जाने माने फुटबॉल कोच पेप गार्डियोला ने एक बार मेस्सी के बारे में कहा था “उनके बारे में मत लिखो। उनका वर्णन करने की कोशिश मत करो। उन्हें खेलते हुए देखो।”
कुछ खिलाड़ी खेल मैदान में खेल नहीं रहे होते हैं,वे एक जादू की निर्मिति कर रहे होते हैं और दर्शक उसके सम्मोहन में होते हैं। उन खिलाड़ियों की अपने विरोधियों से नहीं बल्कि समय से मुठभेड़ हो रही होती है। शमशेर बहादुर सिंह की एक बहुत प्रसिद्ध कविता है "काल, तुझसे होड़ है मेरी। अपराजित तू— तुझमें अपराजित मैं वास करूँ। "
कुछ खिलाड़ियों को मैदान में खेलते हुए देखकर लगता है मानो ये पंक्तियां उनके लिए ही लिखी गई हों।
चालीस की उम्र में लेब्रान जेम्स जिस तरह की बास्केटबॉल खेल रहे हैं, लगता है, वे समय के विपरीत दिशा में दौड़ रहे हों। वे समय के सीने पर सफलता के नए मानक गढ़ रहे होते हैं। नोवाक जोकोविक भी लगभग इतनी ही उम्र में उस को चुनौती देते हुए सफलताओं के नए पैमाने तय कर रहे होते हैं। और उन्तालीस साल के मेस्सी का क्या। मेस्सी ने इस साल के फीफा विश्व कप में दिखाया कि मानवीय क्षमता की सीमा को कहां तक विस्तारित किया जा सकता है।
भौतिक रूप से हर किसी को समय से पराजित हो जाना होता है। चाहे लेब्रान हों,नोवाक हों या मेस्सी हों। उन्हें समय के सामने नतमस्तक हो जाना है। मेस्सी ने भी समय के सामने सिर झुकाया और राष्ट्रीय टीम को विदा कहा। लेकिन बात इतनी भर नहीं है। काल से होड़ के इन इक्कीस सालों में वे काल के कपाल पर जीत की कहानी लिख चुके होते हैं। अपनी प्रतिभा और क्षमता से सफलता की उन अनंत ऊंचाइयों को नाप चुके होते हैं, जहां समय के हाथ नहीं पहुंचने वाले हैं। वे प्रसिद्धि की इबारत इतनी गाढ़ी रोशनाई से लिख चुके होते हैं कि इसे मिटा पाना अब किसी के बस की बात कहां। अपराजित वे काल की आत्मा में समा चुके हैं।
अब जब तक फुटबॉल का खेल है,तब तक मेस्सी हैं। उनका नाम है। उनके खेल के जादू का सम्मोहन है।
आप इसे नियति कहिए या काल या फिर समय,उनकी बार बार उससे मुठभेड़ होती है। वे बार-बार उदास होते हैं। पानी उनकी आंखों में तैरता है। उनके कांधे झुकते हैं। पर वे हारते नहीं है। वे बार बार नियति से द्वंद्व में लौटते हैं। सफलता के नए प्रतिमान गढ़ते हैं। और अंततः एक महानायक की छवि के साथ अपने फुटबॉल खेल का ही नहीं बल्कि काल के साथ आंख मिचौली के खेल का भी समापन करते हैं।
मेस्सी की उम्र उस समय लगभग दस वर्ष रही होगी। वे तब तक ग्रैंडोली क्लब से नेवेल्स ओल्ड बॉयज क्लब में शामिल हो चुके थे। वे अपनी प्रतिभा के वहां झंडे गाड़ रहे थे और सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों में शुमार हो गए थे कि लियो को अपनी एक बीमारी का पता चलता है-ग्रोथ हार्मोन्स डेफिशिएंसी का। खर्चा बड़ा था जिसे ना परिवार उठा सकता था और ना क्लब। लगा एक शानदार प्रतिभा का अंत है ये।
ऐसे में बार्सीलोना के खेल निदेशक कार्ल रिक्सेस ने लियो की प्रतिभा को पहचाना,उसके साथ अनुबंध किया और उसके इलाज का प्रबंध भी। परिवार यूरोप आ गया। ये वर्ष 2000 था। बार्सिलोना अकादमी ने उस बालक की नैसर्गिक प्रतिभा को निखार दिया। और तब वर्ष 2005 में नीदरलैंड में आयोजित फीफा अंडर-20 विश्व कप जीतने में मेस्सी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने टूर्नामेंट में सबसे अधिक छह गोल किए जिसमें नाइजीरिया के खिलाफ 2-1 से फाइनल में जीत में किए गए दोनों गोल शामिल थे। इसके लिए उन्हें गोल्डन बूट और गोल्डन बॉल से सम्मानित किया गया।
लेकिन काल से द्वंद्व बना रहा। कुछ समय बाद ही 17 अगस्त 2005 में सीनियर टीम में उनका पदार्पण बेहद खराब रहा। हंगरी के खिलाफ दोस्ताना मैच में वे 63वें मिनट में स्थानापन्न खिलाड़ी के रूप में अर्जेंटीना के लिए मैदान में उतरे। एक मिनट से भी कम समय में उन्हें सीधा लाल कार्ड दिखाया गया, जब उन्होंने अपना हाथ घुमाया और उनकी कोहनी फुल-बैक विल्मोस वैन्ज़ाक से टकरा गई।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद खराब और कठिन शुरुआत के बावजूद, अंततः मेस्सी सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में से एक बन गए। और बहुत सारे लोगों के लिए महानतम।
उनके 21 साल के अंतरराष्ट्रीय करियर के दो मुख्तलिफ हिस्से हैं। पहला, 2005 से 2016 तक। इसमें वे और बार्सिलोना क्लब एक दूसरे का पर्याय बन जाते हैं। इस समय वे विश्व फुटबॉल परिदृश्य पर अपनी प्रतिभा के बल पर छा जाते हैं और उनकी गणना फुटबॉल इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में की जाने लगती है। अब एक तरफ मेस्सी और रोनाल्डो के बीच प्रतिद्वंदिता स्थापित होती है, तो दूसरी तरफ 'दूसरे माराडोना' के रूप में अपने पूर्वज फुटबॉलर की विरासत के वाहक बन जाते हैं। माराडोना कहते थे कि उन्हें मेस्सी के शरीर में अपनी आत्मा का आभास होता है।
इस समय में उन्होंने बार्सिलोना के लिए और अपने लिए कोई ऐसा खिताब नहीं था,जो ना जीता हो। उन्होंने ला लीगा के आठ खिताब,यूईएफए चैंपियंस लीग के चार खिताब,कोपा डेल रे के चार खिताब,फीफा क्लब वर्ल्ड कप के तीन खिताब और साथ ही एक ही सीजन में ला लीगा, कोपा डेल रे और चैंपियंस लीग तीनों जीतकर दो बार 'ट्रेबल' हासिल किया। इस समय में पांच बार 'बैलोन डी'ओर' पुरस्कार और तीन बार यूरोपियन गोल्डन शू अवार्ड जीते। 2012 में एक कैलेंडर वर्ष में सर्वाधिक गोल 91 गोल का विश्व रिकॉर्ड भी मेस्सी ने हासिल किया।
लेकिन जिस समय वे बार्सिलोना के लिए खिताबों का अम्बार लगा रहे थे, उस समय वे अर्जेंटीना को कोई भी खिताब नहीं दिला सके। इस दौरान एकमात्र उपलब्धि 2008 में ओलंपिक गोल्ड रहा।
2016 में एक बार फिर वे नियति के समक्ष नतमस्तक हुए। अपने 29वें जन्मदिन के ठीक दो दिन बाद कोपा अमेरिका कप के फाइनल में चिली के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में अर्जेंटीना की हार में पेनल्टी चूकने के तुरंत बाद मेस्सी की आँखें नम थीं और वे कह रहे थे 'मेरे लिए राष्ट्रीय टीम का सफर खत्म हो गया है। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। चैंपियन न बन पाना दुखद है।'
ये निराशा स्वाभाविक थी। अर्जेंटीना 2014 विश्व कप के फाइनल में हार चुका था, साथ ही 2007, 2015 और अब 2016 के कोपा अमेरिका कप फाइनल में भी हार गया था। एक खिलाड़ी जो दुनिया का महानतम खिलाड़ी माना जाता हो,वो उन मौकों पर असफल रहा जो उसके लिए सबसे ज्यादा मायने रखते थे।
2016 में राष्ट्रीय टीम से विदा के अपने फैसले को अंततः उन्हें बदलना पड़ा। आखिर उन्हें अपने और अपने देश के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियां पानी बाकी जो थी।
अब उनके खेल करियर का दूसरा हिस्सा शुरू होता है। 2016 से 2026 तक का। वे बार्सिलोना से अलग होते हैं। ये उनके लिए सबसे उदास कर देने वाली बात थी। और उन के लिए भी जिन्हें मेस्सी को नीली लाल धारियों वाली टी शर्ट से अलगाना मुश्किल था। उसके बाद वे सेंट जर्मेन पेरिस और इंटर मियामी के लिए खेले जरूर। पर उस तरह मन नहीं रमा पाए जैसे बार्सिलोना में रमा था। उनके सामने अब विकल्प के तौर पर राष्ट्रीय टीम थी। उनके पास सब कुछ था सिवाय राष्ट्रीय टीम के साथ कोई बड़े खिताब के। ये उनके खेल का अधूरापन था जिसे उन्हें मुकम्मल करना था। और कमाल है कि वे ऐसा कर पाते हैं। अब वे क्लब से कहीं ज्यादा राष्ट्रीय उपलब्धियों को हासिल करते हैं। वे उपलब्धियां जो उनकी सबसे बड़ी चाहना थीं और जो उनसे लगातार दूर भाग रही थीं।
मेस्सी की राष्ट्रीय टीम में वापसी से टीम की किस्मत रातों रात नहीं बदली। 2018 के विश्व कप में अर्जेंटीना एक बार फिर राउंड ऑफ़ 16 से बाहर हो गई और 2019 के कोपा अमेरिका कप में उसे तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। लेकिन उसके बाद अर्जेंटीना और मेस्सी ने 2021 और 2024 में दो बार कोपा अमेरिका कप जीता। और फिर कतर में 2022 का फीफा विश्व कप जीता। हर फुटबॉलर का सबसे बड़ा सपना। मेस्सी का अपना खुद का अधूरा सपना। इतना ही नहीं, फिर 39 साल की उम्र में अमेरिका में आयोजित फीफा विश्व कप में अर्जेंटीना को अकेले दम पर लगातार दूसरी बार फाइनल तक पहुंचाया। उनके प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि उम्र के साथ मेस्सी की गोल करने की क्षमता में कोई कमी नहीं आई है। टूर्नामेंट में उनके आठ गोल केवल म्बाप्पे से कम थे। साथ ही मेस्सी ने चार असिस्ट भी किए।
नियति को मेस्सी ने एक बार फिर अपने रास्ते में खड़ा पाया। जिस शानदार विदाई की वे और उनके चाहने वाले उमीद कर रहे थे,उससे वे वंचित रह गए। अर्जेंटीना फाइनल में स्पेन से हार गई। एक बार फिर मेस्सी की आँखें नम थीं। दो दिन बाद समय के समक्ष वे नतमस्तक हुए। नियति के सम्मान में उन्होंने अपने हाथों से तीन पन्नों का एक समर्पण पत्र लिखा। लेकिन उस समय तक नियति के कपाल पर अपना नाम हमेशा हमेशा के लिए अंकित कर चुके थे।
आखिर वो क्या चीज थी जो मेस्सी को मेस्सी बनाती है। वे एक नैसर्गिक खिलाड़ी थे जिनमें प्रतिभा जन्मजात 'इन बिल्ट' थी। उसे उन्होंने अर्जित नहीं किया था। वे छोटे कद के थे। पांच फुट सात इंच के ।
कद काठी में भी वैसे मजबूत नहीं थे जैसे कि आज के खेल में एक खिलाड़ी को होना होता है। जैसे माराडोना थे। रोनाल्डो थे। अर्लिंग हॉलैंड हैं। एमबापे हैं। वे आधुनिक पावर खेल को अपनी कलात्मकता से स्थानापन्न कर देते हैं। और अपनी गति से भी। वे अपने पैरों से गेंद को ठीक उसी तरह से बरतते हैं जैसे ध्यान चंद अपनी हॉकी से गेंद को। वे खूबसूरत ड्रिबलिंग करते। माराडोना की तरह। उनकी विरासत को और आगे ले जाते हुए। गेंद उनके पैरों से ऐसे चिपकी रहती मानो वो उनसे विछोह सह ही नहीं सकती। वे भी गेंद को बहुत कोमलता से बरतते। उनके खेल में एक खास तरह की कोमलता थी। उनके खेल में उस तरह की निर्ममता नदारद थी जैसी माराडोना में थी। रोनाल्डो में है। या फिर एम्बाप्पे या हॉलैंड में है। उनमें कम लंबे होने के कारण अतिरिक्त चपलता थी। वे एक ऐसे खिलाड़ी थे जो गेंद ड्रिबल करते हुए बिना गेंद के दौड़ने से अधिक तेजी से दौड़ते थे। उनमें एक विशेष गुण ये था कि वे विपक्षी रक्षण की उन दरारों को पहले ही भांप लेते थे जो बाकी खिलाड़ी सोच भी नहीं सकते थे। उनके खेल में सहजता थी। सरलता थी। कलात्मकता थी। गति थी। कमाल का नियंत्रण था। अगर कुछ ना था तो कठोरता नहीं थी। निर्ममता नहीं थी। ताकत का गर्वीला एहसास नहीं था। हां,एक मानवीय अनुभूति का गहरा अहसास था। वे दिल से खेलते लगते थे। उनके खेल में एक अद्भुत लय थी। वे गोल करते समय अपनी कला से विज्ञान के नियमों को धता बताते लगते।
वे मैदान में एक साथ कई भूमिका निभाते। वे एक शानदार फॉरवर्ड तो थे ही जो असंभव से गोल करते। लेकिन वे एक बेहतरीन प्लेमेकर भी थे। एक शानदार टीम प्लेयर जो अपने साथियों को तीव्र गति से,सही समय पर,अचूकता के साथ गेंद पहुंचाते कि विपक्षी खिलाड़ी हैरान-परेशान, भ्रमित और असहाय से रह जाते। बार्सिलोना में पैप गार्डियोला ने उनके लिए एक साथ कई भूमिकाएं तय की। वे एक ही समय में स्ट्राइकर, विंगर और फैसिलिटेटर की तरह खेलते। ये फुटबॉल में नया प्रयोग था।
उनके खेल के ये गुण उनके व्यक्तित्व का अविभाज्य हिस्सा हैं। वे एक शर्मीले और सहज व सरल व्यक्ति थे। मेस्सी की छवि उनके दिल, उनकी ईमानदारी और उनकी विनम्रता से बनती है। एक पत्रकार ने एक बार लिखा था कि 'रोनाल्डो अपनी ईमानदारी में इतने बुरे हैं कि लोग उनका मजाक उड़ाते हैं, जबकि मेस्सी अपनी अच्छाई में इतने अच्छे हैं कि लोग उनका मजाक उड़ाते हैं।' वे एक इंसान के रूप में उनका व्यक्तित्व शानदार था।
उनके भीतर का एक उम्दा इंसान और उनके भीतर का एक अद्भुत खिलाड़ी दोनों मिलकर मेस्सी की एक ऐसी खूबसूरत छवि बनाते हैं जो लाखों करोड़ों प्रशंसकों के हमेशा के लिए चस्पां हो गई है। अब वे खेलें या ना खेलें,ये छवि अमिट है।
उनके संन्यास पर इंग्लैंड के महान फुटबॉलर गैरी लिनेकर से खूबसुरत और क्या ही कहा जा सकता है कि "फुटबॉल आगे बढ़ता रहेगा, जैसा कि हमेशा होता है, लेकिन अर्जेंटीना और दुनिया को आपने जो यादें दी हैं, वे कभी नहीं मिटेंगी। धन्यवाद, लियो।"
हां,
धन्यवाद लियो।
विदा लियो।