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Wednesday, 12 June 2024

सुनील छेत्री

 



समय गौधूलि। दिन गुरुवार। दिनांक 6 जून। सन 2024।  स्थान भारतीय फुटबॉल का मक्का कोलकाता का बिबेकानंद जुबा भारती क्रीडांगन स्टेडियम। मने सॉल्ट लेक स्टेडियम।


इस स्टेडियम के भीतर शोर 120 डेसीबल हुआ जाता है। 68 हज़ार से भी ज़्यादा दर्शक उत्साह के चरम पर हैं। एक नीला समुद्र उमड़ आया है। लेकिन जैसे यहां का मौसम गरम होते हुए भी आर्द्रता से सीला सीला हुआ जाता है,वैसे ही दर्शक उछाह के उच्चतम बिंदु पर होने के बावजूद विदाई की करुणा से भीग रहे हैं। 


वे भारतीय फुटबॉल के एक युग के समापन के साक्षी बन रहे हैं।  


 आज इस शहर में एक नहीं दो सूरज अस्त हो रहे हैं। एक वो जो साल्ट लेक स्टेडियम की दीवारों से परे पश्चिम दिशा में विलीन हुआ जाता है। और एक वो जिसका स्टेडियम के भीतर 110 × 70 मीटर के मैदान में 90 मिनट में अवसान हुआ जाता है।


वे 19 साल से भारतीय फुटबॉल के सिरमौर बने भारतीय फुटबॉल के सबसे चमकदार सितारे को राष्ट्रीय टीम से खेलते हुए अंतिम बार देख रहे हैं।

भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल के कप्तान और सबसे शानदार फारवर्ड सुनील छेत्री अपना अंतिम मैच विश्व कप क्वालीफ़ायर में कुवैत के विरुद्ध खेल रहे हैं।


भारतीय टीम के लिए आज का मैच किसी जलसे से कम नहीं। उसके खिलाड़ी नई जर्सी पहने हुए हैं। ये क्लासिक ब्लू रंग की जर्सी है जिसमें फेडेड लायन स्ट्राइप्स बनी हैं। भारतीय फुटबॉल संघ और स्टारमैक्स एक्टिववियर ने खास इस मौके के लिए बनाया है। 


खिलाड़ियों से लेकर दर्शक तक एक ही भावना से ओतप्रोत हैं 'हमारी दहाड़ सुनो'(hear us roar)। मैच शुरू हो गया है। जैसी शुरुआत भारतीय चाहते थे, वैसी हुई नहीं। बॉल उनके हाथ लग ही नहीं रही है। लेकिन जैसे ही भारतीय खिलाड़ी गेंद को छू भर लेते हैं स्टेडियम गूंज उठता है। 12वें मिनट में भारतीय खिलाड़ी एक मूव बनाते हैं और कॉर्नर अर्जित करते हैं। अनवर अली बॉक्स से शानदार हैडर लगाते हैं, पर बॉल गोलपोस्ट से कुछ ऊपर से चली जाती है। अपने हीरो की शानदार विदाई का ये मैच का सबसे अच्छा अवसर था। पर मौका हाथ से फिसल जाता है।


अंततः मैच बिना गोल के अनिर्णीत समाप्त हो जाता है। जैसी विदाई सुनील छेत्री की होनी चाहिए, वैसी हो नहीं पाती। लेकिन इससे फर्क क्या पड़ता है। इससे उसकी महानता कम तो नहीं हुई जाती। उसका चमकदार कैरियर तो फीका नहीं हुआ जाता। कहां कुछ फर्क पड़ता है उसके साथी खिलाड़ियों पर और स्टेडियम में मौजूद 68 हज़ार दर्शकों पर।


 मैच खत्म हो गया है पर वे अभी भी डटे हैं।


सुनील अब मैदान के चारों और चक्कर लगा रहे हैं अपना आभार प्रकट करने के लिए और स्टेडियम 'छेत्री छेत्री' के गहरे शोर में डूब जाता है। उसके साथी दो कतार में खड़े उसका इंतजार कर रहे हैं। अब वे उसे गार्ड ऑफ ऑनर दे रहे हैं। सुनील के भीतर का बच्चा है कि किलक किलक जाता है। वे रोने लगते हैं। ये वो ही बालक है जिसे के लिए वे कहते हैं कि 'मेरे भीतर एक बच्चा है जो अभी और फुटबॉल खेलना चाहता है।' वो बच्चा मचल उठा है। अभी और फुटबॉल खेलना चाहता है। पर निर्णय लेने पड़ते हैं। वे खिलाड़ियों की दो पंक्तियों के बीच से आगे बढ़ते हैं। एक बार फिर हाथ जोड़ते हैं। और  फिर अदृश्य हो जाते हैं। एक सूरज दिन की यात्रा करके क्षितिज पार जा चुका है। एक सूरज अपना कैरियर पूरा कर मैदान की साइड लाइन के पार दर्शकों की भीड़ के बीच ओझल हो चुका है।  

 

फुटबॉल के एक युग का अवसान हो गया है।


वो सबकी आंखों से ओझल ज़रूर हो गया है लेकिन अपने पीछे एक ऐसी लीगेसी छोड़ गया जिसकी बराबरी कहां कोई कर पायेगा। एक ऐसी लीगेसी जिस पर वो खुद गर्व कर सकता है और हर भारतीय फुटबॉल का चाहने वाला भी।


2005 में पाकिस्तान के विरुद्ध 20 साल के युवा सुनील ने अपने अंतरराष्ट्रीय कैरियर की शुरुआत  की थी और अपना पहला गोल भी। उसके बाद उसने कहां पीछे मुड़कर देखा। अपने घोर अनुशासन, लगन और अभ्यास से  वो गोल मशीन बन जाता है। उसके पैर का जादू उसे मिले पास को गोल में तब्दील कर देता है। वो अपने कैरियर में कुल 94 अंतरराष्ट्रीय गोल करता है। ये केवल और केवल तीन खिलाड़ियों से कम है। रोनाल्डो,ईरान के अली देइ और मेस्सी से।


 1983 में  भारत क्रिकेट का विश्व कप जीत रहा होता है। क्रिकेट आशातीत रूप से लोकप्रियता हासिल कर रहा होता है और एक एलीट खेल से आम आदमी का खेल बन रहा होता है। हॉकी व फुटबॉल जैसे लोकप्रिय खेल नेपथ्य में चले जाते हैं। एक साल बाद 1984 में सिकंदराबाद में एक सैन्य अधिकारी के घर सुनील छेत्री का अवतरण होता है। उसे फुटबॉल की लीगेसी प्राप्त होती है। उसके पिता सेना की टीम के लिए फुटबॉल खेल रहे होते हैं और मां नेपाल की टीम के लिए। उस समय जब बच्चे क्रिकेट की ओर भाग रहे होते हैं,कान्वेंट में पढ़ने वाला ये बालक फुटबॉल को चुनता है और सफलता की नई परिभाषा गढ़ता है।


वो दार्जिलिंग में फुटबॉल का ककहरा सीखता है। मोहन बागान से 2002 में क्लब से कैरियर की शुरुआत करता है। और फिर जेसीटी फगवाड़ा होते हुए अंततः बंगलुरू एफसी से जुड़ जाता है। क्या ही कमाल है आरसीबी का विराट उसका सबसे अच्छा दोस्त होता है। दोनों अपने अपने फन  के उस्ताद खिलाड़ी। फिटनेस फ्रीक,बेहद लगनशील और बेहद अनुशासित भी।


बेंगलुरु जो क्रिकेट का गढ़ है,उसमें सुनील फुटबॉल का परचम लहराता है। जिस शहर में विराट कोहली का डंका बज रहा हो उसी शहर में वो खुद भी लोकप्रियता हासिल करता है। ये सुनील का ही कमाल है कि वो एक आमजन के खेल को एलीट क्लास में भी लोकप्रिय बना देता है।


पुराने समय की फुटबॉल के बाद जिस नई फुटबॉल के पहले स्टार बाइचुंग भूटिया होते हैं, उसके सुनील छेत्री सुपर स्टार बन जाते हैं। भले ही हमारे पास कोई मेस्सी,रोनाल्डो,बापे या हॉलैंड ना हो लेकिन आप गर्व कर सकते हैं कि आपके पास सुनील छेत्री है। हमारा रोनाल्डो भी सुनील है और मेस्सी भी। 


भले ही अब राष्ट्रीय टीम में ना दिखाई दो पर तुम हमारे 'सोनार सोनील' हो और हम 'तोमि हृद माजरे राखबो।'


लव यू सुनील। लव यू छेत्री।

Tuesday, 11 June 2024

सुनील छेत्री



आज जब सुनील छेत्री का सन्यास लेने वाला वक्तव्य सुना तो अनायास ही जाने माने कथाकार सुभाष पंत सर याद आ गए। मैं उन्हें अपने साहित्यिकी कार्यक्रम के लिए बुलाना चाहता था। लेकिन वे कोई कोई बहाना कर स्टूडियो आना टाल रहे थे। कई महीने बाद भी जब वे आने के लिए तैयार नहीं हुए तो मैने उनसे पूछा 'क्या वे नाराज हैं।' तो उन्होंने कहा ऐसा नहीं है कि 'मैं नाराज हूं या नया कुछ नहीं लिख रहा। बल्कि मुझे लगता है कि मैं आकाशवाणी पर बहुत बोल चुका। अब नए युवा साहित्यकारों को मौका मिलना चाहिए।'


सुनील अपने वक्तव्य में कुछ ऐसा ही कह रहे थे। वे कह रहे थे कि ऐसा नहीं है कि 'मैं थक गया हूं या कुछ ऐसा वैसा सोच रहा हूं। बल्कि मैं चाहता कि युवा खिलाड़ियों को मौका मिले और उन्हें ग्रूम किया जाए।'


दरअसल उन पर भी उम्र फिदा है। 39 साल की उम्र में भी वे शानदार फुटबॉल खेल रहे हैं। लेकिन उन्हें भारतीय फुटबॉल की और उसके भविष्य की भी चिंता है। वे चाहते है अब युवा आगे आएं। असाधारण प्रतिभा का ये खिलाड़ी उच्च विचारों से भी भरा है।


जो भी हो तुम एक खिलाड़ी के रूप में मैदान से विदा हो सकते हो पर यकीन मानो तुम कहीं नहीं जा रहे हो। तुम्हारा एक ठिकाना तुम्हारे प्रशंसकों के दिलों में हमेशा बना रहेगा। 


दरअसल हमारे रोनाल्डो,हमारे मेसी,हमारे माराडोना या फिर हमारे पेले भी तुम हो और जरनैल सिंह ढिल्लो,पीके बैनर्जी,बलराम और आई एम विजयन के सच्चे वारिस भी।


हैप्पी रिटायरमेंट।

Saturday, 28 January 2023

सानिया मिर्जा : स्पोर्ट्स आइकॉन

                                (गूगल से साभार)

 आखिर क्या होता है खेल को 'अलविदा' कहना। खेल से 'सन्यास' लेना। इसे हम,आप या कोई भी खेल प्रेमी कहां समझ पाएंगे। उनके लिए इसे समझ पाना इसलिए मुमकिन नहीं होता कि मैदान से उनका एक चहेता रुखसत होता है,तो दो और खिलाड़ी उसकी जगह भरने को आ जाते हैं।  प्रसंशक हैं कि पहले को भुला नए के साथ हो लेते हैं।

पर एक खिलाड़ी के लिए ऐसा कहाँ संभव होता है। खेल से सन्यास का मतलब एक आम आदमी के लिए चाहे जो हो, लेकिन एक खिलाड़ी के लिए ये उसकी सबसे प्रिय वस्तु से विछोह है। एक यात्रा का अंत है। अपने सबसे प्रिय सपने का अचानक से लुप्त हो जाना है। एक ऐसा सपना जो उसके दिल में जन्मा और बरसो बरस बड़े जतन से पाला पोसा और फिर अचानक एक दिन उससे दूर कहीं बहुत दूर चला जाता है। फिर कभी ना मिल पाने को। 

ये अंत है। ये बिछोह है। ये दुख है। ये संताप है। ये भय भी है।

सच तो ये है 'खेल से सन्यास' की इस 'पर्वत सी पीर'को सिर्फ और सिर्फ वो खिलाड़ी ही समझ और महसूस कर पाता है जो खेल से सन्यास लेता है। उसे अलविदा कहता है। 

इसे समझना है तो एक बार महान इतावली फुटबॉलर फ़्रांचेस्को तोत्ती के विदाई वक्तव्य को ध्यान से देखें। वे एएस रोमा से 25 साल खेलने के बाद खेल को अलविदा लेते हुए कह रहे थे- "आपको पता नहीं है पिछले दिनों में पागलों की तरह अकेले में बैठकर कितना रोया हूँ। काश कि मैं कविता लिख पाता। लेकिन ये मुझे नहीं आता। पिछले 25 सालों से में फुटबॉल के मैदान में पैरों की ठोकर से कविता लिखने की कोशिश कर रहा था,और अब सबकुछ खत्म हो गया है।....अब मैं घास की गंध को इतने करीब से नहीं अनुभव कर पाऊंगा। अब जब मैं दौडूंगा तो सूर्य मेरे चेहरे को ऊष्मा नहीं देगा। मैं बार बार खुद से पूछ रहा हूँ मुझे इस सपने से क्यूं जगाया जा रहा है। लेकिन ये सपना नहीं सच है,और अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मैं डर गया हूँ। मुझे डरने की मोहलत दीजिए।"

सौरव गांगुली अपनी किताब 'एक सेंचुरी काफी नहीं'मैं अपने सन्यास के बारे में लिख रहे थे "मेरे दिल में तरह तरह के जज़्बात थे। मैं बेहद गमज़दा था मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा प्यार दूर जा रहा था।"

बीते सितंबर लंदन में लेवर कप के बाद सन्यास लेते समय के महानतम टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर को जार जार रोते हुए देखिए तो एहसास होगा कि एक खिलाड़ी के खेल से सन्यास के मायने क्या होते हैं। 

फिर बीते शुक्रवार, 27 जनवरी 2023 को मेलबर्न पार्क के रॉड लेवर अरीना में भारत की सानिया मिर्ज़ा की आखों से बहते पानी को देखिए। और एक खिलाड़ी को खेल से विदा कहने का मतलब समझिए।

उस दिन मिश्रित युगल के फाइनल में ब्राजील के लुईसा स्तेफानी और राफेल मतोस की जोड़ी से 6-7(2-7),2-7 से हार जाने के बाद ट्रॉफी प्रेजेंटेशन स्पीच में सानिया के साथी खिलाड़ी रोहन बोपन्ना कह रहे थे "ये सच है, सानिया के साथ खेलना स्पेशल है। हमने पहला मिश्रित युगल उस समय साथ खेला था जब वो 14 साल की थी और खिताब जीता था। आज यहां हम आखिरी ग्रैंड स्लैम मैच खेल रहे हैं। दुर्भाग्य से हम खिताब नहीं जीत सके। लेकिन शुक्रिया उस सब के लिए जो तुमने भारतीय टेनिस के लिए किया।" पास खड़ी सानिया थी कि अपने आसुंओं को बहने से रोकने की असफल कोशिश किए जा रही थीं। और आंसू थे कि बहे जाते जाते थे।

                               (गूगल से साभार)

सानिया की आंखों के ये आंसू हार के आंसू नहीं थे बल्कि ये अपने पैशन अपने सपने अपनी ज़िंदगी के सबसे अज़ीज हिस्से से बिछोह से उपजे दुख के आंसू थे। हालांकि वे कह रही थीं "अगर मैं रो रहीं हूँ ये दुख के नहीं खुशी के आंसू हैं। मैं विजेताओं की खुशी के रंग को भंग नहीं करना चाहती।"वे ऐसी ही हैं । इतनी ही उद्दात्त। दुख ऐसे ही उद्दात्त बना देता है मनुष्य को।

ये 36 वर्षीया सानिया का आखिरी ग्रैंड स्लैम मैच  था। उनके 18 साल लंबे खेल जीवन का समापन। खेल से सन्यास। भले ही औपचारिक रूप से उनका आखिरी प्रतियोगिता फरवरी में दुबई इंटरनेशनल हो। पर वास्तव में  उनके खेल जीवन का वास्तविक समापन यही था। 

उन्होंने खेल से विदा कहने को वही मैदान चुना जहां से उन्होंने अपने ग्रैंड स्लैम कॅरियर की शुरुआत की थी साल 2005 में। तब वे तीसरे राउंड तक पहुंची थी। जहां वे उस साल की चैंपियन सेरेना विलियम्स से हार गईं थी। वे हार ज़रूर गई थीं। लेकिन इस हार ने उनमें विश्वास भरा था कि उनके लिए एक खुला आसमां सामने है उड़ान भरने के लिए। उस मैच के बाद सेरेना ने रिपोर्टर्स  से बात करते हुए कहा था "मैं विशेष रूप से भारत से एक खिलाड़ी को इतना अच्छा खेलते हुए देखकर रोमांचित हूँ। उसका खेल बहुत सॉलिड है और वह अभी केवल 18 साल की है। उसका भविष्य उज्जवल है।"

6 साल की उम्र से टेनिस खेलना शुरू करने वाली सानिया सीनियर वर्ग में खेलने से पहले ही जूनियर स्तर पर अनेक उपलब्धि हासिल कर चुकी थी। जूनियर लेवल पर 10 एकल और 13 युगल खिताब वे जीत चुकी थीं जिसमें 2003 का  जूनियर विम्बलडन युगल खिताब भी शामिल था जो उन्होंने एलिसा क्लेबिनोवा के साथ जीता था।

2005 में ऑस्ट्रेलियन ओपन में खेलने के बाद  फरवरी में हैदराबाद में डब्ल्यूटीए खिताब जीता और कोई डब्ल्यूटीए खिताब जीतने वाली वे पहली भारतीय महिला बनी। उसी साल वे यूएस ओपन में प्री क्वार्टर फाइनल तक पहुंची जहां अंततः चैंपियन मारिया शारापोवा से हारीं। उस साल की सफलता ने उन्हें 2005 की 'डब्ल्यूटीए नवोदित खिलाड़ी' के खिताब से नवाजा। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने व देश के लिए अनेक उपलब्धियां हासिल कीं।

अगस्त 2007 में उन्होंने 27वीं रैंकिंग हासिल की। सौ के अंदर रैंकिंग हासिल करने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं। इससे पहले केवल दो भारतीय पुरुष खिलाड़ी, रमेश कृष्णन (उच्चतम 23वीं) और विजय अमृतराज (उच्चतम 18वीं), 30 के अंदर रैंकिंग हासिल कर सके थे। अगले चार सालों तक वे 35वीं रैंकिंग के भीतर रहीं और दुनिया की श्रेष्ठ महिला खिलाड़ियों में उनकी गणना होती रही। 2012 में कलाई में चोट के बाद एकल को छोड़कर पूरी तरह युगल खिलाड़ी बन गईं। उन्हें अपने कॅरियर के शीर्ष पर जो पहुंचना था। उन्होंने डबल्स में 6 ग्रैंड स्लैम खिताब जीते। 2009 में ऑस्ट्रेलियन ओपन और 2012 में फ्रेंच ओपन महेश के साथ और 2014 में यूएस ओपन ब्राज़ील के ब्रूनो सोरेस के साथ मिश्रित युगल के तीन खिताब।

महिला युगल में भी उन्होंने तीन ग्रैंड स्लैम जीते। उनकी सबसे सफल और शानदार जोड़ी स्विट्जरलैंड की मार्टिना हिंगिस के साथ बनी जिसे 'संतीना'के नाम से जाना गया(सानिया का SAN और मार्टिना का TINA)। इस जोड़ी ने ना केवल 14 खिताब जीते जिसमें 2015 के विम्बलडन और यूएस तथा 2016 का ऑस्ट्रेलियन खिताब शामिल हैं बल्कि लगातार 44 मैच जीतने का रिकॉर्ड भी बनाया।

इस दौरान वे 91 हफ्तों तक डबल्स की नंबर एक खिलाड़ी रहीं और अपने खेल जीवन में कुल 43 डब्ल्यूटीए खिताब जीते।

वे एक असाधारण खिलाड़ी थीं जिन्होंने अपनी उपलब्धियों और अपने खेल से भारत में टेनिस के स्वरूप को ही बदल दिया। वे मार्टिना नवरातिलोवा और स्टेफी ग्राफ के खेल को देखते हुए बड़ी हो रही थीं और उनके समय तक विलियम्स बहनें परिदृश्य पर आ चुकी थीं। उन्होंने भी आक्रामक खेल को अपनाया। उनके फोरहैंड शॉट बहुत शक्तिशाली होते थे। वे उनके समकालीन किसी खिलाड़ी जितने ही शक्तिशाली होते। सर्विस रिटर्न्स भी बहुत शक्तिशाली और कोणीय होते। दरअसल उनके खेल की एक कमजोरी थी कोर्ट में मूवमेंट की। उनका कोर्ट में मूवमेंट बहुत धीमा था और इसकी भरपाई अपने शक्तिशाली फोरहैंड और आक्रामक खेल से करतीं। उनके पहले तक भारत में टेनिस एक एलीट और नर्म मिजाज़ खेल  था  जिसे सानिया ने पावर और रफ टफ खेल में बदल दिया।

आक्रामकता, बिंदासपन और साफगोई उनमें जन्मजात थी और उनके स्वाभाविक चारित्रिक गुण। वे जितनी आक्रामक मैदान में प्रतिद्वंदी के प्रति होती, उतनी ही आक्रामक मैदान के बाहर अपने विरोधियों के प्रति। वे अपेक्षाकृत संभ्रांत परिवार से थीं इसलिए उन्हें उस तरह से संसाधनों के अभावों का सामना नहीं करना पड़ा जैसे अमूमन भारतीय महिला खिलाड़ियों को करना पड़ता है। फिर उनके माता पिता हर समय उनके साथ खड़े रहे। 

दरअसल उनके संघर्ष दूसरी तरह के थे। वे महिला थी और मुस्लिम भी। और वे एक ऐसे ग्लैमरस खेल को चुन रही थीं जिसके ड्रेसकोड को लेकर रूढ़िवादी परंपरागत मुस्लिम समाज सहज नहीं हो सकता था। उनका विरोध होना स्वाभाविक था। और खूब हुआ। उनके खिलाफ फतवे जारी किए गए। 2005 में वे केवल 18 साल की थीं और उस साल सितंबर में कोलकाता में सनफीस्ट ओपन खेलने गईं तो उनके कपड़ों को लेकर पहला  फतवा जारी किया गया। लेकिन वे गईं वहां। वे वहां कड़ी सुरक्षा में रहीं। एक 18 साल की लड़की जो चारों और से सुरक्षा घेरे में रहती हो कैसी मानसिकता में जी और खेल रही होगी। लेकिन वो किसी और मिट्टी की बनी थी। उसने 'गिव अप'नहीं किया। उसने टेनिस की ऑफिसियल ड्रेसकोड का पालन किया। स्कर्ट और शॉर्ट में खेली। उसने साहसिक इबारत वाली टी शर्ट पहनने से भी गुरेज नहीं किया। 

विवाद और विरोध उसके साथ साये की तरह थे। फिर वो हॉफमैन कप के एक मैच के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप हो,विवाह पूर्व संबंधों का या पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक का उनके साथ विवाह पूर्व हैदराबाद में रहना हो या उनके साथ विवाह का हो,उन्होंने सभी का सामना किया और आगे बढ़ीं।  खेल प्रशासन और टीम कम्पोज़िशन को लेकर भी विवाद हुए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने हर बार स्टैंड लिया और स्पष्ट स्टैंड लिया।

उनका सबसे बड़ा और स्पष्ट स्टैंड महिलाओं की स्थिति को लेकर था। अखबारों में कहा गया कि सानिया मिर्जा मानती हैं  'भारत में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता।' इस बात पर उनकी कड़ी आलोचना हुई। पर उन्होंने कहा 'मैने ये नहीं कहा भारत में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता। अगर ऐसा होता तो मैं आज यहां नहीं होती। लेकिन मैं बहुत भाग्यशाली हूँ,बहुत ज़्यादा। लेकिन हज़ारों अन्य स्त्रियां इतनी भाग्यशाली नहीं हैं। उनका शारीरिक और यौन शोषण होता है और उन्हें अपने सपनों को पूरा करने की आज़ादी नहीं है क्योंकि वे स्त्रियां हैं।' आज भी उनका स्टैंड स्पष्ट है। 

पीटी उषा के बाद वे भारत की सबसे बड़ी स्पोर्ट्स वीमेन आइकॉन थीं। सानिया मैरी कॉम और साइना नेहवाल के साथ स्टार स्पोर्ट्स वोमेन की त्रयी बनाती हैं। पीवी सिंधु उनके बाद आईं। अपने साहसिक,कभी हार ना मानने,सतत संघर्ष शील और फेमिनिस्ट सानिया नई पीढ़ी की भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी प्रेरणा स्रोत हैं। तभी तो स्टार रेसलर विनेश फोगाट जो खुद खेल प्रशासन और डब्ल्यूएफआई के बाहुबली और दबंग माने जाने वाले अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली उनके सन्यास पर इतनी खूबसूरत बात कह सकीं कि "शुक्रिया सानिया,युवा भारतीय लड़कियों की एक पूरी पीढ़ी को ये बताने के लिए कि सपने कैसे देखे जाते हैं।उनमें से मैं भी एक हूँ। आप तमाम चुनौतियों के बीच पूरे जुनून के साथ खेलीं। आपका दाय भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए बहुत मायने रखता है। सम्मान और बधाई !"

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खेल मैदान में हमेशा तुम्हारी कमी खलेगी। नई पारी के लिए बहुत बधाई सानिया।

Sunday, 25 September 2022

थम गई चकदाह एक्सप्रेस

 


शहर लंदन भी क्या शहर है। कितना खुशकिस्मत। कितना प्रिविलेज्ड। फुटबॉल का वेम्बले इस शहर में है। टेनिस का विंबलडन इस शहर में है। क्रिकेट का लॉर्ड्स इस शहर में है।

शायद ये इस शहर का आकर्षण ही है कि लंबे समय से अनवरत दौड़ रहीं दो खेल एक्सप्रेस यहां आकर ठहर जाती हैं हमेशा हमेशा के लिए। 

ये साल 2022 है। तारीख़ 24 सितंबर की है। खेल इतिहास में दो सफे लिखे जा रहे हैं। दो खेलों के दो महान खिलाड़ी अपने अपने खेल मैदान को अलविदा कह रहे हैं।

24 साल से निरंतर दौड़ रही टेनिस की 'फ़ेडेक्स'शहर के 'द ओ टू' एरीना में आकर ठहर जाती है।

उधर कोलकाता के ईडन गार्डन से एक क्रिकेट एक्सप्रेस 'चकदा एक्सप्रेस' 20 साल लंबी अनवरत यात्रा कर क्रिकेट के मक्का 'लॉर्ड्स'पहुंचती है और यहां आकर विश्राम की मुद्रा में ठहर जाती है।


महिला क्रिकेट की दुनिया की सबसे सफल और सबसे तेज गेंदबाज झूलन निशित गोस्वामी अपने बेहद सफल और 20 साल लंबे  कॅरियर के समापन की घोषणा करती हैं।

ये बीस साल लंबा जीवन हैरतअंगेज कर देने वाला है। इस दौरान वे 12 टेस्ट मैच, 204 एकदिवसीय मैच और 68 टी20 मैच खेलती हैं। वे एकदिवसीय क्रिकेट में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाली खिलाड़ी हैं। उन्होंने कुल 255 विकेट लिए हैं। दक्षिण अफ्रीका की शबनिम इस्माइल के 191 और ऑस्ट्रेलिया की फ्रिट्ज़पेट्रिक से मीलों आगे। इतना ही नहीं क्रिकेट के सभी फॉर्मेट में कुल मिलाकर सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाली खिलाड़ी हैं। उनके नाम कुल 355 अंतरराष्ट्रीय विकेट हैं। उनके बाद कैथरीन ब्रन्ट (329),एलिस पेरी(313)शबनिम इस्माइल(309) और अनीसा मोहम्मद (305)  ही तीन सौ से अधिक विकेट लेने वाली गेंदबाज हैं।

झूलन एक बेहतरीन आल राउंडर खिलाड़ी हैं। मध्यम तेज गति की गेंदबाज और मध्यमक्रम की राइट हैंड बल्लेबाज़। गति उनकी बोलिंग का सबसे बड़ा हथियार है। वे निरंतर 120 किमी की गति से गेंद फेंकती रहीं है। तेज गति और अचूक लेंथ और लाइन उन्हें दुनिया की सबसे सफल गेंदबाज बनाती है।

झूलन साल 2002 में 19 साल की उम्र में चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ एकदिवसीय मैच से अपने अंतरराष्ट्रीय कॅरियर की शुरुआत करती हैं। तीन महीने बाद इंग्लैंड के विरुद्ध ही वे अपना पहला टी20 मैच खेलती हैं। टेस्ट क्रिकेट का आगाज़ करने के लिए उन्हें चार साल और इंतज़ार करना पड़ता है। लेकिन इसकी शुरुआत भी होती इंग्लैंड के विरुद्ध ही है।

क्या ही संयोग है वे अपने कॅरियर की समाप्ति भी इंग्लैंड के खिलाफ ही मैच से करती हैं। कितनों के भाग्य में कॅरियर की समाप्ति लॉर्ड्स के मैदान में करना लिखा होता है। ये झूलन के भाग्य में था। ये उन्हें मिला नहीं। उन्होंने इसे अर्जित किया है।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम इंग्लैंड के दौरे पर है। वो पहले दो मैच जीतकर 2-0 की बढ़त ले चुकी है। ऐसा पिछले 24 सालों में पहली बार हो रहा है।

फिर 24 सितंबर का दिन आता है। भारत इंग्लैंड के विरुद्ध सीरीज का तीसरा मैच होने जा रहा है। भारतीय बालाएं सीरीज जीत चुकी हैं। पर उनकी आंखें नम हैं। उनके हृदय मलिन हैं। लॉर्ड्स की फिजा में नमी उग आई है। सारा वातावरण सीला सीला सा है। उनकी अपनी पूर्व कप्तान, दुनिया की सबसे सफल गेंदबाज आज अंतिम बार जो मैदान पर उनके साथ उतरेगी।

झूलन गोस्वामी इस मैच के बाद क्रिकेट को विदा कह देंगी।

अब अद्भुत दृश्य आकार लेते जाते हैं।

मैच से पहले टॉस हो रहा है। भारतीय कप्तान टॉस के लिए अकेले नहीं जाती। उनके साथ झूलन जा रहीं हैं। इंग्लैंड की कप्तान एमी जोंस सिक्का उछालती हैं और झूलन 'हेड' कहती हैं। टॉस एमी जीतकर क्षेत्र रक्षण चुनती हैं। अब झूलन और एमी हाथ मिलाती हैं। झूलन के बराबर खड़ी हरमनप्रीत की आंखें डबडबा आई हैं।


अब भारतीय टीम बैटिंग कर रही है। भारत के सात विकेट आउट हो चुके हैं। पूजा वस्त्रकार आउट होकर वापस पैवेलियन लौट रही हैं और झूलन मैदान में प्रवेश कर रही हैं। सीमारेखा के अंदर इंग्लैंड की सभी खिलाड़ी दो समानांतर पंक्तियों में खड़ी हैं। वे झूलन को गार्ड ऑफ ऑनर दे रही हैं।

अब भारतीय टीम फील्डिंग के लिए मैदान में जा रही है। भारतीय खिलाड़ी कतारबद्ध खड़ी हैं और झूलन को 'गार्ड ऑफ ऑनर'दे रही हैं। वे झूलन को ऐसे ही पिच तक ले जाती हैं। 

ये इंग्लैंड की पारी का 36वां ओवर है। गेंद झूलन के हाथ में हैं। वे अपनी इस पारी का दसवां और अपने खेल कैरियर की आखिरी 6 गेंद फेंकने वाली हैं। 5 गेंद फेंक चुकी हैं। अब उन्होंने अपनी आखिरी गेंद फेंकी। ये एक डॉट बॉल थी। उनके जीवन की 10005वीं गेंद थी। अब तक किसी और गेंदबाज ने इतनी गेंद नहीं डाली हैं। पर झूलन औरों से जुदा हैं। वे ये कारनामा कर सकती हैं। उन्होंने कर दिखाया है।

आखिरी गेंद फेंकते ही हरमनप्रीत दौड़कर झूलन को बाहों में भर लेती हैं। उनकी आंखों से पानी बरस रहा है। इतने में सारे खिलाड़ी उनसे लिपट गए हैं। आंखें सबकी बरस रहीं हैं।

मैच समाप्त हो गया है। भारत ने ये मैच 16 रनों से जीतकर सीरीज क्लीन स्वीप कर ली है। खिलाड़ियों ने झूलन को कंधों पर उठा लिया है और कंधों पर झूलन को मैदान से बाहर जाए जाते हैं। ऐसी बिदाई झूलन के अलावा बस क्रिकेट के भगवान सचिन को ही नसीब हुई है।

दरअसल लॉर्ड्स के मैदान के ये अद्भुत दृश्य, अपने साथी को ऐसी विदाई, ऐसा सम्मान पाने के दृश्य ऐसे ही नहीं बनते। इसके पीछे घोर संघर्ष,कड़ी मेहनत, अदम्य इच्छाशक्ति और दृढ़ मनोबल की ज़रूरत पड़ती है। झूलन को ये सम्मान यूं ही नही मिल गया। ये उन्होंने अपने लिए अर्जित किया है।

ये सम्मान उनके द्वारा देखे गए सपने और उन सपनों को पूरा करने की उनकी लगन,उनकी कड़ी मेहनत,उनके असाधारण परिश्रम और अदम्य साहस का प्रतिफल है। ये क्रिकेट के लिए उनका जूनून था। टीन ऐज में रोजाना चकदाह से कोलकाता के विवेकानंद स्टेडियम तक का 80 किलोमीटर का फ़ासला झूलन जैसी जीवट की बालिका के बस की बात हो सकती है।

ये झूलन का जूनून, उनकी मेहनत और लगन ही थी कि चकदाह से कोलकाता का सफर चेन्नई से लॉर्ड्स लंदन तक के सफर में तब्दील हो जाता है। कि फुटबॉल की दीवानी एक लड़की विश्व की सबसे सफल गेंदबाज बन जाती है। कि वो अद्भुत सम्मान और अपूर्व प्रेम की हकदार बन जाती है।

झूलन का ये सम्मान दरअसल एक खिलाड़ी भर का सम्मान नहीं है। ये भारतीय महिला क्रिकेट का सम्मान है। झूलन का संघर्ष केवल एक खिलाड़ी का संघर्ष नहीं है,ये भारतीय महिला क्रिकेट का संघर्ष और विजयगाथा है।

भारतीय महिला क्रिकेट का सम्मान पाने और समान दर्जा पाने का संघर्ष पिछली शताब्दी में सत्तर के दशक में शांता रंगास्वामी जैसी ख़िलाडियों के साथ शुरू होता है। 2006 में महिला क्रिकेट का प्रबंधन बीसीसीआई अपने हाथों में ले लेता है। पर महिला खिलाड़ियों का संघर्ष जारी रहता है। उनकी स्थिति किस हद तक दयनीय थी इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें अपनी किट तक के लिए लड़ाई लड़नी होती थी। उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी योग्यता से उन्होंने विश्व क्रिकेट में अपनी हैसियत बनाई और वो सम्मान हासिल किया जो 24 सितंबर 2022 को लॉर्ड्स में झूलन को मिला।

झूलन  की असाधारण विदाई और सम्मान केवल झूलन का सम्मान नहीं है,ये भारतीय महिला क्रिकेट का सम्मान है,पूरी आधी आबादी का सम्मान है।

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झूलन को असाधारण क्रिकेट कॅरियर और उपलब्धियों के लिए बधाई और जीवन की नई पारी के लिए शुभकामनाएं।

खेल मैदान से अलविदा झूलन।


रुक जाना 'फ़ेडेक्स' का




सुप्रसिद्ध शायर फ़िराक गोरखपुरी साहब ने कभी एक शेर कहा था-

"आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख्र करेंगी हम अशरो। 

जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने फ़िराक़ को  देखा है। "

भले ही हमने अदबी दुनिया के 'फिराक' को ना देखा हो,लेकिन हमने खेलों की दुनिया के 'फ़िराक' को देखा है। कि हमने रोजर फेडरर को खेलते हुए देखा है। यकीन मानिए आने वाली नस्लें ज़रूर उन सब पर रश्क़ करेंगी जिन्होंने फेडरर को खेलते हुए देखा है। जो उनके 24 साल के खेल जीवन के साक्षी रहे हैं। जिन्होंने 2003 में विंबलडन खिताब से लेकर 2022 में 23-24 सितंबर की रात को लेवर कप में राफा के साथ जोड़ी बनाकर यूरोप की टीम से अन्तिम मैच तक खेलते फेडरर को देखा ही नहीं उस खेल के जादू को महसूस किया है। 

ऐसी खुशनसीबी कितनों के भाग्य में बदी होती है।

कुछ साधक अपनी विधा के साधक भर नहीं होते, वे जादूगर होते हैं। वे अपने विधा से प्रभावित नहीं करते,बल्कि सम्मोहित करते हैं। एक ऐसा सम्मोहन जिसके असर से ताउम्र निकल नहीं पाते। बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का जादू हो या कुमार गंधर्व के गायन का। कहां कोई बच पाता है। उदय शंकर के पैरों की थिरकन  का जादू हो लच्छू महाराज की भंगिमाओं का जादू। कौन अछूता रह जाता हैं। बेगम अख्तर की गमकती आवाज हो या परवीन शाकिर की मखमली आवाज। कौन इसमें डूब डूब नहीं जाता। 

इनकी कला के सम्मोहन से कहाँ कोई बच पाता है।

और हां, रोजर फेडरर के खेल के जादू से भी कोई कहां बच पाता है।


स्विट्ज़रलैंड की खूबसूरत वादियों में बसे बासेल में जन्मा ये जादूगर मानो अपनी धरती की सारी खूबसूरती खुद अपने में और अपने खेल में समेटे पैदा हुआ हो जिसने आगे चलकर अपने खेल कौशल से,अपनी कला से,उसके खूबसूरत निदर्शन से सारी दुनिया को अभिभूत कर देना था। कि हर किसी को उसके सम्मोहन के मोहपाश में बंध जाना था।

ये दुनिया एक रंगमंच है जिसमें पर्दा उठता है और गिरता है। टेनिस की दुनिया भी रंगमंच से इतर कहां कुछ है। जिस पर पिछले कितने दिनों से तीन पात्रों वाले जादुई यथार्थ वाले शो का मंचन चल रहा है। एक ऐसा शो जिसका पर्दा एक बार उठा तो गिरने का नाम ही ना लेता। एक ऐसा मंच जिस पर तीन पात्रों की कला का जादू बिखर बिखर जाता है। 

ये फेडरर,राफा और नोवाक है। 

ये तीनों हैं कि थकने का नाम ही ना लेते। रंगमंच का परदा हैं कि गिरने का नाम ही ना लेता। अनवरत चलता शो। तीन अंकों का। तीन अंक,तीन पात्रों द्वारा अभिनीत। पात्र, एक दूसरे से अलग भी और एक दूसरे से प्रतिघात करते हुए भी। पात्र एक दूसरे में गुँथे हुए। पात्र एक दूसरे से स्वतंत्र होते भी एक दूसरे में एकाकार। एक दूसरे के बिना आधे अधूरे से। 

ये टेनिस के आइकॉन है। ये टेनिस के देवता है। ये टेनिस की प्रतिमूर्ति हैं। 

ये फेडरर हैं,ये राफा हैं,ये नोवाक हैं।  

अंततः 

इन तीनों में से एक 'अंक' समाप्त हो रहा है। एक पर्दा गिर रहा है। एक पात्र रंगमंच से विदा ले रहा है। टेनिस का एक युग समाप्त हो रहा है। 

कि किसी ग्रीक देवता सा एक खिलाड़ी जिसे दुनिया 'फ़ेडेक्स' कहती है, टेनिस की दुनिया को अलविदा जो कह रहा है।

फेडरर अपने सन्यास के लिए लंदन को चुनते हैं। एक ऐसा स्थान जहाँ से वे महानता की पहली सीढ़ी चढ़ते हैं। अपना पहला जूनियर खिताब जीतते हैं। अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीतते हैं।

 वे एक ऐसा समय चुनते हैं जब 19 साल का एक युवा खिलाड़ी कार्लोस अलकराज यूएस ओपन जीतकर रंगमंच से एक नए शो का पर्दा उठाता है और मंच से उदघोषणा करता है कि हम आपके योग्य उत्तराधिकारी हैं। और फेडरर हैं कि नई पीढ़ी के लिए मंच खाली कर देते हैं।

वे अपने सन्यास के लिए एक ऐसे अवसर  का चुनाव करते हैं जो टेनिस के महान खिलाड़ी रॉड लेवर के नाम पर आयोजित होता है जिनके प्रति फेडरर के मन में अगाध श्रद्धा है और जिस प्रतियोगिता को आकार लेने में वे खुद बड़ा योगदान करते हैं। वे लेवर कप में अपना आखिरी मैच खेलना चुनते हैं।

वे अपने लिए लंदन को चुनते हैं। वो लंदन जो टेनिस के जन्मस्थली इंग्लैंड की राजधानी है। लंदन जहां विम्बलडन है। वो विम्बलडन जहां वे आठ खिताब जीतते हैं। उस लंदन में जहां टेनिस अपने सबसे क्लासिक रूप में आज भी शेष है। वहां टेनिस का सबसे क्लासिक खिलाड़ी पहले टेनिस से एकाकार होता है और फिर को अलविदा कहता है। 

टेनिस है कि फेडरर हुई जाती है। फेडरर हैं कि टेनिस हुए जाते हैं। 'इन्दिरा इज इंडिया'पर बहुतेरों को गुरेज हो सकता है। पर कौन ऐसा होगा जिसे इस बात पर एतराज हो कि 'फेडरर इज टेनिस'या फिर 'टेनिस इज फेडरर'।

फेडरर 1998 में विंबलडन का जूनियर खिताब जीतते हैं। 2001 में विम्बलडन के चौथे दौर में उस समय के सबसे बड़े खिलाड़ी पीट सम्प्रास को हराकर टेनिस टूर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। और फिर 2003 का साल आता है। वे विम्बलडन खिताब जीतकर एक नए युग के आरंभ की घोषणा करते हैं। 

और फिर 2008 तक टेनिस का समय केवल फेडरर का समय होता है जब विम्बलडन फाइनल में एक ऐतिहासिक मैच में राफेल नडाल उन्हें 6-4,6-4,6-7(5-7),6-7(8-10),9-7 से हरा नहीं देते। लगभग 5 घंटे चले इस मैच को मैकनरो सहित तमाम टेनिस विशेषज्ञ टेनिस इतिहास का सर्वश्रेष्ठ मैच मानते हैं।

उसके बाद का समय उनके पराभव का नहीं बल्कि महान त्रिकोणीय प्रतिद्वंदिता का समय है। उस समय तक टेनिस परिदृश्य पर नोवाक भी नमूदार जो हो जाते हैं। हालांकि इस त्रिकोणीय प्रतिस्पर्धा को चतुष्कोणीय बनाने के लिए एंडी मरे भी जोर आजमाइश करते पाए जाते हैं। लेकिन वे जल्द ही श्रीहीन हो जाते हैं।

जिस समय फेडरर टेनिस परिदृश्य पर पदार्पण करते हैं वो संक्रमण काल था। संक्रमण इसलिए कि खेल अपना स्वरूप बदल रहा था। सर्व और वॉली का खेल बेसलाइन के खेल में बदल रहा था।

रैकेट में आई तब्दीली इस बदलाव का बायस थी। उस समय फेडरर ने सर्व और वॉली टेक्नीक को बचा कर रखा था। वे अपने आदर्श पीट सम्प्रास की तरह तेज सर्विस करते और जितना अच्छा बेसलाइन से खेलते उतना ही अच्छा नेट पर खेलते। वे शानदार ताकतवर ग्राउंड स्ट्रोक्स से विपक्षी को हतप्रभ कर देते। पर कोणीय फोरहैंड इनसाइड आउट शॉट उनका सबसे मारक हथियार था और एक हाथ वाला बैकहैंड उनका सबसे खूबसूरत और ग्रेसफुल शॉट। 

उनके खेल की सबसे खूबसूरत बात उनका कोर्ट कवरेज होता। वे  पूरे कोर्ट में पानी की तरह बहते से प्रतीत होते। एक कोने से  दूसरे कोने तक पहुंचना एकदम एफर्टलेस होता। ऐसा करते देखना एक ट्रीट से कम ना होता।


किसी भी खिलाड़ी की महानता केवल उसकी अपनी उपलब्धियों भर से निर्धारित नहीं होती,बल्कि इस बात से भी होती कि उसके प्रतिद्वन्दी कैसे थे। खेल इतिहास में हर महान खिलाड़ी की महान प्रतिद्वंद्विताएँ रही हैं। दरअसल ये प्रतिद्वंद्विताएँ एक दूसरे के खेल को समृद्ध करती चलती है और ये दोनों मिलकर अंततः खेल को समृद्ध करती हैं। खेलों की कुछ महान प्रतिद्वंद्विताओं को देखिए। मुक्केबाजी में मोहम्मद अली बनाम जो फ्रैजियर,टेनिस में मार्टिना नवरातिलोवा बनाम क्रिस एवर्ट,बैडमिंटन में लिन डान बनाम ली चोंग वेई,गोल्फ में अर्नाल्ड पामर बनाम जैक निकलस या फिर बास्केटबॉल में लॉरी बर्ड बनाम मैजिक जॉनसन। और भी ना जाने कितनी। व्यक्तिगत भी और दलगत भी।

ठीक इसी तरह की प्रतिद्वंदिता फेडरर बनाम राफा,फेडरर बनाम नोवाक और नोवाक बनाम राफा हैं। सच तो ये है इनमें से किसी एक की बात शेष दोनों का उल्लेख किए बिना पूरी हो ही नहीं सकती। इन तीनों की प्रतिद्वंदिता ने टेनिस को असीमित ऊंचाइयों पर पहुंचाया है,उसे लिमिटलेस बना दिया है। ये एक तथ्य भर है कि 2003 से लेकर अब तक के कुल 77 ग्रैंड स्लैम में से 63 इन तीनों ने जीते हैं। राफा ने 22,नोवाक ने 21 और फेडरर ने 20। 


 ये आंकड़े हैं जो रिकॉर्ड भर बनाते हैं। अपने समय के सुप्रसिद्ध खिलाड़ी रिचर्ड्स गास्केट का मानना है कि जब महानतम निर्धारित करने की बात आती है तो ग्रैंड स्लैम की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण 'एस्थेटिक्स और ग्रेस'हैं। वे कहते हैं' फेडरर को किसी से भी रिप्लेस नहीं किया जा सकता। जब मैं एस्थेटिक्स के नज़रिए से देखता हूँ या मैदान में उसका ग्रेस देखता हूं  तो मेरे लिए वो सर्वकालिक महानतम खिलाड़ी है।'

जिमी कॉनर्स इस बहस में एक और आयाम जोड़ते हैं। वे कहते है 'विशेषज्ञता के इस युग में खिलाड़ी या तो क्ले कोर्ट विशेषज्ञ है या ग्रास कोर्ट विशेषज्ञ या हार्ड कोर्ट विशेषज्ञ है या फिर आप रॉजर फेडरर हैं।'


आप इन तीनों के व्यक्तित्व का आकलन कीजिए तो पाएंगे कि नोवाक जातीय भेदभाव का शिकार होते हैं और अपने क्रियाकलापों और हाव भाव से सर्वहारा वर्ग के प्रतीत होते हैं। जबकि राफा का व्यक्तित्व मध्यमवर्गीय प्रतीत होता है। इन सब से अलहदा रॉजर फेडरर मैदान में और मैदान के बाहर अपनी शालीनता,अपने ग्रेस और एस्थेटिक सेंस में कुलीनवर्गीय प्रतीत होते हैं। टेनिस स्वयं अपने चरित्र में कुलीनवर्गीय है। टेनिस खेल और फेडरर का टेनिस दोनों क्लासिक हैं और क्लासिकता को पोषित करते हैं। फेडरर टेनिस के मानदंडों के करीब क्या वे स्वयं मानदंड हैं। वे टेनिस के सबसे प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं।


लेकिन ये कैसी प्रतिद्वंदिता है। एक प्रतिद्वंदी विदा होने वाला है और उसी के प्रतिद्वंदी उसे विदाई देने वाले हैं। विदा होने वाला उदास है और विदाई देने वाले भी। आँखें सभी की नम हैं। वे एक दूसरे के प्रेम में तरल हुए जाते हैं। आखिर ये कैसी प्रतिद्वंदिता कि फेड अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी राफा के साथ जोडी बनाकर आखिरी मैच खेलते हैं। कि फेड के इस आखिरी विदाई मैच में ये तीनों प्रतिद्वंदी एक ही टीम हैं। क्या ही दृश्य है कि मैच खत्म होने के बाद फेड राफा के गले मिल रहे हैं और नोवाक हैं कि उन्हें अपने कांधे पर उठाए जाते हैं। ये अद्भुत दृश्य हैं। ये खेल के मैदान पर साकार हो रहे हैं। ये दृश्य खेल के मैदान पर ही साकार हो सकते हैं।

अब फेडरर खेल से विदा ले रहे हैं।

फेडरर का टेनिस से विदा लेना एक युग का अवसान है।

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टेनिस उनके बगैर भी खेला जाता रहेगा। पर यकीन मानिए अब टेनिस वैसा बिल्कुल नहीं होगा जैसा उनके रहते होता था।

खेल मैदान से  अलविदा फ़ेडेक्स।



 

Thursday, 22 September 2022

गजोधर बाबू अब नहीं रहे


          राजू श्रीवास्तव को पसन्द करना या ना करना एक व्यक्तिगत बात हो सकती है। ये भी सच है कि उन्होंने कोई बहुत उच्च कोटि का हास्य व्यंग्य रचा या कहा नहीं। वे कई बार फूहड़ हो जाते  और कई बार अश्लीलता को छूते नज़र आते। और ये भी कि वे कलाकार थे,लेकिन उनकी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं भी थीं।

इस सब के बावजूद ये भी तथ्य है कि वे देश के सर्वाधिक लोकप्रिय स्टैंड अप कॉमेडियन थे और आम जनता उन्हें बेहद चाहती और प्यार करती है। दरअसल उन्होंने स्टैंड अप कॉमेडी को देश में बेहद लोकप्रिय बनाया और एक नया मकाम दिया। लॉफ्टर चेलेंज का पहला सीजन था तो उसमें वे भी एक प्रतिभागी थे। इसमें वे भले ही सुनील और अहसान कुरैशी से पिछड़ गए हों। लेकिन इस प्रतियोगिता से बाहर आकर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लोकप्रियता में सबको पीछे छोड़ दिया।

दो,उनका अपनी बात कहने या डिलीवरी का एक खास तरीका था। भदेस सा।  इसमें वे अपनी स्थानीय कानपुरी बोली जो कन्नौजी मिश्रित अवधी थी, का तड़का लगाते। ये उनकी एक ऐसी यूएसपी थी जो उन्हें अपने सभी समकालीन स्टैंड अप कॉमेडियन से विशिष्ट बनाती थी और जनता में  लोकप्रिय भी।

तीन,सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि वे आम जीवन की विसंगतियों और विडंबनाओं को उसके पूरे भदेसपन के साथ उजागर करते थे। उनके कहन और कंटेंट का जो भदेसपन था,दरअसल वही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी जो उन्हें आम जनता से कनेक्ट करती थी और उनके बीच लोकप्रिय बनाती थी।

उनकी मृत्यु के बाद जिस तरह से सोशल मीडिया और बाकी प्लेटफार्म हर छोटे बड़े आदमी ने उनके बारे में लिखा,कहा-सुना और प्रतिक्रिया दी,ये बताने के लिए पर्याप्त है कि एक कलाकार के रूप में वो कितने लोकप्रिय थे और ये कहने पर मजबूर भी करता है कि 'बंदे में दम था'।

वे स्टैंड अप कॉमेडी के काका हाथरसी हैं। जो मकाम काका हाथरसी को मंचीय हास्य कवियों में हासिल है,वही स्थान स्टैंड अप कॉमेडी में राजू श्रीवास्तव उर्फ गजोधर बाबू को हासिल है। -------------------------

अलविदा गजोधर बाबू।

Wednesday, 29 December 2021

द टर्बनेटर

 



क्या ही संयोग है जब 2021 का अंतिम सप्ताह वर्षांत की घोषणा कर रहा है,उसी समय एक बेहतरीन और शानदार क्रिकेटर अपने खेल कॅरियर के समापन की औपचारिक घोषणा भी करता है। जी हां,ये हरभजन सिंह हैं जो भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ऑफ स्पिनरों में से एक हैं। उनकी ये उदघोषणा भले ही नए साल के आगमन की खुशियों के अहसास को कमतर ना बनाए, पर साल की विदाई के भारी वातावरण को हल्के उदासी के रंग से ज़रूर भर देती है। ये उदासी इसलिए भी कि उनके स्तर का एक खिलाड़ी एक बेहतर विदाई का हकदार होता है। और ये एक कड़वा सच है हम अपनी खेल विरासत को ना तो पहचानने के काबिल हैं और उसे संभालने के ही।

अगर आप भारतीय क्रिकेट इतिहास को पलटकर देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि तमाम महान और शानदार खिलाड़ियों के बीच दो सरदार भारतीय क्रिकेट को और उसकी स्पिन विधा को अपनी मेधा से नई ऊंचाइयों तक पंहुचा देते हैं। ये दो सरदार हैं बिशन सिंह बेदी और हरभजन सिंह। ये दोनों ना केवल अलग समय का प्रतिनिधित्व करते हैं बल्कि स्पिन की अलग विधा का और अलग शैली व तकनीक का प्रतिनिधित्व करते हैं। पर दोनों काम एक ही करते हैं। ये दोनों  ही ना केवल क्रिकेट खेल को बल्कि गेंदबाजी की स्पिन विधा को समृद्ध करते हैं बल्कि भारत के लिए तमाम असाधारण सफलताओं का बायस भी बनते हैं।

अगर बिशन सिंह बेदी प्रसन्ना और चंद्रशेखर के साथ 1983 से पहले की 'एलीट' क्रिकेट की शानदार स्पिनर्स त्रयी बनाते हैं तो हरभजन सिंह अनिल कुंबले और आर. अश्विन के साथ 1983 के बाद की 'मास' क्रिकेट की शानदार स्पिनर्स त्रयी बनाते हैं। बेदी लेग स्पिनर थे तो हरभजन ऑफ स्पिनर। बेदी एक सॉफ्ट बॉलर तो हरभजन कड़क। बेदी धीमी गेंद की ऊंचाई से भरमाते थे तो हरभजन सिंह लो ट्रैजेक्टरी गेंद की गति से। बेदी अपनी धीमी गति से गेंद में घुमाव लाते और स्पिन से बल्लेबाजों को हैरान करते तो हरभजन गति से पिच से गेंद के लिए उछाल लाते और बल्लेबाजों को परेशान करते। दोनों एक ही हथियार गेंद का  अलग तरह से प्रयोग ज़रूर करते पर दोनों बड़े से बड़े बल्लेबाजों का शिकार करते और विपक्षी खेमे को भयभीत किए रहते। जिस समय हरभजन क्रिकेट के गुर सीख रहे थे उस समय सकलैन मुश्ताक का 'दूसरा' कहर ढा रही होती है और बल्लेबाज़ों के मन में भय। आगे चलकर हरभजन ने उस विरासत को संभाला और अपनी तरह की 'दूसरा' ईजाद की जो बल्लेबाजों के लिए कहर बन गई। वे भारत के दो महान ऑफ स्पिनर्स में प्रसन्ना के बजाय वेंकटराघवन के ज़्यादा करीब दीखते हैं और उनकी परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

41 वर्षीय हरभजन का जन्म 1980 को जालंधर में हुआ। एक शहर जिसने अजीत पाल सिंह, परगट सिंह व सुरजीत सिंह  जैसे विश्व प्रसिद्ध हॉकी  खिलाड़ी दिए। शायद उस शहर ने भी समय के बदलाव को पहचान लिया था और अब वो देश को हॉकी के बजाय क्रिकेट खिलाड़ी दे रहा था जिसे अजीत या परगट की तरह ही प्रसिध्दि प्राप्त करनी थी। हालांकि ये केवल एक बदलाव के तौर पर था। जिस बर्लटन पार्क ने क्रिकेट को भज्जी जैसा खिलाड़ी दिया वो आज भी हॉकी के लिए ही जाना जाता है। टोक्यो ओलंपिक में हॉकी का कांस्य पदक जीतने वाली टीम के कप्तान मनप्रीत सहित 08 खिलाड़ी इसी पार्क स्थित सुरजीत सिंह अकादमी से हैं।

हरभजन ने एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्म लिया था। वे पांच बहनों के इकलौते भाई थे। आप समझ सकते हैं कि एक ऐसे परिवार के लड़के पर उम्मीदों और ज़िम्मेदारियों का बोझ किस कदर होता है। लेकिन व्यवसायी पिता ने उन्हें इससे मुक्त किया और क्रिकेट पर ध्यान देने को कहा। आरंभिक ट्रेनिंग बल्लेबाज़ के रूप में हुई। पर नियति को कुछ और मंज़ूर था। कोच चरणजीत  सिंह भुल्लर की असामयिक मृत्यु हुई। वे देविंदर अरोरा की शागिर्दी में आए और एक बल्लेबाज़ गेंदबाज के रूप में रूपांतरित हो गया।


 1997-98 में रणजी ट्रॉफी का एक मैच खेलने मुम्बई की टीम को पंजाब होस्ट कर रहा था। उस मैच में युवा हरभजन ने शानदार गेंदबाजी की। कहा जाता है कि उनका खेल देखकर मुम्बई के कोच बलविंदर सिंह ने युवा हरभजन को मुम्बई में सेटल होने का ऑफर दिया। हरभजन ने मुम्बई जाने से मना कर दिया। आप सोच सकते हैं उस समय मुंबई टीम का कोच एक नवागत खिलाड़ी को ऑफर कर रहा है तो उसकी काबिलियत कैसी और कितनी रही होगी। ये 'पूत के पांव पालने के दीख जाने' वाली कहावत का चरितार्थ होना था।

इस बीच हरभजन ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया और 25 मार्च 1998 को बंगलोर टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहला टेस्ट मैच और उसी साल 17 अप्रैल को न्यूज़ीलैंड के विरुद्ध एकदिवसीय मैच खेला। लेकिन उनका आरंभिक खेल कैरियर बहुत सफल नहीं रहा। वे अपने गेंदबाजी एक्शन के कारण विवाद में रहे। उनका बॉलिंग एक्शन दो बार रिपोर्ट किया गया। उनके ऊपर चकर का ठप्पा लगा। सन 2000 में पिता की मृत्यु हो गई। अब वे अमेरिका में बसने की सोचने लगे क्योंकि लगभग 18 महीने वे राष्ट्रीय टीम में नहीं चुने गए। 

लेकिन नियति रास्ते खुद बनाती है। हरभजन पहले अपने एक्शन में सुधार करने के लिए इंग्लैंड फ्रेड टिटमस के पास गए। फिर 2000-01 सीजन में ऑस्ट्रेलिया की टीम भारत के दौरे पर आई। अनिल कुंबले कंधे के ऑपरेशन के कारण टीम से बाहर थे। सौरव गांगुली ने हरभजन में विश्वास दिखाया और उन्होंने इस मौके को कस कर पकड़ लिया। ऐतिहासिक कोलकाता टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उन्होंने टेस्ट मैच में भारत के लिए पहली हैटट्रिक की, बल्कि 13 विकेट लेकर भारत को जीत भी दिलाई। हालांकि ये मैच लक्ष्मण की 283 रनों की ऐतिहासिक पारी के लिए ज़्यादा जाना जाता है। अगले मैच में उन्होंने 15 विकेट लिए। इस तरह 03 टेस्ट मैचों की इस सीरीज में 32 विकेट लेकर रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।  

उन्होंने अनिल कुंबले के साथ जोड़ीदार के रूप में खूब नाम कमाया और इस जोड़ी ने मिलकर भारत को अनेक यादगार जीत दिलाई। ऐसे समय में जब स्पिन गेंदबाजी अपनी चमक खोती दिखाई पड़ रही हो उन्होंने उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। जब सचिन कहते हैं कि 'उन्होंने पूरी एक पीढ़ी को स्पिन से प्यार करना सिखाया' तो आप समझ सकते हैं कि वे किस स्तर के गेंदबाज रहे होंगे।

उन्होंने कुल 103 टेस्ट मैच खेले और 32.46 की औसत से 417 विकेट लिए। वे भारत के लिए टेस्ट मैच में अनिल कुंबले ,कपिल देव और आर. अश्विन के बाद चौथे सर्वाधिक विकेट लेने वाले बॉलर हैं। उन्होंने टेस्ट मैच में 18.23 की औसत से 2224 रन बनाए। उन्होंने टेस्ट में 02 शाट और 09 अर्द्ध शतक भी जमाए। उन्होंने 236 एक दिवसीय मैचों में भारत का प्रतिनिधित्व किया जिसमें 33.35 की औसत से 269 विकेट लिए। वे भारत के लिए 28 टी-20 मैच भी खेले जिसमे उन्होंने 25.32 की औसत से 25 विकेट लिए।

वे बहुत आक्रामक और जुझारू खिलाड़ी थे। हर विकेट के बाद जोरदार जश्न मनाते और विपक्षी पर दबाव बनाने का प्रयास करते। मैदान में वे हमेशा अति सक्रिय रहते और उत्साह से लबरेज भी। वे खिलंदड़ स्वभाव वाले थे। वे एक ऐसे खिलाड़ी थे जो मैदान में अपनाया सब कुछ झोंक देते। शायद यही कारण था कि अति उत्साह में कई बार सीमाओं का अतिक्रमण कर जाते और विवादों में फंस जाते। बॉलिंग एक्शन के अलावा राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी से निकाला जाना, साइमंड्स एंड्रूज पर नस्लीय टिप्पणी,श्रीशंथ को चांटा और और न्यूज़ीलैंड में गंदे जूते कैरी करने जैसे विवाद उनके साथ जुड़े। लेकिन इन विवादों से कभी हतोत्साहित नहीं हुए बल्कि मजबूत बनकर उभरे। सामान्यतः अपने एक्शन में बदलाव और सुधार के बाद बॉलिंग की काबिलियत कम हो जाती है। पर टिटमस के निर्देशन में एक्शन में सुधार के बाद वे एक और बेहतर गेंदबाज के रूप में आए। 2000-01 सीरीज में 32 विकेट लेकर इसे सिद्ध भी किया। वे 'चकर' से शानदार गेंदबाज के रूप में स्थापित हुए और जालंधर शहर की गलियों का एक दुबला पतला लड़का 'भज्जी' से क्रिकेट की दुनिया में 'द टर्बनेटर'के रूप में स्थापित हो गया।

वे अपने सन्यास वाले वक्तव्य में कहते हैं 'सभी अच्छी चीजें समाप्त हो जाती हैं।' कुछ साल पहले इलाहाबाद में  मीरा सम्मान प्राप्त करने के बाद अपने वक्तव्य में ज्ञानरंजन ने कहा था 'मृत्यु के बाद भी शहर खूबसूरत हो सकते हैं।' यकीन मानिए हरभजन का खेल जीवन भले ही समाप्त हो गया हो लेकिन उनका खेल जीवन हमेशा शिद्दत से याद किया जाता रहेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए वो प्रेरणास्रोत बना रहेगा। उनकी उपलब्धियां खेल प्रेमियों को चमत्कृत करती रहेंगी। ज्ञानरंजन के शब्दों में कहें तो मैदान का जीवन समाप्त होने के बाद भी खूबसूरत बना रहता हैं।

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खेल मैदान से अलविदा भज्जी पाजी।

Saturday, 13 March 2021

'राज' मिताली का


         2006 में दुनिया के सबसे अमीर और प्रोफ़ेशनल क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई ने भारतीय महिला क्रिकेट की बागडोर अपने हाथ में थामी और 'वूमेन्स क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया' का बीसीसीआई में विलय कर दिया गया। इस उम्मीद के साथ कि जिस तरह भारतीय पुरुषों ने क्रिकेट के महासागर में महारत और शोहरत की अनंत गहराई नापी है,ठीक उसी तरह भारतीय बालाएं क्रिकेट के आकाश में प्रसिद्धि की बलन्दी को छु पाएंगी। ये उम्मीद कितनी पूरी हुई और बीसीसीआई का इसमें कितना योगदान रहा,ये सवाल बहसतलब है। पर ये बात जरूर है कि भारतीय बालाओं ने खुद पर भरोसा करना सीख लिया है और उन्होंने अपने भरोसे,अपनी योग्यता के बूते अपने पंखों को इतना मजबूत बना लिया है कि वे अपनी स्वच्छंद उड़ान भर सकें और नित नए मुकाम हासिल कर सकें।

        12 मार्च को दक्षिण अफ्रीका के साथ लखनऊ के इकाना स्टेडियम में खेली जा रही वर्तमान सीरीज के तीसरे एक दिवसीय मैच में मिताली दुराई राज एक ऐसा मील का पत्थर स्थापित कर रहीं थीं जिस पर महिला खिलाड़ी तो क्या पुरुष खिलाड़ी भी रश्क कर उठें। भारतीय इनिंग का 28वां ओवर चल रहा था। ऐनी बॉश के सामने मिताली राज थीं। वे अपने 32 रन के व्यक्तिगत स्कोर पर थीं। उनके 10 हज़ार अंतरराष्ट्रीय रन में सिर्फ 03 की कमी थी। उन्होंने एक चौका लगाया और 10 हज़ार रन पूरे किए। अब  वे 10 हज़ार रन बनाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी और इंग्लैंड की चार्लोट एडवर्ड्स के बाद विश्व की दूसरी खिलाड़ी बन गई हैं। 10 हज़ार अंतरराष्ट्रीय रन बनाना निसन्देह एक असाधारण उपलब्धि है।

       वे एक गेंद पर चौका लगाकर एक असाधारण उपलब्धि हासिल करती हैं और ठीक अगली गेंद पर आउट होकर वापस पवैलियन लौट जाती हैं। ये दो गेंद ज़िन्दगी का और विशेष रूप से महिला ज़िन्दगी का रूपक गढ़ती हैं। ज़िन्दगी पल में तोला पल में माशा। ज़िन्दगी चाहे जैसी ही लेकिन मिताली राज की क्रिकेट यात्रा तो कम से कम ऐसी नहीं है। उन्होंने 1999 में एक बार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे कदम दर कदम प्रसिद्धि के शिखर पर चढ़ती गई और अब तक शिखर पर पहुंच कर ठहर गई हैं। और वे अब उस  ऊंचाई पर हैं जिस पर पहुंच पाना किसी और के लिए नामुमकिन नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है।

         मिताली ने 16 साल की उम्र में पहला अन्तर्राष्ट्रीय मैच आयरलैंड के विरुद्ध एकदिवसीय मैच था जिसमें उन्होंने नॉट आउट 114 रन बनाए। पहला टेस्ट मैच 2002 में इंग्लैंड के विरुद्ध और पहला टी20 मैच 2006 में इंग्लैंड के विरुद्ध खेला था। उन्होंने कुल 10 टेस्ट मैच खेले जिसमें 01 शतक और चार अर्धशतकों की सहायता से 51 की औसत से 663 रन बनाए। उन्होंने 89 टी20 मैचों में 17 अर्धशतकों की सहायता से 37.52 की औसत से 2364 रन और 211 टेस्ट मैच में 6974 रन बनाए हैं। वे 7हज़ार एकदिवसीय रन बनाने से केवल 26 रन दूर हैं और जब आप ये पढ़ रहे होंगे तो सकता है ये माइलस्टोन भी उन्होंने प्राप्त कर लिया हो। महिला क्रिकेट इतिहास की वे ऐसा करने  वाली एकमात्र खिलाड़ी होंगी। साथ ही दो एकदिवसीय  विश्व कप के फाइनल में टीम को पहुंचाने वाली एकमात्र भारतीय कप्तान। 

        वे अपनी उपलब्धियों के लिए  'लेडी सचिन'के नाम से जानी जाती हैं। पर वे भारतीय महिला क्रिकेट की गावसकर ठहरती हैं। वे गावस्कर की तरह अपनी असाधारण खेल और उपलब्धियों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होने वाली और प्रसिद्धि पाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। हरमनप्रीत कौर उनके बाद आईं।अपनी कॉपी बुक स्टाइल,शानदार स्ट्रोक्स और एक छोर से पारी को थामे रखने में गावस्कर सरीखी ही लगती हैं। सिर्फ इतना भर ही नहीं। जिस तरह का पुराने के जाने और नए के आने के दो कालों का, दो महान व्यक्तित्वों की टकराहट का और खेल की दो शैलियों के  बीच का द्वंद और संघर्ष पुरुष क्रिकेट में गावस्कर और कपिल रचते हैं,उसका प्रतिरूप महिला क्रिकेट में मिताली और हरमनप्रीत कौर रचती हैं।

        वे एक वायुसैनिक की पुत्री हैं। उन्होंने बचपन से आसमान में उड़ते वायुयानों को देखा होगा। बहुत करीब से देखा होगा। निसन्देह वे उससे प्रभावित होती होंगी। उससे एक आत्मीयता बनी होगी। अवचेतन में ऊंचाइयों को छूने की चाह जन्मी होगी। इस चाह को पूरा करने के लिए नीला आसमां ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है। क्रिकेट का हरा मैदान तो था। रनवे ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है,22 ग़ज़ की पिच तो थी ना। और कोई यान ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है,एक अदद बल्ला तो था ना। बस चाहना और होंसला के पंख होने चाहिए होते हैं। वे मिताली के पास थे। हां,उन पंखों को कोई खोलने वाला चाहिए था। वो भी मिला। उन पंखों को खोला संपत कुमार ने। उन्हें असीमित उड़ान भरने की काबिलियत दी। दरअसल संपत कुमार कमाल के  पारखी थे।उन्होंने पहली नज़र में हीरे को पहचान लिया था। फिर मेहनत से उसको तराश दिया। आज वो हीरा भारतीय महिला क्रिकेट के माथे सजा है। 

         पर जीवन में कुछ दुर्योग भी आते हैं। बात 1997 की है। 14 साल की उम्र ही मिताली को विश्व कप के संभावितों में चुना लिया गया था। उस के कुछ समय बाद ही संपत कुमार की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। शायद उनका काम पूरा हो गया था। कहते हैं शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे। ताकि कोई दूसरा ताजमहल ना बन सके। तो क्या यहां ईश्वर को लगा कि एक नायाब हीरा तराशा जा चुका है। और ऐसा कोई दूसरा हीरा नहीं होना चाहिए। शायद हां। शायद ना। पर संपत चले गए।

        इसे एक संयोग ही मानना चाहिए कि एक  लड़की नर्तकी बनते बनते क्रिकेटर बन गई। दरअसल मिताली भरतनाट्यम में प्रशिक्षित हैं। पहले वे डांसर बनना चाहती थीं। पर वे क्रिकेटर बन गईं। उनके खेल में लय है,गति है,नियमों की बंदिश है और सबसे ऊपर खेल में कमाल का ग्रेस है। वे एक क्लासिक नृत्य की गति,लय, शास्त्रीयता और ग्रेस को खेल में समाविष्ट कर देतीं हैं और खेल को नृत्य की तरह दर्शनीय और मोहक बना देती हैं। 

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दरअसल वे क्रिकेट की रुक्मणि देवी हैं। एक असाधारण उपलब्धि के लिए उनको  बधाई और अगली के लिए शुभकामनाएं।

Monday, 17 August 2020

पसंद और नापसंद के बीच झूलता क्रिकेट हीरो



          अंततः भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी जिज्ञासा का समाधान हुआ, सबसे ज़्यादा वांछित सवाल का जवाब मिला, और भारतीय क्रिकेट के सबसे चमकदार युग का पटाक्षेप हुआ. अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट के ज़रिये ‘कैप्टन कूल’ ने सन्यास लेने की घोषणा की. धोनी चाहे कितने भी कूल हों लेकिन उनका सन्यास लेना भी इतना ‘कूल’ होगा, ये किसी ने सोचा नहीं था. पर वो धोनी ही क्या जो अपने फ़ैसलों से अपने चाहने वालों को चौंका न दें. आख़िर अपने खेल कॅरिअर के 16 सालों में खेल मैदान के भीतर और बाहर भी वे अपने फ़ैसलों से चौंकाते ही तो रहे हैं. तो विदाई भी ऐसी हुई तो क्या आश्चर्य!
       अगर भारतीय क्रिकेट इतिहास के चार सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के नाम भारतीय क्रिकेट में उनके योगदान के लिए चुनने पड़े तो इनमें निसन्देह एक नाम महेंद्र सिंह धोनी का होगा. शेष तीन नाम ज़ाहिर है कि गावस्कर, कपिल और सचिन हैं.
         1983 में क्रिकेट विश्व कप में भारत की जीत भारतीय क्रिकेट इतिहास की ऐसी युगांतरकारी घटना है, जो उसके इतिहास को दो युगों में विभाजित करती है. 1983 से पहले के क्रिकेट का ‘एलीट काल’ और 1983 के बाद का क्रिकेट का ‘मास काल’. गावस्कर और कपिल इन दो कालों के सबसे बड़े प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं. और इन दोनों की जगह कोई नहीं ले सकता. 83 से पहले का काल क्रिकेट का क्लासिक युग है. और गावस्कर से बड़ा खिलाड़ी कोई नहीं. विश्व की अब तक की सबसे ख़तरनाक गेंदबाजी के ख़िलाफ जिस तरह से टेस्ट क्रिकेट में पहली बार दस हज़ार से ज़्यादा रन बनाए, वो अविश्वसनीय था. ये गावस्कर ही थे, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को विश्व पटल पर एक नई पहचान देने का काम किया.

         '83 में विश्व कप जिताकर कपिल ने न केवल गावस्कर द्वारा बनाई गई पहचान को स्थापित किया बल्कि भारतीय क्रिकेट के विशिष्ट स्वरूप पीछे करके इसे जनसाधारण के खेल में बदल दिया. इसके बाद सचिन आते हैं. वे इस जनसाधारण के खेल को अपनी असाधारण व्यक्तिगत उपलब्धियों से खेल को लोगों के धर्म के रूप में स्थापित कर देते हैं. और वे ख़ुद भगवान के रूप में पूजे जाने लगते हैं. लेकिन अभी भी क्रिकेट इतिहास का चक्र पूरा नहीं हुआ था. अभी भी कुछ कमी सी थी. कुछ अधूरा था. कुछ था, जो छूट रहा था. वो थी खेल की बादशाहत. धोनी तीन-तीन विश्व ख़िताब भारत के लिए जीतते हैं और भारतीय क्रिकेट की बादशाहत क़ायम कर देते हैं. ये ऐसा काम था जो अभी तक कोई नहीं कर पाया था.

         इस तरह सचिन के बाद धोनी के अवदान के साथ भारतीय क्रिकेट का एक पूरा चक्र पूरा होता है. गावस्कर भारतीय क्रिकेट की विश्व पटल पर पहचान बनाते हैं, कपिल उस पहचान को स्थायित्व देकर उसे जनसाधारण के खेल में बदल देते हैं, सचिन खेल को धर्म में परिवर्तित कर देते हैं और धोनी विश्व पटल पर उसकी सर्वोच्चता स्थापित कर देते हैं.

     कपिल और गावस्कर के बाद सचिन और धोनी भारतीय क्रिकेट के स्वरूप को बदलने वाले सबसे बड़े कैटेलिस्ट थे. दोनों का भारतीय क्रिकेट को बड़ा पर अलग अवदान रहा. दरअसल सचिन क्रिकेट का कला पक्ष थे तो धोनी विज्ञान पक्ष. सचिन क्रिकेट की कविता थे तो धोनी निबंध थे. सचिन अंतरात्मा से थे तो धोनी शरीर से. सचिन जितने कोमल से थे तो धोनी उतने ही कठोर. सचिन बहुत वैयक्तिक थे और धोनी सामूहिक. सचिन किसी बन्द लिफाफ़े से थे और धोनी खुली किताब की तरह. दरअसल सचिन दिल थे और धोनी दिमाग. पर दोनों थे भारतीय क्रिकेट के शिखर पुरुष ही.

     धोनी 2004 में भारतीय क्रिकेट फ़्रेम में आते हैं और छा जाते हैं. धीरे-धीरे बाक़ी सब नेपथ्य में चले जाते हैं. वे अपनी प्रतिभा से लैंडस्केप को पोर्ट्रेट में बदल देते हैं. इस काल में वे इस पोर्ट्रेट का एकमात्र चेहरा बन जाते हैं. भारतीय क्रिकेट में सौरव ने जिस आक्रामकता का समावेश किया था, धोनी ने उसे चरम पर पहुंचा दिया था. धोनी अपने खेल से आगे बढ़कर दूसरों के लिए उदाहरण बनते थे. वे आगे बढ़कर ज़िम्मेदारी ख़ुद अपने कंधों पर लेते थे और तब बाक़ी लोगों से उम्मीद करते थे. वे एक शानदार विकेटकीपर थे, बेहतरीन आक्रामक बल्लेबाज़ और असाधारण लीडर. दरअसल उन्हें खेल की गहरी समझ थी. खेल की अपनी इसी असाधारण समझ के चलते वे खेल मैदान पर ऐसे निर्णय लेते, जिनसे अक्सर विशेषज्ञ चौंक जाते. लेकिन उनके निर्णय सही साबित होते. वे जोखिम भरे निर्णय लेते.

        दरअसल असाधारण उपलब्धियों के लिए ऐसे जोखिम लेने की दरकार होती है और उन्हें यह क़बूल था. ये धोनी ही थे जिन्होंने विपक्षी खिलाड़ियों की आंख में आंख डालना सिखाया. उनकी खेल की समझ, खेल में उनकी संलग्नता और खेल के उनके अद्भुत पर्यवेक्षण को इस बात से समझ जा सकता है कि डीआरएस (डिसीजन रिव्यु सिस्टम) को धोनी रिव्यु सिस्टम कहा जाने लगा था. उन्होंने भारतीय क्रिकेट को नए सिरे से संगठित किया. वे सबसे फिट खिलाड़ी थे. विकेटों के बीच उनकी रनिंग गजब थी. उन्होंने फील्डिंग पर विशेष ध्यान दिया. इसीलिए उन्होंने फिटनेस को टीम का मूलमंत्र बना दिया. इसी बिना पर उन्होंने सीनियर खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखाया और नए युवा खिलाड़ियों की जोश से लबरेज टीम बनाई.

        धोनी का अंतरराष्ट्रीय कॅरिअर दिसंबर 2004 में बांग्लादेश दौरे के लिए ओडीआई टीम में चयन के साथ शुरू होता है. हालांकि वे पहले ही मैच वे शून्य पर रन आउट हो जाते हैं, पर अपने पांचवें मैच में पाकिस्तान के खिलाफ 148 रनों की अविस्मरणीय पारी खेल कर स्थापित हो जाते हैं. 2005 में श्रीलंका के विरुद्ध उनका टेस्ट कॅरिअर शुरू होता है और 2006 में दक्षिण अफीका के विरुद्ध टी20 कॅरिअर. इसमें भी ओडीआई की तरह पहले मैच में शून्य पर आउट होते हैं. लेकिन 2007 में टी20 विश्व कप की कमान उन्हें सौंपी जाती है और विश्व कप जीत कर आते हैं. 2011 में 28 साल बाद ओडीआई आईसीसी विश्व कप जिताते हैं. ये जीत सचिन के लिए होती है. और 2013 में आईसीसी चैंपियनशिप. और ऐसा करने वाले एकमात्र कप्तान.

         निःसन्देह एक कप्तान के रूप में उनकी उपलब्धियां असाधारण हैं और एक खिलाड़ी के रूप में सराहनीय. उनकी कप्तानी में भारत ने 2007 में पहला टी ट्वेंटी विश्व कप (इंग्लैंड), 2011 में विश्व कप (भारत), 2013 में चैंपियन ट्रॉफी (दक्षिण अफ्रिका) जीती और 2009 में टेस्ट क्रिकेट में भारत को नंबर एक बनाया. वे भारत के सबसे सफल कप्तान हैं. उन्होंने 50 टेस्ट मैचों में कप्तानी की, जिसमे से 27 में जीत 17 में और 15 अनिर्णीत रहे,199 एक दिवसीय में से 110 में जीते और 74 हारे जबकि 72 टी ट्वेंटी मैचों में से 42 जीते और 28 हारे. उन्होंने कप्तान के रूप में एक दिवसीय मैचों में 54 की औसत और 86 की स्ट्राइक रेट से 6633 रन, टी ट्वेंटी में 122 की स्ट्राइक रेट से 1112 रन और टेस्ट क्रिकेट में 41 की औसत से 3454 रन बनाए हैं. अगर उनके पूरे कॅरिअर के आंकड़ों पर नज़र डाली जाए तो उन्होंने 90 टेस्ट मैच खेल जिसमें उन्होंने 38.1 की औसत से 4876 रन बनाए. 350 एक दिवसीय मैचों में 50.6 के औसत से 10773 रन और 98 टी20 मैचों में 37.6 के औसत से 1617 रन बनाए. विकेट के पीछे टेस्ट मैचों में 256 कैच,तीन रन आउट और 38 स्टंपिंग,एक दिवसीय मैचों में 322 कैच,22 रन आउट और 123 स्टंपिंग और टी20 मैचों में 57 कैच,8 रन आउट और 34स्टंपिंग कीं. ये आंकड़े उनकी सफलता की कहानी कहते हैं और यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि वह एक बड़े खिलाड़ी और महान कप्तान भी हैं.

       लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि वे एक ऐसे खिलाड़ी हैं जो जितने अधिक पसंद किए जाते हैं उतने ही अधिक नापसंद. आखिर क्यों है ऐसा? मैं स्वयं उन्हें पसंद नहीं कर पाता. मैं यह कहने का जोख़िम उठाता हूँ कि धोनी मेरे पसंददीदा खिलाड़ी नहीं रहे और न ही मेरे लिए वे गावस्कर, कपिल या सचिन जैसे खेल आइकॉन रहे हैं. आख़िर आप इतने बड़े खिलाड़ी के मुरीद क्यों नहीं हो पाए? क्यों उस खिलाड़ी के फैन नहीं हो पाए? क्यों उस खिलाड़ी को नापसंद किया जाता है?

         दरअसल आप किसी खिलाड़ी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं. आप जब उसका अनुसरण करते हो तो केवल खेल के मैदान में ही नहीं उसके बाहर भी उसे देखते हो और खेल के मैदान में भी सिर्फ़ उसका खेल भर नहीं देखते हो बल्कि खेल से इतर उसकी गतिविधियों को भी उतनी सूक्ष्मता से देखते हो. 2004 में जब धोनी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट में पदार्पण करते हैं तो कंधे तक फैले लंबे बालों की तरह स्वाभाविकता उनके व्यक्तित्व पर पसरी हुई दिखती थी. उस समय वे एक मध्यम दर्ज़े के शहर और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवार के एक बहुत ही प्रतिभा वाले सच्चे, सरल, स्वाभाविक और उत्साही खिलाड़ी होते हैं. धीरे-धीरे उनका रूपांतरण होता है. वे एक नवोदित खिलाड़ी से बड़े खिलाड़ी बन जाते हैं. फिर 2007 में टीम की कमान उनके हाथ में आती है. क्रिकेट प्रबंधन से उनके बहुत मज़बूत सम्बन्ध बनते हैं. अब वे बहुत शक्तिशाली हो जाते हैं. वे सत्ता के केंद्र में होते हैं और खेल के सर्वेसर्वा बन जाते हैं.

         यहां केवल एक नवोदित खिलाड़ी का खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी बनने का सफ़र ही पूरा नहीं होता बल्कि पूरे व्यक्तित्व का रूपांतरण भी साथ-साथ होता चलता है. वे जैसे-जैसे क़द में बड़े होते जाते हैं वैसे-वैसे उनके बाल छोटे होते चले जाते हैं और उसी अनुपात में उनकी सरलता, स्वाभाविकता, अल्हड़पन और सच्चाई भी कम होती चली जाती है. वे अब सरल नहीं रहते, जटिल हो जाते हैं, स्वाभाविक नहीं रहते कृत्रिमता उन पर हावी हो जाती है, वे हसंमुख और अल्हड़पन की जगह गंभीरता का आवरण ओढ़ लेते हैं, स्वाभाविक अभिमान अहंकार में बदल जाता है और एक साधारण आदमी अचानक से अभिजात वर्ग का प्रतिनिधि लगने लगता है. अभिजात्य उनके पूरे व्यक्तित्व पर पसर जाता है. उनके हाव भाव, चाल-ढाल हर चीज़ पर.

          अपनी सफलताओं और प्रबंधन के साथ संबंधों के बल पर सर्वेसर्वा बन जाते हैं. आदमी जैसे-जैसे सत्ता और ताक़त पाता जाता है वैसे-वैसे वो मन में अधिक और अधिक सशंकित होता जाता है और सबसे पहले उन लोगों को ख़त्म करने का प्रयास करता है जो उसके लिए यानी उसकी सत्ता के लिए ख़तरा हो सकते हैं. धोनी एक-एक करके सारे सीनियर खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं चाहे वो गांगुली हों, लक्ष्मण हों, द्रविड़ हों, गंभीर हों, हरभजन हों, सहवाग हों या फिर सचिन ही क्यों न हों. इनमें से ज़्यादातर खिलाड़ी अपने खेल के कारण नहीं बल्कि धोनी की नापसंदगी के कारण ही हटे. वे इतने शक्तिशाली थे कि टीम में वो ही खेल सकता था जिसे वे चाहते. तभी तो रविन्द्र जडेजा जैसे औसत प्रतिभा वाले खिलाड़ी टीम में लगातार बने रहे और अमित मिश्र जैसे कई खिलाड़ी टीम में अंदर-बाहर होते रहे.

        जब मोहिंदर जैसे बड़े कद के चयनकर्ता उनके विरुद्ध हुए तो उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा. यहां पर पाकिस्तान के इमरान याद आते हैं. जिस समय उनके हाथ में पाकिस्तानी टीम की कमान थी, वे एकदम तानाशाह की तरह व्यवहार करते थे. यहां तक कि लोकल स्तर पर खेलते खिलाड़ी को देखते और राष्ट्रीय टीम में शामिल कर लेते. अपनी प्रतिभा के बल पर उन्होंने अपनी कप्तानी में पकिस्तान को विश्व कप जिताया और टीम को नई ऊंचाईयां भी दी लेकिन उन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेट के ढांचे को ही नष्ट कर दिया कि उनके जाते ही पाकिस्तानी क्रिकेट रसातल में चला गया और आज तक नहीं उबर सका. थोड़ा ग़ौर करेंगे तो आप पाएंगे कि धोनी भी अक्सर इमरान की तरह व्यवहार करते प्रतीत होते हैं. गनीमत यह हुई कि भारतीय क्रिकेट का ढांचा इतना मज़बूत है कि नुकसान न के बराबर या बिलकुल नहीं हुआ.

            उनका यह व्यवहार केवल टीम के स्तर पर ही नहीं दीखता है बल्कि मैदान में भी दिखाई देता है. वे मैदान में अब एक तरह की कृत्रिम गंभीरता ओढ़े नज़र आने लगे. जैसे-जैसे वे सफल होते गए उनकी ‘कैप्टन कूल’ की छवि मज़बूत हो गई. ये सही है कि आज खेल भी बहुत कॉम्प्लिकेटेड हैं और प्रतिद्वंद्विंता बहुत ज़्यादा हो गयी है और ऐसे में किसी भी खिलाड़ी और विशेष रूप से कप्तान का ‘कूल’ होना बनता है. लेकिन कूल होने का मतलब इतना ही है कि विषम परिस्थितियों में भी खिलाड़ी धैर्य और संयम बनाये रखे और कठिन समय में शांत दिमाग से परिस्थितियों के अनुसार फ़ैसले ले सके. इसका ये मतलब यह कतई नहीं हो सकता कि आप जीत में उत्तेजित और उल्लसित न हों और हार में दुखी. खेल तो नाम ही जोश और जूनून का है. आप भावनाओं को काबू में रख ही नहीं सकते. आप मशीन नहीं हो न. आप भाव रहित यंत्रवत कैसे हो सकते हो? धोनी अक्सर जीत-हार के बाद निष्पृह से दिखाई देते हैं मानो जीत-हार का कोई असर उन पर हुआ ही न हो. क्या वे खेल नहीं रहे थे? क्या वे पैसा कमाने के लिए काम भर कर रहे थे?

          उनकी बैटिंग का अंदाज़ बड़ा अनाकर्षक था. उनका रक्षात्मक शॉट देखिये. वे सीना आगे निकाल कर पैरों पर झुकते हुए बड़े ही अजीबोगरीब ढंग से गेंद को धकेलते थे. ऐसे ही हेलीकॉप्टर शॉट कहीं से भी आकर्षक नहीं लगता. एक बात और, जब कोई बॉलर विकेट लेता है तो वह बैट्समैन की ओर एक ख़ास भाव से देखता है या कुछ हाव-भाव प्रकट करता है. ठीक उसी तरह से जब बल्लेबाज़ चौका या छक्के लगाता है तो या तो बॉलर की ओर देखता है या हाव-भाव प्रकट करता है जो बैट्समैन या बॉलर को चिढ़ाए और उसमें खीज़ पैदा करे. दरअसल ये हाव-भाव केवल अपनी योग्यता दिखाने के निमित्त मात्र नहीं होते बल्कि प्रकारान्तर से अपने विपक्षी की काबिलियत की स्वीकृति भी होती है. लेकिन धोनी चौके-छक्के लगाकर भी भावहीन बने रहते हैं, कोई प्रतिक्रिया नहीं देते, जैसे ये कोई बड़ी बात नहीं है. प्रकारान्तर से वे बॉलर की क़ाबिलियत को नकारते हैं. ऐसा करके वे एक ख़ास क़िस्म का अहंकार प्रदर्शित करते हैं. जैसे-जैसे उनका क़द बड़ा होता गया, वैसे-वैसे उनमें सरकाज़्म बढ़ता गया. आप उनकी प्रेस वार्ताएं देखिए. उनके जवाबों में हमेशा एक ख़ास क़िस्म का व्यंग्य लक्षित करेंगे. ये अपने को श्रेष्ठ मानने के अहंकार से उपजा था, जिसमें वे मीडिया को कुछ भी बताना ज़रूरी नहीं समझते थे.

             और अंत में एक बात और. वे आईपीएल में एक ऐसी टीम से जुड़े थे, जिसके मालिक सट्टेबाज़ी से जुड़े थे. ये सभी जानते कि किस तरह से मामले को थोड़े बहुत कार्यवाही करके रफ़ा-दफ़ा किया गया. एक टीम के मालिक इतने गहरे से सट्टेबाज़ी में संलिप्त हो और टीम के कप्तान को कोई जानकारी न हो, ऐसा संभव नहीं लगता वह भी जब उसके मालिक के साथ उनके आर्थिक हितों में साझेदारी हो. कुछ छींटे धोनी पर भी पड़े थे. हालांकि सीधे तौर पर उनकी भागीदारी का कोई सबूत नहीं मिला. लेकिन उस टीम के कप्तान के तौर पर भी और एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी तो बनती ही है और इस मामले में उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई. आप जानते हैं कि इस तरह के आरोप किस तरह से आपकी छवि धूमिल करते हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण अज़हरुद्दीन हैं. वे धोनी से बड़े खिलाड़ी थे और निःसंदेह उन्हीं की तरह सफल कप्तान भी. यही सब कारण हैं कि धोनी के सन्यास की घोषणा करने के बाद भी कुछ ख़ालीपन-सा नहीं लगा.

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इसके बावजूद धोनी निर्विवाद रूप से एक बेहतरीन एथलीट, क्रिकेट की असाधारण समझ और अंतर्दृष्टि रखने वाले और शानदार नेतृत्वकर्ता थे. यह भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल और चमकदार युग की समाप्ति है. भविष्य में भारतीय क्रिकेट के लिए इससे बेहतर समय हो सकता है, ख़राब हो सकता है पर ऐसा तो बिल्कुल नहीं होगा.

गुड बाय धोनी!

Sunday, 5 July 2020

गाथा बैडमिंटन के 'सुपर डान' की



एक ऐसे समय में जब अपने पड़ोसी मुल्क के विरुद्ध भावनाएं बहुत तीव्र और विरोधी हों तो उससे संबंधित  किसी के बारे में भी लिखने के अपने खतरे हैं। लेकिन जब आप प्रेम में होते हैं,वो भी खेल के प्रेम में,तो उसके खिलाड़ियों के प्रेम में भी आप होते हैं और उनके लिए ऐसे खतरे उठाए जा सकते हैं।

तो आज बात बैडमिंटन के 'सुपर डान' लिन डान के बारे में।

लिन डान खेल के बाहर जिन चीजों के लिए जाने गए उनमें एक है उनके शरीर पर गुदे टैटू। 2012 के ओलंपिक के दौरान उनके शरीर के अलग अलग भागों पर 5 टैटू दीख रहे थे। उनके दाएं हाथ के ऊपरी भाग पर एक टैटू था 'until the end of world' यानि 'दुनिया के खत्म होने तक'। बाद में उसी वर्ष इसी नाम से उनकी आत्मकथा आई। शायद उन्हें ये पदबंध बहुत प्रिय था और वे ये अच्छी तरह समझते थे कि इस जीवन में स्थायी कुछ भी नहीं होता। यहां हर चीज़ नश्वर है जिसे अनिवार्यतः समाप्त होना है। फिर वो चाहे जीवन हो या खिलाड़ी का खेल जीवन हो। और ये भी कि इसके अंत तक इसे भरपूर जियो,शिद्दत से जियो और कुछ ऐसा करो जो इस जीवन के पार पहुंचे,इस नश्वरता से परे की चीज हो,जो जीवन के खत्म होने पर भी बची रह जाए। 

तो उनका खेल जीवन भी खत्म होना था। चार जुलाई को उन्होंने खेल को अलविदा कह दिया। इस घोषणा के साथ ही 2000 से 2020 तक का 20 वर्ष का अंतरराष्ट्रीय कॅरियर अपने अंजाम को प्राप्त हुआ। पिछले कुछ दिनों से अपनी बढ़ती उम्र और चोटों के चलते वे खेल के ढलान पर थे। हांलाकि वे 2020 में होने वाले टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे। पर कोरोना के संकट चलते जब ये खेल एक साल के लिए टल गए तो उन्होंने खेल से सन्यास लेने का फैसला किया। इसका सीधा सा अर्थ है कि बैडमिंटन का जादूगर अब कभी भी बैडमिंटन के मंच पर नहीं दिखाई देगा। अब ना तो उसका जादू सरीखा खेल मैदान में देखा जा सकेगा और ना ही उसके द्वारा रैकेट और शटल कॉक से निर्मित संगीत कोर्ट के कंसर्ट में सुना जा सकेगा। पर इन 20 वर्षों को उन्होंने भरपूर जिया और उत्कृष्टता के नए पैमाने और निशान स्थापित किए। ये निशान खेल के शरीर पर समय के पार जाकर हमेशा के लिए चस्पां हो गए हैं जिसे आने वाली पीढ़ी हमेशा देखती रहेगी। इस दौरान उन्होंने इस खेल के संगीत के ऐसे उत्कृष्ट पैमाने बनाए जिनसे निसृत संगीत की गूंज आने वाली पीढ़ियों के कानों में गूंजती रहेंगी।

14 अक्टूबर 1983 में चीन के लोगियान,फुजियान में जन्मे लिन के माता-पिता चाहते थे कि वे  पियानो बजाना सीखे और संगीत में प्रशिक्षित हों। लेकिन लिन ने हाथ में पियानो के बजाय  बैडमिंटन का रैकेट थामा क्योंकि इस बालक को आगे चलकर पियानो के की-बोर्ड पर सात सुरों को साधने के बजाए स्मैशेज,प्लेसिंग, क्रोसकोर्ट,फोरहैंड, बैकहैंड जैसे  शॉट्स के सुरों को अपनी पावर और स्टेमिना की साधना से  रैकेट और शटलकॉक के वाद्ययंत्रों से जीत के कालजयी संगीत की रचना जो करनी थी। और निसन्देह उन्होंने जीत की जो बंदिशें रची उस तरह की बंदिशें रचना किसी और के लिए शायद ही संभव हो। उन्होंने 2008 और 02012 में दो ओलंपिक गोल्ड,2005 और 2006 के विश्व कप में गोल्ड, 2006,2007,2009,2011,2013 की विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड सहित कुल 66 एकल खिताब जीते। उन्होंने अपने खेल कॅरियर में कुल 666 जीत हासिल की। वे खेल इतिहास के पहले और एकमात्र खिलाड़ी हैं जिन्होंने विश्व की सभी 9 बड़ी प्रतियोगिताएं- ओलंपिक,विश्व कप,विश्व चैंपियनशिप, थॉमस कप,सुदीरमन कप,एशियन गेम्स और एशियन चैंपियनशिप,सुपर सीरीज फाइनल्स और आल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीतकर 28 वर्ष की उम्र में ही सुपर ग्रैंड स्लैम पूरा किया। इतना ही नहीं खेल के वे एकमात्र खिलाड़ी हैं जिन्होंने बैक टू बैक दो ओलंपिक गोल्ड जीते।

व्यक्ति स्वभावतः अतीतजीवी होता है। वो हमेशा अतीत की ओर ताकता है। उसका सर्वश्रेष्ठ अतीत में हो चुका होता है। अतीत की स्मृतियां उसके मानस पटल पर इतनी गहरी खुदी होती हैं जो भविष्य की किसी भी चकाचौंध से धुँधली नहीं होतीं। रूड़ी हार्तोनो का खेल जीवन 1979 के आसपास समाप्त होता है और लिएम स्वि किंग का 1986 के आसपास। ये बैडमिंटन के सार्वकालिक महानतम खिलाड़ियों में से हैं। इनके खेल के जादू की स्मृतियां मन में बहुत गाढ़ी थीं जो बचपन से युवावस्था के दौरान अपना आकार गढ़ रही थीं। इन दो महान खिलाड़ियों ने स्मृतियों का इतना बड़ा स्पेस घेर लिया था कि किसी और के लिए जगह नहीं बचती थी। इस खेल में उनके बाद कोई ऐसा जादूगर नहीं हुआ जो इसको रिप्लेस कर सके। लेकिन अजूबे होते हैं। आपका बेस्ट आपके अतीत के बजाय आपके वर्तमान में हो जाता है। लिन डान जो आता है। 2004 से 2012 का समय ऐसा है जब लिन अपने सर्वोच्च पर होते हैं। उसके खेल का सम्मोहन आपकी सारी स्मृतियों को ओवरपॉवर कर लेता है। आपकी स्मृतियों की इबारत को धुंधला कर देता है। रूडी हार्तोनो और लिएम स्वि किंग जैसे खेल के मिथक सरीखे पात्रों के स्पेस को सिकोड़ कर अगर कोई छोटा कर दे और अपने लिए एक बड़ा स्पेस बना ले तो आप समझ सकते हैं कि खिलाड़ी कितना बड़ा और शानदार है। लिन डान ऐसे ही खिलाड़ी हैं।

वे लेफ्टी थे। लेफ्टी के खेल में एक एलिगेंस होता है जो उसके खेल को बेहद दर्शनीय बना देता है। उस एलिगेंस के कारण उस खिलाड़ी को खेलते देखना एक ट्रीट होता है। वो एलिगेंस पावर की रुक्षता को एक लय प्रदान करती है। उसमें एक संगीत बहता सा प्रतीत होता है। आप उसके खेल के साथ बहे चले जाते हैं जैसे किसी नदी में उसके बहाव के साथ कोई तैराक। लिन के साथ भी ऐसा ही था। 

एक खिलाड़ी के रूप में पावर और स्टेमिना उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। और लेफ्टी की एलिगेंस उनके खेल की एक लय बनाती थी। वे बेहद आक्रामक खिलाड़ी थे जो विपक्षी को अपने ताबड़तोड़ स्मैशेज से हतप्रभ कर देते थे। लेकिन उनके खेल की ये विशेषता भी थी और ताकत भी कि वे खेल को नियंत्रित करना जानते थे। वे आक्रामक खेल कर लगातार कई अंक अर्जित कर लेते और उसके बाद अचानक खेल के पेस को धीमा कर देते। उनका फुटवर्क और कोर्ट में मूवमेंट गजब का था। वे किसी भी स्थान से शटल को रिटर्न करने के बाद बहुत ही तीव्र गति से अपनी बेसिक पोजिशन पर लौट आते और विपक्षी के रिटर्न को फिर से आसानी से खेलने की पोजिशन में होते। खेल में जीत के लिए आपका नेट का खेल बहुत अच्छा होना चाहिए। वे नेट पर भी कमाल खेलते थे। वे नेट पर तेजी से आते और बहुत जल्द ही शटल को टैप कर अंक हासिल कर लेते। उनके खेल की एक बड़ी विशेषता उनके शॉट्स की गूढ़ता होती। उनके शॉट्स बेहद डिसेप्टिव होते थे। विपक्षी उनके शॉट्स की दिशा का अनुमान नहीं लगा सकते थे। वे एक निश्चित दिशा में शटल तक आते और अंतिम क्षण में अपने शॉट की दिशा बदल देते। दूसरी तरफ उनके अनुमान करने की अद्भुत क्षमता थी। वे विपक्षी का दिमाग पढ़ने में सक्षम थे। इसीलिए शटल पर उनकी पहुंच बहुत आसान होती और मनचाहे रिटर्न और प्लेसिंग में वे सक्षम होते। दरअसल 20×44 फ़ीट के बैडमिंटन कोर्ट में वे जब भी प्रवेश करते वो उनकी जागीर बन जाता जिसमें उनकी मर्जी से परिंदा(शटल कॉक)पर भी नहीं मार सकता था। वे अतिरिक्त ऊंचाई हासिल करने के लिए एक ऊंची जम्प लगाते और जोरदार स्मैशेज मारते। वे कहते थे 'हर ज़ोरदार पावरफुल छलांग जीत की महत्वाकांक्षा से भरी होती है'।

हर महान खिलाड़ी के खेल जीवन में कुछ महान प्रतिद्वंद्विताएँ होती हैं। दरअसल ये प्रतिद्वंद्विताएँ एक दूसरे के खेल को समृद्ध करती चलती है और ये दोनों मिलकर अंततः खेल को समृद्ध करती हैं। खेलों की कुछ महान प्रतिद्वंद्विताओं को देखिए।मुक्केबाजी में मोहम्मद अली बनाम जो फ्रैजियर,टेनिस में मार्टिना नवरातिलोवा बनाम क्रिस एवर्ट या फेडरर बनाम राफेल नडाल,गोल्फ में अर्नाल्ड पामर बनाम जैक निकलस या फिर बास्केटबॉल में लॉरी बर्ड बनाम मैजिक जॉनसन।ऐसी और भी हैं। व्यक्तिगत भी और दलगत भी। ठीक इसी तरह लिन डान और ली चोंग वेई की प्रतिद्वंदिता भी बैडमिंटन इतिहास की सबसे बड़ी और जग प्रसिद्ध प्रतिद्वंदिता थी जिसने ना केवल एक दूसरे के खेल को समृद्ध किया बल्कि खेल को भी समग्र रूप में। वे दोनों 40 बार एक दूसरे से भिड़े लेकिन 28 के मुकाबले 12 जीत से पलड़ा लिन का भारी रहा। इनमें से वे 22 बार फाइनल में और 15 बार सेमीफाइनल में खेले। लेकिन इस तीव्र प्रतिद्वंदिता के बावज़ूद उनमें कोई कटुता नहीं थी।वे एक दूसरे का मुकाबला करने के लिए लगातार अपने खेल अपनी नीतियों में परिवर्तन करते रहे और खेल को समृद्ध। लेकिन महत्वपूर्ण बात ये कि खेल मैदान की ये प्रतिद्वंद्विता व्यक्तिगत जीवन में नहीं आई। वे एक दूसरे का सम्मान करते थे। जब लिन ने अपने सन्यास की घोषणा की तो सबसे मार्मिक ट्वीट उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी ली ने ही किया कि

'हम जानते थे कि ये दिन आएगा
हमारे ज़िन्दगी का एक भारी क्षण
आपने बहुत ही औदार्य से पर्दा गिराया है
आप वहां के राजा थे जहां हम गर्व से लड़े थे
आपकी ये विदाई की अंतिम लहरें 
शुष्क आंसुओं की खामोशी में
विलुप्त हो जाएंगी।'

और ये प्रतिद्वंदी ही अभी कुछ दिन पहले लिन के बारे में कहता है कि 'लिन डान लीजेंड है। उसके खिताब उसकी कहानी स्वयं कहते हैं। हमें उसका आदर करना ही पड़ेगा।'

निःसंदेह लिन डान हमारे समय के महानतम खिलाड़ी हैं। उनकी मैदान से विदाई उनके खेल से निर्मित जादुई उल्लासमय संगीत को एक उदास धुन में परिवर्तित कर देगी। उनके खेल जीवन की समाप्ति घोषणा दरअसल बैडमिंटन के सबसे चमकदार युग की समाप्ति की घोषणा है।
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खेल के मैदान से अलविदा बैडमिंटन के  'सुपर डान' लिन डान।

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