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Wednesday, 26 May 2021

ये उदासियों का मौसम है

 



लगभग महीने भर बाद फिर दफ्तर जाना शुरू हो गया है। मेरे साथ साथ मां और बेटी की रिपोर्ट भी नेगेटिव आयी है। दिल में सुकून है। लेकिन ये सुकून खुशी से आवृत ना होकर भय,आशंका और संत्रास घिरा है। 

ऐसे समय में जब हमारे चारों ओर अपनों के साथ लाखों लोग जीवन राग के सुरों को साधने का अनथक प्रयास कर रहे हों,उस प्रयास में उनकी सांसे छूट रही हों,उनमें से बहुत सारे लोगों ने इस जीवन राग को साधते साधते मृत्यु राग को साध लिया हो और जब जीवन राग की मधुरता मृत्यु राग की कर्कशता में दबी जाती हो,तो आपका सुकून किसी खुशी का वाहक हो भी कैसे सकता है। 

ये मई का उत्तरार्द्ध है। सामान्य दिनों में ये समय अधिक ऊष्मा,ऊर्जा और उजास से भरा होता है। दिन का उजास कुछ ज्यादा लंबा होता है। उजास कुछ जल्द आता है और शाम को देर तक ठहरता है। अंधेरा कुछ कम समय का होता है। मई की इस ऊर्जा को,इस ऊष्मा को तमाम चीजें अपने अपने ढंग से बढ़ाती हैं। इन तमाम चीजों में खेल,खिलाड़ी और मैदान भी शामिल होते हैं। तमाम खेल मैदानों में खिलाड़ियों का कौशल और उनका संघर्ष इस गरम मौसम को अतिरिक्त उष्मा देता है।

ये ही वो समय होता है जब मोंटे कार्ले,मेड्रिड और रोम के मिट्टी के मैदानों पर दुनिया भर के टेनिस दिग्गज अपने तरकश के तीरों की आजमाइश कर रहे होते हैं और अपने दूसरे हथियारों को भी परख रहे होते हैं कि जिनसे उन्हें लाल मिट्टी के अजेय योद्धा राफा को परास्त करना है। पर रोलां गैरों तक आते आते उनके वे सारे हथियार भोथरे पड़ जाते और वे खेत रहते। लोग राफा के जादू पर विस्मित होते जाते। पर इस बार कहां इसकी सुध है कि माटी की सतह पर एक और प्रतिद्वंदिता जन्म ले रही है और  मेड्रिड में ज्वेरेव ने राफा को हरा दिया है। कहाँ इस बात को जान पाए कि रोम में राफा ने ज्वेरेव को हरा दिया है और फिर फाइनल में एक और क्लासिक मैच में राफा ने जोकोविक को हरा दिया है। कि रोम जीत कर राफा रोलां गैरो के अजेय किले को बचाने निकल पड़ा है। कहां इस बार जानने की मन में उत्कंठा है कि रोलां गैरों में इस बार क्या होगा। कि पीट सम्प्रास ने कुल 14 ग्रैंड स्लैम जीते हैं और इस बार अगर राफा रोलां गैरों में जीत जाता है तो वो केवल इस मैदान पर ही उसकी बराबरी कर लेगा। ऐसा कोई विचार अब कहाँ आपको उत्तेजना से भर पाता है कि ग्रैंड स्लैम की जीत की प्रतिस्पर्धा और कितना आगे जाएगी। कि कौन सार्वकालिक महानतम खिलाड़ी है-फेडरर,जोकोविच या फिर राफेल नडाल। अब ऐसी कोई बहस कहां आपमें उत्तेजना ला पाती है। दुख से सीले मन को सुखाने की वो ऊष्मा इस खेल में इस बार कहां है।



यही वो समय है जब इस गर्म मौसम को एनबीए के प्ले ऑफ मुकाबले भी अतिरिक्त ऊष्मा प्रदान कर रहे होते हैं। सामान्य दिनों में आपकी रुचि होती है कि पिछली बार खिताब जीतने वाली टीम इस बार भी पिछला प्रदर्शन बरकरार रख पाएगी या फिर कोई पुरानी टीम ये खिताब जीतेगी या फिर कोई टीम छुपी रुस्तम साबित होगी। इस बार कौन जानना चाहता है कि अपने पावर प्ले से लेब्रोन जेम्स कौन से रिकॉर्ड ध्वस्त कर रहा है या फिर स्टीफेन करी अपने 3 पॉइंटर से कौन सी कविता रच रहा है। कौन इस बात से हतप्रभ हो रहा होगा कि  पिछली चैंपियन टोरंटो रप्टर्स की टीम इस बार प्ले ऑफ में भी जगह नहीं बना पाई है। कि हज़ारों मौत के मातम से मुरझाए मन को खिलाने की ताकत इस खेल में इस बार कहां है।

इस समय यूरोप की तमाम फुटबॉल लीग अपने चैंपियन तय करने की जद्दोजहद में गर्मी पैदा कर रही होती हैं। प्रीमियर लीग हो या ला लीगा, बुंदेस लीगा हो या सीरी ए और लीग वन, जोरदार संघर्ष और बेहतरीन खेल की गर्मी सभी उत्सर्जित करती हैं। दुनिया भर की फुटबॉल सेलेब्रिटी पैरों के जादू से लोगों में मदहोशी भर रहे होते हैं। फिर चाहे    बार्सिलोना का मेस्सी हो या जुवेंतस का सीआर 07,बेयर्न म्यूनिख का लेवेंदोसकी हो या चेल्सी का जोरजिन्हो हो,रियाल मेड्रिड का टोनी क्रूस हो या मैनचेस्टर सिटी का रुबेन डियास। पर इस बार कौन जानना चाहता है कि मेस्सी का जादू अभी भी बरकरार है और 21 ला लीगा मैचों में 23 गोल किए हैं या कौन रिकार्ड्स में रुचि रखने वाला अपनी रिकॉर्ड बुक में नोट कर रहा होगा कि इस बार अभी तक 40 गोल करके लेवेंदोसकी ने गर्ड म्युलर के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है। कौन जानना चाहेगा कि पेप गार्डियोला ने कौन सी रणनीति से मैनचेस्टर सिटी को पांचवी बार प्रिमीयर लीग का चैंपियन बनाया या एंटोनियो कोंते ने इंटर मिलान को कैसे सीरी ए का चैंपियन बनाया या 29 गोल करने के बाद भी सीआर 07  जुवेंतस को सीरी ए का चैंपियन नहीं बना पाया। इस खेल की तमाम गतिविधियों में मृत्यु की आशंका से डरे मन को आश्वस्त करने की ऊष्मा इस बार कहां है।

ये समय इंडियन प्रीमियर लीग का भी है जो तमाम क्रिकेट प्रेमियों को ऊर्जस्वित करने का काम करती है और मौसम में अतिरिक्त गर्मी पैदा करती है। भले ही ये खेल से ज़्यादा मनोरंजन का सबब बन गयी हो,लोगों की दिलचस्पी चौकों और छक्कों को देखने में और नए चैंपियन को जानने की जिज्ञासा से गर्मी तो बनी ही रहती है। पर इस बार दुख की मार वो खुद ही कहाँ झेल पाई और औंधे मुँह जा गिरी है।



दरअसल इस बार अलग मौसम है इस जहान का। ये उदासियों से घिरा है,ग़मों से सहमा है,आंसुओं से गीला है। इस बार के मौसम में ऊष्मा नहीं है। आसमान से बादल बरस रहे हैं और धरती पर मौत। शरीर ठंडे मौसम से सहम रहे हैं और आत्मा दर्द और ग़मों से करहाते लोगों की चीत्कारों से। 

क्या ही विडंबना है कि हम जितना आगे बढ़ते हैं उतना ही पीछे जाते हैं। जितना सभ्य होते जाते हैं उतना ही असभ्य भी होते जाते हैं। जितना श्लील बनने का प्रयास करते हैं उससे ज़्यादा अश्लील होते जाते हैं। नहीं तो कोई कारण नहीं था कि उन जगहों पर जहां हज़ारों हज़ार लोग काल कवलित हो रहे हों,जहां ज़िंदगी और मृत्यु के बीच संघर्ष चल रहा हो,वहां स्टेडियम की चारदीवारी के भीतर खेल हो रहे हों। जब दिल्ली,मुम्बई,अहमदाबाद और चेन्नई सबसे ज़्यादा हाहाकार मचा था उस समय बीसीसीआई और दुनिया भर के क्रिकेटर देश के लिए नहीं बल्कि पैसों के लिए मनोरंजन कर रहे थे। पिछली बार उनमें इतनी शर्मो हया तो बाकी थी कि विदेश चले गए। इस बार तो वे लाशों के बीच तांडव कर रहे थे। वे खुद को खुदा समझने लगे थे। उन्होंने बायो बबल बनाया था। उनका मानना था उन्हें कुछ नहीं हो सकता। दरअसल जब तक खुद पर नहीं आ पड़ती तब तक दूसरों के दर्द का अहसास नहीं होता। उन्हें भी नहीं हुआ। लेकिन जब उन पर आ पड़ी तो दुम दबाकर भाग खड़े हुए।

खेल हमेशा मनुष्यता के पक्ष में खड़े होते हैं। कितने उदाहरण हैं जब खेल पीड़ितों के पक्ष में खड़ा हुआ। खुद क्रिकेट और क्रिकेटर भी। फुटबॉलर सादियो माने को याद कीजिए। वे अपने अपनी कमाई अपने शहर के लोगों की भलाई में खर्च कर देते हैं। फुटबॉलर मार्कस रशफोर्ड को याद कीजिये जिसने ब्रिटेन के 13 लाख गरीब बच्चों के पक्ष में अभियान चलाकर ब्रिटिश सरकार को घुटनों के बल ला दिया। पिछला अमेरिकन ओपन याद कीजिए जिसमें चैंपियन ओसाका नोआमी ने अमेरिका के अश्वेतों के विरुद्ध हिंसा के विरोध में हर मैच में एक पीड़ित के नाम का मास्क लगाकर हिंसा का विरोध किया। वेस्टइंडीज और इंग्लैंड के बीच खेले जाने मैच को याद कीजिए जिसमें खिलाड़ियों ने घुटनों के बल बैठ कर 'ब्लैक लाइव्स मैटर्स' अभियान का समर्थन किया। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले गए उस टेस्ट मैच को याद कीजिए जिसमें ऑस्ट्रेलिया टीम ने दिल के असाध्य रोग से पीड़ित बच्चे आर्ची शिलर की इच्छा पूर्ण करने के लिए उसे बाकायदा 12वां खिलाड़ी और मानद सह कप्तान बनाया। वे तमाम मौके याद कीजिए ज़ब दुःख की किसी घड़ी में खिलाड़ी काली पट्टी बांधकर खेले। ऐसा कुछ भी आईपीएल में हुआ क्या। नहीं हुआ। इसलिए नहीं हुआ कि ये खेल नहीं व्यापार है। जो लोग इसे अभी भी खेल समझते हैं वे या तो हद से ज़्यादा भोले हैं या फिर नासमझ। 

कहना सिर्फ इतना है कि इस बार गर्मी के मौसम  में  खेलों में भी वो ताब है ही नहीं कि मौसम में या लोगों के दिलों में अतिरिक्त उष्मा भर दें। दरअसल इस बार मौसम खुद ही उदास उदास सा है। सूरज हर सुबह उष्माविहीन उदासी लिए उगता है और थका मांदा सा छिप जाता है तो हवा कुछ बैचैन सी, भागी दौड़ी सी,हेराइ सी लगती है और आसमाँ है कि दुख से गीला हो बरसता जाता है।

ये उदासियों का मौसम है,बेबसी का मौसम है,बेचैनियों का मौसम है। 

और हमें इंतज़ार है उल्लास,उमंग,ऊर्जा और उष्मा से भरे उस पहले वाले मौसम का जिसमें खेल हममें अतिरिक्त उत्साह का संचार  करते थे और हम खुशियों से, रोमांच से,हार-जीत के आवेगों से सराबोर रहते थे। 

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काश वे दिन जल्दी लौट आते।

Wednesday, 21 April 2021

कुंभ मेला:हरिद्वार और प्रयाग



             कुम्भ मेला विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला ही नहीं है बल्कि हिंदुओं की धार्मिक परम्पराओं का,उनकी धार्मिक आस्थाओं का और उनके धार्मिक विश्वासों का सबसे बड़ा शाहकार भी है। इतना ही नहीं ये उनकी इस जीवन के पार पारलौकिक दुनिया के बारे में विश्वासों और धारणाओं के अतिरेक का प्रमाण भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो इतनी बड़ी संख्या में लोग तमाम असुविधाओं,परेशानियों,यहां तक की जीवन के जोखिम को उठाकर भी अपने इस जीवन के साथ साथ परलोक को भी साधने के लिए इसमें भाग लेने क्यों आते!

           दरअसल इस मेले में एक अजब सा आकर्षण है जिससे वशीभूत हो दुनिया के कोने कोने से लोग खिंचे चले आते है। वे भी जिनकी इसमें आस्था है और वे भी जिनकी कोई आस्था नहीं है। चार स्थानों पर लगने वाले ये कुम्भ मेले अपने उद्भव और अंतर्वस्तु में समान हैं। समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश वाली कथा,अखाड़े,उनकी शोभा यात्राएं,पेशवाई,शाही स्नान,भजन कीर्तन,प्रवचन,लाखों श्रद्धालु, साधु संत और श्रद्धा व आस्था की बहती अबाध  धारा। इन चारों स्थानों के मेलों का तो पता नहीं पर क्या ही कमाल है कि प्रयाग और हरिद्वार के मेले एक जैसी अंतर्वस्तु और धार्मिक भावना से अनुस्यूत होने के बावजूद अपनी प्रकृति और चरित्र में कितने भिन्न हैं!

        हरिद्वार में मानव ने गंगा के प्राकृतिक बहाव को अवरुद्ध कर उस को बांधने का प्रयास किया। उसकी एक धारा को मोड़कर अपने अनुसार दिशा दी और उसके किनारों को ईंट,पत्थर और सीमेंट से बांधकर उसे नियंत्रित करने का प्रयास किया। नाम दिया 'हर की पैड़ी'। वहां गंगा का बहाव बहुत तीव्र है। उस वेग से जो ध्वनि वहां गूंजती है उससे सिहरन पैदा होती है। ऐसा लगता है मानो इस बंधन से गंगा  नाराज हैं, उद्विग्न हैं। इस बंधन से मुक्ति के लिए वेग से वहां से निकल जाना चाहती हैं। वहां पूरे वातावरण में एक अंतर्निहित गतिशीलता है। पूरा वातावरण ही गतिशील है। यहां सिर्फ गंगा ही गतिशील नहीं हैं बल्कि गंगा भक्त भी उतने ही गतिशील लगते हैं। यहां स्नानार्थी भी एक तरह की जल्दी में लगते हैं। कोई ठहराव नहीं है। उन्हें जल्द से जल्द स्नान पुण्य अर्जित कर शीघ्रातिशीघ्र वापस जाना है।

              इसके उलट प्रयाग में देखिए। वहां गंगा बिना किसी बंधन या रुकावट के अपने प्राकृतिक बहाव में हैं। वहां गंगा शांत चित्त लगती हैं,बेहद सुकून में,मंद मंद गति से अपनी मस्ती में बहती हुई। इसीलिए वहां के माहौल में गति नहीं है गतिहीनता की स्थिति है,एक ठहराव है। वहां गंगा भक्तों में भी कोई हड़बड़ी या जल्दबाजी नहीं दीखती। वे ठहर जाना चाहते है और ठहरते भी हैं। शायद यही कारण है कि एक माह के कल्पवास का प्रावधान केवल यहीं है। ये एक माह का कल्पवास इस ठहराव का सबसे बड़ा वक्तव्य है। प्रयाग में भक्त अपनी भागती दौड़ती ज़िन्दगी में भी यहां आकर ठहर जाते हैं।



            हरिद्वार में सारे निर्माण स्थायी हैं। पक्के घाट हैं। यहां भरपूर चकाचौंध है। यहां रंग बिरंगा प्रकाश है। ये रोशनी यहां अंधेरा खत्म करने से कहीं ज़्यादा सजावट के लिए है। कुल मिलाकर पूरा माहौल एक प्रकार की कृत्रिमता लिए हुए है। प्रगति का ,आधुनिकता का सूचक है और यहां के माहौल की अंतर्निहित गतिशीलता को और गति प्रदान करता है।

            इसके उलट आप प्रयाग को देखिए। यहां के मेला क्षेत्र का कोई भी निर्माण पक्का या स्थायी है ही नहीं। यहां तक कि मुख्य स्नान घाट संगम नोज भी हर बार अपना स्थान बदल लेता है। हरिद्वार में हर जगह ईंट और पत्थर हैं और उसकी कठोरता है तो प्रयाग में हर और रेत ही रेत है और उसकी कोमलता है,सहजता है सरलता है। यहां के घाटों पर रेत की बोरिया हैं और पुआल है। ये सब यहां की ठहराव के ही अनुरूप है और वातावरण को और अधिक गतिहीन करता है।

           दरअसल हरिद्वार और प्रयाग के कुम्भ का अंतर पश्चिम और पूरब का अंतर है,आधुनिकता और पररम्परा का अंतर है,शहरी और ग्रामीण संस्कृति का अंतर है। हरिद्वार में धार्मिकता अंतर्निहित होते हुए भी मनोरंजन और देशाटन की भावना प्रमुख है और प्रयाग में मनोरंजन और देशाटन की भावना अंतर्निहित होते हुए भी धार्मिक भावना प्रधान है।

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एक ही कथा से उद्भूत और एक जैसी अन्तर्वस्तु लिए दो जगह लगने वाला एक ही मेला भूगोल और इतिहास के चलते अपनी प्रकृति में कितने अलग लगने लगता है!


हरिद्वार कुम्भ_2021


कल यानी 14 तारीख को बैसाखी के अवसर पर हरिद्वार कुम्भ का शाही स्नान पर्व हरिद्वार कुम्भ का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। आकाशवाणी देहरादून को इस का आंखों देखा हाल प्रसारित करना है। आज शाम पूरी टीम पहुंच चुकी है। हम लोग हर की पैड़ी के घाट का जायजा लेने घूमने निकले हैं।हमें उम्मीद थी कि घाटों पर भारी भीड़ होगी। लेकिन उम्मीद के विपरीत काफी कम भीड़ है। शायद आम दिनों में भी इतने ही लोग रहते होंगे। दुकानदारों के चेहरों पर खासी  मायूसी है और सुरक्षाकर्मी रिलेक्स दीख रहे हैं। भीड़ कम होने का कारण शायद कल सम्पन्न हो चुका  सोमवती अमावस्या का स्नान हो या फिर कोरोना भी हो। हां जितने लोग दिखे वे सभी करने से बेफिक्र ही दिखे। 

और हां अगर आप हरिद्वार में हैं और हर की पैड़ी पर हैं तो मोहन पूरी वाले की दुकान का स्वाद लेना ना भूलें। अगर आपको पूड़ी के साथ आलू पसंद हैं वो भी हींग के तड़के के साथ तो अपरान्ह में आएं और पूरी के साथ कद्दू की भाजी पसंद है तो पूर्वाह्न में आएं। बेसन-सूजी का हलवा और पुए का कॉम्बो मीठे के शौकीनों को तृप्त कर सकता है। बाकी लस्सी और गुलाब जामुन तो हैं हीं।

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हां ये कोरोना का काल है,इसका ध्यान ज़रूर रखें।

Monday, 15 March 2021

सड़क पार का खेत



घर की एक बालकनी मुख्य सड़क की ओर है। ये सड़क शहर की दो मुख्य सड़कों को जोड़ने के लिए एक संपर्क मार्ग है। लेकिन अब इसने खुद मुख्य सड़क का रूप ले लिया है। काफी ज्यादा आवाजाही रहती है इस सड़क पर। सड़क के उस पार बालकनी के ठीक सामने एक 'खेत' है। 

खेत में अभी भी फसल उगाई जा रही है। साल में एक आध महीने को छोड़कर हरे रंग की अलग अलग छवियाँ उसमें बिखरी रहती हैं। हर सुबह बालकनी से उस हरियाली को निहारना किसी के लिए भी एक 'ट्रीट' हो सकता है। आप घंटों के हिसाब से उसे निहारते रह सकते हैं। विशेष तौर पर उस स्थिति में जब कंक्रीट का पूरा एक जंगल आपके चारों और उगा हो और चारों तरफ ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं नज़र आती हों।

दरअसल  ये खेत कंक्रीट के रेगिस्तान में नखलिस्तान सरीखा है। बेचैनी के महासागर में सुकून का दरिया है। भागते दौड़ते हांफते शहर के बीच सुस्ताने वाली सराय है। अंधे विकास के कठोर पत्थरों से लड़ता प्रकृति का निहत्था योद्धा है। बस यही डर है कि ना जाने किस दिन अचानक ये योद्धा खेत खेत हो जाएगा। इस खेत को देखकर मैं हमेशा अचरज में पड़ जाता हूँ। अचरज कि ईंट-पत्थरों और रेत-सीमेंट की इस कठोर और निष्ठुर दुनिया के बीचों बीच ये कोमल नरम मुलायम छोटा सा खेत कैसे अभी तक अपना अस्तित्व बनाए हुए है।

पहले ऐसा नहीं था। उस समय ये अकेला खेत नहीं था। बताते हैं कि यहां कभी एक भरा पूरा गांव हुआ करता था। बस एक दिन शहर की नज़र पड़ी। नज़र क्या पड़ी गांव को तो जैसे उसकी नज़र ही लग गई। ये जो शहर हैं ना,पिछली आधी सदी से उनकी भूख बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। उन्हें देखकर लगता है कि वे मानो सदियों से भूखे हैं। जो कुछ भी उनकी उनकी जद में आता है अपनी भूख मिटाने को गड़प करते जाते हैं। नदी,पहाड़,जंगल,बाग,  बगीचे,गांव सब कुछ। तभी तो शहर इतने बेडौल हो गए हैं। एक दो नहीं सारे ही शहर। कोई अपवाद हो तो हो। कैसी बनिए की सी तोंदें हैं इन शहरों की। इस शहर का भी यही हाल है। तमाम गांव की तरह ये शहर एक दिन इस गांव को भी गड़प गया। देखते ही देखते धूसर रंग तेज कृत्रिम रंगों में तब्दील हो जाता है, मिट्टी और ईंटों की कोमलता कंक्रीट की कठोरता में गुम हो जाती है,धैर्य अधीरता में परिवर्तित होती जाता है और सुकून अब बेचैनी का रूप धारण कर लेता है। एक गांव शहर में जो तब्दील हो जाता है।

पर ये 'एकला खेत' अजूबा है ना। अभी भी बना हुआ है वैसे का वैसा ही। वैसा ही सहज सरल कोमल सा जैसे पहले कभी बहुत सारे हुआ करते थे। पर आज एक दम अकेला। आज भी अपने दामन को हरे रंग से सजाए हुए। अब देखिए ना इस समय गेहूँ की फसल लहलहा रही है। मानो इस फसल पर सवार हो वसंत नृत्य करता सा अपनी उपस्थिति की घोषणा कर रहा हो। उधर ठंड धीरे धीरे अपने पांव पीछे खींच रही है। सूर्य अपना ताप हौले हौले बढ़ा रहा है। इस अतिरिक्त ऊष्मा से हरा रंग पिघलने लगा है। हल्का हल्का पीला रंग चढ़ने लगा है। खेत फगुनाया सा लगता है। जैसे कह रहा हो फागुन आ गया। होली के रंगों का सुरूर छाने लगा है। होली के बाद गेंहू की फसल की कच्ची कोमल काया पककर कंचन सी हो जाएगी। कंचन सी? ना ना कंचन ही हो जाएगी। उस किसान से तो पूछो एक बार। जिसने इसे पाल पोस कर इतना बड़ा किया। उसके घर में खुशियों का पीला रंग बिखर बिखर जाएगा जब ये फसल उसके बखारों में जाएगी। आखिर दुनिया में खाली पेट से ज़्यादा स्याह और भरे पेट से ज़्यादा सुनहरा रंग किस चीज का होता है।

 मैं जब भी चारों और से अट्टालिकाओं से घिरे, फसल से लहलहाते झूमते इस खेत को देखता हूँ तो वो गाता सा प्रतीत होता है। मधुर संगीत का रस कानों में घुलता सा महसूस होता है। मानो वो अकेला होकर भी पूरी निर्भयता के साथ,अपने सारे गमों को भुलाकर,अपने अस्तित्व को खत्म करने की शहर की साज़िशों को  चुनौती दे रहा हो और गा रहा हो 'एकला चलो रे,एकला चलो रे...'।

फसल कट जाने के बाद भी बाद भी कितने दिनों तक उसका रंग पीला ही रहता है। एक स्वर्णिम आभा उस पर पसरी नज़र आती है। खुशी चारों और फैली सी लगती है। लगता है खुशी का वो खुमार उस पर अब भी छाया है जो उसने किसान के बखारों को भरकर किसान के पूरे परिवार के चेहरों को दी है। 

अब जेठ का महीना आ गया है। पता ही ना चला। सूरज ने रौद्र रूप धारण कर लिया है। शायद किसी बात पर कुपित हो। क्रोध से उसका ताप बढ़ गया है। इस ताप से खेत की खुशी का पीला रंग पिघलने है। वो उघाड़े बदन जो है। फसल बखारों में है और वो निपट अकेला। खुशी का पीला रंग उदासी के धूसर रंग में गल रहा है। 

अब वो उदासी के साथ हैरान परेशान भी लगने लगा है। बहुत ही बेचैन सा। घबराया सा। आपने देखा होगा कि चींटियां हमेशा एक पंक्ति में चलती हैं। सबसे आगे चलने वाली रानी चींटी फेरोमेन्स नाम का दृव्य छोड़ती जाती जाती है और उसकी गंध पहचान कर बाकी चींटियां उसके पीछे चलती जाती हैं। पर कभी कभी कोई चींटी भटक जाती है। उस चींटी की छटपटाहट देखिए। वो लाइन को ढूंढने  को अपने साथियों से जुड़ने को किस कदर इधर से उधर भटकती है,उसकी घबराहट,उसकी बेचैनी किस तरह से आदमी को भी द्रवित कर देती है। इस माह खेत किसी भटकती चींटी सा दीखने लगता है। वही छटपटाहट, बेचैनी,घबराहट।

छटपटाहट से उसकी उदासी का रंग गहराता जाता है। बीते दिनों की याद में खेत भीतर ही भीतर गलता जाता है,गलता जाता है। धूसर रंग मटमैला होकर स्याह होने लगता है। उसका चेहरा क्या पूरा शरीर कुम्हला जाता है। अकेलापन शायद उसे खाए जा रहा है। अट्टालिकाओं के अट्टहास से उसका दुख घनीभूत होता जाता है। उसका शरीर अब स्याह हो चला है।

अषाढ़ लग गया है। खेत के इतने दुख से आसमान भी द्रवित होने लगता है। भावुक होकर आसमां के आंसू बारिश बनकर अविरल बहने लगते है। बूंदों की शीतलता से उसके दुखों का ताप कम होने लगता है। खेत की शुष्कता फिर से तरल होने होने लगती है, मुरझाई हिम्मत हरी होने लगती है। किसान भी खुशी के खुमार से बाहर आकर फिर से खेत के पास लौट आता है। अब वो चारा बोता है। इतना साथ पाकर खेत खुशी से हरा भरा होने लगता है। वो स्याह हरे रंग से रंग जाता है। खेत फिर अट्टालिकाओं के सामने सिर तानकर खड़ा सा प्रतीत होता है। 

अचानक 'मणिपुर की लौह महिला' शर्मिला चानू इरोम की याद आती है। उसका एकल संघर्ष याद आता है। बिल्कुल ऐसा ही तो इस खेत का संघर्ष है। निपट अकेला है। पर सीना ताने खड़ा है अट्टालिकाओं और उनके मालिकों के सामने। उनके हर अतिक्रमण का प्रतिरोध करते हुए ना केवल अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयास कर रहा है बल्कि कंक्रीट होती दुनिया में थोड़ी सी कोमलता को भी बचाने की लगातार कोशिश कर रहा है। वो भी निपट अकेले। अपनी बालकनी से उसे निहारते हुए पता नहीं कितनी बार अट्टालिकाओं के बीच फसल के साथ लहराते इस खेत में इरोम की छवि नज़र आती है।

पता नहीं क्यों इधर कुछ दिनों से हरी भरी लहराती फसल के बावजूद उदास उदास सा है वो। उसके तमाम प्रयास, तमाम प्रतिरोध के बावजूद कुछ फसल उजाड़ दी गयी है। उसके सीने को सरिया,ईंटें,रेत,सीमेंट,बजरी से पाट दिया गया है। उस पर एक और अट्टालिका का निर्माण होने लगा है। वो कराह रहा है। उसके कराहने की,उसकी सिसकियां कानों को बेध बेध जाती हैं। बचपन की  एक कहानी याद आ रही है। उस डायन की जिसकी जान तोते में बसती थी। यहां  उसके उलट है। प्रकृति की जान खेती किसानी में बसती है। और इसका नियंत्रण विकास डायन को मिल गया है। वो जब चाहे खेत के किसी एक हिस्से को उससे अलगा देती है। प्रकृति कराहती रहती है। खेत सिसकता रहता है। आगे निकलने की अंधी दौड़ दौड़ती बहरी दुनिया और दुष्ट विकास डायन को कुछ सुनाई नहीं देता। प्रकृति ऐसे ही तिल तिल मरती जाती है।

एक दिन आएगा कि मैं सुबह उठूंगा,बालकनी में आऊंगा। पर ना खेत होगा,ना फसल होगी और ना आंखों का,मन का सुकून होगा। होगी तो बस एक बेचैनी होगी,छटपटाहट होगी। और कंक्रीट के जंगल का कुछ और विस्तार हो गया होगा।

उस खेत को निहारते हुए कई बार ऐसा लगता है कि उसके और आम आदमी के जीवन में कितनी समानता है। फिर क्यों वे उसके दुश्मन बन बैठे हैं। क्या कभी दोस्त बन कर साथ नहीं रह सकते।

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आज मैं बेचैन हूँ। उसकी उदासी देखी नहीं जा रही है। मैं बालकनी से भीतर कमरे में आ गया हूँ।

Monday, 1 February 2021

मेरे घर के सामने एक फ्लाई ओवर है



             


                  घर के ठीक सामने एक ओवरफ्लाई है। मुझे समझ नहीं आता कि मैं इसे सड़क ही समझूँ या सड़क से अलग कोई स्वतंत्र अस्तित्व। या दोनों ही। एक सवालिया निगाह से जब भी मैं उसकी ओर देखता हूँ तो वो हौले से मुस्कुराता है और फिर  कहता है

'अहं ब्रह्मास्मि'। मने 'अरे भाई मैं  सड़क ही हूँ'। 

फिर मेरे चेहरे को देखता है। मेरे चेहरे पर निश्चित ही उसे असमंजस के भाव दीखते  होंगे। उसे अब थोड़ा सा आनंद आने लगता है।

वो कहता है 'इसे दूसरी तरह से समझो'।

'मतलब'?

'तत त्वं असी'। मने 'सड़क ही मुझमें है'।

ये कहते हुए उसके चेहरे की भोली मुस्कान थोड़ी गहरी हो जाती है और फिर मुझे ऐसे ही छोड़कर निरपेक्ष भाव से अपने काम में संलग्न हो जाता है। 

कुछ भारी भरकम डम्पर आ रहे हैं। उन्हें अब वो अपनी पीठ से होकर उस पार उतार रहा है।

 मैं अब भी उसका सड़क से अलग अस्तित्व खोज रहा हूँ। एक बहुत बड़ा आर्च सामने दिखाई देता है। लगता है हां ये तो कुछ अलग है। पर कोई एक ऐसा बिंदु नहीं दीख पड़ता कि निश्चित तौर पर कहा जा सके कि यहां सड़क खत्म और फ्लाई ओवर शुरू। बस लगता है सड़क ने यहां अपना कद ऊंचा कर लिया है। ये उठान एक निश्चित ऊंचाई तक जाता है, फिर ढलान और फिर समतल। ना तो इस उठान में कोई अभिमान और ना ढलान में हीनता दीनता। अगर कुछ है तो बस अपने दर्द से उबरने का प्रयास भर। कितना दर्द है इस ऊंचाई के पीछे। इस दर्द को उसकी ऊँचाई से थोड़े ही ना देखा समझा जा सकता है। किसी के दर्द को जानने के लिए उसके भीतर उतरना पड़ता है और उसकी ऊंचाई को महसूसने के लिए उसे नीचे से देखना पड़ता है।

तो क्या है उसका दुःख? एक बार फ्लाई ओवर को नीचे से देखो तो सही। पता चलेगा। कितना गहरा दर्द होता है दो टुकड़ों में बांट दिए जाने का। उसकी सहोदर रेल ने ही तो उसे बांटा। उसके सीने को ही चीर दिया। अपना रास्ता बनाने के लिए। दिल चीरने से पहले ज़रा भी ना सोचा। दर्द वो भी अपनों का दिया कितना घनीभूत होता है ना। 

लेकिन दर्द हमेशा नकार ही लाए ज़रूरी तो नहीं। 'दुःख आदमी को माँजता भी तो है'।  दुख आदमी को कितना उदात्त भी बना देता है। बहुत सारी राहें ऐसी ही होती हैं। वे दुःख देने वालों को माफ करके आगे बढ़ जाती हैं। वे ना केवल उसे ही रास्ता देती हैं,उल्टे उसे निर्बाध बना देती हैं और इस प्रक्रिया में खुद को बहुत ऊपर उठा लेती हैं। हर उस सड़क की किस्मत में,जिसके सीने को चीरकर एक दर्द दे दिया जाता है,एक फ्लाई ओवर में बदल जाना नहीं होता। दुःख को अपनी ताकत बना लेना और  अपने सारे दर्द को अपने भीतर समो लेने का स्पेस क्रिएट कर लेना हर किसी के बस की बात कहां  होती है।

पर क्या ही कमाल है कि अपने जख्मों,अपने दर्द के झंझावात को अपने भीतर समेटे वो खुद को जिंदगी के रंग बिरंगे दृश्यों के बेहद खूबसूरत कोलाज से सजाए रहता है। उसकी पीठ पर ज़िंदगी के दृश्य पल पल बदलते रहते है, केलिडोस्कोप में बदलती खूबसूरत आकृतियों से। अभी अभी एक षोडशी ने स्कूटी रोकी है। वो एक सेल्फी ले रही है। उस ऊंचाई से दिख रहे अनंत स्पेस को अपने साथ सेल्फी में बांध लेना चाहती है, जैसे मन के अनंत स्पेस में उसने अपने सपने समेटे हैं। उधर दो लड़के रुकते हैं। वे अपनी सेल्फी में अपने पीछे ऊंची ऊंची इमारतों को साधना चाहते हैं अपनी ऊंची ख्वाहिशों की तरह। एक ट्रक हांफता सा धीरे धीरे चढ़ाई चढ़ रहा है जैसे उसका चालक अपनी ज़िंदगी नाप रहा है। चालक ट्रक थाम देता है। मानो ज़िन्दगी के शिखर पर पहुंचने की ललक को कुछ पल के लिए यहीं महसूस लेना चाहता हो। वो अब एक सेल्फी ले रहा है। वो फ्रेम में पहाड़ों को अपने कंधों के पीछे लाना चाह रहा है ठीक वैसे ही जैसे पहाड़ सी ज़िन्दगी को अपने कंधों पर ढो रहा है। ऐसे ही धीरे धीरे दिन चढ़ता जाता है। सूरज उसके एकदम ऊपर आ गया है वो सूरज जो सुबह उसके एक छोर पर था। ऐसा लगता है वो सूरज को भी रोज इसी तरह से इस छोर से उस छोर की सैर कराता है अपनी पीठ पर लाद कर। और ये फ्लाईओवर है कि बिना थके, बिना रुके अपनी पीठ पर असंख्य दृश्य बनाता जाता है,बनाता जाता है। 

उधर से कुछ बच्चे पीठ पर बैग लादे स्कूल से घर वापस जा रहे हैं। बेफिक्रे से,भले ही उनकी पीठ पर भविष्य का बोझ लदा हो। शोर मचा रहे हैं। उनमें से कुछ ऊपर आसमान में देखते हैं, जहां उन्हें कुछ परिंदे दिखाई पड़ते हैं बिल्कुल उनकी तरह अलमस्त। वे भी उछल कूद करने लगते हैं। कुछ बच्चे इधर उधर झांक रहे हैं। कुछ दूर तक ढ़ेले फेंक रहे हैं। फिर सारे बच्चे दूर दूर तक फैले मकानों के मकड़जाल को देखने लगे जाते हैं मानो भविष्य उन्हें उनके सामने पड़ी लंबी मकडज़ाल सी ज़िन्दगी का आईना दिखा रहा हो। पर वे उससे बेपरवाह से चहक रहे हैं। उनकी खुशियों से जो तेज निकल रहा है उससे सूरज की रोशनी कुछ और ज़्यादा चमकीली हो गयी है।  बाइक से एक जोड़ा उतरता है। हाथों में हाथ डाले। दुनिया से अनजाने। सामने पहाड़ों पर दूर तक फैली सारी हरियाली को अपनी आंखों में समेट लेना चाहते हैं कि आगे के जीवन के हरे भरे आँगन में प्यार की बरसात होती रहे। उनकी सेल्फी के बैकग्राउंड में जंगल की हरियाली फैल गयी है। 

सूरज अब दूसरे छोर पर आ गया है। उसका ताप उसकी रोशनी कम हो चली है। एक वृद्ध दंपति टहलते हुए जा रहे हैं। कंधे ज़िन्दगी के दबाव सहते सहते झुक से गए हैं। मुश्किलों के लाख थपेड़ों को सहने के बाद भी जीवन पूरी तरह शुष्क नहीं हुआ है। अभी भी जीवन में रस बाकी है। स्निग्धता बाकी है। वृद्ध एक सेल्फी के लिए इसरार करता है। वृद्धा के चेहरे पर बालसुलभ हया नुमाया हो जाती है। वे सेल्फी लेते हैं। ढलता सूरज उनके फ्रेम में चस्पां हो जाता है। वे धीरे धीरे लेकिन सधे कदमों से ढलान पर उतरने लगते हैं,अपनी ज़िंदगी की ही तरह।

गाड़ियां लगातार इधर से उधर दौड़ी जा रही हैं उसकी पीठ से होकर। जैसे ज़िन्दगी दौड़ी जाती है समय की पीठ पर सवार होकर। रात हो चली है। अब सूरज की रोशनी के बजाय बिजली के बल्बों से फ्लाई ओवर चमचमा रहा है। ज़िन्दगी ऐसी ही होती है। ज़िन्दगी की स्याह हक़ीक़तें कृत्रिम रोशनियों से ऐसे ही ढकी जाती हैं। अब रात जवां हो चली है। हल्के वाहनों की आवाजाही कम हो गई है। खुशियों का दिन विदा हो गया है। ग़म की रात गहराने लगी है। बड़े बड़े ट्रक और डम्परों की आवाजाही बढ़ गई है।

दिन रात ऐसे ही बीतते जाते हैं। पल पल दृश्य बदलते जाते हैं। दृश्यों से बने कोलाज के फ्रेम भी बदलते जाते हैं। अगर कुछ नहीं बदलता तो बस फ्लाई ओवर की सूरत और सीरत नहीं बदलती। काले तारकोल से पुती पीठ से दिन रात लोगों को इस ओर से उस ओर पहुंचाता रहता है और हर उस व्यक्ति की ज़िंदगी में, जो उससे होकर गुजरता है खुशियों के रंग भरता जाता है।

दुनिया में कुछ लोग भी ऐसे ही होते हैं जो ज़िन्दगी के दिए दर्द और अपनों के दिये ज़ख्मों को अपने भीतर समेटकर और ज़िंदगी के मुश्किलों के तारकोल से सनी होने के बावजूद दूसरों की ज़िंदगी को खुशनुमा रंगों की बारिश से सराबोर करते रहते हैं।

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क्योंकि वे कुछ व्यक्ति मेरे घर के सामने वाला फ्लाई ओवर होते हैं।

Saturday, 9 January 2021

खेलों का बदलता स्वरूप


 
जाने माने क्रिकेटर और बीबीसीआई के अध्यक्ष सौरव गांगुली अब स्वस्थ होकर घर वापसी कर चुके है। एक इतने एक्टिव और बड़े खिलाड़ी को हृदयाघात की खबर हैरान करने वाली तो थी। लेकिन इस खबर को उनके एक विज्ञापन से जोड़कर देखने से कई और बड़े प्रश्न खड़े होते हैं। (दरअसल ये विज्ञापन एक तेल का था जिसमें दिल को स्वस्थ रखने का दावा किया गया था) प्रश्न क्या बड़े बड़े खिलाड़ी किसी चीज को इंडोर्स करते समय उसके गुण दोष को जांचते है या नहीं। प्रश्न क्या खिलाड़ियों में क्या नैतिकता बची है। प्रश्न क्या वे अपने फॉलोअर्स और चाहने वालों के प्रति अपना कोई उत्तरदायित्व समझते है। प्रश्न क्या धनार्जन ही उनका सबसे बड़ा लक्ष्य है। और सबसे बड़ा प्रश्न क्या खुद खिलाड़ी और खेल बाज़ार का टूल बन गए हैं, बाज़ार की कमोडिटी बन गए हैं। याद कीजिए युवराज की कैंसर वाली खबर को।जिस समय ये खबर ब्रेक हुई उस समय वे लोगों को स्वस्थ रखने का दावा करने वाले एक कैप्सूल्स' का विज्ञापन कर रहे थे। अंततः इस विज्ञापन को रोकना पड़ा और फिर इसे सलमान करने लगे। सचिन तेंदुलकर भारत रत्न हैं लेकिन वे तमाम छोटी बड़ी चीजों विज्ञापन करते हैं। क्या ये इतने बड़े सम्मान का दुरुपयोग और अवमूल्यन नहीं है। यही बात सदी के महानायक पर भी लागू होती है। पर यहां उ केवल खेल और खिलाड़ियों तक सीमित रखते हैं।

दरअसल खिलाड़ियों का ये रवैया या व्यवहार एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है। प्रश्न बाज़ार के अनुरूप खेलव के बदलते चरित्र का। प्रश्न खेल और खिलाड़ियों का बाज़ार की कमोडिटी में रूपांतरित होने का,रिड्यूस होने का। खिलाड़ियों द्वारा आंख मूंदकर चीजों को एंडोर्स करना दरअसल खेलों में बाज़ार के की घुसपैठ और उसके बढ़ते प्रभाव का ही परिणाम है। कोरोना से ठहरी ज़िन्दगी के बीच गतिविधियों को फिर से शुरू करने की जितनी बेचैनी आर्थिक जगत को थी उतनी ही खेल जगत में भी थी। अब आप देखिए ना आईपीएल होकर ही रहा। हिंदुस्तान में अनुकूल परिस्थितियां ना हों तो क्या यूएई में तो थीं ना। और दर्शकों का क्या! ना भी होंगे तो चलेगा। टीवी पर तो आएगा ना। खेल नहीं रुकना चाहिए। 'शो मस्ट गो ऑन।' आईपीएल अकेली ऐसी प्रतियोगिता नहीं है जो शुरू हुई है। क्रिकेट का सीजन बहुत पहले शुरू हो गया था। वेस्टइंडीज के इंग्लैंड दौरे के साथ। उधर एनबीए भी शुरू हो चुका है। टेनिस में यूएस ओपन  और फ्रेंच ओपन भी हो गए और ऑस्ट्रेलियाई ओपन शुरू होने को आया। कोरोना से थमी ज़िन्दगी के बीच खेल गतिविधियां फुटबॉल से हुई और जर्मनी की बूंदेसलीगा पहली लीग थी जिसने वैश्विक स्तर पर खेल गतिविधि शुरू की। खेल और दर्शक एक ऐसा युग्म है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। आर्थिक गतिविधियों को बहाल करना ज़रूरी हो सकता है पर बिना दर्शकों के खेलों का खेला करना ज़रूरी है तो क्यों? ये सवाल पूछा जाना लाजिमी है।

                   आलोचक शम्भूनाथ लिखते हैं "कभी राजनीति और बाज़ार धर्म के अधीन थे। एक समय आया जब धर्म और बाज़ार राजनीति के अधीन हुए। आज दिखता है धर्म और राजनीति बाज़ार के अधीन हो गए हैं।" बाज़ार की प्रभुता वाले इस समय में जब स्त्री देह और बच्चों की मासूमियत भी कमोडिटी बना दी गयी हों तो खेलों की क्या  बिसात। दरअसल खेल भी अब एक कमोडिटी से ज़्यादा,और अलग कुछ नहीं है। पिछले 40-50 सालों में खेलों में भी मूलभूत परिवर्तन हुए हैं। जिन्हें अधिकाधिक बाज़ार के अनुरूप बनाने की कोशिश की गई और की जा रही है जिससे खेलों का चेहरा एकदम बदल गया है। इसको चिन्हित करने का प्रयास हुआ या नहीं,नहीं पता। पर इसकी शिनाख्त ज़रूरी है।


दरअसल खेलों के स्वरूप में परिवर्तन की आहट भारत में खेलों में 'सेन्टर ऑफ एक्सेलेन्स'की अवधारणा के साथ सुनाई देती है। आज से 40-50 साल पहले के समय को और भारतीय खेल परिदृश्य को याद कीजिए। उस समय खेल पैसा कमाने से ज़्यादा शोहरत अर्जित करने और स्वास्थ्य बनाने का शौकिया उपक्रम हुआ करता था। उन दिनों स्कूल कॉलेजों की तो बात छोड़िए तमाम गली मोहल्लों तक में छोटे बड़े खेल मैदान होते जिसमें बच्चे खेलते मिल जाते। उस समय स्कूल और कॉलेज खेलों की नर्सरी हुआ करते थे। बड़ी संख्या में बच्चे इन मैदानों पर खेलने आते। यहीं पर उन्हें खेलने के उपकरण और सुविधाएं मिलती। इन्हीं में से बच्चे आगे बढ़ते और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नाम कमाते। लेकिन उन दिनों हॉकी जैसे एक दो खेलों को छोड़कर भारत खेलों में अच्छा नहीं कर पा रहा था। तब ये विचार आया कि खेलों का स्तर सुधारने के लिए सेन्टर ऑफ एक्सीलेंस बनाये जाएँ। पटियाला में भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना की गई और देश भर में स्पोर्ट्स हॉस्टल और स्पोर्ट्स कॉलेज बनाए गए। ये एक प्रगतिशील कदम था जिसने खेलों के स्तर को सुधारा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन इसने खेलों के चरित्र को बदल दिया। अब खेलों का केंद्र ये सेंटर हो गए। स्कूल-कॉलेजों और  गली-मोहल्लों से खेल और खेल मैदान गायब होने लगे और खेल अब इन सेंटरों के इर्द गिर्द सिमटने लगे। इन सेंटरों में सीमित संख्या में ही खिलाड़ी छात्रों की पहुंच बनती थी और है। अब खेलों में वे ही आते जिन्हें इसी में कैरियर बनाना होता। शौकिया खेलने वालों की संख्या अब दिन ब दिन कम होने लगी। केवल खेल और खिलाड़ी ही कम नहीं हुए बल्कि खेल प्रतियोगिताएं भी कम होने लगीं। इन प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों और दर्शकों का बहुत ही आत्मीय रिश्ता होता और भावनात्मक लगाव भी। इन प्रतियोगिताओं में स्थानीयता का पुट होता और मानवीय रिश्तों की खुशबू। जहां खेल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस तक सिमटने लगे वहीं प्रतियोगिता अब केवल खेल संघों की ज़िम्मेदारी के दायरे में सिमट आईं। तमाम प्रतियोगिताएं जिनसे खेलों की पहचान होती थी,जिनसे जाने माने खिलाड़ी निकलते थे और उसमें प्रतिभाग करते थे,नेपथ्य में चली गईं। याद कीजिए हॉकी की अंतर विश्वविद्यालय प्रतियोगिता,बेटन कप,आगा कप,मुरुगप्पा गोल्ड कप,क्रिकेट में मौइनुद्दोला कप,शीश महल कप,रोहिंटन बारिया कप और ऐसे ही तमाम खेलों की बहुत सारी प्रतियोगिताएं।

       

खेलों के मूल चरित्र में बदलाव और खेलों के बाज़ार के साथ गठजोड़ का एक बड़ा कारक बनी खेल मैदानों की कृत्रिम सतहें। साल 1966। अमेरिका में पहली बार बेसबॉल के खेल मैदान पर कृत्रिम खेल सतह का प्रयोग किया गया। बाद में इसे एस्ट्रो टर्फ के नाम से जाना गया। कहा गया प्राकृतिक घास के मैदानों का रख रखाव ना केवल कठिन होता है बल्कि महंगा भी होता है। फिर तो धीरे धीरे हर खेल में कृत्रिम खेल सतहें आ गयी। यहां तक कि कुश्ती और कबड्डी जैसे मिट्टी पर खेले जाने वाले खाटी खेलों में भी मैट्स का प्रयोग होने लगा। ये एक बड़ा व्यवसाय बन गया। उनकी लॉबी हर जगह सक्रिय हो गयी। हर खेल में लाने का प्रयास होने लगे और अंततः वे इसमें काफी हद तक सफल भी रहे। यहां तक कि एथलेटिक्स तक में सिंथेटिक ट्रैक आ गए। कृत्रिम सतहों से खेल में  निसंदेह कुछ तो कृत्रिमता आती ही। ये सतहें प्राकृतिक सतहों की तुलना में अधिक तेज होती हैं। इसमें अतिरिक्त उछाल भी होती है। इसने दो तरह से खेलों को प्रभावित किया। एक,अमीर और गरीब देशों के बीच खेलों के स्तर के गैप को और बड़ा  कर दिया। सभी बड़ी प्रतियोगिताएं इन्हीं सतहों पर खेली जाने लगी। अमीर देश इन्हें आसानी से अफोर्ड कर सकते थे। उनके खिलाड़ी बचपन से उनपर अभ्यास कर सकते थे। ये अमीर देश यूरोप और अमेरिकी महाद्वीप से थे। ये उन देशों के खिलाड़ियों की कद काठी और जलवायु के काफी अनुकूल थी। जबकि गरीब देश इन प्राकृतिक सतहों के खर्च को उठाने में असमर्थ थे और उन खुद खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता उन सतहों पर खेलने के उतनी अनुकूल ना होने के कारण वे देश पिछड़ते चले गए। दूसरे, इन सतहों ने खेल में एक अतिरिक्त तेजी ला दी और खेलों को पावर हाउस में तब्दील कर दिया। ये गति और ताकत उस प्रक्रिया की अनिवार्य ज़रूरत थी जिसके तहत खेलों को  बाज़ार के लिए कमोडिटी के रूप में बदला जा रहा है या बदल दिया गया है। बाज़ार की आवश्यकताओं के अनुरूप खेलों को अधिकाधिक उत्तेजना उत्प्रेरक बनाया जा रहा है। बाज़ार की इस ज़रूरत पर खिलाड़ियों की सेहत से भी कम्प्रोमाइज किया गया,खिलवाड़ किया गया। इन कृत्रिम  सतहों पर खेलने से खिलाड़ियों के स्वास्थ्य पर विपरीत पड़ता है और शरीर में वीयर टियर बहुत अधिक होता है। पर बाज़ार की शक्तियां प्रबल है। हॉकी इसका एक उदाहरण भर है जिसने खेल की कलात्मकता की कीमत पर उसमें ताकत और गति ला दी और एशियाई हॉकी और विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप की हॉकी को रसातल में पहुंचा दिया। पर बाज़ार को इसी की ज़रूरत है। फुटबॉल में भी ये कृत्रिम सतह लाई गई लेकिन जब उसमें खिलाड़ियों पर विपरीत असर पड़ना शुरू हुआ तो जल्द ही मोह भंग हो गया और वे प्राकृतिक घास पर लौट आए। पर बाजार बाज़ार होता है। उसे इतने हल्के में कहां लिया जा सकता है। फुटबाल में पुनः इसको स्थापित करने के ज़ोरदार प्रयास किए जा रहे हैं। इस बार इस बहाने के साथ कि ठंडे देशों में धूप की कमी के कारण प्राकृतिक घास का उगना कठिन होता है।


     दरअसल आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में,जब समय की बहुत कमी हो और क्षणिक उत्तेजना ही उसका सबसे बड़ा पैशन हो, किस तरह के खेलों की ज़रूरत आदमी को है और खेलों को बेचने के लिए बाज़ार को है? यही ना कि खेलों के छोटे संस्करण हो और क्षणिक उत्तेजना के लिए उसमें ताकत और गति का समावेश हो। खेलों में पिछले सालों में लगातार ऐसे परिवर्तन किए गए। विशेष रूप से खेल नियमों में परिवर्तन करके। एक ओर खेलों के समय में लगातार कमी करके उन्हें छोटा किया गया और टीवी के मुफीद बनाकर उनमें ज़्यादा ब्रेक्स का प्रावधान किया गया। 

 

 क्रिकेट को ही ले लीजिए। क्रिकेट के पांच दिवसीय टेस्ट मैच के बाद एकदिनी क्रिकेट आया,फिर टी20 आया और अब तो 100 बॉल संस्करण और 10 ओवर संस्करण भी आ गया है। इन संस्करणों में सिर्फ चौके छक्कों और विकेटों के गिरने से उत्पन्न उत्तेजना भर हैं। खेल की बेसिक्स तो सिरे से नदारद है। इस प्रवृति ने खेलों के मूल रूप को ही विकृत कर दिया। हॉकी के खेल का समय 70 मिनट की जगह 60 मिनट का कर दिया गया और 35 मिनट के दो हॉफ की जगह चार क्वार्टर कर दिए गए। ठीक इसी तरह से बास्केटबॉल में 20 मिनट के दो हाफ की जगह 10 मिनट के चार क्वार्टर कर दिए गए। अब एक टीम को 24/30 सेकंड के अंदर बास्केट अटेम्प्ट करना और 6/8 सेकंड के अंदर अपने पाले से विपक्षी पाले में जाना अनिवार्य कर दिया गया। टेबल टेनिस में गेम 15 अंकों की जगह 11 अंकों का कर दिया गया और मैच बेस्ट ऑफ फाइव की जगह बेस्ट ऑफ नाइन के कर दिए गए। बैडमिंटन और वॉलीबॉल जैसे खेलों में अंक गणना के तरीकों में ही परिवर्तन कर दिया गया। पहले सर्विस ब्रेक करने के बाद अपनी सर्विस पर अंक अर्जित करना पड़ता था। लेकिन अब सर्विस ब्रेक करने का अंक भी मिलने लगा है जिसने खेल समाप्ति की अवधि कम करने का काम किया है। दरअसल नियमों में ये सारे बदलाव इस बात को ध्यान में रख कर किए जा रहे हैं कि खेलों में मैच की अवधि कम हो सके और उसमें ब्रेक अधिक हो सकें। आज लोगों के पास समय कम है। प्रयास यही है कि खेलों के छोटे संस्करण हो ताकि दर्शक उन्हें पूरा देख पाएं। तभी विज्ञापन मिलेंगे और स्पॉन्सरशिप मिलेगी।  दूसरी ओर इस कम अवधि में भी अधिकाधिक ब्रेक्स डाले जा रहे हैं ताकि खेल ज़्यादा से ज़्यादा टीवी के मुफीद हो सकें। यानी ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन दिखाए जा सकें। इसके अलावा अधिकाधिक ब्रेक और कम अवधि के कारण खिलाड़ियों में स्टेमिना बना रहता है,उन्हें अधिक समय तक स्टेमिना बचाकर नहीं रखना होता है। इससे खिलाड़ी अधिक पावर और गति का प्रयोग कर एक अतिरिक्त उत्तेजना पैदा कर सकता है। ये भी खेलों के बाज़ारीकरण की एक अनिवार्य शर्त है।


खेलों के बाज़ारीकरण या व्यवसायीकरण का एक और उपकरण है तकनीक। खेलों में तकनीक का प्रयोग वहां तक तो उचित लगता है जहां तक वे खिलाड़ियों के  कला कौशल में स्वाभाविक वृद्धि करें। लेकिन जब तकनीक का हद से ज़्यादा प्रयोग होने लगे और अप्राकृतिक रूप से खिलाड़ियों की क्षमता को बढ़ाया जाने लगे और उनको रोबोट बनाया जाने लगे तो दिक्कत की बात है। तकनीक को ज़रूरत से ज़्यादा थोपा जा रहा है। दरअसल अब हो ये रहा है कि बाज़ार के अनुरूप खेलों को अधिक गतिवान और पावरफुल बनाने के लिए खिलाड़ियों के शरीर,उनके कपड़े,खेल मैदानों की सतहें और खेलों में प्रयुक्त किए जाने वाले उपकरणों में तकनीक का इस हद तक समावेश किया जा रहा है कि खेल दो खिलाड़ियों या खिलाड़ियों की दो टीमों के बीच की स्पर्धा न होकर तकनीक की स्पर्धा हो गई है।

 

खेलों को कमोडिटी में बदलने के मूल मंत्र हैं पावर,गति और उत्तेजना। इसीलिए बाज़ार की दृष्टि से खेलों में अवकाश का,अंतरालों का और कलात्मकता का कोई स्थान नहीं रह गया है या बहुत कम रह गया है। अगर रह गया है तो सिर्फ उतना भर कि इसके एकदम खत्म होने से दर्शकों की रुचि ही ना खत्म हो जाए। खेलों से कलात्मकता खत्म होती जा रही है। खिलाड़ी मनुष्य से अधिक रोबोट होते जा रहे हैं। फिटनेस फ्रीक कोहली या कैप्टन कूल धोनी के बरअक्स कपिल गावस्कर को देखिए तो समझ आएगा। दरअसल खेलों की अवधि को कम करने और उसमें अधिक ब्रेक की आवश्यकता की भरपाई  खेलों के अंतराल खत्म करके या न्यूनतम करके की जा रही है। आपको खेलों के इस अंतराल और इसके महत्व को समझना जरूरी है। हर खेल में खिलाड़ी का लक्ष्य होता है,मसलन गोल बनाना या अंक अर्जित करना या रन या विकेट अर्जित करना। खिलाड़ी या टीम इसको अर्जित करने का और विपक्षी को अर्जित करने से रोकने का निरंतर प्रयास करते हैं। एक प्रयास शुरू करने और अर्जित करने के बीच का समय ही वो अंतराल है जिसमें एक खिलाड़ी अपने खेल कौशल,अपनी स्किल,अपनी कलात्मकता का निदर्शन कर सकता है या करता है। पर बाज़ार को सीधे परिणाम चाहिए। उनके लिए अंतराल जितने कम हों उतना अच्छा। बस इसी को नए नए नियम बनाकर कम से कम करने का प्रयास किया जा रहा है। बाज़ार के लिए हर प्रयास का जल्द से जल्द परिणाम अधिक मायने रखता है। इसे आपने कैसे हासिल किया इसका महत्व अब नहीं रहा। इसीलिये अब स्किल का स्थान ट्रिक्स ने ले लिया है। इसको खेलों के उदाहरण से समझा जा सकता है। अब क्रिकेट को लीजिए। टेस्ट मैच में इतना अवकाश/अंतराल होता था कि आप गेंद और बल्ले के बीच कला कौशल का क्लासिक संघर्ष देख सकें। बल्लेबाज़ को हर गेंद पर रन बनाने की जल्दबाजी नहीं करनी होती थी। वो हर अच्छी गेंद को आराम से क्लासिक अंदाज़ में खेल सकता था या छोड़ सकता था और रन बनाने के लिए एक ऐसी गेंद का इंतज़ार कर सकता था जिस पर एक क्लासिक स्ट्रोक्स से रन बना सके। ओवर दर ओवर इस क्रम में मैदान फेंके जा सकते थे। ठीक इसी तरह गेंदबाज अपनी गेंदबाजी की कला का निदर्शन करता और बल्लेबाज़ को गलती करने के लिए मजबूर करता। इसमें बैटिंग और बॉलिंग में एक क्लासिक और कलात्मक संघर्ष देखने को मिलता। लेकिन इसके संक्षिप्त संस्करण में हर गेंद पर रन बनाने या विकेट निकालने की जल्दबाजी करनी ही है। क्योंकि चौके छक्कों से या विकेट गिरने से ही दर्शकों का मनोरंजन होना है,उसमें एक कृत्रिम उत्तेजना पैदा होनी है। अब बल्लेबाज़ हर गेंद पर चौके छक्के लगाना है तो उसके पास इसके लिए अपनी कला का प्रयोग करने के इंतज़ार की इजाज़त या अवकाश कहां है या  गेंदबाज के पास  विकेट लेने के लिए अपनी स्किल के प्रयोग करने का। अब उसे तुरत फुरत में ट्रिक का इस्तेमाल करके बल्लेबाज़ को गेंद बाउंड्री से बाहर मारनी है और बॉलर को विकेट लेना है। 


  अब आप हॉकी को लीजिए। एस्ट्रो टर्फ ने खेल को पावर और गति दी। और एक नियम के खत्म कर देने भर से खेल महज 'हिट,रन एंड गोल' तक सीमित कर दिया है। हॉकी और फुटबॉल में ऑफ साइड का एक नियम होता है। ये नियम काफी जटिल होता है। लेकिन ये खेल को वांछित प्रतिस्पर्धा और कला कौशल के निदर्शन हेतु पर्याप्त अंतराल प्रदान करता है। पर इसमें गति लाने और अधिक गोल के लिए इस नियम को खत्म कर दिया गया। अब लंबे पावरफुल हिट और गोल मूलमंत्र हो गया। ड्रिब्लिंग और टेकलिंग के लिए जो अंतराल था उसका महत्व ही खत्म हो गया। बैडमिंटन और वॉलीबॉल में जो सर्विस बदलने पर भी अंक मिलने के कारण प्रतिस्पर्धा करने और कला निदर्शन का जो अंतराल था वो बहुत हद तक खत्म हो गया। बास्केटबॉल में 24/30 सेकंड के नियम ने भी यही किया। जिसने 3 पॉइंटर शॉट को इस कदर प्रोमिनेन्ट कर दिया कि ले अप और डंक को पृष्ठभूमि में धकेल दिया।


और अंततः खेलों में लीग के आगमन ने खेलों और खिलाड़ियों को पूरी तरह से कमोडिटी में बदल दिया। मौज मस्ती,मनोरंजन,सट्टा और पार्टियों का पुंज आईपीएल महज एक सर्कस से इतर कुछ है क्या?  


दरअसल खेलों को कमोडिटी बनाने के क्रम में खेलों के अंतरालों को कम या खत्म करने का मतलब है खेलों से उसकी कलात्मकता को छीन लेना। उसकी आत्मा को मार देना। उसकी कोमलता को खत्म कर देना। उसके स्त्री मन को मार देना। उसकी सहजता और सरलता को खत्म कर देना। उसकी रवानी और निरंतरता को समाप्त कर देना। अब खेल शुष्क वस्तु  भर है जो देखने मे तो आकर्षक है जिसे कुछ समय के लिए आपमें उत्तेजना तो आती है पर आके दिल के करीब नहीं आ पाती। खेल एक ऐसी वस्तु में तब्दील होते जा रहे हैं जिसमें बाहरी सौंदर्य तो है जिसकी चकाचौंध आपको आकर्षित तो करती है आपमें क्षणिक आवेग भी भरती है पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं बना पाती,आपके दिल मे घर नहीं कर पाती। ये समय खेलों के एमेच्योर स्वरूप के पूरी तरह प्रोफेशनल स्वरूप में बदल जाने का है। एक पैशन, लगाव,आनंद का एक वस्तु एक कमोडिटी में बदल जाने का है। 

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बाज़ार का सिद्धांत मुनाफा है। मुनाफे में नैतिकता का क्या काम। खिलाड़ियों के विज्ञापन करने और चीजों को एंडोर्स करने को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। मुनाफा ज़िंदाबाद।

Wednesday, 6 February 2019

ये अमावस्या की स्याह रात का महा उत्सव है

ये अमावस्या की स्याह रात का महा उत्सव है
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जीवन के प्रति अपने नज़रिए,रीति रिवाज़ों,परम्पराओं और मान्यताओं के कारण हम भारतीय पूरे संसार में यूं ही नहीं अनोखे समझे जाते हैं,अद्भुत समझे जाते हैं। गज़ब का जीवट और धैर्य होता है हम में। हम कई बार अतिवाद के ऊपरी छोर पर पहुँच कर पागलपन की चौहद्दी लांघते से लगते हैं। जीवन के सुख दुःख को इतनी समदृष्टि से देखते हैं कि दुखों का भी खुशियों की तरह उत्सव मनाते हैं। पूर्णिमा की उजली रात की तरह अमावस्या की स्याह रात का भी महा उत्सव रचते हैं।
        इन दिनों प्रयाग में कुम्भ चल रहा है और 4 फरवरी को मौनी अमावस्या थी। इस बार ये सोमवार को थी यानी सोमवती अमावस्या। ये संयोग काफी दिनों में पड़ता है और सरकार,मीडिया और निसंदेह आम जनता भी इसे महा उत्सव की तरह मनाने को आतुर थी और मनाया भी।लेकिन किस तरह !


03 फरवरी 02 बजे 

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आकाशवाणी को मकर संक्रांति के बाद मौनी अमावस्या स्नान पर्व और शाही स्नान का सजीव आँखों देखा हाल प्रसारित करना था। कमेंट्री से जुड़े लोग पहले ही कुंभ क्षेत्र पहुंच चुके हैं। लगभग डेढ़ बजे हम नौ लोग जिसमें कमेंटेटर और साथी अधिकारी लोग थे,तीन गाड़ियों से मेला क्षेत्र के लिए रवाना होते हैं।दो गाड़ियों पर पास है,एक पर नहीं। हम लोग आशंकित हैं पता नही गाड़ी कहां रोक दी जाय और फिर अपने मेला क्षेत्र स्थित कैम्प तक पहुंचने के लिए कितना पैदल चलना पड़े। आशंका थोड़ी दूर चलते ही सच साबित होती है। हिन्दू होस्टल चौराहे पर बैरिकेड लगे हैं। गाड़ियों को यहां रोका जा रहा है। संगम की यहां से दूरी 6 किलोमीटर से भी ज़्यादा है।यहां से लोगों की पैदल यात्रा शुरू होती है। अब बड़ी संख्या में लोग पैदल जाते दिखाई दिखाई देने लगे हैं। लोग पहले कोशिश करते हैं कि गाड़ियां आगे जा सकें लेकिन असफल होने पर उतर कर पैदल चल पड़ते हैं। एक हल्की सी निराशा की लकीरें उनके चेहरों पर उभरती हैं,पर गंगा दर्शन और उसमें डुबकी लगाने के उत्साह में वे कहीं छिप सी जाती हैं। हमें मीडिया पासधारी होने का लाभ मिलता है। हमारी गाड़ियाँ आगे बढ़ती हैं। जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जाते हैं, पैदल स्नानार्थियों की संख्या भी बढ़ती जाती है। सबमें बस एक ही आतुरता परिलक्षित होती है संगम पहुंचने की। बालसन चौराहे पर फिर बेरिकेडिंग है। हम पुलिस से बहस करने से बचने के लिए अल्लापुर का रास्ता पकड़ लेते हैं और बाघम्बरी गद्दी होते हुए दारागंज जाने वाली सड़क पर परेड ग्राउंड प्रवेशद्वार पर पहुंचते हैं। आश्चर्यजनक रूप से यहां पर तैनात पुलिसकर्मी मीडिया पास दिखाने पर सहजता से जाने देते हैं और हम लोग काली सड़क क्रॉसिंग पहुंचते हैं। काली सड़क पूरी तरह से संगम जाने वाले स्नानर्थियों से भरी चल रही है। सड़क पर तिल रखने की जगह नहीं है। हमें इन्हें चीर कर आगे बढ़ना है,लेकिन ये संभव नहीं हो पा रहा है। लोगों का अनवरत  प्रवाह है। उस प्रवाह में एक लय है। सब एक गति से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसा लगता है मानो कोई नदी बह रही हो  जिसमें पानी की जगह मानव प्रवाहित हो रहे हैं। उस प्रवाह का गंतव्य संगम स्थल की है जिसमें वे खुद को विलीन कर देना चाहते हैं। हम गाड़ी से उतर कर उस पार खड़े सिपाहियों के पास जाते हैं। उनसे उस पार लगी बेरिकेडिंग हटा कर जाने देने का आग्रह करते हैं। वे सहजता से मान जाते हैं और बड़ी मशक्कत के बाद उस मानव प्रवाह को रोकते हैं और हम आगे बढ़ते हैं। इसके बाद दो और जगह बेरिकेडिंग हैं,किसी तरह हम उन्हें पार करते हैं। अंततः  बांध के नीचे त्रिवेणी सड़क वाली टी पर पहुंचते हैं जहां रास्ता पूरी तरह बंद है। हम लोग गाड़ियां वापस भेज देते हैं। यहां से कैम्प पास ही है।

03 फरवरी रात्रि 08 बजे
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रात्रि के आठ बजे हैं। हम 5 साथी अक्षयवट मार्ग स्थित अपने टावर को देखने के बहाने संगम तक घूमने निकलते हैं। ये यमुना का उत्तरी किनारा है। किले से लेकर संगम तक यमुना के उत्तरी किनारे पर लगभग 50 मीटर चौड़ाई में पुआल बिछी है।उस पर कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं हैं।गाम गिराम के लोग समूहों में यहां उपस्थित हैं। अधिसंख्य क्या लगभग सभी समाजार्थिक दृष्टि से निम्न निम्न मध्यम वर्ग से हैं। तमाम बैठे बतिया रहे हैं ,बहुत से कंबल रजाई ताने सो रहे हैं।जगह जगह चूल्हे सुलगे हैं। खाना बनाने का उपक्रम हो रहा है। लिट्टी चोखा,दाल भात,खिचड़ी,चूड़ा,कुछ जगह रोटियां भी। जिनके पास बनाने का जुगाड़ नही है वे चना चबैना से काम चला रहे हैं। तो बहुत से लोग घर से ही बनवाकर लाये हैं। ये हाल सिर्फ यमुना किनारे का ही नही है बल्कि सेक्टर 3 और  4 में हर उस जगह का है जहां हुक्मरानों के कारिंदों ने लोगों को ऐसा करने की अनुमति दी है बल्कि यूं कहें कि ऐसा करने से रोका नहीं है।ठंड अपने शबाब पर है। गहराती जाती अमावस की रात में हल्की हल्की सी हवा बहने लगी है जो ठंड से लिपट कर उसकी उपस्थिति के अहसास को तीव्र से तीव्रतर कर रही है। सर के ऊपर केवल आसमान का छावा है और नीचे एक पतली पॉलीथिन का बिछौना या चादर और पुआल मिलकर लोगों को धरती से विलगाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। रेत साज़िशन पाला बदल कर ठंड के साथ हो लिया है और ठंड की मारक क्षमता को चाकू की धार की माफिक पैना कर  रहा है,और  तीक्ष्ण बना रहा है। पर क्या ही कमाल है जो उन श्रद्दालुओं पर इस बरसती ठंड और सुविधाओं की शून्य उपस्थिति का जरा भी असर हो रहा हो। वे असीम धैर्य के साथ उस दीर्घ प्रतीक्षित शुभ मुहूर्त का इंतज़ार कर रहे हैं जब वे संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाकर अपने जन्म जन्मांतरों के पाप काट देंगे और अपने इहलोक के साथ परलोक को भी साध लेंगे। इस कड़कड़ाती ठंड और विपरीत परिस्थितियों  के बावजूद लोगों के चेहरों पर असंतोष या रोष के भाव की उपस्थिति शून्य है। अगर कुछ है तो उनके चेहरों पर आतुरता है और संतोष का भाव तो छलक छलक जा रहा है। सब खुश हैं। उस कड़ाके की ठंडी रात की कठिनतम परिस्थितियां भी अपने तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी संतुष्टि के स्थायी भाव को विचलित नही कर पा रही हैं । ठीक उनके अपने जीवन की तरह। वे लगातार अभावों,कष्टों के बावजूद बेहतर दिनों की आस नही छोड़ते। अनवरत कर्म में लीन रहते हैं। इस आस में कि बस सुख उनके जीवन में आने वाला है। सुख उनके जीवन से अनुपस्थित हैं तो क्या हुआ, वे साल दर साल दुखों का ही उत्सव मना लेते हैं। आज भी ठीक वैसे ही कठिनतम परिस्थितयों के बीच अमावस की स्याह रात का भी पूर्णिमा की उजली रात की तरह उत्सव मनाने की अदमनीय इच्छा के वशीभूत हैं।
           
 हम लोग वापस कैम्प लौट आये हैं।
  
 3 फरवरी रात्रि 11बजकर 19 मिनट से अमावस शुरू हो गई है। ऐसी उद्घोषणाएं ध्वनि विस्तारक यंत्रो के माध्यम से लगातार प्रसारित की जा रही हैं। हम कैम्प में लेटे इनको सुन रहे हैं। नींद विचारों की भीड़ में गुम हो गई है। अर्धरात्रि के बाद भीड़ का दबाव शायद बढ़ गया है। ऐसा अनुमान हम लोग लेटे लेटे लगा रहे हैं। क्योंकि अब लोगों से अपील की जा रही है कि वे स्नान करके अपने गंतव्यों की और प्रस्थान करें। ये अपील स्वयं डीआईजी और मेलाधिकारी कर रहे हैं। उनके स्वर में व्यग्रता की उपस्थिति महसूस होती है।

04 फरवरी प्रातः 04 बजे
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प्रातः चार बजे यमुना पट्टी सड़क पर स्थित हम अपने कैम्प के गेट पर खड़े हैं। ये संगम वापसी मार्ग है।स्नानार्थियों का दबाव बढ़ रहा है। काली मार्ग और यमुना पट्टी क्रॉसिंग पर आने वाले स्नानार्थियों को रोकने के लिए लगे बैरिकेड हटा दिए गए हैं। बहुत से लोगों को जो संगम क्षेत्र में प्रवेश कर गए हैं उन्हें अलग अलग स्थानों पर डाइवर्ट किया जा रहा है।जमुना पट्टी सीधे किला घाट और यमुना किनारे जाती है। लोग वहीं नहाते हैं। संगम पर थोड़ा दबाव काम हो जाता है। मुख्य संगम स्थल वैसे भी कहाँ आम आदमियों के लिए उपलब्ध है। वो अखाड़ों के शाही स्नान के लिए आरक्षित है। इस समय तक यमुना पट्टी पर भी पाँव रखने की जगह नहीं बची है। एक तरफ से लोग संगम जा रहे हैं दूसरी और से वापस जा रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है दो रेलगाड़ियां समानांतर पटरियों पर विपरीत दिशा में जा रही हों। उफ्फ ये क्या !एक अधेड़ दम्पत्ति भीगे कपड़ों में चले आ रहे हैं। वे नहाकर बाहर आए तो उनके वस्त्र गायब थे। प्रातः चार बजे 4 /5 डिग्री तापमान में गीले अधो वस्त्र और धोती ब्लाउज में वे काँप रहे हैं। पर क्या ही कमाल है उनके चहरे पर अफसोस की शिकन नहीं है। वे दयनीय नहीं लग रहे हैं। संगम में स्नान करने से आत्मा की संतृप्ति के भाव उनके चहरे पर इसने प्रबल हैं कि उनके शारीरिक कष्ट का आभास नहीं होता है। वे एसएसपी ऑफिस का पता पूछते हैं और पता पाकर तेज कदमों से आगे बढ़ जाते हैं। पर हमारी देह काँप उठती है।

04 फरवरी प्रातः 05. 30 बजे
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सजीव कमेंटरी के चार स्थलों में से एक काली मार्ग बाँध स्थित संकट मोचन हनुमान मंदिर है। ये कैम्प के सबसे निकट है। यहां पहुँचना सबसे आसान है। इसीलिए हम थोड़ी देर से लगभग साढ़े पांच बजे वहां के लिए निकलते हैं। पांच मिनट बाद हम काली सड़क और जमुना पट्टी के क्रासिंग पर खड़े हैं। भीड़ को वहां रोक दिया है। शायद संगम पर अधिक भीड़ हो गयी है। सामने हमारा गंतव्य दिखाई दे रहा है। लेकिन हमें जाने नहीं दिया जा रहा है। हम चिंतित होते हैं। किसी तरह से सुरक्षा कर्मियों को कन्विंस करते हैं। हमें किनारे से लगे बेरिकेडिंग को लांघ कर जाने को कहा जाता है। किसी तरह से हम उसे पारकर अपने गंतव्य पर पहुंचते हैं। लेकिन इस बीच भीड़ इतनी अधिक हो चुकी है कि उसको संभाल पाना असंभव होता जा रहा है। पीछे से लगातार लोग आ रहे हैं और वहां पर रोक दिया गया है। अब धक्का मुक्की  के हालात हो गए हैं। जैसे पानी को रोकना असंभव होता है। वो अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है। ठीक वैसे ही भीड़ को रोकना मुश्किल है। भीड़ ने अब अपना रास्ता ढूंढ लिया है। 
उसने साइड में लगी बेरिकेडिंग तोड़ दी है। लोग उससे हा हा कार करते हुए इस तरह से जा रहे हैं जैसे पानी कोई बांध तोड़ कर हरहराकर बह निकलता है। सुरक्षाकर्मी अपने स्थान पर खड़े असहाय से देख रहे हैं और हम मंदिर की छत से। हम सिहर उठते हैं। पर भीड़ के हिस्सा बने बच्चों,युवाओं,महिलाओं,वृद्धों किसी के भी चहरे पर 'यहां आना गलत हुआ' जैसा कोई भाव नहीं है,कोई शिकन उनके माथे पर नहीं है। अजीब सा पागलपन उनके सिर पर सवार है,एक आतुरता चहरे पर पसरी है। 

04 फरवरी प्रातः 10 बजे
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प्रातः साढ़े पांच बजे से दस बजे तक मंदिर की छत से,जहां से हम सजीव आँखों देखा हाल प्रसारित कर रहे थे,संगम की ओर उमड़ते जन सैलाब को देख रहे थे। शहर में दक्षिण और पच्छिम  दिशाओं से आने वाले यात्रियों के लिए परेड क्षेत्र से होकर आने वाला काली मार्ग संगम क्षेत्र में प्रवेश का मुख्य मार्ग है तो दूसरी और उत्तर से शहर में प्रवेश करने वाले यात्रियों के लिए दारागंज से होकर बाँध के नीचे वाला समानांतर मार्ग है जो बाँध के ठीक नीचे काली सड़क से मिलता है। हम इसे मंदिर से साफ़ साफ़ देख पा रहे हैं। दोनों तरफ से अनवरत जन प्रवाह आ रहा है। जो हमारे सामने मिलकर जनसैलाब का रूप धारण कर रहा है। चारों तरफ नरमुंड ही नरमुंड चमक रहे हैं। ये बिलकुल गंगा यमुना के संगम सा दृश्य प्रस्तुत करता सा प्रतीत होता है। उत्तर दिशा से दारागंज से आता जनप्रवाह मानो गंगा हो जिसमें  दक्षिण दिशा से परेड होकर काली मार्ग से आता यमुना जैसा अपेक्षाकृत बड़ा जनप्रवाह बाँध के नीचे दारागंज से आने वाले जनप्रवाह में मिलकर एक विशाल जनप्रवाह का निर्माण करता है। दस बजे हमारी कमेंट्री ख़त्म होती है। अपना सामान समेट कर हम भी उस जन प्रवाह का हिस्सा बन जाते हैं। 
 यूँ तो काली मार्ग मुख्यतः संगम जाने का मार्ग है लेकिन हम सुबह से ही देख रहे थे कि इसी से बहुत से वापस भी जा रहे हैं। आने जाने वालों ने बड़ी ही ईमानदारी से आधा आधा मार्ग बाँट लिया है। हम संगम से आने वाले जनप्रवाह की विपरीत दिशा से जाने का प्रयास करते हैं क्यूँकि हमारा कैम्प मंदिर से संगम की और पड़ता है। बहाव के विरुद्ध तैरना हमेशा कठिन और कष्टप्रद होता है। यहां इसे हमने यथार्थ में घटित होते महसूसा। हम दो लोग भीड़ द्वारा संगम जाने वाले जनप्रवाह में धकिया दिए गए जबकि हमारे पांच साथी साइड के बेरिकेड को पार करने की फिराक में हैं। इस प्रयास में हमारे वरिष्ठ कमेंटेटर काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो राम मोहन पाठक बेहोश होते होते बचे। उनकी खराब होती हालत देखकर सुरक्षाकर्मियों ने आनन फानन में उन्हें साइड बेरिकेडिंग से उस तरफ कर दिया। उसी के साथ बाकी चार लोग भी उस तरफ कूद गए और अपनी जान बचाई। उधर हम दो लोग भीड़ में बिना किसीअपनी ऊर्जा खर्च किये आगे की और धकेले जा रहे हैं। बार बार भगदड़ के आसार बन रहे हैं। उस धक्का मुक्की में छूटे जूते चप्पल उस भयावहता के सबसे मुखर बयान लग रहे हैं। हमारे मुख भय से पीले हो गए हैं पर लोग हैं कि इस भयावह स्थिति में संगम में डुबकी लगाने की आतुरता से गीले हो रहे हैं। एक अजीबअधीरता से सबके चेहरे लाल  हैं। 
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मुझे सिर्फ एक ही अहसास होता है कि कुम्भ मेला भारतीयों की धार्मिक आस्था और विश्वास  का,उनके हर्ष, उल्लास,उनकी सामूहिकता,विश्व बंधुत्व की भावना का शाहाकार ही नहीं है बल्कि उनकी अतिवादिता का,जो पागलपन की सीमा को छू छू जाती है का भी उदाहरण है। ये एक ऐसा बयान है जो उस भारतीय मानसिकता को निदर्शित करता है जिसमें वे दुःख और अभावों के इस कदर आदी हो जाते हैं कि सुख के अभाव में दुखों का भी उत्सव गान करते हैं और  पूर्णिमा की उजली रात की तरह अमावस की स्याह रात का भी उत्सव राग बुनते हैं। 




नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...