Wednesday 14 June 2023

मैनचेस्टर डर्बी और सिटी का डबल



              बात सन् 1764-65 की है. जेम्स हरग्रीव्ज़ ने ‘स्पिनिंग जेनी’ नाम के एक जादुई यंत्र का आविष्कार किया. 18वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में पूरे यूरोप और विश्व में सूती कपड़े की मांग ज़ोर पकड़ रही थी. उस समय केवल आठ हज़ार की आबादी वाला इंग्लैंड का एक क़स्बानुमा शहर मैनचेस्टर सूती कपड़ों के उत्पादन का केंद्र बनने की कोशिश में था. वहां के बुनकर हस्तचालित पुराने हथकरघों से उस बढ़ती मांग को पूरा करने में ख़ुद को असमर्थ पा रहे थे. ऐसे में ‘जेनी’ ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी.

    हरग्रीव्ज़ की जेनी में आठ स्पांडल थे. यानी अब पहले जितने समय में आठ गुना सूत काता जा सकता था. इसने वहां टेक्सटाइल कारख़ानों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया. देखते ही देखते वहां बड़ी संख्या में सूती कपड़ों के कारख़ाने लग गए. उसके साथ ही कपड़ों को रंगने और ब्लीच करने के लिए ज़रूरी केमिकल्स की मांग बढ़ने से केमिकल फ़ैक्ट्री भी लगने लगीं और उन कारख़ानों के लिए आवश्यक संयंत्र बनाने के कारख़ाने भी स्थापित हुए. कच्चे माल के लाने के लिए परिवहन नहर प्रणाली का विकास हुआ और पहली रेल लाइन की स्थापना भी यहीं हुई.

    अब देश के कोने-कोने से लोग बड़ी संख्या में कारख़ानों में काम पाने के लिए मैनचेस्टर आने लगे.

    19वीं शताब्दी के शुरू होते होते मैनचेस्टर औद्योगिक क्रांति का प्रमुख केंद्र बन गया और इंग्लैंड के सबसे बड़े तीन शहरों में एक. अब उसकी आबादी तीन लाख से ऊपर हो चुकी थी. इसमें ज़्यादातर मजदूर थे जिन्हें बारह घंटों से भी अधिक समय तक कारख़ानों में काम करना पड़ता था और कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन. ऐसे में उनके मनोरंजन के साधनों की ज़रूरत महसूस होने लगी. इससे अनेक खेलों के आयोजनों की शुरुआत हुई, जिसमें घुड़सवारी से लेकर फ़ुटबॉल तक शामिल थे.

    मजदूरों के बीच फ़ुटबॉल तेजी से लोकप्रिय होने लगा. और देखते ही देखते वहां कई फ़ुटबॉल क्लब बन गए. इनमें से दो क्लब ऐसे थे, जिन्हें आगे चलकर न केवल विश्व प्रसिद्ध फ़ुटबॉल क्लबों में तब्दील हो जाना था बल्कि प्रसिद्ध खेल प्रतिद्वंद्विता में भी बदल जाना था, जिसे ‘मैनचेस्टर डर्बी’ के नाम से जाना जाना था.

   सन् 1878 में लंकाशायर व यॉर्कशायर रेलवे के मज़दूरों ने ‘न्यूटन हीथ एलवाईआर फ़ुटबॉल क्लब’ बनाया. 1892-93 में एक स्वतंत्र कंपनी बन जाने के कारण नाम से एलवाईआर शब्द हटा दिया गया. सन् 1902 तक आते आते क्लब का घाटा बहुत बढ़ गया और इसको बंद करने की नौबत आ गई. उस समय चार स्थानीय व्यापारियों ने इसमें निवेश किया और आधिकारिक रूप से इसका नाम ‘मैनचेस्टर यूनाइटेड फ़ुटबॉल क्लब’ पड़ा.

    उधर सन् 1880 में एक अन्य फ़ुटबॉल क्लब ‘सेंट मार्क्स’ (वेस्ट गोर्टन) की स्थापना हुई. सन् 1887 में इसका नाम ‘ऑर्डिक एसोसिएशन फ़ुटबॉल क्लब’ हो गया. और फिर 16 अप्रैल 1894 को ये क्लब ‘मैनचेस्टर सिटी फ़ुटबॉल क्लब ‘ नाम से जाना जाने लगा.

    इन दोनों टीमों के बीच पहला मुक़ाबला 1881 में हुआ, जिसमें न्यूटन हीथ ने सेंट मार्क्स की टीम को 3-0 से हरा दिया. ये एक दोस्ताना मैच था और प्रतिद्वंद्विता जैसी कोई बात न थी. लेकिन इसी दशक में दोनों टीमों ने प्रगति करना शुरू किया और मैनचेस्टर क्षेत्र की दो सर्वश्रेष्ठ टीमें बन गईं. इनमें से ही कोई एक टीम मैनचेस्टर कप जीतती. यहां से दोनों टीमों में श्रेष्ठता के लिए प्रतिद्वंद्विता स्थापित हो गई. और दोनों टीमों के बीच मुकाबले ‘मैनचेस्टर डर्बी’ के नाम से जाने जाने लगे. समय के साथ-साथ यह प्रतिद्वंद्विता सघन और तीव्र होती गई और विश्व भर में खेलों की और विशेषकर फ़ुटबॉल की सबसे प्रसिद्ध खेल प्रतिद्वंद्विताओं में शुमार हो गई.

    ऐसी प्रतिद्वंद्विताएं कभी भी एकतरफ़ा कहां हो पाती हैं. पलड़ा कभी इस ओर झुक जाता तो कभी उस ओर. पर कुल मिलाकर मैनचेस्टर डर्बी में रेड डेविल्स यानी यूनाइटेड का पलड़ा भारी रहा. डर्बी में अब तक कुल 190 मुकाबलों में से 78 यूनाइटेड ने और 59 सिटी ने जीते. शेष 53 मुकाबले अनिर्णीत रहे. इस दौरान यूनाइटेड ने 67 खिताब जीते तो सिटी ने 31 खिताब.

    लेकिन 2023 का साल मानो इस प्रतिद्वंद्विता का निर्णायक साल था. 142 साल पुरानी प्रतिद्वंद्विता का चर्मोत्कर्ष था. लेकिन ये साल सिटी की बुलंदियों का भी साल है.

    इंग्लैंड की सबसे प्रतिष्ठित फ़ुटबॉल प्रतियोगिताओं में एफए कप शुमार है, जो विश्व की सबसे पुरानी प्रतियोगिता है. इस प्रतियोगिता के 142 साल के इतिहास में पहली बार फ़ाइनल में मैनचेस्टर की ये दो टीमें आमने-सामने थीं. ये मैनचेस्टर डर्बी का महामुक़ाबला था. मानो ये एफए कप का फाइनल न होकर, डर्बी फ़ाइनल हो.

    यह मैच 03 जून को लंदन के वेम्बले स्टेडियम में खेला गया.

    सुप्रसिद्ध मैनेजर पेप गोर्डियाला के निर्देशन और जर्मन मिडफ़ील्डर इल्के गुंडोगन के नेतृत्व में जब सिटी की टीम हरी घास पर अपनी पारंपरिक आसमानी रंग की जर्सी में मैदान पर उतरी तो इस साल की प्रीमियर लीग की जीत के गर्व से आसमान से ऊंचे उनके सिर थे और किसी महासमुद्र से संतुष्ट और शांत प्रतीत होते थे. यह और बात है उनके सीने में प्रतिद्वंद्वियों को हराने के लिए ज़ज्बात की एक सुनामी थी.

    दूसरी और मैनेजर एरिक तेन हाग के निर्देशन में और पुर्तगाली अटैकिंग मिडफ़ील्डर ब्रूनो फ़र्नांडीज के नेतृत्व में यूनाइटेड की टीम इतिहास के अपने पक्ष में होने के गौरव की रक्तिम आभा लिए और फ़रवरी में ही ईएफएल में जीत की अग्नि से दावानल हुए प्रतिद्वंद्वी टीम को भस्म कर देने की मुद्रा में थी.

    ये आसमानी रंग के हरहराते महासागर और लाल रंग की लपलपाती दावानाल के बीच का मुकाबला जो था.

    मैच शुरू हुआ. सिटी के कप्तान गुंडोगन ने किक ऑफ़ किया. गेंद गोलकीपर के पास पहुंची. उसने जोरदार किक से बॉल को यूनाइटेड के पेनाल्टी एरिया के पास पहुंचा दिया. एक हैडर से बॉल गुंडोगन के पास पहुँची और उसने शानदार वॉली से गैंद गोल में पहुंचा दी. अभी मैच शुरु हुए केवल 13 सेकंड हुए थे. ये एफए कप फ़ाइनल का सबसे तेज गोल था.

    सिटी ने 1-0 की बढ़त ले ली थी. लगा मानो स्टेडियम में आसमानी समुद्र गर्जना कर रहा था और दहकती दावानल निस्तेज हुई जाती थी. हालांकि दावानल निस्तेज भले ही हो गई हो, पर अभी भी बहुत आग उसमें बाक़ी थी.

     इधर सिटी ने मोमेंटम बनाए रखा. जल्दी ही उसने गोल करने के दो और मौक़े बनाए. पहले ब्रुएने के फ्री किक पर रोडरी ने हैडर बाहर मार दिया. उसके तुरंत बाद हालैंड ने मौक़ा गंवाया. इधर यूनाइटेड ने गेंद पर नियंत्रण बढ़ाकर दबाव बनाना शुरू किया. एक के बाद एक कई आक्रमण किए. इसका प्रतिफल उन्हें पेनाल्टी के रूप में मिला. हालांकि ये पेनाल्टी वीएआर से मिली. कप्तान फ़र्नांडीज ने बराबरी का गोल दाग दिया. ये गोल 33वें मिनट में आया.

    दूसरे हाफ़ में 51 वें मिनट में ब्रुएने का फ्री किक एक बार फिर गुंडोगन को पेनाल्टी एरिया में मिला और एक बार फिर वॉली पर गोल कर सिटी को फिर बढ़त दिला दी. इसके बाद दोनों ही टीमों ने मूव बनाए और गोल के मौक़े भी. लेकिन अंततः मैच 2-1 से सिटी ने जीत लिया.

    मैनचेस्टर सिटी ने प्रीमियर लीग के बाद एफए कप जीत कर अपना डबल पूरा किया. ऐसा उसने दूसरी बार किया. इससे पहले ये कारनामा 2018-19 में किया था. जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी ये कारनामा तीन बार 1993-94, 1995-96 और 1998-99 में किया था.

    मैनचेस्टर डर्बी में इस बार बाज़ी सिटी के हाथ रही. लेकिन इससे बड़ी प्रतिष्ठा अभी भी दांव पर है. इस शनिवार यूएफा कप चैपियनशिप के फ़ाइनल में उसका मुक़ाबला इंटर मिलान से है. सवाल ये है कि क्या ये फ़ाइनल जीतकर सिटी अपना ट्रिपल पूरा कर पाएगी या नहीं.

    अभी तक विश्व के कुल 21 क्लब ने 29 बार ट्रिपल पूरा किया है. पर इंग्लैंड की केवल एक टीम है, जिसने ये किया है और वो सिटी की डर्बी प्रतिद्वंद्वी यूनाइटेड है जिसने 1998-99 में ये ट्रिपल किया था.

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    सिटी की बारी है. ये शनिवार और रविवार के बीच की जो रात है न, कम रोमांचक नहीं होने जा रही है.

याद रखिएगा!


लाजवाब जोकोविच

 


मानवीय क्षमताएं असीमित हैं। इस हद तक कि जो चीजें किसी समय अकल्पनीय लगती हैं,आगे चलकर वे यथार्थ में तब्दील हो जाती हैं। मानव ने अपने विकास क्रम में ये बात अलग अलग समय पर अलग अलग क्षेत्रों में बार बार सिद्ध की है।

 ऐसा भी होता है कि मानव की बहुत सी उपलब्धियां इस हद तक अविश्वसनीय होती हैं कि तर्कातीत हो जाती हैं। हम उनमें तब देवत्व का आरोपण कर देते हैं। 

और खेल भी इससे अछूते कहाँ रह पाते हैं। जब सचिन या पेले या माराडोना या मेस्सी या शुमाकर या माइकेल जॉर्डन या लेब्रों जेम्स या मोहम्मद अली जैसे खिलाड़ी खेलों में मानवीय क्षमताओं के तर्कातीत मानक स्थापित करते हैं तो उन्हें भगवान का दर्ज़ा दे दिया जाता है। 

बीते रविवार फिलिप कार्टियर अरीना पर 36 साल के नोवाक जोकोविच फ्रेंच ओपन के फाइनल में कैस्पर रड को 7-6(7-1),6-3,7-5 से हराकर जब अपना 23वां ग्रैंड स्लैम जीत रहे थे तो कुछ ऐसा ही अविश्वसनीय कर रहे थे। कि उस उपलब्धि को बयां करने के लिए कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं हो सकता था। उसके लिए कोई तर्क प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था। 

नोवाक अपने प्रतिद्वंदी राफा के 22 ग्रैंड स्लैम से  एक खिताब अधिक जीत रहे थे,तो राफा नोवाक को बधाई देते हुए ट्वीट कर कह रहे थे  "23 एक नंबर है जिसके बारे में कुछ समय पहले तक सोचना भी असंभव था, तुमने इसे कर दिखाया।"

निःसंदेह वे कुछ असंभव ही कर रहे थे। कुछ समय पहले तक के अकल्पनीय को हकीकत में तब्दील कर रहे थे।  वे टेनिस ही नहीं,पूरे खेल इतिहास का पुनर्लेखन कर रहे थे। एक खिलाड़ी की क्षमताओं की नई परिभाषा गढ़ रहे थे जिसका एक छोर असंभव और अविश्वसनीय शब्दों को छूता है।

याद कीजिए 2002 का यूएस ओपन। आंद्रे अगासी को हराकर पीट सम्प्रास अपना 14वां ग्रैंड स्लैम जीत रहे थे, तो टेनिस के जानकार और प्रसंशक विस्मय से भर उठे थे। वे कह रहे थे इससे अब कौन पार पाएगा। तब रोज़र फ़ेडरर आए। उन्होंने पहले 14 की बराबरी की और 20 पर जाकर रुके। लोगों को लगा ये असंभव है और तब राफा आए। 22 पर रुके। लगा ये संख्या असंभव है। लेकिन जो 22 को असंभव मान रहे थे वे एक भूल कर रहे थे। वे नोवाक को या तो विस्मृत कर रहे थे या खारिज़। और तब नोवाक आए। हां उनके आगे कौन पर लगा प्रश्रचिन्ह असीमित समय तक लगा रह सकता है,ये यकीन मानिए।

इस बात पर गौर कीजिए कि नोवाक 23 पर रुके नहीं है। वे कहां तक जाएंगे,वे कौन सी संख्या पर रुकेंगे,ये भविष्य तय करेगा। जिस तरह की उनकी फिटनेस है और जिस तरह से वे खेल रहे हैं, कोई भी संख्या असंभव नहीं है। 30 भी नहीं।

उनके 23 ग्रैंड स्लैम जीत में दो बातें उल्लेखनीय हैं। एक, आखिरी 11 खिताब उन्होंने 30 साल की उम्र के बाद जीते हैं। दो, इन सालों में उन्होंने 05 ग्रैंड स्लैम मिस किए। एकऑस्ट्रेलियन और एक अमेरिकन कोविड टीकाकरण ना कराने की वजह से एक विंबलडन कोरोना की वजह से हुआ ही नहीं और एक विम्बलडन थकान के कारण छोड़ दिया। जबकि एक अमेरिकन क्वार्टर फाइनल में गेंद बॉल बॉय को मारने के कारण डिसक्वालिफाई कर दिए गए। अन्यथा आप समझ सकते हैं वे कहां पर इस समय होते।

दरअसल  दिनांक 11 अप्रैल,2023 दिन रविवार को पेरिस के  स्थानीय समय के अनुसार लगभग शाम के चार बजे फिलिप कार्टियर अरीना पर फ्रेंच ओपन के फाइनल मुकाबले के लिए अहर्ता पाने वाले दो खिलाड़ी अलग अलग भाव भंगिमाओं से मैदान में प्रवेश कर रहे थे। 

24 साल के युवा खिलाड़ी नॉर्वे के कैस्पर रड का चेहरा आत्मविश्वास से दमक रहा था। वे क्ले कोर्ट के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं और जैसा वे दो सालों से खेल रहे थे उससे उनका आत्मविश्वास आसमान पर ना होता तो कहां होता। वे अब इस साल के संभावित विजेता माने जा रहे थे क्योंकि कार्लोस अलकराज सेमीफाइनल में हार चुके थे।

दूसरी और सर्बिया के 36 साल के किशोर नोवाक जोकोविच सारी दुनिया जहान की मासूमियत अपने चेहरे में समेटे प्रवेश कर रहे थे। लेकिन उनके मन की बेचैनी और उद्विग्नता को उनकी सारी मासूमियत भी मिलकर छिपाने में असमर्थ हो रही थी। ये इतिहास रचने की बेचैनी थी। एक ऐसे मुकाम पर पहुंचने की उद्विग्नता थी जहां तक कोई नहीं पहुंचा था। उस आसमां को छूने की लालसा थी जिसे कभी किसी ने ना छुआ हो और ना ही कोई छू सके।

खेल शुरू हुआ। पहले सेट का दूसरा गेम लगभग 11 मिनट चला। रड ने नोवाक की सर्विस ब्रेक की और अपना गेम जीतकर स्कोर 3-0 किया। लेकिन चौथे गेम में रड ने एक ओवरहेड शॉट मिस किया। यहां से मोमेंटम शिफ्ट हुआ। नोवाक रंग में आने लगे। उनके शक्तिशाली फोरहैंड शॉट्स का अब रड के पास कोई जवाब नहीं रह गया था। पहला सेट टाई ब्रेक में गया। नोवाक ने टाई ब्रेक 7-1 से जीता। फिर  अगले दो सेट आसानी से जीत लिए। जो नोवाक पहले सेट में थके से लग रहे थे। इस सेट की जीत ने उनमें अपूर्व उत्साह भर दिया। वे अगले दो सेटों में उससे एकदम अलग अपनी ऊर्जा और अपने खेल को उस ऊंचाई पर ले गए जिस तक रड नहीं पहुंच सकते थे और नहीं पहुंच पाए।

तीन घंटों के संघर्ष के बाद नोवाक के चेहरे की मासूमियत और मायूसी रड के चेहरे पर नमूदार हो गयी थी और नोवाक का चेहरा आत्मविश्वास और खुशी से दहक रहा था। लाल मिट्टी पर लाल जूतों और लाल टी शर्ट के साथ उनका चेहरा भी रक्तिम हुआ जाता था। हां इन सब के बीच उनका काला शॉर्ट्स किसी नजरबट्टू सा उन्हें बुरी नज़र से बचाता नज़र आता था।

उस जीत के बाद नोवाक नोवाक कहां रह गए थे। उनका चेहरा असीमित खुशी से दीप्त हो रहा था। वे टेनिस जगत के आकाश में सूर्य से चमक रहे थे जिसके सामने टेनिस जगत के सारे सितारे श्रीहीन हुए जाते थे। और रोलां गैरों की लाल मिट्टी नोवाक के प्रेम में पड़कर लजाती हुई कुछ और अधिक लाल हुई जाती थी।

उनकी जीत दरअसल एक डिफाईनिंग मोमेंट था। एक निर्णायक पल। निर्णायक मोमेंट उस त्रिकोणीय संघर्ष का जिसके दो अन्य कोण फेडरर और राफा बनाते थे। 2003 में शुरू हुए फेडरर और राफा की प्रतिद्वंदिता को 2010 में नोवाक त्रिकोणीय आयाम देते हैं और फिर तीनों मिलकर पिछले बीस सालों के काल को टेनिस इतिहास के स्वर्णिम काल में बदल देते हैं।

अगर आप ध्यान से देखेंगे तो ये प्रतिद्वंदिता खेल शैलियों भर की नहीं है,बल्कि तीन अलग अलग व्यक्तित्वों की भी है। वे अपनी खेल शैली और अपने पूरे व्यक्तित्व से तीन अलग वर्गों का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं। आप इन तीनों के व्यक्तित्व का आंकलन कीजिए तो पाएंगे कि  रोजर फेडरर मैदान में और मैदान के बाहर अपनी शालीनता, अपने ग्रेस और एस्थेटिक सेंस में कुलीन प्रतीत होते हैं। टेनिस ख़ुद ही अपने चरित्र में कुलीन है। टेनिस खेल और फेडरर का टेनिस दोनों क्लासिक हैं और क्लासिकता को पोषित करते हैं। फेडरर टेनिस के मानदंडों के क़रीब क्या, वे स्वयं मानदंड हैं। वे टेनिस के सबसे प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं। जबकि राफा अपने चेहरे मोहरे,वस्त्र विन्यास और अपने चपल,चंचल,अधीर स्वभाव जिसमें हर शॉट पर ज़ोर से आवाज़ करना और हर हारे या जीते पॉइंट पर प्रतिक्रिया करते मध्य वर्ग के प्रतिनिधि से प्रतीत होते।

इन दोनों से अलग नोवाक जातीय भेदभाव का शिकार होते हैं और अपने क्रियाकलापों और हाव-भाव से सर्वहारा वर्ग के प्रतीत होते हैं। वैसे भी उनका बचपन बेहद विषम परिस्तिथियों से गुजरा है। उनका पूरा बचपन बाल्कान संघर्ष के बीच बीता है। जब वे बड़े हो रहे थे तो वे अपना समय बंकर में बिता रहे थे। परिस्थितियों ने उन्हें अजेय योद्धा बनाया। वे खेल मैदान में अंतिम समय तक संघर्ष करते हैं और अंतिम समय तक हार नहीं मानते। 

उनकी अपनी सोच और मान्यताएं उन्हें विवादास्पद और अलोकप्रिय के साथ साथ आम से जोड़ती है। वे कोविड टीकारण के खिलाफ थे। वे कोसोवा के उस मंदिर में जाकर शक्ति और शांति पाने जाते हैं जिसके बारे में मान्यता है कि वो एक दैवीय स्थल है। वे पिछले 10 वर्षों से ग्लूटन  रहित खाना खा रहे हैं। जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

लेकिन आप कह सकते है कि वे अपनी मान्यताओं के प्रति लॉयल हैं। उसके लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं। वे अपने टीकाकरण ना करने पर दृढ़ रहे। इसकी कीमत दो ग्रैंड स्लैम थी।

ट्रॉफी प्रेजेंटेशन सेरेमनी में वे लाल काली जैकेट में आए जिसकी दाईं और 23 लिखा था। विक्ट्री स्टैंड पर एक हाथ में मस्केटियर ट्रॉफी थी और दूसरे हाथ से 23 नंबर की ओर इशारा कर रहे थे। 


वे बता रहे थे कि टेनिस इतिहास में ये एक अनोखी,अद्भुत और अविश्वसनीय संख्या है। और ये भी मैं नोवाक हूँ। मुझे जान लीजिए। ये संख्या मैंने और केवल मैंने अर्जित की है।

और

और,वे बता रहे थे कि मैं आप की तरह हाड़ मांस का बना व्यक्ति हूँ। मुझे भगवान मानने की भूल मत करना। और ये भी कि निश्चिंत रहिए मुझमें अभी भी बहुत टेनिस बाकी है। नई पीढ़ी को अभी और काबिलियत हासिल करनी है। पुरानों का समय अभी खत्म नहीं हुआ है। हम वे वटवृक्ष हैं जिनके साये से निकलने में बहुत मेहनत लगती है।

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फिलहाल तो 23वे ग्रैंड स्लैम की बधाई स्वीकार करो दोस्त।

ये रोमांच से भरा खेल रविवार था

14 जुलाई 2024, रविवार का दिन। एक ऐसा दिन जिसे नियति ने मानो खेल और केवल खेल के लिए निर्धारित किया हो। मानो उसने कहा हो इस दिन बस खेल होंगे ...