Monday, 30 January 2023

छोटी छोटी कहानियां का बड़ा संसार

 


खेल मैदान की अभी हाल की तीन खबरें-सानिया मिर्ज़ा के शानदार खेल जीवन का समापन,विनेश फोगाट की बगावत और अंडर 19 क्रिकेट विश्व कप में भारतीय लड़कियों की जीत,इस बात की ताईद करती हैं कि देश बदल रहा हो या नहीं, समाज बदल रहा हो या नहीं, पर लड़कियां बदल रही हैं,उनकी सोच बदल रही है और उनकी ज़िंदगी बदल रही है।

अब लड़कियों के हाथों को चूल्हा,चौका और चूड़ियां नहीं रुचती


बल्कि बैट और बॉल शोभते हैं,रैकेट शोभते हैं, मैट और मैदान शोभते हैं।

पहले अंडर 19 क्रिकेट विश्व कप जीतने वाली लड़कियों की चेहरों पर फैली खुशी देखिए और फिर उनके जीवन में झांकिए,तो आपको पता चलेगा कि ये सफलता लड़कियों की लगन,उनके परिश्रम,उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति,कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी हार ना मानने का जज़्बा और सबसे ऊपर उनकी नई और बदलती का परिणाम है।

उन लड़कियों में एक मन्नत है। गांव चिल ज़िला पटियाला। खेलने के लिए पैसा पास नहीं।  लड़कों की कोचिंग में जुगाड़ हुई तो लड़के साथ खिलाने को तैयार नहीं। पर उसने हार नहीं मानी। अड़ी रही। कोचिंग जाती रही। अब वो टीम की 'जोंटी रोड्स'है।

एक और लड़की है सोनम यादव। उम्र केवल 15 साल। पिता मजदूर। पता ज़िला फिरोजाबाद,उत्तर प्रदेश। देश दुनिया की लड़कियों की कलाइयों को सजाने वाली चूड़ियां बनाने के लिए विश्व प्रसिद्ध शहर की इस लड़की को कांच की चूड़ियों की जगह रास गुगली। जीवन की पिच पर भी और खेल की पिच पर भी।

एक लड़की है फलक नाज़। संगम नगरी प्रयागराज की ही नहीं देश की शान बन चुकी है अब। चपरासी पिता ने नाज़ों से पाला पर नाजुक नहीं बनाया। उसकी तेज गेंदें विपक्षी बल्लेबाजों पर कहर बरपाती हैं।

इस लड़की का नाम है अर्चना। पता ग्राम रतई पुरवा ज़िला उन्नाव। पिता बचपन में छोड़ बस चले। मां ने हार नहीं मानी। नतीजा विश्व विजेता भारतीय टीम की जान।

एक लड़की दिल्ली की-श्वेता सहरावत। वॉलीबॉल,बैडमिंटन,स्केटिंग तक में हाथ आजमाया। पर रास आया क्रिकेट। नतीजा विश्व कप में 140 की स्ट्राइक और 99 की औसत से सर्वाधिक 297 रन।



भोपाल की सौम्या तिवारी। कपड़े धोने की थपकी से गली मोहल्ले में क्रिकेट खेलने से लेकर भारतीय टीम के उपकप्तान का सफर करने वाली लड़की। एक योद्धा लड़की। कोच द्वारा कोचिंग देने से इनकार करने पर भी हार ना मानने वाली लड़की। नतीजा विश्व कप के फाइनल में विजयी रन बनाने वाली बैटर।

और अंत में, कप्तान शेफाली वर्मा।  15 साल और 285 दिन की सबसे कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय अर्धशतक बना कर सचिन का रिकॉर्ड तोड़ने वाली लड़की। अंडर 19 विश्व कप,सीनियर विश्व कप और राष्ट्रमंडल प्रतियोगिता के फाइनल में खेलने वाली अकेली खिलाड़ी।

छोटी छोटी लड़कियों की ये छोटी छोटी कहानियां उनके बड़े बड़े सपनों और बड़े बड़े संघर्षों की कहानियां हैं। ये छोटी छोटी जगहों की छोटी छोटी कहानियां सफलता का इतना बड़ा संसार रचती हैं कि उन्हें खुद भी कहाँ विश्वास हो पाता होगा। क्या पता उनका खुद का रचा संसार उन्हें ही 'लार्जर दैन लाइफ' प्रतीत होता हो।

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और हां, भारत में दो लड़कियों के एक पिता को लड़कियों की ये सफलता बरसात की पहली फुहार  की भीगी भीगी रेशम सी मुलामियत का अहसास ना कराती होगी तो और क्या कराती होगी।

Saturday, 28 January 2023

सानिया मिर्जा : स्पोर्ट्स आइकॉन

                                (गूगल से साभार)

 आखिर क्या होता है खेल को 'अलविदा' कहना। खेल से 'सन्यास' लेना। इसे हम,आप या कोई भी खेल प्रेमी कहां समझ पाएंगे। उनके लिए इसे समझ पाना इसलिए मुमकिन नहीं होता कि मैदान से उनका एक चहेता रुखसत होता है,तो दो और खिलाड़ी उसकी जगह भरने को आ जाते हैं।  प्रसंशक हैं कि पहले को भुला नए के साथ हो लेते हैं।

र एक खिलाड़ी के लिए ऐसा कहाँ संभव होता है। खेल से सन्यास का मतलब एक आम आदमी के लिए चाहे जो हो, लेकिन एक खिलाड़ी के लिए ये उसकी सबसे प्रिय वस्तु से विछोह है। एक यात्रा का अंत है। अपने सबसे प्रिय सपने का अचानक से लुप्त हो जाना है। एक ऐसा सपना जो उसके दिल में जन्मा और बरसो बरस बड़े जतन से पाला पोसा और फिर अचानक एक दिन उससे दूर कहीं बहुत दूर चला जाता है। फिर कभी ना मिल पाने को। 

ये अंत है। ये बिछोह है। ये दुख है। ये संताप है। ये भय भी है।

च तो ये है 'खेल से सन्यास' की इस 'पर्वत सी पीर'को सिर्फ और सिर्फ वो खिलाड़ी ही समझ और महसूस कर पाता है जो खेल से सन्यास लेता है। उसे अलविदा कहता है। 

से समझना है तो एक बार महान इतावली फुटबॉलर फ़्रांचेस्को तोत्ती के विदाई वक्तव्य को ध्यान से देखें। वे एएस रोमा से 25 साल खेलने के बाद खेल को अलविदा लेते हुए कह रहे थे- "आपको पता नहीं है पिछले दिनों में पागलों की तरह अकेले में बैठकर कितना रोया हूँ। काश कि मैं कविता लिख पाता। लेकिन ये मुझे नहीं आता। पिछले 25 सालों से में फुटबॉल के मैदान में पैरों की ठोकर से कविता लिखने की कोशिश कर रहा था,और अब सबकुछ खत्म हो गया है।....अब मैं घास की गंध को इतने करीब से नहीं अनुभव कर पाऊंगा। अब जब मैं दौडूंगा तो सूर्य मेरे चेहरे को ऊष्मा नहीं देगा। मैं बार बार खुद से पूछ रहा हूँ मुझे इस सपने से क्यूं जगाया जा रहा है। लेकिन ये सपना नहीं सच है,और अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मैं डर गया हूँ। मुझे डरने की मोहलत दीजिए।"

सौरव गांगुली अपनी किताब 'एक सेंचुरी काफी नहीं'मैं अपने सन्यास के बारे में लिख रहे थे "मेरे दिल में तरह तरह के जज़्बात थे। मैं बेहद गमज़दा था मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा प्यार दूर जा रहा था।"

बीते सितंबर लंदन में लेवर कप के बाद सन्यास लेते समय के महानतम टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर को जार जार रोते हुए देखिए तो एहसास होगा कि एक खिलाड़ी के खेल से सन्यास के मायने क्या होते हैं। 

फिर बीते शुक्रवार, 27 जनवरी 2023 को मेलबर्न पार्क के रॉड लेवर अरीना में भारत की सानिया मिर्ज़ा की आखों से बहते पानी को देखिए। और एक खिलाड़ी को खेल से विदा कहने का मतलब समझिए।

स दिन मिश्रित युगल के फाइनल में ब्राजील के लुईसा स्तेफानी और राफेल मतोस की जोड़ी से 6-7(2-7),2-7 से हार जाने के बाद ट्रॉफी प्रेजेंटेशन स्पीच में सानिया के साथी खिलाड़ी रोहन बोपन्ना कह रहे थे "ये सच है, सानिया के साथ खेलना स्पेशल है। हमने पहला मिश्रित युगल उस समय साथ खेला था जब वो 14 साल की थी और खिताब जीता था। आज यहां हम आखिरी ग्रैंड स्लैम मैच खेल रहे हैं। दुर्भाग्य से हम खिताब नहीं जीत सके। लेकिन शुक्रिया उस सब के लिए जो तुमने भारतीय टेनिस के लिए किया।" पास खड़ी सानिया थी कि अपने आसुंओं को बहने से रोकने की असफल कोशिश किए जा रही थीं। और आंसू थे कि बहे जाते जाते थे।

                               (गूगल से साभार)

सानिया की आंखों के ये आंसू हार के आंसू नहीं थे बल्कि ये अपने पैशन अपने सपने अपनी ज़िंदगी के सबसे अज़ीज हिस्से से बिछोह से उपजे दुख के आंसू थे। हालांकि वे कह रही थीं "अगर मैं रो रहीं हूँ ये दुख के नहीं खुशी के आंसू हैं। मैं विजेताओं की खुशी के रंग को भंग नहीं करना चाहती।"वे ऐसी ही हैं । इतनी ही उद्दात्त। दुख ऐसे ही उद्दात्त बना देता है मनुष्य को।

ये 36 वर्षीया सानिया का आखिरी ग्रैंड स्लैम मैच  था। उनके 18 साल लंबे खेल जीवन का समापन। खेल से सन्यास। भले ही औपचारिक रूप से उनका आखिरी प्रतियोगिता फरवरी में दुबई इंटरनेशनल हो। पर वास्तव में  उनके खेल जीवन का वास्तविक समापन यही था। 

न्होंने खेल से विदा कहने को वही मैदान चुना जहां से उन्होंने अपने ग्रैंड स्लैम कॅरियर की शुरुआत की थी साल 2005 में। तब वे तीसरे राउंड तक पहुंची थी। जहां वे उस साल की चैंपियन सेरेना विलियम्स से हार गईं थी। वे हार ज़रूर गई थीं। लेकिन इस हार ने उनमें विश्वास भरा था कि उनके लिए एक खुला आसमां सामने है उड़ान भरने के लिए। उस मैच के बाद सेरेना ने रिपोर्टर्स  से बात करते हुए कहा था "मैं विशेष रूप से भारत से एक खिलाड़ी को इतना अच्छा खेलते हुए देखकर रोमांचित हूँ। उसका खेल बहुत सॉलिड है और वह अभी केवल 18 साल की है। उसका भविष्य उज्जवल है।"

6 साल की उम्र से टेनिस खेलना शुरू करने वाली सानिया सीनियर वर्ग में खेलने से पहले ही जूनियर स्तर पर अनेक उपलब्धि हासिल कर चुकी थी। जूनियर लेवल पर 10 एकल और 13 युगल खिताब वे जीत चुकी थीं जिसमें 2003 का  जूनियर विम्बलडन युगल खिताब भी शामिल था जो उन्होंने एलिसा क्लेबिनोवा के साथ जीता था।

2005 में ऑस्ट्रेलियन ओपन में खेलने के बाद  फरवरी में हैदराबाद में डब्ल्यूटीए खिताब जीता और कोई डब्ल्यूटीए खिताब जीतने वाली वे पहली भारतीय महिला बनी। उसी साल वे यूएस ओपन में प्री क्वार्टर फाइनल तक पहुंची जहां अंततः चैंपियन मारिया शारापोवा से हारीं। उस साल की सफलता ने उन्हें 2005 की 'डब्ल्यूटीए नवोदित खिलाड़ी' के खिताब से नवाजा। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने व देश के लिए अनेक उपलब्धियां हासिल कीं।

गस्त 2007 में उन्होंने 27वीं रैंकिंग हासिल की। सौ के अंदर रैंकिंग हासिल करने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं। इससे पहले केवल दो भारतीय पुरुष खिलाड़ी, रमेश कृष्णन (उच्चतम 23वीं) और विजय अमृतराज (उच्चतम 18वीं), 30 के अंदर रैंकिंग हासिल कर सके थे। अगले चार सालों तक वे 35वीं रैंकिंग के भीतर रहीं और दुनिया की श्रेष्ठ महिला खिलाड़ियों में उनकी गणना होती रही। 2012 में कलाई में चोट के बाद एकल को छोड़कर पूरी तरह युगल खिलाड़ी बन गईं। उन्हें अपने कॅरियर के शीर्ष पर जो पहुंचना था। उन्होंने डबल्स में 6 ग्रैंड स्लैम खिताब जीते। 2009 में ऑस्ट्रेलियन ओपन और 2012 में फ्रेंच ओपन महेश के साथ और 2014 में यूएस ओपन ब्राज़ील के ब्रूनो सोरेस के साथ मिश्रित युगल के तीन खिताब।

हिला युगल में भी उन्होंने तीन ग्रैंड स्लैम जीते। उनकी सबसे सफल और शानदार जोड़ी स्विट्जरलैंड की मार्टिना हिंगिस के साथ बनी जिसे 'संतीना'के नाम से जाना गया(सानिया का SAN और मार्टिना का TINA)। इस जोड़ी ने ना केवल 14 खिताब जीते जिसमें 2015 के विम्बलडन और यूएस तथा 2016 का ऑस्ट्रेलियन खिताब शामिल हैं बल्कि लगातार 44 मैच जीतने का रिकॉर्ड भी बनाया।

स दौरान वे 91 हफ्तों तक डबल्स की नंबर एक खिलाड़ी रहीं और अपने खेल जीवन में कुल 43 डब्ल्यूटीए खिताब जीते।

वे एक असाधारण खिलाड़ी थीं जिन्होंने अपनी उपलब्धियों और अपने खेल से भारत में टेनिस के स्वरूप को ही बदल दिया। वे मार्टिना नवरातिलोवा और स्टेफी ग्राफ के खेल को देखते हुए बड़ी हो रही थीं और उनके समय तक विलियम्स बहनें परिदृश्य पर आ चुकी थीं। उन्होंने भी आक्रामक खेल को अपनाया। उनके फोरहैंड शॉट बहुत शक्तिशाली होते थे। वे उनके समकालीन किसी खिलाड़ी जितने ही शक्तिशाली होते। सर्विस रिटर्न्स भी बहुत शक्तिशाली और कोणीय होते। दरअसल उनके खेल की एक कमजोरी थी कोर्ट में मूवमेंट की। उनका कोर्ट में मूवमेंट बहुत धीमा था और इसकी भरपाई अपने शक्तिशाली फोरहैंड और आक्रामक खेल से करतीं। उनके पहले तक भारत में टेनिस एक एलीट और नर्म मिजाज़ खेल  था  जिसे सानिया ने पावर और रफ टफ खेल में बदल दिया।

क्रामकता, बिंदासपन और साफगोई उनमें जन्मजात थी और उनके स्वाभाविक चारित्रिक गुण। वे जितनी आक्रामक मैदान में प्रतिद्वंदी के प्रति होती, उतनी ही आक्रामक मैदान के बाहर अपने विरोधियों के प्रति। वे अपेक्षाकृत संभ्रांत परिवार से थीं इसलिए उन्हें उस तरह से संसाधनों के अभावों का सामना नहीं करना पड़ा जैसे अमूमन भारतीय महिला खिलाड़ियों को करना पड़ता है। फिर उनके माता पिता हर समय उनके साथ खड़े रहे। 

रअसल उनके संघर्ष दूसरी तरह के थे। वे महिला थी और मुस्लिम भी। और वे एक ऐसे ग्लैमरस खेल को चुन रही थीं जिसके ड्रेसकोड को लेकर रूढ़िवादी परंपरागत मुस्लिम समाज सहज नहीं हो सकता था। उनका विरोध होना स्वाभाविक था। और खूब हुआ। उनके खिलाफ फतवे जारी किए गए। 2005 में वे केवल 18 साल की थीं और उस साल सितंबर में कोलकाता में सनफीस्ट ओपन खेलने गईं तो उनके कपड़ों को लेकर पहला  फतवा जारी किया गया। लेकिन वे गईं वहां। वे वहां कड़ी सुरक्षा में रहीं। एक 18 साल की लड़की जो चारों और से सुरक्षा घेरे में रहती हो कैसी मानसिकता में जी और खेल रही होगी। लेकिन वो किसी और मिट्टी की बनी थी। उसने 'गिव अप'नहीं किया। उसने टेनिस की ऑफिसियल ड्रेसकोड का पालन किया। स्कर्ट और शॉर्ट में खेली। उसने साहसिक इबारत वाली टी शर्ट पहनने से भी गुरेज नहीं किया। 

विवाद और विरोध उसके साथ साये की तरह थे। फिर वो हॉफमैन कप के एक मैच के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप हो,विवाह पूर्व संबंधों का या पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक का उनके साथ विवाह पूर्व हैदराबाद में रहना हो या उनके साथ विवाह का हो,उन्होंने सभी का सामना किया और आगे बढ़ीं।  खेल प्रशासन और टीम कम्पोज़िशन को लेकर भी विवाद हुए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने हर बार स्टैंड लिया और स्पष्ट स्टैंड लिया।

नका सबसे बड़ा और स्पष्ट स्टैंड महिलाओं की स्थिति को लेकर था। अखबारों में कहा गया कि सानिया मिर्जा मानती हैं  'भारत में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता।' इस बात पर उनकी कड़ी आलोचना हुई। पर उन्होंने कहा 'मैने ये नहीं कहा भारत में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता। अगर ऐसा होता तो मैं आज यहां नहीं होती। लेकिन मैं बहुत भाग्यशाली हूँ,बहुत ज़्यादा। लेकिन हज़ारों अन्य स्त्रियां इतनी भाग्यशाली नहीं हैं। उनका शारीरिक और यौन शोषण होता है और उन्हें अपने सपनों को पूरा करने की आज़ादी नहीं है क्योंकि वे स्त्रियां हैं।' आज भी उनका स्टैंड स्पष्ट है। 

पीटी उषा के बाद वे भारत की सबसे बड़ी स्पोर्ट्स वीमेन आइकॉन थीं। सानिया मैरी कॉम और साइना नेहवाल के साथ स्टार स्पोर्ट्स वोमेन की त्रयी बनाती हैं। पीवी सिंधु उनके बाद आईं। अपने साहसिक,कभी हार ना मानने,सतत संघर्ष शील और फेमिनिस्ट सानिया नई पीढ़ी की भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी प्रेरणा स्रोत हैं। तभी तो स्टार रेसलर विनेश फोगाट जो खुद खेल प्रशासन और डब्ल्यूएफआई के बाहुबली और दबंग माने जाने वाले अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली उनके सन्यास पर इतनी खूबसूरत बात कह सकीं कि "शुक्रिया सानिया,युवा भारतीय लड़कियों की एक पूरी पीढ़ी को ये बताने के लिए कि सपने कैसे देखे जाते हैं।उनमें से मैं भी एक हूँ। आप तमाम चुनौतियों के बीच पूरे जुनून के साथ खेलीं। आपका दाय भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए बहुत मायने रखता है। सम्मान और बधाई !"

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खेल मैदान में हमेशा तुम्हारी कमी खलेगी। नई पारी के लिए बहुत बधाई सानिया

Tuesday, 17 January 2023

स्टीफन डगलस केर:'पारस' प्रशिक्षक





स्टीफन डगलस केर:'पारस' प्रशिक्षक


 क होता है पारस पत्थर। जिस चीज को छू ले सोने की बन जाए। बेशकीमती हो जाए। अनमोल हो जाए। कुछ लोग भी पारस होते हैं। वे चीजों को छू भर लें दीप्त होने लगती हैं। सोने की माफिक चमकने लगती हैं। स्टीफेन डगलस केर ऐसे ही प्रशिक्षक हैं। पारस हैं। उन्होंने गोल्डन स्टेट वारियर्स के खिलाड़ियों को छुआ,सितारे बनकर चमकने लगे। गोल्डन स्टेट वारियर्स टीम को छुआ,सफलता की असाधारण चमक से सबको चकाचौंध दिया।

बीते शुक्रवार 13 जनवरी की रात एनबीए के 2022-23 के रेगुलर सीजन में वेस्टर्न कांफ्रेंस में सान एंटोनियो स्पर्स की टीम अपने अरीना अलामो डोम में गोल्डन स्टेट वारियर्स की टीम को होस्ट कर रही थी। इस सीजन पिछली चैंपियन गोल्डन स्टेट वारियर्स की टीम पूरी तरह से फॉर्म में नहीं है और उसकी अच्छी शुरुआत नहीं रही। लेकिन इस मैच में वारियर्स ने शानदार खेल दिखाया और उसने मेजबान स्पर्स को 144-113 से हरा दिया। इस मैच को देखने के लिए रिकॉर्ड संख्या में दर्शक उपस्थित थे। कुल 68,323 दर्शक।

रअसल एक कोच के रूप में स्टीव केर की रेगुलर सीजन में ये 450वीं जीत थी। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए ऐसी ही रिकॉर्ड ब्रेकिंग दर्शकों की उपस्थिति और शानदार जीत की दरकार थी। निसंदेह स्टीव केर एनबीए के महानतम प्रशिक्षकों में से एक हैं।

नबीए के पिछले सीजन 2021-22 में स्टेट वारियर्स की टीम बोस्टन सेल्टिक्स को 4-2 से हराकर पिछले आठ सालों में चौथी बार और अपने फ्रेंचाइजी इतिहास की सातवीं चैंपियनशिप जीत रही थी। आठ सालों में चौथी बार। स्टीव ने गोल्डन स्टेट को छू जो लिया था। वे उसके कोच जो बन गए थे।

स्टीव 2014-15 के सीजन में स्टेट वारियर्स के पहली बार हेड कोच बने और पहली बार में ही उसको चैंपियन बना दिया। ऐसा करने वाले एनबीए के 75 वर्षों के इतिहास में केवल सातवें प्रशिक्षक थे।उल्लेखनीय है फाइनल में वे लेब्रोन जेम्स कैवेलियर्स को हरा कर ये जीत हासिल कर रहे थे।डब नेशन 40 साल बाद चैंपियन बन रही थी। इतना ही नहीं उन्होंने डब नेशन को लगातार 05 साल तक एनबीए के फाइनल में पहुंचाया। 2014 के बाद 2017,2018 और 2022 में स्टेट वारियर्स को चैंपियनशिप दिलाई।

च तो ये है 2014 के सीजन से पहले डब नेशन एक बहुत ही औसत टीम थी। लेकिन इस सीजन उस टीम के हेड कोच बनते ही उन्होंने टीम को औसत टीम से चैंपियन टीम में रूपांतरित कर दिया। 

बिला शक वे एक महानतम प्रशिक्षकों की श्रेणी में शुमार हो चुके हैं। ये इस तथ्य से भी जाना जा सकता है कि 2022 में एनबीए की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर एनबीए ने सार्वकालिक 15 सर्वश्रेष्ठ कोचों की एक सूची जारी की जिसमें स्टीव केर भी एक थे। और वे एकमात्र वर्तमान सक्रिय कोच थे। इससे पहले 1916 के सीजन में उन्हें एनबीए के सर्वश्रेष्ठ कोच का खिताब मिल चुका था।

तना ही नहीं 2022 में जब एक कोच के रूप में चौथी रिंग प्राप्त कर रहे थे तो कुल मिलाकर वे अपनी नवीं रिंग प्राप्त कर रहे थे। पांच खिलाड़ी के रूप में और चार कोच के रूप में। वे एनबीए के एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने कोच और खिलाड़ी के रूप में चार चार रिंग (खिताब ) जीती हैं।

खिर एक प्रशिक्षक के रूप में उनकी सफलता का राज क्या था। दरअसल वे एक उम्दा खिलाड़ी भी थे जो तमाम बेहतरीन प्रशिक्षकों के अधीन और विशेष रूप से महानतम प्रशिक्षक फिल जैक्सन के अधीन खेले थे। उनसे मिले सारे अनुभवों के आधार पर डब नेशन को प्रशिक्षित किया और एक उम्दा टीम में परिवर्तित कर दिया।

क प्रशिक्षक के रूप में उनकी रणनीति का प्रमुख औज़ार था 'त्रिकोणीय आक्रामक तकनीक'।
पहले शिकागो बुल्स और फिर सान एंटोनियो स्पर्स से खेलते हुए जो ट्राई एंगुलर ऑफेंसिव  तकनीक (त्रिकोणीय आक्रामण शैली) से वे रूबरू हुए, उसका परिवर्धित  रूप स्टेट वारियर्स की टीम को दिया और उसे सर्वश्रेष्ठ टीम के रूप में परिवर्तित कर दिया।

त्रिकोणीय आक्रमण तकनीक बास्केटबॉल की एक ऐसी तकनीक या खेल प्रविधि है जिसमें कोई टीम एक विंग से आक्रामक मूव बनाती है जिसमें पास,ड्रिबलिंग और खिलाड़ियों के मूवमेंट के बिंदुओं को जोड़ेंगे तो वे अनेकानेक त्रिकोण बनाएंगे। और इस तरह से आक्रामक टीम बास्केट करने और अंक अर्जित करने के आसान मौकों की निर्मिति करती है। इस तकनीक में जिस विंग में खेल होता है(स्ट्रांग विंग) उसमें तीन खिलाड़ी होते हैं और जिस विंग में खेल नहीं होता है (वीक विंग),उसमें दो खिलाड़ी। 

ये एक ऐसा तरल कॉम्बिनेशन है जिसमें टीम के पांचों खिलाड़ी शामिल होते हैं और इसमें कोई भी खिलाड़ी किसी भी स्थान पर खेल सकता है और एक दूसरे की पोजीशन ले सकता है। इसमें खिलाड़ी की आई क्यू मायने रखती है और दो खिलाड़ियों के बीच का स्पेस भी। ये एक कठिन लेकिन बहुत ही कारगर प्रविधि है जिससे कई टीमें चैंपियन बनी हैं।

स आक्रमण शैली या प्रविधि को इज़ाद करने वाले दक्षिण कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सैम बैरी माने जाते हैं जिसे आगे चलकर कंसास राज्य के मुख्य प्रशिक्षक टेक्स विंटर ने आगे बढ़ाया जो बैरी के अधीन खेले थे। बाद में शिकागो बुल्स के हेड कोच और दुनिया के महानतम प्रशिक्षकों में से एक फिल जैक्सन ने इसे अपनाया और इस तकनीक को प्रसिद्ध कर दिया।

रअसल 1985 में टेक्स विंटर शिकागो बुल्स में सहायक प्रशिक्षक बन गए और मुख्य कोच फिल जैक्सन के साथ मिलकर त्रिकोणीय आक्रमण तकनीक को लागू किया। परिणाम था कुल 11 एनबीए  चैंपियनशिप। 06 शिकागो बुल्स के साथ और 05 लॉस एंजिलिस लेकर्स के साथ। 

ही वो समय था जब स्टीव केर एक खिलाड़ी के रूप में पहले बुल्स और फिर स्पर्स के साथ कैरियर बना रहे थे और उस तकनीक से रूबरू भी हो रहे थे जिस का प्रयोग करके उन्हें आगे खुद की प्रशिक्षित टीम को चैंपियन बनाना था।

वे भले ही एनबीए के महानतम खिलाड़ियों में से ना रहे हों लेकिन उम्दा खिलाड़ी अवश्य रहे और एक खिलाड़ी के रूप में कुल पांच रिंग जीती। तीन बुल्स के साथ और दो स्पर्स के साथ। 


न्होंने खिलाड़ी के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत एरिज़ोना वाइल्डकैट्स के साथ किया। उसके बाद 1986 में वे फीबा विश्व कप जीतने वाली अमेरिकी टीम के सदस्य थे। इस उपलब्धि ने उनके लिए प्रोफेशनल बनने का रास्ता खोल दिया। उन्हें 1988 में सबसे पहले फीनिक्स संस ने ड्राफ्ट किया। लेकिन 26 मैचों के बाद वे क्लीवलैंड कैवेलियर्स को ट्रेड कर दिए गए। उनका खिलाड़ी के रूप में स्वर्णिम काल 1993 में उस समय शुरू हुआ जब वे शिकागो बुल्स में शामिल हुए। उस समय उस टीम में माइकेल जॉर्डन थे और कोच थे फिल जैक्सन। बुल्स के साथ उन्होंने 1996,1997 और 1998 में तीन रिंग जीती। उसके बाद वे सान एंटोनियो स्पर्स के साथ जुड़े और 1999 में चौथी रिंग जीती। उन्होंने खिलाड़ी के रूप में अपनी पांचवी रिंग 2003 में एक बार फिर स्पर्स के साथ जीती। 

जिस समय 2003 में 15 सीजन के बाद उन्होंने खिलाड़ी के रूप में अपने कॅरियर का समापन किया उस समय वे एक हज़ार से ज़्यादा मैच खेल चुके थे। हालांकि उसमें से केवल 30 मैचों में उन्होंने फर्स्ट फाइव से शुरुआत की। वे थ्री पॉइंटर के  चैंपियन थे। 1997 में उन्होंने थ्री पॉइंटर चैंपियनशिप जीती। उनका थ्री पॉइंटर का कॅरियर औसत 45.4 है जो एनबीए का अब तक का सर्वश्रेष्ठ औसत है। बाद में उनके प्रशिक्षण में स्टीफेन करी ने थ्री पॉइंटर में विशेषज्ञता हासिल की।


स्टीफेन डगलस केर(स्टीव केर) का जन्म लेबनान की राजधानी में हुआ था। 1984 में जब उनके पिता मैल्कम एच केर बेरूत की अमेरिकन यूनिवर्सिटी के  प्रेसिडेंट थे,चरमपंथी गुट ने उनकी हत्या कर दी। उस समय स्टीव केर 18 साल के थे। इस घटना ने उनकी जीवन और उनकी सोच पर गहरा प्रभाव डाला। एक साक्षात्कार में वे कह रहे थे 'पिता की हत्या से पहले मेरा जीवन अभेद्य था। बुरी घटनाएं दूसरों के जीवन मे घटित होती हैं। मैं सोचता था मैं ऐसी घटनाओं से परे हूँ और मेरा परिवार भी।' इस घटना ने उन्हें और अधिक मानवीय बना दिया और दूसरों के दुःख दर्द के प्रति अतिरिक्त संवेदनशील भी।

सीलिए वे अमेरिकी गन कल्चर के घोर विरोधी बने। उन्होंने अमेरिका में हुई हर गोलीबारी पर चिंता जाहिर करते और ऐसी हर घटना पर भावुक और विचलित हो जाते। अमेरिकी संसद में 'गन नियंत्रण विधेयक' पर रिपब्लिकंस के उसे रोकने के प्रयास को अमेरिकी जनता को बंधक बनाने का प्रयास कहा। उन्होंने 'ब्लैक लाइव्स मैटर्स'का भी समर्थन किया और शांतिपूर्ण विरोध का समर्थन भी। उन्होंने हमेशा'श्वेत सर्वोच्चता'का विरोध किया।

ये सही है कि महान खिलाड़ी बिल रसेल की तरह एक खिलाड़ी के रूप में वे  11 रिंग नहीं जीत सके और ना ही महानतम कोच फिल जैक्सन की तरह एक कोच के रूप में 11 रिंग जीती हैं,पर एक खिलाड़ी और कोच के रूप में संयुक्त रूप से अब तक 09 रिंग जीत चुके हैं और इस रूप में वे औरों से बहुत आगे हैं और अलग भी। कोई उनके आस पास भी नहीं टिकता। फिर उनका संवेदनशील व्यक्तित्व उन्हें असाधारण की श्रेणी में ला खड़ा करता है।
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बिला शक वे 'पारस' है। एक 'पारस प्रशिक्षक'।जिन्होंने गोल्डन स्टेट वरियर्स की टीम को छुआ और उसे सोने की टीम में बदल दिया। वे अभी 57 वर्ष के हैं और एक कोच के रूप में एक लंबा समय उनके पास है। आगे आगे देखिए होता है क्या।


Sunday, 15 January 2023

विश्व कप हॉकी 2023

 



ये साल 1975 था। तारीख 15 थी। और महीना मार्च का।

भारत में अभी भी आपातकाल की घोषणा होने में तीन महीने का समय बाकी था। क्रिकेट के स्वरूप को बदल देने वाले प्रुडेंशियल क्रिकेट विश्व कप के शुरू होने में भी इतना ही समय शेष था। इतना ही नहीं भारत की हॉकी को श्री हीन कर देने वाले एस्ट्रोटर्फ को पहली बार इंट्रोड्यूस करने वाले मॉन्ट्रियल ओलंपिक  के आयोजन में भी अभी साल भर का समय था।

स समय हमारी आमद बचपन और किशोरावस्था की संधि बेला में हो चुकी थी,लेकिन टीन ऐज अभी भी साल,दो साल की दूरी पर थी। क्रिकेट में हमारी थोड़ी रुचि बढ़ने लगी थी। दर्शकों की डिमांड पर छक्का लगाने वाले सलीम दुर्रानी,फॉरवर्ड शार्ट लेग पर फील्डिंग करने वाले असाधारण फील्डर एकनाथ सोलकर और फ्लाइट के जादूगर प्रसन्ना जैसे खिलाड़ियों के रास्ते क्रिकेट दिल में उतरने की जद्दोजहद करने लगा था। लेकिन दिल का बड़ा क्या लगभग सारा का सारा हिस्सा अभी भी हॉकी के हवाले ही होता था। ध्यानचंद,केडी सिंह बाबू,पृथ्वी सिंह,रूप सिंह,बलबीर सिंह सीनियर जैसे खिलाड़ियों के जादुई किस्सों को सुनते हुए हम बड़े हो रहे थे और अशोक कुमार,गोविंदा,सुरजीत,माईकेल किंडो,फिलिप्स गोविंदा और अजीतपाल सिंह  जैसा खिलाड़ी बनने का सपना लेकर हॉकी हाथों में लिए रोज़ शाम को खेल मैदान में जाना शुरू हो गया था।

न उस समय भारतीय खेल इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ रहा था। भारत किसी खेल में पहली बार विश्व चैंपियन बन रहा था। उसके सर हॉकी के विश्व चैंम्पियन का ताज जो सज रहा था। 

वो साल 1975 के मार्च की 15वीं तारीख थी। मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर के मर्देका स्टेडियम में खेले गए तीसरे हॉकी विश्व कप के फाइनल में भारत अपने परंपरागत प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को 2-1 से हराकर ना केवल अपना पहला और अब तक का अपना एकमात्र खिताब जीत रहा था बल्कि हॉकी के छीजते गौरव को पुनर्स्थापित भी कर रहा था। 

हॉकी विश्व कप की ये जीत भारतीय खेल इतिहास का एक ऐसा स्वर्णिम पल था जो आवाज के जादूगर जसदेव सिंह के माध्यम से हमारे दिल पर कभी ना मिटने के लिए अंकित हो रहा था। आज भी ऐसा लगता है जैसे ये अभी कल की ही घटना है। क्या ही कमाल है जैसे जैसे हम उम्रदराज होते हैं हमें निकट भूत का बहुत कुछ याद नहीं रहता लेकिन दूर अतीत ऐसे याद आता है जैसे वो कल ही घटा हो। इस विश्व कप की जीत की यादें भी ऐसी ही यादें हैं।

स समय तक भारत में टीवी का आगमन तो हो चुका था। लेकिन उसका अस्तित्व आठ दस बड़े शहरों तक बहुत सीमित मात्रा में मौजूद था। उन दिनों खेलों को हम स्टेडियम के किसी कोने में उपस्थित कमेंटेटरों की आंख से देखा करते थे। उस पूरे टूनामेंट को भी हमने ऐसे ही देखा था।

फाइनल मैच हॉकी के परंपरागत प्रतिद्वंदियों भारत और पाकिस्तान के बीच था। उस समय ये दोनों टीमें हॉकी की सबसे बड़ी टीमें हुआ करती थीं। ऐसे में मैच में एक अतिरिक्त तनाव और उत्तेजना का होना स्वाभाविक था। उम्मीद के अनुरूप ही वो ऐतिहासिक फाइनल मैच बहुत तेज गति से खेला गया। पाकिस्तान ने शरूआत में कुछ बेहतरीन मूव बनाए। उसने दूसरे ही मिनट में पेनाल्टी कॉर्नर अर्जित किया और मंज़ूरुल हसन ने गेंद गोल में डाल दी। लेकिन रेफरी ने गोल नहीं माना क्योंकि गेंद डी पर स्टॉपर द्वारा ठीक से नहीं रोकी गई थी। मैच का पेस और पिच स्थापित हो चुका था। मैदान में जितनी उत्तेजना व्याप गई थी उससे कहीं अधिक उतेजना और तनाव हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे मैच का आंखों देखा हाल सुन रहे सैकड़ों हॉकी प्रेमियों के दिलों में व्याप गया था।

क और फॉरवर्ड्स ताबड़तोड़ हमले कर रहे थे दूसरी और डिफेंडर हार्ड टैकल। छठवें मिनट में हीं  मंज़ूरुल के टैकल से अशोक कुमार मैदान में पड़े कराह रहे थे और तेरहवें मिनट में पाकिस्तानी राइट इन समीउल्लाह वरिंदर की स्टिक से ज़मीन पर थे और दाहिने कंधे में चोट खाकर मैदान से और मैच से ही बाहर नहीं हो रहे थे बल्कि पाकिस्तान को को भी मैच से बाहर कर रहे थे। समीउल्लाह की जगह सफदर अब्बास आए। 

फदर अब्बास समीउल्लाह जितने प्रभावी भले ही ना हों, पर पाकिस्तान ने आक्रमण जारी रखे और अंततः 18वें मिनट में उसको पहला गोल करने में सफलता मिली। तेजतर्रार फारवर्ड लेफ्ट इन मोहम्मद सईद ने वरिंदर सिंह से गेंद छीनी और और गोली की गति से ड़ी में घुसे और भारतीय गोलकीपर अशोक दीवान को छकाते हुए पाकिस्तान को 1-0 से आगे कर दिया। भारतीय फैंस सकते में थे।। इससे पहले एक गोल अमान्य हो चुका था। उस पेनाल्टी को अर्जित करने वाले भी मोहम्मद सईद ही थे। 

सके बाद भारत ने अपने आक्रमण को दाहिने छोर पर केंद्रित किया और गोल करने के कई मौके बनाए, लेकिन पहले हाफ गोल नहीं कर सके। पहला हाफ पाकिस्तान के पक्ष में 1-0 पर समाप्त हुआ। ये वो समय था जब मैच 35-35 मिनट के दो हाफ का हुआ करता था।

दूसरे हाफ में शुरुआती कुछ मौकों को छोड़कर भारत ने शानदार खेल दिखाया जिससे मैच धीरे धीरे पाकिस्तान के हाथों से छूटने लगा था। भारत के लिए बराबरी का गोल 46वें मिनट में उस समय आया जब फिलिप्स ने भारत के लिए चौथा पेनाल्टी कॉर्नर अर्जित किया जिसे सुरजीत सिंह ने गोल में बदल कर भारत को बराबरी पर ला दिया।

गभग आठ मिनट बाद ही अशोक कुमार ने लांग कॉर्नर पर गोल कर भारत को 2-1 से बढ़त दिला दी। ये गोल एक खूबसूरत टीम वर्क था। अजीतपाल ने शॉट लिया। अशोक ने वो शॉट रिसीव किया ड्रिबल कर डी के अंदर गए और पास फिलिप्स को दिया,फिलिप्स ने पास फिर अशोक को दिया और अशोक ने गोल दाग दिया। अंत तक ये स्कोर बना रहा। 

स गोल की तुलना आप 1986 के माराडोना 'गोल्डन हैंड गोल'से कर सकते हैं। इसलिए नहीं कि ये गोल गलत था या गलत तरीके से किया गया था। बल्कि इसलिए कि ये भी उसी गोल की तरह विवादास्पद बना दिया गया और इसलिए भी इस गोल का परिणाम एक इतिहास रच रहा था।

ये एक विवादास्पद गोल था जिसका पाकिस्तान के खिलाड़ी ये कहकर विरोध कर रहे थे कि गेंद गोलपोस्ट से अंदर नहीं गई है। लेकिन उस मैच के रैफरी विजयनाथन बहुत बाद में भी उस गोल को याद करते हुए कहते हैं कि 'ये साफ गोल था। मैं गोलकीपर और स्ट्राइकर के एकदम पास खड़ा था। वीडियो से ये साफ  हो जाता है कि  वो स्पष्ट गोल था। फोटो और वीडियो झूठ नहीं बोलते। उस फ्रेम में मैं और नौ खिलाड़ी हैं लेकिन इस्लाउद्दीन कहीं आस पास भी नहीं हैं।' दरअसल वे उस पाकिस्तानी टीम के कप्तान इस्लाउद्दीन के उस दावे पर अपनी प्रतिक्रिया कर रहे थे कि अशोक कुमार द्वारा किया गया वो गोल स्पष्ट गोल नहीं था जिसे गलत तरीके से भारत को अवार्ड किया गया। बरसों बाद इस्लाउद्दीन ने अपनी आत्मकथा में भी एक अलग अध्याय 'गोल जो था ही नहीं' में भी अपना वही आरोप दोहराया था। वे एक सच को झूठ बनाने की लगातार कोशिश कर रहे थे।

स जीत के साथ भारत ने अपना पहला विश्व कप खिताब जीत लिया था और अपने खोए गौरव को पुनर्स्थापित भी कर दिया था। ये अलग बात है कि वो बहुत ज़्यादा दिनों तक रहा नहीं। ऐसा क्यों हुआ ये फिर कभी।

भारतीय टीम के मैनेजर बलबीर सिंह सीनियर उस जीत के बाद कह रहे थे 'पिछले 10 वर्षों में ये भारत की पाकिस्तान पर सबसे शानदार जीत है।' दरअसल ये 1971 में पहले विश्व कप के समय फाइनल में भारत की पाकिस्तान के हाथों हार का स्वीट रिवेंज ही था। उस हार से भारत फाइनल में प्रवेश नहीं कर सका और अंततः केन्या को हराकर उसने कांस्य पदक जीता था। दूसरे विश्व कप में उसने फाइनल में प्रवेश किया। लेकिन वहां नीदरलैंड ने भारत को पेनाल्टी शूटआउट तक गए मैच में 4-2 से हरा दिया था।

1973 की भारतीय टीम बहुत मजबूत थी। शारीरिक रूप से भी और खेल कौशल की दृष्टि से भी। तभी तो जर्मन कोच ने कहा था 'यदि ये टीम मुझे मिल जाए तो इसे मैं इसे विश्व की होने वाली हर प्रतियोगिताओं का विजेता बना दूं।'

1975 की भारतीय टीम भी वैसी ही थी। उसे ग्रुप बी में घाना, अर्जेंटीना,ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और पश्चिम जर्मनी के साथ रखा गया था। तीन जीत, एक ड्रा और एक हार के साथ भारत अपने ग्रुप में प्रथम स्थान पर रहा था और सेमीफाइनल में भारत का मुकाबला मलेशिया से हुआ।

स प्रतियोगिता का 13 मार्च को भारत और मलेशिया के बीच खेला गया सेमी फाइनल भी एक क्लासिक मैच था जिसमें मलेशिया ने जीत के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया था। उस भारतीय टीम के कप्तान अजीतपाल सिंह बताते हैं कि 'ये उनके लिए उस प्रतियोगिता का सबसे कठिन मैच था।'उस मैच में भारत खेल खत्म होने में लगभग पांच मिनट पहले तक 1-2 से पिछड़ रहा था। भारत का विश्व कप जीतने का सपना टूटने के कगार पर था। तभी कोच बलबीर सिंह सीनियर ने फुल बैक माइकेल किंडो की जगह असलम शेर खान को मैदान में उतारा। उसके कुछ क्षणों बाद ही भारत को पेनाल्टी कॉर्नर मिला। इसे असलम शेर खान ले रहे थे। आज भी याद आता है कमेंटेटर बता रहे थे हिट लेने से पहले उन्होंने गले में पड़े ताबीज को चूमा, उसके बाद हिट लिया, गेंद गोल में थी। स्कोर 2-2 हुआ। अतिरिक्त समय मे हरभजन गोल कर भारत को 3-2 से जिताकर फाइनल में पहुंचा दिया था। मलेशिया को ये हार अब तक सालती है। उस मैच में मलेशिया की ओर से पहला गोल करने वाले दातुन फूक लोक कहते हैं 'उस मैच की स्मृति को मिटाना असंभव है। वो हार अभी भी उदास करती है।'

रअसल ये जीत और विश्व विजेता बनना भारत की छीजती  गौरवपूर्ण हॉकी परंपरा को रोककर पुनर्स्थापित करने का आखरी प्रयास था।  1928 से 1956 तक लगातार ओलंपिक में 6 स्वर्ण पदक जीत चुका। उसके बाद की भारत की हॉकी अधोगति की ओर जाती हॉकी थी। 1960 में वो रजत पदक जीत सका था। 1964 में एक बार फिर स्वर्ण पदक जीता,लेकिन उसके बाद 1968 और 1972 में उसे मात्र कांसे के पदक से संतोष करना पड़ा।

धर विश्व कप में भी 1971 के पहले संस्करण में तीसरे और 1973 के दूसरे संस्करण में दूसरे स्थान पर रहा था।

1975 के बाद हॉकी केवल एस्ट्रो टर्फ पर खेला गया। उसके बाद की हॉकी की कहानी एस्ट्रो टर्फ,नियमों में परिवर्त्तन, ऑफ साइड के नियम की समाप्ति, कलात्मकता को ताकत और गति द्वारा रिप्लेस करने और भारत व पूरे एशिया की हॉकी की अधोगति की कहानी है। भारत के लिए 1928 से शुरू हुआ एक चक्र 2008 में पूर्ण होता है जब वो ओलंपिक के लिए अहर्ता भी प्राप्त नहीं कर सका था।

ब एक बार फिर समय बदला है। धीरे धीरे हॉकी गति पकड़ रही है। पिछले मास्को ओलंपिक में कांस्य पदक जीता है। समय का चक्र फिर से घूम रहा है।

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ब जब 13 जनवरी 2023 से भारत में  15वां हॉकी विश्व कप आयोजित हो रहा है तो कुछ सपने देखने का और पुरानी ऊंचाइयों को महसूसने का अवसर तो बनता है ना।



Friday, 30 December 2022

अलविदा 'द ओ री दो फ़ुतबाल'


  


अलविदा 'द ओ री दो फ़ुतबाल
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जिस व्यक्ति के बारे में हम कह सुन रहे हैं,इतना लिख पढ़ रहे हैं,दरअसल पहले जान तो लें वो है क्या!

पेले के समकालीन और दुनिया के महानतम फुटबॉलरों में शुमार हॉलैंड के जोहान क्रुयफ़ ने एक बार कहा था 'पेले एकमात्र ऐसे फुटबॉलर हैं जो तर्क की सारी सीमाओं को पार कर गए हैं।'

र्क की सीमा के पार मनुष्य होते हैं क्या! नहीं ना! तो क्या वे फुटबॉल के ईश्वर थे? शायद हाँ!

भी तो एक दूसरे महानतम फुटबॉलर हंगरी के फ्रेंक पुस्कास ने कहा था ' इतिहास का महानतम खिलाड़ी डी स्टिफानो था। मैं पेले को खिलाड़ी मानने से इनकार करता हूँ। वो इन सबसे ऊपर है।' 

क खिलाड़ी से ऊपर आखिर कौन हो सकता है! एक ईश्वर ही ना! यानी पेले एक ईश्वर ही थे ? 

1970 के विश्व कप फाइनल में ब्राज़ील ने इटली को 4-1 से हराया था। उस मैच में उन्हें मार्क कर रहे महान इतावली डिफेंडर तार्सीसिओ बर्गनिच कह रहे थे 'मैच से पहले मैंने स्वयं को समझाया आखिर है तो वो भी(पेले) औरों जैसा हाड़ मांस का बना व्यक्ति ही। पर मैं गलत था।'

यानी वो एक इंसान भी नहीं था। स्वाभाविक है ईश्वर ही होगा!

हां याद आया दो बार खुद पेले ने भी कुछ ऐसा ही कहा था। 1970 के विश्व कप के दौरान मेनचेस्टर यूनाइटेड के डिफेंडर पैडी क्रेरंद ने एक टीवी शो में पेले से पूछा कि 'पेले के हिज्जे (spelling)क्या हैं।' पेले ने कहा 'बहुत ही आसान। जी ओ डी(G O D)।' एक अन्य बार ये पूछे जाने पर कि क्या उनकी शोहरत ईसा जितनी ही है,उन्होंने कहा था कि 'दुनिया के कुछ हिस्सों में ईसा को उतनी अच्छी तरह से नहीं जाना जाता है।'

तो तय हुआ कि अगर वे तर्कातीत थे,एक खिलाड़ी से कहीं अधिक थे और हाड़ मास के इंसान भी नहीं थे,तो ईश्वर ही होंगे।

 आज तक मैं भी उसे देव तुल्य ही जानता समझता था। मेरे तईं फुटबॉल का कुल इतिहास दो देवताओं का इतिहास था। जो पेले से शुरू होकर मैस्सी पर खत्म हो जाता है। मुझे उन दोनों के बीच माराडोना ही एक ऐसा इंसान नज़र आता था जो उन देवताओं के सामने ताल ठोंकता,उन्हें चुनौती देता नज़र आता था।

लेकिन आज जब एडसन अरांतेस दो नेसीमेंतो नाम के शरीर ने पेले नाम की आत्मा को बेघर कर दिया है,तो कुछ अलग ही अहसास हुआ जाता है। दृष्टि है कि साफ हुई जाती है। मन का भ्रम है कि छंटा जाता है। मन  में बनी एक मूर्ति है जो टूट टूट जाती है। और?

र एक ईश्वर है कि जिसकी मौत हुई जाती है।

ब पेले नाम के किसी ईश्वर को मैं नहीं जानता। पेले हाड़ मांस का बना हम और आप जैसा ही एक व्यक्ति था,एक ऐसा व्यक्ति जिसकी मृत्यु भी होती है,जो खिलाड़ी था और जो फुटबॉल खेलता था। ऐसी फुटबॉल खेलता जैसी कोई दूसरा ना खेल पाता। एक ऐसा फुटबॉलर जैसा कोई दूसरा ना था। ठीक वैसा ही जैसे एक बीथोवन था,एक बाख था और  माईकेल एंजेलो। और ये सब ईश्वर की अनुपम देन ना थीं, तो क्या थीं।

रअसल ये इंसान की फितरत है कि वो इंसानी सीमाओं को पहचानता ही नहीं।  वो नहीं जानता इंसान की क्षमताएं क्या और कितनी हैं। एक इंसान के वे कार्य जो उसके लिए जब तर्क से परे हो जाते हैं,तो उसमें देवत्व को आरोपित कर देता है।

लेकिन इंसान की तर्कातीत उपलब्धियों में देवत्व का आरोपण मनुष्यता का और खुद मनुष्य का अपमान है। ये मनुष्य की उपलब्धियों को छोटा कर देना है। मनुष्य को रिड्यूस कर देना है। शायद पेले को देवता कहना, ईश्वर  बनाना उसकी असाधारण क्षमताओं को रिड्यूस कर देना है। 

पेले हाड़ मांस का बना एक खूबसूरत इंसान था, और है और रहेगा। वो एक ऐसा इंसान था जो मानवीय गरिमा से ओतप्रोत था और जिसका चेहरा मानवीय करुणा दीप्त होता था।

वो हाड़ मांस का बना एक ऐसा खिलाड़ी था जिसने 17 साल की उम्र में पहला विश्व कप जीत लिया था। जिसने एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन विश्व  विश्व कप जीते थे। जिसने एक,दो या सौ, दो सौ नहीं बल्कि कुल 1283 गोल किए थे। एक ऐसा खिलाड़ी, फुटबॉल का ऐसा जादूगर था जिसके पैरों का जादू देखने भर को नाइजीरिया के सिविल वार में लड़ते दो पक्ष 48 घंटों का युद्ध विराम कर दिया था। ऐसा खिलाड़ी था जिसने खेल कौशल को उस सीमा तक पहुँचा दिया था वो तर्कातीत हो जाती थी।

सने एक ऐसी  असाधारण उपलब्धि धारण की थी कि सिर्फ 29 साल की उम्र में 1000वां गोल कर सका और उसकी  इस उपलब्धि को चांद पर जाकर सेलिब्रेट किया गया। आखिर क्या ही संयोग विधि द्वारा गढ़े जाते हैं कि ऐन 19 नवंबर 1969 के दिन जब वो वास्को डी गामा के विरुद्ध सांतोस के लिए खेलते हुए  पेले अपना हजारवाँ गोल कर रहा था,तो मनुष्य अपोलो यान से चांद पर पहुंच कर इस क्षण को सेलिब्रेट करता है। ऐसा सम्मान और किसे मिल सकता था। आखिर कौन इसके काबिल हो सकता था।

वो क्या ही अद्भुत दृश्य रहा होगा जब उसने अपना हजारवाँ गोल किया तो कितने ही मिनटों तक खेल रोक दिया गया था और सांतोस और वास्को डी गामा,पक्ष और विपक्ष दोनों ही दलों के खिलाड़ी उस को अपने कांधे बिठाकर परेड कर रहे थे।

कितना खूबसूरत वो खिलाड़ी रहा होगा और कितना खूबसूरत उसका मन कि वो अपने एक हजारवें गोल का जश्न मनाने के बजाए ब्राजील के हज़ारों गरीब बच्चों और उनके भविष्य की चिंता कर रहा था। आखिरकार मदर टेरेसा की तरह दुनिया भर की करुणा से भीग रहे चेहरे को देखकर ही तो सन 1966 में पेले से मुलाकात करते हुए पोप पॉल ने कहा  होगा 'नर्वस मत होओ मेरे बेटे. मैं तुमसे ज्यादा नर्वस हूँ. बहुत लम्बे अरसे से ख़ुद तुम से मिलने का सपना देखता रहा हूँ।'

खिर कितने खुशकिस्मत रहे होंगे वे लोग जिन्होंने उनके पैरों से होते 1283 गोल देखे होंगे। 91 हैट्रिक बनती देखी होंगी। कितने खूबसूरत रहे होंगे उनके बाइसिकल गोल। कितना खूबसूरत रहा होगा वो शॉट जब चेकोस्लोवाकिया के खिलाफ़ मध्य रेखा से लगभग गोल कर ही दिया था।

कैसा अनोखा और मूल्यवान  रहा होगा वो खिलाड़ी जिसको खो देने के भय से राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया गया हो।

सी खूबसूरत फुटबॉल जिसमें अद्भुत ड्रिबलिंग हो,शक्ति,गति और नियंत्रण हो,लय हो,देवताओं को कहां रुचती है। ये तो हाड़ मांस से बने मानुस को शोभती है, हां पेले को रुचती है। 

1957 से 1974 के मध्य फुटबॉल के मैदान में एक खिलाड़ी द्वारा जो जादू बिखेरा गया, जो कीर्तिमान बने, वे देवताओं के बस की बात थोड़े ही ना थी। ये उन सीमाओं की बानगी भर है, जिन्हें एक मानव अपनी योग्यता से विस्तारित करता है,जिन्हें हम देख नहीं पाते,कल्पना नहीं कर पाते,हमें तर्कातीत लगने लगती हैं। दरअसल ये वो खूबसूरत नैरेटिव है जो ये बयान देता है कि मानव  क्या कुछ कर सकता है। उसकी क्षमताओं की क्या सीमाएं हैं।  पेले की कहानी एक ऐसी कहानी है,जो कहती है दुनिया में क्या संभव है और आदमी क्या कर सकता है। बाइडेन के शब्दों में पेले 'स्टोरी ऑफ व्हाट इस पॉसिबल' है।

ज अब जब पेले नहीं रहे तो कितने स्टेडियम उदास हो गए होंगे। कितने मैदान होंगे जो मन मसोसकर कर खेद जता रहे होंगे। कितने गोलपोस्ट होंगे जो गहन वेदना से गल रहे होंगे।कितनी फुटबॉल होंगी जो आंसू बहा रही होंगी। कितनी व्हिस्ल होंगी जो शोक गीत गा रही होंगी।

र हम में से ना जाने कितने लोग होंगे जिनके दिल जार जार करके रो रहे होंगे। ठीक ऐसे ही जैसे मेरा दिल रो रहा है। आज मन शिद्दत से चाह रहा है कि एक बार उसके शरीर से लिपटकर रो सकता। काश कि उसे एक बार अपनी आंखों से खेलते हुए देख पाता। काश एक पत्रकार के रूप में उससे एक     साक्षात्कार ले पाता। उससे उसके खेल के संबंध में ढेर सारे प्रश्न पूछ पाता। एक दोस्त  की तरह उसके गले मे हाथ डालकर सड़कों पर आवारागर्दी कर सकता। किसी नुक्कड़ की दुकान पर बैठकर चाय पी सकता। उसके साथ फुटबॉल खेल सकता। और फिर उसके उम्दा खेल पर ईर्ष्या करते हुए उससे कह पाता 'अबे तुझसे अच्छा खेलता हूँ मैं।'

र ये सब  इच्छाएं कोई देवता पूरी कहां पर पाते।एक इंसान ही पूरी कर पाता ना। 

र हां पेले कभी कहां मर सकता है। वो हमारे दिलों में,मैदानों में ,फुटबॉल खेल में और हमारी बातों में,किस्से कहानियों में हमेशा ज़िंदा रहेगा। 

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र ये भी कि सुप्रसिद्ध फुटबॉलर बॉबी चार्लटन से खूबसूरत बात और कौन कह सकता है कि 'फुटबाल खेल का जन्म इसीलिए हुआ कि पेले खेल सके।'

लविदा द पेले। द ओरी। द ब्लैक पर्ल।



Thursday, 22 December 2022

विश्व कप फुटबॉल डायरी_08

 



अस्सी मिनट बनाम चालीस मिनट बनाम पेनाल्टी शूट आउट

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              अगर मैं शिक्षक होता तो अपने विद्यार्थियों को सिखाता कि जीवन का एक पर्यायवाची 'फुटबॉल का खेल' होता है और एक फुटबॉल मैच वो बाइस्कोप होता है जिससे केवल उस जीवन को देखा भर नहीं जाता बल्कि उसे महसूस भी किया जाता है। हर वो आदमी जिसने कल लुसैल स्टेडियम में विश्व कप फुटबॉल का फाइनल देखा होगा,इस बात की ताईद करता पाया जाएगा।

          आखिर ऐसा कौन सा संवेग बच रहा होगा जो इस मैच में दौरान देह मन ने अनुभव ना किया होगा, ज़िंदगी के वे कौन से पाठ रहे होंगे, जो ये एक मैच ना सिखा पाया होगा या वो कौन सा रंग होगा जो इस एक मैच ना बिखरा होगा। जिसने भी कल का फाइनल मैच देखा होगा,इससे अलग क्या सोच पा रहा होगा।

           बीती रात फुटबॉल विश्व कप के बीच अर्जेंटीना और पिछली चैंपियन फ्रांस के बीच खेला गया मैच 120 मिनट के बाद भी 3-3 गोल की बराबरी पर छूटा,तो निर्णय पेनाल्टी शूट आउट से हुआ और अर्जेंटीना फ्रांस को 4-2 से हराकर विश्व चैंपियन बना। ये अर्जेंटीना का तीसरा विश्व खिताब था।

           दरअसल इस मैच को तीन भागों में अलग करके देखा जा सकता है। एक,पहले 80 मिनट। दो, 30 अतिरिक्त मिनट सहित अंतिम 40 मिनट। तीन,पेनाल्टी शूटआउट। ये तीन भाग इस मैच के आरंभ, उत्कर्ष और समापन थे। 

           ये मैच दो अलग फुटबॉल शैलियों और तीन महाद्वीपों के बीच का मुकाबला था। एक तरफ दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल  की कलात्मकता थी। दूसरी तरफ यूरोप की गति और शक्ति थी। उस गति और शक्ति में अफ्रीकियों की किसी भी परिस्थिति से हार ना माने की अदम्य जिजीविषा और अंतिम समय तक संघर्ष करने के हौंसले का समावेश था।

          पहले भाग में अर्जेंटीना किसी विश्व चैंपियन की तरह खेला। इस भाग में अर्जेंटीना का खेल कौशल अपने उठान पर था, जिसने यूरोपीय गति और शक्ति को हतप्रभ कर दिया। ये अर्जेंटीना का इस प्रतियोगिता का सबसे शानदार प्रदर्शन था। उनके मूव और उनके पासेस का खेल देखना अदभुत अनुभव था। गेंद पर नियंत्रण और पासेस की दिशा कमाल की थी। ऐसा लग रहा था मानो अर्जेंटीनी खिलाड़ी एक दूसरे के मष्तिष्क को पढ़ ले रहे हैं। वे किसी धुन पर थिरकते प्रतीत होते। एक लय में। एक अन्विति में। सम्मोहन बिखेरते हुए। सम्मोहित करते हुए। इस दौरान अगर अर्जेंटीना का आक्रमण धुन पर थिरक रहा था तो डिफेंस किसी चट्टान की तरह अडिग खड़ा था जिससे टकरा कर फ्रांसीसी गति और ताकत बेबस हुई जाती थी। इस भाग में अधिकांश समय खेल फ्रांस के हाफ और उसके बॉक्स के आसपास सिमट गया था। उनका कमिटमेंट अविश्वसनीय था। मानो वे ये दृढ़ प्रतिज्ञा करके आएं हों कि फीफा ट्रॉफी का अगला गंतव्य केवल और केवल ब्यूनस आयर्स ही होना है।

             अर्जेंटीना के सामने फ्रांस की टीम दोयम दर्जे की प्रतीत हो रही थी। पहले 80 मिनट में एमबापे के केवल 11 टचेज जो अब तक का सबसे कम थे। वे खेल से अनुपस्थित से थे। फ्रांस की असहायता इस बात से समझी जा सकती हैं कि इन 80 मिनटों में फ्रांस की टीम केवल एक बार वो भी 71वें मिनट में गोल पर शॉट ले सकी और एमबापे का ये शॉट टारगेट से बहुत ऊपर से निकल गया।

             इस प्रतियोगिता में अब तक फ्रांसीसी जीत के कर्णधार रहे ग्रीजमान,देम्बेले और थियो हर्नांडेज इस समय तक बाहर जा चुके थे और उनकी जगह थुरम, कोमेन और कमाविन्गा ले चुके थे। ये बदलाव दरअसल कलात्मकता और गति व ताकत के द्वंद्व में तीसरे आयाम का जुडना था। अब अफ्रीकी जज्बा और संघर्ष करने की अदम्य लालसा भी फ्रांसीसी टीम में समाविष्ट हो चुकी थी। मृतप्राय गति व ताकत में सब्सिट्यूशन से फिर से प्राण फूंके जा चुके थे। अब मुकाबला दक्षिण अमेरिका बनाम यूरोप से आगे बढ़कर दक्षिण अमेरिका बनाम यूरोप व अफ्रीका हो चुका था।

           अंतिम 10 मिनट बचे थे। अर्जेंटीना दो गोल से आगे था। उस की जीत लगभग पक्की मानी जा रही थी कि समय चक्र ने पलटा खाया।  क्या पता उस समय फ्रांस के खिलाड़ियों में मष्तिष्क में अपने महानायक नेपोलियन के वे शब्द भी गूंज रहे हों कि   'असंभव जैसा शब्द उनकी डिक्शनरी में नहीं होता।' जो भी हो 79वें मिनट में एक मौका मिला फ्रांस को। मौनी अर्जेंटीना के बॉक्स में अकेले गेंद के साथ थे। अर्जेंटीना के ओटामेंदी के पास गोल बचाने का उन्हें गिराने के अलावा कोई चारा नहीं था। फ्रांस को पेनाल्टी मिली और एमबापे का गोल नंबर 06 आया। मैच में जान आ गयी। एक मिनट बीतते बीतते एमबापे का गोल नंबर 07 आया और स्कोर 2-2 से बराबर।

             गति और जोश ने अर्जेंटीना की लय को भंग कर दिया था। अगले 09 मिनट एक तरह से अफरा तफरी के थे। जो लय टूट चुकी थी,उसे फिर से बांधने में और गति ने जो लय पकड़ ली थी, उसे रोकने के लिए अर्जेंटीना को भी समय चाहिए था। इसी अफरा तफरी में रेगुलर समय समाप्त हुआ। दोनों टीमों को नए सिरे से रणनीति बनाने का मौका मिला।

              अतिरिक्त समय का खेल अर्जेंटीना ने ठीक वहीं से शुरू किया जहां उन्होंने उसे 80वें मिनट में छोड़ा था। वे एक बार फिर लय में थे और फ्रांसीसी गति और ताकत कुछ हद तक दिशाहीन। 109वें मिनट में एक बार फिर मैस्सी ने गोल गेंद के अंदर की। ये मेसी का मैच का गोल नबर दो और प्रतियोगिता का गोल नंबर 07 था। एक बार फिर लगा अर्जेंटीना जीत चुका है। अब केवल 05 मिनट शेष थे। खेल खत्म हुआ ही चाहता था। पर नियति को ये मंजूर ना था। ये फ्रांस की किस्मत थी कि बॉक्स के अंदर मोन्टीएल की कोहनी में गेंद लगी और एक और पेनाल्टी फ्रांस को। एमबापे की हैट्रिक गोल नंबर 08 के साथ आई। अब स्कोर 3-3 बराबरी पर था। अगर 80 मिनट का पहला भाग इस मैच की प्रस्तावना थी तो  40 मिनट का ये भाग मैच का उत्कर्ष था जिसमें खेल का रुख दोनों और झुकता रहा।

               अब इस मैच का उपसंहार लिखा जाना था। प्रस्तावना में पहले ही लिखा जा चुका था मैच अर्जेंटीना का है। निष्कर्ष इससे भिन्न कहां होना था। पेनाल्टी शूट आउट में एक बार फिर अर्जेंटीना ने फ्रांस को, उसके भाग्य को और फिर से चैंपियन बनने की उसकी किसी भी संभावना को शूटआउट कर दिया था। अब 4-2 जीतकर अर्जेंटीना नया चैंपियन था।

             याद कीजिए 2018 के विश्व कप को। प्री क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना का फ्रांस से खेलना तय पाया गया था। वो शनिवार का दिन था। तातारिस्तान की राजधानी कज़ान का कज़ान एरिना था। ये क़यामत की शाम थी जिसमें लोगों ने एक क्लासिक मैच देखा था। उन्होंने उम्मीदों के उफान को देखा था और उसे बहते हुए भी देखा था। ये भी दो महाद्वीपों के बीच मुकाबला था। ये फुटबाल की दो अलग शैलियों के बीच मुकाबला था। ये उम्मीदों की विश्वास से टकराहट थी। उम्रदराज़ों का युवाओं से सामना था। अनुभव जोश के मुक़ाबिल था। कलात्मकता रफ़्तार और शक्ति से रूबरू थी। जो मुकाबला मैदान में दो टीमों के बीच हो रहा था वो लाखों लोगों के लिए मेस्सी का फ्रांस से मुकाबला बन गया था। अगर लोग अर्जेंटीना को मेस्सी के लिए जीतता देखना चाहते थे तो खुद मेस्सी अर्जेंटीना के लिए जीतना चाहता था। मेस्सी ने अपना सब कुछ झोंक दिया। उसने कुल मिला कर दो असिस्ट किये। लेकिन अर्जेंटीना और जीत के बीच 19 साल का नौजवान एमबापा आ खड़ा हुआ। उसने केवल दो गोल ही नहीं दागे बल्कि एक पेनाल्टी भी अर्जित की। उसकी गति के तूफ़ान में अर्जेंटीना का रक्षण तिनके सा उड़ गया। मेस्सी का अर्जेंटीना 4 के मुकाबले 3 गोल से हार गया। लोगों की उम्मीदें हार गई। हताश निराश मेस्सी मैदान से बाहर निकले तो एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मानो वे इस असफलता को पलटकर देखना ही नहीं चाहते थे। 

         लेकिन क्या ही स्वीट रिवेंज था ये। एक बार फिर मानो वही मुकाबला दोहराया जा रहा हो। बिल्कुल उस जगह से शुरू हो रहा हो,जहां कजान में खत्म हुआ था।  19 साल का टीनएजर अब 23 साल का गबरू जवान हो चुका था। एक बार फिर  वो फुटबॉल के देवता की राह  में रोडा बनने का दुस्साहस कर रहा था। उसने अपनी टीम के 05 में से 04 गोल किए। लेकिन इस बार देवता से,अनुभव से,अदम्य चाहना से वो हार गया। इस बार समय और नियति मैस्सी के साथ थी। हुनर के साथ थी। इस बार एमबापे उदास थे। और मैस्सी अपने हाथों में फीफा कप उठाए उसे चूमते जाते थे। दोनों किरदारों के रोल बदल गए थे।

              कला और क्लास के आगे ताकत और गति पस्त हो चुके थे। नियति अपना खेल दिखा चुकी थी। आप भले ही कहें नियति क्रूर होती है। लेकिन इतनी भी नहीं कि एक असाधारण प्रतिभा को, खेल के महानतम खिलाड़ी को और उसके जादूगर को उस सम्मान से,उस हक़ से महरूम रख सके जिस पर उसका हक बनता था। मैस्सी की झोली में अब एक विश्व कप ट्रॉफी थी। जिस कला का वो सर्वश्रेष्ठ व्याख्याता था,अब  वो उसके शिखर पर था। अधूरी इच्छाओं का एक देवता पूर्णत्व को प्राप्त हो चुका था। वे हाथों में फीफा कप लेकर उसे चूम रहे थे। वे कह रहे थे 'मैं इसे बेइंतेहा चाहता था। मैं जानता था कि ईश्वर ये मुझे देंगे। ये लम्हा मेरा है।' सच में वो मैस्सी का लम्हा था।

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दरअसल यही फुटबॉल है। यही खेल है। यही जीवन है। 

और हम हैं कि अर्जेंटीना के कुछ और ज़्यादा समर्थक हुए जाते हैं। कि मैस्सी को कुछ और ज़्यादा चाहने वाले हुए जाते हैं। कि फुटबॉल के कुछ और अधिक दीवाने हुए जाते हैं।


Tuesday, 20 December 2022

फुटबॉल विश्व कप 2022 डायरी_07

                                 (साभार गूगल)
                       
अंतिम चार का द्वंद्व
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विश्व कप फुटबॉल के पहले सेमीफाइनल में अर्जेंटीना ने क्रोशिया को 3-0 से हराकर फाइनल में प्रवेश कर लिया है। निःसंदेह अर्जेंटीना की जीत महत्वपूर्ण है,लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण मैच की स्कोरलाइन है।

स्कोर लाइन देखकर ऐसा लगता है कि अर्जेंटीना ने किसी नौसिखिया टीम को हराया है। जबकि सारी दुनिया जानती है,वास्तविकता ये नहीं है। क्रोशिया  की गणना फुटबॉल की दुनिया की सबसे ताकतवर टीमों में की जाती है। वो इस बार की संभावित विजेताओं में शुमार थी और पिछली बार की उपविजेता। जिस टीम का नेतृत्व दुनिया के सबसे शानदार मिडफील्डर लुका मोद्रीच कर रहे हों, जिसके पास दुनिया के सबसे बड़े डिफेंडरों में से एक, और प्रतियोगिता में सबसे शानदार खेल रहे जोस्को ग्वार्डिओल हों,और जिसके पास लिवकोविच जैसा बेहतरीन गोलकीपर हो जिसने इस विश्व कप में सबसे ज़्यादा 24 बचाव किए हों, वो टीम कमज़ोर हो भी कैसे सकती है।

निःसंदेह क्रोशिया की टीम एक बहुत मजबूत और शानदार टीम है जो दुनिया की किसी भी टीम को हराने का माद्दा रखती है। लेकिन खेल का परिणाम केवल एक टीम के खिलाड़ियों के मैदान में खेल कौशल भर से निर्धारित नहीं होते। ये विपक्षी टीम के खिलाड़ियों के खेल कौशल,उसकी रणनीति,उसके द्वारा अपने सामने वाली टीम की रणनीति को समझने और उसमें छिद्र ढूंढ लेने के साथ साथ रैफरी के निर्णयों और अंततः नियति द्वारा भी निर्धारित होते हैं। 

गर मैदान में कुछ अप्रत्याशित ना हो तो कवि केशव तिवारी  के शब्दों में कहा जा सकता है 'काहे का खेल और काहे की फुटबॉल'। यही खेल है और यही फुटबॉल। 

मैच के पहले हॉफ के आधे से अधिक समय तक गेंद पर नियंत्रण और खेल का नियंत्रण क्रोशिया के पास था। खेल अर्जेंटीना के हॉफ में खेला जा रहा था। पर मुकाबला फुटबॉल लीजेंड मैस्सी और चतुर रणनीतिकार लियोनेल स्कलोनी से था। वे खेल के इस क्रोशियाई अधिपत्य के बीच में अपनी टीम के लिए अवसर खोज रहे थे और वे उन्होंने ढूंढ निकाले। यही फुटबॉल की समझ है।फुटबॉल है।

गेंद पर पूरी तरह नियंत्रण के अपने खतरे हैं। ऐसे में जब आप गेंद पर से नियंत्रण खोते हैं तो आप रक्षण के लिए उस तरह एकबद्ध नहीं हो पाते जिस तरह से होना चाहिए। नियंत्रण छूटने से आपकी लय टूट जाती है। आप अपने रक्षण में गैप छोड़ देते हो। मैस्सी और उनके साथियों ने वे गैप ढूंढ लिए।उन गैप से उन्होंने प्रतिआक्रमण किए, अपनी टीम के लिए मौके बनाए और विपक्षी टीम को तहस नहस कर दिया। मैच समाप्ति के बाद मैस्सी ऐसा ही कुछ कह रहे थे।

 ई प्रतिआक्रमणों में से ऐसा ही एक प्रतिआक्रमण अर्जेंटीना ने 34वें मिनट में किया। मैनचेस्टर सिटी के लिए खेलने अर्जेंटीना के नवोदित स्टार जूलियन अल्वारेज ने इतना तेज आक्रमण किया कि बाकि एक रक्षक को मात दी,उसे पीछे छोड़ा। अब वे बॉक्स में अकेले गोलकीपर के सामने थे। गोलकीपर डॉमिनिक लिवकोविच अल्वारेज को टैकल करने के लिए मजबूर हुए। रैफरी ने इसे खतरनाक माना। अर्जेंटीना को पेनाल्टी मिली। अब मैस्सी के बाएं पैर का जादू था। सही दिशा में छलांग लगाने के बाद भी गोलकीपर गति और ऊंचाई से मात खा गए। अर्जेंटीना 1-0 से आगे हो गया। अब मैच का रुख अर्जेंटीना के पक्ष में झुक गया। उनके पक्ष में मोमेंटम बन चुका था और क्रोशिया के हाथ से मैच फिसलने लगा था।

पेनाल्टी का निर्णय रैफरी का था। बहुत से लोगों का मानना था ये टैकल इतना खतरनाक नहीं था कि पेनाल्टी दी जाती। लेकिन रैफरी का निर्णय अर्जेंटीना के पक्ष में गया। यही भाग्य था,नियति थी और फुटबॉल भी।

पांच मिनट बाद अर्जेंटीना ने एक और प्रतिआक्रमण किया। 39वें मिनट में एक बार फिर अल्वारेज ने काउंटर अटैक पर शानदार मूव बनाया और लगभग अकेले दम पर गोल कर टीम को 2-0 से आगे कर दिया। ये युवा अल्वारेज की स्किल और गति हैं जिसने वन मैन आर्मी मैस्सी के बोझ को ना केवल कम किया है,बल्कि उन्हें आक्रमण और रणनीति बनाने के अतिरिक्त अवसर भी दिए हैं।

क्रोशिया एक फाइटर टीम है। उसने 2-0 से पिछड़ने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी थी। क्वार्टर फाइनल में नीदरलैंड भी अर्जेंटीना के विरुद्ध 0-2 से पीछे थी और वो मैच को पेनाल्टी शूट तक ले गई थी। दूसरे हॉफ में भी क्रोशिया ने गेंद पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। कुछ अच्छे मूव भी बनाए। पर मूव बनाना और उसे फिनिश करना दो बातें हैं। वे फिनिश करने में असफल रहे। इधर अर्जेंटीना ने क्रोशिया डिफेंस में छिद्र ढूंढ लिए थे। वे प्रतिआक्रमण करते रहे। इस बीच मैच के 69वें मिनट में क्रोशिया के हॉफ में लगभग मध्य रेखा से बॉल मैस्सी को मिली। दुनिया का एक बेहतरीन डिफेंडर ग्वार्डिओल,मैस्सी को मार्क कर रहा था। लेकिन यहां मैस्सी था,मैस्सी की ड्रिब्लिंग थी,मैस्सी के पैरों का जादू था। ग्वार्डिओल की मार्किंग के साथ ही मेसी गेंद को बॉक्स में ले गए,उसके बाद वे एक क्षण के लिए रुके,फिर दाएं गए, फिर बाएं गए और फिर दाएं गए, ग्वार्डिओल को पूरी तरह युक्तिहीन और असहाय छोड़ गेंद अल्वारेज को सरका दी। अल्वारेज ने गेंद आगे गोल में सरका दी। स्कोर अब 3-0 था और इसने क्रोशिया की किसी भी संभावना को खत्म कर दिया था।

मैस्सी का ये असिस्ट इस विश्व कप की सबसे खूबसूरत मूव था। इस मूव को देखना किसी खूबसूरत कविता को देखना,किसी बेहतरीन नृत्य को देखना और किसी उम्दा संगीत को सुनने जैसा था। ये मैस्सी की स्किल थी। उनके पैरों का जादू था। ये फुटबॉल का खेल था। फुटबॉल था।

स विश्व कप में मैस्सी क्या ही कमाल खेल रहे हैं। पहले मैच में हार के बाद पांच मैच और पांचों में मैन ऑफ द मैच। अविश्वसनीय प्रदर्शन। मैस्सी का दूसरा फाइनल पक्का हुआ। अर्जेंटीना तीसरे विश्व खिताब की और बढ़ी और निसंदेह मैस्सी सार्वकालिक महानतम खिलाड़ी। मैं जानता हूँ ,आप जानते हैं,सारी दुनिया जानती है,आखिर 'गोट' कौन है।

तो तय हुआ कि खिलाड़ियों की प्रतिभा और खेल कौशल में जब भाग्य और अनिश्चितता का तड़का लगता है,तो फुटबॉल के खेल में रोमांच पैदा होता है। फुटबॉल का खेल बनता है। फुटबॉल बनता है।
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तो रविवार तक अनिश्चितता में झूलते रहिए और दिल को थामे रखिए। पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों।

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