इस फानी दुनिया को अलविदा कह देने के बाद भी व्यक्ति कहाँ पूरी तरह से इस दुनिया से विदा ले पाता है। कितना कुछ वो छूट जाता है। तमाम चीजों में। अपनी अनुपस्थिति में कितनी बार उपस्थित हो आता है। बार बार। मानो वो यहीं कहीं हो। सबसे ज्यादा स्मृति की तहों में लिपटा हुआ।
विजय एक ऐसे व्यक्ति हैं,जो जब-तब स्मृतियों के दरवाजे पर दस्तक देते रहते हैं। विजय यानी विजय कुमार गौड़। इस बार एक यात्रा संस्मरण के बहाने। यात्रा संस्मरण 'अपने वतन का नाम बताओ'।
विजय भाई को मैं देहरादून आने से पहले जानता था। फेसबुक के माध्यम से। वे उन लोगों में से एक थे जिनसे इलाहाबाद से देहरादून आने के बाद मिलना था। आने के बाद जल्द ही मुलाकात भी हो गई। ये साल था 2019। और फिर मिलने का ये सिलसिला अगले पांच सालों तक बदस्तूर चलता रहा। हर तीन चार महीने के अंतराल पर तो उनसे मुलाकात होती ही रही। 2024 के फरवरी में देहरादून छोड़ने तक। फिर एक दिन उनके ना रहने की खबर आई। जितना दुख उससे कहीं ज्यादा ये आश्चर्य की इतना जिंदादिल,घुम्मकड़,एक बहुत ही उत्साही ट्रैकर और स्वस्थ व्यक्ति के साथ ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन जिंदगी में दुख अक्सर अचानक और अप्रत्याशित रूप में ही सामने आते हैं।
आज जब उनका सद्य प्रकाशित यात्रा संस्मरण हाथ में आया तो स्मित मुस्कान लिए उनका चेहरा आंखों के सामने हो आया। उनकी आवाज कानों में घुलने लगी। मानो वे संस्मरण स्वयं बांच रहे हों। किताब को खोलकर सबसे पहले अनुक्रमणिका देखी तो एक अनजाने सुख का अनुभव हुआ। नंबर चार पर एक संस्मरण ज्यों का त्यों सुरक्षित रखा है। 'चंद्रशिला से कम ऊँचा है खांखरखेत'।
वे बहुत ही तार्किक और विवेकी व्यक्ति थे। लोकतांत्रिक मूल्यों में उनका गहरा विश्वास था। सच्चे जनवादी लेखक। जिनकी मानवीयता और मानवीय मूल्यों में गहरी आस्था थी। सबसे बड़ी बात उनके लेखन और वैयक्तिक आचरण में कोई फांक नहीं थी। जितने ईमानदार वे लेखन में थे,उतने ही ईमानदार आचरण से। वे देहरादून के उन चंद लेखकों में से थे जिनसे मैं संपर्क में आया और जिनकी ईमानदारी ने मुझे प्रभावित किया। इसीलिए मन में उनके लिए बहुत ज्यादा सम्मान था।
बात मार्च 2022 की है। साहित्यिक रेडियो पत्रिका के लिए एक संस्मरण की रिकॉर्डिंग के लिए मैंने विजय भाई को फोन किया। फोन उठाते ही उन्होंने कहा '
भाईसाहब माफ़ कीजिए मेरे पास कोई नई कहानी या कविताएं नहीं हैं। इसलिए मैं नहीं आ पाऊंगा। रेडियो के किसी भी कार्यक्रम अधिकारी को विजय भाई की इस बात से घोर अचरज हो आता। दरअसल आकाशवाणी में नियमानुसार कोई भी पूर्व प्रकाशित या प्रसारित रचना प्रसारित नहीं हो सकती। लेकिन जब मूल्य का क्षरण होता है तो उसका असर हर क्षेत्र में होता है। और रेडियो इसका कोई अपवाद नहीं है। अब लेखक रेडियो के लूपहोल्स,अपनी वरिष्ठता और संबंधों का फायदा उठाकर न केवल प्रकाशित रचनाओं को रिकॉर्ड करा देते हैं, बल्कि एक ही रचना को कई कई बार रिकॉर्ड करा देते हैं।
उनकी बात से मुझे हैरानी नहीं हुई। मैं ये बात उससे पहले अरुण कुमार असफल जी और दो एक और वरिष्ठ लेखकों से भी सुन चुका था। मुझे देहरादून की लेखकीय ईमानदारी का आभास था। मैंने हंसते हुए कहा 'इस बार मुझे आपका यात्रा संस्मरण चाहिए।' लेकिन उन्होंने इस वायदे के साथ उससे भी इंकार कर दिया कि 'जैसे ही इस बार मैं यात्रा पर निकलूंगा तो रेडियो के लिए एक संस्मरण लिखने की कोशिश करूंगा।' उस दिन मन उनके लिए सम्मान से भर गया। उनकी लेखकीय ईमानदारी का मुरीद हुआ।
मई खत्म होते होते उनका फोन आया। उन्होंने बताया एक संस्मरण तैयार है। मैंने तुरंत ही उन्हें रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया और जून की साहित्यिकी में उस संस्मरण को प्रसारित किया। संस्मरण 'चंद्रशिला से कम ऊँचा है खांखरखेत'। उनके अपने पैतृक गांव के पास स्थित दो अपूर्व पहाड़ी सौंदर्य वाली जगहों की यात्रा का संस्मरण। एक ऐसा यात्रा संस्मरण जिसमें उन स्थानों के सौंदर्य से कहीं अधिक उन जगहों की कठिनाइयों का दुख था। खाली होते गांव और पलायन की पीड़ा थी। और दरकते पहाड़ी जीवन की सिसकियाँ थी। ये एक कमाल का संस्मरण था।
दरअसल विजय की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे एक बेहतरीन कवि थे। एक उम्दा कहानीकार थे। प्रतिभाशाली रंगकर्मी थे। खेल प्रेमी और शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे। और। और एक बहुत ही उत्साही और हिम्मती घुमक्कड़,यायावर,ट्रैकर और अन्वेषक थे। अक्सर दुख मिश्रित अचरज हो आता है कि एक ऐसा घुमक्कड़ जिसने जीवन भर पता नहीं कितने दुर्गम दर्रों और पहाड़ों को पार किया,वो अपने हृदयाघात से कैसे पार नहीं पा पाया। शायद ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है। ज़िन्दगी ऐसी ही होती है।
वे बार बार पहाड़ों पर जाते हैं। पर्यटक बनकर नहीं। यायावर की तरह। राहुल की तरह अन्वेषक बनकर। हमजातोव की तरह जन्मभूमि के दुख दर्द को समझने बूझने,महसूस करने। पहाड़ उनका जन्मस्थान जो था। उत्तराखंड से लेकर कश्मीर तक के पहाड़ उनके लिए वही स्थान रखते हैं जो हमजातोव के लिए दागिस्तान का था। पहाड़ उनका अपना ' दागिस्तान ' था। वे लिखते हैं- "...पहाड़ों की यात्राएं मेरे लिए मुक्ति की कामना ही नहीं। यात्राओं के बहाने ही तो मैं अक्सर अपने अतीत में झाँकने की कोशिश करता हूँ। माँ,पिता,चाचा,चाची और ढेरों पहाड़वासियों की उस ज़िंदगी में झाँकना चाहता हूं जो उन्हें पहाड़ छोड़ने के लिए मजबूर करती रही हैं। मुझे लगता है इसे जानने के लिए दुनिया भर के पहाड़ों से पलायन करते लोगों की ज़िंदगी में झाँकना होगा। किसी भी देश का पहाड़ी जीवन उस देश के कुलीन जीवन से अलग है।"
ये यात्राएं उनके अपने भीतर के अंधेरों से लड़ने की प्रेरणा हैं- "अपने भीतर के जंगलों से बाहर निकलने का क्रम ही मेरी यात्राएं हैं जिसकी स्मृतियां हर वक़्त मथती रहती हैं और जीवन को गति देती हैं।"
आखिर वे इतने दुर्गम प्रदेशों की यात्राएं कैसे सम्पन्न करते हैं। कैसे बार बार दुर्गम दर्रे पार करते है। कैसे पहाड़ों की अलंघ्य चोटियां पार करते हैं। वे एक सूत्र देते हैं। पहाड़ों को नापने का। उन्हें पार करने का। जो अंततः जिंदगी को जीने का भी सूत्र हो आता है। वे कहते हैं- "पहाड़ ताकत से नहीं,हिम्मत से होते हैं पार।"
वे अपने इन यात्रा वृत्तांतों में पहाड़ों के भूगोल को बताते हैं। उसके इतिहास का पाठ करते हैं। लेकिन वे भूगोल से कहीं अधिक उस भूगोल को जीने वालों की बात करते हैं। इतिहास से कहीं अधिक इतिहास को बनाने वालों की ज़िंदगी की कथा कहते हैं। और अपनी इस विशेषता में ये किताब अनिल कुमार यादव के चर्चित यात्रा विवरणों 'कीड़ाजड़ी' और 'वो भी कोई देस है महराज' से गहरा साम्य रखती है।
ये यात्रा संस्मरण 'अपने वतन का नाम बताओ' अपने कलेवर में बहुत छोटा है। 134 पन्नों में सिमटा हुआ। कुल 12 संस्मरणों और यात्रा कथाओं में बंटा हुआ। सभी एक दूसरे से अलग। एक दूसरे से जुदा। अपने आप में मुकम्मल। लेकिन एक सूत्र से आपस में गुंथी हुई। पहाड़ी जीवन के सूत्र में। एक लंबी गाथा की तरह। कंटेंट में बहुत ही समृद्ध। पाठकों को विषय की अंतर्दृष्टि से लैस करती हुई।
अपने पहले संस्मरण में जिससे इस पुस्तक का नामकरण हुआ हिमाचल प्रदेश के लमखागा दर्रे की यात्रा का वृतांत है। एक ऐसा दर्रा जो भारत के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण पर्वतीय दर्रों में से एक है। दर्रा जो समुद्र तल से लगभग 17 हजार फुट से भी अधिक ऊंचाई पर स्थित है। यह दर्रा पारंपरिक रूप से हिमाचल के किन्नौर जिले में स्थित छितकुल गांव को उत्तराखंड की हर्षिल घाटी से जोड़ता है। भारत-तिब्बत सीमा के बेहद करीब होने के कारण यह भौगोलिक और रणनीतिक दोनों दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ये अत्यधिक कठिन श्रेणी का ट्रेक है जहां ग्लेशियर,विशाल बर्फ के मैदान,मोरेन और तीखी ढलानें मिलती हैं। निसंदेह इसके लिए तकनीकी अनुभव और बेहतरीन शारीरिक सहनशक्ति की जरूरत होती है। वृतांत बेहद रोमांचक और दृश्यात्मक है।
दो यात्रा वृतांत मिनकियानी दर्रे की यात्रा पर आधारित हैं। ये हिमाचल प्रदेश में धौलाधार पर्वत श्रृंखला में स्थित एक प्रसिद्ध दर्रा है जो समुद्र तल से लगभग 14 हज़ार की ऊंचाई पर है। ये दर्रा कांगड़ा घाटी को चंबा घाटी से जोड़ता है। इसकी खड़ी चढ़ाई और पथरीले रास्ते ट्रैकिंग को बेहद दुष्कर बनाते हैं। इन वृत्तांतों को पढ़कर महसूस होता है कि वे किस हद तक पहाड़ में धंसे हैं कि वे दर्रे को पिता के काँधे के रूप में कल्पित करते हैं और दर्रे व उसकी चोटियों को पिता पुत्र के अकल्पनीय और खूबसूरत रूपक में बदल देते हैं। एक ऐसे पिता के जो पुत्र को मेला दिखाने के लिए आपने काँधे चढ़ाए है। पुत्र और ज्यादा दृश्य देखने को पिता के कांधे पर खड़ा हो जाता है और पिता पुत्र को संभालने के लिए अपने हाथों को अधिकतम ऊंचाई तक ले आता है। पिता का कांधा एक दर्रा है। उसके दो हाथ ऊंची चोटियां। बच्चा ट्रैकर।
जांस्कर घाटी लद्दाख के बीहड़ भूभाग में गहराई में बसी हिमालय के सबसे मनमोहक जगहों में से एक है। बर्फ से ढके पहाड़ों, प्राचीन मठों,घाटियों और निर्मल नदियों से घिरी यह घाटी रोमांच और सांस्कृतिक जीवन के अन्वेषण का अविस्मरणीय अनुभव है। वे जांस्कर घाटी में बार बार जाते हैं। यहां की तीन बार की यात्राओं के कुल पांच विवरण हैं। वे वाया मनाली,दारचा अपनी यात्राएं संपन्न करते हैं। इन पांच यात्रा विवरणों में दुर्गम भौगोलिक संरचनाओं के रोमांचक विवरणों के अलावा यहां के सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन पर भी बहुत कुछ कहा गया है। इसमें युवा हैं। रोजगार की समस्या है। विभिन्न क्षेत्रों के पोर्टरों की आपसी प्रतिद्वंदिता और संघर्ष है। गोम्पेल लामा,तेनजिंग, नाम्बगिल,छुवेगा जैसे युवा हैं। जीवन के संघर्षों की और सरवाइव करने की जद्दोजहद है। ये वृतांत बहुत मार्मिक बन पड़ा है।
गौतम गर्ब्याल उर्फ आनंद नांबियाल के शीर्षक से एक यात्रा वृतांत अपने अंत में एक छोटे से पत्र से बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। ये छोटा सा पत्र पहाड़ी जीवन की दुश्वारियां आकस्मिक आपदाओं और जीवन की अनिश्चितता और मृत्यु के शोक को बहुत ही मुखर लेकिन कारुणिक अभिव्यक्ति देता है।
पत्र कुछ यूं पढ़ता है "सर,मालपा अब वो मालपा नहीं रहा जो आपने देखा था। जिस दुकान में बसेरा किया था,मलबे का ढेर है। काली नदी ने मालपा के पहाड़ों को तोड़ दिया है। उन्हीं दुकानों के भीतर ठहरे थे गर्ब्यांग,गुंजी, बुद्धी,कुटी, नांबी और व्यास-चौदास घाटी के ढेरों साथी,जो अब नहीं रहे। आनंद भी उन्हीं में था सर। लिपुलेख के पार तिब्बत के पहाड़ों को देखने की इच्छा रही हो या पढ़ाई के लिए फीस जुटाने की इच्छा,मलबे के नीचे वो भी दफन हो गई। इस वक्त धारचूला एकदम सूना है। काली नदी का बहाव अभी भी पहाड़ों को कंपा रहा है। आगे लिख पाना इस वक्त मेरे लिए संभव नहीं है। आपका गौतम गर्ब्याल।"
निसंदेह ये एक शानदार यात्रा संस्मरण जिसमें किताबों और गजेटियरों में मिल जाने वाले यांत्रिक और रेडीमेड विवरण नहीं,बल्कि स्वयं के देखे,जाने,भोगे,अनुभूत किए वास्तविक और सच्चे विवरण हैं। यही बात इसे किताब को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाती है।

