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थम गई चकदाह एक्सप्रेस

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  शहर लंदन भी क्या शहर है। कितना खुशकिस्मत। कितना प्रिविलेज्ड। फुटबॉल का वेम्बले इस शहर में है। टेनिस का विंबलडन इस शहर में है। क्रिकेट का लॉर्ड्स इस शहर में है। शायद ये इस शहर का आकर्षण ही है कि लंबे समय से अनवरत दौड़ रहीं दो खेल एक्सप्रेस यहां आकर ठहर जाती हैं हमेशा हमेशा के लिए।  ये साल 2022 है। तारीख़ 24 सितंबर की है। खेल इतिहास में दो सफे लिखे जा रहे हैं। दो खेलों के दो महान खिलाड़ी अपने अपने खेल मैदान को अलविदा कह रहे हैं। 24 साल से निरंतर दौड़ रही टेनिस की 'फ़ेडेक्स'शहर के 'द ओ टू' एरीना में आकर ठहर जाती है। उधर कोलकाता के ईडन गार्डन से एक क्रिकेट एक्सप्रेस 'चकदा एक्सप्रेस' 20 साल लंबी अनवरत यात्रा कर क्रिकेट के मक्का 'लॉर्ड्स'पहुंचती है और यहां आकर विश्राम की मुद्रा में ठहर जाती है। महिला क्रिकेट की दुनिया की सबसे सफल और सबसे तेज गेंदबाज झूलन निशित गोस्वामी अपने बेहद सफल और 20 साल लंबे  कॅरियर के समापन की घोषणा करती हैं। ये बीस साल लंबा जीवन हैरतअंगेज कर देने वाला है। इस दौरान वे 12 टेस्ट मैच, 204 एकदिवसीय मैच और 68 टी20 मैच खेलती हैं। वे एकदिवसीय क्र

रुक जाना 'फ़ेडेक्स' का

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सुप्रसिद्ध शायर फ़िराक गोरखपुरी साहब ने कभी एक शेर कहा था- "आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख्र करेंगी हम अशरो।  जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने फ़िराक़ को  देखा है। " भले ही हमने अदबी दुनिया के 'फिराक' को ना देखा हो,लेकिन हमने खेलों की दुनिया के 'फ़िराक' को देखा है। कि हमने रोजर फेडरर को खेलते हुए देखा है। यकीन मानिए आने वाली नस्लें ज़रूर उन सब पर रश्क़ करेंगी जिन्होंने फेडरर को खेलते हुए देखा है। जो उनके 24 साल के खेल जीवन के साक्षी रहे हैं। जिन्होंने 2003 में विंबलडन खिताब से लेकर 2022 में 23-24 सितंबर की रात को लेवर कप में राफा के साथ जोड़ी बनाकर यूरोप की टीम से अन्तिम मैच तक खेलते फेडरर को देखा ही नहीं उस खेल के जादू को महसूस किया है।  ऐसी खुशनसीबी कितनों के भाग्य में बदी होती है। कुछ साधक अपनी विधा के साधक भर नहीं होते, वे जादूगर होते हैं। वे अपने विधा से प्रभावित नहीं करते,बल्कि सम्मोहित करते हैं। एक ऐसा सम्मोहन जिसके असर से ताउम्र निकल नहीं पाते। बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का जादू हो या कुमार गंधर्व के गायन का। कहां कोई बच पाता है। उदय शंकर के पैरों की थिरकन  का जादू हो लच

गजोधर बाबू अब नहीं रहे

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          राजू श्रीवास्तव को पसन्द करना या ना करना एक व्यक्तिगत बात हो सकती है। ये भी सच है कि उन्होंने कोई बहुत उच्च कोटि का हास्य व्यंग्य रचा या कहा नहीं। वे कई बार फूहड़ हो जाते  और कई बार अश्लीलता को छूते नज़र आते। और ये भी कि वे कलाकार थे,लेकिन उनकी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं भी थीं। इस सब के बावजूद ये भी तथ्य है कि वे देश के सर्वाधिक लोकप्रिय स्टैंड अप कॉमेडियन थे और आम जनता उन्हें बेहद चाहती और प्यार करती है। दरअसल उन्होंने स्टैंड अप कॉमेडी को देश में बेहद लोकप्रिय बनाया और एक नया मकाम दिया। लॉफ्टर चेलेंज का पहला सीजन था तो उसमें वे भी एक प्रतिभागी थे। इसमें वे भले ही सुनील और अहसान कुरैशी से पिछड़ गए हों। लेकिन इस प्रतियोगिता से बाहर आकर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लोकप्रियता में सबको पीछे छोड़ दिया। दो,उनका अपनी बात कहने या डिलीवरी का एक खास तरीका था। भदेस सा।  इसमें वे अपनी स्थानीय कानपुरी बोली जो कन्नौजी मिश्रित अवधी थी, का तड़का लगाते। ये उनकी एक ऐसी यूएसपी थी जो उन्हें अपने सभी समकालीन स्टैंड अप कॉमेडियन से विशिष्ट बनाती थी और जनता में  लोकप्रिय भी। तीन,सबसे महत्वपूर्ण बा

ओले ओले ओले कार्लोस

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न्यूयॉर्क के फ्लशिंग मीडोज में स्थित आर्थर ऐश स्टेडियम यूएस ओपन 2022 के पुरुष वर्ग के फाइनल मैच के दौरान "ओले,ओले,ओले कार्लोस" से गूंज रहा था। दरअसल ये टेनिस के भविष्य का नया थीम सांग है। नया थीम सांग इसलिए कि वहां उपस्थित 24 हज़ार दर्शकों सहित दुनिया भर के टेनिस प्रेमी टेनिस के नए युग का आरंभ देख रहे थे। वे टीनएजर कार्लोस अलकराज गार्सिया को चैंपियन बनते देख रहे थे। अब वे नए टेनिस स्टार के उदय को देख रहे थे। दर्शक भविष्य के नए चैंपियन से रूबरू हो रहे थे। आज स्पेन के कार्लोस अलकराज फाइनल मैच में नॉर्वे के कैस्पर रूड के खिलाफ मैच पॉइंट के लिए सर्व कर रहे थे। उन्होंने गोली की तरह दनदनाती हुई सर्विस की जो कैस्पर रूड की पहुँच से बाहर थी। ये 'ऐस' था। फाइनल मैच के अलकराज के 18 ऐस में अंतिम। अब उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी नार्वे के कैस्पर रूड को एक बेहद संघर्षपूर्ण और रोमांचक मैच में 6-4,2-6,7-6(7-1) और 6-2 से हरा दिया था। ऐस लगाते ही कार्लोस अलकराज पीठ के बल लेट गए। उन्होंने अपनी आंखों को अपनी हथेलियों से ढाँप लिया था। वे कुछ क्षणों के लिए निश्चेष्ट लेटे

नई टेनिस क्वीन:इगा स्वियातेक

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न्यूयॉर्क के फ्लशिंग मीडोज के आर्थर ऐश एरीना में यूएस ओपन के दौरान खेल के नेपथ्य में एफ्रो अमेरिकनों के दुःख दर्द के वाहक जैज़ संगीत को बहते हुए महसूस किया जा सकता है। समय-समय पर एफ्रो अमेरिकन खिलाड़ी अपने खेल से इस संगीत की कोई तान छेड़ उसके स्वर को ऊंचा कर देते हैं और संगीत की ये ऊंची तान है कि अपने आकर्षण के मोहपाश में बांध बांध लेती है। इस साल पुरुष वर्ग में फ्रांसिस टिआफो इस संगीत की तान मद्धम सुर में सेमीफाइनल तक छेड़ते रहे। लेकिन महिला वर्ग में सेरेना विलियम्स की तीसरे दौर में हार से ये संगीत उसके आंसुओं में घुलकर विलीन हो गया और उसकी जगह पॉप संगीत ने ले ली। और इसको छेड़ने वाली थी पोलैंड की 21 वर्षीया इगा स्वियातेक। वे ब्रिटिश पॉप स्टार सील की दीवानी हैं। सील का एक बहुत प्रसिद्ध गीत है क्रेजी। इस गीत की पंक्ति है 'हम कभी सर्वाइव नहीं कर सकते जब तक कि हम थोड़े क्रेजी ना हो जाएं....लोगों से भरे इस संसार में थोड़े से लोग होते हैं जो उड़ना चाहते हैं क्या ये क्रेजी नहीं है।' और खिलाड़ियों की इस भीड़ में इगा उन थोड़े से खिलाड़ियों में हैं जो सफलता के आसमान में उ

भारतीय पुरातत्व के पितामह

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प्रख्यात पुरातत्ववेत्ता प्रो. बृजवासी लाल का 10 सितंबर को 101 वर्ष की भरी पूरी उम्र में दिल्ली में निधन हो गया। वे पिछले कुछ दिन से बीमार थे और एक अस्पताल में भर्ती थे। वे संस्कृत के विद्यार्थी थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए किया। उसके बाद में उनकी पुरातत्व में रुचि हुई और प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता मार्टिमर व्हीलर के सानिध्य में पुरातत्व में प्रशिक्षित हुए। वे 1968 से 1972 तक भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के महानिदेशक रहे और उसके बाद भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला के निदेशक भी रहे। उनकी सेवाओं के लिए 2021 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। जबकि सन 2000 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। प्राचीन इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते ही उनसे परिचय नहीं था, बल्कि ये सौभाग्य था कि अनन्य मित्र अजय प्रकाश खरे के सगे ताऊ जी होने के कारण भी उनसे व्यक्तिगत परिचय और मुलाकातें थीं। उनके साथ श्रृंगबेरपुर पुरातात्विक उत्खनन स्थल देखने और समझने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ था। वे बहुत ही सहज और सरल व्यक्तित्व थे। वे सार्वजनिक जीवन में ह

खोखो से अल्टीमेट खो खो यानि माटी से मैट तक का सफर

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                                    (गूगल से साभार)              जब खो खो खेल मिट्टी से मैट पर स्थानांतरित हो रहा होता है,तो ये खेल अपनी प्रगति के एक नए चरण में प्रवेश कर रहा होता है। और इसे देखने के बाद आप दुविधा में भी पड़ सकते हैं कि क्या ये वही खेल है जिसे हमने अपने बचपन में खेला या देखा था।         दरअसल मैट वाली जिस अल्टीमेट खो खो को कल से देखना शुरू किया है ना,ये वो खो खो नहीं है जिसे आपने दिन की खिली धूप में मिट्टी पर खिलाड़ियों को नंगे पैर या पीटी शूज में सेंडो बनियान और नेकर पहने खेलते देखा है। इसमें मिट्टी की जगह कृत्रिम सिंथेटिक सतह आ गई है जैसे की अन्य खेलों के साथ साथ कुश्ती और कबड्डी में आ गई है। इसमें साधारण जूते नहीं बल्कि विशेष रूप से इस खेल के लिए डिजाइन किए जूते हैं। डिजायनर कपड़े हैं। ये अब दिन में नहीं बल्कि गहराती रात में कृत्रिम प्रकाश में खेला जाता है।       तो इसमें चकाचौंध होगी ही। जुनून, एक्शन, गति,उन्माद भी भरपूर होगा। उत्तेजना भी होगी। शोर शराबा भी होगा। दिखावा होगा, थोड़ा नकलीपन, थोड़ा बनावटीपन भी होगा। इसमें चारों तरफ ग्लैमर ही ग्लैमर पसरा होगा।  यानि कृत