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Friday, 31 January 2025

देहरादून 'द सिटी ऑफ लव'



 गर इक अरसा बीत जाने के बाद भी इक छूटे शहर की सुबहें आपको याद आएं और वे आपके कांधे बैठ हौले हौले मुस्कुराएं,गर उस शहर की दोपहरें बेचैन करने लगें और उन दोपहरों की धूप आपके साथ खिलखिलाए,गर उस शहर की शामें आपको सुकून से भर देती हों और आपके साथ हाथ में हाथ डालकर जब तब चहलकदमी करने  लगती हो तो समझना चाहिए कि आप उस शहर के इश्क़ में थे। 

शहर छूटने के बहुत बहुत दिन बाद भी उसकी सड़कें आवारागर्दी करने को आवाजें देती हो, उसकी गलियां विस्मय से भर देती हों और अपने साथ चहलकदमी करने को बुलाती हो,उस शहर के बाजारों की आवाजें कानों में रस घोलती सी लगती हों,तो समझिए कि अभी भी शहर के इश्क़ में हैं।

उस शहर का कोई एक दिन उसे छोड़ देने के बाद भी ताज़गी से भर देता हो और कोई रात मन को आर्द्र कर जाती हो,गर उसकी बारिशें रोमान से भर देती हों और सरसराती हवाएं कानों में संगीत सी घुलती जाती हों,गर उस शहर की रोशनी आपकी खुशियों की चमक बढ़ा देती हो और उस शहर के अंधेरे आपके दुखों के छिपने की पनाहगाह बन जाते हों तो यकीन करना ही होता है कि आप अब भी शहर की मोहब्बत की गिरफ्त में हैं।

अब जिस समय एक छूटे हुए शहर इलाहाबाद में आए जन सैलाब की खबरें आ रही हैं,मन में यादों का एक और सैलाब आया हुआ है। पर यादों का ये सैलाब इलाहाबाद की ओर से नहीं,छूटे शहर देहरादून की ओर से आया है। एक ऐसा सैलाब जो मन को लगातार अतीत में धकेले जा रहा है।

कुछ शहरों के बारे में आपको उन शहरों में रहते हुए नहीं,उसके छूट जाने के बाद पता चलता है कि वे आपके भीतर किस कदर धंस गए थे और आप उनके भीतर। दरअसल वे एक दूजे के भीतर इतने चुपके से प्रवेश करते हैं कि अहसास ही नहीं होने पाता। और फिर छूटने के क्रम में कितना कुछ कोई शहर हमारे साथ हो लेता है और कितना कुछ अपना हम उस शहर के हवाले कर आते हैं।

और शहर छूटने कितने कितने ही दिनों बाद जब किसी एक दिन आप खुद को ढूंढते हैं,तब पता चलता है कि 'कितना आप' तो आपके के पास हैं ही नहीं। 'कितना आप' उस शहर में छूट गए हो। और अब कितना कुछ ऐसा है जो उस शहर का आपके भीतर भीतर चला आया है। उस 'छूटे आप' से बने रिक्त को भरने के लिए। तब पता चलता है कि आप कदर उस शहर की मोहब्बत में गिरफ्त में थे।

साल बीत जाने पर भी 'इश्क़ का शहर देहरादून' ऐसे ही यादों पर सवार हो आता है। आखिर भला वो कौन कमबख्त होता होगा जो इस शहर की मोहब्बत में ना पड़ जाता होगा। पांच साल का वक़्फ़ा भले ही बहुत ज्यादा ना होता हो पर इतना जरूर होता है कि आप उस शहर में जीने लगें। उस शहर को जीने लगें।

देहरादून 'द सिटी ऑफ लव' के दो रूप मन और दिमाग पर अभी भी तारी हैं। एक, सुकून से भर भर देने वाला आम,लीची और बासमती की खुशबू से महकता गमकता खूबसूरत शहर। दूजा, बेजा बोझ और उसके दबाव से जूझता शहर।


पहली बार ये शहर किसी सुकोमल, कमनीय राजकुमार सा लगा था। एक ऐसा शहर जिसे मौसम की मार से बचाने के लिए चारों ओर पहाड़ियों ने दुशाला ओढ़ा रखा है। एक शहर जिसे   घनी धूप से बचाने को गहरी हरियाली ने उसके सिर पर छावा कर दिया हो। जिसके शीश पर मसूरी मुकुट सी शोभायमान होती। मानो धान के हरे खेत उसके लिबास  बन जाते और रसीले आप और लीची उस लिबास पर टंके सितारे। राजपुर सड़क गले में पड़े हार सी तो रिस्पना उसकी कमर पर लटकी करधनी और वे एलीट संस्थाएं मसलन भारतीय सैन्य अकादमी, फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, डील, सर्वे कार्यालय उसके गले में शोभते तमगे।


लेकिन कुछ तो ऐसा है इस शहर में कि तमाम कमियों के बावजूद इससे मोहब्बत कम नहीं होती बल्कि बढ़ती जाती है। निश्चय ही इस पर ईश्वर की नेमत है। तभी तो गुरु रामराय ने इस धरती को अपना डेरा बनाया होगा। इसके चारों और की पहाड़ियों पर स्थानीय महासू देवता का निवास है। बारिशों के बाद इन पहाड़ियों के नीले रंग को देखिए तो लगेगा कि इसके वाशिंदों के गलतियों के विष को पीकर इतनी तो नेमत बख्श ही दी है कि इस जगह से आदमी को मोहब्बत हो जाए।

और फिर क्या ही खूबसूरत विडंबना है कि दो एक दूसरे से एकदम विपरीत एहसासों के द्वैत में जीता है ये शहर। प्रेम और युद्ध के द्वैत में। ये द्वैत कितने शहरों के हिस्से आता होगा।  

 इस शहर का विशेषण है 'सिटी ऑफ लव' यानी मोहब्बत का शहर। कैसे और क्योंकर मिला होगा इस शहर को ये नाम। शायद इसीलिए ना कि ये इतना खूबसूरत है कि हर कोई इसके प्रेम में पड़ जाता होगा। सच है ना। और प्रेम के इसी शहर में सैन्य विद्या का दुनिया का सबसे मकबूल संस्थान है भारतीय सैन्य अकादमी। जो नौजवान स्नातकों को युद्ध विद्या और युद्ध रणनीति में निष्णात करता है। इस शहर के हर कोने में सैनिकों का वास है। इस शहर में ही प्रीमियर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान है। इस शहर में ही युद्ध में गोरखा वीरता का अमर स्मारक ' खलंगा युद्ध स्मारक' है और यहीं पर 'वार मेमोरियल' भी है। और इसी शहर में कलिंग युद्ध से बेजार हुए शांति और प्रेम के अमर शासक अशोक का कलसी स्तंभ भी है। प्रेम और युद्ध दो विपरीत भावों के साथ जीता कोई और शहर कहां मिलेगा।

और फिर शहर में एक दिल भी तो धड़कता है। आखिर इंसान तो इसी में रहते हैं और शहर उन्हीं में तो जीता है। ये जो इस शहर को मोहब्बत के शहर का तमगा मिला है उन्हीं के कारण है। वे प्रेम से भरे हैं। आत्मीयता से भरे हैं। उल्लास और उत्साह से भरे हैं। वे अब भी इस शहर में विश्वास करते हैं और इससे प्यार करते हैं। वे ही उसमें जान फूंकते हैं। वे ही उसकी प्राण वायु हैं। उसकी धड़कन हैं। सच तो ये है कि ये शहर शरीर से कितना भी जर्जर हो जाए, आत्मा तो ज़िंदादिल बनी रहेगी क्योंकि इसके रहवासी जो जिंदादिल है।

शहर भी कोई बेजान शय तो नहीं। ये भी तो वैसे ही जीता है जैसे आदमी। उसी तरह सांसे लेता है और अपना जीवन जीता है। ये भी जवां होता है, बूढ़ा होता है और मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। नहीं तो क्या वजह हो सकती है कि बीती सदी के नब्बे के दशक वाला एक खूबसूरत राजकुमार सा शहर अगली सदी के दो दशक बाद ही हांफता खांसता अधेड़ सा लगने लगता है। समय के साथ कितना बदल जाता है शहर कि तीस बरस के अंतराल पर एक ही शहर दो शहर से लगने लगते हैं। कितने मुख्तलिफ। कितने अजनबी। एक दूसरे से कितने अलहदा। 

क्या ही दुख भरी दास्तां है इस शहर की कि तीस साल बाद जब उस शहर से दूसरी मुलाकात हुई तो एक ऐसा उदास,विकल और अपने ही बोझ से झुका सा हांफता सा नजर आया । क्या ही दुख है कि एक खूबसूरत,स्वप्न सरीखा शहर कैसे धीरे धीरे अपनी मृत्यु की और बढ़ रहा था।

एक शहर जिसे कुदरत ने बेइंतहा प्राकृतिक सौंदर्य की नेमतों से बक्शा हो,उसे उसी कुदरत के सबसे स्वार्थी नुमाइंदे मनुष्य ने कुरूप बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।  इस शहर के विकास के लिए जिस खास सौंदर्य बोध की जरूरत थी वैसा शायद ही किसी नगर नियोजक व्यक्ति या संस्था के पास  रहा हो। नहीं तो क्या ही कारण रहा कि अनियमित और अनियंत्रित अनियोजित रूप से विकसित होती कालोनियां इसकी खूबसूरती के बदनुमा दाग   बन गईं।

निर्मल जल से भरी नहरों और नदियों वाले इस शहर को बजबजाते नालों वाले शहर में तब्दील होना मानो इस शहर की नियति में था। नहरें सड़कों में तब्दील हो गईं और खूबसूरत नदियां बिंदाल और रिस्पना गंदे नालों में।

इस शहर की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस शहर में एक दो नहीं बल्कि आधा दर्जन प्रीमियर और विश्व प्रसिद्धि संस्थाएं प्रकृति और पृथ्वी का अध्ययन करने और उसके संरक्षण के लिए हो, वहां प्रकृति का सबसे निर्दयता और निर्ममता से दोहन किया जा रहा है। इन संस्थानों में वन अनुसंधान संस्थान,भारतीय वन्य जीव संस्थान,राष्ट्रीय वन अकादमी,वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान  शुमार हैं। इन सब के होने के बावजूद विकास के नाम पर जिस तरह से वनों और पेड़ों का कटान हो रहा है और नगर के प्राकृतिक सौंदर्य को नष्ट किया जा रहा है,इससे दुखद और क्या बात हो सकता है। सहस्त्रधारा रोड पर चौड़ीकरण के नाम पर हजारों पेड़ काट दिए गए हैं। एक्सप्रेस वे के नाम पर दो सौ साल तक के पुराने और बहुमूल्य सागौन के पेड़ काट डाले गए और अब अभी हाल में खलंगा क्षेत्र में हजारों पेड़ काटने की योजना। दरअसल पेड़ों का ये कटान शहर के सौंदर्य भर को नष्ट कर देना बाहर नहीं है बल्कि उसकी आबोहवा को दूषित कर देना और सांस लेने को और दुष्कर कर देना भी है। ये एक शहर के लिबास को उतार कर उसे अनावृत कर देना है।

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इस शहर को तिल तिल मरते देख एक बार फिर तो ज्ञानरंजन याद आते हैं और उनका कथन याद आता है कि 'बाज शहर अपनी मृत्यु में भी खूबसूरत हो सकता है।' देहरादून एक ऐसा ही शहर है। जो अपनी मृत्यु के बाद भी खूबसूरत ही रहेगा।

Sunday, 21 April 2019

ये महासू की धरती है



ये महासू की धरती है

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देहरादून आए एक माह से ज़्यादा बीत चुका है ।लेकिन एक खास किस्म का खालीपन अभी भी मन में पसरा पड़ा है। जब भी किसी एक जगह से विस्थापित होकर दूसरी जगह स्थापित होते हैं तो आपको अपने लिए जगह बनाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती है। आपको अपने लिए एक स्पेस क्रिएट करना होता है। ये स्पेस आपको यूं ही सहजता से नहीं मिल जाता। लोग आपको या तो स्पेस देते नहीं हैं या फिर देते हैं तो इतना कम कि वो खाँचा आपके लिए बहुत छोटा है। उसमें आप फिट नहीं हो पाते। अपनी काबिलियत से,मेहनत से अपने लायक स्पेस बनाना पड़ता हैं ।आपको खुद को साबित करना पड़ता है। तब जाकर आपकी उपस्तिथि दर्ज होती है। इसीलिए किसी भी नई जगह बनाने में एक लंबा अरसा बीत जाता है। आप हमेशा संघर्षरत रहते हैं। समय कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता।आप एक भराव में रहते हैं हमेशा।

     पर दून की बात कुछ और है। यहां स्पेस की कोई समस्या ही नहीं है। स्पेस लोगों के दिलों में भी और बाहर भी खूब है। लोग कुछ और जगहों की तरह तंग दिल जो नहीं हैं।
यहां लोग आपको आपकी क़ाबिलियत से ज़्यादा स्पेस देते हैं। खुद उनके दिलों में जो स्पेस है। दरअसल वे प्रकृति पुत्र हैं। उन्होंने देना सीखा है और खूब खूब देना सीखा है।अब ये आपके ऊपर है जो ज़्यादा स्पेस मिला है तो उसको आपको खुद कैसे भरना है। ये शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बसा शहर है। चारों और पहाड़ियां हैं। वे अक्सर धूसर रंग की दिखाई  देती हैं। ऐसा महसूस होता है मानो इन पहाड़ों पर पड़ने वाली शुभ्र बर्फ पिघलकर यहां के लोगों के मन को साफ कर निष्कलुष कर देती है और बदले में मन की सारी कलुषता सोख कर खुद को धूसर कर लेती है। क्या ही संयोग है कि ये शिवालिक पहाड़ियां महासु (महाशिव) का निवास स्थल है और ये बात शायद उसी परंपरा से आती है। ठीक वैसे ही जैसे शिव दुनिया को बचाने के लिए विष पी लेते हैं और नीलकंठी हो जाते हैं।
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देहरादून प्रवास डायरी_एक






Thursday, 14 March 2019

अलविदा शहरे मोहब्बत।

                      


एक शहर का यादों का समंदर हो जाना
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   13 और 14 मार्च के मध्य की रात्रि है ये। गाड़ी नं. 14163,संगम एक्सप्रेस इलाहाबाद से यात्रियों को मेरठ की ओर लिए जा रही है। रात्रि का एक बजा है। रेलगाड़ी अँधेरे का सीना चीर बढ़ी चली जा रही है। अधिकांश लोग सो रहे हैं। लेकिन एच 1 बोगी की सीट नं 9 पर मैं  केवल और केवल करवटें बदल रहा हूँ। नींद आँखों से कोसों दूर है। नींद शायद इन आँखों को अभी भी वहीं कहीं ढूंढ रही होगी जहाँ बरसों बरस से रहती आई है। उसे शायद ये इल्म ही ना हुआ हो कि जिन आँखों में उसे रैन बसेरा करना है वे अब  कहीं दूर निकल गई हैं। या फिर इल्म हो भी तो तो ये सोच कर वहीं रुक गई हो कि आज की रात वहां उसके लिए कोई जगह ही ना हो क्यूंकि आज की रात तो उनमें पानी को ही जगह जो कम पड़ जानी है। उफ्फ ये कितना पानी साथ चला आया है कि पानी से आँख भर भर जाती हैं। और ट्रेन है कि दौड़ी दौड़ी जाती है। ये रेलगाड़ी आखिर इतनी तेजी से क्यूँ दौड़ी चली जाती है।  क्या इसलिए कि इस बार का जाना वापस आने के लिए नहीं है?
                          तन जितना इस शहर से दूर भागा जा रहा है, मन उतना ही उस शहर की ओर लौट लौट जाता है। उस महबूब शहर की ओर जिसमें ज़िंदगी के सबसे महत्वपूर्ण 35 साल बिताए। वो शहर जिसमें यौवन की दहलीज़ पर आमद हुई। एक ऐसा शहर जिसमें गाँव का अल्हड़पन तो था ही, पर शहर की नफासत भी मिली थी । वो शहर होने भर को शहर था। शांत  ठहरा सा शहर।  बस शहर होने के एहसास भर से संतुष्ट शहर। ऐसा शहर जिसमें आगे बढ़ने की जल्दबाज़ी ना थी। वो शहर जो बहुत बहुत मखमली सा था और कुछ कुछ खुरदुरा सा भी।  वो शहर जो हम में रच बस गया और वो शहर जिसमें हम  रच बस गए। वो शहर जिसकी गली कूँचों में हमारी कितनी ही यादें बिखरी पड़ी हैं और हमारी यादों में उसके  गली कूँचे। वो शहर जिसमें  हम जिए। वो शहर जिसे हमने जिया। वो शहर जिसमें हमने ख्वाबों को देखना सीखा, जिसमें ख्वाब देखे और उन ख्वाबों के लिए कुछ करने गुज़रने की सलाहियत पाई। वो शहर जिसमें क ख ग सीखा पढ़ाई का भी और ज़िन्दगी का भी।
                                रेलगाड़ी दौड़ी चली जा रही है।  खिड़की के शीशे से पर्दा हटा है। बाहर कुछ ख़ास नहीं दिखाई दे रहा है। बस दरख्त साये से पीछे भागे जा रहे हैं। दिमाग में विचार भी उसी तरह भागे जा रहे हैं। यादें अतीत में गहरे और गहरे उतराना चाहती हैं। अब रेलगाड़ी धीमी हो चली है। शायद कोई शहर आने वाला है। पटरी के समानांतर लैंप पोस्ट का सिलसिला शुरू हो गया है। उनसे मंद मंद उदास सा प्रकाश फ़ैल रहा है। लगता है उदासी मन के सूनेपन से सहमकर बाहर आ गयी है और सब जगह व्याप गयी है। मन को थोड़ा सुकून मिलता है। इस उदास रात में कुछ  तो अपना सा है।  जिस तरह से हम किसी शहर के लिए उदास होते हैं तो क्या वे भी किसी के उसे छोड़ देने से मायूस होते होंगे। उसके गली कूंचे भी उदास होते होंगे। उस शहर की वे जगहें विछोह महसूसती होंगी। खालीपन के अहसास से तो ना भर जाती होंगी।
                               रेलगाड़ी ने फिर गति पकड़ ली है। एक और स्टेशन पीछे छूट गया है। दिल की धड़कनें फिर बढ़ने लगती हैं। मन कुछ और बेचैन हो उठता  है। महबूब शहर पीछे और पीछे छूटता जाता है। पर जितना ये शहर छूटता जाता है उससे कहीं ज़्यादा फिर फिर मन में बसता जाता है। दिल में यादों के निशान कुछ और गहरे होते जाते हैं। छूटने और फिर फिर बसने का ये सिलसिला अनवरत चलता जाता है। और इन दो विरुद्धों में सामंजस्य बैठाते हुए नए गंतव्य के लिए मन तैयार हो रहा होता है।  बिलकुल इस महबूब शहर की तरह जिसकी मूल प्रवृति ही विरुद्धों के सामंजस्य की है। जिसका अस्तित्व ही विरोधी भावों के मेलजोल पर टिका है और जो दो विपरीत धाराओं से मिल कर गतिमान होता है। उसका इतिहास और भूगोल बना ही इस सामंजस्य से है।

                                     अब देखिए ना प्रकृति ने उसे कुछ ऐसी ही नेमत से बख़्शा है। ये जगह ही ऐसी है जहां  विपरीत प्रकृति वाली दो  नदियाँ इसकी उत्तरी और दक्षिणी सीमाएं बनाती हैं और फिर मिलकर पूरब में बह निकलती हैं। अथाह जलराशि लिए धीर गंभीर यमुना दक्षिण में बहती है। शायद इसका स्याह रंग उसकी गहराई से ही बनता है और उसकी अथाह जलराशि का प्रतीक भी बनता है। तो उत्तर से होती हुई गंगा आती है। अपेक्षाकृत कम गहराई और कम जलराशि लेकिन विस्तार लिए। इसका विस्तीर्ण बहाव ही इसे शुभ्र रंग प्रदान करता है। विधि ने ही जब इस स्थान के लिए ऐसा विधान रचा तो मानव ही पीछे क्यों रहता। उसने शहर को ही दो भागों में बाँट दिया। सीमा बनी रेल लाइन। इसके दक्षिण का शहर पुराना और उत्तर का नया। दक्षिण वाला हिस्सा यमुना की तरह सघन और अधिक जनसंख्या वाला और उत्तर गंगा की तरह कम जनसंख्या वाला  और विरल बसावट वाला । दक्षिण यहाँ के स्थायी और मूल निवासियों का हिस्सा तो उत्तर आस पास के शहरों से आए आप्रवासियों का हिस्सा। एक स्थानीय विशेषताओं और संस्कृति का वाहक तो दूसरा आयातित विशेषताओं से भरा पूरा। एक पुरातन संस्कृति पर गर्वोन्नत होता हुआ तो एक आधुनिक भावबोध पर इतराता हुआ। एक गली कूंचो में मंथर गति से चलता तो दूसरा चौड़ी सडकों पर दौड़ता। एक पुराने घर चौबारों में बसता तो दूसरा बड़े बड़े बंगलों में रहता। एक ठहरा ठहरा सा तो दूसरा बहता बहता सा। एक मस्त मौला सा तो दूसरा उद्विग्न  अधीर अधीर सा। भूगोल की ये दो चौहद्दी एक इलाहाबाद बनाती हैं।
                                 फिर भूगोल अपना इतिहास भी अपनी तरह ही रचता है। अगर ये वत्स महाजनपद के शासकों की साम्राज्यवादी भौतिक लिप्साओं की स्थली रहा तो बुद्ध और महावीर की तपस्थली और धर्म प्रचार का केंद्र भी रहा। ये जगह अवन्ति और वत्स महाजनपदों के बीच संघर्ष की हुंकार और टंकार के कोलाहल से आक्रान्त हुई तो उदयन और वासवदत्ता के प्रेम संगीत से भीग भीग भी गयी। ऐन उस जगह जहां चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन सांसारिक इच्छाओं से विरक्त होकर अपना सर्वस्व दान कर देता था,बादशाह अकबर अपनी साम्राज्यवादी लालसाओं को पूरा करने के लिए क़िले का निर्माण करता है और अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए किलेबंदी करता है। जहां अलाउद्दीन खिलज़ी गद्दी के लालच में अपने चाचा की ह्त्या कर धोखे और षड़यंत्र के कारनामे को अंजाम देता है ,शहज़ादा खुसरू  प्रेम की खातिर जान देने का आदर्श स्थापित किया चाहता है। क्या ही कमाल है जिस जगह ब्रिटिश साम्राज्ञी ईस्ट इण्डिया कंपनी से देश का शासन अपने हाथ लेकर अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए इसे राजधानी बनाती है उसी जगह को देश की आज़ादी के लिए क्रांतिकारी देशभक्त अपना केंद्र बनाते हैं। ये ही वो शहर है जहां परिमल संस्था और प्रगतिवादी टकराते और रगड़ खाते श्रेष्ठ हिंदी साहित्य रचते हैं।
                              ये जितना लफ़्फ़ाज़ों,बकैतों,भौकालों का शहर है उतना ही संजीदा लोगों का भी। जितना बमबाज़ों का उतना ही कलमबाज़ों का। ना जाने किस जगह फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलती अधुनातन नवयौवना के साथ खांटी भोजपुरी बोलने वाला  युवा डेट करता मिल जाए। ना जाने कब आप चौड़ी चौड़ी साफ सुथरी सड़कों पर से गुजरते हुए पतली गलियों की भूल भुलैया में जा पहुंचे और कब जाने कंधे से कंधे टकराती और दम रोक देने वाली गलियों से निकल कर नीले आसमान के नीचे हरे भरे खुले वातावरण में सांस लेने लगे। कब आपकी आंखों के सामने भैसों के मस्त झूमते काफिले के ठीक पीछे विश्व के बड़े ब्रांडों की मोटर कारों के झुंड द्वारा रास्ता देने की याचना के लिए हॉर्न बजने का दृश्य नमूदार हो जाए। और फिर शहर का पॉश इलाका सिविल लाइंस तो स्वयं ही बड़े बड़े शानदार बंगलों के बीच बीच में सगरपेशा लोगों की झोपडपट्टियों के  साथ विकास की विसंगतियों का सबसे बड़ा विज्ञापन सा प्रस्तुत होता ही है।
                             अगर यहां के मूल वाशिंदे इस शहर की आत्मा हैं तो आसपास के इलाकों से लेकर दूर दराज के इलाकों से आए लोग इस शहर का दिल दिमाग हैं। ये शहर जितना स्थानीय कारोबारी और व्यापारी बनाते हैं उतना ही बाहर से आए सरकारी मुलाज़िम सजाते सवाँरते हैं। ये शहर जितना यहां के माननीय जजों और काले कोट में सजे एडवोकेट्स का है उतना ही बाहर से आए हैरान परेशान मुवक्किलों का भी है। ये शहर जितनी गृहस्थों की कर्म भूमि है उतनी ही बाहर से आए विद्यार्थियों की तपस्थली भी है। जितने लहकट इस शहर की आन है उतने ही मेधावी शहर की शान हैं।सेठ साहूकारों की अट्टालिकाएं शहर को वैभव प्रदान करती हैं तो मध्य प्रदेश,पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आये मज़दूरों की श्रम शक्ति उस वैभव का आधार बनती है। ये इस शहर में ही संभव होता है कि एक कान से आपको वैभव के अट्टहास सुनाई दे और दूसरे कान से मजबूरी की सिसकियां। एक ही साथ आपको सजा संवरा वैभव और शानों शौकत इठलाता इतराता मिलेगा तो पीठ पर नमक के दाग सजाए मानवीय श्रम की गरिमा चहलकदमी करते हुए भी मिलेगी।
                                         दरअसल ये बहुस्तरीय जीवन और संवेदनाओं का शहर है। शहर के जीवन की ये परतें अपने अस्तित्व के लिए अनेक स्तरों पर सहभाग करती हैं, टकराती हैं और आगे बढ़ती हैं। ये परतें एक दूसरे से अलहदा भी होती हैं और एक दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण भी करती हैं। अब यहां के विद्यार्थी जीवन को ही देखिए ना। यहां बड़ी संख्या में बाहर से विद्यार्थी आते हैं और यहां के समाज का अभिन्न अंग बन जाते हैं। पर फांके स्पष्ट दीख पड़ती हैं। एक ओर वे स्थानीय समाज को अर्थवृति के साधन मुहैय्या कराते हैं तो  दूसरी और उनमें अक्सर हितों का टकराव भी होता है। इलाहाबाद के छात्र समुदाय की  अपनी एक अलग पहचान है। वे एक इकाई के रूप में स्पष्टतः अलग दीख पड़ते हैं। लेकिन ये इकाई भी बहुस्तरीय है। उसके अपने खाँचें हैं,परतें हैं,अंतर्विरोध हैं।ये वर्टिकल भी हैं और होरिजेंटल भी। यहां भी ठीक समाज की तरह छात्रों का स्तरीकरण होता है। सबसे बड़ा विभाजन हॉस्टल और डेलीगेसी का।निसंदेह होस्टलर इलीट और डेलीगेसी वाले मास। फिर यूनिवर्सिटी होस्टल वाले ऊपर और ट्रस्ट होस्टल वाले नीचे। लेकिन बात दबंगई की हो तो ट्रस्ट वाले बहुत ऊपर। इसी तरह डेलीगेसी वालों के भी स्तरीकरण के कई खांचे। कुछ विश्वविद्यालय के आस पास रहने वाले ज़्यादा खुशकिस्मत और शहर के बाहरी इलाकों और कछारी मोहल्लों में रहने वाले दोयम दर्जे वाले। खांचे और भी हैं। जातीय चेतना वाले भी,क्षेत्रीय चेतना वाले भी,भाषाई चेतना वाले भी और सबसे ऊपर वर्गीय चेतना वाले तो हैं ही। पर एक बात सबमें कॉमन। कमरे हॉस्टल के हों या डेलीगेसी के ,बड़े बड़े सपने उसके इनमेट की आखों से निकलकर कमरे के कोने कोने में समाए होते हैं और इन सपनों की चमक उनसे निकलकर दूर दराज़ के गांव गिराव में रहने वाले मां बाप,भाई बहनों और कुछ की पत्नियों की आंखों तक पहुंचती है। ये सपने इनमेट के कम और उसके घर परिवार वालों के ज़्यादा करीब होने लगते हैं। गांव और छोटे छोटे कस्बों के खुले वातावरण से आकर दबड़ेनुमा कमरों की कैद में जब उनका दम घुटने लगता है तो शहर के तमाम बाजारों की रौनकें उनकी बदरंग कैद  भरी ज़िन्दगी में कुछ रंग भर देती है तो बहुत से किताबों  की दुनिया के भीतर जाकर उसके असीमित अनोखे संसार में अपने सपनों को उड़ान देने की कोशिश करते। कुछ के सपने पूरे होकर आसमान में सितारे से टंक जाते कुछ के पूरे तो होते हैं पर आधे अधूरे जो सड़क के लैंपपोस्ट,लालटेन या फिर दिए से टिमटिमाते रह जाते। लेकिन ऐसे भी कम लोग नहीं होते जिनके सपनों के चिराग जल ही नहीं पाते और शोक के करुण संगीत में बदल जाते। कुछ तो इससे भी आगे जाकर सल्फास की गोली या चादर के फंदों तक पहुँच जाते और अनंत में विलीन हो जाते।
               दिमाग में शहर की भोगी,जानी, समझी छवियों के असंख्य कोलाज बन मिट रहे हैं। कभी मुस्कान से होंठ फैल जाते हैं तो कभी आंख नम होने लगती हैं। आंखों की इस कोर से उस कोर तक फैले पानी में उन यार दोस्तों के प्रतिबिम्ब तैर रहे हैं जो इन 35 सालों के हासिल है। वे यार दोस्त जिनके होने से ज़िन्दगी है। वे जो अब यार दोस्त ना होकर विस्तारित परिवार का हिस्सा हैं। वे लोग जिन्होंने 35 सालों के रहवास में रंग भरे,खुशियों का सबब बने और मुसीबतों में साथ खड़े रहे। ज़िन्दगी के अद्भुत रंगों वाले इस शहर ने ज़िन्दगी को विविध रंगों से भर भर दिया है।दिल की ज़मीन पर इस शहर की यादों की एक ऐसी अमिट पगडंडी बन गयी है जो समय के किसी भी झंझावात से धुँधला नहीं सकती।
                    अलविदा इलाहाबाद!
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एक शहर को अलविदा कहना ज़िंदगी को अलविदा कहने जैसा क्यूँ है !

Tuesday, 30 October 2018

आखिर नाम में ही तो सब कुछ है


आखिर नाम में ही तो सब कुछ है 
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किसी जगह का नाम बदलना मेरे लिए किसी बड़ी परिघटना की तरह नहीं होता था। ऐसा होना महज़ शब्द भण्डार में एक और संज्ञा का बढ़ जाना भर था या फिर सामान्य ज्ञान में एक और सवाल का बढ़ जाना भर। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते वक़्त बहुत सारी जगहों के पुराने-नए नाम याद किया करते थे। आखिर किसी जगह के नाम बदलने की परम्परा नयी नहीं थी। देश में ही नहीं विदेशों में भी। तमाम शहरों और जगहों के नाम बदले। क्या फर्क पड़ा। सिवाय इसके कि आपके सामान्य ज्ञान में एक और शब्द का इजाफा हुआ कि बम्बई अब मुंबई हो गया या फिर मद्रास चेन्नई। यहां तक कि जब मुग़लसराय दीन दयाल उपाध्याय नगर हुआ तब भी ये बदलाव महज एक नाम का बदलाव भर था।
                           लेकिन अब जब इस महबूब शहर का नाम बदल गया है। 'इलाहाबाद' जब 'प्रयागराज' हो गया है,तो ऐसा क्यूँ नहीं लगता कि ये भी एक शहर के नाम का सिर्फ एक  बदलाव भर है। निसंदेह प्रयागराज सुन्दर नाम है। बहुत से लोग पहले भी इस नाम का प्रयोग करते रहे हैं। तो क्या फर्क है किसी और जगह के  और इस शहर के नाम बदल जाने में। 
                            दरअसल ये फ़र्क़ जगह का है। जिन जगहों पर आप जीते हैं और जिन जगहों को आप जीते हैं,उन जगहों के नाम बदलने पर फ़र्क़ महसूस होता है और खूब होता है। ये वो जगहें होती हैं जिनमें आप रचे बसे होते हैं और वे आप में रची बसी होती हैं। उन जगहों की पहचान उनके नाम होते हैं और उन जगहों की तरह वे नाम भी आपके भीतर तक गहरे पैठे होते हैं। और इन्हें नयी पहचान देना निसंदेह दुष्कर होता है।
                      जिन जगहों को मैंने शिद्दत से जिया,उनमें से तीन ऐसी जगहें थीं जिनके नाम बदले। पहला मेरा गांव।सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज नाम 'सुंदरा उर्फ़ पूठा'। जो 'पूठा' के नाम से जाना जाता है और बोलचाल में 'पुट्ठा'।किसी भी गाँव की तरह आम गाँव। कच्चे पक्के घर। बड़े बड़े घेर और उसमें ढेर सारे डंगर। ऐसा गांव जिसकी अलमस्त सुबहें खेत दिशा जाती महिलाओं की बातों की गुनगुनाहट,खेत जाते बैलों और हलों की सरसराहट,हाथ में तख्ती और पट्टी लिए बच्चों की खिलखिलाहट और उससे मेल खाती चिड़ियों की चहचहाअट से गुलज़ार रहती। उनींदी सी अलसाई दोपहरें जिसमें नीम के पेड़ों तले बैठे ताश खेलते बेफिक्र किसानों की आवाज़ों की खनखनाहट खलल डालती। सुरमई शामें खुद किसानों के गले से या फिर ट्रांजिस्टर से बजती रागनियों से महकती। और निस्तब्ध नीरव रातें दादुर की टरटराहट,झींगुरों की भनभनाहट और सियारों के रुदन से बेचैन होती और रह रह कर डंगरों के गले में बंधी घंटियों की आवाजों से गमकती।लेकिन जल्द ही विकास की आंधी सब कुछ बहा ले गयी।नाम भी और पहचान भी।शहर सुरसा के मुख की तरह विस्तारित हुआ और आस पास के गॉवों को ग्रसता गया। शहर ने गॉव को चारों और से घेर लिया। उसका जीवन रस चूस लिया। और गला घोंट दिया। ज़मीनों के बदले लोगों को मुआवज़ा मिला। अब घर दबड़ों में बदल गए। हल,बैल और ट्रैक्टरों की जगह मोटर साइकिलों और कारों ने ले ली। अब सुबहें और दोपहरें वाहनों और उनके हॉर्न की चीखों के शोर से आहत होने लगीं तो शामें और रातें रागनियों की जगह आवारा कुत्तों के भोंकने और शराबियों की गालियों से कराहने लगीं।गाँव को नयी पहचान मिली 'वेदव्यास पुरी'।पर आज भी उसकी पहचान 'पुट्ठा'से ही होती है और दिल भी 'वेदव्यास पुरी' में 'पुट्ठा' ही ढूंढता है।
दूसरी जगह एटा जिले की तहसील कासगंज। इसमें कभी रहा नहीं। फिर भी जीवन का अभिन्न हिस्सा। यहां सैकड़ों बार खेलने गया।क्रिकेट पहला प्यार। यही जगह इस प्यार के अलगाव की वजह बनी। कैच पकड़ते समय सीधे हाथ की माध्यिका में चोट लगी।वो उँगली आज भी कुछ टेढी है।क्रिकेट छूट गया और कासगंज याद रह गया। ये जलीस भाई की वजह से भी याद है। उस समय वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज़ों का खौफ हुआ करता था और एटा के क्रिकेट सर्किल में जलीस भाई का।कहते हैं जलीस उस समय के राष्ट्रीय गेंदबाजों जितनी तेज गेंद  फेंकते थे।वे यू पी टीम के प्रबल दावेदार थे।पर उनका कोई माई बाप नहीं था।चयन नहीं हो पाया।उनकी गेंद पर बल्ले के किनारे से लगकर थर्ड मैन और और गली के ऊपर से कई बार छक्के लगते देखे थे और कई बार खुद भी उनकी गेंदों को कान के पास से सरसराते हुए गुज़रते देखा था। उस कहर बरपाती तेज गेंदबाजी का खौफ आज भी दिमाग पर तारी है।भले ही वेस्ट इंडीज़ की पेस बैटरी का खौफ ना देखा हो पर जलीस की गेंदबाजी के उस खौफ से उसका अंदाज़ लगाना मुश्किल भी नहीं। उसके बहुत बाद भी एटा से फरीदपुर जाते हुए कासगंज की सडकों से ही गुज़रते थे।आज भी स्मृतियों में वो शहर कासगंज के नाम से अंकित है। उसका बदला नाम अभी गूगल से जाना काशीराम नगर।
 और अब इलाहाबाद। सपनों का, ख़्वाबों का, सपनों को देखने का और उन्हें हक़ीक़त में बदलने का जो शहर था उसका नाम इलाहाबाद ही था प्रयाग नहीं।जिस सपनीले शहर को सबसे पहले किशोरावस्था में धर्मवीर भारती की नज़र से देखा था वो शहर इलाहाबाद ही था।जिस शहर में ज़िन्दगी के 35 सबसे अहम साल जिए और जिस शहर को 35 साल जिया वो कोई और नहीं इलाहाबाद ही था । 25 पैसे प्रति घंटे की किराए की साइकिल से जिस शहर की तमाम गलियों को दिन रात गहाते हुए मन पर स्मृतियों  की जो अमिट पगडंडी बनी है उस शहर का नाम कुछ और नहीं इलाहाबाद ही है। जिस शहर ने जीवन को जीने की सलाहियत दी और सलाहियत से जीवन जीने दिया वो इलाहाबाद ही है। वो शहर जो आपके दुःख दर्द,सुख दुःख का भागीदार रहा हो,वो शहर जिसने आपको मनुष्य बनने की प्रक्रिया में रत किया हो,वो शहर जिसने मुहब्बत करनी सिखाई हो,वो शहर जिसने आपको आजीविका दी हो,वो शहर जिसमें आपका एक खूबसूरत परिवार बना हो,वो शहर जिसने आपको बेपनाह मोहब्बत करने वाले दोस्त दिए हों,वो शहर इलाहाबाद ही है। गर वो शहर आपकी रग रग ना बस जाता तो क्या होता। उस शहर की पहचान आपके भीतर कहीं गहरे ना पैठ जाती तो क्या होता। 
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अर्से पहले मुझे भी शेक्सपियर की जूलियट की तरह लगता था कि 'नाम में क्या रखा है'। पर अब नहीं। बनिस्बत अब शायर अनजान का गीत याद आता है 'प्यार कागज़ पे लिखी कहानी नहीं'।दरअसल किसी शहर का नाम दस्तावेज़ों में दर्ज़ एक निर्जीव शब्द भर नहीं कि जब चाहो बदल दो बल्कि शहर में जीने वालों और शहर को जीने वालों की संवेदनाओं और संवेगों के रस में पगी सजीव संज्ञा है।  
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बिला शक प्रयागराज एक खूबसूरत नाम है। उसे चाहने वालों को शहर का ये नया नाम मुबारक और हमें अपना !



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