजरी टाइम में पेनाल्टी से नेमार ने गोलकर इस हार के अंतर को कम किया।

जहां हालैंड के इस विश्व कप में कुल सात गोल हुए और वे गोल्डन बूट की दौड़ में बने हुए हैं,वहीं नेमार का विश्व को जीतने का सपना टूट गया। मैच समाप्ति के बाद नेमार अपनी नम आंखों से अपनी खेल पारी की समाप्ति की घोषणा कर रहे थे। और पूरी दुनिया हतप्रभ दुखी मन से उनको विदाकर रही थी। हमारे दौर का एक और महान सितारा जो पेले की शानदार विरासत को आगे बढ़ा रहा था,मैदान से विदा हो रहा था।


दृश्य तीन,एक और सितारा आंखों से मोती टपकाता विश्व कप को अलविदा कह रहा था। एक और महानतम खिलाड़ी विश्व कप को जीतने के अधूरे अरमान लिए फुटबॉल प्रेमियों से विश्व कप में कभी ना दीखने के लिए विदा ले रहा था। ये पुर्तगाल का क्रिस्टियानो रोनाल्डो था। उसकी टीम एक बहुत प्रतीक्षित मैच में स्पेन की टीम से 0-1 से हारकर इस विश्व कप से बाहर हो गई थी। स्पेन और पुर्तगाल का ये मुकाबला बहुत बड़ा माना जा रहा था। लेकिन ये इस विश्व कप के सबसे नीरस मुकाबलों में से एक था जिसमें मैच के इंजरी टाइम में 91वें मिनट में मेरीनो ने गोलकर स्पेन पुर्तगाल को हरा दिया। ये मैच अब केवल और केवल रोनाल्डो की विदाई के लिए जाना जाएगा।

स्पेन से हार के बाद रोनाल्डो का विश्व कप न जीत पाने का ग़म उनकी आंखों से बह रहा था। उनके साथी उन्हें अकेला छोड़ टनल में जा चुके थे। और तब 18 साल के उनके प्रतिद्वंदी लामिने यमल ने उनको अपने गले से लगाया और उनके दुख को साझा किया। आप क्रिस्टियानो से प्यार कर सकते या घृणा कर सकते है। लेकिन उनकी महानता को उनसे कोई नहीं छीन सकता। विश्व कप ट्रॉफी उनकी जीती ट्रॉफी में एक और अंक की बढ़ोत्तरी भर होती बाकी उसका उनके पास ना होने से उनकी महानता पर क्या ही फर्क पड़ता है।

फुटबॉल इन्हीं दृश्यों से खूबसूरत बना हुआ है।

दो

ये दौर तीन मेजबान देशों की इस प्रतियोगिता से विदाई का दौर भी ठहरा। 

इंग्लैंड और मेक्सिको के बीच एक ऐसा रोमांचक मुकाबला हुआ जो अब तक के विश्व कप का सबसे बेहतरीन मैच था। क्या ही शानदार मैच था ये। अविश्वसनीय माहौल। नाटकीय गोल। एक पेनल्टी। एक रेड कार्ड। एक और पेनल्टी। आधे घंटे से अधिक समय तक आक्रामक दर आक्रमण और घबराई हुई रक्षा पंक्ति का खेल। अंतिम 46 मिनट में 10 बनाम 11 की टक्कर। परिणाम इंग्लैंड तीन गोल। मेक्सिको दो गोल। 

कितना दुखद था कि एक टीम प्रतियोगिता से बाहर हो रही थी।

इंग्लैंड केवल एक मैच भर नहीं जीत रहीं थी बल्कि अपनी विश्व कप जीतने की राह की बहुत बड़ी बाधा पार कर रही थी। वो सिर्फ मेक्सिको की टीम से ही नहीं खेल रही थी, बल्कि स्टेडियम में मौजूद 80 हजार दर्शकों और उनके शोर के विरुद्ध भी खेल रही थी। वो सात हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित एस्टाडियो एज़्टेका पर वायु दाब, तापमान में बदलाव और ऑक्सीजन की कमी से भी लड़ रही थी। इन परिस्थितियों में भी ट्यूशेल की टीम ने कुछ ऐसा कर दिखाया जो पहले किसी ने नहीं किया था। उन्होंने एस्टाडियो एज़्टेका में मैक्सिको के खिलाफ विश्व कप का मैच जीत लिया था। 

और बेल्जियम ने तो कमाल ही कर दिखाया। उसने मेजबान यूएस की मजबूत मेजबान टीम को 4-1 से रौंद ही दिया था। ये कमाल हुआ कैसे। क्या इसका श्रेय डोनाल्ड ट्रम्प को जाना चाहिय। शायद हां या ना भी। उन्होंने फीफा से यूएस के सबसे सफल फॉरवर्ड  फोलारिन बालोगुन  को बोस्निया के विरुद्ध मैच में मिले रेड कार्ड के कारण एक मैच के प्रतिबंध को रद्द करवा दिया। इससे बेल्जियम की टीम पर गहरा प्रभाव पड़ा और पूरी टीम को एकजुट कर दिया। बेल्जियम जिसका कि प्रतियोगिता में अब तक प्रदर्शन कोई खास नहीं रहा था,शानदार प्रदर्शन किया। अमेरिकी टीम पर 4-1 की जीत बेल्जियम के उच्च कोटि के खेल और उनके दबदबे की कहानी कहती है। मैच में जो कुछ हुआ वो मैदान के भीतर से ज्यादा मैदान के बाहर की घटनाओं का परिणाम था। 

ये एक टीम से ज्यादा एक व्यक्ति की हार थी जिसकी प्रतिष्ठा एक बार फिर मुँह बाये जमीन पर औंधी पड़ी थी।

राउंट ऑफ 16 की शुरुआत ही एक सह मेजबान कनाडा की हार से हुई। अफ्रीका की एकमात्र आगे बढ़ी टीम मोरक्को ने आसानी से 3-0 से हराया। मोरक्को की टीम क्वार्टर फाइनल में तो जरूर पहुंची पर इस मैच में उसे एक बड़ा झटका लगा। उनकी टीम आगे बढ़ गई, लेकिन उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। मैच के पहले हॉफ के हाइड्रेशन ब्रेक से ठीक पहले उन्हें हैमस्ट्रिंग में चोट लग गई। 25 वर्षीय इस खिलाड़ी ने मोरक्को के लिए शानदार प्रदर्शन कर रहे थे और गोल कर रहे थे। एक हफ्ते पहले ही बायर्न म्यूनिख ने उन्हें अनुबंधित किया था। उनके स्टार खिलाड़ी इस्माइल सैबारी केवल इस मैच से ही नहीं बल्कि पूरी प्रतियोगिता से बाहर हो गए हैं। 

तीन

एक और जहां इस दौर में शानदार और यादगार मैच हुए वहीं दो मैच बेहद नीरस रहे। स्पेन और पुर्तगाल का मैच नीरस रहा लेकिन वो रेगुलर टाइम में ही समाप्त हो गया। लेकिन स्विट्ज़रलैंड और कोलंबिया के बीच मुकाबला तो अतिरिक्त समय से निकल कर पेनाल्टी शूटआउट तक गया। ये मैच कैसा रहा इसको इस बात से समझा जा सकता है कि रेगुलर खेल के 90 मिनट में दोनों टीमों के कुल मिलाकर सिर्फ चार शॉट ही गोल पर लगे। जेम्स रोड्रिगेज और लुइस डियाज जैसे खिलाड़ियों के होने के बावजूद कोलंबिया की टीम स्विस डिफेंस को भेद नहीं पाई। स्विस टीम ने भी बीच-बीच में कुछ अच्छे प्रयास किए, लेकिन कोई खतरनाक हमला नहीं कर पाई। पेनाल्टी शूट आउट में स्विट्ज़रलैंड ने कोलंबिया को 4-3 से हराकर क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया।

चार

फिलाडेल्फिया की भीषण गर्मी में खेले गए मैच में चैंपियनशिप की सबसे प्रबल दावेदार फ्रांस की टीम ने  पैराग्वे की टीम को 1-0 से हराया। फ्रांस का एक अनुशासित रक्षात्मक पैराग्वे टीम से सामना था जिसने फ्रांस को कड़ी टक्कर दी और उसे गोल करने या शॉट लेने की कोई जगह नहीं दी। ये पैराग्वे की वही मजबूत दीवार थी जिसने जूलियन नागेल्समैन की जर्मनी टीम और उनकी रणनीति को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था और राउंड ऑफ 32 में बड़ा उलटफेर कर सबको चौंका दिया था।

पैराग्वे के रक्षात्मक खेल के अलावा आक्रामक और फिजिकल खेल के कारण  सितारों से सजी फ्रांसीसी टीम मैच के अधिकांश समय तक पैराग्वे के गोल पर कोई गंभीर खतरा उत्पन्न नहीं कर पाई। लेकिन 70वें मिनट में म्बाप्पे पेनल्टी क्षेत्र में घुसे और गिर पड़े। पहले उनके विरुद्ध कोई फाउल नहीं दिया गया लेकिन वीएआर के जरिए उस फैसले की समीक्षा की गई और उसे पलट दिया गया। फ्रांस को पेनल्टी किक दी गई। म्बाप्पे ने पेनल्टी को गोल में बदल दिया। ये इस मैच का एकमात्र गोल था। इस मैच में भी पैराग्वे के गोलकीपर ऑरलैंडो गिल ने शानदार बचाव किए। 

इस मैच में पैराग्वे की टीम ने बेहद आक्रामक और शारीरिक खेल दिखाया। फ्रांस के खिलाड़ियों को चोटिल करने और रोकने के लिए उन्होंने हर हथकंडा अपनाया जिसे  'डर्टी' खेल बताया गए और इसे लेकर मैच के बाद काफी विवाद भी हुआ।

पांच

क्वार्टर फाइनल में पहुंची आठ टीमों में से छह टीमें यूरोप की हैं। इसके अलावा एक टीम दक्षिण अमेरिका से अर्जेंटीना और अफ्रीका से मोरक्को है। ये समीकरण फुटबॉल में अभी भी यूरोपीय प्रभुत्व की कहानी कहता है।

छह

और चलते चलते बात टिकटों की कीमतों की। विश्व कप के शुरू होने से पहले टिकटों की बहुत ज्यादा कीमत और उनकी काला बाजारी की बहुत चर्चा थी। लेकिन मेजबान अमेरिका की हार और पुर्तगाल के बाहर हो जाने के तुरंत बाद ही सेकेंडरी मार्केट में 60 फीसद से भी कम हो गई हैं। अब क्वार्टर फाइनल के लिए टिकट की कीमत 2950 डॉलर प्रति टिकट से घटकर 1200 डॉलर प्रति टिकट हो गई है। सबसे सस्ती टिकट फ्रांस और मोरक्को क्वार्टर फाइनल मैच की है जिसकी कीमत लोकप्रिय और भरोसेमंद सेकेंडरी टिकट मार्केटप्लेस टिक पिक में 989 डॉलर से शुरू है।



फीफा विश्व कप 2026 डायरी 22:रोनाल्डो विश्व कप से विदा

 


क्रिस्तियानो रोनाल्दो को आप पसंद करें या ना करें, ये व्यक्तिगत चॉइस हो सकती है। आप उनसे प्यार करें या घृणा,ये भी व्यक्तिगत पसंद हो सकती है। लेकिन ये तथ्य अटल सत्य है कि वो फुटबॉल खेल के महानतम खिलाड़ियों में से एक हैं, जिन्होंने फुटबॉल को फुटबॉल बनाया। इस बात से भी उनकी महानता पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने कोई विश्व कप जीता या नहीं।

नेमार ने विश्व कप नहीं जीता। अल्फ्रेडो डी स्टेफानो ने नहीं जीता,फेरेंक पुस्कास ने नहीं जीता,जोहान क्रूएफ ने नहीं जीता, मिशेल प्लातिनी ने नहीं जीता,रॉबर्टो बैजियो ने नहीं जीता। लेकिन क्या उनके महान होने में किसी तरह का कोई संदेह किसी को भी है।

ये बात इसलिए कि मौजूदा विश्व कप में स्पेन से हार के बाद उनकी एक सम्मानजनक विदाई बनती थी, जो उनके साथियों ने ही नहीं की। पूरी टीम उन्हें छोड़कर सीधे टनल में जा पहुंची,उनके साथियों से अधिक संवेदनशीलता तो स्पेन के खिलाड़ियों ने दिखाई। खुद लामिन यामाल उन्हें सांत्वना और सम्मान दे रहे थे। ये एक महानतम खिलाड़ी के साथ बेहद असंवेदनशील व्यवहार था। ये खेल भावना कतई नहीं हो सकती।

चाहे जो हो मेरे तईं तो मेस्सी दिल है तो रोनाल्दो दिमाग। दिल लियोनेस मेस्सी से प्यार करता है,पर दिमाग रोनाल्दो का सम्मान। मेस्सी कोई कलात्मक अभिव्यक्ति है, तो रोनाल्दो वैज्ञानिक सूत्र। मेस्सी किसी कृति का भाव पक्ष है तो रोनाल्दो उसका शिल्प। 

मेस्सी जिस खेल का महान खिलाड़ी है ना तुम उसके चैंपियन हो। और चैंपियन ही रहोगे। 

अदेउस दे रोनाल्दो दा कोपा मुंदो।

Tuesday, 7 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 21: पोएटिक जस्टिस




बेल्जियम की टीम द्वारा यूनाइटेड स्टेट्स की टीम को 4-1 से रौंद दिया जाना 'पोएटिक जस्टिस' है। बोस्निया के विरुद्ध मैच में यूएस के सबसे बड़े और मुख्य स्ट्राइकर बालोगन को रेड कार्ड मिला। रेड कार्ड मिलते ही उस खिलाड़ी का स्वतः ही अगला मैच ना खेलना तय हो जाता है। लेकिन बालोगन की ये सजा एक साल के लिए स्थगित कर दी गई। कमाल की बात है कि इस स्थगन के लिए फीफा की और से किसी भी तरह का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

सी विश्व कप अब तक 11 और खिलाड़ियों को भी रेड कार्ड मिले हैं और वे सस्पेंशन की सजा भुगत रहे हैं। इसमें कतर के असीम मडिबो भी शामिल हैं। इस फाउल में कनाडा के इस्माइल कोने के पैर में फ्रक्चर हो गया था। असीम मडिबो पर पांच मैचों का प्रतिबंध लगा है जबकि उनका टेकल उतना खतरनाक प्रकृति का नहीं था। चोट लगना कुछ हद तक संयोग था।

फीफा विश्व कप में अब तक लगभग 190 रेड कार्ड खिलाड़ियों को मिले हैं। बालोगन से पहले केवल एक खिलाड़ी ऐसे हैं जिनकी सज़ा सस्पेंड की गई हैं और वे है विश्व के महानतम खिलाड़ियों में एक ब्राजील के गरींचा जिन्हें ये इम्युनिटी 1962 के विश्व कप में मिली थी जब अनुशासनात्मक कमेटी ने उनकी सजा को स्थगित कर दी थी।

क्रिस्टियानो रोनाल्डो को आयरलैंड के खिलाफ विश्व कप क्वालीफायर मैच में सीधे रेड कार्ड के कारण 3 मैचों का प्रतिबंध मिला था। हालांकि यहां भी फीफा ने उनके शानदार ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए 2 मैचों का प्रतिबंध एक साल की अवधि के लिए निलंबित कर दिया था जिससे वह 2026 विश्व कप के शुरुआती मैचों में खेल पाए। फिलहाल वे भी विश्व कप से बाहर हो चुके हैं।

और हां, मूर्खाधिपति महाराज मुंह के बल औंधे पड़े हैं।

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 25 : सेमीफाइनल एक

  फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल की बात करने से पहले समय को थोड़ा पीछे लिए चलते हैं और स्मृति बन चुके दो मैचों को एक बार फिर याद कर लेते ह...