Thursday, 30 July 2026

ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल 2026

एक : फीके फीके से खेल

इस बार के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ खेल बहुत फीके फीके से हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया द्वारा मेजबानी  से पीछे हट जाने के बाद  किसी तरह से ये खेल बहुत कम समय और बजट में ग्लासगो ने आयोजित किए हैं। 2022 में बर्मिंघम में आयोजित खेलों के मुकाबले लगभग आधी स्पर्धाएं और खिलाड़ी भाग ले रहे हैं।

फिलहाल अभी तक भारत की लड़कियां और लड़कों ने 5-5 पदक जीते हैं। लेकिन लड़कियां दो स्वर्ण,एक रजत और दो कांस्य पदक जीतकर लड़कों को पीछे धकेलकर पहले स्थान पर बनी हुई हैं।

और हां लड़कियों के पदकों की चमक के बीच भारतीय उम्मीदों का बोझ उठाए दो भारोत्तोलक मीराबाई चानू और ज्ञानेश्वरी यादव की तिरंगे रंगों की हेयरक्लिप और हेयरबैंड भी ना केवल दर्शकों के दिलों को छू रहे हैं बल्कि आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

दो : गुमनामी से शोहरत तक की लंबी दौड़ 


ज़िंदगी की जद्दोजहद की दौड़ें अक्सर गुमनामी के अंधेरों में दम तोड़ देती हैं। लेकिन वैसी ही कोई एक दौड़ शोहरत और बलंदी की रोशन दुनिया अता कर जाती है। अलीगढ़ जिले के सिरसा गांव के गुलबीर सिंह से बेहतर इसे और कौन जान सकता है।

गुलबीर जब अपने गांव की पगडंडियों पर सेना में सिपाही की भर्ती के लिए दौड़ का अभ्यास कर रहे थे,तो वो घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने की जद्दोजहद भर थी। लेकिन 2018 में 18 वर्ष की उम्र में जब खेल कोटे में वे ग्रेनेडियर रेजिमेंट में भर्ती हो रहे थे,तो एथलेटिक्स ट्रैक उनकी प्रतीक्षा में खड़ा था और शोहरत उनकी आगवानी कर रही थी।

अरुणाचल में अंतर यूनिट स्पर्धाओं के दौरान आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट पुणे के कोच यूनुस खान ने उनकी प्रतिभा को लक्षित किया और उन्हें इंस्टीट्यूट ले आए। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

हांगजू एशियाई खेल 2023 में 10 हज़ार मीटर का कांस्य पदक जीता। उसके बाद वे अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग स्थित हाई परफॉर्मेंस सेंटर में हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग लेने गए। वहां से जब वे भारत वापस आए,तो एक नए अवतार में लौटे। अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने भारत के कई दशकों पुराने 3,000 मीटर, 5,000 मीटर और 10,000 मीटर के राष्ट्रीय  रिकॉर्ड्स को एक-एक करके तोड़ दिया।

उसके बाद आए ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल। यहां वे अपने शानदार प्रदर्शन से जगी उम्मीदों का बोझ साथ लेकर आए। लेकिन वे उस बोझ तले दबे नहीं,उससे और ज्यादा निखरे। उन्होंने यहां 10 हजार मीटर दौड़ का रजत पदक जीता। समय था 27:49.78। ये रजत भी एक बड़ी उपलब्धि की तरह आया। इसलिए कि ये इस प्रतियोगिता की इस स्पर्धा का 90 साल में पुरुषों का पहला भारतीय पदक था। बड़ी बात ये कि ये कारनामा अफ्रीकी धावकों के बीच किया था। इस स्पर्धा में वे डेनियल एबेनयो जैसे कई नामचीन अफ्रीकी धावकों के मुकाबिल थे। कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में 1986 के बाद ये पहला अवसर था कि इस स्पर्धा में कोई अफ्रीकी धावक पोडियम पर नहीं खड़ा था।  

वे मात्र .85 सेकेंड के अंतर से ऑस्ट्रेलिया के धावक से स्वर्ण पदक चूक गए। आज उनका रजत पदक एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन आगे आने वाले समय में रजत की खुशी से ज्यादा स्वर्ण चूक जाने की टीस सालती रहेगी।

ग्लासगो में वे उम्मीदों का बोझ लेकर आए थे। लेकिन वे उसके तले दबे नहीं,उससे और ज्यादा निखरे। उन्होंने यहां 10 हजार मीटर दौड़ का रजत पदक जीता। ये इस प्रतियोगिता की इस स्पर्धा का 90 साल में पहला भारतीय पदक था। सबसे बड़ी उपलब्धि ये कारनामा अफ्रीकी धावकों के बीच किया था। इस स्पर्धा में वे डेनियल एबेनयो जैसे कई नामचीन अफ्रीकी धावकों के मुकाबिल थे। कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में 1986 के बाद ये पहला अवसर था कि कोई अफ्रीकी धावक पोडियम पर नहीं खड़ा था। 

वे मात्र .85 सेकेंड के अंतर से ऑस्ट्रेलिया के धावक के. रॉबिन्सन से स्वर्ण पदक चूक गए। आज उनका रजत पदक एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन आगे आने वाले समय में रजत की खुशी से ज्यादा स्वर्ण चूक जाने की टीस सालती रहेगी

तीन : ऊंचाई का नया नाम सर्वेश अनिल कुशारे



भारतीय एथलीट अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता की जो रोमानी कहानियां लिखते हैं,वे अपनी निर्मिति में उतनी रोमानी होती नहीं हैं। वे अक्सर ग्रामीण पृष्ठभूमि,अभावों,संघर्षों,कठिनाइयों और खेल प्रशासन की निष्क्रियता,उदासीनता और बेईमानी के खुरदुरे धरातल पर कठोर परिश्रम,लगन,धैर्य और दृढ़ इच्छाशक्ति जैसी क्रियाओं से लिखी जाती हैं

सर्वेश अनिल कुशारे एक ऐसे ही एथलीट हैं। वे नासिक के देवरगांव में एक प्याज की खेती करने वाले साधारण किसान के घर जन्म लेते हैं,कृषि अपशिष्ट के लैंडिंग पिट बनाकर ऊंची उड़ान का अभ्यास करते हैं और विश्व के सर्वश्रेष्ठ लैंडिंग पिटों पर अपनी प्रतिभा की उड़ान से सबको चमत्कृत कर देते हैं।

दो वर्ष की बेटी के 31 वर्षीय पिता सर्वेश इस समय शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। 27 जून को अंतर राज्य एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 2.31 मीटर ऊंची उड़ान के साथ आठ साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड ही नहीं बनाते हैं,बल्कि 2.30 मीटर के मनोवैज्ञानिक बैरियर को भी पार कर जाते हैं। फिर 11 जुलाई को 2.26 मीटर की छलांग के साथ मोनाको में आयोजित  डायमंड लीग में अपने पहले ही प्रतिभाग में कांस्य पदक जीतकर पहले भारतीय हाई जम्पर बनकर इतिहास लिखते हैं। उल्लेखनीय ये है कि कुशारे ने यहां टोक्यो ओलंपिक के संयुक्त चैंपियन जियानमार्को टैम्बेरी और मुताज़ बरशिम जैसे सितारों को पीछे छोड़ देते हैं।

और फिर ग्लासगो में 28 जुलाई को 2.25 मीटर की छलांग के साथ अपना पहला राष्ट्रमंडल खेलों का रजत पदक जीतते हैं। ये उनका दुर्भाग्य कि वे काउंटबैक के आधार पर स्वर्ण पदक चूक जाते हैं। स्वर्ण पदक विजेता जमैका के रोमेन बैकफोर्ड भी कुशारे की तरह 2.28 मीटर की ऊंचाई पार करने में असफल रहते हैं, लेकिन 2.25 की ऊंचाई पहले प्रयास में पार कर जाते हैं और कुशारे अपने तीसरे प्रयास में।

31 साल की उम्र में जब एथलीट रिटायरमेंट ले रहे होते हैं, उस समय कुशारे सफलता के नए मानदंड तय कर रहे हैं। गांव में कृषि अपशिष्ट से बने लैंडिंग पिट से अंतरराष्ट्रीय मंच पर इतिहास रचने की ये यात्रा जितनी रोमानी है उतनी ही प्रेरणादायी भी।

चार

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