Tuesday, 16 June 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी ०४ : ज़मीं पर पाँव पड़ते नहीं मेरे

 

       खेल की खूबसूरती ही ये है, कोई एक दिन जो खिलाड़ी का नहीं होता वो रसातल में होता है, और कोई एक दिन जो उसका हो तो वो आसमाँ पर होता है। कोई एक दिन का खेल, कोई एक मैच आपको चाँद पर बैठा देता है। 90 मिनट का समय केवल एक मैच का समय भर नहीं होता। ये एक खिलाड़ी की पूरी जिंदगी की मेहनत होती है। उसका पूरा जीवन होता  है। उसके द्वारा देखे गए सपने होते हैं और उन सपनों को साकार करने का समय होता है।

एक

     इस बात को केप वर्डे के 40 साल के गोलकीपर जोसिमर जोस एवोरा  डायस से बेहतर और कौन समझ सकता है। इस समय वे खुद को धरती पर कहां पा रहे होंगे। वे तो खुद को चांद की सतह पर चलता हुआ महसूस कर रहे होंगे। 

        केप वर्डे अटलांटिक महासागर में अफ्रीका के पश्चिमी तट से लगभग 600 किलोमीटर दूर 10 ज्वालामुखीय द्वीपों का एक खूबसूरत देश है। उस ने पहली बार विश्व कप फाइनल्स के लिए क्वालीफाई किया है। वे कल विश्व कप का अपना पहला मैच खेल रहे थे। विश्व नंबर दो और इस बार के विश्व चैंपियन बनने की सबसे अधिक संभावना वाली और सबसे शक्तिशाली टीमों में से एक स्पेन से खिलाफ। एक दिन पहले कुछ कमजोर टीमों का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा था। काराकाओ जर्मनी से 1-7 से हारी थी और स्वीडन की टीम ने ट्यूनीशिया को 5-1 से हराया था। स्पेन के लिए ये मैच केक वॉक समझा जा रहा था जिसे स्पेन को बड़े अंतर से जीत जाना था। लेकिन केप वर्डे ने शानदार खेल दिखाया। उनका रक्षण अभेद्य था जिसे स्पेन के अग्रिम पंक्ति के  खिलाड़ी भेदने असफल रहे। 

          केप वर्डे  की विश्व रैंकिंग 67वीं है। इसलिए विश्व नंबर दो टीम के कोच लुइस डे ला फुएंते अपने स्टार खिलाड़ी लमिन यामल और निकी  विलियम्स को फर्स्ट इलेवन में शामिल नहीं किया। लेकिन केप वर्डे की टीम ने दूसरे हाफ में उन दोनों को उतारने के लिए मजबूर कर दिया। वे मैदान में उतरे। पर नतीजा वही रहा। वे भी केप वर्डे के रक्षण को भेद नहीं पाए। मैच अंततः गोल रहित अनिर्णीत समाप्त हो गया। ये इस विश्व कप का पहला बड़ा अप्रत्याशित परिणाम था। 


           दरअसल स्पेन के स्ट्राइकर्स और केप वर्डे के गोल के बीच एक खिलाड़ी था। उसका नाम था जोसिमर जोस एवोरा  डायस और जिसे हम वोजिन्हा के नाम से बेहतर जानते हैं। वोजिन्हा ने स्पेन के हर आक्रमण को नाकाम कर दिया। उनके इस खेल पर प्रभाव को इस तथ्य से बेहतर समझा जा सकता है कि स्पेन के खिलाड़ियों ने 27 प्रयास गोल पर किए। उनमें से 10 शॉट टारगेट पर थे। और टारगेट वाले दस शॉट में से आठ बॉक्स के अंदर से लिए गए शॉट थे। वोजिन्हा हर बार गेंद और गोल के बीच दीवार बने खड़े रहे। वे इस मैच के हीरो थे।

          मैच समाप्ति के बाद वोजिन्हा मैदान पर लेट गए। उनकी आंखों से पानी बह रहा था। मानो वे अपने उन मोतियों सरीखे आँसुओं से मैदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हों। मैच के बाद वे कह रहे थे "मैंने अपना पूरा जीवन इसी के लिए, इसी पल के लिए, इसी सपने के लिए मेहनत की है"। वे अभी तक पुर्तगाल के क्लब चावेज़ के लिए तीसरी डिवीजन लीग में खेल रहे हैं। लेकिन इस वर्ल्ड कप के बाद उनके लिए दुनिया वो दुनिया नहीं होगी जो इस विश्व कप से पहले थी। अब उनकी एक दूसरी दुनिया होगी। इस मैच से पहले उनके इंस्टाग्राम पर केवल  पचास हजार फॉलोअर थे और अब छह मिलियन  यानी साठ लाख से भी ज्यादा।

दो

       जितनी शानदार दिन की शुरुआत हुई केप वर्डे और स्पेन के मैच से उतना  शानदार दिन का समापन हुआ ईरान और न्यूजीलैंड के मैच से । ये एक रोमांचक और संघर्षपूर्ण मैच था। और न्यूजीलैंड के हाल फिलहाल के फुटबॉल इतिहास के यादगार पल। उन्होंने अपनी से ऊंची रैंकिंग ईरान को 2-2 की बराबरी पर रोक दिया। 

           न्यूजीलैंड ने एलिना जस्ट के गोलों से दो बार बढ़त ली और ईरान ने दोनों बार बराबरी की। 

          ईरान ये मैच अमेरिका ईरान युद्ध के समापन की घोषणा के कुछ ही समय बाद खेल रहा था। उड़ान की टीम को अमेरिका ने अपने देश में रुकने की अनुमति नहीं दी है। उन्होंने मेक्सिको में अपना बेस कैंप बनाया हुआ है। जबकि उन्हें अपने तीनों लीग मैच अमेरिका में खेलने है। वे करीब 30 घंटे पहले ही लॉस एंजिलिस में पहुंचे थे। एक शत्रु देश में और होस्टाइल वातावरण में मैच खेलने का क्या ही भयावह अनुभव रहा होगा। लेकिन मैच के बाद मन ऑफ द मैच खिलाड़ी रहे ईरान के रामिन रेज़ाँ ने एक सवाल का क्या ही शानदार जवाब दिया - 'ईरान में जो मुश्किलें हैं, वो हमारी मुश्किलें हैं, उससे आपका लेना-देना नहीं है।'

तीन

       दिन के बाकी दो मैच भी अनिर्णीत रहे। बेल्जियम और मिस्र का मैच 1-1 की बराबरी पर छूटा। जबकि सऊदी अरब और उरुग्वे का मैच भी 1-1 पर ड्रॉ रहा। फीफा विश्व कप ऐसा 58 साल बाद हो रहा था कि एक दिन में खेले गए सभी चारों मैच अनिर्णीत रहे हों। इससे पहले सन 1958 में स्वीडन में हुए विश्व कप में हुआ था। तब 15 जून को खेले गए चार मैच अनिर्णीत रहे थे। उस समय भी एक मैच जो स्वीडन और वेल्स के बीच खेला गया था वो 0-0 की बराबरी पर रहा था। इंग्लैंड बनाम ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट जर्मनी बनाम नॉर्दर्न आयरलैंड 2-2 की बराबरी पर तथा पराग्वे बनाम यूगोस्लाविया मैच 3-3 की बराबरी पर छूटा था।

चार 

       और अंत में बात एशियाई टीमों टीमों की। इस विश्व कप में एशियाई टीमों ने बेहद शानदार और ऐतिहासिक शुरुआत की है और अभी तक कोई भी टीम कोई मैच नहीं हारी है। इस बार एशियाई फुटबॉल महासंघ (AFC) से रिकॉर्ड नौ टीमें भाग ले रही हैं।अब तक के मैचों में ऑस्ट्रेलिया ने शानदार खेल दिखाते हुए तुर्की को 2-0 से हराया। जापान ने नीदरलैंड्स जैसी मजबूत यूरोपीय टीम के खिलाफ कड़ा मुकाबला करते हुए 2-2 से ड्रॉ खेला। कतर ने स्विट्जरलैंड के खिलाफ 1-1 से ड्रॉ खेलकर अपना पहला विश्व कप अंक हासिल किया। सऊदी अरब ने उरुग्वे जैसी दिग्गज टीम को 1-1 से बराबरी पर रोक दिया। ईरान ने भी न्यूजीलैंड के खिलाफ बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए मैच 2-2 से ड्रॉ कराया।

एक बड़ा सवाल सभी फुटबॉल प्रेमियों के मस्तिष्क में जरूर आता होगा कि फीफा ट्रॉफी यूरोप और दक्षिण अमेरिका से बाहर कब और कहां जाएगी।



Monday, 15 June 2026

फीफा विश्व कप २०२६ डायरी ०३: एक खूबसूरत परंपरा



    जिस तरह से दुनिया भर के प्रसंशक अपनी टीमों की हौंसला अफजाई के लिए अमेरिका,कनाडा और मेक्सिको पहुंच रहे हैं,वो फीफा विश्व कप 2026 के सुंदर दृश्य रच रहे हैं। बोस्निया हर्जेगोविना के हजारों समर्थकों ने जिस तरह से यूरोप से आकर टोरंटो में मार्च किया वो जितने सुंदर दृश्य को बना रहे थे ठीक वैसे ही खूबसूरत दृश्य न्यूयार्क की सड़कों पर ब्राजील के समर्थक भी निर्मित कर रहे थे। 

एक

    लेकिन सबसे खूबसूरत दृश्य जापानी टीम के समर्थक बना रहे हैं।

    जापानी लोग अपने संयमित और अनुशासित और सरल जीवल के लिए जाने जाते हैं। वे फुटबॉल के मैदान पर भी सार्वजनिक जीवन की सुचिता और गरिमा के दृष्टांत बना रहे हैं। जापानी समर्थकों ने 1998 फ्रांस में हुए विश्व कप फुटबॉल के दौरान  शानदार परम्परा कायम की । वे स्टेडियम को खेल के अंत में वैसा ही साफ़ सुथरा छोड़ कर आते है,जैसा कि उन्हें मिला था। वे मैच के बाद दर्शकों द्वारा छोड़ी गई खाने पीने की चीजों और बाकी फैलाई गई गंदगी को साफ करने के बाद ही स्टेडियम छोड़ते हैं। प्रतियोगिता के चौथे दिन जापान और नीदरलैंड का मैच था। एक बेहतरीन मैच हुआ। 18वें नंबर की विश्व रैंकिंग टीम जापान ने विश्व रैंकिंग में नंबर आठ की टीम से कड़ा मुकाबला किया। मैच में जापान की टीम दो बार पिछड़ी, लेकिन दो बार गोलकर बराबरी पर आई। मैच 2-2 गोल की बराबरी पर छूटा। लेकिन सुंदर दृश्य उनके समर्थक बना रहे थे जिन्होंने मैच की समाप्ति की व्हिस्ल बजते ही वे स्टेडियम साफ करने में जुट गए। खुद फीफा ने अपने एक्स हैंडल पर जापानी समर्थकों की स्टेडियम साफ करने की एक वीडियो पोस्ट की है।

दो

   


कैरेबियन सागर में वेनेजुएला से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर एक बहुत छोटा सा अदभुत प्राकृतिक सौंदर्य वाला एक स्वायत्त देश है काराकाओ। इसका क्षेत्रफल है करीब 450 @वर्ग किलोमीटर और कुल जनसंख्या है एक लाख साठ हज़ार। इसने पहली बार फाइनल्स के लिए क्वालीफाई किया है और अब तक क्वालीफाई करने वाला सबसे छोटा देश है। इस समय इसकी विश्व रैंकिंग 82वीं है। चौथे दिन काराकाओ का विश्व कप का पहला मैच चार बार की चैम्पियन जर्मनी से था। हालांकि ये मैच वे 1-7 से हार गए। लेकिन इस मैच का एक सबसे खूबसूरत क्षण था जर्मनी के खिलाफ़ किया गए पहला और एकमात्र गोल था। जर्मनी के फेलिक्स नेमचा ने छठवें मिनट में ही एक शानदार घुमावदार शॉट से जर्मनी को  1-0 की बढ़त दिला दे। लेकिन 21वें मिनट में कराकाओ के लिवानो कॉमेनेंशिया ने बॉक्स के किनारे से बाये पैर से एक शानदार शॉट लगाया जिसे जर्मनी के गोल कीपर मैनुअल नेउर। नहीं रोक पाये और कॉमेनेंशिया ने अपना नाम इतिहास में लिखा लिया।

तीन

    इस बार विश्व कप में खूब गोल हो रहे हैं। पहले चार दिनों में कुल 14 लीग मैच में कुल 38 गोल हुए है। प्रति मैच 3.17 की औसत से। सबसे कम गोल वाला मैच में स्कॉटलैंड ने हैती को 1-0 से हराया। जबकि सबसे ज्यादा गोल वाले मैच में जर्मनी ने कराकाओ को 7-1 से हराया। एडुआर्डो लगियानो एक जगह कहते हैं “मैं दुनिया भर में घूमता हूँ, हाथ फैलाए हुए, और स्टेडियमों में प्रार्थना करता हूँ: 'भगवान के लिए, एक शानदार मूव तो बनाओ।' और जब भी मैदान पर बेहतरीन फुटबॉल देखने को मिलती है, तो मैं इस चमत्कार के लिए ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ, और मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह मूव किस टीम या देश के खिलाड़ी ने किया है।”

   हर फुटबॉल प्रेमी यही चाहता है एक शानदार मूव और  उससे बना एक गोल। और उसे क्या चाहिए। कुछ भी तो नहीं। यही उसकी चरम आनन्दानुभूति है।



फीफा विश्व कप २०२६ डायरी ०२: छोटे देशों की बड़ी बातें

 

   बोस्निया और हर्जेगोविना दक्षिण पूर्वी यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप का 34 लाख की आबादी वाला बहुत ही छोटा और नया देश है जिसकी स्थापना युगोस्लाविया की विघटन प्रक्रिया में 1995 के डेटन समझौते के तहत हुई. 

    इस छोटे से देश ने इस बार के विश्व कप में 2014 के बाद दूसरी बार क्वालीफाई किया है और ग्रुप बी में मेज़बान कनाडा, स्विट्ज़रलैंड और ईरान के साथ रखा गया है. विश्व कप में इसके प्रदर्शन पर विशेष नजर रखी जानी चाहिए. क्योंकि विश्व कप में क्वालीफायर में दिग्गज टीमों को हराकर यहां तक पहुंची है.

   अगर इस बार चार बार की विश्व चैंपियन और  'कैटेनेसियो' जैसी अभेद्य रक्षा पद्धति को ईजाद करने वाले तथा जीनो डोफ़ व बुफों जैसे गोलकीपर और बरेसी, पाओली माल्दिनी, फेबियो कैनावरो व चेलिनी जैसे डिफेंडर देने वाली इटली की टीम लगातार तीसरी बार विश्व कप  में क्वालीफाई नहीं कर सकी, तो इसका कारण ये टीम है जिसने अपने नए कोच पूर्व राष्ट्रीय टीम कप्तान सर्गेज बारबारेज़ के नेतृत्व में प्ले ऑफ फाइनल में इटली को हराया था. इससे पहले सेमीफाइनल वेल्स की टीम को जबक प्रारंभिक मैचों में रुमानिया को हराया और ऑस्ट्रिया से ड्रॉ खेला. 

      बीती रात मेजबान कनाडा के विरुद्ध एक रोमांचक मैच में शानदार रक्षण दिखाते हुए 1-1 से ड्रॉ खेला. मैच का पहला गोल 21वें मिनट में बोस्निया के जोवो लुकिच ने कॉर्नर पर हेडर से किया. जबकि कनाडा की और से बराबरी का गोल 78वें मिनट में कनाडा के लीजेंड खिलाड़ी काइल लाएं ने किया. लारिन कनाडा के लिए सबसे ज्यादा गोल करने करने वालों में दुआरे नंबर पर हैं. लेकिन उन्हें फर्स्ट इलेवन में जगह नहीं मिली. लेकिन जैसे ही उन्हें स्थानापन्न के रूप में मैदान में जगह मिली दो मिनट के भीतर बराबरी का गोल कर अपनी महत्ता सिद्ध कर दी.

      कनाडा में विश्व कप का ये शानदार आगाज़ था. मैच से पूर्व दोनों टीमों के समर्थकों ने परंपरागत रूप से  मैच से पहले मार्च करके टोरंटो की सड़कों को नीले और लाल रंग से पेंट कर दी थी. ये अद्भुत दृश्य थे.

      फिलहाल तीन विश्व कप में कनाडा का ये पहला अंक था और सात मैचों में हार के बाद पहला ड्रा. 

       ये लाल और नीले के बीच मुकाबला था. आग और पानी का मुकाबला. रक्षण और आक्रमण का मुकाबला. एक बराबरी का मुकाबला।



Friday, 12 June 2026

जसपाल राणा:लक्ष्य जो नहीं उन्हें नहीं चुकना था

 



बहुत बार लिखे से बहुत बहुत ज्यादा गंभीर और महत्वपूर्ण बात छायाकार के कैमरे की आँख से पकड़ा गया कोई एक लम्हा या कोई एक फ्रेम बोल देता है। वे ऐसे अविस्मरणीय और यादगार लम्हे अपने कैमरे से कैद कर देते हैं कि वे आपके दिलोदिमाग पर हमेशा के लिए चस्पां हो जाते हैं। ऐसे लम्हे जिन्हें शब्दों में बांधा ही नहीं जा सकता। किसी भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता सिवाय छायाचित्र के।

आज जब हमारे समय के एक बहुत ही महत्वपूर्ण और जाने माने निशानेबाज जसपाल राणा ने इतनी कम उम्र में इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया तो उनके दो ऐसे ही अविस्मरणीय छायाचित्र लगातार आंखों के सामने घूम रहे हैं। ये दो चित्र उनके पूरे खेल जीवन को कहने के लिए पर्याप्त हैं।

एक


पहला छायाचित्र 2024 के पेरिस ओलंपिक का है। पेरिस में मनु भाकर निशानेबाजी में एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने की अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल करती हैं। ऐसा कारनामा करने वाली वे एकमात्र भारतीय एथलीट होती हैं। उसके बाद वे रेंज से वापस जा रही होती हैं। उनके साथ उनके कोच जसपाल राणा हैं। ये उसी समय का छायाचित्र है। जसपाल बहुत ही सजग और सीधे बैठे हैं और मनु आँखें बंद किये बेपरवाह सी उनके काँधे पर सर टिकाए हैं।

गुरु शिष्य संबंध को इससे बेहतर ढंग से और किसी भी तरह नहीं कहा जा सकता था या यूं कहें कि नहीं कहा जा सकता है। मानो अपने शिष्य की सारी जिम्मेदारी,सारा बोझ गुरु अपने कांधे उठाए है। उधर मनु भाकर का चेहरा निश्चिंतता और खुशी दमक रहा है। उनको अपने गुरु पर इस कदर विश्वास है कि गुरु का कांधा उसे हर फ़िक्र और हर चिंता से मुक्त कर देता है। इतना ही नहीं गुरु अपना कांधा प्रस्तुत कर इतना स्पेस भी देता है कि अभी अभी जो अविस्मरणीय उपलब्धि उसने हासिल की है,उसे अपनी बंद आंखों से फिर फिर जी ले। बंद आंखों से उस उपलब्धि को जी लेने का अनिर्वचनीय सुख उनके चेहरे से छलका छलका जाता है। 

 गुरु शिष्या का ये संबंध इकहरा नहीं है। बल्कि द्वंदात्मक है। वहाँ केवल समर्पण,लगाव और प्रतिबद्धता भर नहीं है, बल्कि मत विभिन्नता,मन मुटाव और अलगाव भी है।  टोक्यो ओलंपिक से पहले जसपाल राणा को जूनियर टीम का हाई परफॉर्मेंस प्रशिक्षक नियुक्त किया जाता है और मनु भाकर भी उनकी प्रशिक्षु होती हैं। लेकिन दिल्ली में आयोजित विश्व निशानेबाजी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले इवेंट्स को लेकर मनमुटाव होता है। उनके रास्ते अलग अलग हो जाते हैं। ये मनमुटाव टोक्यो ओलंपिक के दौरान चरम पर पहुंच जाता है जब मनु भाकर की राइफल इवेंट के बीच में खराब हो जाती है और उन्हें इवेंट बीच में ही छोड़ना पड़ता है।

लेकिन दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। गुरु शिष्या की प्रतिभा को पहचानता है और शिष्या गुरु की महिमा को। मनु को अपनी गलती का अहसास होता है। वो फिर फिर जसपाल के पास लौटती है और प्रशिक्षण शुरू करती है। नतीजा दुनिया के सामने होता है।

दरअसल ये कहानी ये बताती है कि वे आला दर्जे के प्रशिक्षक थे। अहंकार उन्हें छू नहीं गया था। वे अपने प्रशिक्षु की प्रतिभा को ना केवल पहचानते थे, बल्कि उसे तराशना भी जानते थे। उन्होंने मनु भाकर को स्वीकार कर उन्हें ऊँचाइयों तक पहुंचाया। जब उन्हें जूनियर टीम का प्रशिक्षक बनाया गया तो उन्होंने बड़ी संख्या में निशानेबाजों की प्रतिभा को निखारा  जिन्होंने आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपूर्व उपलब्धियां हासिल की। इनमें मनु भाकर के अलावा सौरव चौधरी,अनीश भानवाला पिंकी यादव जैसे नाम शामिल हैं। 

उनके असामयिक निधन से बड़ी संख्या में होनहार प्रशिक्षुओं को एक बहुत ही योग्य प्रशिक्षक की कमी हमेश सालती रहेगी।

दो

ये 2006 के दोहा एशियाई खेलों का है। इस प्रतियोगिता में उन्होंने तीन सोने के और एक चांदी का तमगा जीता था। ये प्रदर्शन उन्होंने उस समय किया था जब अन्य भारतीय निशानेबाज बहुत अच्छ प्रदर्शन नहीं कर रहे थे और वे खुद बीमार थे। वे सेंटर-फायर पिस्टल स्पर्धा में विश्व रिकॉर्ड बनाने के कगार पर थे, लेकिन जसपाल अपने आखिरी दो निशानों पर केवल 9 अंक ही हासिल कर पाए और विश्व रिकॉर्ड बनाने से चूक गए लेकिन सोना तो जीता ही। इस उपलब्धि के बाद वे किसी बच्चे की तरह फूट फूट कर रोये। उस समय उनके चेहरे पर बाल सुलभ भोलापन था। उन आँसुओं के पीछे छिपी आत्म संतुष्टि और खागी को सहज ही महसूस किया जा सकता था। उनके आंख से छलके आंसू कह रहे थे कि भावनाओं के अतिरेक से धैर्य का बांध टूट ही जाता है,फिर चाहे दुख हो सुख।

उन्होंने एक शूटर के रूप में असाधारण उपलब्धियां हासिल की। उनकी मुख्य स्पर्धा 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल थी। उन्होंने 1994 से 2006 तक कुल 15 पदक जीते हैं, जिनमें 9 स्वर्ण पदक, 4 रजत पदक और 2 कांस्य पदक शामिल हैं। उनका सबसे सफल प्रदर्शन 2002 में मैनचेस्टर में रहा, जहां उन्होंने छह पदक जीते थे। जसपाल के नाम भारत के सबसे अधिक पदक जीतने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के एथलीट के रूप में रिकॉर्ड है, उन्होंने चार संस्करणों में कुल 15 पदक जीते हैं, जिनमें नौ स्वर्ण, चार रजत और दो कांस्य पदक शामिल हैं। 1994 में मिलान में जूनियर विश्व चैंपियनशिप के दौरान जसपाल के घुटने पर दर्दनाक फोडा निकल आया था, जिससे उनके लिए खड़े होना भी असहनीय हो गया था। फिर भी उन्होंने अविस्मरणीय प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता और जूनियर विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की।

निसंदेह वे भारत के सबसे सफल और बड़े निशानेबाजों में थे। लेकिन उनकी उपलब्धियों का महत्व पदकों की संख्या में उतना नहीं जितना इस बात में है कि एक महंगे खेल को जिसमें अब तक धनवानों और राजघरानों का प्रभुत्व था,साधारण और आम व्यक्ति के लिए उपलब्ध कराया। 

तीन

वे हमेशा खिलाड़ियों के पक्ष और उनके हितों के लिए खड़े रहे। 2017 में इंपोर्टेड  शूटिंग उपकरणों पर  जीएसटी लागू होने पर वे उसके सबसे मुखर आलोचकों में से एक थे। उनका मानना था कि इन पर भारी कर लगाने से शूटिंग युवा खिलाड़ियों के लिए बेहद महंगी हो जाएगी और उभरती प्रतिभाओं को नुकसान होगा।

चार

एक प्रशिक्षक, एक निशानेबाज और खेल वो खिलाड़ियों के प्रवक्ता के रूप में उनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनकी कमी हर क्षेत्र में खलेगी। ये उम्र उनके जाने की कतई नहीं थी। लेकिन होनी को कोई टाल नहीं सकता।

उनका असामयिक निधन भारतीय खेल और विशेष रूप से शूटिंग में एक बड़ा निर्वात बनाता है।

उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Thursday, 11 June 2026

फीफा विश्व कप २००२६ डायरी ०१ : पूर्वावलोकन

 



उरुग्वे के सुप्रसिद्ध लेखक पत्रकार एडुआर्डो गैलियानो फुटबॉल खेल के अनन्य प्रेम में थे। उन्होंने फुटबॉल पर एक अद्भुत किताब लिखी है 'फुटबॉल इन सन एंड शैडो'। ये शायद फुटबॉल पर लिखी सबसे शानदार किताब है। फुटबॉल का महाकाव्य। इसमें फुटबॉल का जुनून,उसका रोमांच,उसका उत्साह और जोश ही नहीं दिखाई देता,बल्कि उसकी कलात्मकता और रागात्मकता की गूंज भी सुनाई देती है। उसमें उन्होंने एक जगह लिखा 'फुटबॉल एक धर्म है, जिसके अपने देवी-देवता और रीति-रिवाज हैं।'

भारत में खेल प्रेमियों के लिए भले ही क्रिकेट धर्म हो,लेकिन ये सच है कि पूरे संसार के खेल प्रेमियों का धर्म फुटबॉल ही है। जाहिरा तौर पर फुटबॉल धर्म है तो उसके असंख्य चाहने वाले अनुयायी भी होंगे जिन्होंने अपनी अपनी पसंद के खिलाड़ियों को देवत्व का आरोपण किया होगा और उनके देश को किसी देवथान की तरह पूजा होगा। 

जब एक धर्म हुआ,उसके कोटि कोटि देवता हुए,असंख्य अनुयायी हुए, देवथान हुए, तो कितने ही सारे धर्मोत्सव भी होते ही होंगे न। तो इसका सबसे बड़ा उत्सव हुआ फीफा विश्व कप। फुटबॉल का महाकुंभ। हर चार साल में लगने वाला। इस बार ये कुंभ उत्तरी अमेरिका में। 

यूनाइटेड स्टेट्स,कनाडा और मेक्सिको में संयुक्त रूप से आयोजित होने वाला ये विश्व कप सबसे बड़ा आयोजन। फीफा कप का 23वां संस्करण। विश्व भर की कुल 48 टीमें। अब तक की सर्वाधिक। 

इन 48 देशों के खिलाड़ी 16 स्थानों के 16 मैदानों पर अपने एक जोड़ी पैर, एक अदद सिर और एक बॉल 'ट्रायोंडा' के साथ अथक परिश्रम से अर्जित स्किल और जादू सरीखे हुनर के प्रदर्शन को बेताब हुए जाते हैं।


हरे भरे मैदान हैरतअंगेज कारनामों के प्रदर्शन का साक्षी बनने के लिए पैरों के जादुगरों के इंतजार से बेज़ार हुए जाते हैं। मैदानों की आउटलाइंस इन कारनामों की सीमा तय करने में व्यस्त हुई जाती हैं। गोलपोस्ट सीना ठोंक कर अपने मेहमानों को अपने हुनर से उन्हें भेदने की चुनौती देते हुए खड़े दीख पड़ते हैं। और स्टेडियमों के स्टैंड हैं कि अपने मेहमानों के स्वागत में पलकें बिछाए आतुर हुए जाते हैं।

एक इंतजार है जो अब खत्म हुआ चाहता है। एक व्हिसल है कि बजा चाहती है और एक पर्दा है महोत्सव का, जो उठा चाहता है। 

यहाँ पीठ पर लदी अतीत की सुनहरी स्मृतियां होंगी। मस्तिष्क को मथता वर्तमान का खुरदुरा यथार्थ होगा। और दिल में पैठे भविष्य के रोमानी स्वप्न होंगे।

यहां प्रशिक्षकों की रणनीतियों की बाजीगरी होगी। विज्ञान की निश्चितता होगी। तकनीक की कारगुजारियां होंगी। और इन सब के योग से निखरी खिलाड़ियों की अद्भुत कला की रस वर्षा से सराबोर होते दर्शक होंगे।

अपनी विशिष्ट पहचान लिए विभिन्न रंगों की जर्सियां होंगी। खिलाड़ियों की पहचान बताते पीठ और सीने पर अंक होंगे। और राष्ट्रों की पहचान जताते लहराते रंग बिरंगे परचम होंगे।

यहां जोश होगा। उत्साह होगा। जुनून होगा। रोमांच होगा। खेल मुकाबलों की निश्चितता होगी और परिणामों की अनिश्चितता होगी। जीत की खुशी होगी। पराजय की उदासी भी। आंसू खुशी के भी बहेंगे और दुख के भी।

यहां पराभव की ओर जाते और फीफा वर्ल्ड कप में अंतिम बार भाग लेते उम्रदराज खिलाड़ी होंगे।

अर्जेंटीना के लियोनस मैसी होंगे।

पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो होंगे।

क्रोएशिया के लुका मोड्रिच  होंगे

स्कॉटलैंड के गोलकीपर क्रेग गॉर्डन होंगे।

मेक्सिको के गुइलेर्मो ओचोआ होंगे।

 बोस्निया और हर्जेगोविना के ईडिन जिको होंगे

और यहां अपनी प्रतिभा की झलक दिखाते भविष्य के उभरते सितारे युवा खिलाड़ी भी होंगे।

यहां मेक्सिको के गिल्बर्टो मोरा होंगे।

स्पेन के यामल होंगे।

जर्मनी के क्रिएटिव लेनार्ट कार्ल होंगे।

सेनेगल के अटैकर इब्राहिम म्बाये होंगे।

मिस्र के हमजा अब्देलकरीम होंगे।

दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए क्लच ईगल होगा। जायु जगुआर होगा। मैपल मूस होगा।


मशहूर संगीतकार डेविड गुएटा और गायक एंड्रिया बोसेली का तैयार किया गीत ' डीएनए ' की स्वरलहरिया दिलों की धड़कन बढ़ाने के लिए फ़िज़ा में तैर रही होंगी। तो कोलंबियाई सुपरस्टार शकीरा और बर्ना बॉय का ' दाई दाई ' गीत आपके उत्साहवर्धन के स्टूडियों में गूंज रहे होंगे। इन पर थिरकते खिलाड़ी भी होंगे और दर्शक भी।

यहां राष्ट्र तो उपस्थित होंगे ही बल्कि पूरे के पूरे महाद्वीप अपनी विशिष्ट शैली के साथ उपस्थित होंगे। आर्यन प्रजाति और दुनिया में सर्वश्रेष्ठ होने का बोध लिए शारीरिक बनावट में लंबे,शक्तिशाली पावर गेम का नियंता यूरोप होगा। साम्यवाद के बैनर तले बना मानस और कारीगरों वाला हुनर लिए कलात्मक खेल दिखाता दक्षिण अमेरिका होगा। कठिन और दुरूह भूगोल,निर्धनता, आर्थिक बदहाली और दुनिया के भीषण गृह युद्धों से उद्भूत कठिनतम परिस्थितियों से पाई जिजीविषा वाला, कभी हार ना मानने का अफ्रीकी संघर्ष होगा। गरम और उमस भरी जलवायु से उत्पन्न अलसाया सा, धीमा सा एशिया होगा। और अपने अकड़ और हेकड़ी से भरा  स्वभाव और रफ टफ खेल लिए उत्तरी अमेरिका भी होगा।

यहां अपनी टीम के लिए विभिन्न मूल,जाति, प्रजाति,संस्कृतियों और देशों के भेदभाव भुलाता सांस्कृतिक समभाव होगा। एकता होगी। भाई चारा होगा। यहां अपनी टीमों के समर्थन में उग्र राष्ट्रवाद,झगड़े ,दंगे और बैर, वैमनस्य भी होगा।

यहां केवल खेल भर नहीं होगा। फुटबॉल भर भी नहीं होगा। बल्कि यहां राजनीति होगी। कूटनीति होगी।  अर्थव्यवस्था होगी। शिद्दत के साथ बाज़ार खड़ा होगा। सॉफ्ट पावर होगी। अधिकाधिक समावेशी खेल और समाज बनाने के उद्देश्य से 32 के बजाय 48 टीमें होंगी। और ग्रीनलैंड और तमाम मुद्दों के मद्देनजर बायकॉट के प्रयास और अपीलें  भी होंगी। 

इस आयोजन के कारण पर्यावरण का पहुँचते नुक़सान का मुद्दा उपस्थित होगा। कड़े वीजा और आव्रजन नियमों के कारण समर्थकों के अमेरिका में प्रवेश का विरोध होगा। महंगे टिकटों की मार से प्रभावित खेल प्रेमी होंगे। अमेरिका और मेक्सिको में चरमपंथियों से सुरक्षा का सवाल मुंह बाए खड़ा होगा।

सोमालिया के शीर्ष फीफा फुटबॉल रेफरी उमर अब्दुलकादिर अर्टान को आने से रोकने वाला असंवेदनशील अमेरिकी प्रशासन सवालों के कटघरे में खड़ा होगा। और अपने तीनों लीग मैच अमेरिका में खेलने वाली ईरान की टीम को अमेरिका में ना रुकने देने वाला धृष्ट और बदगुमान राष्ट्रध्यक्ष भी होगा।

फुटबॉल का जुनून होगा। इन सब के बीच फुटबॉल की श्रेष्ठता के लिए  104 मुकाबले होंगे। और एक चैंपियन होगा। 

यानी कि फुटबॉल खेल के भीतर एक पूरी की पूरी भरी पूरी दुनिया समाई होगी।

 हां भारत में इस आयोजन के देखने के लिए जी टीवी 

नए नए लॉन्च हुए स्पोर्ट्स चैनल होंगे। और इसे देखने के लिए 799 रुपये का एक रिचार्ज होगा।

और क्या होगा?

अपने देवता मेस्सी और देवथान अर्जेंटीना  की जीत की कामना लिए

विकल्प के तौर पर पेले और गरींचा की थाती के लिए और नेमार के लिए ब्राजील की जीत की कामना लिए

और तीसरे विकल्प के तौर पर लीजेंड रोनाल्डो की विदाई के लिए पुर्तगाल की जीत की कामना लिए 

हम भी मौजूद होंगे।

Monday, 8 June 2026

साशा का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब

 


रात चाहे जितनी स्याह हो उसे सुबह की रोशनी में विलीन हो जाना है। शिशिर की असीम निस्सारता को बसंत की खिलखिलाहट में तब्दील हो जाना है। निराशा के बादल चाहे जितने घने हों उम्मीद की किरनों का उन बादलों को भेद ही देना है। राह लंबी हो सकती है,लेकिन धैर्य ना छूटे तो अंततः मुकाम हासिल हो ही जाना है। कल फिलिप कार्टियर की सुर्ख लाल सतह पर फ्रेंच ओपन के फाइनल में जर्मनी के एलेक्जेंडर साशा ज्वेरेव की इटली के फ्लाविया कोबोल पर 6-1, 4-6, 6-4, 6-7(4-6), 6-1 से संघर्षपूर्ण जीत कुछ ऐसी ही कहानी कहती है। साशा का ये पहला ग्रैंड स्लैम खिताब था।

साशा का फ्रेंच ओपन का ये ल खिताब दरअसल उनकी उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच की आवाजाही की कहानी है। उनके हार ना मानने के जज़्बे की कहानी है। चोटों से जूझते हुए उनके लगातार संघर्ष करने और कठोर परिश्रम की कहानी है। ये शिखर से एक साँस भर की दूरी से बार बार उनकी फिसलन की कहानी भी है। ये खिताब उनके 29 बसंत लंबे इंतजार की कहानी है। 

एक खिताब जो 555 जीत के बाद आया। चार ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने के बाद आया। दस साल के लंबे कॅरियर के बाद आया।

दरअसल ये नियति की गति की कहानी है।

इस बार के फ्रेंच ओपन के बीते एक पखवाड़े के समय ने रोला गैरों के फ़लक पर साफ़ साफ इबारत लिखी कि इस बार का पुरुष एकल का ये खिताब नियति ने साशा के लिए,उसके धैर्य के लिए और उसकी अनंत प्रतीक्षा के लिए पहले ही रिजर्व कर दिया है। वरना तो ये खिताब अलकाराज का ना हो जाता जो कलाई की चोट के चलते इस बार लाल मिट्टी पर खेलने से महरूम हो गए या यूं कहें कि नियति द्वारा कर दिए गए। इसके बाद भी साशा का कहां नंबर आता था। नंबर एक खिलाड़ी यानिक सिनर इसे ना जीत लेते और अपने ग्रैंड स्लैम खिताबों के संख्या अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी अलकराज के बराबर पहुंचा देते। लेकिन वे दूसरे दौर में अप्रत्याशित रूप से हार कर बाहर हो गए। साशा के रास्ते की एक और बाधा दूर हुई। लेकिन ठहरिए। अभी भी साशा का कहां नंबर आता है। नोवाक जोकोविच को क्यों भूले जा रहे हैं। वे अपने  25वें ग्रैंड स्लैम का शिद्दत से पीछा कर रहे थे और दो दौर में शानदार खेल दिखा कर अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर चुके थे। लेकिन नियति इस बार केवल और केवल साशा के पाले में थी। नोवाक तीसरे दौर में हारकर बाहर हो गए। अब जाकर साशा की चर्चा शुरू हुई। क्या साशा अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीत सकते हैं? साशा ने अपने खेल से दिखाया 'हाँ,क्यों नहीं'। 

याद कीजिए 2009 का फ्रेंच ओपन। इसमें पुरुष एकल खिताब  रोजर फेडरर ने जीता था। उन्होंने स्वीडन के रॉबिन सोडरिंग को हराया था। ये फेडरर का एकमात्र फ्रेंच ओपन खिताब था। दरअसल ये नियति ने तय किया था कि इस बार का खिताब रोजर फेडरर का ही होगा। इससे पहले राफेल नडाल बार बार उनके और फ्रेंच ओपन के बीच उपस्थित हो जाते। वे फेडरर को फाइनल में चार बार हरा चुके थे। फेडरर जानते थे कभी वो समय आयेगा जब फाइनल में नडाल उनके सामने नहीं होंगे। ये यही साल था। इस बार सोडरिंग ने अप्रत्याशित रूप से रफ़ाल को चौथे दौर में हराकर बाहर कर दिया। फेडरर जानते थे ईश्वरीय वरदान से कम नहीं। और उन्होंने ना केवल अपना पहला फ्रेंच ओपन जीता बल्कि करियर ग्रैंड स्लैम पूरा किया और साथ ही पीट संप्रास के 14 ग्रैंड स्लैम खिताब के रिकॉर्ड की बराबरी भी की।

इस बार साशा जानते थे कि ना तो नोवाक और ना ही अलकराज और सिनर उनके रास्ते में हैं। ये विधि का विधान रचा गया था। साशा ने चूक नहीं की।  उन्होंने हर उपाय किया। उन्होंने अपने खेल में काले रंग की ड्रेस पहनी हुई थी। आप उन्हें किसी लांग शॉट में देखेंगे तो लगेगा उनकी काले रंग की ड्रेस लाल रंग के मैदान पर काले टीके सरीखी है। एक ऐसा टीका जिसे दुनिया जहान की माएं अपने बच्चों के माथे उसे दुनिया की हर बुरी नज़र से बचाए रखने को लगाती है। क्या पता अपने हर दुर्भाग्य से बचने के लिए ही इस बार ज्वेरेव ने इस काली ड्रेस का टीका लगाना सुनिश्चित किया हो।

साशा को कोई भी चीज उतनी आसानी से नहीं मिलती। इस बार का फाइनल भी ऐसा ही था। मैच पांच सेट तक खिंचा। पूरा मैच ऊपर नीचे होता रहा। कभी साशा के पक्ष में,कभी कोबोली के पक्ष में। पहले ही गेम में साशा ने कोबोली की सर्विस ब्रेक की और आसानी से पहला सेट 6-1 से जीता। तब लगा साशा आसानी से जीतने जा रहे हैं। लेकिन साशा को कोई चीज आसानी से मिल जाए तो फिर साशा,साशा कहां रह जाते। अगला सेट कोबोली ने 6-4 से जीतकर मैच में जान फूंक दी। अब बारी साशा की थी तो उन्होंने बिल्कुल उसी अंतर यानी 6-4 से जीतकर 2-1 की बढ़त ले ली। लेकिन ये बढ़त साशा की जीत सुनिश्चित नहीं करती थी। याद कीजिए  2020 का यूएस ओपन का फाइनल। डोमिनिक थिएम के विरुद्ध भी साशा  ऐसे ही  2-1 की बढ़त बना चुके थे और अंततः हार गये थे। अब संघर्ष निर्णायक मोड पर आ रहा था। चौथे सेट में किसी ने भी अपनी सर्विस नहीं खोई और सेट टाई ब्रेक में गया और बाजी कोबोली ने मारी और सेट 7-6(6-4) से जीतकर स्कोर 2-2 की बराबरी पर ला खड़ा किया। लेकिन फाइनल सेट में अचानक साशा ने गियर बदला और कमाल का खेल दिखाया।

 दरअसल कोबोली ने चौथे सेट के बाद एक ब्रेक लिया। वे यूरिनल गए। ये पांच मिनट का ब्रेक था। इसमें साशा ने अपने को पुनर्संयोजित किया। वे जिस नर्वस क्रैंप का शिकार हो गए थे,उससे अपने शरीर को मुक्त किया और फिर क्या ही लाजवाब टेनिस खेली जिसका कोबोली के पास कोई जवाब नहीं था। उन्होंने ये सेट 6-1 से जीता,और और अपनी असाध्य इच्छा पूरी की।

ज्वेरेव और कोबोली के बीच का मुकाबला केवल दो दोस्तों या दो खिलाड़ियों के बीच का मुकाबला भर नहीं था। ये दो अलग अलग  कालखंड के बीच का मुकाबला भी था।  खेल की दुनिया में लगभग प्रौढ़ होती पीढ़ी का बिल्कुल नई युवा पीढी के बीच का मुकाबला था। ये अनुभव और युवा जोश के बीच मुकाबला था। साशा लगभग 10 साल से सर्किट में थे जबकि कोबोल ने अभी सफर शुरू ही किया था।  साशा के पास ग्रैंड स्लैम के कई फाइनल खेलने का अनुभव था और कोबोली का ये पहला पहला ही  फाइनल मुकाबला था। जहां कोबोली सेमीफाइनल में बिना खेले चार दिन के आराम के बाद कोर्ट पर आए थे, वहीं साशा एक संघर्षपूर्ण मुकाबला खेलकर फाइनल में थे। लेकिन दोनों के बीच समानता ये थी कि ये सर्किट के दो सबसे शानदार सर्विस करने वाले थे।

ये मुकाबला बहुत हद तक बेहतरीन सर्विस करने और  अपने ग्राउंड स्ट्रोक्स को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने का मुकाबला था। साशा इसमें बीस साबित हुए और  जीत ने उनका वरण किया। साशा ने 80 प्रतिशत अपनी पहली सर्विस सही की और उसमें से 73 प्रतिशत पर अंक अर्जित किए। जबकि कोबोली ने केवल 53 प्रतिशत पहली सर्विस सही की और केवल 68 प्रतिशत पर अंक हासिल किए। इसका नतीजा हुआ कि उन्हें गेम जीतने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ी और अधिक ऊर्जा खर्च की। उनकी सर्विस इतनी प्रभावशाली थी कि उनके केवल दो सर्विस गेम ड्यूस में गए। और ये भी कि साशा ने अपने स्ट्रोक्स को बेहतर ढंग से खेला और कोबोली के मुकाबले आधी बेज़ा गलतियां की। यही स्कोर का और हार जीत का अंतर है।

दरअसल पुरुष टेनिस में ज्वेरेव एक ऐसी पीढ़ी के प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं जो अपनी पूर्ववर्ती सीनियर खिलाड़ियों और परवर्ती युवा खिलाड़ियों के बीच सैंडविच बन गई और टेनिस इतिहास के दाय में अपना सही हिस्सा और स्थान नहीं बना पाई। जिन उपलब्धियों के वे हकदार थे,उनसे वे वंचित रह गए।  इस खिलाड़ियों में मुख्य हैं डेनिल मेदवेदेव,डोमिनिक थिएम, सिटसिपास और खुद अलेक्जेंडर ज्वेरेव। उनसे पहली पीढ़ी की फेडरर ,नडाल और जोकोविच की त्रयी इस कदर प्रतिभाशाली और डॉमिनेंट थी कि उनकी छाया से इस पीढ़ी को उबरने का मौका नहीं मिला। फेडरर नोवाक नडाल की त्रयी इतने लंबे समय तक मैदान में प्रभावी रही कि इन खिलाड़ियों को कोई मौका मिल पाता कि अलकाराज और सिनर जैसे प्रतिभाशाली युवा खिलाड़ियों की नई पीढ़ी मैदान में आ गई। हालांकि इन दो पीढ़ियों के बीच में इस बीच की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे दो खिलाड़ी ज्वेरेव और मेदवेदेव अभी भी डटे हैं और मजबूत चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं। 

एक खेल प्रेमी,दर्शक और प्रसंशक होने के नाते आपकी सहानुभूति और समर्थन हमेशा उस खिलाड़ी के लिए होता है जिसे जीत,खिताब और ट्रॉफी की अधिक आवश्यकता होती है। कोबोली और ज्वेरेव दोनों अपने पहले ग्रैंड स्लैम खिताब के लिए खेल रहे थे। ज्वेरेव के पास समय कम था। जो था भी वो तेजी से फिसल रहा था। इसीलिए ज्वेरेव के बड़े प्रसंशक ना होते हुए भी उनकी इस जीत से एक अलग किस्म की संतुष्टि और सुकून का अनुभव हो रहा है जो अगले कुछ समय तक मन मस्तिष्क पर तारी रहने वाला है।

फिलहाल तो साशा को लंबी प्रतीक्षा और कड़ी मेहनत से मिले इस पहले ग्रैंड स्लैम खिताब की बहुत बधाई।



Monday, 26 January 2026

शाइनिंग साइना




हर उड़ान की एक मंजिल होती है। कि एक चमकीला दिन शाम में घुल जाता है। कि पूनम का चांद सूरज की आगवानी में स्वाहा होता जाता है। कि रात के जगमग सितारे सुबह के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। कि जैसे अभी जो बसंत है उसे ग्रीष्म में पिघल जाना है। कि प्रसिद्धि के आकाश में अनंत ऊंचाइयों वाली एक उड़ान अंततः पूर्ण विराम की अवस्था में आ जाती है। कि एक समय आता है जब खिलाड़ी को अंततः खेलों को अलविदा कहना ही होता है। कि उसके खेल जीवन की यवनिका का पटाक्षेप होना होता है और उसका खेल जीवन दैनंदिन जीवन में समाहित हो जाता है। जैसे कि साइना नेहवाल स्वीकारती हैं कि हां,उनके असाधारण उपलब्धियों वाले लंबे करियर का समापन हो चुका है। अभी नहीं,दो साल पहले ही।

वो साल 1990 का बसंत था। तारीख 17 मार्च । हिसार में एक लड़की जन्मती है। बसंत में जन्मी लड़की खुद बसंत हो जाना चाहती है। लेकिन दिक्कत ये है कि पितृसत्ता अपने हिस्से से अधिक पर काबिज हुआ चाहती है। उसे लड़कियों के एक हिस्से को भी अपनी शक्ति के साए में रखना है। कि उन लड़कियों की चाहतों के पंख को उनकी परवाज से पहले ही काट दिया जाता है। कि उनको जन्मने से बहुत बहुत पहले ही होम कर दिया जाता हैं।

पर हर क्रिया की समान प्रतिक्रिया होती है। दबाव जितना ज्यादा होता है उतना ही ज्यादा प्रतिरोध होता है। दुनिया की खूबसूरती ही इस बात में है कि हर एक समान नहीं है। बहुत से माता-पिता पितृसत्ता के साए में मुक्त हैं। उन्हें अपनी छोरियों और उनकी काबिलियत में तनिक संदेह नहीं होता। वे मानते हैं 'कि म्हारी छोरियां छोरों सुं कम हं के।' फिर उन्हें योग्य गुरुओं का वरदहस्त प्राप्त होता है जो उनकी योग्यता को पहचानकर उसे तराशते है। तब कई दैदीप्यमान नक्षत्रों का उदय होता है। उनमें से एक का नाम साइना नेहवाल है।

साइना अपने माता पिता की दूसरी संतान थी। उनकी एक बड़ी बहन थी। अपनी आत्मकथा में साइना लिखती हैं कि 'उनकी दादी लड़का चाहती थीं। इसीलिए जब साइना पैदा हुई, तो वे एक माह तक उन को देखने नहीं आईं।' उनके पिता हिसार में कृषि वैज्ञानिक थे। अपने पिता की पदोन्नति पर जब साइना परिवार के साथ हैदराबाद आईं,तो पितृसत्ता के प्रतिकार के लिए और खुद को साबित करने के लिए खेल चुना, जैसा कि हरियाणा की तमाम लड़कियां चुनती हैं। खेलों में उनके सामने दो विकल्प थे। या तो वे बॉक्सिंग,कुश्ती या निशानेबाजी जैसे उन खेलों खेलों में महारत हासिल करें जो सामान्यतः पुरुषों के 'हलके' माने जाते हैं या फिर पावर के इस खेल से इतर अपनी खुद की इच्छा के दूसरे खेलों के आकाश में अपने पंखों को हौसलों की उड़ान दें। 

पहले उन्होंने मार्शल आर्ट कराटे को चुना और ब्राउन बेल्ट हासिल की। लेकिन जल्द ही उस खेल को चुन लिया जिसमें उनके माता-पिता ने महारत हासिल की हुई थी। वो खेल जो उनकी नियति था। वो खेल जो बल्ले और चिड़िया का खेल था। वो खेल जिसमें चिड़िया को मन मुताबिक उड़ान दी जा सकती थी। वो खेल जो उसके सपनों की उड़ान का रूपक था। ये खेल बैडमिंटन था।


जिस समय उन्होंने बैडमिटन खेल को चुना या नियति ने इस खेल के लिए उनको चुना,उस समय उनकी उम्र आठ साल थी। और जब एक बार उन्होंने हाथ में रैकेट पकड़ा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा जब तक कि उसने प्रतिस्पर्धात्मक खेल से विदा लेकर रैकेट को रख नहीं दिया।

वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस समय जानी गईं जब साल 2008 में वे विश्व जूनियर चैंपियन बनीं। उसी साल बीजिंग ओलंपिक में बैडमिंटन के महिला एकल के क्वार्टर फाइनल में पहुंची। ऐसा करने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं। अगले ही वर्ष उन्होंने इंडोनेशिया ओपन जीतकर बीडब्ल्यूएफ सुपर सीरीज का खिताब जीतकर पहली भारतीय बनने का गौरव हासिल किया और एक साल बाद साल 2010 में वे राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन बनीं। लंदन ओलंपिक 2012 में कांस्य पदक जीतकर वे बैडमिंटन में भारत की पहली ओलंपिक पदक विजेता बनीं। साल 2015 में उन्होंने एकल बैडमिंटन रैंकिंग में विश्व नंबर 1 बनकर एक और इतिहास रचा। ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला और प्रकाश पादुकोण के बाद शिखर पर पहुंचने वाली देश की दूसरी शटलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। उसी वर्ष  बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाली देश की पहली शटलर भी बनीं। हालांकि कैरोलिना मारिन से हार कर रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा। साल 2014 उबेर कप में उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी की और अपराजित रहीं जिससे भारत को उबेर कप में पहला कांस्य पदक जीतने में मदद मिली। उन्होंने कुल मिलाकर 24 अंतर्राष्ट्रीय खिताब जीते जिसमें 10 सुपर  सीरीज खिताब हैं। 

साइना का कोर्ट कवरेज कमाल का था। वे जिस सहजता और सरलता से और ज्यामितीय गुणा भाग से शटल का अनुसरण करतीं और कोर्ट को नापतीं, वो किसी लयकारी को देखने या फिर किसी धुन को सुनने से कम ना था। वे बैक कोर्ट की उस्ताद खिलाड़ी थीं और रक्षण उनका फोर्टे। पावर और स्टेमिना उनमें अपार था और किलिंग इंस्टिक्ट कूट कूटकर भरी। जोखिम उठाना उन्होंने सीखा था। वे खेल के शुरुआती क्षणों से ही आक्रमण कर विपक्षी को हतप्रभ कर देतीं और उन पर बढ़त बना लेतीं। उनमें विपक्षी के खेल को समझकर रणनीति बनाने की कमाल की चतुराई थी। हां, नेट पर खेल में पकड़ ना होना उनके खेल को वल्नरेबल बनाता और उनकी चोटें उनकी सफलता की सबसे बड़ी बाधा बनतीं।

लेकिन उनकी असाधारण उपलब्धियां उन्हें भारत की महानतम बैडमिंटन खिलाड़ी बनाती हैं। आप कह सकते हैं कि पीवी सिंधु उनसे बड़ी खिलाड़ी हैं, क्योंकि उनकी उपलब्धियां साइना से कहीं ज्यादा हैं। उन्होंने दो ओलंपिक पदक जीते और विश्व चैंपियनशिप भी। लेकिन किसी खिलाड़ी का इतिहास में स्थान निर्धारण केवल उसकी उपलब्धियों भर से नहीं होता,बल्कि इस बात से भी होता है कि किसने खेल को और आने वाली पीढ़ी को किस तरह और कितना प्रभावित किया। उनका खेल पर इंपैक्ट कैसा और कितना था। साइना का प्रभाव उनके आंकड़ों और पदकों से कहीं अधिक व्यापक है। वह लाखों लोगों के लिए आदर्श और प्रेरणास्रोत बन गईं। 

जिस समय साइना खेल परिदृश्य पर उभरीं,उस समय पुरुषों में तो प्रकाश पादुकोण,सैयद मोदी और पुलेला गोपीचंद जैसे बड़े नाम थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियां हासिल की थीं।लेकिन महिलाओं में ऐसा कोई नाम ना था। अमी घिया या अमिता कुलकर्णी जैसे दो एक नाम थे जो लोकल सर्किट में तो बड़ा नाम थे,लेकिन उनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी पहचान ना थीं। ये वो समय था जब विश्व बैडमिंटन पर चीन का दबदबा था। चीन की दीवार खिलाड़ियों के लिए अभेद्य थी। साइना ने अपने असाधारण खेल से चीन इस अभेद्य दीवार को लांघा ही नहीं उसे ध्वस्त किया। साइना ने चीनी खिलाड़ियों की जमात के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वे बड़ी सफलताएं प्राप्त की,जो किसी भी खिलाड़ी का सपना हो सकती थीं,और उस समय तक भारतीय महिला खिलाड़ियों से लगभग असंभव दूरी पर अवस्थित थी। साइना का महत्व इस दूरी को मिटाकर असंभव को संभव बनाने में है।

दरअसल उन्होंने अपने खेल और उपलब्धियों से एक ऐसा रास्ता बनाया जिस पर चलकर आगे के खिलाड़ियों ने सफलता प्राप्त की। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने की उम्मीद की लौ भी जगाई और ये हिम्मत,हौसला और विश्वास भी भरा कि चीन की दीवार या कोई भी बाधा पार की जा सकती है,अगर आपने हौसला,जज्बा,लगन और कठिन परिश्रम करने का माद्दा है तो।

उनकी करीब करीब हर उपलब्धि से पहले लगा 'पहली'  विशेषण या फिर 'पहली भारतीय खिलाड़ी' और 'पहली भारतीय महिला खिलाड़ी' संज्ञा  बैडमिंटन खेल और भारतीय खेल परिदृश्य पर उनके इंपैक्ट की कुंजी है। वे एकमात्र भारतीय हैं जिन्होंने बीडब्ल्यूएफ के प्रत्येक प्रमुख व्यक्तिगत स्पर्धा में कम से कम एक पदक जीता है, यानी बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप,बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक पदक@। वह ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय हैं और बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय हैं। 2006 में नेहवाल फोर स्टार टूर्नामेंट जीतने वाली पहली भारतीय महिला और सबसे कम उम्र की एशियाई खिलाड़ी बनीं। वह सुपर सीरीज खिताब जीतने वाली पहली भारतीय भी हैं। वे राष्ट्रमंडल खेलों में दो एकल स्वर्ण पदक (2010 और 2018) जीतने वाली पहली भारतीय भी बनीं । 

भारतीय क्रिकेट टीम ने कई विश्व प्रतियोगिताएं और वर्ल्ड कप जीते हैं, लेकिन जो प्रभाव और महत्व 1983 के विश्व कप जीतने का है, वैसा किसी और का नहीं। यही बात साइना के साथ है। साइना जैसा महत्व और इंपैक्ट किसी और का कहां। 

2012 के लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर और खेल जगत से परे जाकर सुपर स्टारडम हासिल करके भारत में बैडमिंटन को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने साबित किया कि भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय खेलों के उच्चतम स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं और जीत हासिल कर सकती हैं। उनकी सफलता ने पीवी सिंधु सहित भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों की एक पूरी पीढ़ी को पेशेवर रूप से इस खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

दरअसल वे पी टी उषा के बाद भारतीय खेल जगत की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली आईकन हैं। जिस तरह से 1984 के बाद पीटी उषा हर घर का जाना पहचाना नाम बन गई थी,ठीक उसी तरह से 2012 के बाद साइना नेहवाल भी। उन्होंने साबित किया कि 'छोरी छोरी स कम ना सै'।

साइना के खेल खेल मैदान से सक्रिय अनुपस्थिति भारतीय  बैडमिंटन में एक ऐसा निर्वात बनाती है जिसकी भरपाई अगर असंभव नहीं तो बहुत बहुत कठिन जरूर है। 

खेल मैदान से विदा साइना।

फीफा विश्व कप 2026 डायरी ०४ : ज़मीं पर पाँव पड़ते नहीं मेरे

         खेल की खूबसूरती ही ये है, कोई एक दिन जो खिलाड़ी का नहीं होता वो रसातल में होता है, और कोई एक दिन जो उसका हो तो वो आसमाँ पर होता है।...