Friday, 12 June 2026

जसपाल राणा:लक्ष्य जो नहीं उन्हें नहीं चुकना था

 



बहुत बार लिखे से बहुत बहुत ज्यादा गंभीर और महत्वपूर्ण बात छायाकार के कैमरे की आँख से पकड़ा गया कोई एक लम्हा या कोई एक फ्रेम बोल देता है। वे ऐसे अविस्मरणीय और यादगार लम्हे अपने कैमरे से कैद कर देते हैं कि वे आपके दिलोदिमाग पर हमेशा के लिए चस्पां हो जाते हैं। ऐसे लम्हे जिन्हें शब्दों में बांधा ही नहीं जा सकता। किसी भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता सिवाय छायाचित्र के।

आज जब हमारे समय के एक बहुत ही महत्वपूर्ण और जाने माने निशानेबाज जसपाल राणा ने इतनी कम उम्र में इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया तो उनके दो ऐसे ही अविस्मरणीय छायाचित्र लगातार आंखों के सामने घूम रहे हैं। ये दो चित्र उनके पूरे खेल जीवन को कहने के लिए पर्याप्त हैं।

एक


पहला छायाचित्र 2024 के पेरिस ओलंपिक का है। पेरिस में मनु भाकर निशानेबाजी में एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने की अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल करती हैं। ऐसा कारनामा करने वाली वे एकमात्र भारतीय एथलीट होती हैं। उसके बाद वे रेंज से वापस जा रही होती हैं। उनके साथ उनके कोच जसपाल राणा हैं। ये उसी समय का छायाचित्र है। जसपाल बहुत ही सजग और सीधे बैठे हैं और मनु आँखें बंद किये बेपरवाह सी उनके काँधे पर सर टिकाए हैं।

गुरु शिष्य संबंध को इससे बेहतर ढंग से और किसी भी तरह नहीं कहा जा सकता था या यूं कहें कि नहीं कहा जा सकता है। मानो अपने शिष्य की सारी जिम्मेदारी,सारा बोझ गुरु अपने कांधे उठाए है। उधर मनु भाकर का चेहरा निश्चिंतता और खुशी दमक रहा है। उनको अपने गुरु पर इस कदर विश्वास है कि गुरु का कांधा उसे हर फ़िक्र और हर चिंता से मुक्त कर देता है। इतना ही नहीं गुरु अपना कांधा प्रस्तुत कर इतना स्पेस भी देता है कि अभी अभी जो अविस्मरणीय उपलब्धि उसने हासिल की है,उसे अपनी बंद आंखों से फिर फिर जी ले। बंद आंखों से उस उपलब्धि को जी लेने का अनिर्वचनीय सुख उनके चेहरे से छलका छलका जाता है। 

 गुरु शिष्या का ये संबंध इकहरा नहीं है। बल्कि द्वंदात्मक है। वहाँ केवल समर्पण,लगाव और प्रतिबद्धता भर नहीं है, बल्कि मत विभिन्नता,मन मुटाव और अलगाव भी है।  टोक्यो ओलंपिक से पहले जसपाल राणा को जूनियर टीम का हाई परफॉर्मेंस प्रशिक्षक नियुक्त किया जाता है और मनु भाकर भी उनकी प्रशिक्षु होती हैं। लेकिन दिल्ली में आयोजित विश्व निशानेबाजी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले इवेंट्स को लेकर मनमुटाव होता है। उनके रास्ते अलग अलग हो जाते हैं। ये मनमुटाव टोक्यो ओलंपिक के दौरान चरम पर पहुंच जाता है जब मनु भाकर की राइफल इवेंट के बीच में खराब हो जाती है और उन्हें इवेंट बीच में ही छोड़ना पड़ता है।

लेकिन दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। गुरु शिष्या की प्रतिभा को पहचानता है और शिष्या गुरु की महिमा को। मनु को अपनी गलती का अहसास होता है। वो फिर फिर जसपाल के पास लौटती है और प्रशिक्षण शुरू करती है। नतीजा दुनिया के सामने होता है।

दरअसल ये कहानी ये बताती है कि वे आला दर्जे के प्रशिक्षक थे। अहंकार उन्हें छू नहीं गया था। वे अपने प्रशिक्षु की प्रतिभा को ना केवल पहचानते थे, बल्कि उसे तराशना भी जानते थे। उन्होंने मनु भाकर को स्वीकार कर उन्हें ऊँचाइयों तक पहुंचाया। जब उन्हें जूनियर टीम का प्रशिक्षक बनाया गया तो उन्होंने बड़ी संख्या में निशानेबाजों की प्रतिभा को निखारा  जिन्होंने आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपूर्व उपलब्धियां हासिल की। इनमें मनु भाकर के अलावा सौरव चौधरी,अनीश भानवाला पिंकी यादव जैसे नाम शामिल हैं। 

उनके असामयिक निधन से बड़ी संख्या में होनहार प्रशिक्षुओं को एक बहुत ही योग्य प्रशिक्षक की कमी हमेश सालती रहेगी।

दो

ये 2006 के दोहा एशियाई खेलों का है। इस प्रतियोगिता में उन्होंने तीन सोने के और एक चांदी का तमगा जीता था। ये प्रदर्शन उन्होंने उस समय किया था जब अन्य भारतीय निशानेबाज बहुत अच्छ प्रदर्शन नहीं कर रहे थे और वे खुद बीमार थे। वे सेंटर-फायर पिस्टल स्पर्धा में विश्व रिकॉर्ड बनाने के कगार पर थे, लेकिन जसपाल अपने आखिरी दो निशानों पर केवल 9 अंक ही हासिल कर पाए और विश्व रिकॉर्ड बनाने से चूक गए लेकिन सोना तो जीता ही। इस उपलब्धि के बाद वे किसी बच्चे की तरह फूट फूट कर रोये। उस समय उनके चेहरे पर बाल सुलभ भोलापन था। उन आँसुओं के पीछे छिपी आत्म संतुष्टि और खागी को सहज ही महसूस किया जा सकता था। उनके आंख से छलके आंसू कह रहे थे कि भावनाओं के अतिरेक से धैर्य का बांध टूट ही जाता है,फिर चाहे दुख हो सुख।

उन्होंने एक शूटर के रूप में असाधारण उपलब्धियां हासिल की। उनकी मुख्य स्पर्धा 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल थी। उन्होंने 1994 से 2006 तक कुल 15 पदक जीते हैं, जिनमें 9 स्वर्ण पदक, 4 रजत पदक और 2 कांस्य पदक शामिल हैं। उनका सबसे सफल प्रदर्शन 2002 में मैनचेस्टर में रहा, जहां उन्होंने छह पदक जीते थे। जसपाल के नाम भारत के सबसे अधिक पदक जीतने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के एथलीट के रूप में रिकॉर्ड है, उन्होंने चार संस्करणों में कुल 15 पदक जीते हैं, जिनमें नौ स्वर्ण, चार रजत और दो कांस्य पदक शामिल हैं। 1994 में मिलान में जूनियर विश्व चैंपियनशिप के दौरान जसपाल के घुटने पर दर्दनाक फोडा निकल आया था, जिससे उनके लिए खड़े होना भी असहनीय हो गया था। फिर भी उन्होंने अविस्मरणीय प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता और जूनियर विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की।

निसंदेह वे भारत के सबसे सफल और बड़े निशानेबाजों में थे। लेकिन उनकी उपलब्धियों का महत्व पदकों की संख्या में उतना नहीं जितना इस बात में है कि एक महंगे खेल को जिसमें अब तक धनवानों और राजघरानों का प्रभुत्व था,साधारण और आम व्यक्ति के लिए उपलब्ध कराया। 

तीन

वे हमेशा खिलाड़ियों के पक्ष और उनके हितों के लिए खड़े रहे। 2017 में इंपोर्टेड  शूटिंग उपकरणों पर  जीएसटी लागू होने पर वे उसके सबसे मुखर आलोचकों में से एक थे। उनका मानना था कि इन पर भारी कर लगाने से शूटिंग युवा खिलाड़ियों के लिए बेहद महंगी हो जाएगी और उभरती प्रतिभाओं को नुकसान होगा।

चार

एक प्रशिक्षक, एक निशानेबाज और खेल वो खिलाड़ियों के प्रवक्ता के रूप में उनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनकी कमी हर क्षेत्र में खलेगी। ये उम्र उनके जाने की कतई नहीं थी। लेकिन होनी को कोई टाल नहीं सकता।

उनका असामयिक निधन भारतीय खेल और विशेष रूप से शूटिंग में एक बड़ा निर्वात बनाता है।

उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Thursday, 11 June 2026

फीफा विश्व कप २००२६ डायरी ०१ : पूर्वावलोकन

 



उरुग्वे के सुप्रसिद्ध लेखक पत्रकार एडुआर्डो गैलियानो फुटबॉल खेल के अनन्य प्रेम में थे। उन्होंने फुटबॉल पर एक अद्भुत किताब लिखी है 'फुटबॉल इन सन एंड शैडो'। ये शायद फुटबॉल पर लिखी सबसे शानदार किताब है। फुटबॉल का महाकाव्य। इसमें फुटबॉल का जुनून,उसका रोमांच,उसका उत्साह और जोश ही नहीं दिखाई देता,बल्कि उसकी कलात्मकता और रागात्मकता की गूंज भी सुनाई देती है। उसमें उन्होंने एक जगह लिखा 'फुटबॉल एक धर्म है, जिसके अपने देवी-देवता और रीति-रिवाज हैं।'

भारत में खेल प्रेमियों के लिए भले ही क्रिकेट धर्म हो,लेकिन ये सच है कि पूरे संसार के खेल प्रेमियों का धर्म फुटबॉल ही है। जाहिरा तौर पर फुटबॉल धर्म है तो उसके असंख्य चाहने वाले अनुयायी भी होंगे जिन्होंने अपनी अपनी पसंद के खिलाड़ियों को देवत्व का आरोपण किया होगा और उनके देश को किसी देवथान की तरह पूजा होगा। 

जब एक धर्म हुआ,उसके कोटि कोटि देवता हुए,असंख्य अनुयायी हुए, देवथान हुए, तो कितने ही सारे धर्मोत्सव भी होते ही होंगे न। तो इसका सबसे बड़ा उत्सव हुआ फीफा विश्व कप। फुटबॉल का महाकुंभ। हर चार साल में लगने वाला। इस बार ये कुंभ उत्तरी अमेरिका में। 

यूनाइटेड स्टेट्स,कनाडा और मेक्सिको में संयुक्त रूप से आयोजित होने वाला ये विश्व कप सबसे बड़ा आयोजन। फीफा कप का 23वां संस्करण। विश्व भर की कुल 48 टीमें। अब तक की सर्वाधिक। 

इन 48 देशों के खिलाड़ी 16 स्थानों के 16 मैदानों पर अपने एक जोड़ी पैर, एक अदद सिर और एक बॉल 'ट्रायोंडा' के साथ अथक परिश्रम से अर्जित स्किल और जादू सरीखे हुनर के प्रदर्शन को बेताब हुए जाते हैं।


हरे भरे मैदान हैरतअंगेज कारनामों के प्रदर्शन का साक्षी बनने के लिए पैरों के जादुगरों के इंतजार से बेज़ार हुए जाते हैं। मैदानों की आउटलाइंस इन कारनामों की सीमा तय करने में व्यस्त हुई जाती हैं। गोलपोस्ट सीना ठोंक कर अपने मेहमानों को अपने हुनर से उन्हें भेदने की चुनौती देते हुए खड़े दीख पड़ते हैं। और स्टेडियमों के स्टैंड हैं कि अपने मेहमानों के स्वागत में पलकें बिछाए आतुर हुए जाते हैं।

एक इंतजार है जो अब खत्म हुआ चाहता है। एक व्हिसल है कि बजा चाहती है और एक पर्दा है महोत्सव का, जो उठा चाहता है। 

यहाँ पीठ पर लदी अतीत की सुनहरी स्मृतियां होंगी। मस्तिष्क को मथता वर्तमान का खुरदुरा यथार्थ होगा। और दिल में पैठे भविष्य के रोमानी स्वप्न होंगे।

यहां प्रशिक्षकों की रणनीतियों की बाजीगरी होगी। विज्ञान की निश्चितता होगी। तकनीक की कारगुजारियां होंगी। और इन सब के योग से निखरी खिलाड़ियों की अद्भुत कला की रस वर्षा से सराबोर होते दर्शक होंगे।

अपनी विशिष्ट पहचान लिए विभिन्न रंगों की जर्सियां होंगी। खिलाड़ियों की पहचान बताते पीठ और सीने पर अंक होंगे। और राष्ट्रों की पहचान जताते लहराते रंग बिरंगे परचम होंगे।

यहां जोश होगा। उत्साह होगा। जुनून होगा। रोमांच होगा। खेल मुकाबलों की निश्चितता होगी और परिणामों की अनिश्चितता होगी। जीत की खुशी होगी। पराजय की उदासी भी। आंसू खुशी के भी बहेंगे और दुख के भी।

यहां पराभव की ओर जाते और फीफा वर्ल्ड कप में अंतिम बार भाग लेते उम्रदराज खिलाड़ी होंगे।

अर्जेंटीना के लियोनस मैसी होंगे।

पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो होंगे।

क्रोएशिया के लुका मोड्रिच  होंगे

स्कॉटलैंड के गोलकीपर क्रेग गॉर्डन होंगे।

मेक्सिको के गुइलेर्मो ओचोआ होंगे।

 बोस्निया और हर्जेगोविना के ईडिन जिको होंगे

और यहां अपनी प्रतिभा की झलक दिखाते भविष्य के उभरते सितारे युवा खिलाड़ी भी होंगे।

यहां मेक्सिको के गिल्बर्टो मोरा होंगे।

स्पेन के यामल होंगे।

जर्मनी के क्रिएटिव लेनार्ट कार्ल होंगे।

सेनेगल के अटैकर इब्राहिम म्बाये होंगे।

मिस्र के हमजा अब्देलकरीम होंगे।

दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए क्लच ईगल होगा। जायु जगुआर होगा। मैपल मूस होगा।


मशहूर संगीतकार डेविड गुएटा और गायक एंड्रिया बोसेली का तैयार किया गीत ' डीएनए ' की स्वरलहरिया दिलों की धड़कन बढ़ाने के लिए फ़िज़ा में तैर रही होंगी। तो कोलंबियाई सुपरस्टार शकीरा और बर्ना बॉय का ' दाई दाई ' गीत आपके उत्साहवर्धन के स्टूडियों में गूंज रहे होंगे। इन पर थिरकते खिलाड़ी भी होंगे और दर्शक भी।

यहां राष्ट्र तो उपस्थित होंगे ही बल्कि पूरे के पूरे महाद्वीप अपनी विशिष्ट शैली के साथ उपस्थित होंगे। आर्यन प्रजाति और दुनिया में सर्वश्रेष्ठ होने का बोध लिए शारीरिक बनावट में लंबे,शक्तिशाली पावर गेम का नियंता यूरोप होगा। साम्यवाद के बैनर तले बना मानस और कारीगरों वाला हुनर लिए कलात्मक खेल दिखाता दक्षिण अमेरिका होगा। कठिन और दुरूह भूगोल,निर्धनता, आर्थिक बदहाली और दुनिया के भीषण गृह युद्धों से उद्भूत कठिनतम परिस्थितियों से पाई जिजीविषा वाला, कभी हार ना मानने का अफ्रीकी संघर्ष होगा। गरम और उमस भरी जलवायु से उत्पन्न अलसाया सा, धीमा सा एशिया होगा। और अपने अकड़ और हेकड़ी से भरा  स्वभाव और रफ टफ खेल लिए उत्तरी अमेरिका भी होगा।

यहां अपनी टीम के लिए विभिन्न मूल,जाति, प्रजाति,संस्कृतियों और देशों के भेदभाव भुलाता सांस्कृतिक समभाव होगा। एकता होगी। भाई चारा होगा। यहां अपनी टीमों के समर्थन में उग्र राष्ट्रवाद,झगड़े ,दंगे और बैर, वैमनस्य भी होगा।

यहां केवल खेल भर नहीं होगा। फुटबॉल भर भी नहीं होगा। बल्कि यहां राजनीति होगी। कूटनीति होगी।  अर्थव्यवस्था होगी। शिद्दत के साथ बाज़ार खड़ा होगा। सॉफ्ट पावर होगी। अधिकाधिक समावेशी खेल और समाज बनाने के उद्देश्य से 32 के बजाय 48 टीमें होंगी। और ग्रीनलैंड और तमाम मुद्दों के मद्देनजर बायकॉट के प्रयास और अपीलें  भी होंगी। 

इस आयोजन के कारण पर्यावरण का पहुँचते नुक़सान का मुद्दा उपस्थित होगा। कड़े वीजा और आव्रजन नियमों के कारण समर्थकों के अमेरिका में प्रवेश का विरोध होगा। महंगे टिकटों की मार से प्रभावित खेल प्रेमी होंगे। अमेरिका और मेक्सिको में चरमपंथियों से सुरक्षा का सवाल मुंह बाए खड़ा होगा।

सोमालिया के शीर्ष फीफा फुटबॉल रेफरी उमर अब्दुलकादिर अर्टान को आने से रोकने वाला असंवेदनशील अमेरिकी प्रशासन सवालों के कटघरे में खड़ा होगा। और अपने तीनों लीग मैच अमेरिका में खेलने वाली ईरान की टीम को अमेरिका में ना रुकने देने वाला धृष्ट और बदगुमान राष्ट्रध्यक्ष भी होगा।

फुटबॉल का जुनून होगा। इन सब के बीच फुटबॉल की श्रेष्ठता के लिए  104 मुकाबले होंगे। और एक चैंपियन होगा। 

यानी कि फुटबॉल खेल के भीतर एक पूरी की पूरी भरी पूरी दुनिया समाई होगी।

 हां भारत में इस आयोजन के देखने के लिए जी टीवी 

नए नए लॉन्च हुए स्पोर्ट्स चैनल होंगे। और इसे देखने के लिए 799 रुपये का एक रिचार्ज होगा।

और क्या होगा?

अपने देवता मेस्सी और देवथान अर्जेंटीना  की जीत की कामना लिए

विकल्प के तौर पर पेले और गरींचा की थाती के लिए और नेमार के लिए ब्राजील की जीत की कामना लिए

और तीसरे विकल्प के तौर पर लीजेंड रोनाल्डो की विदाई के लिए पुर्तगाल की जीत की कामना लिए 

हम भी मौजूद होंगे।

Monday, 8 June 2026

साशा का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब

 


रात चाहे जितनी स्याह हो उसे सुबह की रोशनी में विलीन हो जाना है। शिशिर की असीम निस्सारता को बसंत की खिलखिलाहट में तब्दील हो जाना है। निराशा के बादल चाहे जितने घने हों उम्मीद की किरनों का उन बादलों को भेद ही देना है। राह लंबी हो सकती है,लेकिन धैर्य ना छूटे तो अंततः मुकाम हासिल हो ही जाना है। कल फिलिप कार्टियर की सुर्ख लाल सतह पर फ्रेंच ओपन के फाइनल में जर्मनी के एलेक्जेंडर साशा ज्वेरेव की इटली के फ्लाविया कोबोल पर 6-1, 4-6, 6-4, 6-7(4-6), 6-1 से संघर्षपूर्ण जीत कुछ ऐसी ही कहानी कहती है। साशा का ये पहला ग्रैंड स्लैम खिताब था।

साशा का फ्रेंच ओपन का ये ल खिताब दरअसल उनकी उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच की आवाजाही की कहानी है। उनके हार ना मानने के जज़्बे की कहानी है। चोटों से जूझते हुए उनके लगातार संघर्ष करने और कठोर परिश्रम की कहानी है। ये शिखर से एक साँस भर की दूरी से बार बार उनकी फिसलन की कहानी भी है। ये खिताब उनके 29 बसंत लंबे इंतजार की कहानी है। 

एक खिताब जो 555 जीत के बाद आया। चार ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने के बाद आया। दस साल के लंबे कॅरियर के बाद आया।

दरअसल ये नियति की गति की कहानी है।

इस बार के फ्रेंच ओपन के बीते एक पखवाड़े के समय ने रोला गैरों के फ़लक पर साफ़ साफ इबारत लिखी कि इस बार का पुरुष एकल का ये खिताब नियति ने साशा के लिए,उसके धैर्य के लिए और उसकी अनंत प्रतीक्षा के लिए पहले ही रिजर्व कर दिया है। वरना तो ये खिताब अलकाराज का ना हो जाता जो कलाई की चोट के चलते इस बार लाल मिट्टी पर खेलने से महरूम हो गए या यूं कहें कि नियति द्वारा कर दिए गए। इसके बाद भी साशा का कहां नंबर आता था। नंबर एक खिलाड़ी यानिक सिनर इसे ना जीत लेते और अपने ग्रैंड स्लैम खिताबों के संख्या अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी अलकराज के बराबर पहुंचा देते। लेकिन वे दूसरे दौर में अप्रत्याशित रूप से हार कर बाहर हो गए। साशा के रास्ते की एक और बाधा दूर हुई। लेकिन ठहरिए। अभी भी साशा का कहां नंबर आता है। नोवाक जोकोविच को क्यों भूले जा रहे हैं। वे अपने  25वें ग्रैंड स्लैम का शिद्दत से पीछा कर रहे थे और दो दौर में शानदार खेल दिखा कर अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर चुके थे। लेकिन नियति इस बार केवल और केवल साशा के पाले में थी। नोवाक तीसरे दौर में हारकर बाहर हो गए। अब जाकर साशा की चर्चा शुरू हुई। क्या साशा अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीत सकते हैं? साशा ने अपने खेल से दिखाया 'हाँ,क्यों नहीं'। 

याद कीजिए 2009 का फ्रेंच ओपन। इसमें पुरुष एकल खिताब  रोजर फेडरर ने जीता था। उन्होंने स्वीडन के रॉबिन सोडरिंग को हराया था। ये फेडरर का एकमात्र फ्रेंच ओपन खिताब था। दरअसल ये नियति ने तय किया था कि इस बार का खिताब रोजर फेडरर का ही होगा। इससे पहले राफेल नडाल बार बार उनके और फ्रेंच ओपन के बीच उपस्थित हो जाते। वे फेडरर को फाइनल में चार बार हरा चुके थे। फेडरर जानते थे कभी वो समय आयेगा जब फाइनल में नडाल उनके सामने नहीं होंगे। ये यही साल था। इस बार सोडरिंग ने अप्रत्याशित रूप से रफ़ाल को चौथे दौर में हराकर बाहर कर दिया। फेडरर जानते थे ईश्वरीय वरदान से कम नहीं। और उन्होंने ना केवल अपना पहला फ्रेंच ओपन जीता बल्कि करियर ग्रैंड स्लैम पूरा किया और साथ ही पीट संप्रास के 14 ग्रैंड स्लैम खिताब के रिकॉर्ड की बराबरी भी की।

इस बार साशा जानते थे कि ना तो नोवाक और ना ही अलकराज और सिनर उनके रास्ते में हैं। ये विधि का विधान रचा गया था। साशा ने चूक नहीं की।  उन्होंने हर उपाय किया। उन्होंने अपने खेल में काले रंग की ड्रेस पहनी हुई थी। आप उन्हें किसी लांग शॉट में देखेंगे तो लगेगा उनकी काले रंग की ड्रेस लाल रंग के मैदान पर काले टीके सरीखी है। एक ऐसा टीका जिसे दुनिया जहान की माएं अपने बच्चों के माथे उसे दुनिया की हर बुरी नज़र से बचाए रखने को लगाती है। क्या पता अपने हर दुर्भाग्य से बचने के लिए ही इस बार ज्वेरेव ने इस काली ड्रेस का टीका लगाना सुनिश्चित किया हो।

साशा को कोई भी चीज उतनी आसानी से नहीं मिलती। इस बार का फाइनल भी ऐसा ही था। मैच पांच सेट तक खिंचा। पूरा मैच ऊपर नीचे होता रहा। कभी साशा के पक्ष में,कभी कोबोली के पक्ष में। पहले ही गेम में साशा ने कोबोली की सर्विस ब्रेक की और आसानी से पहला सेट 6-1 से जीता। तब लगा साशा आसानी से जीतने जा रहे हैं। लेकिन साशा को कोई चीज आसानी से मिल जाए तो फिर साशा,साशा कहां रह जाते। अगला सेट कोबोली ने 6-4 से जीतकर मैच में जान फूंक दी। अब बारी साशा की थी तो उन्होंने बिल्कुल उसी अंतर यानी 6-4 से जीतकर 2-1 की बढ़त ले ली। लेकिन ये बढ़त साशा की जीत सुनिश्चित नहीं करती थी। याद कीजिए  2020 का यूएस ओपन का फाइनल। डोमिनिक थिएम के विरुद्ध भी साशा  ऐसे ही  2-1 की बढ़त बना चुके थे और अंततः हार गये थे। अब संघर्ष निर्णायक मोड पर आ रहा था। चौथे सेट में किसी ने भी अपनी सर्विस नहीं खोई और सेट टाई ब्रेक में गया और बाजी कोबोली ने मारी और सेट 7-6(6-4) से जीतकर स्कोर 2-2 की बराबरी पर ला खड़ा किया। लेकिन फाइनल सेट में अचानक साशा ने गियर बदला और कमाल का खेल दिखाया।

 दरअसल कोबोली ने चौथे सेट के बाद एक ब्रेक लिया। वे यूरिनल गए। ये पांच मिनट का ब्रेक था। इसमें साशा ने अपने को पुनर्संयोजित किया। वे जिस नर्वस क्रैंप का शिकार हो गए थे,उससे अपने शरीर को मुक्त किया और फिर क्या ही लाजवाब टेनिस खेली जिसका कोबोली के पास कोई जवाब नहीं था। उन्होंने ये सेट 6-1 से जीता,और और अपनी असाध्य इच्छा पूरी की।

ज्वेरेव और कोबोली के बीच का मुकाबला केवल दो दोस्तों या दो खिलाड़ियों के बीच का मुकाबला भर नहीं था। ये दो अलग अलग  कालखंड के बीच का मुकाबला भी था।  खेल की दुनिया में लगभग प्रौढ़ होती पीढ़ी का बिल्कुल नई युवा पीढी के बीच का मुकाबला था। ये अनुभव और युवा जोश के बीच मुकाबला था। साशा लगभग 10 साल से सर्किट में थे जबकि कोबोल ने अभी सफर शुरू ही किया था।  साशा के पास ग्रैंड स्लैम के कई फाइनल खेलने का अनुभव था और कोबोली का ये पहला पहला ही  फाइनल मुकाबला था। जहां कोबोली सेमीफाइनल में बिना खेले चार दिन के आराम के बाद कोर्ट पर आए थे, वहीं साशा एक संघर्षपूर्ण मुकाबला खेलकर फाइनल में थे। लेकिन दोनों के बीच समानता ये थी कि ये सर्किट के दो सबसे शानदार सर्विस करने वाले थे।

ये मुकाबला बहुत हद तक बेहतरीन सर्विस करने और  अपने ग्राउंड स्ट्रोक्स को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने का मुकाबला था। साशा इसमें बीस साबित हुए और  जीत ने उनका वरण किया। साशा ने 80 प्रतिशत अपनी पहली सर्विस सही की और उसमें से 73 प्रतिशत पर अंक अर्जित किए। जबकि कोबोली ने केवल 53 प्रतिशत पहली सर्विस सही की और केवल 68 प्रतिशत पर अंक हासिल किए। इसका नतीजा हुआ कि उन्हें गेम जीतने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ी और अधिक ऊर्जा खर्च की। उनकी सर्विस इतनी प्रभावशाली थी कि उनके केवल दो सर्विस गेम ड्यूस में गए। और ये भी कि साशा ने अपने स्ट्रोक्स को बेहतर ढंग से खेला और कोबोली के मुकाबले आधी बेज़ा गलतियां की। यही स्कोर का और हार जीत का अंतर है।

दरअसल पुरुष टेनिस में ज्वेरेव एक ऐसी पीढ़ी के प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं जो अपनी पूर्ववर्ती सीनियर खिलाड़ियों और परवर्ती युवा खिलाड़ियों के बीच सैंडविच बन गई और टेनिस इतिहास के दाय में अपना सही हिस्सा और स्थान नहीं बना पाई। जिन उपलब्धियों के वे हकदार थे,उनसे वे वंचित रह गए।  इस खिलाड़ियों में मुख्य हैं डेनिल मेदवेदेव,डोमिनिक थिएम, सिटसिपास और खुद अलेक्जेंडर ज्वेरेव। उनसे पहली पीढ़ी की फेडरर ,नडाल और जोकोविच की त्रयी इस कदर प्रतिभाशाली और डॉमिनेंट थी कि उनकी छाया से इस पीढ़ी को उबरने का मौका नहीं मिला। फेडरर नोवाक नडाल की त्रयी इतने लंबे समय तक मैदान में प्रभावी रही कि इन खिलाड़ियों को कोई मौका मिल पाता कि अलकाराज और सिनर जैसे प्रतिभाशाली युवा खिलाड़ियों की नई पीढ़ी मैदान में आ गई। हालांकि इन दो पीढ़ियों के बीच में इस बीच की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे दो खिलाड़ी ज्वेरेव और मेदवेदेव अभी भी डटे हैं और मजबूत चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं। 

एक खेल प्रेमी,दर्शक और प्रसंशक होने के नाते आपकी सहानुभूति और समर्थन हमेशा उस खिलाड़ी के लिए होता है जिसे जीत,खिताब और ट्रॉफी की अधिक आवश्यकता होती है। कोबोली और ज्वेरेव दोनों अपने पहले ग्रैंड स्लैम खिताब के लिए खेल रहे थे। ज्वेरेव के पास समय कम था। जो था भी वो तेजी से फिसल रहा था। इसीलिए ज्वेरेव के बड़े प्रसंशक ना होते हुए भी उनकी इस जीत से एक अलग किस्म की संतुष्टि और सुकून का अनुभव हो रहा है जो अगले कुछ समय तक मन मस्तिष्क पर तारी रहने वाला है।

फिलहाल तो साशा को लंबी प्रतीक्षा और कड़ी मेहनत से मिले इस पहले ग्रैंड स्लैम खिताब की बहुत बधाई।



Monday, 26 January 2026

शाइनिंग साइना




हर उड़ान की एक मंजिल होती है। कि एक चमकीला दिन शाम में घुल जाता है। कि पूनम का चांद सूरज की आगवानी में स्वाहा होता जाता है। कि रात के जगमग सितारे सुबह के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। कि जैसे अभी जो बसंत है उसे ग्रीष्म में पिघल जाना है। कि प्रसिद्धि के आकाश में अनंत ऊंचाइयों वाली एक उड़ान अंततः पूर्ण विराम की अवस्था में आ जाती है। कि एक समय आता है जब खिलाड़ी को अंततः खेलों को अलविदा कहना ही होता है। कि उसके खेल जीवन की यवनिका का पटाक्षेप होना होता है और उसका खेल जीवन दैनंदिन जीवन में समाहित हो जाता है। जैसे कि साइना नेहवाल स्वीकारती हैं कि हां,उनके असाधारण उपलब्धियों वाले लंबे करियर का समापन हो चुका है। अभी नहीं,दो साल पहले ही।

वो साल 1990 का बसंत था। तारीख 17 मार्च । हिसार में एक लड़की जन्मती है। बसंत में जन्मी लड़की खुद बसंत हो जाना चाहती है। लेकिन दिक्कत ये है कि पितृसत्ता अपने हिस्से से अधिक पर काबिज हुआ चाहती है। उसे लड़कियों के एक हिस्से को भी अपनी शक्ति के साए में रखना है। कि उन लड़कियों की चाहतों के पंख को उनकी परवाज से पहले ही काट दिया जाता है। कि उनको जन्मने से बहुत बहुत पहले ही होम कर दिया जाता हैं।

पर हर क्रिया की समान प्रतिक्रिया होती है। दबाव जितना ज्यादा होता है उतना ही ज्यादा प्रतिरोध होता है। दुनिया की खूबसूरती ही इस बात में है कि हर एक समान नहीं है। बहुत से माता-पिता पितृसत्ता के साए में मुक्त हैं। उन्हें अपनी छोरियों और उनकी काबिलियत में तनिक संदेह नहीं होता। वे मानते हैं 'कि म्हारी छोरियां छोरों सुं कम हं के।' फिर उन्हें योग्य गुरुओं का वरदहस्त प्राप्त होता है जो उनकी योग्यता को पहचानकर उसे तराशते है। तब कई दैदीप्यमान नक्षत्रों का उदय होता है। उनमें से एक का नाम साइना नेहवाल है।

साइना अपने माता पिता की दूसरी संतान थी। उनकी एक बड़ी बहन थी। अपनी आत्मकथा में साइना लिखती हैं कि 'उनकी दादी लड़का चाहती थीं। इसीलिए जब साइना पैदा हुई, तो वे एक माह तक उन को देखने नहीं आईं।' उनके पिता हिसार में कृषि वैज्ञानिक थे। अपने पिता की पदोन्नति पर जब साइना परिवार के साथ हैदराबाद आईं,तो पितृसत्ता के प्रतिकार के लिए और खुद को साबित करने के लिए खेल चुना, जैसा कि हरियाणा की तमाम लड़कियां चुनती हैं। खेलों में उनके सामने दो विकल्प थे। या तो वे बॉक्सिंग,कुश्ती या निशानेबाजी जैसे उन खेलों खेलों में महारत हासिल करें जो सामान्यतः पुरुषों के 'हलके' माने जाते हैं या फिर पावर के इस खेल से इतर अपनी खुद की इच्छा के दूसरे खेलों के आकाश में अपने पंखों को हौसलों की उड़ान दें। 

पहले उन्होंने मार्शल आर्ट कराटे को चुना और ब्राउन बेल्ट हासिल की। लेकिन जल्द ही उस खेल को चुन लिया जिसमें उनके माता-पिता ने महारत हासिल की हुई थी। वो खेल जो उनकी नियति था। वो खेल जो बल्ले और चिड़िया का खेल था। वो खेल जिसमें चिड़िया को मन मुताबिक उड़ान दी जा सकती थी। वो खेल जो उसके सपनों की उड़ान का रूपक था। ये खेल बैडमिंटन था।


जिस समय उन्होंने बैडमिटन खेल को चुना या नियति ने इस खेल के लिए उनको चुना,उस समय उनकी उम्र आठ साल थी। और जब एक बार उन्होंने हाथ में रैकेट पकड़ा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा जब तक कि उसने प्रतिस्पर्धात्मक खेल से विदा लेकर रैकेट को रख नहीं दिया।

वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस समय जानी गईं जब साल 2008 में वे विश्व जूनियर चैंपियन बनीं। उसी साल बीजिंग ओलंपिक में बैडमिंटन के महिला एकल के क्वार्टर फाइनल में पहुंची। ऐसा करने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं। अगले ही वर्ष उन्होंने इंडोनेशिया ओपन जीतकर बीडब्ल्यूएफ सुपर सीरीज का खिताब जीतकर पहली भारतीय बनने का गौरव हासिल किया और एक साल बाद साल 2010 में वे राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन बनीं। लंदन ओलंपिक 2012 में कांस्य पदक जीतकर वे बैडमिंटन में भारत की पहली ओलंपिक पदक विजेता बनीं। साल 2015 में उन्होंने एकल बैडमिंटन रैंकिंग में विश्व नंबर 1 बनकर एक और इतिहास रचा। ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला और प्रकाश पादुकोण के बाद शिखर पर पहुंचने वाली देश की दूसरी शटलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। उसी वर्ष  बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाली देश की पहली शटलर भी बनीं। हालांकि कैरोलिना मारिन से हार कर रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा। साल 2014 उबेर कप में उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी की और अपराजित रहीं जिससे भारत को उबेर कप में पहला कांस्य पदक जीतने में मदद मिली। उन्होंने कुल मिलाकर 24 अंतर्राष्ट्रीय खिताब जीते जिसमें 10 सुपर  सीरीज खिताब हैं। 

साइना का कोर्ट कवरेज कमाल का था। वे जिस सहजता और सरलता से और ज्यामितीय गुणा भाग से शटल का अनुसरण करतीं और कोर्ट को नापतीं, वो किसी लयकारी को देखने या फिर किसी धुन को सुनने से कम ना था। वे बैक कोर्ट की उस्ताद खिलाड़ी थीं और रक्षण उनका फोर्टे। पावर और स्टेमिना उनमें अपार था और किलिंग इंस्टिक्ट कूट कूटकर भरी। जोखिम उठाना उन्होंने सीखा था। वे खेल के शुरुआती क्षणों से ही आक्रमण कर विपक्षी को हतप्रभ कर देतीं और उन पर बढ़त बना लेतीं। उनमें विपक्षी के खेल को समझकर रणनीति बनाने की कमाल की चतुराई थी। हां, नेट पर खेल में पकड़ ना होना उनके खेल को वल्नरेबल बनाता और उनकी चोटें उनकी सफलता की सबसे बड़ी बाधा बनतीं।

लेकिन उनकी असाधारण उपलब्धियां उन्हें भारत की महानतम बैडमिंटन खिलाड़ी बनाती हैं। आप कह सकते हैं कि पीवी सिंधु उनसे बड़ी खिलाड़ी हैं, क्योंकि उनकी उपलब्धियां साइना से कहीं ज्यादा हैं। उन्होंने दो ओलंपिक पदक जीते और विश्व चैंपियनशिप भी। लेकिन किसी खिलाड़ी का इतिहास में स्थान निर्धारण केवल उसकी उपलब्धियों भर से नहीं होता,बल्कि इस बात से भी होता है कि किसने खेल को और आने वाली पीढ़ी को किस तरह और कितना प्रभावित किया। उनका खेल पर इंपैक्ट कैसा और कितना था। साइना का प्रभाव उनके आंकड़ों और पदकों से कहीं अधिक व्यापक है। वह लाखों लोगों के लिए आदर्श और प्रेरणास्रोत बन गईं। 

जिस समय साइना खेल परिदृश्य पर उभरीं,उस समय पुरुषों में तो प्रकाश पादुकोण,सैयद मोदी और पुलेला गोपीचंद जैसे बड़े नाम थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियां हासिल की थीं।लेकिन महिलाओं में ऐसा कोई नाम ना था। अमी घिया या अमिता कुलकर्णी जैसे दो एक नाम थे जो लोकल सर्किट में तो बड़ा नाम थे,लेकिन उनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी पहचान ना थीं। ये वो समय था जब विश्व बैडमिंटन पर चीन का दबदबा था। चीन की दीवार खिलाड़ियों के लिए अभेद्य थी। साइना ने अपने असाधारण खेल से चीन इस अभेद्य दीवार को लांघा ही नहीं उसे ध्वस्त किया। साइना ने चीनी खिलाड़ियों की जमात के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वे बड़ी सफलताएं प्राप्त की,जो किसी भी खिलाड़ी का सपना हो सकती थीं,और उस समय तक भारतीय महिला खिलाड़ियों से लगभग असंभव दूरी पर अवस्थित थी। साइना का महत्व इस दूरी को मिटाकर असंभव को संभव बनाने में है।

दरअसल उन्होंने अपने खेल और उपलब्धियों से एक ऐसा रास्ता बनाया जिस पर चलकर आगे के खिलाड़ियों ने सफलता प्राप्त की। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने की उम्मीद की लौ भी जगाई और ये हिम्मत,हौसला और विश्वास भी भरा कि चीन की दीवार या कोई भी बाधा पार की जा सकती है,अगर आपने हौसला,जज्बा,लगन और कठिन परिश्रम करने का माद्दा है तो।

उनकी करीब करीब हर उपलब्धि से पहले लगा 'पहली'  विशेषण या फिर 'पहली भारतीय खिलाड़ी' और 'पहली भारतीय महिला खिलाड़ी' संज्ञा  बैडमिंटन खेल और भारतीय खेल परिदृश्य पर उनके इंपैक्ट की कुंजी है। वे एकमात्र भारतीय हैं जिन्होंने बीडब्ल्यूएफ के प्रत्येक प्रमुख व्यक्तिगत स्पर्धा में कम से कम एक पदक जीता है, यानी बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप,बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक पदक@। वह ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय हैं और बीडब्ल्यूएफ विश्व जूनियर चैंपियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय हैं। 2006 में नेहवाल फोर स्टार टूर्नामेंट जीतने वाली पहली भारतीय महिला और सबसे कम उम्र की एशियाई खिलाड़ी बनीं। वह सुपर सीरीज खिताब जीतने वाली पहली भारतीय भी हैं। वे राष्ट्रमंडल खेलों में दो एकल स्वर्ण पदक (2010 और 2018) जीतने वाली पहली भारतीय भी बनीं । 

भारतीय क्रिकेट टीम ने कई विश्व प्रतियोगिताएं और वर्ल्ड कप जीते हैं, लेकिन जो प्रभाव और महत्व 1983 के विश्व कप जीतने का है, वैसा किसी और का नहीं। यही बात साइना के साथ है। साइना जैसा महत्व और इंपैक्ट किसी और का कहां। 

2012 के लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर और खेल जगत से परे जाकर सुपर स्टारडम हासिल करके भारत में बैडमिंटन को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने साबित किया कि भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय खेलों के उच्चतम स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं और जीत हासिल कर सकती हैं। उनकी सफलता ने पीवी सिंधु सहित भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों की एक पूरी पीढ़ी को पेशेवर रूप से इस खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

दरअसल वे पी टी उषा के बाद भारतीय खेल जगत की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली आईकन हैं। जिस तरह से 1984 के बाद पीटी उषा हर घर का जाना पहचाना नाम बन गई थी,ठीक उसी तरह से 2012 के बाद साइना नेहवाल भी। उन्होंने साबित किया कि 'छोरी छोरी स कम ना सै'।

साइना के खेल खेल मैदान से सक्रिय अनुपस्थिति भारतीय  बैडमिंटन में एक ऐसा निर्वात बनाती है जिसकी भरपाई अगर असंभव नहीं तो बहुत बहुत कठिन जरूर है। 

खेल मैदान से विदा साइना।

Saturday, 1 November 2025

कुछ सपने देर से पूरे होते हैं,पर होते हैं।

 


ये खेल सत्र मानो कुछ खिलाड़ियों की दीर्घावधि से लंबित पड़ी अधूरी इच्छाओं के पूर्ण होने का सत्र है। 

कुछ सपने देर से पूरे होते हैं,पर होते हैं।

याद कीजिए विराट कोहली को। उनके पास सब कुछ था। अगर कुछ नहीं था तो एक अदद आईपीएल ट्रॉफी नहीं थी। 2025 का सीजन आया और रॉयल चैलेंजर बेंगलुरु ने आईपीएल जीत लिया। एक अधूरी साध पूरी हुई।

35 साल के सुरजीत नरवाल के पास भी क्या कुछ नहीं था। देश के सबसे बेहतरीन डिफेंडर में उनका नाम था। दो एशियाई गोल्ड मेडल थे। इससे पहले प्रो कबड्डी के नौ सत्र वे खेल चुके थे। आंकड़ों के हिसाब से दूसरे सबसे बेहतरीन डिफेंडर। फजल अत्रिचल के बाद सबसे ज्यादा टैकल प्वाइंट। पांच सौ का आंकड़ा छूते हुए। इस दौरान पुनेरी पलटन और बेंगलुरु बुल्स के कप्तान भी रहे।

लेकिन इतना होने के बावजूद अगर उनके पास कुछ नहीं था तो नौ सीजन खेलने के बावजूद कोई खिताब उनके नाम नहीं था। यहां तक कि कोई फाइनल भी उन्हें नसीब ना हुआ।

तब साल 2025 का प्रो कबड्डी का 12वां सत्र आया। दबंग दिल्ली से जुड़े और एक अपूर्ण इच्छा पूर्णता में बदल गई। एक सपना साकार हुआ। एक खिताब उनके माथे सजा। एक ट्रॉफी उनके हाथ सजी। एक ट्रॉफी को उनके होठों ने स्पर्श किया।

आज फाइनल में दबंग दिल्ली ने एक रोमांचक मैच में पुनेरी पलटन को 30-28 अंकों से परास्त कर अपना दूसरा खिताब जीता और टीम ने इस खिताब को सुरजीत को समर्पित कर दिया।

सुरजीत विशेषज्ञ राइट कवर डिफेंडर हैं और अपनी आक्रामकता और अग्रिम टैकल के लिए जाने जाते हैं। डैश उनका सिग्नेचर मूव है जिसमें वे निर्णायक तरीके से रेडर को कोर्ट से बाहर धकेल कर आउट कर देते हैं। वे लीग के सबसे शानदार रक्षात्मक खिलाड़ियों में से एक हैं। वे अब तक 34 हाई फाइव और 26 सुपर टैकल कर चुके हैं।

कुछ सपने देर से पूरे होते हैं,पर होते हैं।

सुरजीत को पहला खिताब मुबारक और दबंग दिल्ली को अपना दूसरा।

Friday, 31 October 2025

महिला विश्व कप सेमीफाइनल



आखिर आप अपने बल्ले से क्या संदेश देना चाहते हैं। ये आप पर निर्भर करता है कि आप अपने बल्ले को बंदूक समझें या वायलिन। आप उसे मृत्यु और घृणा का शस्त्र बना दें या जीवन और खुशी का साज।

इससे खूबसूरत और स्वीट रिवेंज क्या हो सकता था जो आज भारतीय बालाओं ने डी वाई पाटिल मैदान पर ऑस्ट्रेलियन टीम से लिया। अभी 12अक्टूबर की ही बात तो थी भारतीय टीम के 330 रनों के लगभग असंभव से लक्ष्य को ऑस्ट्रेलियाई टीम ने भेद कर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था। 

और आज भारतीय टीम उसी ऑस्ट्रेलियाई टीम द्वारा दिए गए 338 रनों के लक्ष्य को पार कर नया रिकॉर्ड बना रही थीं।

वेलडन जेमिमा।

वेलडन टीम इंडिया।

फाइनल के लिए ढेरों शुभकामनाएं।



Saturday, 20 September 2025


थलेटिक्स सभी खेलों का मूल है। उसकी तमाम स्पर्धाएं दर्शकों को रोमांच और आनंद से भर देती हैं। कुछ कम तो कुछ ज्यादा। और कहीं उसकी किसी स्पर्धा को कोई असाधारण साधक मिल जाए तो वो स्पर्धा दर्शकों को अनिर्वचनीय आनन्द से भर देती है। मसलन पोल वोल्ट स्पर्धा को जब आर्मंड गुस्ताव  'मोंडो' डुप्लांटिस जैसा साधक मिल जाए तो क्या ही कहा जा सकता है। केवल एथलेटिक्स ही नहीं बल्कि खेलों में रुचि रखने वाला हर खेल प्रेमी इस बात से सहमत होगा कि डुप्लांटिस पोल वोल्ट के अद्भुत साधक हैं। एक असाधारण एथलीट। वे अपनी काबिलियत से जब जब अपनी स्पर्धा को छू भर देते हैं,तो स्वतः ही श्रेष्ठता के नए मानदंड स्थापित होने लगते हैं।


सा ही कुछ बीते सोमवार टोक्यो में घटित हो रहा था। वे टोक्यो के नेशनल स्टेडियम में आयोजित विश्व एथलेटिक्स प्रतियोगिता की पोल वोल्ट स्पर्धा में 6.30 मीटर ऊंची छलांग लगाकर कुल 14वीं बार और साल 2025 का अपना चौथा विश्व रिकॉर्ड बेहतर बनाकर एक अनोखे काम को अंजाम दे रहे थे। इस दफ़ा उनके बार की ऊंचाई पिछली दफ़ा से एक सेंटीमीटर अधिक थी। 

र कमाल ये कि इस कारनामे के सम्मान में बिल्कुल ऐसा ही वाकअ टोक्यो से हजारों मील दूर स्वीडन के शहर अवेस्ता में घट रहा था। इस शहर के लोगों ने भी 14वीं बार नगर के डाला हॉर्स चौक पर स्थापित पोल वोल्ट बार को थोड़ा और ऊंचा किया। एक सेंटीमीटर ऊंचा। दरअसल ये दुनिया के महानतम और सर्वश्रेष्ठ पोल वॉल्टर डुप्लांटिस का उनकी मां के गृहनगर अवेस्ता के निवासियों द्वारा अपने चहेते  पोल वॉल्टर के सम्मान का अनोखा तरीका था।


 ये साल 2020 था। उस साल तोरुन पोलैंड में आयोजित यूरोपियन इनडोर प्रतियोगिता में डुप्लांटिस ने पहली बार 6.17 मीटर पार कर इस स्पर्धा का नया रिकॉर्ड बनाया था। उस समय तक अवेस्ता नगर के निवासियों ने तय किया कि वे अपनी विश्व प्रसिद्ध 11 मीटर ऊंची काष्ठ की डाला घोड़े की मूर्ति वाले चौक पर एक पोल वोल्ट बार स्थापित करेंगे जिसकी ऊंचाई डुप्लांटिस के रिकॉर्ड के बराबर होगी। उसके बाद वे जब भी अपने विश्व रिकॉर्ड को बेहतर करते हैं,डाला घोड़े वाले इस चौक पर स्थापित इस पोल वोल्ट बार की ऊंचाई उतनी ही बढ़ती जाती है, जितना डुप्लांटिस रिकॉर्ड की बढ़ोतरी करते हैं।

2020 में रेनॉड लैविल्लेनी का 6.16 मीटर के पुराने रिकॉर्ड को तोड़ने के बाद से, मोंडो ने 14 बार विश्व रिकॉर्ड को बेहतर ही नहीं किया बल्कि उन्होंने 49 प्रतियोगिताओं में लगातार जीत हासिल की है और अजेय रहे हैं। उन्होंने लगातार इनडोर और आउटडोर चैंपियनशिप में लगातार आठ वैश्विक खिताब जीते। वह दो बार के ओलंपिक चैंपियन, तीन बार के विश्व आउटडोर चैंपियन और तीन बार के विश्व इनडोर चैंपियन हैं। डुप्लांटिस इतिहास के उन गिने-चुने एथलीटों में से एक हैं जिन्होंने युवा, जूनियर और सीनियर स्तर पर विश्व चैंपियनशिप खिताब जीते हैं। वे अभी केवल 25 वर्ष के हैं और अविश्वसनीय तरीके से जीत रहे हैं तथा विश्व रिकॉर्ड बना रहे हैं। 

रअसल पोल वोल्ट का नशा उनकी रगों में बह रहा था। सन 1999 में अमेरिका के लुइसियाना प्रांत के लाफ़ायेत शहर में जन्मे डुप्लांटिस के पिता ग्रेग डुप्लांटिस पूर्व पोल वॉल्टर हैं जिनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 5.80 मीटर है, जबकि उनकी  माँ हेलेना हेप्टाथलीट और वॉलीबॉल खिलाड़ी हैं।

नकी असाधारण सफलता का श्रेय उनके माता पिता को जाता है, जो उनके कोच भी हैं। डुप्लांटिस स्प्रिंट रेसर हैं और सौ मीटर के धावक भी। उनके कोच माता पिता ने डुप्लांटिस की गति को तकनीक से लैस किया। दरअसल गति डुप्लांटिस का सबसे बड़ा हथियार है। जिस प्रयास में उन्होंने टोक्यो में पिछले रविवार 6.30 मीटर का विश्व रिकॉर्ड बनाया उस प्रयास में जमीन छोड़ने से ठीक पहले उनकी गति 22 मील प्रति घंटा थी। इसके अलावा वे अपेक्षाकृत कम लचीले पोल का प्रयोग करते हैं ताकि वे कुछ अतिरिक्त उछल पा सकें। ऐसा माना जाता है उनकी इस सफलता के पीछे प्यूमा शू कंपनी द्वारा खास उनके लिए डिजाइन किए जूते  'द क्ला' भी एक कारक हैं।

र डुप्लांटिस पोल वोल्ट यानी बांस कूद के अकेले साधक नहीं हैं। पोल वोल्ट का कोई भी इतिहास सर्गेई बुबका का उल्लेख किए बिना पूरा नहीं हो सकता। दरअसल पोल वोल्ट का समूचा इतिहास इन्हीं दो पोल वॉल्टर के कारनामों का रोमांचक और उत्तेजक इतिहास भर है। एक से इस स्पर्धा का इतिहास शुरू होता है और दूसरे पर आकर ठहर जाता है। एक इसका अतीत,दूसरा वर्तमान।


र्गेई बुबका का जन्म सन 1963 में यूक्रेन के शहर लुहांस्क में हुआ। यूं तो वे स्प्रिंट रेसर और लांग जंपर भी थे लेकिन उन्हें चैंपियन एथलीट बनाया पोल वोल्ट ने। ये साल 1983 था, जब केवल 19 साल की उम्र में हेलसिंकी फिनलैंड में आयोजित विश्व एथलेटिक्स प्रतियोगिता में उन्होंने पोल वोल्ट का स्वर्ण पदक जीता। इस जीत के साथ वे प्रसिद्धि के ऐसे रथ पर सवार हुए जिसे कभी ना रुकना था ना थकना।

न्होंने अपना पहला विश्व रिकॉर्ड 1984 में चेकोस्लोवाकिया के शहर ब्रातिस्लावा में बनाया जब उन्होंने 5.85 मीटर की ऊंचाई पार की। वे लगातार 6 बार विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप के विजेता रहे। 1985 में छह मीटर और फिर 1991 में 20 फीट (6.10 मीटर) पार करने वाले वे पहले पोल वॉल्टर थे। उन्होंने अपने करियर में कुल 35 बार विश्व रिकॉर्ड को बेहतर किया। उनके द्वारा 1993 में बनाया गया 6.15 मीटर का इनडोर और 1994 में 6.14 मीटर का आउटडोर रिकॉर्ड उस समय तक अजेय रहा जब तक कि रेनॉड लैविल्लेनी ने फरवरी 2014 में 6.16 मीटर पार कर तोड़ नहीं दिया।

लेकिन अपनी तमाम प्रतिभा के बावजूद चार प्रयासों में केवल एक ओलंपिक स्वर्ण पदक जीत सके 1988 के सियोल ओलंपिक में। 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक के सोवियत बहिष्कार के कारण के कारण वे ओलंपिक में भाग नहीं ले सके जबकि वे उस समय विश्व रिकॉर्डधारी थे। 1992 के बार्सिलोना ओलंपिक में वे आश्चर्यजनक रूप से 5.70 मीटर की छलांग लगाने में असफल रहे। 1996 के अटलांटा ओलंपिक में एड़ी की चोट के कारण हटना पड़ा। और अंततः 2000 के सिडनी ओलंपिक में  पुनः 5.70 मीटर की छलांग लगाने के तीन असफल प्रयास के बाद क्वालीफाई नहीं कर सके। नियति का विधान कुछ ऐसा ही रचा गया।

बुबका ने सन 2001 में जब सक्रिय खेल जीवन से विदा ली हुए तो उस समय उनकी उपलब्धियों में छह विश्व चैम्पियनशिप खिताब, चार विश्व इंडोर चैम्पियनशिप खिताब, यूरोपीय चैम्पियनशिप में एक स्वर्ण और यूरोपीय इंडोर चैम्पियनशिप में एक अन्य स्वर्ण पदक शामिल थे।

खिर उनकी इस असाधारण सफलता का राज क्या था। वे पोल को सामान्यतः पकड़े जाने वाले स्थान से कहीं अधिक ऊपर से पकड़ते थे। ये तकनीक उन्हें अतिरिक्त लाभ पहुंचाती। लेकिन ये तभी संभव हो सकता है जब खिलाड़ी में शक्ति,गति और शरीर में लचीलापन हो और बुबका में कमाल की गति,ताकत और किसी जिम्नास्ट सरीखा लचीलापन था। इतना ही नहीं बुबका को एक ऐसा गुरु मिला जिन्होंने उनकी क्षमता और योग्यता को तराश कर उन्हें कोहिनूर हीरा सरीखा बना दिया। ये गुरु थे विताली पेत्रोव। वो असाधारण कोच थे जिन्होंने सर्गेई बुबका, येलेना इसिनबायेवा और ग्यूसेप गिबिलिस्को जैसे दिग्गज पोल वॉल्टर्स को प्रशिक्षित किया था। ये तीनों विश्व चैंपियन थे और पहले दो ने ना केवल ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते बल्कि विश्व रिकॉर्ड भी स्थापित किए ।

2001 में संन्यास लेते समय बुबका ने अपने संबोधन में कहा था "कभी-कभी, जब मैं अपने किए पर विचार करता हूं, तो मुझे लगता है कि मैंने एथलेटिक्स के इतिहास में योगदान दिया है।" ये ना तो आत्म श्लाघा थी और ना अतिशयोक्ति। ये वक्तव्य एक यथार्थ था। निःसंदेह बुबका ने मानवीय क्षमता के नए प्रतिमान गढ़े थे।

लेकिन प्रतिमान रूढ़ नहीं होते। देश काल के साथ साथ बदलते जाते हैं। बुबका द्वारा बनाए गए प्रतिमानों को ध्वस्त होना था और वे हुए। एक समय लगता था बुबका अजेय हैं। लेकिन फिर आए डुप्लांटिस।

बुबका ने शुरुआत 5.85 मीटर से की और उसे  6.14 तक लेकर आए। उन्होंने रिकॉर्ड को कुल मिलाकर 29 सेंटीमीटर बेहतर किया। डुप्लांटिस 6.17 मीटर को  6.30 मीटर तक ले आए हैं। अभी तक 13 सेंटीमीटर बेहतर कर चुके हैं।

तो यक्ष प्रश्न यही कि बुबका की विरासत को डुप्लांटिस कहां तक ले जायेंगे। डुप्लांटिस की प्रतिभा कहने को मजबूर करती है आकाश को छू लेने की कोशिश करते डुप्लांटिस के लिए इस खेल में 'आकाश ही सीमा' है।

पोल वोल्ट के इतिहास के सर्गेई बुबका और अर्मांडा डुप्लांटिस दो ऐसे नक्षत्र हैं जिनकी प्रतिभा और हैरतअंगेज कारनामों की चमक से बाकी की चमक फीकी पड़ जाती है। आकाश नापने के इनके प्रयासों की गाथा में बाकी सभी पोल वॉल्टर उस गाथा में उन दो से छूटे स्पेस और अंतरालों को भरने के निमित्त मात्र हैं।


जसपाल राणा:लक्ष्य जो नहीं उन्हें नहीं चुकना था

  बहुत बार लिखे से बहुत बहुत ज्यादा गंभीर और महत्वपूर्ण बात छायाकार के कैमरे की आँख से पकड़ा गया कोई एक लम्हा या कोई एक फ्रेम बोल देता है। वे...