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Tuesday, 9 September 2025

एशियाई चैंपियन

 


देश में क्रिकेट खेल के 'धर्म' बन जाने के इस काल में भी हमारी उम्र के कुछ ऐसे लोग होंगे जो हॉकी को लेकर आज भी उतने ही नास्टेल्जिक होंगे जितने किसी समय में वे हॉकी के दीवाने रहे होंगे।  निश्चित ही इन लोगों की 1983 में क्रिकेट विश्व कप जीतने की स्मृति से कहीं अधिक गहरी और स्थाई स्मृति 1975 में भारतीय हॉकी टीम की विश्व कप की जीत की होगी। कपिल देव के बेंसन हेजेज कप को सर से ऊपर उठाए वाले चित्र से कहीं जीवंत तस्वीर हॉकी विश्व कप उठाए कप्तान और संसार के अपने समय के सर्वश्रेष्ठ सेंटर हॉफ अजितपाल सिंह की तस्वीर होगी। उनकी स्मृति में जितना कपिल द्वारा अविश्वसनीय तरीके से पकड़ा गया रिचर्ड्स का कैच कौंधता होगा उससे अधिक असलम शेर खान का ताबीज चूमकर पेनाल्टी से किया गया गोल कौंधता होगा। ये सब वही लोग होंगे जिन्हें जितने कपिल, मोहिंदर, यशपाल, किरमानी, पाटिल जैसे खिलाड़ियों के बल्ले और गेंद से कारनामें भाते होंगे, उससे कहीं ज्यादा उनकी स्मृति आशिक कुमार, बी पी गोविंदा,असलम शेर खान,अजितपाल सिंह, माइकल किंडो,सुरजीत सिंह जैसे खिलाड़ियों की मैदान पर चपलता और स्टिक वर्क की खूबसूरती जगह घेरती होगी।

लेकिन मैदान पर भारतीय हॉकी के इतने खूबसूरत दृश्य विरल हो चले। यहां से भारतीय हॉकी की यात्रा शिखर से रसातल की और यात्रा  है। 

1975 के बाद हॉकी केवल एस्ट्रो टर्फ पर खेला गया। उसके बाद की हॉकी की कहानी एस्ट्रो टर्फ,नियमों में परिवर्त्तन, ऑफ साइड के नियम की समाप्ति, कलात्मकता को ताकत और गति द्वारा रिप्लेस करने और भारत व पूरे एशिया की हॉकी की अधोगति की कहानी है। भारत के लिए 1928 ओलंपिक स्वर्ण से शुरू हुआ एक चक्र 2008 में पूर्ण होता है जब वो ओलंपिक के लिए अहर्ता भी प्राप्त नहीं कर सका था।

 तब से ही तमाम लोगों के साथ इन लोगों की ये इच्छा रही होगी कि एक बार फिर भारत का हॉकी में वही जलवा कायम हो,मैदान में हॉकी का वही जादू चले जो सन 1975 के बाद शनै शनै छीज रहा था। लेकिन उस समय से ही भारतीय हॉकी ने नई हॉकी से तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास भी शुरू कर दिए थे। और खुद को उसके अनुरूप ढालने के धीरे धीरे परिणाम आने शुरू हुए। 2020 टोक्यो और 2024 पेरिस में भारतीय टीम द्वारा जीते गए कांस्य पदक शिखर की ओर बढ़ती भारतीय हॉकी के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।

और अभी हाल ही में राजगीर में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप में भारत की शानदार जीत इस बात की ताईद करती है। फाइनल में पिछले विजेता दक्षिण कोरिया के ऊपर 4-1 की बड़ी जीत बताती है है कि क्रेग फुल्टन के निर्देशन में टीम की दिशा और दशा दोनों एकदम सही है। 

इस प्रतियोगिता में भारत ने धीमी लेकिन सधी शुरुआत की। पहले ग्रुप मैच में चीन को 4-3 से और उसके बाद जापान को 2-1 से हराया। उसके बाद तीसरे मैच में कजाकिस्तान को 15-0 से रौंद दिया।  उसके बाद सुपर फोर में भी पहले मैच में दक्षिण कोरिया से 2-2 से ड्रॉ खेला। यहां से टीम इंडिया ने गति पकड़ी और शानदार खेल दिखाया। अगले ही मैच में मलेशिया की मजबूत टीम को 4-1 से हराया। लेकिन अंतिम मैच में चीना के विरुद्ध सबसे बढ़िया खेला और ग्रुप राउंड में जिस चीन से बमुश्किल जीता था उसे 7-1 से हरा दिया और फाइनल में प्रवेश किया।

फाइनल में उसका मुकाबला पिछ्ले चैंपियन दक्षिण कोरिया से था। यहां पर जो टीम इंडिया का दांव पर था वो था आगामी विश्व चैंपियनशिप सीधे प्रवेश था। उसने कोरिया को शानदार खेल से सभी क्षेत्रों में पीछे छोड़ा और आसानी से 4-1 से हराकर चौथी बार चैंपियन बना।

भारत के खेल में गति,स्किल और पावर का शानदार समावेश था। टीम का मैदान के भीतर कॉर्डिनेशन शानदार था। निःसंदेह ये जीत उत्साहवर्धक है और शिखर की ओर एक मजबूत व दमदार कदम भी। हॉकी के स्वर्णिम अतीत के प्रति नास्टेल्जिया में जीने वालों के लिए भारतीय टीम की जीत और खिलाड़ियों के उठे हाथों से बड़ी आश्वस्ति और क्या हो सकती है।

मुबारक टीम इंडिया।



Sunday, 15 January 2023

विश्व कप हॉकी 2023

 



ये साल 1975 था। तारीख 15 थी। और महीना मार्च का।

भारत में अभी भी आपातकाल की घोषणा होने में तीन महीने का समय बाकी था। क्रिकेट के स्वरूप को बदल देने वाले प्रुडेंशियल क्रिकेट विश्व कप के शुरू होने में भी इतना ही समय शेष था। इतना ही नहीं भारत की हॉकी को श्री हीन कर देने वाले एस्ट्रोटर्फ को पहली बार इंट्रोड्यूस करने वाले मॉन्ट्रियल ओलंपिक  के आयोजन में भी अभी साल भर का समय था।

उस समय हमारी आमद बचपन और किशोरावस्था की संधि बेला में हो चुकी थी,लेकिन टीन ऐज अभी भी साल,दो साल की दूरी पर थी। क्रिकेट में हमारी थोड़ी रुचि बढ़ने लगी थी। दर्शकों की डिमांड पर छक्का लगाने वाले सलीम दुर्रानी,फॉरवर्ड शार्ट लेग पर फील्डिंग करने वाले असाधारण फील्डर एकनाथ सोलकर और फ्लाइट के जादूगर प्रसन्ना जैसे खिलाड़ियों के रास्ते क्रिकेट दिल में उतरने की जद्दोजहद करने लगा था। लेकिन दिल का बड़ा क्या लगभग सारा का सारा हिस्सा अभी भी हॉकी के हवाले ही होता था। ध्यानचंद,केडी सिंह बाबू,पृथ्वी सिंह,रूप सिंह,बलबीर सिंह सीनियर जैसे खिलाड़ियों के जादुई किस्सों को सुनते हुए हम बड़े हो रहे थे और अशोक कुमार,गोविंदा,सुरजीत,माईकेल किंडो,फिलिप्स गोविंदा और अजीतपाल सिंह  जैसा खिलाड़ी बनने का सपना लेकर हॉकी हाथों में लिए रोज़ शाम को खेल मैदान में जाना शुरू हो गया था।

ऐन उस समय भारतीय खेल इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ रहा था। भारत किसी खेल में पहली बार विश्व चैंपियन बन रहा था। उसके सर हॉकी के विश्व चैंम्पियन का ताज जो सज रहा था। 

वो साल 1975 के मार्च की 15वीं तारीख थी। मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर के मर्देका स्टेडियम में खेले गए तीसरे हॉकी विश्व कप के फाइनल में भारत अपने परंपरागत प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को 2-1 से हराकर ना केवल अपना पहला और अब तक का अपना एकमात्र खिताब जीत रहा था बल्कि हॉकी के छीजते गौरव को पुनर्स्थापित भी कर रहा था। 

हॉकी विश्व कप की ये जीत भारतीय खेल इतिहास का एक ऐसा स्वर्णिम पल था जो आवाज के जादूगर जसदेव सिंह के माध्यम से हमारे दिल पर कभी ना मिटने के लिए अंकित हो रहा था। आज भी ऐसा लगता है जैसे ये अभी कल की ही घटना है। क्या ही कमाल है जैसे जैसे हम उम्रदराज होते हैं हमें निकट भूत का बहुत कुछ याद नहीं रहता लेकिन दूर अतीत ऐसे याद आता है जैसे वो कल ही घटा हो। इस विश्व कप की जीत की यादें भी ऐसी ही यादें हैं।

उस समय तक भारत में टीवी का आगमन तो हो चुका था। लेकिन उसका अस्तित्व आठ दस बड़े शहरों तक बहुत सीमित मात्रा में मौजूद था। उन दिनों खेलों को हम स्टेडियम के किसी कोने में उपस्थित कमेंटेटरों की आंख से देखा करते थे। उस पूरे टूनामेंट को भी हमने ऐसे ही देखा था।

फाइनल मैच हॉकी के परंपरागत प्रतिद्वंदियों भारत और पाकिस्तान के बीच था। उस समय ये दोनों टीमें हॉकी की सबसे बड़ी टीमें हुआ करती थीं। ऐसे में मैच में एक अतिरिक्त तनाव और उत्तेजना का होना स्वाभाविक था। उम्मीद के अनुरूप ही वो ऐतिहासिक फाइनल मैच बहुत तेज गति से खेला गया। पाकिस्तान ने शरूआत में कुछ बेहतरीन मूव बनाए। उसने दूसरे ही मिनट में पेनाल्टी कॉर्नर अर्जित किया और मंज़ूरुल हसन ने गेंद गोल में डाल दी। लेकिन रेफरी ने गोल नहीं माना क्योंकि गेंद डी पर स्टॉपर द्वारा ठीक से नहीं रोकी गई थी। मैच का पेस और पिच स्थापित हो चुका था। मैदान में जितनी उत्तेजना व्याप गई थी उससे कहीं अधिक उतेजना और तनाव हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे मैच का आंखों देखा हाल सुन रहे सैकड़ों हॉकी प्रेमियों के दिलों में व्याप गया था।

एक और फॉरवर्ड्स ताबड़तोड़ हमले कर रहे थे दूसरी और डिफेंडर हार्ड टैकल। छठवें मिनट में हीं  मंज़ूरुल के टैकल से अशोक कुमार मैदान में पड़े कराह रहे थे और तेरहवें मिनट में पाकिस्तानी राइट इन समीउल्लाह वरिंदर की स्टिक से ज़मीन पर थे और दाहिने कंधे में चोट खाकर मैदान से और मैच से ही बाहर नहीं हो रहे थे बल्कि पाकिस्तान को को भी मैच से बाहर कर रहे थे। समीउल्लाह की जगह सफदर अब्बास आए। 

सफदर अब्बास समीउल्लाह जितने प्रभावी भले ही ना हों, पर पाकिस्तान ने आक्रमण जारी रखे और अंततः 18वें मिनट में उसको पहला गोल करने में सफलता मिली। तेजतर्रार फारवर्ड लेफ्ट इन मोहम्मद सईद ने वरिंदर सिंह से गेंद छीनी और और गोली की गति से ड़ी में घुसे और भारतीय गोलकीपर अशोक दीवान को छकाते हुए पाकिस्तान को 1-0 से आगे कर दिया। भारतीय फैंस सकते में थे।। इससे पहले एक गोल अमान्य हो चुका था। उस पेनाल्टी को अर्जित करने वाले भी मोहम्मद सईद ही थे। 

इसके बाद भारत ने अपने आक्रमण को दाहिने छोर पर केंद्रित किया और गोल करने के कई मौके बनाए, लेकिन पहले हाफ गोल नहीं कर सके। पहला हाफ पाकिस्तान के पक्ष में 1-0 पर समाप्त हुआ। ये वो समय था जब मैच 35-35 मिनट के दो हाफ का हुआ करता था।

दूसरे हाफ में शुरुआती कुछ मौकों को छोड़कर भारत ने शानदार खेल दिखाया जिससे मैच धीरे धीरे पाकिस्तान के हाथों से छूटने लगा था। भारत के लिए बराबरी का गोल 46वें मिनट में उस समय आया जब फिलिप्स ने भारत के लिए चौथा पेनाल्टी कॉर्नर अर्जित किया जिसे सुरजीत सिंह ने गोल में बदल कर भारत को बराबरी पर ला दिया।

लगभग आठ मिनट बाद ही अशोक कुमार ने लांग कॉर्नर पर गोल कर भारत को 2-1 से बढ़त दिला दी। ये गोल एक खूबसूरत टीम वर्क था। अजीतपाल ने शॉट लिया। अशोक ने वो शॉट रिसीव किया ड्रिबल कर डी के अंदर गए और पास फिलिप्स को दिया,फिलिप्स ने पास फिर अशोक को दिया और अशोक ने गोल दाग दिया। अंत तक ये स्कोर बना रहा। 

इस गोल की तुलना आप 1986 के माराडोना 'गोल्डन हैंड गोल'से कर सकते हैं। इसलिए नहीं कि ये गोल गलत था या गलत तरीके से किया गया था। बल्कि इसलिए कि ये भी उसी गोल की तरह विवादास्पद बना दिया गया और इसलिए भी इस गोल का परिणाम एक इतिहास रच रहा था।

ये एक विवादास्पद गोल था जिसका पाकिस्तान के खिलाड़ी ये कहकर विरोध कर रहे थे कि गेंद गोलपोस्ट से अंदर नहीं गई है। लेकिन उस मैच के रैफरी विजयनाथन बहुत बाद में भी उस गोल को याद करते हुए कहते हैं कि 'ये साफ गोल था। मैं गोलकीपर और स्ट्राइकर के एकदम पास खड़ा था। वीडियो से ये साफ  हो जाता है कि  वो स्पष्ट गोल था। फोटो और वीडियो झूठ नहीं बोलते। उस फ्रेम में मैं और नौ खिलाड़ी हैं लेकिन इस्लाउद्दीन कहीं आस पास भी नहीं हैं।' दरअसल वे उस पाकिस्तानी टीम के कप्तान इस्लाउद्दीन के उस दावे पर अपनी प्रतिक्रिया कर रहे थे कि अशोक कुमार द्वारा किया गया वो गोल स्पष्ट गोल नहीं था जिसे गलत तरीके से भारत को अवार्ड किया गया। बरसों बाद इस्लाउद्दीन ने अपनी आत्मकथा में भी एक अलग अध्याय 'गोल जो था ही नहीं' में भी अपना वही आरोप दोहराया था। वे एक सच को झूठ बनाने की लगातार कोशिश कर रहे थे।

इस जीत के साथ भारत ने अपना पहला विश्व कप खिताब जीत लिया था और अपने खोए गौरव को पुनर्स्थापित भी कर दिया था। ये अलग बात है कि वो बहुत ज़्यादा दिनों तक रहा नहीं। ऐसा क्यों हुआ ये फिर कभी।

भारतीय टीम के मैनेजर बलबीर सिंह सीनियर उस जीत के बाद कह रहे थे 'पिछले 10 वर्षों में ये भारत की पाकिस्तान पर सबसे शानदार जीत है।' दरअसल ये 1971 में पहले विश्व कप के समय फाइनल में भारत की पाकिस्तान के हाथों हार का स्वीट रिवेंज ही था। उस हार से भारत फाइनल में प्रवेश नहीं कर सका और अंततः केन्या को हराकर उसने कांस्य पदक जीता था। दूसरे विश्व कप में उसने फाइनल में प्रवेश किया। लेकिन वहां नीदरलैंड ने भारत को पेनाल्टी शूटआउट तक गए मैच में 4-2 से हरा दिया था।

1973 की भारतीय टीम बहुत मजबूत थी। शारीरिक रूप से भी और खेल कौशल की दृष्टि से भी। तभी तो जर्मन कोच ने कहा था 'यदि ये टीम मुझे मिल जाए तो इसे मैं इसे विश्व की होने वाली हर प्रतियोगिताओं का विजेता बना दूं।'

1975 की भारतीय टीम भी वैसी ही थी। उसे ग्रुप बी में घाना, अर्जेंटीना,ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और पश्चिम जर्मनी के साथ रखा गया था। तीन जीत, एक ड्रा और एक हार के साथ भारत अपने ग्रुप में प्रथम स्थान पर रहा था और सेमीफाइनल में भारत का मुकाबला मलेशिया से हुआ।

इस प्रतियोगिता का 13 मार्च को भारत और मलेशिया के बीच खेला गया सेमी फाइनल भी एक क्लासिक मैच था जिसमें मलेशिया ने जीत के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया था। उस भारतीय टीम के कप्तान अजीतपाल सिंह बताते हैं कि 'ये उनके लिए उस प्रतियोगिता का सबसे कठिन मैच था।'उस मैच में भारत खेल खत्म होने में लगभग पांच मिनट पहले तक 1-2 से पिछड़ रहा था। भारत का विश्व कप जीतने का सपना टूटने के कगार पर था। तभी कोच बलबीर सिंह सीनियर ने फुल बैक माइकेल किंडो की जगह असलम शेर खान को मैदान में उतारा। उसके कुछ क्षणों बाद ही भारत को पेनाल्टी कॉर्नर मिला। इसे असलम शेर खान ले रहे थे। आज भी याद आता है कमेंटेटर बता रहे थे हिट लेने से पहले उन्होंने गले में पड़े ताबीज को चूमा, उसके बाद हिट लिया, गेंद गोल में थी। स्कोर 2-2 हुआ। अतिरिक्त समय मे हरभजन गोल कर भारत को 3-2 से जिताकर फाइनल में पहुंचा दिया था। मलेशिया को ये हार अब तक सालती है। उस मैच में मलेशिया की ओर से पहला गोल करने वाले दातुन फूक लोक कहते हैं 'उस मैच की स्मृति को मिटाना असंभव है। वो हार अभी भी उदास करती है।'

दरअसल ये जीत और विश्व विजेता बनना भारत की छीजती  गौरवपूर्ण हॉकी परंपरा को रोककर पुनर्स्थापित करने का आखरी प्रयास था।  1928 से 1956 तक लगातार ओलंपिक में 6 स्वर्ण पदक जीत चुका। उसके बाद की भारत की हॉकी अधोगति की ओर जाती हॉकी थी। 1960 में वो रजत पदक जीत सका था। 1964 में एक बार फिर स्वर्ण पदक जीता,लेकिन उसके बाद 1968 और 1972 में उसे मात्र कांसे के पदक से संतोष करना पड़ा।

उधर विश्व कप में भी 1971 के पहले संस्करण में तीसरे और 1973 के दूसरे संस्करण में दूसरे स्थान पर रहा था।

1975 के बाद हॉकी केवल एस्ट्रो टर्फ पर खेला गया। उसके बाद की हॉकी की कहानी एस्ट्रो टर्फ,नियमों में परिवर्त्तन, ऑफ साइड के नियम की समाप्ति, कलात्मकता को ताकत और गति द्वारा रिप्लेस करने और भारत व पूरे एशिया की हॉकी की अधोगति की कहानी है। भारत के लिए 1928 से शुरू हुआ एक चक्र 2008 में पूर्ण होता है जब वो ओलंपिक के लिए अहर्ता भी प्राप्त नहीं कर सका था।

अब एक बार फिर समय बदला है। धीरे धीरे हॉकी गति पकड़ रही है। पिछले मास्को ओलंपिक में कांस्य पदक जीता है। समय का चक्र फिर से घूम रहा है।

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अब जब 13 जनवरी 2023 से भारत में  15वां हॉकी विश्व कप आयोजित हो रहा है तो कुछ सपने देखने का और पुरानी ऊंचाइयों को महसूसने का अवसर तो बनता है ना।



Friday, 6 August 2021

हॉकी की वापसी



 ".....मेरे लिए उसका प्रेम शाश्वत था। हमारा ये प्रेम लंदन में फला फूला, हेलसिंकी में हमने शादी की और मेलबोर्न में  हनीमून मनाया। 11 साल के लंबे अरसे के बाद जब एक बार फिर वो मेरे पास आई तो पहले जैसी ही ताज़गी से भरी और आकर्षक थी। इस बार वो मुझे कुआलालंपुर लेकर आई और हम एक बार फिर आसमां पर थे। लेकिन वो एक बार फिर गायब हो गई। इस आश्वासन के साथ कि वो वापस लौटेगी। मैं उसका इंतजार कर रहा हूँ- ओ मेरी परी सरीखी हॉकी.....।" 

                  हॉकी के महान खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर ये अपनी आत्मकथा में लिख रहे थे। हम जानते हैं कि हॉकी के इस प्रेम में वे अकेले नहीं थे। आज भी पूरी एक पीढ़ी है जो उनकी तरह ही हॉकी के अनन्य प्रेम में है। उनकी तरह भले ही उस पीढ़ी के लोगों ने हॉकी ना खेली हो परंतु उसे देखते हुए,उसका अनुसरण करते हुए और उसे जीते हुए ये पीढ़ी बड़ी हुई है और बलबीर सिंह सीनियर की तरह इंतज़ार में थी कि 'परी सरीखी हॉकी' कभी तो लौटेगी। और एक बार फिर हॉकी

               वाया टोक्यो वापस लौट आयी जैसे 1975 में कुआलालंपुर के रास्ते बलबीर की ज़िंदगी में लौटी थी और अपने चाहने वाले करोडों के दिलों में लौटी थी। उसका इस तरह आना मानो आपके बचपन के किसी खूबसूरत क्रश का जीवन की तीसरी बेला में अचानक सामने आ जाना है जिसे देख आप खुशी से किंकर्तव्यविमूढ़ हुए जा रहे हैं।

                  जो लोग प्रेम में हैं या रहे हैं वे जान सकते हैं कि प्रतीक्षा प्रेम की वो सबसे खूबसूरत शय है जो मन को जितना गुदगुदाती है,उतना बेचैन भी करती है। एक प्रतीक्षारत प्रेमी जान सकता है कि प्रतीक्षा से उपजी बेचैनियां इसलिए खूबसूरत होती हैं कि आप अपने वांछित यथार्थ को तसव्वुर में जीते हैं और जीते जाते हैं। तसव्वुर की चीजें अक्सर यथार्थ से बेहतर,कोमल और खूबसूरत होती हैं।

               हॉकी के प्रेम में डूबी ये पूरी पीढ़ी पिछले 41 सालों से उसकी प्रतीक्षा में थी और उसकी बेचैनियों को तसव्वुर में जी रही थी। ये एक लंबी प्रतीक्षा थी। इतनी लंबी कि बचपन और किशोरवय की उस संधिबेला की कनपटी अब चांदी सी सफेद होने लगी है या हो चुकी है।

              ये 41 साल लंबी नहीं बल्कि उससे कहीं ज़्यादा 45 साल लंबी प्रतीक्षा थी। दरअसल हम उसकी गणना 1980 से मास्को ओलंपिक करते हैं। लेकिन वो तो 1976 में मॉन्ट्रियल ओलंपिक से गायब हो चुकी थी। 1980 की स्वर्णिम आभा दरअसल आभासी थी। वो सोने की नहीं पीतल की चमक थी। पश्चिमी देशों के बहिष्कार के कारण हॉकी की बड़ी शक्तियां वहां थी ही नहीं। 6 दोयम टीमों में भी बमुश्किल आप जीत पाए थे। 


               आप इसकी क्रोनोलॉजी को समझिए। 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में हम तीसरे नंबर थे। 1975 कुआलालंपुर में विश्व कप जीतते हैं। लेकिन अगले साल ही 1976 में मॉन्ट्रियल में लुढ़क कर 7वें स्थान पर आ जाते हैं। हॉकी हमसे लगातार दूर होती जाती है। और 2008 में बीजिंग ओलंपिक के आते आते वो हमारी आंखों से पूरी तरह ओझल हो जाती है,विस्मृत हो जाती है। हम बीजिंग के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाते। एक चक्र पूरा होता है। 1928 में एम्स्टर्डम में गोल्ड से 2008 बीजिंग में अनुपस्थिति तक। यहां से चक्र उल्टा घूमता है। 2012 लंदन में 12वां, 2016 रियो में 8वां और 2021 टोक्यो में तीसरा स्थान।

              ये आपके आत्ममंथन का बायस है कि जिसे आप दिलो जान से चाहते हैं, टूटकर प्यार करते हैं और राष्ट्रीय खेल का दर्जा देकर अपने माथे बिठाते हैं तब भी वो आपसे दूर होती जाती है और आप असहाय से उसे दूर जाते हुए बेबस देखते जाते हैं।

                   दरअसल ये आपकी गलती थी। आप समय के बहाव को रोकना चाहते थे और हॉकी थी कि समय के साथ बहना चाहती थी,समय के साथ कदमताल करना चाहती थी। वो आधुनिक होना चाहती थी और आप थे कि उसे वहीं रोक देना चाहते थे। वो  पश्चिमोन्मुखी हो जाती है। पश्चिम के तौर तरीके उसे लुभाने लगते हैं। वहां की तेजी और ताकत लुभाती है और साथ ही कृत्रिमता भी। कृत्रिम एस्ट्रो टर्फ पर गति और ताकत बहुत फबते हैं और हॉकी है कि उस चकाचौंध  पर फिदा हो हो जाती है। अब वो घास और मिट्टी के मैदान को देखकर नाक-भौं सिकोड़ने लगती है। अब उसे आपकी कलात्मकता नही रुचती,वो तकनीक से प्रभावित होती है। आप उस परिवर्तन को पहले तो देख नहीं पाते और जब देख भी लेते हो तो स्वीकार नहीं करते। आप आगे के बजाए पीछे की और देखते हो। आप उसे प्यार तो करते हो पर उसे चेरी की तरह रखना चाहते हो। आप खुद के तौर तरीके नहीं बदलना चाहते और उसे बदलने से रोक देना चाहते हो।  इतना हो तो भी सब्र कर ले। आप बीसवीं सदी में 18वीं सदी की तरह काम करते हो। बजाय इसके कि आप उसकी चाहतों को समझो आप उस पर जागीर की तरह आधिपत्य जमाना चाहते हो। आपस में लड़ते हो और उसकी पूरी तरह उपेक्षा कर देते हो। 

                ज़ब तक आप ये समझो कि वो आपसे दूर जा चुकी है तो आप अपने को बदलना शुरू करते हो। लेकिन बदलाव को लेकर अभी आप उपापोह की स्थिति में हो। आपको अभी भी पुराने तौर तरीकों पर विश्वास है। इस उपापोह और आपकी सीमाओं के कारण परिवर्तन वांछित तरीके से और वांछित तेजी से नहीं कर पाते। इस बीच वो आपसे इतनी दूर जा चुकी होती है कि आंखों से ओझल हो जाती है।

                तब जाकर आपकी नींद टूटती है। आपकी खुमारी उतरती है। अब आप आमूलचूल परिवर्तन के लिए तैयार होते हो। आप उसे अपनी और खींचने के लिए गति ,पावर और तकनीक अपनाते हो। कोचिंग के तौर तरीके बदलते हो। बाज़ार की ज़रूरत के हिसाब से खुद को ढलते हो। और लीग सिस्टम लाते हो। अपने यहां भी पश्चिमी खिलाड़ियों के एक्सपोज़र देने का वादा करते हो। और उसमें धन का आकर्षण पैदा करते हो। अंततः आपके प्रयास सफल होते है और तब कहीं जाकर आप उसे वापस ला पाने में समर्थ होते हो।

              आप हॉकी की क्रिकेट से तुलना कीजिए। आप हॉकी का 1975 में विश्व कप जीतते हो। पर उसमें हो रहे परिवर्तनों की आहट नहीं सुन पाते और इसीलिए उसमें तीव्र उतार आता है। 1983 में क्रिकेट का विश्व कप जीतते है। वे उसमें आ रहे परिवर्तनों को बहुत शीघ्रता से और सहजता से अपनाते हैं और उठान पर होते हैं। आखिर इन दो खेलों की विपरीत प्रवृत्तियों का कारण क्या होता है। दरअसल तमाम कारणों के अलावा सबसे बड़ा कारण एक व्यक्ति होता है। इसका नाम होता है जगमोहन डालमिया। वे एक उद्योगपति थे। वे बीसीसीआई अध्यक्ष बनते हैं और उसके प्रबंधन में कॉरपोरेट कल्चर का प्रवेश कराते हैं और बहुत ही पेशेवर ढंग से वित्तीय प्रबंधन करते हैं। देखते ही देखते बोर्ड सबसे अमीर बोर्ड बन जाता है और ताकतवर भी। अब क्रिकेट में पैसा आता है और उसी अनुपात में क्रिकेट प्रगति करता है।

दरअसल हॉकी को भी एक डालमिया की ज़रूरत है।

             हॉकी संघ पिछले कुछ सालों से अधिक सक्रिय हुआ और हॉकी को बढ़ाने हर संभव प्रयास कर रहा है। निसन्देह इसमें अंतर्राष्ट्रीय हॉकी संघ भी बहुत सहयोग कर रहा है। पिछले कुछ सालों से एक और व्यक्ति है जिसने इसमें दखल दिया है। ये उड़ीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक हैं। इस मामले में उनका दृष्टिकोण साफ है। डालमिया ने कॉर्पोरेट कल्चर क्रिकेट में लाई। पटनायक भी पैसे की अहमियत समझते हैं लेकिन उनका आधारभूत ढांचे और सुविधाओं के विकास पर ज़ोर है। ये दरअसल एक राजनेता और एक उद्योगपति होने का अंतर है। 2018 में जब सहारा ने अपनी क्राइसिस के चलते हॉकी इंडिया की स्पॉन्सरशिप से हाथ खींचा तो उड़ीशा सरकार ने हॉकी इंडिया से  5 सालों का 150 करोड़ रुपये का करार किया और पुरुष महिला और  जूनियर टीम की स्पॉन्सरशिप दी। इसके अलावा भी उड़ीसा सरकार ना केवल हॉकी को बल्कि खेलों के समुचित विकास के काम कर रही है। उसने 2018 में टाटा ग्रुप के साथ भुवनेश्वर में हॉकी हाई परफॉर्मेन्स सेंटर स्थापित किया ताकि विश्व स्तरीय खिलाड़ी बनाए जा सकें। और जमशेदपुर में देश का सबसे हॉकी स्टेडियम भी बना रही है। ऐसे समय में जब कोरोना महामारी से उपजे वित्तीय संकट के चलते केंद्र सरकार सहित अनेक राज्य सरकारों ने खेलों का बजट कम किया है,वहीं उड़ीशा सरकार ने इस साल खेलों का बजट 250 करोड़  का रखा जिसे अगले साल 350 करोड़ करने का वादा किया है। पिछले दिनों भारत में जितनी भी बड़ी हॉकी प्रतियोगिताएं हुई उन सब की मेजबानी उड़ीशा ने ही की। इनमें2014 की चैंपियन्स ट्रॉफी, 2017 में हॉकी वर्ल्ड लीग फाइनल और विश्व कप 2018 हैं और 2023 विश्व कप भी यहीं आयोजित किया जाएगा।


                ये देखना रोचक होगा कि नवीन पटनायक हॉकी के डालमिया बन पाते हैं या नहीं। पर ये निश्चित है कि टोक्यो में भारत में शानदार हॉकी खेली बावजूद इसके कि वे ऑस्ट्रेलिया और बेल्जियम से हारे। और भारतीय हॉकी की पुनर्वापसी के लिए आज के मैच से बेहतर मैच नहीं हो सकता था। 1-3 से पिछड़ने के बावजूद भारत ने शानदार वापसी की और 5-4 से मैच जीता। इस मैच में वो सब कुछ था जो आधुनिक हॉकी में होने की अपेक्षा की जाती है या की जा सकती है। तभी अशोक कुमार कहते हैं कि ये एक सम्पूर्ण मैच था  जिसे हॉकी कोच आगे रेफेरेंस के तौर पर अपने पास पास रखेंगे।

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फिलहाल तो भारत की वापसी और कांस्य पदक जीतने की बधाई। और ये देखना भी रोचक होगी कि हॉकी की ये वापसी कितनी टिकाऊ होती है।


Monday, 25 May 2020

अलविदा द ग्रेट सीनियर


"मेरा जन्म गांव में हुआ। पर कुछ ही सालों में मेरे माता पिता मुझे एक छोटे से शहर में ले आए। यहां मैंने उसे पहली बार देखा। वो मुझे पसंद आई,उसके प्रति सम्मान जगा,उससे प्रेम करने लगा और उसे पूजने लगा। वो मेरी देवी बन गई,मेरा पहला प्यार,मेरी प्रियतमा। वो मुझे अपने साथ संसार के अलग अलग देशों के नए नए स्थानों और घास के हरे भरे मैदानों तक ले गई। हम जहां भी जाते हमारा राजसी सम्मान होता।....मेरे लिए उसका प्रेम शाश्वत था। हमारा ये प्रेम लंदन में फला फूला, हेलसिंकी में हमने शादी की और मेलबोर्न में  हनीमून मनाया। 
             
11 साल के लंबे अरसे के बाद जब एक बार फिर वो मेरे पास आई तो पहले जैसी ही ताज़गी से भरी और आकर्षक थी। इस बार वो मुझे कुआलालंपुर लेकर आई और हम एक बार फिर आसमां पर थे। लेकिन वो एक बार फिर गायब हो गई। इस आश्वासन के साथ कि वो वापस लौटेगी। मैं उसका इंतजार कर रहा हूँ- ओ मेरी परी सरीखी हॉकी।" 

अपने प्रेम की ऐसी इंटेंस और सघन अभिव्यक्ति कोई ऐसा  प्रेमी ही कर सकता था जो प्रेम में आपादमस्तक डूबा हो। इस कहानी में वो खुशनसीब प्रेमिका हॉकी थी और उसके प्रेम में पागल दीवाने बलबीर सिंह सीनियर थे। वे ऐसा 1977 में अपनी आत्मकथा 'द गोल्डन हैट्रिक'में लिख रहे थे। और वे अपनी उस परी सरीखी हॉकी का ज़िक्र कर रहे थे जिसे उन्होंने 1948 से 1956 तक एक खिलाड़ी के रूप में और फिर 1975 में चीफ कोच और मैनेजर के रूप में उसके उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया था जहां से वो सिर्फ और सिर्फ नीचे ही आ सकती थी और आई भी। दरअसल वे खेल कौशल और सफलता के शीर्ष पर थे। वे अपनी महबूबा हॉकी का अपने पास उसी शीर्ष पर लौटने का इंतज़ार करते रहे। लेकिन अफ़सोस इस बार वो नहीं लौटी। और उसके इंतज़ार में अंततः आज सुबह(25 मई 2020)को उन्होंने इस नश्वर संसार को 95 साल की भरी पूरी उम्र में अलविदा कह दिया।

उनका जन्म 1923 में जालंधर के हरिपुरा खालसा गांव में 31 दिसंबर (10 अक्टूबर 1924 ?) को हुआ था। उनके पिता दलीप सिंह दोसांझ स्वतंत्रता सेनानी थे। और चाहते थे कि वो पढ़ लिख कर नौकरी करें। पर उनमें हॉकी की जन्मजात प्रतिभा थी जिसे उस समय के प्रसिद्ध कोच  हरबैल सिंह ने देखा,परखा और तराशा। जल्द ही वे पंजाब विश्वविद्यालय की टीम में चुन लिए गए और 1943 से 1945 तक वो टीम चैंपियन रही। उसके बाद अविभाजित पंजाब राज्य की टीम के लिए भी चुन लिए गए। 1947 में आज़ादी से पूर्व की अंतिम  राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप बॉम्बे में खेली गई जिसे पंजाब ने बॉम्बे को हराकर जीती। इन सभी जीतों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

द्वितीय विश्व युद्ध के कारण 1940 और 1944 के ओलंपिक खेल नहीं हो पाए। तब 1948 में लंदन में ओलंपिक हुए। उस समय भारत आज़ाद हुआ ही था। अंग्रेज खिलाड़ी वापस इंग्लैंड जा चुके थे और तमाम बड़े प्लेयर पाकिस्तानी टीम का हिस्सा बन चुके थे। ऐसे में बलबीर सिंह का चयन भारतीय टीम के लिए हो गया। ये स्वप्न सरीखे इतिहास के लिखे जाने की शुरूआत थी जिसकी समाप्ति अंततः 1975 में होनी थी।

1948 के ओलंपिक में पहले  11 खिलाडियों में उनका स्थान नहीं बनता था पर बॉम्बे के रेग्गी रोड्रिक्स बीमार पड़ गए और बलबीर को खेलने का मौका मिला। 23 वर्षीय होनहार युवा की ये शानदार शुरुआत थी। उस मैच में उन्होंने एक हैट्रिक सहित 6 गोल किये और भारत ने अर्जेंटीना को 9-1 से रौंद डाला। लेकिन अगले दो मैचों में उन्हें बैंच पर बैठना पड़ा। तब फाइनल में ब्रिटेन के विरुद्ध खेलने का अवसर मिला। वे इस मैच में भी नहीं खेल पाते पर कुछ भारतीय मेडिकल छात्रों की पहल पर वहां के हाई कमिश्नर श्री मेनन के हस्तक्षेप से ही खेल सके थे। पहले ही हाफ में उन्होंने दो गोल किए जिसके बूते भारत ने ब्रिटेन को 4-0 से हराकर लगातार चौथी बार ओलंपिक गोल्ड जीता। भारत कुछ ही दिन पहले ब्रिटेन की लंबी गुलामी से आज़ाद हुआ था और अब वो उसको उसी की धरती पर उसे परास्त कर रहा था। और ये भी कि ये आज़ाद भारत की पहली जीत थी। बलबीर उस जीत के बारे में कहते हैं कि 'इससे पहले जो पदक जीते थे वे यूनियन जैक के लिए थे पर इस बार तिरंगे के लिए। उस खुशी का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। उसे सिर्फ और सिर्फ महसूस किया जा सकता है।'

 1952 के हेलसिंकी में उन्हें के डी सिंह 'बाबू' का नायब नियुक्त किया गया। एक बार फिर उन्होंने ब्रिटेन के विरुद्ध शानदार खेल दिखाया। उसके विरुद्ध सेमीफाइनल में बलबीर ने हैट्रिक जमाई। उसके बाद फाइनल में नीदरलैंड को 6-1 से हराकर भारत ने लगातार पाँचवा ओलंपिक स्वर्ण जीता। इसमें  पांच गोल अकेले बलबीर के थे। और ये फाइनल में किसी एक खिलाड़ी द्वारा सबसे अधिक गोल करने का रिकॉर्ड था जो आज तक अजेय है।

 1956 के मेलबोर्न ओलंपिक में उन्होंने भारतीय हॉकी टीम का नेतृत्व किया। पहले ही मैच में भारत ने अफगानिस्तान को 13-0 से हराया जिसमें 05 गोल बलबीर के थे। लेकिन इस मैच में उन्हें चोट लग गई जिसके कारण लीग मैच में बाहर बैठना पड़ा। पर जर्मनी के खिलाफ महत्वपूर्ण सेमीफाइनल मैच में प्लास्टर चढ़ी उंगली के साथ वे खेले। भारत ने ये मैच 1-0 से जीता। उसके बाद फाइनल में पाकिस्तान को 1-0 से हराकर लगातार छठवीं बार स्वर्ण जीता। अब वे अपने आदर्श ध्यानचंद की लगातार 3 बार ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने की बराबरी कर चुके थे जिनके  1936 की बर्लिन जीत की डॉक्यूमेंट्री देखकर वे फैन बने थे। उन्होंने कुल 08 ओलंपिक मैचों में 22 गोल किए थे। 

इसके अलावा उन्होंने 1958 के टोक्यो और 1962 जकार्ता एशियाई खेलों में भारत को हॉकी में रजत पदक भी दिलाया। उसके बाद वे 1971 में विश्व कप खेलने वाली भारतीय हॉकी टीम के कोच बने जहां भारतीय टीम को कांसे के पदक से संतोष करना पड़ा था। 1975  के विश्व कप को जीतने वाली टीम के चीफ कोच और मैनेजर थे। वे पंजाब खेल महानिदेशक भी रहे जहां से 1982 में रिटायर हुए। उनके खाते में उपलब्धियां और भी हैं। 1957 में पद्मश्री प्राप्त करने वाले वे पहले खिलाड़ी थे। 2006 में वे सर्वश्रेष्ठ सिख हॉकी प्लेयर घोषित हुए। हॉकी इंडिया द्वारा 2015 में उन्हें मेजर ध्यान चंद लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया गया। 2012 के लंदन ओलंपिक के दौरान 1896 से 2012 तक के सफर को रेखांकित जिन 16 महान ओलम्पियन्स को चुना गया उनमें वे एकमात्र भारतीय और विश्व के एकमात्र हॉकी खिलाड़ी थे।

बलबीर हॉकी के सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ खिलाडियों में थे। वे सेन्टर फारवर्ड की पोजीशन पर खेलते थे। गति,अचूक निशाना,शक्तिशाली शॉट्स और फर्स्ट हैंड पास/बॉल रिलीज उनके खेल की विशेषता थी। वे सही मायने में टीम के खिलाड़ी थे। वे बहुत तेजी से गेंद रिलीज करते थे। वे अपने पासेज से दोनों तरफ के विंगर्स को व्यस्त रखते। डी के पास बॉल मिलते ही वे हवा की माफिक गतिशील हो जाते और डिफेंडर असहाय। उनका निशाना इतना अचूक होता था कि बहुत बार तो वे गोल पोस्ट की तरफ देखे  बगैर ही गोल कर दिया करते थे।

हॉकी के प्रति उनका प्रेम और समर्पण इस बात से समझा जा सकता है कि जब 1975 के विश्व कप के लिए चंडीगढ़ में टीम कैम्प लगा तो वे खिलाड़ियों के साथ ही रहे। इसी कैम्प के दौरान उनके पिता का देहांत हो गया। इसके लिए उन्होंने ट्रेनिंग का केवल एक सेशन मिस किया। वे पिता की अंत्येष्टि करके तुरंत वापस आ गए। और शेष कर्मकांड उन्होंने विश्व कप से वापस आने पर किए। इसी कैम्प के दौरान उनकी पत्नी को भी ब्रेन हैमरेज हो गया। तब भी वे अपनी पत्नी को अस्पताल में भर्ती करा कर तुरंत वापस आ गए। बाद में इस बात को याद करते हुए उन्होंने बताया था कि जब वे विश्व कप के बाद वापस आए तो पत्नी स्वस्थ हो गई थीं और उन्होंने बलबीर से पहला सवाल किया 'कप कहां है।'

निसन्देह वे महान खिलाड़ी थे। लगभग ध्यानचंद की कैलिबर के ही। ध्यानचंद की तरह उनके खाते में तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक हैं। पर उन्हें उस तरह का सम्मान नहीं मिला जैसा ध्यानचंद को मिला। यहां ध्यान रखने की बात ये है कि ध्यानचंद ब्रिटिश भारत की मजबूत टीम से खेल रहे थे। लेकिन बलबीर  संक्रमण काल के खिलाड़ी थे। ऐसे समय में एडजस्ट करना और सर्वाइव करना मुश्किल काम होता है। पुराना जो महान था वो पास नहीं था और  नए का निर्माण बाकी था। पर महान खिलाड़ी ऐसी परिस्थितियों से ही उपजते हैं। 1936 के ओलंपिक की विजेता और अजेय टीम तीन भागों में विभक्त होकर पूर्व की महान टीम की छाया मात्र रह गई थी। जब वे राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बने भारत तभी आज़ाद हुआ था। देश के हालात ठीक नहीं थे। भारत की हॉकी टीम पुनर्निमाण के दौर में थी। एक नवोदित टीम को महान टीम में बदलना और उसके साथ बड़ी उपलब्धियां हासिल करना बड़ी नहीं बल्कि बहुत बड़ी बात है। हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं या यूं कह सकते हैं कि आज़ादी से पहले अगर हमारे पास ध्यानचंद थे तो आज़ादी के बाद बलबीर सीनियर। और इसे बात को यूं भी कह सकते हैं कि   उनकी उपलब्धियां अगर ध्यानचंद से ज़्यादा नहीं थीं तो कम भी नहीं थीं। कनाडा के एक पत्रकार पैट्रिक ब्लेनरहासेट(Patrick Blennerhassett) ने उनकी एक बायोग्राफी लिखी है 'अ फोरगोटेन लीजेंड:बलबीर सिंह सीनियर'। उसमें वे यही स्थापित करते हैं कि बलबीर भारत के महानतम हॉकी  खिलाड़ी हैं जिन्हें उनके अपने देश ने सायास भुला दिया। लेकिन वे उसका कारण बहुत हास्यास्पद सा बताते हैं।  वे कहते हैं कि ध्यानचंद को हिन्दू होने के कारण ज़्यादा महत्व दिया गया और भारत में मुसलमान और सिख खिलाड़ियों की उपेक्षा होती है और बलबीर उसी के शिकार हुए। लेकिन 1971 में भारतीय टीम के कोच, 1975 में मैनेजर, खेल महकमे के महानिदेशक, पहले पदमश्री खिलाड़ी और हॉकी इंडिया द्वारा लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड कुछ ऐसे तथ्य हैं जो पैट्रिक की स्थापना का खुद ही खंडन करते हैं।  लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि उन्हें अपने हिस्से का दाय नहीं मिला। जितना वे डिजर्व करते थे उतना नहीं मिला।

पर जो भी हो वे भारत के महानतम सार्वकालिक हॉकी खिलाड़ियों में से एक तो थे ही बल्कि एक बहुत सरल सहज व्यक्ति  थे और सही मायने में इंसान। वे कहते थे 'मैं जन्म से सिख हूँ और कर्म और वैचारिक तौर पर सेकुलर और राष्ट्रवादी हूँ।' उनकी ये भावना भारतीय संस्कृति और संविधान की मूल आत्मा के अनुरूप ही नहीं थी बल्कि सच्ची खेल भावना के अनुरूप भी थी। उनका जाना भारतीय खेल जगत को कुछ और दरिद्र कर गया।

विनम्र श्रद्धांजलि।



Friday, 14 December 2018

मृग मरीचिका



मृग मरीचिका
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इंग्लैंड ने विश्व कप फुटबॉल 1966 में जीता था।उसके बाद ये खिताब उसके लिए मृग मरीचिका बन गया।ठीक वैसे ही भारत ने हॉकी का विश्व कप 1975 में जीता था और उसके बाद भारत के लिए इस खिताब की चाहत किसी बच्चे की चाँद को पाने की चाहत सी हो गयी।मेज़बान होने के नाते जो विश्व खिताब इस बार कुछ करीब लग रहा था वो दरअसल मृगमरीचिका ही था।
आज शाम जब भुबनेश्वर के कलिंगा स्टेडियम में भारत की टीम डच टीम के विरुद्ध अपना क्वार्टर फाइनल मैच खेलने उतरी तो उम्मीद थी कि गहराती शाम के अन्धकार को भारतीय टीम अपनी जीत से रोशनी में तब्दील कर देगी और 43 सालों से जीत के सूखे को  कम से कम कुछ आर्द्रता से भर देगी।पर ऐसा हुआ नहीं।उलटे  गहराती शाम का ये अन्धेरा हार की निराशा से कुछ और गहरा गया और 1975 के कारनामे को दोहराए जाने इंतज़ार कुछ और लंबा हो गया।
निसंदेह भारत ने शानदार खेल दिखाया।उसने 57 प्रतिशत बॉल पर नियंत्रण रखा।12वें मिनट में आकाशदीप ने गोल करके उम्मीद की ज्योति बाली थी वो टूटे तारे की चमक सी क्षणिक साबित हुई।15वे मिनट में ही थियरी ब्रिंकमन ने गोल उतार दिया।अगले दो क्वार्टर में कई मौके बढ़त बनाने के भारत ने गवाएं और खेल बराबरी पर छूटा।लेकिन चौथे क्वार्टर में मिंक वान डेर ने गोल करके भारत के भाग्य को सील कर दिया।
भारत बिला शक बढ़िया खेला।पर कई बार बढ़िया खेल नहीं बल्कि 'जीत से कुछ भी कम नहीं' की ज़रुरत होती है।आज जब जीत की सबसे ज़्यादा चाहना थी तब हार हाथ आई।
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हार की इस निराशा से उबरने के लिए फिलहाल सिंधु की विश्व नंबर एक ताई जू यिंग पर 14-21,21-16,21-18से जीत को सेलिब्रेट करें।
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गुड लुक नेक्स्ट टाइम टीम इंडिया।

Monday, 17 September 2018

ओ सरदारा पाजी तू घना याद आंदा

सरदारा पाजी खेल मैदान से अलविदा
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आप चाहे जीवन के खेल में दो चरम बिंदुओं के बीच मध्यम मार्ग चुन कर मज़े से खेल सकते हैं,लेकिन खेल के जीवन में  मध्यम मार्ग उतना सीधा और सरल नहीं होता,बल्कि यूँ कहा जा सकता है कि ये सबसे कठिन होता है।यहां बात हॉकी और फुटबॉल की है और उनके मिडफ़ील्ड की है। दरअसल मिडफ़ील्ड की पोजीशन सबसे महत्वपूर्ण होती है और इसीलिए इस पर खेलना सबसे कठिन भी। 

       चाहे फॉरवर्ड हों या फुल बैक उन्हें सिर्फ अपनी पोजीशन के खेल में महारत हासिल करनी रहती है। लेकिन मिडफील्डर को अपनी पोजीशन के खेल की महारत हासिल करने के लिए फॉरवर्ड और फुल बैक/डिफेंडर दोनों की पोजीशन के खेल में महारत  हासिल करनी होती है।मिडफील्डर वो केंद्र बिंदु जिसके इर्द गिर्द खेल चलता है।वे पहले तो आक्रमण की ज़मीन तैयार करते हैं,मूव बनाते हैं और फिर फॉरवर्ड के साथ विपक्षी किले पर आक्रमण करते हैं। और साथ ही विपक्षी के आक्रमण की जंगे मैदान के बीचों बीच धार भोथरी ही नहीं करते बल्कि अपने डिफेंडरों के साथ मिल कर अपने क़िले की रक्षा भी करते हैं। दरअसल वे ही हैं जो अपने गोल से लेकर विपक्षी गोल तक मार्च करते हैं और पेट्रोलिंग भी। आज के टोटल गेम में भी सबसे ज़्यादा मेहनत उन्हें ही करनी होती है। अभी  हाल ही संपन्न हुए विश्व कप फुटबॉल ने साबित किया कि जब जिस टीम के मिडफील्डरों ने शानदार खेल दिखाया जीत उन्हें ही नसीब हुई।
 
लेकिन आप जब भारत की हॉकी के मिडफील्ड की बात करते हैं तो दो नाम ही याद आते हैं। अजीत पाल सिंह और सरदार सिंह।पहला पंजाब के संसारपुर गांव से तो दूसरा हरयाणा के संत नगर गांव से। भारतीय हॉकी के दो भिन्न कालखडों के दो सर्वश्रेष्ठ मिडफील्डर।अजीत स्वर्णिम दौर के सबसे बेहतरीन सेंटर हॉफ तो सरदार सिंह अधोगति के बाद पुनर्निर्माण दौर के सबसे बेहतरीन मिडफील्डर। 
            सरदार सिंह ने 2006 अंतर्राष्ट्रीय हॉकी में प्रवेश किया और एशियाई खेलों में खराब प्रदर्शन के बाद अपने 12 साल लम्बे अंतर्राष्ट्रीय खेल जीवन को अलविदा कहा। दरअसल वो 20वीं शताब्दी के पहले दो दशकों का सबसे शानदार खिलाड़ी है। उसने भारत के लिए 300 से ज़्यादा  मैच खेले। भारतीय हॉकी के इस पुनर्निर्माण के  वो एकमात्र ऐसा खिलाड़ी था  विश्व की किसी भी टीम के लिए खेल सकता था।वो दो बार एफआईएच के प्लेयर ऑफ़ द ईयर के लिए नामांकित हुआ। वो शानदार प्लेमेकर था।आक्रमण के लिए मूव बनाते समय वो मैदान में पानी सा बहता और प्रतिपक्ष के आक्रमण के समय चट्टान सा खड़ा हो जाता। वो अपने साथियो को शानदार पास देता। इसमें उसको गज़ब की महारत हासिल थी। वो राइटहेंडर था। एक राइट हेंडर के लिए दांये से बाँए पास देना सबसे आसान होता है। लेकिन उसने एक नया पास इज़ाद किया। बिलकुल क्रिकेट के रिवर्स स्वीप सा। वो ड्रिब्लिंग करते हुई बांये से दांये रिवर्स पास करता। वो असंभव कोणों से पास करता। उसके पास बेहद सटीक होते। जिस समय 32 साल की अपने बूट खूंटी पर टाँगे उस समय वो हिन्दुस्तान का सबसे फिट एथलीट था। भारतीय खेलों में फिटनेस का पर्याय माने जाने वाले  कोहली से भी ज़्यादा। एशियाई खेलों  में जाने से पहले उसने यो-यो फिटनेस टेस्ट में 21.4  का स्कोर किया जबकि उसी समय कोहली का उस टेस्ट में स्कोर 19 था।
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उसके खेल मैदान में ना होने का ख्याल मन में एक अजीब सा खालीपन को भर देता है। और ये तय है कि इस खालीपन को जल्द भर पाना संभव नहीं। तो अपने एक और पसंदीदा खिलाड़ी को खेल मैदान से अलविदा !








नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...