अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन परिश्रम का परिणाम होता है। नागोया एशियाई खेलों में भारतीय दल ने अब तक 10 स्वर्ण पदक सहित कुल 59 पदक जीते हैं। वे सभी प्रसंशा के पात्र है और उन्हें बहुत बधाई।
लेकिन इनमें भी कुछ मुकाबले और जीत अलग होती हैं। अलग से चिह्नित किए जाने योग्य। सभी समान एथलीटों में कोई एक प्रथम। भारतीय दल की ये 'पार एक्सीलेंस' एथलीट विद्या रामराज है।
विद्या अपने लक्ष्य राह में आई हर मुश्किल से पार पाती है और लक्ष्य की प्राप्ति करती हैं। उन्होंने अपनी मंजिल के लिए ट्रक ड्राइवर पिता के ट्रक की जगह ट्रैक को चुना और कोयंबतूर से नागोया तक सफर तय किया। गुमनामी से शोहरत तक का सफर। नागोया में वे एक नहीं बल्कि तीन तीन पदक जीतती हैं। इतना ही नहीं वो एक लीजेंड भारतीय एथलीट पीटी उषा द्वारा बनाए भारतीय एथलेटिक्स के सबसे पुराने रिकॉर्ड को भी ध्वस्त कर देती है। वे 'टॉप परफार्मर' और 'एथलीट ऑफ द इंडियन कॉन्टेन्जेट' हैं।
उधर तमाम पदक जीतने वाले प्रदर्शन के बावजूद तीन ऐसे परफॉर्मेंस हैं, जिन्हें अलग से चिह्नित किया जाना चाहिए। ये परफॉर्मेंस इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे बताते हैं कि भारतीय एथलीट में वो किलिंग इंस्टिंक्ट और एटीट्यूड आ गया है जो अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में बेहतरीन परफॉर्मेंस के लिए जरूरी है। उन्होंने इस बात को आत्मसात कर लिया है कि कोई भी हार या जीत तब तक कंप्लीट नहीं होती जब तक कि मैच खत्म ना हो जाए।
एक,स्क्वैश खिलाड़ी अनाहत सिंह भविष्य की स्टार हैं। वे कुछ दिन पहले ही जूनियर विश्व चैंपियन बनी थीं,मिस्र,यूएस और यूके के तिलिस्म को तोड़कर। उनका ये परफॉर्मेंस नागोया में जारी रहा। सेमीफाइनल वे अपने से बहुत ऊँची रैंक वाली विश्व नंबर 6 जापान की सातोमी वातानबे के खिलाफ खेल रही थीं। वे पहले दो गेम हार गई थीं और तीसरे गेम में भी 8-10 से पीछे थीं। ज्यादातर के लिए ये मैच अनाहत की हार में खत्म था। लेकिन अनाहत ने ये मैच 9-11, 11-13,12-10,11-6,11-3 से जीत लिया।
दो,भारतीय वॉलीबॉल टीम इन दिनों एक लंबे अंतराल के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा परफॉर्म कर रही है। नागोया में भी ये प्रदर्शन जारी रहा। टीम अपने से कई रैंक ऊपर वाली टीम कतर के साथ अपना अंतिम लीग मैच खेल रही थी। वे दो सेट हार चुके थे। हार के कगार पर थे। वापसी की संभावनाएं ना के बराबर थीं। लेकिन भारतीय टीम ने कर दिखाया। वे मैच जीत गए 26-28, 25-27, 25-23, 25-20, 24-22 से।
तीन,कुछ खिलाड़ी अपनी प्रतिभा, परफॉर्मेंस और उपलब्धियों से अपना इतना बड़ा प्रभामंडल बना लेते हैं कि उसकी चमक के आओगे बहुत सारे अन्य प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की चमक फीकी पड़ जाती है। क्रिकेट से इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं मसलन पद्माकर शिवालकर,राजेंद्र सिंह हँस,अमोल मजूमदार, राजिंदर गोयल। इस समय भारतीय जवले परिदृश्य भी ऐसा ही है। नीरज चोपड़ा की प्रतिभा और उपलब्धियों से बने औरा में कई होनहार जैवलिन थ्रोअर नेपथ्य में चले गए। यशवीर सिंह ने 85.74 मीटर और रोहित यादव ने 84.35 मीटर चांदी और काँसे के पदक जीतकर बताया कि वे नीरज की छत्रछाया से बाहर वे बेहतरीन परफार्मर हैं और नीरज के वारिस भी। जो दूरी उनके जैवलिन इन दिनों तय कर रहे हैं वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्माननीय हैं।
