Sunday, 13 September 2026




नुवाद विधा अपने पाठकों को दूसरी भाषाओं और उसके साहित्य संसार में आवा जाही की सुविधा प्रदान करती है। इन दिनों अन्य भाषाओं से और विशेष रूप से अंग्रेजी से हिंदी में खूब अनुवाद हो रहा है। इधर अंग्रेजी में लिखी गई चार पुस्तकें और उनका हिंदी अनुवाद खूब चर्चा में रहा।

नेहा दीक्षित एक प्रसिद्ध पत्रकार हैं, जिन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं और इन दिनों फ्रीलांसिंग कर रही हैं। उन्होंने नौ साल के गहन रिसर्च और लगभग नौ सौ लोगों से साक्षात्कार करने के बाद एक पुस्तक लिखी 'द स्टोरी ऑफ अननोन इंडियन : द मैनी लाइव्स ऑफ सईदा एक्स '। इसका हिंदी में 'कोई एक सईदा' के नाम से अनुवाद आया। दूसरी किताब जानी मानी अंग्रेजी लेखिका और बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय की आत्म कथा 'मैरी कम्स टू मी' है जिसका हिंदी अनुवाद 'मेरी मां गैंगस्टर' शीर्षक से आया। रस्किन बॉन्ड अपनी तरह के अनोखे और सुप्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक हैं। उनकी आत्मकथा 'लोन  फॉक्स डांसिंग:माई ऑटो बायोग्राफी' का हिंदी अनुवाद 'अपनी धुन में'  शीर्षक से आया। चौथी किताब जाने माने पत्रकार मार्क टली की 'अपकंट्री टेल्स:वंस अपऑन अ टाईम इन द हर्ट ऑफ़ इंडिया'  है जिसका अनुवाद 'धीमी वाली फास्ट पैसेंजर' के नाम से आया है। 


1.कोई एक सईदा

नेहा दीक्षित की किताब 'कोई एक सईदा' बहुत शानदार है। ये नामालूम सी महिला श्रमिक सईदा (बदला नाम) की बायोग्राफी और डॉक्यूमेंट्री है। सईदा बनारस के एक बुनकर परिवार की महिला है जो साल 1992 में 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों से उत्पन्न परिस्थितियों के कारण बनारस से विस्थापित होकर परिवार सहित दिल्ली में शरण लेती है। यहां उसके सामने सबसे बड़ा संकट अपना और अपने परिवार के सर्वाइवल का आता है क्योंकि उसके पास सर ढंकने के लिए ना कोई छत है, ना ही कोई नौकरी या रोजगार। पूंजी के नाम पर कुल जमा तीन हजार रुपए। 

अब उसका संघर्ष शुरू होता है। यहां जो वो पहला काम शुरू करती है वो है लांड्री का। होटल में विदेशी सैलानियों के कपड़े धोने का। जल्द ही आशियाना बदलता है और काम भी। दूसरा काम मसालों को साफ करने का मिलता है। और फिर जिदगी को ढर्रे पर लाने की जद्दोजहद में कभी वो खुद काम छोड़ देती है और कभी छूट जाता है। इस तरह उसे हर बार एक अलग काम पकड़ना पड़ता है जिसमें किशमिश की डंठल बीनना,नमकीन बनाना,बादाम गिरी निकालना,जींस के धागों की तुरपाई,जरी का काम शादी के कार्ड बनाना,अगरबत्ती,सॉफ्ट टॉय,गजक, अगरबत्ती बनाने जैसे काम शामिल हैं। इस दौरान वो केवल अपने परिवार के अस्तित्व की लड़ाई ही नहीं लड़ती बल्कि मजदूरों के हक़ और हुकूक की लड़ाई भी लड़ती है। 

ज़री,किशमिश,गजक, डोर नॉब,बादाम,सॉफ्ट टॉय, अगरबत्ती,तिरंगा और शादी के कार्ड नाम से नौ भागों में लिखी गई ये किताब एक अत्यंत साधारण महिला की एक ऐसी असाधारण कहानी कहती है कि जो 1990 के बाद के तीन दशकों के उत्तर भारत के राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज बन जाती है। 1992 के बाबरी मस्जिद के बाद हुए दंगे और 2020 के दिल्ली दंगों के बीच किस तरह भारतीय समाज और  हिन्दू-मुस्लिम संबंध विकसित हुए,उसकी सूक्ष्म और गहरी पड़ताल भी इस किताब में है। ये निम्न वर्ग की एक महिला के अपने जीवन और अपने परिवार के जीवन को चलाने और सरवाइव करने के लिए किए गए संघर्षों का उम्मीद से भरा बयान है। विस्थापन की मार्मिक कहानी भी है कि किस तरह परिस्थितियां लोगों को अपनी भूमि से उजड़ कर दूसरी जगह पलायित होने को मज़बूर करती हैं और अपने जीवन संघर्षों में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि वापसी की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। विडंबना ये कि अगर कोई वापस लौटना भी चाहे तो खुद उसके परिवार वाले ही उसे असंभव बना देंगे क्योंकि जीवन की खुरदुरी वास्तविकता उन्हें परिजन नहीं प्रतिस्पर्धी बना देती है। आर्थिक उदारीकरण के बाद वाले इस दौर में जीवन यापन किस कदर कठिन हो गया है कि बनारस से दिल्ली पलायन के बाद सईदा को अपनी जीविका के लिए कितने ही काम करने पड़ते हैं। उसे बार बार अपना काम बदलना होता है। इसमें एक तरफ बनारस के बुनकर समाज की झलक है तो दूसरी और दिल्ली आउटसोर्सिंग से काम कराए जाने की पद्धति के ब्यौरे भी हैं। इसमें अगर दिल्ली के बाहरी इलाकों में औद्योगिक विकास का कुरूप चेहरा है तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्या और बदहाली भी अपनी विद्रूपता के साथ उपस्थित होती है। 


2. मेरी माँ गैंगस्टर

जानी मानी अंग्रेजी लेखिका अरुंधति रॉय की आत्मकथा है। इस किताब के हाथ में आते ही उसके हिंदी शीर्षक से दो सवाल मन में उठते हैं। पहला, क्या ये किताब उनकी माँ के बारे में है। और दूसरा, क्या गैंगस्टर शब्द का प्रयोग रुचिकर है। दूसरे सवाल के बारे में क्या ही कहा जा सकता है लेकिन, हां, आत्मकथा में माँ  केंद्र की तरह उपस्थित हैं जिसके इर्द गिर्द लेखिका की जिंदगी अपना रास्ता बनाती है। मां को केंद्र में रखकर लिखी गई ये आत्मकथा दरअसल उनके अपनी माँ के साथ प्रेम और बेरुखी के बीच झूलते संबंध का बेबाक बयान है। माँ बेटी का ये सम्बन्ध बहुत ही जटिल है। एक तरफ उनकी माँ उनके साथ एक डिक्टेटर की तरह व्यवहार करती है और उन्हें गाली तक देती है। संबंधों में इतनी कटुता है कि वे अठारह साल की उम्र में घर छोड़ देती हैं तो सात आठ साल तक माँ से मिलती तक नहीं हैं और ना ही माँ इस दौरान उनकी कोई खोज खबर लेती हैं। दूसरी और वे माँ से बहुत प्रभावित हैं और अपने में उनका अक्स देखती हैं और अपने व्यक्तिव के निर्माण में माँ के योगदान को स्वीकृति हैं। वे सीरियाई ईसाई समाज के उत्तराधिकार नियम में बदलाव के लिए माँ के संघर्ष,उनके अनोखे स्कूल की स्थापना और सिंगल पेरेंट के रूप दो बच्चों की परवरिश का विस्तार से ना केवल वर्णन करती हैं बल्कि उससे बहुत मुत्तासिर भी होती हैं। 

लेकिन ये आत्मकथा केवल अपने और माँ के जटिल संबंधों पर ही बात नहीं करती बल्कि इसमें खुद के जीवन निर्मिति की बेबाक और यथार्थ आत्म स्वीकृति भी है। स्त्री गरिमा और अस्मिता का आख्यान भी है। साथ ही नर्मदा बचाव आंदोलन जैसे तमाम सामाजिक राजनीतिक आंदोलन में भागीदारी और उस पर बेबाक राय भी है।


3.अपनी धुन में 

जहां अरुंधति की आत्मकथा रूक्ष भूमि पर लिखी गई है,वहीं अंग्रेजी के प्रसिद्ध  लेखक रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा कोमल भूमि पर लिखी गई है। एंग्लो इंडियन रस्किन अपनी तरह के अनूठे और बहुत ही लोकप्रिय लेखक हैं। ये आत्मकथा अपने आप में एक सुरीली धुन है जिसे एक बार सुनना शुरू किया तो इसमें इस कदर डूब जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कब खत्म हो आती है। इसमें आजादी से पहले और बाद का,दोनों भारत उपस्थित हैं। इसमें जामनगर है।देहरादून है। शिमला है। मसूरी है। दिल्ली है। लंदन और वेल्स भी है। उन्हें पहाड़ से प्रेम है और पहाड़ इसमें अनिवार्यतः आते हैं। वे अविवाहित हैं। इसलिए अकेलेपन की एक उदास अनुगूंज उनकी इस जीवन धुन की पृष्ठभूमि में अंतर्निहित है। 

चार खंडों में लिखी गयी आत्मकथा के पहले खंड में जन्म से लेकर पिता की मृत्यु तक की कहानी है। दूसरे खंड में पिता की मृत्यु के बाद से उनके इंग्लैंड जाने तक के जीवन का वृतांत है। तीसरे खंड में अपने इंग्लैंड प्रवास और वापसी पर एक पूर्णकालिक लेखक के रूप में स्थापित होने के वृतांत हैं और अंतिम भाग में उनके बाद के जीवन का आत्मकथ्य है। हां, जितनी मार्मिक और सुंदर कथा अपने जीवन के पूर्वार्ध की कही है,वैसी उत्तरार्ध की नहीं कह पाये। शायद दूर का जीवन अधिक सूक्ष्म से दिखाई देता रहा होगा और निकट भूत ने उन्हें उस तरह से कहने लायक ना लगा हो। 

निसंदेह एक उम्दा आत्मकथा है।


4.धीमी वाली तेज पैसेंजर 

सभी जानते हैं कि मार्क टली एक प्रख्यात पत्रकार थे। वे भारत में बीबीसी के प्रतिनिधि की हैसियत से आए थे। हालांकि बाद में बहुत समय तक फ्रीलांसिंग भी की। वे लंबे समय तक भारत में रहे और यहां से उनका गहरा लगाव था। उन्होंने भारत को,यहाँ के जीवन को बहुत गहराई से समझा था। धीमी वाली पैसेंजर की कहानियां इस बात की पुष्टि करती प्रतीत होती हैं। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश  का सामाजिक राजनीतिक जीवन अपने पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित है।  ये कहानियां पिछली सदी के अस्सी के दशक के पूर्वी उत्तर प्रदेश के कस्बाई जीवन का आइना हैं।

इसमें कुल मिलाकर सात कहानियां हैं। इस संग्रह का शीर्षक संग्रह की छठी कहानी के नाम पर जिसमें एक सांसद अपनी फैक्ट्री चलने के लिए पैसेंजर ट्रेन को बंद कराना चाहता है और जनता उसके खिलाफ संघर्ष करती है। पहली कहानी टीले वाले मंदिर की है जिसमें दलित बुधराम द्वारा गांव में संत रैदास के मंदिर बनवाने,उसमें अगड़ों के अड़ंगे और उनसे संघर्ष की कहानी है। दूसरी कहानी मिलन पुर में क़त्ल ग्रामीण जीवन में पुलिस और सीआईडी जैसी संस्थाओं की भूमिका और भ्रष्टाचार की कहानी कहती है। हलवाहे का संताप शीर्षक वाली कहानी उस दौर की कहानी है जब किसान के लिए बैंक से लोन लेना महाभारत था।किसान अपनी इज्ज़त के लिए कर्जदार होता जाता और अंततः कोर्ट कचहरी के चक्कर में सब कुछ गंवा देता है। खानदानी धंधा बाहर पढ़े लिखे एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो अपने पिता की राजनीतिक विरासत से अपना करियर बनाना चाहता है लेकिन हवा हवाई ख्याल और जमीनी हक़ीकत की जानकारी के अभाव में मुँह की खाता है। वो समझ पाता है कि राजनीति खानदानी पेशा नहीं है। दो अन्य कहानियां हैं  एक गांधवादी की प्रेम कथा और किस्सा एक भिक्षु का।

ये कहानियां बताती हैं उन्होंने यहां रहकर केवल अपना काम भर नहीं किया बल्कि इसे जिया भी है।

ये चारों किताबें अलग अलग जॉनर की किताबें हैं। लेकिन इनमें कुछ समानताएं हैं। ये चारों किताबें अंग्रेजी में लिखी गईं और इन चारों का हिंदी अनुवाद जाने माने छायाकार,पत्रकार, लेखक-अनुवादक प्रभात सिंह ने किया है। ये चारों ही शानदार अनुवाद हैं। बहुत ही सहज और सरल। प्रवाहमान। लगता है आप मूल हिंदी में लिखी किताब ही पढ़ रहे हैं। हां आज हिंगलिश के ज़माने में उर्दू शब्दों का खूब प्रयोग किसी को खल सकता है क्योंकि हमने उर्दू के सामान्य शब्दों का उपयोग करना भी बंद कर दिया है। लेकिन ये शब्द सही मायने में गद्य के स्वाभाविक प्रवाह को बनाए रखते हैं। इन किताबों के अनुवाद के लिए प्रभात सर को साधुवाद कहना तो बनता है।



(अक्षत पत्रिका के लिए फिर से लिखा गया आलेख)




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