Monday, 20 July 2026

फीफा विश्व कप डायरी 27: फ़ाइनल

 



फाइनल मैच की पूर्व संध्या पर आयोजित एक विशेष प्रेस कार्यक्रम में स्पेन और अर्जेंटीना के कोच और कप्तानों के अलावा खेल शख्सियतें भी मंच पर थीं। उनमें से एनएफएल के दिग्गज टॉम ब्रैडी और एनबीए के दिग्गज खिलाड़ी केविन ड्यूरेंट के अलावा महानतम टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच भी थे। वे मेस्सी से सवाल पूछ रहे थे, ' इतने बड़े फाइनल से पहले के प्रेशर को वे कैसे संभालते हैं।'

दरअसल ये समस्या मंच साझा कर रहे अपने अपने खेल के दो महानतम खिलाड़ियों की साझा समस्या थी। वे दोनों हो गोट को दर्जा पा चुके हैं और अमरत्व को पा लेने की चाह में डूबे हैं। वे दोनों 39 बसंत पार 40वें साल में हैं। पर हार नहीं मान रहे हैं। वे खेल नहीं छोड़ रहे हैं और खेल उन्हें। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे   शानदार खेल दिखा रहे हैं।

अगर मेस्सी लगातार दो विश्व कप जीतकर अमर हो जाना चाहते थे, तो नोवाक अपना 25 वा ग्रैंड स्लैम जीतकर। नोवाक ने जनवरी 23 में अपना 24 वां ग्रैंड स्लैम जीता था। उसके बाद से वे ग्रैंड स्लैम के दो फाइनल और छह सेमीफाइनल हार चुके हैं। वे खिताब के करीब आते हैं और चूक जाते हैं। उधर मेस्सी भी अपने दूसरे खिताब से एक कदम की दूरी से चूक जाते हैं। दोनों खेलों के इतिहास में अमर होते-होते रह जाते हैं। ये विधि का विधान जो ठहरा। अमरत्व देवताओं का विशेषाधिकार है। माणुस की देवता बनने की चाह कहाँ पूरी होती है। मेस्सी और नोवाक अपनी समस्त मानवीय कमजोरियों के साथ सामान्य माणुस ही ठहरे। 

रविवार की शाम को अमेरिका के न्यूजर्सी में खेले गए फीफा विश्व कप फुटबॉल के फाइनल को जीतकर अर्जेंटीना की टीम मेस्सी की विश्व कप से विदाई को अविस्मरणीय बना देना चाहती थी। पर ऐसा हो ना सका। ये एक बेहद कठिन मुकाबला था। मैच 120 मिनट तक गया और एक गोल हुआ। तीसरा स्थान निर्धारित करने वाला फ्रांस और इंग्लैंड का मैच मनोरंजन से भरपूर था, जिसमें 10 गोल हुए। ये फुटबॉल का टी ट्वेंटी मैच था। जबकि फाइनल तनाव से भरा लेकिन कुछ हद तक नीरस मैच था। फुटबॉल का टेस्ट मैच।

ये फाइनल मैच दो महाद्वीप की फुटबॉल और उसकी श्रेष्ठता का द्वंद्व  भर नहीं था,बल्कि रक्षण और आक्रमण के बीच का द्वंद्व भी था। एक तरफ कोपा कप विजेता अर्जेंटीना का आक्रमण था जिसने फाइनल से पूर्व 19 गोल किए थे,तो दूसरी तरफ यूरो चैंपियन का रक्षण था जिसने अब तक केवल एक गोल खाया था। एक तरफ संयमित और अनुशासित टीम वर्क था, तो दूसरी तरफ कुछ उच्छृंखल और वैयक्तिक प्रतिभा और पराक्रम का उपक्रम था। ये एक बीती जाती पीढ़ी और नवागत पीढ़ी के बीच का द्वंद्व था। ये विदाई लेते मेस्सी और उदित होते नए सितारे यमल के बीच मुकाबला था। ये बार्सिलोना बनाम बार्सिलोना था।

स्पेन की टीम निर्विवाद रूप से तकनीकी रूप से श्रेष्ठ थी। ये उन्होंने पिछले सात मैचों में दिखाया था। अर्जेंटीना उनसे पार पा सकने में असमर्थ थी।@@ ये अर्जेंटीना की टीम जानती थी। उन्होंने पराग्वे वाली शैली को अपनाया। फ्रांस शानदार खेलकर और पूरे मैच पर अपना नियंत्रण रखते हुए भी बमुश्किल 1-0 से जीत पाई थी। पैराग्वे ने फिजिकल होना चुना, रफ टफ खेलना चुना। अर्जेंटीना के सामने और कोई रास्ता नहीं था। फाइनल पहुंचकर कोई हारना नहीं चाहता। उन्होंने भी पैराग्वे का रास्ता चुना। पूरे मैच पर स्पेन ने खेल पर पूरा नियंत्रण रखा। बस वे गोल करने में असमर्थ रहे। इसका कारण अर्जेंटीना की आक्रामक व फिजिकल टैक्लिंग के अलावा गोलकीपर मार्टिनेज भी रहे। मार्टिनेज़ ने इस मैच में कुल 11 सेव किए। जबकि गोल्डन ग्लव्स के विजेता स्पेन के गोलकीपर उनाई सिमोन ने पूरे टूर्नामेंट में 10 सेव किए। ये मैच उन्होंने अपने लिए अविस्मरणीय बना दिया। वे अर्जेंटीना के एकमात्र खिलाड़ी थे, जिन्होंने अंतिम समय तक संघर्ष किया।

स्पेन के दबदबे को इस बात से समझ जा सकता है कि स्पेन के गोल पर 20 अटेम्प्ट के मुकाबले अर्जेंटीना के कुल जमा दो अटेम्प्ट थे। उसकी स्थिति इतनी दयनीय हो गई थी कि वे रेगुलर समय में तो गोल पर एक अटेम्प्ट भी नहीं ले पाए।

 स्पेन ने फाइनल जीता। फीफा ट्रॉफी जीती। खेल जीता। श्रेष्ठता की लड़ाई जीती। उसने अपने सुंदर खेल से लोगों का दिल भी जीता। दरअसल स्पेन की ये जीत टीम की जीत है। टीम में ना कोई मेस्सी था,ना एम्बाप्पे था,ना अर्लिंग हॉलैंड था,ना केन था। ये एक टीम थी और उसके 11 सदस्य थे। जीत में सबका बराबरी का योगदान था। यमल का भी। जितना योगदान बेहतरीन गोलकीपर का था, उतना फुल बैक का,उतना ही मिडफील्ड का और उसी अनुपात में फॉरवर्ड का। यहां टीम पहले और खिलाड़ी की इमेज बाद में थी। स्पेन के लिए सबसे ज्यादा गोल करने वाले ओयरजाबल को 60 मिनट बाद ही रिप्लेस कर दिया गया।

 ये अनुशासन की जीत थी,धैर्य की जीत थी, आपसी तालमेल और समन्वय की जीत थी,एकता की जीत थी। ये एक टीम की जीत थी। ये फुटबॉल की जीत थी।

जिस तरह के दृश्य  मैच की समाप्ति के बाद आंखों के सामने आए,वे शर्मनाक थे। खेल हमें हार में भी विनत होना सिखाता है। शालीन होना सिखाता है। ग्रेसफुल होना सिखाता है। हार को भी गरिमामय तरीके से स्वीकार करने का साहस होना चाहिए। यहां खेल शर्मसार हुआ। 

 एक ऐसा फाइनल जिसे अर्जेंटीना से कहीं ज्यादा उसके समर्थक भूलना चाहेंगे। हार के कारण नहीं। खेल भावना से च्युत होने के कारण भी। 

और हां मेस्सी के आंसुओं के कारण भी।


फीफा विश्व कप डायरी 27: मेस्सी की विश्व कप से विदाई

 


दो आंखों से निकले पानी ने संसार भर में फैले करोड़ों प्रशंसकों को दुख और अवसाद के गहरे समंदर में डूबने के लिए छोड़ दिया।

दो आंखों से पानी निकला और असंख्य हृदय नम हो आए।

दो आंखों से बार बार पानी बहा। असंख्य मन पीड़ा से भर उठे।

ये विदाई की गहरी वेदना के आंसू थे। वो एक लक्षित उद्देश्य के सपने के बार बार टूटने से बच जाने का सुख और अंततः उस स्वप्न के टूट जाने की वेदना थी और उसका पानी था 

हली बार वे दो आँखें नम हुई तो वो एक पश्चाताप की अग्नि और अंत में एक स्वप्न को बचा पाने की खुशी का गीलापन था। इसमें दुख का नमक और सुख की मिठास का मिश्रण था।

दूसरी बार गीली हुईं तो ये हारी बाजी जीत लेने की ऊष्मा की आर्द्रता थी जिसमें अपने सबसे बड़े विपक्षी पर विजय और एक जिए जा रहे  स्वप्न को लगभग पा लेने के सुख की शहद सी मिठास थी।

र अंततः एक जिए जा रहे स्वप्न के तिड़क कर टूट जाने  की आह का खारा पानी था जिसमें ग़म छिपाए ना छुपता था। डुबाए ना डूबता था। 

ब समय को,नियति को उसके साथ होना था,उसका साथ छोड़ दिया।

क चाह अनचाही खत्म हुई।

क युग खत्म हुआ।

दो आँखें की विदाई हुई। निराशा के खारेपन के साथ। विश्व कप से हमेशा हमेशा के लिए।



Thursday, 16 July 2026

फीफा विश्व कप डायरी 26 : सेमीफ़ाइनल दो

 



अक्सर खेल केवल खेल के मैदान में ही नहीं खेले जाते बल्कि एक समानांतर खेल खिलाड़ियों के सीने में भी चल रहा होता है। कई बार फुटबॉल जितनी पैरों से खेली जाती उतनी ही मनोभावों और उद्वेगों से भी खेली जाती है। ऐसे मैचों में खिलाड़ियों की स्किल के ऊपर उसका आवेग हावी हो जाता है। इंटेंसिटी हद से ज्यादा बढ़ जाती है। और खेल है कि फिजिकल होने लगता है। और अगर मैदान में इंग्लैंड और अर्जेंटीना जैसे प्रतिद्वंदी आमने सामने हों तो फिर क्या ही बात है। इस बात की ताईद कल अटलांटा में खेला गया फीफा विश्व कप का दूसरा सेमीफ़ाइनल करता है।

जैसे जैसे अर्जेंटीना और इंग्लैंड की टीमें आगे बढ़ रही थीं,दोनों टीमों के मुकाबले की संभावनाएं बढ़ती जा रही थीं। और भावनाओं की तीव्रता भी। अर्जेंटीना के समर्थक जहाँ भी जाते वे अपना नया विश्व कप एंथम 'ला कुआर्ता एस्ट्रेला' द फोर्थ स्टार गाते कि "मैं जन्म से मृत्यु तक अर्जेंटीना का हूँ। माल्वीनास के लिए, डिएगो के लिए, लियो की आखिरी ट्रॉफी के लिए, अर्जेंटीना, मैं तुम्हें दो बार का चैंपियन देखना चाहता हूँ।" इस गाने में माराडोना और मेस्सी के साथ साथ माल्वीनास यानी फ़ॉकलैंड द्वीप समूह का भी जिक्र है। माल्वीनास की ग्रंथि अर्जेंटीना के सामान्य समर्थकों के मन में ही नहीं बल्कि खिलाड़ियों में भीतर भी किसी कोने में बैठी थी। मिस्र पर जीत के बाद अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने अपने ड्रेसिंग रूम में ये गाना गया। और उसके बाद ये मैच शुरू होने से पहले अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने अपने राष्ट्र गान को जिस जोश ओ जूनून और हाव भाव से गाया,उससे ये लग गया था कि टीम के लिए ये मैच सेमीफ़ाइनल से कुछ ज्यादा है।

स्कोलिनी ने अपने पुराने 4-4-2 के फॉर्मेशन से टीम उतारी। लेकिन टीम में एक बदलाव किया। मैदान के भीतर मेस्सी के बॉडी गार्ड कहे जाने वाले मिडफील्डर रोड्रिगो डी पॉल की जगह गुलियानी सिमोने को खिलाया। दूसरी और इग्लैंड ने अपनी टीम में तीन बदलाव किए। फुल बैक रीस जेम्स और जेड स्पेंस तथा विंगर मॉर्गन रोजर्स को टीम में शामिल किया।

कोच थॉमस ट्यूशेल ने 4-2-3-1 फॉर्मेशन के साथ शुरुआत की। इंग्लैंड की रणनीति मिडफील्ड को कंट्रोल करने और मेस्सी को रोकने की थी।

हले हॉफ के खेल की इंटेंसिटी बताती है कि भावनाओं ने प्राथमिकता ग्रहण कर ली थी। इस हॉफ में एक भी गोल नहीं हुआ। केवल तीन शॉट लिए गए। दो इंग्लैंड ने। एक अर्जेंटीना ने। कोई भी शॉट दोनों टीमों का टारगेट पर नहीं लगा। और 19 फाउल हुए। ये हॉफ भावनाओं के अतिरेक में खेला गया हॉफ था। खेल फिजिकल हुआ और दोनों में से कोई भी टीम लय नहीं पा सकी। कुछ हद तक ये हॉफ नीरस रहा। 

लेकिन पहले हॉफ के बाद मध्यांतर में खिलाड़ियों के दिमाग से भावनाओं का ज्वार उतरा,तो उन्हें फुटबॉल की याद आई। याद आई तो फुटबॉल का खेल आया और आई उसकी लय, उसकी गति, उसकी ताल और बाकी सब कुछ भी आया। खेल रोमांचक और संघर्षपूर्ण हो आया। 

डेडलॉक इंग्लैंड ने 55 वें मिनट में तोड़ा जब मॉर्गन रोजर्स ने दाहिनी ओर से शानदार क्रॉस डाला जिसे  एंथनी गॉर्डन ने पकड़ा और कुटी रोमेरो को चकमा देते हुए सटीक गोल दाग दिया। यहां पर खेल इंग्लैंड के नियंत्रण में था। और अर्जेंटीना बैकफुट पर थी।

स यहीं पर इंग्लिश कोच थॉमस ट्यूशेल और टीम चूक गई। यहां से टीम एकदम रक्षात्मक हो गई। वे एक और गोल के लिए गए ही नहीं। उस समय तक 35 मिनट और इंजरी टाइम का खेल बाकी था। इतने लंबे समय तक एक गोल की लीड को बचाना किसी भी रक्षा पंक्ति के लिए बहुत दुष्कर कार्य होता है। वो भी अर्जेंटीना जैसी टीम और मेस्सी के खिलाफ।

72वें मिनट में थॉमस ट्यूशेल ने गोल करने वाले एंथोनी गॉर्डन की जगह डिफेंडर एजरी कोंसा को मैदान में उतारकर लो ब्लॉक बनाकर अर्जेंटीना को रोकने का प्रयास किया। उसके दस मिनट बाद थॉमस ट्यूशेल एक और रक्षात्मक बदलाव किया और मिडफील्डर डेक्लान राइस की जगह डिफेंडर निको ओ'रेली को मैदान में उतारा। साथ ही रीस जेम्स की जगह डैन बर्न को भी।


सके विपरीत स्कोलिनी ने आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने पहले निकोलस गोंजालेज को और फिर 81वें मिनट में लेफ्ट-बैक निकोलस टैग्लियाफिको की जगह स्ट्राइकर लोटारो मार्टिनेज को मैदान में उतारा। इससे खेल पर पूरी तरह से नियंत्रण अर्जेंटीना का हो गया। गॉर्डन के 55वें मिनट में किए गए पहले गोल और लोटारो मार्टिनेज के 90+2वें मिनट में किए गए विजयी गोल के बीच, इंग्लैंड के पास केवल 12 प्रतिशत गेंद का कब्ज़ा रहा क्योंकि अर्जेंटीना ने इस बीच हमलों की झड़ी लगा दी। इसका परिणाम अर्जेंटीना को 85वें मिनट में मिला जब  मेस्सी के पास पर बॉक्स से बाहर से एंज़ो फर्नांडीज ने शानदार लांग रेंज शॉट लगाकर मैच बराबरी पर ला दिया। सात मिनट बाद ही इंजरी टाइम के दूसरे मिनट में मेस्सी ने  दाहिनी ओर से जेड स्पेंस को पछाड़ते हुए एक जादुई क्रॉस दिया जिस पर लोटारो मार्टिनेज ने हेडर से गोल कर दिया और टीम को फाइनल में पहुंचा दिया। ये शायद मेस्सी के खेल जीवन के सबसे सुंदर और जादुई क्रॉस में से एक होगा। ये अर्जेंटीना का नॉक आउट दौर का सबसे अच्छा और कन्विंसिंग खेल था जिसमें वो सही मायने में चैंपियन की तरह खेल रही थी।


ये अर्जेंटीना का लगातार चौथा नॉक आउट मैच था जिसमें बिल्कुल अंत समय में जादू सा खेल दिखाकर विपक्षी टीम को ना केवल हतप्रभ किया बल्कि पूरी तरह पछाड़ दिया। वे किसी सोए शेर की तरह उठते और कुछ ही समय में विपक्ष के पूरे खेल को तहस नहस कर देते। राउंड ऑफ 32 में कोबे वर्डे के खिलाफ 110वें मिनट तक 2-2 की बराबरी पर थे। राउंड ऑफ 16 में 78 वें मिनट मिस्र से 0-2 से पीछे थे। क्वार्टर फाइनल में स्विट्ज़रलैंड से 111 वें मिनट तक 1-1 की बराबरी पर थे और सेमीफाइनल में इंग्लैंड से 85 वें मिनट तक 0-1 से पीछे थे। अंतिम परिणाम हम सब जानते हैं।

र्जेंटीना की टीम ने बताया आखिरी समय तक हार नहीं माननी चाहिए और प्रयास करते रहना चाहिए। सफलता मिलती ही है। कोई हार जब तक अंतिम नहीं होती जब तक समाप्ति की व्हिस्ल ना बज जाए।

नॉकआउट मैचों में अर्जेंटीना की टीम एक रूपक गढ़ती है, उस बुझते दिए का जो बुझने से पहले जोरदार तरीके से फड़कता है। मैदान (दिए) में जब समय( तेल) खत्म होने को ही होता है तो अर्जेंटीना की टीम (बाती) अचानक से अपनी सारी ऊर्जा और काबिलियत से फड़फड़ा उठती है और विपक्ष को ध्वस्त करके उत्पन्न प्रकाश रूपी आनंद से अपने प्रशंसकों के दिलों को दीप्त कर देती है। और फिर अगले मैदान की खोज में चल देते हैं।

और अर्जेंटीना के समर्थक खुशी से झूमकर कह उठते हैं -वामोस मेस्सी। वामोस अर्जेंतीना।

Wednesday, 15 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 25 : सेमीफाइनल एक


 


फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल की बात करने से पहले समय को थोड़ा पीछे लिए चलते हैं और स्मृति बन चुके दो मैचों को एक बार फिर याद कर लेते हैं।

एक, बात 5 जून 2025 के यूएफा नेशंस लीग की है। इस का दूसरा सेमीफाइनल फ्रांस और स्पेन के बीच खेला गया था। इस बहुत ही रोमांचक और संघर्षपूर्ण मुकाबले में कुल नौ गोल हुए। ये मैच स्पेन ने 5-4 से जीता।

दो,समय को थोड़ा और पीछे लिए चलते हैं। तारीख आती है 9 जुलाई 2024। स्थान एलियांज स्टेडियम म्यूनिख। एक और सेमीफाइनल। इस बार यूएफा यूरो 2024 प्रतियोगिता का। प्रतिद्वंदी वही स्पेन और फ्रांस। नतीजा भी वही। एक बहुत ही संघर्षपूर्ण व रोचक मुकाबले में स्पेन ने फ्रांस को 2-1 से हरा दिया।

तिहास अपने को दोहराता है। एक बार नहीं बार बार।

स बार स्थान अमेरिका का डलास। एक बार फिर सेमीफाइनल। इस बार फीफा विश्व कप 2026 का। प्रतिद्वंदी वही फ्रांस और स्पेन। नतीजा भी वही। स्पेन ने फ्रांस को 2-0 से हरा दिया।

तिहास की घटनाओं से कुछ निष्कर्ष निकाले जाते हैं। कुछ सबक सीखे जाते हैं। कुछ प्रेरणाएं ले जाती हैं। लोगों ने और विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि ये इस विश्व कप का सबसे शानदार मैच होने जा रहा है। एक ऐसा मैच जो आगे के समय में उद्धृत किया जाता रहेगा। एक फाइनल जो फाइनल से पहले होने जा रहा है। एक ऐसा मैच जिसका हाइप क्रिएट हो गया था। लेकिन निष्कर्ष गलत भी साबित होते हैं। इस बार वहीं हुआ।

ये स्पेन की एकतरफा जीत थी। कई बार आंकड़े घटनाओं की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर पाते। इस मैच की स्कोरलाइन भी नहीं कर रही है। स्पेन ने फ्रांस को कहीं टिकने नहीं दिया। याद कीजिए 8 जुलाई 2014 को बेलो होराइजेंटो के मिनईराको स्टेडियम में फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल को। जर्मनी ने मेजबान ब्राजील को 7-1 से हराकर जिस तरह ह्यूमिलेट किया था, ये उससे कम ना था।

हीं पता स्पेन ने फ्रांस पर पहली दो जीत से सबक सीखे थे या नहीं। या फिर उससे कुछ सीखने की जरूरत थी भी या नहीं, क्योंकि वे विजेता थे। और विजेता की दृष्टि धुंधली हो जाती है। लेकिन वे उन जीतों से एक चीज अवश्य लेकर आए थे। वो था उनका आत्मविश्वास।

मैच से पहले स्पेन के स्टार खिलाड़ी लामिन यामाल से फ्रांस से होने वाले मुकाबले के बारे में पूछा गया। ये सवाल बनता था। फ्रांस की टीम लगातार तीसरे विश्व कप के सेमीफाइनल में थी और लगातार तीसरे फाइनल तथा एक और विश्व कप जीतने का सपना देख रही थी। ऐसा सपना देखना गैर वाजिब नहीं था। उन्होंने 2018 का विश्व कप जीता था। 2022 के विश्वकप फाइनल में पेनाल्टीशूट आउट में अर्जेंटीना से हारे थे। यानी तीन विश्व कप में वे रेगुलर समय में अजेय थे। और यहां अमेरिका में वे तो विपक्षी दल में भय उत्पन्न कर देने की हद तक शानदार खेल दिखा रहे थे। वे सभी मैच बहुत आसानी से और बहुत ही कन्विंसिंग अंतर के साथ जीतकर यहां तक पहुंचे थे।

लेकिन स्पेन की टीम और उसके खिलाड़ी इस सब से निश्चिंत थे। लामिन यामाल ने पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा था कि 'हम फ्रांस से नहीं डरते। हमने निकट अतीत में उन्हें कई बार हराया है।'  ये यामाल का दंभ या अहंकार नहीं था। ये जमीनी हकीकत थी। वे निकट अतीत में फ्रांस को दो बार हरा चुके थे। ये निकट अतीत की जीत से अपने साथ यहां विश्व कप में लाया गया आत्मविश्वास बोल रहा था। अपनी योग्यता, अपनी काबिलियत पर उन्हें भरोसा था। इसी भरोसे वे इस सेमीफाइनल में फ्रांस के मुकाबिल थे। निडर। निशंक। दृढ़ प्रतिज्ञ। स्थितप्रज्ञ।

रअसल फ्रांस और स्पेन के बीच का ये सेमीफाइनल दो टीमों के फाइनल में पहुंचने और अपने विश्व कप को जीत लेने के सपने को वास्तविकता के और करीब ले आने का रास्ता भर नहीं था,बल्कि यूरोपियन फुटबॉल में श्रेष्ठता स्थापित करने की लड़ाई भी थी। ये अपराजित रक्षण और अजेय आक्रमण के बीच का द्वंद्व था। ये वैयक्तिक हीरोइज़्म और सामूहिक सामंजस्य के मध्य की होड़ थी। ये दो टीमों के खिलाड़ियों के बीच का द्वंद्व भर नहीं था,बल्कि दो दिग्गज प्रशिक्षकों के बीच का,उनके विचारों का, उनकी रणनीतियों का, उनकी काबिलियत की परीक्षा भी थी। ये दिदियेर डेसचैम्प्स और लुइस दे ला फुएंते के बीच संघर्ष था। ये लेस ब्लेस और ला रोजा के बीच मुकाबला था। यहां लाल रंग नीले रंग से मुकाबिल था।

फ्रांस ने 4-2-1-3 के और स्पेन 4-1-2-3 के फॉर्मेशन से खेल शुरू किया। दोनों टीमों के इरादे साफ थे। दोनों अटैकिंग खेलना चाहते थे। लेकिन अलग अलग संभावनाओं के साथ। 

स पूरे विश्व कप में फ्रांस ने शानदार अटैकिंग खेल दिखाया था। उनके पास अनस्टॉपेबल फॉरवर्ड की चौकड़ी थी - एम्बाप्पे, डेम्बेले, ओलिसे और बारकोला। उन्होंने अर्जेंटीना के बाद सबसे ज्यादा 16 गोल बनाये थे। उनको अपनी आक्रमण पंक्ति पर पूरा भरोसा था। उस आक्रमण पंक्ति पर जिसे रोक पाना किसी भी डिफेंस के लिए अब तक तो नामुमकिन रहा था। लेकिन जितनी चर्चा उनके अटैक की थी, उतनी ही डिफेंस की थी। डिफेंस उनका कमजोर माना जा रहा था। उनकी सोच रही होगी कि भले ही एकाध गोल हो जाएं पर अटैक इतना पावरफुल है कि विपक्षी पर ज्याद गोल मार देंगे। वे अपनी स्ट्रेंथ पर खेल रहे थे।

दूसरी तरफ स्पेन की सोच उलट थी। इस प्रतियोगिता में उनका डिफेंस लगभग अजेय रहा है। चट्टान की तरह। जिसे भेद पाना विपक्ष के लिए लगभग नामुमकिन था। उन्होंने केवल एक गोल खाया था। पूरी प्रतियोगिता की दौरान उनके डिफेंस की चर्चा रही थी।जबकि आक्रमण उनका शांत सा रहा था। लामिन यामाल ने केवल एक गोल किया था। केवल मिकेल ओयारज़ाबल ने चार गोल किए थे। और कोई भी खिलाड़ी गोल्डन बूट की दौड़ में शामिल नहीं था। वे अटैकिंग इसलिए ही खेल रहे थे कि शुरुआत में ही एक बार बढ़त बना लें, तो फिर वे अपना किला विपक्षी को नहीं ही भेदने देंगे। वे अपनी कमजोरी पर खेल रहे थे। उसे एड्रेस कर रहे थे। अजेय आक्रमण के सामने  अभेद्य रक्षण खड़ा था।

स्पेन की टीम मैदान में उतरते ही बॉल पर ऐसे कब्जा जमाती है मानो बॉल केवल उसकी मिल्कियत हो। वो ज़्यादा से ज्यादा बॉल पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती है। इसके लिए उसकी छोटे-छोटे पासों वाली 'टिकी-टाका' खेल शैली सबसे मुफीद बैठती है। इस मैच  में भी ऐसा ही हुआ। स्पेन ने शुरू से ही गेंद पर अपना दबदबा बनाए रखा। डेडलॉक को तोड़ने में स्पेन को केवल 22 मिनट लगे, जब फ्रांस के पेनल्टी क्षेत्र में लुकास डिग्ने ने लामिन यामाल पर फाउल किया और ओयारजाबल ने पेनल्टी से गोल बनाया।

ये लुकास डिग्ने की इतने करीबी मैच की ऐसी लापरवाही भरी भूल थी, जो अक्षम्य है। डिग्ने का यामाल से कोई क्लोज कॉन्टैक्ट नहीं था। उन्होंने या तो यामाल को नोटिस नहीं किया या फिर उन्हें लगा कि वे पहले ही गेंद क्लियर कर देंगे। ये एक गलती मैच का टर्निंग प्वाइंट था। इस गोल के आते ही स्पेन दोगुनी उत्साहित हुई और आत्मविश्वास आसमान पर था। उसके बाद दूसरे हॉफ के शुरू में 58वें मिनट में ओल्मा के पास पर पोरो ने गोलकर मैच के निर्णय पर अंतिम मुहर लगा दी। ये गोल स्पेन के लंबे मूव का परिणाम था और उसकी 'टिकी-टाका' शैली का सबसे शानदार निर्देशन भी।

स्पेन का पूरे मैच पर दबदबा रहा। उन्होंने गेंद पर पूरा नियंत्रण रखा और खेल की गति को अपने अनुसार नियंत्रित किया। स्पेन के दबदबे को इस बात से समझा जा सकता है कि फ्रांस के केवल दो शॉट लक्ष्य पर लगे। उन्होंने फ्रांस की मजबूत अग्रिम पंक्ति को हमला करने का कोई मौका ही नहीं दिया। अब तक की फ्रांस की जीतों में माइकल ओलिसे की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। वे शानदार प्लेमेकर थे। लेकिन इस मैच में कुकुरेला ने उन्हें पूरी तरह से मार्क करके रखा। उन्होंने बार-बार गेंद का पजेशन खोया और एक भी ड्रिबल पूरा नहीं कर पाए। औस्मान डेम्बेले को गेंद लेने के लिए बार बार पीछे आना पड़ रहा था। और एम्बाप्पे को गेंद मिल ही नहीं पा रही थी। 

स मैच पर रॉयटर्स की रोचक टिप्पणी थी कि 'स्पेन ने फ्रांस को अनाकोंडा की तरह जकड़ लिया था।'  एक और रोचक कमेन्ट एक्स पर डॉ रमाकांत राय का है। उन्होंने लिखा 'स्पेन ने अपने गोलपोस्ट पर काला जादू कर रखा है।' हां निसंदेह ये जादू ही है। काला जादू। इसमें क्या शक हो सकता है कि स्पेन पर अब तक केवल एक गोल हुआ है। हां ये जरूर है कि ये जादू किसी तंत्र मंत्र से सिद्ध नहीं है,बल्कि उनकी उस अभेद्य रक्षापंक्ति से सिद्ध हुआ है जिसमें कहीं कोई दरार नहीं है। जो चट्टान की माफिक है। वो जादू जो कप्तान रोड्री,फेबियन रूइज, ओल्मो  के मिडफील्ड तथा कुकुरेला, कुबारसी, लेपोर्टे और पोरो के बैक लाइन से बना है।

ये स्पेन की एक शानदार जीत है जो वैयक्तिक प्रतिभा के ऊपर टीम की सामूहिकता,उनके खिलाड़ियों के बीच बेहतरीन सामंजस्य और तालमेल की जीत है। ये स्पेन की फ्रांस पर बड़ी प्रतियोगिताओं के लगातार तीसरे सेमीफाइनल में जीत थी।

हार के बाद एम्बाप्पे कह रहे थे "हमने वो प्रदर्शन नहीं किया जो हम चाहते थे, न तो सामरिक दृष्टि से, न तकनीकी दृष्टि से और न ही समग्र स्तर पर। जब आप विश्व कप के सेमीफाइनल में वो करने में विफल रहते हैं जो आपको करना चाहिए, तो आप जीत नहीं सकते। स्पेन अपनी योजना और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहा। हमारी प्रेसिंग में संवाद की कमी थी... यहां तक ​​कि जब हमने गेंद पर दोबारा कब्जा जमाया, तब भी हमारे पहले पास और पहले टच विश्व कप सेमीफाइनल के लायक नहीं थे।"

अब फाइनल में उनका मुकाबला इंग्लैंड और अर्जेंटीना के बीच के होने वाले विजेता से होगा। फाइनल मैच की प्रकृति क्या होगी ये इस बात पर निर्भर करेगा कि दूसरे सेमीफाइनल में कौन जीतता है। इंग्लैंड जीतता है तो ये यूरो 24 का रेप्लिका होगा और यूरोप में फुटबॉल की श्रेष्ठता के लिए संघर्ष  बन जाएगा। और अगर अर्जेंटीना जीतती है तो ये दो महाद्वीपों यूरोप और दक्षिण अमेरिका के बीच फुटबॉल की पारंपरिक प्रतिद्वंदिता, दो फुटबॉल परंपराओं का द्वंद्व होगा। 

तो कल का इंतजार करिए।



Monday, 13 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी_24: क्वार्टर फाइनल मैच

 



फीफा विश्व कप के तीन रोमांचक दिन और बीते। चार संघर्षपूर्ण मुकाबले संपन्न हुए। और वो सब इतिहास का हिस्सा बना जो रात रात भर जाग कर फुटबॉल देखने के लिए चाहिए होता है। शानदार गोल। बेहतरीन बचाव। रणनीतिक चातुर्य। खिलाड़ियों का अद्भुत कौशल। कमाल की टैक्लिंग। और मोहक ड्रिबलिंग। करीबी और कड़े मुकाबले। और विवादों का चोली दामन का साथ। जीत और हार,खुशी और गम,उम्मीद और निराशा के बीच से होते हुए अंततः विश्व कप अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचा। मैचों का शतक पूरा हुआ। और बची विश्व की श्रेष्ठ चार टीमें। ताज के लिए अंतिम चार मुकाबले। फुटबॉल का खेल। उसका रोमांच। और फुटबॉल की अतरंगी दुनिया। 

एक 

1992 में फीफा रैंकिंग की शुरुआत के बाद ये पहला अवसर है जबकि श्रेष्ठ चार टीमें सेमीफाइनल में पहुंची हैं। फ्रांस,अर्जेंटीना,स्पेन और इंग्लैंड। अब मुकाबला होगा नंबर 1और 3 के बीच और नंबर 2 और 4 के बीच। देखना ये है कि क्या इस में अब कोई क्रम व्यतिक्रम होता है या नहीं। आखिर इन चारों टीमों का अंतिम चार में पहुंचना क्या प्रदर्शित करता है। यही कि फीफा रैंकिंग काफी हद तक विश्वसनीय है या फिर ये कि टीमों ने अपनी रैंकिंग और प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रदर्शन किया है। शायद दोनों ही।

दो

पहले दो क्वार्टर फाइनल मैच दो अलग अलग दिन खेले गए। दोनों मैच रेगुलर टाइम में समाप्त हुए। फ्रांस ने मोरक्को को 2-0 से और स्पेन ने बेल्जियम को 2-1 से हराया। बाकी दो मैच एक ही दिन में संपन्न हुए और दोनों ही मैचों में निर्णय के लिए अतिरिक्त समय की तो आवश्यकता आन पड़ी,लेकिन पेनाल्टी शूट आउट तक नहीं जाना पड़ा। अर्जेंटीना ने स्विट्जरलैंड को 3-1 से और इंग्लैंड ने नॉर्वे को 2-1 से हराया। 

तीन

पहला क्वार्टर फाइनल बोस्टन में फ्रांस और मोरक्को के बीच हुआ। उसने 2-0 से आसान जीत हासिल की। अभी तक फ्रांस के सामने कोई भी बड़ी परेशानी सामने नहीं आई है। उसने सभी मैच अपेक्षाकृत आसानी से जीते हैं। ये इस विश्व कप की सबसे शक्तिशाली और शानदार टीम है,इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है। इसीलिए उसे जीत का सबसे प्रबल और बड़ा दावेदार माना जा रहा है। उसके पास शानदार अटैकर है। भरोसेमंद मिडफील्डर हैं। और मजबूत रक्षापंक्ति है।


इस मैच में मोरक्को के सबसे भरोसेमंद फॉरवर्ड इस्माइल सैबारी चोट लगने के कारण नहीं खेल रहे थे। लेकिन इस मैच का सबसे आश्चर्यजनक पहलू ये था कि मोरक्को ने अपनी फर्स्ट इलेवन में एक भी रेगुलर फॉरवर्ड नहीं खिलाया। उनके रेगुलर फॉरवर्ड 60वें मिनट में पहला गोल खाने के बाद आए। ये गोल एम्बाप्पे ने पेनाल्टी से किया। दूसरा गोल छह मिनट बाद ही उस्मान डैंबेले ने किया।

 चार

लॉस एंजिलिस में खेले गए दूसरे मैच में स्पेन ने अंतिम क्षणों में विजयी गोल दागकर बेल्जियम को हरा दिया। स्पेन ने 30वें मिनट में पहला गोल किया। लामिन यामल और पेड्रो पोरो ने दाहिनी ओर से शानदार तालमेल बिठाते हुए डैनी ओल्मो के लिए गोल का मौका बनाया। हालांकि कर्टोइस ने ओल्मो के पहले शॉट को रोक दिया, लेकिन फैबियान रुइज़ ने रिबाउंड पर सटीक शॉट लगाकर गोल कर दिया।


 इस मैच से पहले स्पेन ने लगातार पांच मैचों में एक भी गोल नहीं खाया था। यानी गोलकीपर उनाई सिमोन ने विश्व कप में रिकॉर्ड बनाते हुए 650 मिनट तक कोई गोल नहीं खाया। ये सिलसिला मैच के 41वें मिनट में तब टूटा जब बेल्जियम के चार्ल्स डी केटेलेरे ने क्यूबार्सी को पछाड़ते हुए टिमोथी कास्टाग्ने के सटीक क्रॉस पर हेडर से गोल किया। 

मैच का निर्णायक क्षण मेरिनो के मैदान में उतरने के दो मिनट बाद आया। 88वें मिनट में, पाउ कुबार्सी ने एक जोरदार लॉन्ग-रेंज शॉट लगाया। बेल्जियम के सब्स्टीट्यूट गोलकीपर सेने लैमेंस रिबाउंड को रोक नहीं पाए, जिससे आर्सेनल के फॉरवर्ड मरिनो ने मैच के अपने दूसरे ही टच में गेंद को गोल में डाल दिया। इससे पहले मेरिनो ने राउंड ऑफ 16 में पुर्तगाल के खिलाफ भी 91वें मिनट में विजयी गोल किया था। 

बेल्जियम के लिए यह बेहद निराशाजनक अंत था। 71वें मिनट में उनके स्टार गोलकीपर थिबाउट कर्टोइस के चोटिल हो जाने के कारण उनकी जगह लैमेंस को मैदान में उतारा गया था।

पांच

मियामी में खेले गए तनावपूर्ण मैच में इंग्लैंड ने अतिरिक्त समय के बाद नॉर्वे को हराकर जीत हासिल की। जूड बेलिंघम ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन किया।

पहला गोल  36वें मिनट में एंड्रियास शेल्डरुप के गोल ने नॉर्वे को बढ़त दिला दी। शेल्डरुप ने एक क्रॉस को गलत तरीके से हिट किया जो जॉर्डन पिकफोर्ड के पोस्ट से टकराकर ऊपरी कोने में जा लगा। लेकिन सामान्य समय के हाफ-टाइम से ठीक पहले बेलिंगहैम ने एंथनी गॉर्डन के शानदार पास पर गोल दागकर इंग्लैंड ने बराबरी कर ली।  

90 मिनट के रेगुलर समय के बाद 1-1 से बराबर रहने के बाद, अतिरिक्त आधे घंटे के खेल में तीसरे मिनट में ओरजान नाइलैंड की गलती से मिले रिबाउंड पर बेलिंगहैम ने निर्णायक गोल किया।

ये मैच जितना इंग्लैंड के सेमीफाइनल में पहुंचने और विश्व कप अभियान जारी रह जाने के लिए याद किया जायेगा उससे कहीं ज्यादा नॉर्वे के दूसरे गोल को रद्द किए जाने और बॉल के तार को छू जाने के विवाद के लिए याद किया जाएगा।

नॉर्वे को टोरब्योर्न हेगेम के गोल से 2-1 की बढ़त मिल सकती थी, लेकिन कॉर्नर किक पर एर्लिंग हालैंड द्वारा इलियट एंडरसन को धक्का देने के कारण इसे रद्द कर दिया गया। वहीं, इस बात पर भी विवाद रहा कि क्या इंग्लैंड के पहले गोल पर पिच के ऊपर लगे तारों का कोई असर पड़ा था। नॉर्वे के कोच स्टाले सोलबक्केन का मानना ​​था कि नॉर्वे की गोल किक किसी तार से छू गई जिससे गेंद सीधे आसमान से गिरी,लेकिन फीफा के बॉल सेंसर ने कोई संपर्क नहीं दिखाया।

छह

केन्सास में खेले गए आखिरी क्वार्टर फाइनल मैच में पिछली चैंपियन अर्जेंटीना ने स्विट्जरलैंड को 3-1 से हराकर लगातार दूसरी बार सेमीफाइनल में जगह बनाई।

जूलियन अल्वारेज़ और लौतारो मार्टिनेज़ ने अतिरिक्त समय में गोल करके अर्जेंटीना के विजय अभियान को जारी रखा। मैच नियमित समय के अंत में 1-1 से समाप्त हुआ। पहला गोल दसवें मिनट में लियोनेल मेस्सी के क्रॉस पर एलेक्सिस मैक एलिस्टर ने किया। लेकिन 67 वें मिनट में डैन दोये ने बराबरी का गोल कर दिया।


दोये के गोल के तुरंत बाद ही वीएआर निर्णय के बाद ब्रेल एम्बोलो को फाउल का नाटक करने के लिए मैदान से बाहर भेज दिया गया। ब्रील एम्बोलो को 'डाइव' लगाने के लिए पीला कार्ड दिखाया गया ।क्योंकि इस मैच का ये उनका दूसर पीला कार्ड थे जो स्वतः ही रेड कार्ड में तब्दील हो गया। विश्व कप की शुरुआत से ठीक पहले संशोधित किए गए 'गलत पहचान नियम' के कारण रेफरी के पास पीला कार्ड दिखाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। टूर्नामेंट के दौरान ऐसा निर्णय पहली बार नहीं लिया गया था। इससे पहले, अमेरिका और पैराग्वे के बीच समूह चरण के एक मैच में, अमेरिकी डिफेंडर टिम रीम को दिया गया पीला कार्ड वीएआर द्वारा मिगुएल अल्मियन की डाइव की समीक्षा के बाद रद्द कर दिया गया था, जिसके बाद अल्मियन को चेतावनी दी गई थी।

तो फुटबॉल जारी है। उसका रोमांच सब पर तारी है। यानी गेम ऑन है और उसका रोमांच फुल ऑन। बस थोड़ी सी नींद में खलल डालिए और फुटबॉल के खेल का आनंद लीजिए।



Sunday, 12 July 2026

नई चैंपियन नोस्कोवा और चेक वर्चस्व

 



निवार की रात 2026 के विंबलडन ग्रैंड स्लैम में महिला एकल का फाइनल कैरोलिना मुचोवा और लिंडा नोस्कोवा के बीच खेला गया। ये दोनों बालाएं चेक गणराज्य की थीं और दोनों को अपने पहले ग्रैंड स्लैम की तलाश थी। 

 न दोनों के बीच साम्यता यहीं आकर रुक जाती है। उसके बाद ये मुकाबला दो अलग उम्र,खेल शैली,अनुभव और टेंपरामेंट के मध्य था। अगर मुचोवा 29 साल की परिपक्व खिलाड़ी हैं, तो नोस्कोवा 21 साल की युवा। पहली कलात्मक टेनिस की आइकन हैं, तो दूसरी शक्ति का पर्याय। पहली पर्याप्त अनुभव के साथ मैदान में उतरी थीं,तो दूसरी के पास जोश उसकी ताकत। एक धैर्य से जड़ी,तो दूसरी पैशन से तारी। एक अपना दूसरा ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल रही थी, तो दूसरी कभी क्वार्टर फाइनल से आगे नहीं बढ़ी। एक अपने पूरे करियर में लगातार चोटों से जूझती रही है,तो दूसरी इनसे बेपरवाह,बिंदास।

ज जब टेनिस का खेल भी पावर का पर्याय हो गया हो तो ऐसे में सर्व और वाली, शानदार ड्रॉप्स और साथ ही ट्वीनर में माहिर होना बहुत ही दुर्लभ होता जा रहा है। खेल विशेषज्ञ मुचोवा को इन विशेषताओं से युक्त टेनिस की खिलाड़ी से ज्यादा 'कलाकार' मानते हैं जिनका खेल विविधाओं और तकनीकी से परिपूर्ण है। उन्हें खेलते देखना किसी ट्रीट से कम नहीं। तो दूसरी और नोस्कोवा पावर और आक्रामक खेल की प्रतिनिधि खिलाड़ी। शक्तिशाली तेज गति की सर्विस जिनके खेल का मुख्य हथियार है और बेसलाइन से शक्तिशाली शॉट्स जिनके खेल का मुख्य अवयव।

स बार का विंबलडन का फाइनल एक ही देश की इन दो खिलाड़ियों के बीच एक रोमांचक मुकाबला था। ये तीन सीटों का हाई वोल्टेज ड्रामा था। इस पूरे मैच को तीन भागों में बांट कर देखा जा सकता है। इनमें से पहला और आखिरी भाग नोस्कोवा के हक में और बीच वाला भाग मुचोवा के हिस्से रहा। 


ससे पूर्व ग्रैंड स्लैम में ये दोनों खिलाड़ी केवल एक बार आमने सामने थीं 2025 के यूएस ओपन में। इस संघर्षपूर्ण मुकाबले में मुचोवा ने जीत हासिल की थी। लेकिन कल विंबलडन की हरी घास के मैदान पर पहली किसी भी हार और प्रतिद्वंदी के अनुभव से बेपरवाह नोस्कोवा ने शक्तिशाली सर्विस और जबरदस्त फोरहैंड के बल पर केवल 31 मिनट में पहला सेट जीत लिया 6-2 से। और दूसरे सेट में भी 5-2 की बढ़त बना ली। नोस्कोवा अब चैंपियन बनने ही वाली थीं। वे चैंपियनशिप के लिए सर्व कर रही थीं कि अचानक नर्वस हो उठी। उधर मुचोवा जैसे सोते से जागी हों। मुचोवा के अपने अगले सर्विस गेम में पांच ड्यूस हुए। इस दौरान उन्होंने अपनी सर्विस को ब्रेक होने से ही नहीं बचाया, बल्कि तीन चैंपियनशिप प्वाइंट भी बचाए। इसके बाद नोस्कोवा के अगले सर्विस गेम में आठ ड्यूस हुए। नोस्कोवा द्वारा सात ब्रेक प्वाइंट बचाने के बाद अंततः मुचोवा ने नोस्कोवा की सर्विस ब्रेक की। और लगातार पांच गेम जीतकर सेट 7-5 जीत लिया। इस दौरान उन्होंने अपने शानदार ड्रॉप शॉट्स का इस्तेमाल किया और नोस्कोवा को लगातार गलती के लिये मजबूर किया। अब रोमांच अपने चरम पर था। लगा मुचोवा अपनी लय पा चुकी हैं और जीत की और अग्रसर हैं। इससे पहले सेमीफाइनल में मुचोवा ऐसा कर चुकी थीं,जब उन्होंने कोको गफ के विरुद्ध मैच प्वाइंट बचाकर अंततः मैच जीत लिया था। 

दूसरी तरफ लगातार पांच गेम हारकर सेट गंवाने के बाद नोस्कोवा दोनों तर्जनी उंगलियों को कानों में डाले कुछ उदास,कुछ निराश, अपनी कुर्सी पर जा बैठीं। वे दर्शकों के उस शोर को अनसुना करने की कोशिश कर रही थीं, जो मुचोवा के शानदार खेल,उनके पांच मैच प्वाइंट बचाने और मैच में वापसी के बाद उठा था। लेकिन 21 वर्षीय नोस्कोवा को उस समय उस शोर को नहीं बल्कि कि अपनी निराशा और हताशा को अनसुना करने और उसे दूर करने की जरूरत थी। और उन्होंने ऐसा किया।

 नोस्कोवा के लगातार पांच गेम हारने व  पांच मैच प्वाइंट गंवाकर 6-2, 5-2 की आसान बढ़त खत्म करने के बाद उनके पहले ग्रैंड स्लैम जीतने की उम्मीदें लगभग खत्म हो चली थीं। वहाँ उपस्थित पंद्रह हजार दर्शकों को लगने लगा था कि अब मुचोवा ही जीतेंगी। लेकिन नोस्कोवा जानती थीं कि अगर जीतना है तो अपनी निराशा और घबराहट और नर्वसनेस से उबरना होगा। उन्होंने एक बाथरूम ब्रेक लिया। वहां उन्होंने अपने को शांत किया और सारी ऊर्जा समेटकर कोर्ट पर वापसी की। अब वे बिल्कुल वैसी ही दीख रही थीं जैसे मैच के आरम्भ में । उन्होंने अपने खेल की लय जल्द ही प्राप्त कर ली। तीसरे सेट के दूसरे ही गेम में मुचोवा की सर्विस ब्रेक की और 3-0 की बढ़त ले ली। और फिर 6-3 से सेट जीतकर विंबलडन की हरी घास पर सफलता की नई इबारत लिख रही थीं। इस जीत में उनको जरूर ही तीसरे दौर में 17वीं वरीयता प्राप्त सोराना सिर्स्टिया के खिलाफ जीत ने संबल प्रदान किया होगा जिसमें वे तीसरे व निर्णायक सेट में 4-5, 40-Ad से पिछड़ने के बावजूद  टाई-ब्रेक में 11-9 से जीत गईं थीं।

जीत का ये क्षण उनके लिए बहुत विशेष था। बहुत ही भावुक। दो साल पहले विंबलडन के शुरू होने से एक दिन पहले ही उनकी माँ का कैंसर से देहांत हो गया था। प्रेजेंटेशन सेरेमनी में वे कह रही थीं "एक और व्यक्ति हैं जिन्हें मैं धन्यवाद देना चाहती हूं,और वो हैं मेरी मां। आपके बिना मैं निश्चित रूप से यहां नहीं खड़ी होती, इसलिए धन्यवाद।" वे ये कहती हैं, और आसमान की ओर एक चुंबन भेजती हैं। 

क अद्भुत दृश्य बनता है जिसमें जितना सुख है उतना ही दुख भी। उनकी आँखें पानी से नम हैं। शायद एक आंख जीत की मिठास लिए,दूसरी दुख का नमक लिए। या फिर दोनों में ही कुछ कुछ मीठा और कुछ कुछ खारा सा। 

र उनकी इस जीत को उनकी हमवतन और दोस्त कैरोलिना मुचोवा एंडोर्स करते हुए कह रही थीं "आप बहुत युवा हैं, यह आपका पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल है, जिस तरह से आपने इसे संभाला और जिस तरह से आपने खेला वह वाकई अविश्वसनीय है। इसके अलावा आप एक बेहद दयालु हैं, इसलिए आपको और आपकी टीम को बहुत-बहुत बधाई। आप इसकी हकदार हैं।" 

 लिंडा नोस्कोवा रोजवाटर डिश जीतकर एक खिताब भर नहीं जीत रही थीं,बल्कि वे अपने देश की पुरखिनों द्वारा विंबलडन टेनिस के इतिहास में स्थापित जीत की परम्परा को आगे बढ़ा रही थीं जिसे टेनिस की महानतम खिलाड़ियों में शुमार मार्टिना नवरातिलोवा ने शुरू किया था और पेत्रा क्वितोवा, मार्केटा वोंद्रोसोवा,बारबोरा क्रेज्सिकोवा जैसी खिलाड़ियों ने आगे बढ़ाया था। ये पिछले चार सालों में तीसरा विंबलडन महिला एकल का खिताब था जिसे चेक गणराज्य की खिलाड़ी ने जीता है। और ये सफलता कोई संयोग नहीं है बल्कि देश की उच्च गुणवत्ता वाली  प्रशिक्षण सिस्टम का परिणाम है, जिसमें कैटरीना सिनियाकोवा, मैरी बोज़कोवा और कोवाकोवा बहनों जैसी उभरती प्रतिभाएं शामिल हैं।

टेनिस जगत को अपनी नई स्टार लिंडा नोस्कोवा के उदय की और लिंडा नोस्कोवा को इस जीत की बधाई।


Thursday, 9 July 2026

खेल डायरी_01: उम्र


 कुछ लोगों पर उम्र इस खूबसूरती से गिरती है उनका व्यक्तित्व और अधिक उभरकर आता है। उनके लिए उम्र एक गिनती भर रह जाती है।

कल रात दुनिया के दो अलग अलग कोनों में उम्र के 39वें पड़ाव पर उम्र को धता बताते हुए दो खिलाड़ी सफलता की एक सी लेकिन अलग अलग खूबसूरत कहानी लिख रहे थे। 

मेस्सी अटलांटा में अपने पैरों की कलम को फुटबॉल की रोशनाई में डुबोकर जो इबारत फुटबॉल की पीठ पर लिख रहे थे,वैसी ही इबारत नोवाक जोकोविक विंबलडन में अपने रैकेट के कलम से बॉल की रोशनाई में डुबोकर टेनिस कोर्ट के वक्ष पर लिख रहे थे।

मेस्सी  केवल 15 मिनट में एक असिस्ट और गोल से एक हारी बाजी को जीत में बदल देते हैं। 79 मिनट तक मिस्र से 0-2 से पिछड़ने के बाद 3-2 से जीत असंभव को संभव बनाना था। ये मेस्सी के अनुभवी नेतृत्व,संयम और परिपक्वता की कहानी है।


उधर लन्दन में उम्र के ठीक इसी पड़ाव पर नोवाक जोकोविच विंबलडन के इतिहास का सबसे लंबा क्वार्टर फाइनल जीतकर विंबलडन के अपने 15वें सेमीफाइनल में जगह पक्की कर इतिहास रचते है। जोकोविच ने 05 घंटे और 15 मिनट तक चले असाधारण मैच में फेलिक्स ऑगर-एलियासिमे को 7-6 (12-10), 3-6, 6-3, 6-7 (4-7), 7-6 (10-4) से हराया। 

बढ़ती उम्र भी ना कितनी खूबसूरत रंगों में सामने आती है।


फीफा विश्व कप डायरी 27: फ़ाइनल

  फाइनल मैच की पूर्व संध्या पर आयोजित एक विशेष प्रेस कार्यक्रम में स्पेन और अर्जेंटीना के कोच और कप्तानों के अलावा खेल शख्सियतें भी मंच पर थ...