Monday, 26 January 2026

शाइनिंग साइना




हर उड़ान की एक मंजिल होती है। कि एक चमकीला दिन शाम में घुल जाता है। कि पूनम का चांद सूरज की आगवानी में स्वाहा होता जाता है। कि रात के जगमग सितारे सुबह के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। कि जैसे अभी जो बसंत है उसे ग्रीष्म में पिघल जाना है। कि प्रसिद्धि के आकाश में अनंत ऊंचाइयों वाली एक उड़ान अंततः पूर्ण विराम की अवस्था में आ जाती है। कि एक समय आता है जब खिलाड़ी को अंततः खेलों को अलविदा कहना ही होता है। कि उसके खेल जीवन की यवनिका का पटाक्षेप होना होता है और उसका खेल जीवन दैनंदिन जीवन में समाहित हो जाता है। जैसे कि साइना नेहवाल स्वीकारती हैं कि हां,उनके असाधारण उपलब्धियों वाले लंबे करियर का समापन हो चुका है। अभी नहीं,दो साल पहले ही।

वो साल 1990 का बसंत था। तारीख 17 मार्च । हिसार में एक लड़की जन्मती है। बसंत में जन्मी लड़की खुद बसंत हो जाना चाहती है। लेकिन दिक्कत ये है कि पितृसत्ता अपने हिस्से से अधिक पर काबिज हुआ चाहती है। उसे लड़कियों के एक हिस्से को भी अपनी शक्ति के साए में रखना है। कि उन लड़कियों की चाहतों के पंख को उनकी परवाज से पहले ही काट दिया जाता है। कि उनको जन्मने से बहुत बहुत पहले ही होम कर दिया जाता हैं।

पर हर क्रिया की समान प्रतिक्रिया होती है। दबाव जितना ज्यादा होता है उतना ही ज्यादा प्रतिरोध होता है। दुनिया की खूबसूरती ही इस बात में है कि हर एक समान नहीं है। बहुत से माता-पिता पितृसत्ता के साए में मुक्त हैं। उन्हें अपनी छोरियों और उनकी काबिलियत में तनिक संदेह नहीं होता। वे मानते हैं 'कि म्हारी छोरियां छोरों सुं कम हं के।' फिर उन्हें योग्य गुरुओं का वरदहस्त प्राप्त होता है जो उनकी योग्यता को पहचानकर उसे तराशते है। तब कई दैदीप्यमान नक्षत्रों का उदय होता है। उनमें से एक का नाम साइना नेहवाल है।

साइना अपने माता पिता की दूसरी संतान थी। उनकी एक बड़ी बहन थी। अपनी आत्मकथा में साइना लिखती हैं कि 'उनकी दादी लड़का चाहती थीं। इसीलिए जब साइना पैदा हुई, तो वे एक माह तक उन को देखने नहीं आईं।' उनके पिता हिसार में कृषि वैज्ञानिक थे। अपने पिता की पदोन्नति पर जब साइना परिवार के साथ हैदराबाद आईं,तो पितृसत्ता के प्रतिकार के लिए और खुद को साबित करने के लिए खेल चुना, जैसा कि हरियाणा की तमाम लड़कियां चुनती हैं। खेलों में उनके सामने दो विकल्प थे। या तो वे बॉक्सिंग,कुश्ती या निशानेबाजी जैसे उन खेलों खेलों में महारत हासिल करें जो सामान्यतः पुरुषों के 'हलके' माने जाते हैं या फिर पावर के इस खेल से इतर अपनी खुद की इच्छा के दूसरे खेलों के आकाश में अपने पंखों को हौसलों की उड़ान दें। 

पहले उन्होंने मार्शल आर्ट कराटे को चुना और ब्राउन बेल्ट हासिल की। लेकिन जल्द ही उस खेल को चुन लिया जिसमें उनके माता-पिता ने महारत हासिल की हुई थी। वो खेल जो उनकी नियति था। वो खेल जो बल्ले और चिड़िया का खेल था। वो खेल जिसमें चिड़िया को मन मुताबिक उड़ान दी जा सकती थी। वो खेल जो उसके सपनों की उड़ान का रूपक था। ये खेल बैडमिंटन था।


जिस समय उन्होंने बैडमिटन खेल को चुना या नियति ने इस खेल के लिए उनको चुना,उस समय उनकी उम्र आठ साल थी। और जब एक बार उन्होंने हाथ में रैकेट पकड़ा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा जब तक कि उसने प्रतिस्पर्धात्मक खेल से विदा लेकर रैकेट को रख नहीं दिया।

वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस समय जानी गईं जब साल 2008 में वे विश्व जूनियर चैंपियन बनीं। उसी साल बीजिंग ओलंपिक में बैडमिंटन के महिला एकल के क्वार्टर फाइनल में पहुंची। ऐसा करने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं। अगले ही वर्ष उन्होंने इंडोनेशिया ओपन जीतकर बीडब्ल्यूएफ सुपर सीरीज का खिताब जीतकर पहली भारतीय बनने का गौरव हासिल किया और एक साल बाद साल 2010 में वे राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन बनीं। लंदन ओलंपिक 2012 में कांस्य पदक जीतकर वे बैडमिंटन में भारत की पहली ओलंपिक पदक विजेता बनीं। साल 2015 में उन्होंने एकल बैडमिंटन रैंकिंग में विश्व नंबर 1 बनकर एक और इतिहास रचा। ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला और प्रकाश पादुकोण के बाद शिखर पर पहुंचने वाली देश की दूसरी शटलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। उसी वर्ष  बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाली देश की पहली शटलर भी बनीं। हालांकि कैरोलिना मारिन से हार कर रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा। साल 2014 उबेर कप में उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी की और अपराजित रहीं जिससे भारत को उबेर कप में पहला कांस्य पदक जीतने में मदद मिली। उन्होंने कुल मिलाकर 24 अंतर्राष्ट्रीय खिताब जीते जिसमें 10 सुपर  सीरीज खिताब हैं। 

साइना का कोर्ट कवरेज कमाल का था। वे जिस सहजता और सरलता से और ज्यामितीय गुणा भाग से शटल का अनुसरण करतीं और कोर्ट को नापतीं, वो किसी लयकारी को देखने या फिर किसी धुन को सुनने से कम ना था। वे बैक कोर्ट की उस्ताद खिलाड़ी थीं और रक्षण उनका फोर्टे। पावर और स्टेमिना उनमें अपार था और किलिंग इंस्टिक्ट कूट कूटकर भरी। जोखिम उठाना उन्होंने सीखा था। वे खेल के शुरुआती क्षणों से ही आक्रमण कर विपक्षी को हतप्रभ कर देतीं और उन पर बढ़त बना लेतीं। उनमें विपक्षी के खेल को समझकर रणनीति बनाने की कमाल की चतुराई थी। हां, नेट पर खेल में पकड़ ना होना उनके खेल को वल्नरेबल बनाता और उनकी चोटें उनकी सफलता की सबसे बड़ी बाधा बनतीं।

लेकिन उनकी असाधारण उपलब्धियां उन्हें भारत की महानतम बैडमिंटन खिलाड़ी बनाती हैं। आप कह सकते हैं कि पीवी सिंधु उनसे बड़ी खिलाड़ी हैं, क्योंकि उनकी उपलब्धियां साइना से कहीं ज्यादा हैं। उन्होंने दो ओलंपिक पदक जीते और विश्व चैंपियनशिप भी। लेकिन किसी खिलाड़ी का इतिहास में स्थान निर्धारण केवल उसकी उपलब्धियों भर से नहीं होता,बल्कि इस बात से भी होता है कि किसने खेल को और आने वाली पीढ़ी को किस तरह और कितना प्रभावित किया। उनका खेल पर इंपैक्ट कैसा और कितना था। साइना का प्रभाव उनके आंकड़ों और पदकों से कहीं अधिक व्यापक है। वह लाखों लोगों के लिए आदर्श और प्रेरणास्रोत बन गईं। 

जिस समय साइना खेल परिदृश्य पर उभरीं,उस समय पुरुषों में तो प्रकाश पादुकोण,सैयद मोदी और पुलेला गोपीचंद जैसे बड़े नाम थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियां हासिल की थीं।लेकिन महिलाओं में ऐसा कोई नाम ना था। अमी घिया या अमिता कुलकर्णी जैसे दो एक नाम थे जो लोकल सर्किट में तो बड़ा नाम थे,लेकिन उनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी पहचान ना थीं। ये वो समय था जब विश्व बैडमिंटन पर चीन का दबदबा था। चीन की दीवार खिलाड़ियों के लिए अभेद्य थी। साइना ने अपने असाधारण खेल से चीन इस अभेद्य दीवार को लांघा ही नहीं उसे ध्वस्त किया। साइना ने चीनी खिलाड़ियों की जमात के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वे बड़ी सफलताएं प्राप्त की,जो किसी भी खिलाड़ी का सपना हो सकती थीं,और उस समय तक भारतीय महिला खिलाड़ियों से लगभग असंभव दूरी पर अवस्थित थी। साइना का महत्व इस दूरी को मिटाकर असंभव को संभव बनाने में है।

दरअसल उन्होंने अपने खेल और उपलब्धियों से एक ऐसा रास्ता बनाया जिस पर चलकर आगे के खिलाड़ियों ने सफलता प्राप्त की। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने की उम्मीद की लौ भी जगाई और ये हिम्मत,हौसला और विश्वास भी भरा कि चीन की दीवार या कोई भी बाधा पार की जा सकती है,अगर आपने हौसला,जज्बा,लगन और कठिन परिश्रम करने का माद्दा है तो।

उनकी करीब करीब हर उपलब्धि से पहले लगा 'पहली'  विशेषण या फिर 'पहली भारतीय खिलाड़ी' और 'पहली भारतीय महिला खिलाड़ी' संज्ञा  बैडमिंटन खेल और भारतीय खेल परिदृश्य पर उनके इंपैक्ट की कुंजी है। वे एकमात्र भारतीय हैं जिन्होंने बीडब्ल्यूएफ के प्रत्येक प्रमुख व्यक्तिगत स्पर्धा में कम से कम एक पदक जीता है, यानी बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप,बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक पदक@। वह ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय हैं और बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय हैं। 2006 में नेहवाल फोर स्टार टूर्नामेंट जीतने वाली पहली भारतीय महिला और सबसे कम उम्र की एशियाई खिलाड़ी बनीं। वह सुपर सीरीज खिताब जीतने वाली पहली भारतीय भी हैं। वे राष्ट्रमंडल खेलों में दो एकल स्वर्ण पदक (2010 और 2018) जीतने वाली पहली भारतीय भी बनीं । 

भारतीय क्रिकेट टीम ने कई विश्व प्रतियोगिताएं और वर्ल्ड कप जीते हैं, लेकिन जो प्रभाव और महत्व 1983 के विश्व कप जीतने का है, वैसा किसी और का नहीं। यही बात साइना के साथ है। साइना जैसा महत्व और इंपैक्ट किसी और का कहां। 

2012 के लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर और खेल जगत से परे जाकर सुपर स्टारडम हासिल करके भारत में बैडमिंटन को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने साबित किया कि भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय खेलों के उच्चतम स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं और जीत हासिल कर सकती हैं। उनकी सफलता ने पीवी सिंधु सहित भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों की एक पूरी पीढ़ी को पेशेवर रूप से इस खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

दरअसल वे पी टी उषा के बाद भारतीय खेल जगत की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली आईकन हैं। जिस तरह से 1984 के बाद पीटी उषा हर घर का जाना पहचाना नाम बन गई थी,ठीक उसी तरह से 2012 के बाद साइना नेहवाल भी। उन्होंने साबित किया कि 'छोरी छोरी स कम ना सै'।

साइना के खेल खेल मैदान से सक्रिय अनुपस्थिति भारतीय  बैडमिंटन में एक ऐसा निर्वात बनाती है जिसकी भरपाई अगर असंभव नहीं तो बहुत बहुत कठिन जरूर है। 

खेल मैदान से विदा साइना।

Saturday, 1 November 2025

कुछ सपने देर से पूरे होते हैं,पर होते हैं।

 


ये खेल सत्र मानो कुछ खिलाड़ियों की दीर्घावधि से लंबित पड़ी अधूरी इच्छाओं के पूर्ण होने का सत्र है। 

कुछ सपने देर से पूरे होते हैं,पर होते हैं।

याद कीजिए विराट कोहली को। उनके पास सब कुछ था। अगर कुछ नहीं था तो एक अदद आईपीएल ट्रॉफी नहीं थी। 2025 का सीजन आया और रॉयल चैलेंजर बेंगलुरु ने आईपीएल जीत लिया। एक अधूरी साध पूरी हुई।

35 साल के सुरजीत नरवाल के पास भी क्या कुछ नहीं था। देश के सबसे बेहतरीन डिफेंडर में उनका नाम था। दो एशियाई गोल्ड मेडल थे। इससे पहले प्रो कबड्डी के नौ सत्र वे खेल चुके थे। आंकड़ों के हिसाब से दूसरे सबसे बेहतरीन डिफेंडर। फजल अत्रिचल के बाद सबसे ज्यादा टैकल प्वाइंट। पांच सौ का आंकड़ा छूते हुए। इस दौरान पुनेरी पलटन और बेंगलुरु बुल्स के कप्तान भी रहे।

लेकिन इतना होने के बावजूद अगर उनके पास कुछ नहीं था तो नौ सीजन खेलने के बावजूद कोई खिताब उनके नाम नहीं था। यहां तक कि कोई फाइनल भी उन्हें नसीब ना हुआ।

तब साल 2025 का प्रो कबड्डी का 12वां सत्र आया। दबंग दिल्ली से जुड़े और एक अपूर्ण इच्छा पूर्णता में बदल गई। एक सपना साकार हुआ। एक खिताब उनके माथे सजा। एक ट्रॉफी उनके हाथ सजी। एक ट्रॉफी को उनके होठों ने स्पर्श किया।

आज फाइनल में दबंग दिल्ली ने एक रोमांचक मैच में पुनेरी पलटन को 30-28 अंकों से परास्त कर अपना दूसरा खिताब जीता और टीम ने इस खिताब को सुरजीत को समर्पित कर दिया।

सुरजीत विशेषज्ञ राइट कवर डिफेंडर हैं और अपनी आक्रामकता और अग्रिम टैकल के लिए जाने जाते हैं। डैश उनका सिग्नेचर मूव है जिसमें वे निर्णायक तरीके से रेडर को कोर्ट से बाहर धकेल कर आउट कर देते हैं। वे लीग के सबसे शानदार रक्षात्मक खिलाड़ियों में से एक हैं। वे अब तक 34 हाई फाइव और 26 सुपर टैकल कर चुके हैं।

कुछ सपने देर से पूरे होते हैं,पर होते हैं।

सुरजीत को पहला खिताब मुबारक और दबंग दिल्ली को अपना दूसरा।

Friday, 31 October 2025

महिला विश्व कप सेमीफाइनल



आखिर आप अपने बल्ले से क्या संदेश देना चाहते हैं। ये आप पर निर्भर करता है कि आप अपने बल्ले को बंदूक समझें या वायलिन। आप उसे मृत्यु और घृणा का शस्त्र बना दें या जीवन और खुशी का साज।

इससे खूबसूरत और स्वीट रिवेंज क्या हो सकता था जो आज भारतीय बालाओं ने डी वाई पाटिल मैदान पर ऑस्ट्रेलियन टीम से लिया। अभी 12अक्टूबर की ही बात तो थी भारतीय टीम के 330 रनों के लगभग असंभव से लक्ष्य को ऑस्ट्रेलियाई टीम ने भेद कर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था। 

और आज भारतीय टीम उसी ऑस्ट्रेलियाई टीम द्वारा दिए गए 338 रनों के लक्ष्य को पार कर नया रिकॉर्ड बना रही थीं।

वेलडन जेमिमा।

वेलडन टीम इंडिया।

फाइनल के लिए ढेरों शुभकामनाएं।



Saturday, 20 September 2025


थलेटिक्स सभी खेलों का मूल है। उसकी तमाम स्पर्धाएं दर्शकों को रोमांच और आनंद से भर देती हैं। कुछ कम तो कुछ ज्यादा। और कहीं उसकी किसी स्पर्धा को कोई असाधारण साधक मिल जाए तो वो स्पर्धा दर्शकों को अनिर्वचनीय आनन्द से भर देती है। मसलन पोल वोल्ट स्पर्धा को जब आर्मंड गुस्ताव  'मोंडो' डुप्लांटिस जैसा साधक मिल जाए तो क्या ही कहा जा सकता है। केवल एथलेटिक्स ही नहीं बल्कि खेलों में रुचि रखने वाला हर खेल प्रेमी इस बात से सहमत होगा कि डुप्लांटिस पोल वोल्ट के अद्भुत साधक हैं। एक असाधारण एथलीट। वे अपनी काबिलियत से जब जब अपनी स्पर्धा को छू भर देते हैं,तो स्वतः ही श्रेष्ठता के नए मानदंड स्थापित होने लगते हैं।


सा ही कुछ बीते सोमवार टोक्यो में घटित हो रहा था। वे टोक्यो के नेशनल स्टेडियम में आयोजित विश्व एथलेटिक्स प्रतियोगिता की पोल वोल्ट स्पर्धा में 6.30 मीटर ऊंची छलांग लगाकर कुल 14वीं बार और साल 2025 का अपना चौथा विश्व रिकॉर्ड बेहतर बनाकर एक अनोखे काम को अंजाम दे रहे थे। इस दफ़ा उनके बार की ऊंचाई पिछली दफ़ा से एक सेंटीमीटर अधिक थी। 

र कमाल ये कि इस कारनामे के सम्मान में बिल्कुल ऐसा ही वाकअ टोक्यो से हजारों मील दूर स्वीडन के शहर अवेस्ता में घट रहा था। इस शहर के लोगों ने भी 14वीं बार नगर के डाला हॉर्स चौक पर स्थापित पोल वोल्ट बार को थोड़ा और ऊंचा किया। एक सेंटीमीटर ऊंचा। दरअसल ये दुनिया के महानतम और सर्वश्रेष्ठ पोल वॉल्टर डुप्लांटिस का उनकी मां के गृहनगर अवेस्ता के निवासियों द्वारा अपने चहेते  पोल वॉल्टर के सम्मान का अनोखा तरीका था।


 ये साल 2020 था। उस साल तोरुन पोलैंड में आयोजित यूरोपियन इनडोर प्रतियोगिता में डुप्लांटिस ने पहली बार 6.17 मीटर पार कर इस स्पर्धा का नया रिकॉर्ड बनाया था। उस समय तक अवेस्ता नगर के निवासियों ने तय किया कि वे अपनी विश्व प्रसिद्ध 11 मीटर ऊंची काष्ठ की डाला घोड़े की मूर्ति वाले चौक पर एक पोल वोल्ट बार स्थापित करेंगे जिसकी ऊंचाई डुप्लांटिस के रिकॉर्ड के बराबर होगी। उसके बाद वे जब भी अपने विश्व रिकॉर्ड को बेहतर करते हैं,डाला घोड़े वाले इस चौक पर स्थापित इस पोल वोल्ट बार की ऊंचाई उतनी ही बढ़ती जाती है, जितना डुप्लांटिस रिकॉर्ड की बढ़ोतरी करते हैं।

2020 में रेनॉड लैविल्लेनी का 6.16 मीटर के पुराने रिकॉर्ड को तोड़ने के बाद से, मोंडो ने 14 बार विश्व रिकॉर्ड को बेहतर ही नहीं किया बल्कि उन्होंने 49 प्रतियोगिताओं में लगातार जीत हासिल की है और अजेय रहे हैं। उन्होंने लगातार इनडोर और आउटडोर चैंपियनशिप में लगातार आठ वैश्विक खिताब जीते। वह दो बार के ओलंपिक चैंपियन, तीन बार के विश्व आउटडोर चैंपियन और तीन बार के विश्व इनडोर चैंपियन हैं। डुप्लांटिस इतिहास के उन गिने-चुने एथलीटों में से एक हैं जिन्होंने युवा, जूनियर और सीनियर स्तर पर विश्व चैंपियनशिप खिताब जीते हैं। वे अभी केवल 25 वर्ष के हैं और अविश्वसनीय तरीके से जीत रहे हैं तथा विश्व रिकॉर्ड बना रहे हैं। 

रअसल पोल वोल्ट का नशा उनकी रगों में बह रहा था। सन 1999 में अमेरिका के लुइसियाना प्रांत के लाफ़ायेत शहर में जन्मे डुप्लांटिस के पिता ग्रेग डुप्लांटिस पूर्व पोल वॉल्टर हैं जिनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 5.80 मीटर है, जबकि उनकी  माँ हेलेना हेप्टाथलीट और वॉलीबॉल खिलाड़ी हैं।

नकी असाधारण सफलता का श्रेय उनके माता पिता को जाता है, जो उनके कोच भी हैं। डुप्लांटिस स्प्रिंट रेसर हैं और सौ मीटर के धावक भी। उनके कोच माता पिता ने डुप्लांटिस की गति को तकनीक से लैस किया। दरअसल गति डुप्लांटिस का सबसे बड़ा हथियार है। जिस प्रयास में उन्होंने टोक्यो में पिछले रविवार 6.30 मीटर का विश्व रिकॉर्ड बनाया उस प्रयास में जमीन छोड़ने से ठीक पहले उनकी गति 22 मील प्रति घंटा थी। इसके अलावा वे अपेक्षाकृत कम लचीले पोल का प्रयोग करते हैं ताकि वे कुछ अतिरिक्त उछल पा सकें। ऐसा माना जाता है उनकी इस सफलता के पीछे प्यूमा शू कंपनी द्वारा खास उनके लिए डिजाइन किए जूते  'द क्ला' भी एक कारक हैं।

र डुप्लांटिस पोल वोल्ट यानी बांस कूद के अकेले साधक नहीं हैं। पोल वोल्ट का कोई भी इतिहास सर्गेई बुबका का उल्लेख किए बिना पूरा नहीं हो सकता। दरअसल पोल वोल्ट का समूचा इतिहास इन्हीं दो पोल वॉल्टर के कारनामों का रोमांचक और उत्तेजक इतिहास भर है। एक से इस स्पर्धा का इतिहास शुरू होता है और दूसरे पर आकर ठहर जाता है। एक इसका अतीत,दूसरा वर्तमान।


र्गेई बुबका का जन्म सन 1963 में यूक्रेन के शहर लुहांस्क में हुआ। यूं तो वे स्प्रिंट रेसर और लांग जंपर भी थे लेकिन उन्हें चैंपियन एथलीट बनाया पोल वोल्ट ने। ये साल 1983 था, जब केवल 19 साल की उम्र में हेलसिंकी फिनलैंड में आयोजित विश्व एथलेटिक्स प्रतियोगिता में उन्होंने पोल वोल्ट का स्वर्ण पदक जीता। इस जीत के साथ वे प्रसिद्धि के ऐसे रथ पर सवार हुए जिसे कभी ना रुकना था ना थकना।

न्होंने अपना पहला विश्व रिकॉर्ड 1984 में चेकोस्लोवाकिया के शहर ब्रातिस्लावा में बनाया जब उन्होंने 5.85 मीटर की ऊंचाई पार की। वे लगातार 6 बार विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप के विजेता रहे। 1985 में छह मीटर और फिर 1991 में 20 फीट (6.10 मीटर) पार करने वाले वे पहले पोल वॉल्टर थे। उन्होंने अपने करियर में कुल 35 बार विश्व रिकॉर्ड को बेहतर किया। उनके द्वारा 1993 में बनाया गया 6.15 मीटर का इनडोर और 1994 में 6.14 मीटर का आउटडोर रिकॉर्ड उस समय तक अजेय रहा जब तक कि रेनॉड लैविल्लेनी ने फरवरी 2014 में 6.16 मीटर पार कर तोड़ नहीं दिया।

लेकिन अपनी तमाम प्रतिभा के बावजूद चार प्रयासों में केवल एक ओलंपिक स्वर्ण पदक जीत सके 1988 के सियोल ओलंपिक में। 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक के सोवियत बहिष्कार के कारण के कारण वे ओलंपिक में भाग नहीं ले सके जबकि वे उस समय विश्व रिकॉर्डधारी थे। 1992 के बार्सिलोना ओलंपिक में वे आश्चर्यजनक रूप से 5.70 मीटर की छलांग लगाने में असफल रहे। 1996 के अटलांटा ओलंपिक में एड़ी की चोट के कारण हटना पड़ा। और अंततः 2000 के सिडनी ओलंपिक में  पुनः 5.70 मीटर की छलांग लगाने के तीन असफल प्रयास के बाद क्वालीफाई नहीं कर सके। नियति का विधान कुछ ऐसा ही रचा गया।

बुबका ने सन 2001 में जब सक्रिय खेल जीवन से विदा ली हुए तो उस समय उनकी उपलब्धियों में छह विश्व चैम्पियनशिप खिताब, चार विश्व इंडोर चैम्पियनशिप खिताब, यूरोपीय चैम्पियनशिप में एक स्वर्ण और यूरोपीय इंडोर चैम्पियनशिप में एक अन्य स्वर्ण पदक शामिल थे।

खिर उनकी इस असाधारण सफलता का राज क्या था। वे पोल को सामान्यतः पकड़े जाने वाले स्थान से कहीं अधिक ऊपर से पकड़ते थे। ये तकनीक उन्हें अतिरिक्त लाभ पहुंचाती। लेकिन ये तभी संभव हो सकता है जब खिलाड़ी में शक्ति,गति और शरीर में लचीलापन हो और बुबका में कमाल की गति,ताकत और किसी जिम्नास्ट सरीखा लचीलापन था। इतना ही नहीं बुबका को एक ऐसा गुरु मिला जिन्होंने उनकी क्षमता और योग्यता को तराश कर उन्हें कोहिनूर हीरा सरीखा बना दिया। ये गुरु थे विताली पेत्रोव। वो असाधारण कोच थे जिन्होंने सर्गेई बुबका, येलेना इसिनबायेवा और ग्यूसेप गिबिलिस्को जैसे दिग्गज पोल वॉल्टर्स को प्रशिक्षित किया था। ये तीनों विश्व चैंपियन थे और पहले दो ने ना केवल ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते बल्कि विश्व रिकॉर्ड भी स्थापित किए ।

2001 में संन्यास लेते समय बुबका ने अपने संबोधन में कहा था "कभी-कभी, जब मैं अपने किए पर विचार करता हूं, तो मुझे लगता है कि मैंने एथलेटिक्स के इतिहास में योगदान दिया है।" ये ना तो आत्म श्लाघा थी और ना अतिशयोक्ति। ये वक्तव्य एक यथार्थ था। निःसंदेह बुबका ने मानवीय क्षमता के नए प्रतिमान गढ़े थे।

लेकिन प्रतिमान रूढ़ नहीं होते। देश काल के साथ साथ बदलते जाते हैं। बुबका द्वारा बनाए गए प्रतिमानों को ध्वस्त होना था और वे हुए। एक समय लगता था बुबका अजेय हैं। लेकिन फिर आए डुप्लांटिस।

बुबका ने शुरुआत 5.85 मीटर से की और उसे  6.14 तक लेकर आए। उन्होंने रिकॉर्ड को कुल मिलाकर 29 सेंटीमीटर बेहतर किया। डुप्लांटिस 6.17 मीटर को  6.30 मीटर तक ले आए हैं। अभी तक 13 सेंटीमीटर बेहतर कर चुके हैं।

तो यक्ष प्रश्न यही कि बुबका की विरासत को डुप्लांटिस कहां तक ले जायेंगे। डुप्लांटिस की प्रतिभा कहने को मजबूर करती है आकाश को छू लेने की कोशिश करते डुप्लांटिस के लिए इस खेल में 'आकाश ही सीमा' है।

पोल वोल्ट के इतिहास के सर्गेई बुबका और अर्मांडा डुप्लांटिस दो ऐसे नक्षत्र हैं जिनकी प्रतिभा और हैरतअंगेज कारनामों की चमक से बाकी की चमक फीकी पड़ जाती है। आकाश नापने के इनके प्रयासों की गाथा में बाकी सभी पोल वॉल्टर उस गाथा में उन दो से छूटे स्पेस और अंतरालों को भरने के निमित्त मात्र हैं।


Tuesday, 9 September 2025

एशियाई चैंपियन

 


देश में क्रिकेट खेल के 'धर्म' बन जाने के इस काल में भी हमारी उम्र के कुछ ऐसे लोग होंगे जो हॉकी को लेकर आज भी उतने ही नास्टेल्जिक होंगे जितने किसी समय में वे हॉकी के दीवाने रहे होंगे।  निश्चित ही इन लोगों की 1983 में क्रिकेट विश्व कप जीतने की स्मृति से कहीं अधिक गहरी और स्थाई स्मृति 1975 में भारतीय हॉकी टीम की विश्व कप की जीत की होगी। कपिल देव के बेंसन हेजेज कप को सर से ऊपर उठाए वाले चित्र से कहीं जीवंत तस्वीर हॉकी विश्व कप उठाए कप्तान और संसार के अपने समय के सर्वश्रेष्ठ सेंटर हॉफ अजितपाल सिंह की तस्वीर होगी। उनकी स्मृति में जितना कपिल द्वारा अविश्वसनीय तरीके से पकड़ा गया रिचर्ड्स का कैच कौंधता होगा उससे अधिक असलम शेर खान का ताबीज चूमकर पेनाल्टी से किया गया गोल कौंधता होगा। ये सब वही लोग होंगे जिन्हें जितने कपिल, मोहिंदर, यशपाल, किरमानी, पाटिल जैसे खिलाड़ियों के बल्ले और गेंद से कारनामें भाते होंगे, उससे कहीं ज्यादा उनकी स्मृति आशिक कुमार, बी पी गोविंदा,असलम शेर खान,अजितपाल सिंह, माइकल किंडो,सुरजीत सिंह जैसे खिलाड़ियों की मैदान पर चपलता और स्टिक वर्क की खूबसूरती जगह घेरती होगी।

लेकिन मैदान पर भारतीय हॉकी के इतने खूबसूरत दृश्य विरल हो चले। यहां से भारतीय हॉकी की यात्रा शिखर से रसातल की और यात्रा  है। 

1975 के बाद हॉकी केवल एस्ट्रो टर्फ पर खेला गया। उसके बाद की हॉकी की कहानी एस्ट्रो टर्फ,नियमों में परिवर्त्तन, ऑफ साइड के नियम की समाप्ति, कलात्मकता को ताकत और गति द्वारा रिप्लेस करने और भारत व पूरे एशिया की हॉकी की अधोगति की कहानी है। भारत के लिए 1928 ओलंपिक स्वर्ण से शुरू हुआ एक चक्र 2008 में पूर्ण होता है जब वो ओलंपिक के लिए अहर्ता भी प्राप्त नहीं कर सका था।

 ब से ही तमाम लोगों के साथ इन लोगों की ये इच्छा रही होगी कि एक बार फिर भारत का हॉकी में वही जलवा कायम हो,मैदान में हॉकी का वही जादू चले जो सन 1975 के बाद शनै शनै छीज रहा था। लेकिन उस समय से ही भारतीय हॉकी ने नई हॉकी से तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास भी शुरू कर दिए थे। और खुद को उसके अनुरूप ढालने के धीरे धीरे परिणाम आने शुरू हुए। 2020 टोक्यो और 2024 पेरिस में भारतीय टीम द्वारा जीते गए कांस्य पदक शिखर की ओर बढ़ती भारतीय हॉकी के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।

र अभी हाल ही में राजगीर में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप में भारत की शानदार जीत इस बात की ताईद करती है। फाइनल में पिछले विजेता दक्षिण कोरिया के ऊपर 4-1 की बड़ी जीत बताती है है कि क्रेग फुल्टन के निर्देशन में टीम की दिशा और दशा दोनों एकदम सही है। 

स प्रतियोगिता में भारत ने धीमी लेकिन सधी शुरुआत की। पहले ग्रुप मैच में चीन को 4-3 से और उसके बाद जापान को 2-1 से हराया। उसके बाद तीसरे मैच में कजाकिस्तान को 15-0 से रौंद दिया।  उसके बाद सुपर फोर में भी पहले मैच में दक्षिण कोरिया से 2-2 से ड्रॉ खेला। यहां से टीम इंडिया ने गति पकड़ी और शानदार खेल दिखाया। अगले ही मैच में मलेशिया की मजबूत टीम को 4-1 से हराया। लेकिन अंतिम मैच में चीना के विरुद्ध सबसे बढ़िया खेला और ग्रुप राउंड में जिस चीन से बमुश्किल जीता था उसे 7-1 से हरा दिया और फाइनल में प्रवेश किया।

फाइनल में उसका मुकाबला पिछ्ले चैंपियन दक्षिण कोरिया से था। यहां पर जो टीम इंडिया का दांव पर था वो था आगामी विश्व चैंपियनशिप सीधे प्रवेश था। उसने कोरिया को शानदार खेल से सभी क्षेत्रों में पीछे छोड़ा और आसानी से 4-1 से हराकर चौथी बार चैंपियन बना।

भारत के खेल में गति,स्किल और पावर का शानदार समावेश था। टीम का मैदान के भीतर कॉर्डिनेशन शानदार था। निःसंदेह ये जीत उत्साहवर्धक है और शिखर की ओर एक मजबूत व दमदार कदम भी। हॉकी के स्वर्णिम अतीत के प्रति नास्टेल्जिया में जीने वालों के लिए भारतीय टीम की जीत और खिलाड़ियों के उठे हाथों से बड़ी आश्वस्ति और क्या हो सकती है।

मुबारक टीम इंडिया।



Tuesday, 2 September 2025

प्रो कबड्डी लीग 2025_2 देवांक दलाल और मूंछ उमेठने का नया स्वैग

 



'प्रो कबड्डी लीग' के सीजन 11 के सर्वश्रेष्ठ रेडर देवांक दलाल ने सीजन 12 की शुरुआत ठीक वहां से की है,जहां उन्होंने सीजन 11 खत्म किया था।

बीती रात सीजन 12 का छठा मैच पिछले साल की चैंपियन 'हरियाणा स्टीलर्स' और 'बंगाल वॉरियर्स' के बीच था,जो इन दोनों ही टीमों का इस सीजन का पहला मैच था। इस मैच में वॉरियर्स ने स्टीलर्स को 54-44 अंकों से हरा दिया। इस मैच में वॉरियर्स के कप्तान देवांक दलाल ने शानदार 21 अंक बनाए। 

 दो साल पहले सर में लगी जानलेवा चोट से उबर कर पिछले सीजन में 'पटना पायरेट्स' की तरफ से खेलते हुए देवांक ने कुल 25 मैचों में 301 अनेक बनाए थे जिसमें 18 सुपर टेन थे, जो एक रिकॉर्ड है। उनका प्रति मैच औसत 12 अंकों का था। तमिल थलाइवा के खिलाफ एक मैच में उन्होंने 25 अंक अर्जित किए थे।

निःसंदेह वे एक शानदार रेडर हैं। लम्बा कद और शारीरिक सौष्ठव उनकी रेड को मारक बनाता है। जबकि उनकी गति और चपलता उसे धार देती है। और उनका संयमित एटीट्यूड उनकी रेड बेहद सफल बनाता है।

पहले ही मैच में शानदार प्रदर्शन दिखता है कि वे इस सीजन भी अपना जलवा दिखाने को तैयार हैं। वे इस साल के सबसे मंहगे भारतीय खिलाड़ी है जिन्हें इस सीजन 2.20 करोड़ मिले हैं। इसी साल फरवरी में उन्होंने दिल्ली में आयोजित 71वीं राष्ट्रीय कबड्डी चैंपियनशिप सेना को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इस प्रतियोगिता के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी खिलाड़ी घोषित किए गए।

फिलहाल वे प्रो कबड्डी लीग के 12वें संस्करण के नए सेंसेशन हैं। और क्रिकेट के गब्बर की तरह मूछें उमेठना नया स्वैग।

प्रो कबड्डी लीग 2025_1



इसमें कोई शक नहीं है कि आईपीएल के बाद प्रो कबड्डी लीग भारत की दूसरी सबसे सफल लीग है। लीग ने गाँव जवार के इस खेल को ना केवल खूब लोकप्रिय बनाया है, बल्कि उसे ग्लैमरस भी बनाया है। सबसे बड़ी बात खिलाड़ियों के पास अच्छा पैसा भी आया है। इस साल की ऑक्शन के हीरो ईरान के शादलू हैं जिन्हें गुजरात जायंट्स  ने 2.23 करोड़ में खरीदा है,जबकि देवांक दलाल को बंगाल वॉरियर्स ने 2.20 करोड़ में खरीदा है। शादलू को लगातार तीसरे साल दो करोड़ से ज्यादा मिला है। वैसे इस बार रिकॉर्ड 10 खिलाड़ियों को एक करोड़ से अधिक मिले हैं।


इंग्लिश प्रीमियर लीग और प्रो कबड्डी लीग दोनों हॉटस्टार पर लाइव दिखाई जा रही है। अगर इसके आंकड़ों को लोकप्रियता का कोई पैमाना माने, तो इस समय लाइव चल रहे चार प्रीमियर लीग मैच के कुल दर्शक 7 लाख 31हजार हैं जबकि यूपी योद्धा और तेलुगु टाइटंस के बीच प्रो के मैच के दर्शक इस समय 24 लाख हैं।


शाइनिंग साइना

हर उड़ान की एक मंजिल होती है। कि एक चमकीला दिन शाम में घुल जाता है। कि पूनम का चांद सूरज की आगवानी में स्वाहा होता जाता है। कि रात के जगमग स...