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Tuesday, 29 September 2026

०समूचे पहाड़ मेरा दागिस्तान है०

 


इस फानी दुनिया को अलविदा कह देने के बाद भी व्यक्ति कहाँ पूरी तरह से इस दुनिया से विदा ले पाता है। कितना कुछ वो छूट जाता है। तमाम चीजों में। अपनी अनुपस्थिति में कितनी बार उपस्थित हो आता है। बार बार। मानो वो यहीं कहीं हो। सबसे ज्यादा स्मृति की तहों में लिपटा हुआ।

विजय एक ऐसे व्यक्ति हैं,जो जब-तब स्मृतियों के दरवाजे पर दस्तक देते रहते हैं। विजय यानी विजय कुमार गौड़। इस बार एक यात्रा संस्मरण के बहाने। यात्रा संस्मरण 'अपने वतन का नाम बताओ'।

विजय भाई को मैं देहरादून आने से पहले जानता था। फेसबुक के माध्यम से। वे उन लोगों में से एक थे जिनसे इलाहाबाद से देहरादून आने के बाद मिलना था। आने के बाद जल्द ही मुलाकात भी हो गई। ये साल था 2019। और फिर मिलने का ये सिलसिला अगले पांच सालों तक बदस्तूर चलता रहा। हर तीन चार महीने के अंतराल पर तो उनसे मुलाकात होती ही रही। 2024 के फरवरी में देहरादून छोड़ने तक। फिर एक दिन उनके ना रहने की खबर आई। जितना दुख उससे कहीं ज्यादा ये आश्चर्य की इतना जिंदादिल,घुम्मकड़,एक बहुत ही उत्साही ट्रैकर और स्वस्थ व्यक्ति के साथ ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन जिंदगी में दुख अक्सर अचानक  और अप्रत्याशित रूप में ही सामने आते हैं। 

आज जब उनका सद्य प्रकाशित यात्रा संस्मरण हाथ में आया तो स्मित मुस्कान लिए उनका चेहरा आंखों के सामने हो आया। उनकी आवाज कानों में घुलने लगी। मानो वे संस्मरण स्वयं बांच रहे हों। किताब को खोलकर सबसे पहले अनुक्रमणिका देखी तो एक अनजाने सुख का अनुभव हुआ। नंबर चार पर एक संस्मरण ज्यों का त्यों सुरक्षित रखा है। 'चंद्रशिला से कम ऊँचा है खांखरखेत'।

वे बहुत ही तार्किक और विवेकी व्यक्ति थे। लोकतांत्रिक मूल्यों में उनका गहरा विश्वास था। सच्चे जनवादी लेखक। जिनकी मानवीयता और मानवीय मूल्यों में गहरी आस्था थी। सबसे बड़ी बात उनके लेखन और वैयक्तिक आचरण में कोई फांक नहीं थी।  जितने ईमानदार वे लेखन में थे,उतने ही ईमानदार आचरण से। वे देहरादून के उन चंद लेखकों में से थे जिनसे मैं संपर्क में आया और जिनकी ईमानदारी ने मुझे प्रभावित किया। इसीलिए मन में उनके लिए बहुत ज्यादा सम्मान था।


बात मार्च 2022 की है। साहित्यिक रेडियो पत्रिका के लिए एक संस्मरण की रिकॉर्डिंग के लिए मैंने विजय भाई को फोन किया। फोन उठाते ही उन्होंने कहा '

भाईसाहब माफ़ कीजिए मेरे पास कोई नई कहानी या कविताएं नहीं हैं। इसलिए मैं नहीं आ पाऊंगा। रेडियो के किसी भी कार्यक्रम अधिकारी को विजय भाई की इस बात से घोर अचरज हो आता। दरअसल आकाशवाणी में नियमानुसार कोई भी पूर्व प्रकाशित या प्रसारित रचना प्रसारित नहीं हो सकती। लेकिन जब मूल्य का क्षरण होता है तो उसका असर हर क्षेत्र में होता है। और रेडियो इसका कोई अपवाद नहीं है। अब लेखक रेडियो के लूपहोल्स,अपनी वरिष्ठता और संबंधों का फायदा उठाकर न केवल प्रकाशित रचनाओं को रिकॉर्ड करा देते हैं, बल्कि एक ही रचना को कई कई बार रिकॉर्ड करा देते हैं।

उनकी बात से मुझे हैरानी नहीं हुई। मैं ये बात उससे पहले अरुण कुमार असफल जी और दो एक और वरिष्ठ लेखकों से भी सुन चुका था। मुझे देहरादून की लेखकीय ईमानदारी का आभास था। मैंने हंसते हुए कहा 'इस बार मुझे आपका यात्रा संस्मरण चाहिए।' लेकिन उन्होंने इस वायदे के साथ उससे भी इंकार कर दिया कि 'जैसे ही इस बार मैं यात्रा पर निकलूंगा तो रेडियो के लिए एक संस्मरण लिखने की कोशिश करूंगा।' उस दिन मन उनके लिए सम्मान से भर गया। उनकी लेखकीय ईमानदारी का मुरीद हुआ।

मई खत्म होते होते उनका फोन आया। उन्होंने बताया एक संस्मरण तैयार है। मैंने तुरंत ही उन्हें रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया और जून की साहित्यिकी में उस संस्मरण को प्रसारित किया। संस्मरण  'चंद्रशिला से कम ऊँचा है खांखरखेत'। उनके अपने पैतृक गांव के पास स्थित दो अपूर्व पहाड़ी सौंदर्य वाली जगहों की यात्रा का संस्मरण। एक ऐसा यात्रा संस्मरण जिसमें उन स्थानों के सौंदर्य से कहीं अधिक उन जगहों की कठिनाइयों का दुख था। खाली होते गांव और पलायन की पीड़ा थी। और दरकते पहाड़ी जीवन की सिसकियाँ थी। ये एक कमाल का संस्मरण था।

दरअसल विजय की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे एक बेहतरीन कवि थे। एक उम्दा कहानीकार थे। प्रतिभाशाली रंगकर्मी थे। खेल प्रेमी और शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे। और। और एक बहुत ही उत्साही और हिम्मती घुमक्कड़,यायावर,ट्रैकर और अन्वेषक थे। अक्सर दुख मिश्रित अचरज हो आता है कि एक ऐसा घुमक्कड़ जिसने जीवन भर पता नहीं कितने दुर्गम दर्रों और पहाड़ों को पार किया,वो अपने हृदयाघात से कैसे पार नहीं पा पाया। शायद ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है। ज़िन्दगी ऐसी ही होती है। 

वे बार बार पहाड़ों पर जाते हैं। पर्यटक बनकर नहीं। यायावर की तरह। राहुल की तरह अन्वेषक बनकर। हमजातोव की तरह जन्मभूमि के दुख दर्द को समझने बूझने,महसूस करने। पहाड़ उनका जन्मस्थान जो था।  उत्तराखंड से लेकर कश्मीर तक के पहाड़ उनके लिए वही स्थान रखते हैं जो हमजातोव के लिए दागिस्तान का था। पहाड़ उनका अपना ' दागिस्तान ' था। वे लिखते हैं- "...पहाड़ों की यात्राएं मेरे लिए मुक्ति की कामना ही नहीं। यात्राओं के बहाने ही तो मैं अक्सर अपने अतीत में झाँकने की कोशिश करता हूँ। माँ,पिता,चाचा,चाची और ढेरों पहाड़वासियों की उस ज़िंदगी में झाँकना चाहता हूं जो उन्हें पहाड़ छोड़ने के लिए मजबूर करती रही हैं। मुझे लगता है इसे जानने के लिए दुनिया भर के पहाड़ों से पलायन करते लोगों की ज़िंदगी में झाँकना होगा। किसी भी देश का पहाड़ी जीवन उस देश के कुलीन जीवन से अलग है।" 

ये यात्राएं उनके अपने भीतर के अंधेरों से लड़ने की प्रेरणा हैं- "अपने भीतर के जंगलों से बाहर निकलने का क्रम ही मेरी यात्राएं हैं जिसकी स्मृतियां हर वक़्त  मथती रहती हैं और जीवन को गति देती हैं।"

आखिर वे इतने दुर्गम प्रदेशों की यात्राएं कैसे सम्पन्न करते हैं। कैसे बार बार दुर्गम दर्रे पार करते है। कैसे पहाड़ों की अलंघ्य चोटियां पार करते हैं। वे एक सूत्र देते हैं। पहाड़ों को नापने का। उन्हें पार करने का। जो अंततः जिंदगी को जीने का भी सूत्र हो आता है। वे कहते हैं- "पहाड़ ताकत से नहीं,हिम्मत से होते हैं पार।"

वे अपने इन यात्रा वृत्तांतों में पहाड़ों के भूगोल को बताते हैं। उसके इतिहास का पाठ करते हैं। लेकिन वे भूगोल से कहीं अधिक उस भूगोल को जीने वालों की बात करते हैं। इतिहास से कहीं अधिक इतिहास को बनाने वालों की ज़िंदगी की कथा कहते हैं। और अपनी इस विशेषता में ये किताब अनिल कुमार यादव के चर्चित यात्रा विवरणों 'कीड़ाजड़ी' और 'वो भी कोई देस है महराज' से गहरा साम्य रखती है।

ये यात्रा संस्मरण 'अपने वतन का नाम बताओ' अपने कलेवर में बहुत छोटा है। 134 पन्नों में सिमटा हुआ। कुल 12 संस्मरणों और यात्रा कथाओं में बंटा हुआ। सभी एक दूसरे से अलग। एक दूसरे से जुदा। अपने आप में मुकम्मल। लेकिन एक सूत्र से आपस में गुंथी हुई। पहाड़ी जीवन के सूत्र में। एक लंबी गाथा की तरह। कंटेंट में बहुत ही समृद्ध। पाठकों को विषय की अंतर्दृष्टि से लैस करती हुई।

अपने पहले संस्मरण में जिससे इस पुस्तक का नामकरण हुआ हिमाचल प्रदेश के लमखागा दर्रे की यात्रा का वृतांत है। एक ऐसा दर्रा जो भारत के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण पर्वतीय दर्रों में से एक है। दर्रा जो समुद्र तल से लगभग 17 हजार फुट से भी अधिक ऊंचाई पर स्थित है। यह दर्रा पारंपरिक रूप से हिमाचल के किन्नौर जिले में स्थित छितकुल गांव को उत्तराखंड की हर्षिल घाटी से जोड़ता है। भारत-तिब्बत सीमा के बेहद करीब होने के कारण यह भौगोलिक और रणनीतिक दोनों दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ये अत्यधिक कठिन श्रेणी का ट्रेक है जहां ग्लेशियर,विशाल बर्फ के मैदान,मोरेन और तीखी ढलानें मिलती हैं। निसंदेह इसके लिए तकनीकी अनुभव और बेहतरीन शारीरिक सहनशक्ति की जरूरत होती है। वृतांत बेहद रोमांचक और दृश्यात्मक है।

दो यात्रा वृतांत मिनकियानी दर्रे की यात्रा पर आधारित हैं। ये हिमाचल प्रदेश में धौलाधार पर्वत श्रृंखला में स्थित एक प्रसिद्ध दर्रा है जो समुद्र तल से लगभग 14 हज़ार की ऊंचाई पर है। ये दर्रा कांगड़ा घाटी को चंबा घाटी से जोड़ता है। इसकी खड़ी चढ़ाई और पथरीले रास्ते ट्रैकिंग को बेहद दुष्कर बनाते हैं। इन वृत्तांतों को पढ़कर महसूस होता है कि वे किस हद तक पहाड़ में धंसे हैं कि वे दर्रे को पिता के काँधे के रूप में कल्पित करते हैं और दर्रे व उसकी चोटियों को पिता पुत्र के अकल्पनीय और खूबसूरत रूपक में बदल देते हैं। एक ऐसे पिता के जो पुत्र को मेला दिखाने के लिए आपने काँधे चढ़ाए है। पुत्र और ज्यादा दृश्य देखने को पिता के कांधे पर खड़ा हो जाता है और पिता पुत्र को संभालने के लिए अपने हाथों को अधिकतम ऊंचाई तक ले आता है। पिता का कांधा एक दर्रा है। उसके दो हाथ ऊंची चोटियां। बच्चा ट्रैकर।

 जांस्कर घाटी लद्दाख के बीहड़ भूभाग में गहराई में बसी हिमालय के सबसे मनमोहक जगहों में से एक है। बर्फ से ढके पहाड़ों, प्राचीन मठों,घाटियों और निर्मल नदियों से घिरी यह घाटी रोमांच और सांस्कृतिक जीवन के अन्वेषण का अविस्मरणीय अनुभव है। वे जांस्कर घाटी में बार बार जाते हैं। यहां की तीन बार की यात्राओं के कुल पांच विवरण हैं। वे वाया मनाली,दारचा अपनी यात्राएं संपन्न करते हैं। इन पांच यात्रा विवरणों में दुर्गम भौगोलिक संरचनाओं के रोमांचक विवरणों के अलावा यहां के सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन पर भी बहुत कुछ कहा गया है। इसमें युवा हैं। रोजगार की समस्या है। विभिन्न क्षेत्रों के पोर्टरों की आपसी प्रतिद्वंदिता और संघर्ष है। गोम्पेल लामा,तेनजिंग, नाम्बगिल,छुवेगा जैसे युवा हैं। जीवन के संघर्षों की और सरवाइव करने की जद्दोजहद है। ये वृतांत बहुत मार्मिक बन पड़ा है।

गौतम गर्ब्याल उर्फ आनंद नांबियाल के शीर्षक से एक यात्रा वृतांत अपने अंत में एक छोटे से पत्र से बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। ये छोटा सा पत्र पहाड़ी जीवन की दुश्वारियां आकस्मिक आपदाओं और जीवन की अनिश्चितता और मृत्यु के शोक को बहुत ही मुखर  लेकिन कारुणिक अभिव्यक्ति देता है।

पत्र कुछ यूं पढ़ता है "सर,मालपा अब वो मालपा नहीं रहा जो आपने देखा था। जिस दुकान में बसेरा किया था,मलबे का ढेर है। काली नदी ने मालपा के पहाड़ों को तोड़ दिया है। उन्हीं  दुकानों के भीतर ठहरे थे गर्ब्यांग,गुंजी, बुद्धी,कुटी, नांबी और व्यास-चौदास घाटी के ढेरों साथी,जो अब नहीं रहे। आनंद भी उन्हीं में था सर। लिपुलेख के पार तिब्बत के पहाड़ों को देखने की इच्छा रही हो या पढ़ाई के लिए फीस जुटाने की इच्छा,मलबे के नीचे वो भी दफन हो गई। इस वक्त धारचूला एकदम सूना है। काली नदी का बहाव अभी भी पहाड़ों को कंपा रहा है। आगे लिख पाना इस वक्त मेरे लिए संभव नहीं है। आपका गौतम गर्ब्याल।"

निसंदेह ये एक शानदार यात्रा संस्मरण जिसमें किताबों और गजेटियरों में मिल जाने वाले यांत्रिक और रेडीमेड विवरण नहीं,बल्कि स्वयं के देखे,जाने,भोगे,अनुभूत किए वास्तविक और सच्चे विवरण हैं। यही बात इसे किताब को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाती है।





Friday, 12 June 2026

जसपाल राणा:लक्ष्य जो नहीं उन्हें नहीं चुकना था

 



बहुत बार लिखे से बहुत बहुत ज्यादा गंभीर और महत्वपूर्ण बात छायाकार के कैमरे की आँख से पकड़ा गया कोई एक लम्हा या कोई एक फ्रेम बोल देता है। वे ऐसे अविस्मरणीय और यादगार लम्हे अपने कैमरे से कैद कर देते हैं कि वे आपके दिलोदिमाग पर हमेशा के लिए चस्पां हो जाते हैं। ऐसे लम्हे जिन्हें शब्दों में बांधा ही नहीं जा सकता। किसी भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता सिवाय छायाचित्र के।

आज जब हमारे समय के एक बहुत ही महत्वपूर्ण और जाने माने निशानेबाज जसपाल राणा ने इतनी कम उम्र में इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया तो उनके दो ऐसे ही अविस्मरणीय छायाचित्र लगातार आंखों के सामने घूम रहे हैं। ये दो चित्र उनके पूरे खेल जीवन को कहने के लिए पर्याप्त हैं।

एक


पहला छायाचित्र 2024 के पेरिस ओलंपिक का है। पेरिस में मनु भाकर निशानेबाजी में एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने की अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल करती हैं। ऐसा कारनामा करने वाली वे एकमात्र भारतीय एथलीट होती हैं। उसके बाद वे रेंज से वापस जा रही होती हैं। उनके साथ उनके कोच जसपाल राणा हैं। ये उसी समय का छायाचित्र है। जसपाल बहुत ही सजग और सीधे बैठे हैं और मनु आँखें बंद किये बेपरवाह सी उनके काँधे पर सर टिकाए हैं।

गुरु शिष्य संबंध को इससे बेहतर ढंग से और किसी भी तरह नहीं कहा जा सकता था या यूं कहें कि नहीं कहा जा सकता है। मानो अपने शिष्य की सारी जिम्मेदारी,सारा बोझ गुरु अपने कांधे उठाए है। उधर मनु भाकर का चेहरा निश्चिंतता और खुशी दमक रहा है। उनको अपने गुरु पर इस कदर विश्वास है कि गुरु का कांधा उसे हर फ़िक्र और हर चिंता से मुक्त कर देता है। इतना ही नहीं गुरु अपना कांधा प्रस्तुत कर इतना स्पेस भी देता है कि अभी अभी जो अविस्मरणीय उपलब्धि उसने हासिल की है,उसे अपनी बंद आंखों से फिर फिर जी ले। बंद आंखों से उस उपलब्धि को जी लेने का अनिर्वचनीय सुख उनके चेहरे से छलका छलका जाता है। 

 गुरु शिष्या का ये संबंध इकहरा नहीं है। बल्कि द्वंदात्मक है। वहाँ केवल समर्पण,लगाव और प्रतिबद्धता भर नहीं है, बल्कि मत विभिन्नता,मन मुटाव और अलगाव भी है।  टोक्यो ओलंपिक से पहले जसपाल राणा को जूनियर टीम का हाई परफॉर्मेंस प्रशिक्षक नियुक्त किया जाता है और मनु भाकर भी उनकी प्रशिक्षु होती हैं। लेकिन दिल्ली में आयोजित विश्व निशानेबाजी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले इवेंट्स को लेकर मनमुटाव होता है। उनके रास्ते अलग अलग हो जाते हैं। ये मनमुटाव टोक्यो ओलंपिक के दौरान चरम पर पहुंच जाता है जब मनु भाकर की राइफल इवेंट के बीच में खराब हो जाती है और उन्हें इवेंट बीच में ही छोड़ना पड़ता है।

लेकिन दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। गुरु शिष्या की प्रतिभा को पहचानता है और शिष्या गुरु की महिमा को। मनु को अपनी गलती का अहसास होता है। वो फिर फिर जसपाल के पास लौटती है और प्रशिक्षण शुरू करती है। नतीजा दुनिया के सामने होता है।

दरअसल ये कहानी ये बताती है कि वे आला दर्जे के प्रशिक्षक थे। अहंकार उन्हें छू नहीं गया था। वे अपने प्रशिक्षु की प्रतिभा को ना केवल पहचानते थे, बल्कि उसे तराशना भी जानते थे। उन्होंने मनु भाकर को स्वीकार कर उन्हें ऊँचाइयों तक पहुंचाया। जब उन्हें जूनियर टीम का प्रशिक्षक बनाया गया तो उन्होंने बड़ी संख्या में निशानेबाजों की प्रतिभा को निखारा  जिन्होंने आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपूर्व उपलब्धियां हासिल की। इनमें मनु भाकर के अलावा सौरव चौधरी,अनीश भानवाला पिंकी यादव जैसे नाम शामिल हैं। 

उनके असामयिक निधन से बड़ी संख्या में होनहार प्रशिक्षुओं को एक बहुत ही योग्य प्रशिक्षक की कमी हमेश सालती रहेगी।

दो

ये 2006 के दोहा एशियाई खेलों का है। इस प्रतियोगिता में उन्होंने तीन सोने के और एक चांदी का तमगा जीता था। ये प्रदर्शन उन्होंने उस समय किया था जब अन्य भारतीय निशानेबाज बहुत अच्छ प्रदर्शन नहीं कर रहे थे और वे खुद बीमार थे। वे सेंटर-फायर पिस्टल स्पर्धा में विश्व रिकॉर्ड बनाने के कगार पर थे, लेकिन जसपाल अपने आखिरी दो निशानों पर केवल 9 अंक ही हासिल कर पाए और विश्व रिकॉर्ड बनाने से चूक गए लेकिन सोना तो जीता ही। इस उपलब्धि के बाद वे किसी बच्चे की तरह फूट फूट कर रोये। उस समय उनके चेहरे पर बाल सुलभ भोलापन था। उन आँसुओं के पीछे छिपी आत्म संतुष्टि और खागी को सहज ही महसूस किया जा सकता था। उनके आंख से छलके आंसू कह रहे थे कि भावनाओं के अतिरेक से धैर्य का बांध टूट ही जाता है,फिर चाहे दुख हो सुख।

उन्होंने एक शूटर के रूप में असाधारण उपलब्धियां हासिल की। उनकी मुख्य स्पर्धा 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल थी। उन्होंने 1994 से 2006 तक कुल 15 पदक जीते हैं, जिनमें 9 स्वर्ण पदक, 4 रजत पदक और 2 कांस्य पदक शामिल हैं। उनका सबसे सफल प्रदर्शन 2002 में मैनचेस्टर में रहा, जहां उन्होंने छह पदक जीते थे। जसपाल के नाम भारत के सबसे अधिक पदक जीतने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के एथलीट के रूप में रिकॉर्ड है, उन्होंने चार संस्करणों में कुल 15 पदक जीते हैं, जिनमें नौ स्वर्ण, चार रजत और दो कांस्य पदक शामिल हैं। 1994 में मिलान में जूनियर विश्व चैंपियनशिप के दौरान जसपाल के घुटने पर दर्दनाक फोडा निकल आया था, जिससे उनके लिए खड़े होना भी असहनीय हो गया था। फिर भी उन्होंने अविस्मरणीय प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता और जूनियर विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की।

निसंदेह वे भारत के सबसे सफल और बड़े निशानेबाजों में थे। लेकिन उनकी उपलब्धियों का महत्व पदकों की संख्या में उतना नहीं जितना इस बात में है कि एक महंगे खेल को जिसमें अब तक धनवानों और राजघरानों का प्रभुत्व था,साधारण और आम व्यक्ति के लिए उपलब्ध कराया। 

तीन

वे हमेशा खिलाड़ियों के पक्ष और उनके हितों के लिए खड़े रहे। 2017 में इंपोर्टेड  शूटिंग उपकरणों पर  जीएसटी लागू होने पर वे उसके सबसे मुखर आलोचकों में से एक थे। उनका मानना था कि इन पर भारी कर लगाने से शूटिंग युवा खिलाड़ियों के लिए बेहद महंगी हो जाएगी और उभरती प्रतिभाओं को नुकसान होगा।

चार

एक प्रशिक्षक, एक निशानेबाज और खेल वो खिलाड़ियों के प्रवक्ता के रूप में उनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनकी कमी हर क्षेत्र में खलेगी। ये उम्र उनके जाने की कतई नहीं थी। लेकिन होनी को कोई टाल नहीं सकता।

उनका असामयिक निधन भारतीय खेल और विशेष रूप से शूटिंग में एक बड़ा निर्वात बनाता है।

उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Thursday, 6 March 2025

अलविदा प्रिय पैडी

 



सुनील गावस्कर ने अपनी किताब 'आइडॉल्स' में अपने पसंदीदा क्रिकेटर्स के बारे में लिखा है। इनमें से 22वें नंबर पर पद्माकर शिवालकार और 23वें नंबर पर राजेंद्र गोयल हैं। इन दोनों को ही उन्होंने बहुत ही शिद्दत से याद किया है। राष्ट्रीय फलक पर अपने हुनर से चमक बिखेरने वाले ये दोनों ऐसे हुनरमंद सितारा स्पिनर्स थे जिन्हें नियति ने क्रिकेट के अंतर्राष्ट्रीय फलक पर अपनी जवांमर्दी दिखाने से महरूम कर दिया।

ये वो समय था जब स्पिन गेंदबाजी की कला अपने चरम पर थी। बेदी, प्रसन्ना,चंद्रशेखर और वेंकट राघवन की चौकड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी घुमावदार और उड़ान वाली गेंदों से स्पिन गेंदबाजी की वेस्टइंडीज,इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की खौफनाक तेज गेंदबाजी के बरक्स एक अलहदा छवि बना रही थी। वे चारों खौफ के बजाए ललचा-ललचा कर बल्लेबाजों को छका रहे थे। 

और जिस समय ये चौकड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर ये काम कर रहे थे,ठीक उसी समय भारत के दो और गेंदबाज पद्माकर शिवालकर और राजिंदर गोयल का युग्म राष्ट्रीय स्तर पर उसी काम को अंजाम दे रहे थे। दरअसल उस महान चौकड़ी के समानांतर स्पिन गेंदबाजी के एक प्रति संसार की निर्मिति कर रहे थे। इस युग्म द्वारा रचा जा रहा संसार योग्यता और स्पिन कला कौशल में चौकड़ी द्वारा निर्मित दुनिया की आभा से ज़रा भी कम ना था। बस कुछ कम था तो नियति के साथ का अभाव भर था। योग्यता और प्रतिभा की आभा दोनों जगहों पर एक सी थी। पर एक में खुशकिस्मती की चमक थी दूसरे में बदकिस्मती की छाया। एक प्रसिद्धि से गमक गमक जाता। दूसरा कुछ ना मिल पाने की उदास छाया से आच्छादित रहता। 

उन दोनों को देखकर समझा जा सकता है कि एक मौका मिलने और ना मिलने भर से जीवन में कितना बड़ा अंतर आ जाता है या आ सकता है। कई बार होता है आप एक गलत समय पर पदार्पण करते है। शायद उन दोनों की ये बदकिस्मती थी कि वे बिशन सिंह बेदी के समकालीन थे। अगर नियति उन दोनों पर मेहरबान हुई होती तो हम एक दूसरा इतिहास पढ़ रहे होते। प्रभूत क्षमता और प्रतिभा होने के बाद भी भारत की ओर से खेलने का उन्हें एक मौका नहीं मिला। दोनों की नियति एक थी। दोनों की त्रासदी एक थी। दोनों यूं ही बीत गए,रीत गए,जाया हो गए।

पर वे दोनों घरेलू क्रिकेट के उस्ताद खिलाड़ी थे। दोनों वामहस्त धीमी गति के ऑर्थोडॉक्स लेग स्पिनर। ये उन चार खिलाड़ियों में से थे जिन्हें बिना टेस्ट खेले बीसीसीआई के सी के नायडू लाइफ टाइम पुरस्कार से नवाजा गया। दो ऐसे खिलाड़ी जिन्हें बिना भारत की ओर से खेले गावस्कर की किताब  'आइडॉल्स' में जगह मिली।

राजिंदर गोयल का निधन 2020 में हुआ और अब 03 मार्च 2025 को 84 साल की उम्र में शिवालकर ने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा।

पद्माकर शिवालकर क्या ही प्रतिभाशाली रहे होंगे कि जब पहली बार उन्होंने ट्रायल दिया तो उन्होंने क्रिकेट की गेंद को छुआ भी नहीं था। वो उस समय तक केवल टेनिस बॉल से खेला करते थे। उन दिनों उन्हें काम की जरूरत थी और बीनू मांकड़ को अपनी फैक्ट्री टीम के लिए खिलाड़ियों की। उन्होंने शिवालकर को चुना और कहा 'मेरी या किसी और की शैली की नकल ना करना।' उस युवा ने इस बात की गांठ बांध ली। अपनी खुद की शैली ईजाद की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उन्होंने 1961-62 में पहली बार प्रथम श्रेणी मैच खेला और 1987-88 तक 48 वर्ष की उम्र तक खेलते रहे। उन्होंने इस दौरान कुछ 124 मैचों में 19.69 की औसत से 589 विकेट और 16 विकेट लिस्ट ए मैचों में लिए।

एक गेंदबाज के रूप में पलक झपकते विपक्षी टीम को ध्वस्त करने की अद्भुत क्षमता थी उनमें। उनकी सबसे शानदार गेंदबाजी का उदाहरण 1973 का रणजी फाइनल है। ये फाइनल मैच चेन्नई के  चेपॉक स्टेडियम में मुंबई और तमिलनाडु के बीच खेल गया था। पिच वेंकटराघवन और वी वी कुमार के अनुकूल थी। मुंबई की पहली पारी 151 रन पर सिमट गई और तमिलनाडु ने पहले दिन के खेल की समाप्ति पर दो विकेट पर 62 रन बना लिए थे और बड़ी बढ़त लेने के लिए तैयार दिख रहा था। उस समय माइकल दलवी और अब्दुल जब्बार की साझेदारी ने 56 रन बनाए थे। पर अगले दिन शिवालकर जब गेंदबाजी करने आये और पहली गेंद तेजी से घूमी और उछली तो उस टीम के सदस्य कल्याण सुंदरम बताते हैं कि उस गेंद को देखते ही तमिलनाडु टीम को आभास हो गया था कि जल्द ही सभी का बैटिंग नंबर आने वाला है। और ये आशंका सही साबित हुई। बाकी के आठ विकेट केवल 18 रन जोड़ सके और तमिलनाडु की टीम 80 रन पर ऑल आउट हो गई। उस इनिंग में शिवालकर ने 16 रन पर 08 विकेट लिए और दूसर पारी 18 रन देकर 05 विकेट। पांच दिन का मैच दो दिन में खत्म हो गया।

एक स्पिन गेंदबाज के दो प्रमुख विशेषता होती हैं। एक, हवा में उड़ान और लूप। दूसरी, पिच से गेंद का घुमाव। वे फ्लाइट और लूप के मास्टर गेंदबाज थे। वे एक और तो हवा में गेंद की उड़ान से बल्लेबाज को भरमाते,तो दूसरी और वे अपनी गेंद की गति और लंबाई से बल्लेबाजों को परेशान करते। बल्लेबाजों को स्टंप आउट कराना उनका सबसे प्रिय शगल था और खासियत भी।

वे एक शानदार और सफल गेंदबाज थे। उन्होंने 13 बार दस या दस से अधिक विकेट लिए और 42 बार एक पारी में पांच या पांच से अधिक विकेट लिए। इस सब के बावजूद वे भारतीय टीम के लिए नहीं चुने जा सके। इसका उन्हें हमेशा मलाल रहा। और इसे हमेशा उन्होंने बहुत शिद्दत से महसूस किया।

एक कहावत है 'सफलता से अधिक सफल कुछ नहीं होता'। इस बात को सबसे ज्यादा वही समझ सकता है जिन्हें सफलता नहीं पाई हो। वे अपनी सारी योग्यता और प्रतिभा के बावजूद भारतीय टीम में जगह ना बना पाने की असफलता और उससे उपजी निराशा को और सफलता की ऊष्मा को और उसके महत्व को शिवालकर से बेहतर भला और कौन समझ सकता है। 


और उनकी इस निराशा और उदासी को सबसे अधिक उनके गायन में महसूस की जा सकती है। 

वे एक शानदार प्रोफेशनल गायक भी थे। पक्के गायक। अगर वे क्रिकेटर ना होते तो शायद वे एक सफल और शानदार गायक होते। उन्होंने अपने कुछ गीतों में कहा है कि कैसे एक व्यक्ति का भाग्य  उसके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है रूप से 'हा चेंदु दैवगतिचा......' गीत में। जब वे ये गीत गाते तो अहसास होता है कि मानो वे अपना जीवन गा रहे हों। कितनी शिद्दत से उनका दर्द उस गीत में छलक छलक जाता है। जब वे गाते हैं तो लगता है उसमें उन्होंने अपनी आत्मा का समावेश कर दिया है। ये उनके जीवन का मानो थीम गीत हो - 


"भाग्य का यह चक्र निरंतर घूमता रहता है, 

कभी ऊँचाइयों तक ले जाकर तो 

कभी किसी का जीवन बिखेरकर। 


यह समय की चाल कैसी है, 

इसे कोई नहीं समझ पाया। 

जब भी कुछ होता है, 

लोग बिना सोचे-समझे दोषारोपण करने लगते हैं और हज़ारों ज़ुबानें बड़बड़ाने लगती हैं।


इस भाग्य के खेल को ज़रा करीब से देखो

जिस तरह समुद्र में नावें छोड़ी जाती हैं 

और लहरों की मार से उनकी परीक्षा होती है, 

वैसे ही जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं। 

जो इन लहरों से लड़ने की ताकत रखते हैं,

 वे विजयी होते हैं, 

तो कुछ लोग इन्हीं लहरों में समा जाते हैं।


परंतु यह सब तो जीवन का स्वाभाविक क्रम है, फिर दुखी होने से क्या लाभ?

जो भी सुख के पल हमारे पास बचे हैं, उन्हें प्रेम और सहेज कर रखो।

इन्हीं सुखद पलों से जीवन का मधुर संगीत बनता है, जो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।"


बाद में उन्होंने 'हा चेंदु दैवगतिचा' (समय का ये चक्र) नाम से किताब भी लिखी। सच में वे समय के चक्र में फंसे थे और नियति का शिकार थे। वे इसे जानते समझते थे और इसको शिद्दत से महसूस करते थे। एक उदास संगीत हमेशा उनके जीवन के पार्श्व में बजता था। उसकी लय पर उनका जीवन थिरकता था।

क्या ही विडंबना है कि जिसने गेंद की उड़ान को साध लिया हो, जो गेंद की उड़ान का जादूगर हो,उसका साधक हो,नियति ने उसे उड़ने न दिया। उसे उन ऊंचाइयों से महरूम कर दिया जिन ऊंचाइयों का वो हकदार था और जिन ऊंचाइयों को वो छूना चाहता था।

पर कुछ जीवन अपूर्ण इच्छाओं को लिए ही पूर्ण हो जाते हैं। पद्माकर शिवालकर भी गेंदबाजी के एक ऐसे ही साधक थे जिनकी बहुत सी इच्छाएं अपूर्ण ही रहनी थी।  शायद उनकी महानता इस अपूर्णता से ही बनती है और वे इसीलिए याद किए जाते रहेंगे।

अलविदा प्रिय पैडी।


Friday, 11 October 2024

स्मृति शेष पिता




 "चले गए थे वे अकेले

एक रहस्यमय जगत में

जहां से आज तक लौटकर नहीं आया कोई

वह शय्या अभी भी है

वह सिरहाना अभी भी है

मैं भी हूं तारों-भरे आकाश के नीचे

पृथ्वी के लोगों के बीच


चल रहीं हूं अकेली उन्हें याद करती हुई

जीवन के बीच जीवन ढूंढती हुई।"


असमिया कवयित्री मणिकुंतला भट्टाचार्य की कविता 'पिता' का अंश।

मणिकुंतला की ये पीड़ा सिर्फ उनकी पीड़ा नहीं है, शायद पूर्ण हुए हर पिता के बच्चों की है। पिता का उनके सिर पर रखा हाथ दुनिया की सबसे बड़ी आश्वस्ति है। और उसका सिर से उठ जाना एक ऐसा अभाव जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकता।

किसी के जाने से जिंदगी रुकती नहीं है। पिता के जाने पर भी कहां रुकती है। चलती जाती है वो बिना रुके। हमें भी कहां रुकने देती है! लेकिन जिंदगी रुके भले ही ना, पर वो पहले जैसी रह भी कहां जाती है। बस होता इतना भर है कि पैरों तले धरती की मुलामियत थोड़ी कम हो जाती है और सिर के ऊपर का आसमान थोड़ा और दूर। धरती का हरा रंग थोड़ा कम हरा दीखने लगता है और आसमान का रंग थोड़ा कम नीला। सूरज का ताप कुछ और तीक्ष्ण हो जाता है और हवा की चुभन कुछ और नुकीली। सर्द रातें कुछ ज्यादा सर्द होती जाती हैं और गरम दिन कुछ और गरम। बारिशें हैं कि बेमानी हुई जाती हैं और आंसू खारे। बस जिंदगी है कि चलती जाती है। कुछ और भारी होती हुई। कुछ और उदास होती हुई। रुकती, ठिठकती, सहमी हुई सी। सिर पर से पिता के हाथ का उठ जाना जिंदगी का निष्कवच हो जाना जो होता है।

लेकिन किया भी जाए तो क्या किया जा सकता है। मानना ही पड़ता है कि ज़िंदगी की सबसे बड़ी और अंतिम सच्चाई ही ये है कि इसे एक दिन खत्म हो जाना ही है। ये धीमे धीमे समय में घुलती जाती है और फिर किसी एक दिन पूरी तरह घुल कर खत्म हो जाती है। और तब रह जाते हैं खत्म हुए जीवन के वे अवशेष जो दिल और दिमाग के गहरे भीतरी कोनों में दबे रह जाते हैं। स्मृतियां के रूप में। अब वे स्मृतियां ही सबसे बड़ी पूंजी होती हैं। होती हैं सबसे अनमोल धरोहर। सबसे मजबूत कवच। ये स्मृतियां ही शेष रह जाती हैं जिन्हें खुशबू सा हो ज़िंदगी को ताउम्र महकाना है। उन्हें अंधेरे समय का उजास बन जाना है। मुश्किल समय में उनका हल। उदास समय की मुस्कान बन जाना है। रुके समय की गति।

पिता को गए तीन साल होने को आए। इस बीच कोई एक दिन ऐसा नहीं बीता जिस दिन पिता की स्मृति ने बेचैन ना किया हो। इतना वक़्फा बीत जाने के बाद भी ऐसा लगता है जैसे उनका जाना बस कल की ही तो बात है। उनकी स्मृतियां उदासी का सबब भी बनती हैं और मुस्कान का भी। हंसाती हैं, तो रुलाती भी हैं। कभी गुदगुदाती हैं। कभी कसक पैदा करती हैं। 


पिता की स्मृति इकहरी नहीं है। ये कई कई परत वाली हैं। अलग अलग भावावेगों वाली। जटिल। अलग अलग समय में अलग अलग भावोद्वेग पैदा करती हुई आती हैं और तिरोहित हो जाती हैं।

पिता का व्यक्तित्व बहुत ही सुदर्शन था। लंबे। छछहरे बदन। रक्ताभ वर्ण। रुआबदार व्यक्तित्व।शुरुआती जीवन अभावों से बना था। इसलिए जो भी किया खुद के बूते। सेल्फमेड। खिलाड़ी। गुस्सैल इतने कि परिवार क्या गांव जवार भी सहमता। लेकिन सोच में पुरुषवादी। पूरी तरह पितृसत्ता वादी। 

वे ऐसे कैसे हुए। पता नहीं। हो सकता है ये जातीय संस्कार रहे हों या परिवेशगत संस्कार। मेरे बाबा और परबाबा ज़मीदार की रैयत रहे। उसकी जमीन जोतते और उसे लगान देते। ये तो 1956 का ज़मीदारी उन्मूलन कानून था कि ज़मीन उनकी अपनी हुई और वे स्वतंत्र किसान बने। क्या पता उस सामंतवादी व्यवस्था का हिस्सा होने के संस्कार रहे हों।

लेकिन ये उनके व्यक्तित्व का विरोधाभास था कि पुरुषवादी सोच के बावजूद बेटी को बेइंतहा प्यार करते। उसे अगर ज़्यादा भी नहीं तो कभी बेटे से कम भी नहीं समझा। एक समय पर वे दकियानूसी लगते तो किसी दूसरे समय पर बेहद प्रगतिशील।

जो भी हो,बचपन उनसे डरते बीता। ना जाने कितनी बार मार खाई। एक ऐसा बचपन जो हमेशा अपने पिता से छिपता फिरता। उनसे बचता फिरता। इतने डर के बावजूद उनका होना सबसे बड़ी आश्वस्ति थी। सबसे बड़ा संबल था। वे मां की तरह नहीं थे। हो भी नहीं सकते थे। मां किसी नदी की तरह। बात बात में प्यार छलकता। पिता किसी चट्टान की तरह। ऊपर से कठोर। अपने बच्चों के प्रति प्रेम को भीतर समेटे हुए लेकिन बाहर से निर्लिप्त, निस्पृह,कठोर,अनमने से।

बेहद ज़िद्दी थे। वे अपने मन में हर बात के लिए एक धारणा बना लेते। उनको लगता वही सही है जो उन्होंने सोचा है। बहुत बार उस समय तक डांट या मार खाते जब तक हम वो बात ना कह देते जो उन्होंने सोच रखी है। भले ही वो गलत हो। इससे उनका अहम तुष्ट होता। हम बहुत बार पहले ही वो बात कह देते जो उन्होंने सोच रखी होती थी। हालांकि वो बात सच नहीं होती थी। पर इससे हमारा जल्द बचाव हो जाता। 

वे बहुत अनुशासनप्रिय थे और बहुत नियमित भी। सुबह बहुत जल्द उठते और हमें भी कान पकड़कर बहुत सुबह उठा देते। इस सुबह का मतलब सुबह के चार बजे होता। गर्मियों में ही नहीं बल्कि सर्दियों में भी। हमें पढ़ने के लिए बैठा देते और खुद रेडियो पर गाने लगा देते और व्यायाम करते। सुबह उठना बहुत कष्टप्रद लगता। लेकिन धीरे धीरे गाने सुनने का चस्का लगा और सुबह उठना उस तरह से कष्टप्रद ना रह गया। उन्हें रेडियो सुनने का बड़ा शौक था। रेडियो कश्मीर से रात्रि आठ बजे प्रसारित होने वाला कार्यक्रम 'वादी की आवाज़' उनका बहुत ही पसन्दीदा कार्यक्रम था जिसके स्टॉक करेक्टर मुंशीजी और निक्की की नोक झोंक केवल उन्हें ही नहीं माँ और हमारे भी मन को गुदगुदाती।

वे सरकारी नौकरी में थे। लेकिन वे बिल्कुल भी महत्वाकांक्षी ना थे। वे ईमानदारी और स्वाभिमान से जीना चाहते। उनकी चाहतें बहुत ही साधारण। हम चाहते कि हमारा दाखिला कान्वेंट स्कूल में हो। पर वे कहते वहां पढ़ने का मतलब बच्चे ना अंग्रेजी ठीक से सीख पाएंगे और ना हिंदी। हालांकि हम जानते थे कि वे दो बच्चों को कान्वेंट में पढ़ाना अफोर्ड नहीं कर सकते थे।


उन्होंने अपने बेटे से भी कोई बहुत बड़ी उम्मीद नहीं लगाई थी। वे सिर्फ इतना चाहते थे कि वो एक अच्छा खिलाड़ी बने और दबंगई करे। वे खुद भी एक अच्छे खिलाड़ी रहे और कालेज में रहते हुए दबंगई भी की। उस समय अपने इकलौते बेटे से ऐसी उम्मीद रखना वाकई चकित कर देने वाला था। इसके लिए उन्होंने अपने तईं खूब प्रयास किए। वे अपने साथ शाम को मैदान पर ले जाते और सुबह फिटनेस के लिए। 

लेकिन उनकी इस इच्छा को पूरा नहीं ही होना था। बेटे की खेलों में रुचि तो हुई। खेला भी खूब। पर उस स्तर पर ना पहुंच सका जहां वे उसे देख रहे थे। दबंगई तो बिल्कुल भी ना हुई। वे बेटे को अक्सर लड़ाई झगड़े के लिए प्रेरित करते। इस मायने में कि बेटा दब्बू ना बने। वे अक्सर कहते पिटो या पीटो, पर डरकर घर मत आओ। कितने पिता अपने इकलौते बेटे को इस तरह की छूट देने का साहस कर पाते होंगे। आज की तरह ना सोचें बल्कि आज से लगभग आधी सदी पहले के समय को रखकर देखे तो ये बात मुझे तो आज भी अचंभे से भर देती है।

उनका हमारे दिलों में गजब का खौफ होता। इतना ज्यादा कि सही बात ही भूल जाते। कक्षा आठ की बात है। वार्षिक परीक्षा में गणित का पर्चा देकर घर आया था। उन्होंने कहा ये सब अभी हल करके दिखाओ। घबराहट में सारे सवाल गलत किए। बहुत मार पड़ी। जब परिणाम आए तो गणित के उस पर्चे में 50 में से 49 अंक आए थे। 

लेकिन ये जीवन की शायद आखिरी मार थी। पिता जी का दूसरी जगह स्थानांतरण हो गया। हम वहीं बने रहे और पिताजी आते जाते रहे। ये मेरे लिए सुकून की बात थी। उस समय नौवीं कक्षा में ही विषय चुनने होते थे। पिताजी ने कला वर्ग में दाखिला दिलाया ताकि खेलने के लिए अधिक समय मिल सके। ऐसा उस समय हो रहा था जब सबसे नकारा बच्चे कला वर्ग में दाखिला लिया करते थे। लेकिन उनकी अपने इकलौते बेटे से अपेक्षाएं सामान्य चलन से बहुत अलग थी।

हाई स्कूल की बोर्ड की परीक्षा उनके बगैर दीं। परीक्षा परिणाम को लेकर ना तो उन्हें बहुत उम्मीद थी और ना ही भरोसा। लेकिन जब उन्होंने परिणाम देखा तो वे हैरान थे। उनका बेटा डिस्टिकंशन से उत्तीर्ण हुआ था। छियत्तर प्रतिशत अंकों के साथ। उनके मूंह से निकला था 'ये तो हाथ से गया।' ये बेहद अप्रत्याशित प्रतिक्रिया थी। उन्हें ये अहसास हो गया था जो वे चाहते हैं वो कभी पूरा नहीं होगा। लेकिन उससे अधिक गर्व से भरा मैंने उन्हें अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा। उनकी उम्मीदें बदल गईं थी। उसके बाद उन्होंने पढ़ाई को लेकर ताजिंदगी कोई सवाल या संदेह नहीं किया।

लेकिन समय बदल जाता है। हमारे संबंध भी बदल रहे थे। हम अपनी नई भूमिकाओं के लिए तैयार हो रहे थे। मैं पढ़ने इलाहाबाद आ गया था। एक घटना से घबराकर पिताजी को एक पत्र लिखा था जिसमें अकेले रहने के डर को व्यक्त किया था। उस समय तक फोन अस्तित्व में नहीं आया था। पत्रों पर सवार हो भावनाएं,

जज्बात,विचार इत उत डोलते रहते। जवाब में उन्होंने जो पत्र लिखा था वो आज भी अंधेरे मन को रोशन कर देता है। वे बहुत सुंदर लिखते। सिर्फ हस्तलिपि सुंदर नहीं होती बल्कि उसका कंटेंट उससे भी सुंदर होता। वो पत्र भौतिक रूप में भले ही पास नहीं है। पर किसी रोशनी की तरह दिल में हमेशा बना रहता है। उनके लिखे का आशय था कोई भी सारी उम्र साथ नहीं होता। वे भी नहीं रहेंगे। हर किसी को अपना मार्ग स्वयं बनाना है। बल्कि इस बात के लिए भी खुद को तैयार करना होता है कि जो हाथ अब तक तुम्हे संभालते रहे हैं अब उन हाथों को भी संभालने की सलाहियत भी पैदा करनी है। 

कभी नहीं सोचा था कि वो समय भी आएगा कि उन हाथों को संभालना होगा जिन हाथों ने बचपन से जवानी तक सहारा दिया था। पर समय सबसे बलवान होता है। होनी अपनी करके रहती है। समय से निर्दय,निष्ठुर और क्या होता है,किसी को पता हो तो बताए।

 वे सेवानिवृत हो गए थे। उन्होंने गांव में रहना चुना। लेकिन कुछ साल बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा। अब उन्हें हम नौकरी पर साथ ले आए थे। 

उन्हें जीवन से बहुत प्यार था। वे जीना चाहते थे। लंबा बहुत लंबा। उन्हें ड्रिंक का शौक था। धूम्रपान का भी। लेकिन डॉक्टर ने सब मना कर दिया था। उन्होंने डॉक्टर की हर सलाह का अक्षरशः पालन किया। उन्होंने हद से ज्यादा संयमित जीवन जीना शुरू कर दिया था। 

बायपास सर्जरी के बाद वे 15 सालों तक अच्छे से रहे। बस इस बीच उन्होंने बहुत कुछ जिम्मेदारियों से मुक्त होना शुरू कर दिया था। जिम्मेदारियां अपने बेटे को हस्तांतरित करना शुरू कर दिया था। ये उन्होंने इतने सहज और सरलता से किया कि किसी को अहसास ही नहीं हुआ कि वे क्या कर रहे हैं। उन्होंने खुद को अपने बहु- बेटे के हवाले कर दिया था। ठीक वैसे ही जैसे कभी हम उनके हवाले हुआ करते थे।

उनके स्वास्थ्य की सबसे बड़ी बाधा उनकी दृष्टि का धीमे धीमे क्षय होते जाना था। तमाम इलाज के बावजूद उनकी दृष्टि लगातार कमजोर होती जा रही थी। डॉक्टर कुछ नहीं कर पा रहे थे। क्षीण होती दृष्टि उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों को लगातार सीमित कर रही थी। 

ये वो समय था जब कोरोना बीमारी मानवता पर कहर बनकर टूट पड़ी थी। उनकी आंखों की रोशनी लगातार कम होती जा रही थी। इस बीच एक और बीमारी ने उन्हें अपना शिकार बना लिया था। वे डिमेंशिया से प्रभावित होने लगे थे। वे चीजें भूलने लगे थे। वे मां को भी पहचानना भूल जाते थे। एक समय ऐसा आया जब वे सिर्फ और सिर्फ अपनी पुत्रवधु को पहचानते थे। उन्हें केवल उस पर भरोसा रहा गया था। मां को अक्सर पूछते 'ये कौन है'। अपने बेटे को अब वे एक अनजान साहब के तौर पर पहचानते। ये हृदय विदारक था।

 कई दुख आपके लिए ऐसे होते हैं जो बहुत सारे दुखों के समुच्चय से भी गहरे होते हैं। मन को गहरी टीस से भर देते हैं। वे आपकी आत्मा पर फफोलों की तरह उभर आते हैं जिनसे दुख रिसता रहता है। पिता को इस तरह से देखने से बड़ा दुख और क्या हो सकता था। लेकिन नियति अपना कार्य निस्पृह होकर करती रहती है। उसके लिए क्या दुख, क्या सुख।

अब वे शारीरिक रूप से भी बहुत कमजोर हो चले थे। वे किसी छोटे से बालक की तरह। उन्होंने पूरी तरह से खुद को हमें सौंप दिया था। वे बच्चों की तरह इसरार करते। उनकी देखभाल करते हुए हमें अपनी बेटियों का बचपन याद आने लगता। कई बार उनके हाथों को हम पकड़े बैठे रहते। उनके हाथ ऐसे लगते जैसे बचपन में बेटियों के हाथ। उतने ही कोमल, अशक्त। सोचते वृद्धावस्था और बाल्यावस्था में क्या फ़र्क होता है।

उनके हाथों की कोमलता भले ही हमें बेटियों के बचपन का अहसास कराती,पर उन हाथों का ठंडापन हमें अव्यक्त भय से भर देता। बेटियों और पिता के हाथों की कोमलता का अहसास एक होते हुए भी हमे अंतर साफ नजर आता। बचपन के हाथों का अहसास जीवन का अहसास है। आगत का अहसास है। नवजीवन और नवसृजन का अहसास है। वृद्धावस्था के हाथों की कोमलता का अहसास जाने का अहसास है। जीवन की समाप्ति का अहसास है। बुझती लौ का अहसास है। कुछ छूटते जाने का अहसास है।

उनके हाथों का कोमल स्पर्श हमें दो अलग अलग एहसासों से एक साथ भर देता। उनके हाथों की कोमलता हमारे अंतर्मन को तरलता से भर देती। वो प्यार के सोते सी फूट पड़ती। लेकिन उनके हाथों का ठंडापन भय से शुष्क कर देता। अथाह पीड़ा से भर देता।

एक ऐसे व्यक्ति को जो हमारे लिए शक्ति का पर्याय  हो। जीवन का संबल हो। जिसकी छत्रछाया में खुद को महफूज़ समझते रहे हो, जो हमारे लिए साहस का पुंज रहा हो,उसे इस कदर अशक्त देखकर आत्मा चीत्कार ना कर उठे तो और क्या करे। जिन हाथों पर कभी झूला झूले हों, जिन हाथों से जीवन का संगीत सुना हो,उन हाथों से मृत्यु राग सुनते हुए मन दुख छालों से ना भर जाता तो और क्या होता।

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है जिन हाथों से मार खाने में कभी आप डरते हों आज उन हाथों से मार खाने की इच्छा जाग जाए। कैसे अशक्त हो गए होंगे वे हाथ।

अब पिता की हालत गंभीर होती जा रही थी। हम उन्हें रोज मृत्यु के थोड़ा और करीब जाते देख रहे थे। इससे भयावह अहसास और क्या हो सकता था। अंततः उन्हें अस्पताल में दाखिल करना पड़ा। डॉक्टर का हर आश्वासन उनकी आगत मृत्यु का पैगाम होता। हम उन्हें देहरादून से मेरठ ले आए। वे अक्सर कहा करते उन्हें उनकी जन्मभूमि ही ले जाया जाए। यहां तीन दिन बाद 11 अक्टूबर 2021 को एक जीवन की डोर टूट गई। नियति का एक जीवन चक्र पूर्ण हुआ। पिता पूर्ण हुए। एक आत्मा शरीर के बंधन से मुक्त हुई। शरीर अपनी माटी से जा मिला।

दुख दुख होता है। समय उनका सबसे बड़ा मलहम  होता है। दुख मिट जाते हैं। पर कोई कोई दुख जीवन में एक ऐसा अभाव भर देता है जिसे कभी भी,कोई भी कहां पूरा कर पाता है। पिता का जाना एक ऐसा ही दुख है।

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सच तो ये है कि पिता का जाना जीवन के एक हिस्से का अलग हो जाना है। जिंदगी के अमूल्य क्षणों में से कुछ का छूट जाना है। सपनों की एक शाख का सूख जाना है। खुशियों के एक हिस्से का अनंत में विलीन हो जाना है। 

दरअसल पिता का जाना आपकी आत्मा पर पड़ा दुख का ऐसा अमिट निशान है जिसे अब कभी नहीं जाना है।

Tuesday, 24 October 2023

सरदार ऑफ स्पिन



हमारी स्मृतियां सिर्फ देखी गई चीजों से ही नहीं बनती बल्कि पढ़ी गई और सुनी गई चीजों से भी बनती हैं। हम उस पीढ़ी के लोग हैं जब हम बाल्यावस्था से किशोरावस्था की और बढ़ रहे थे,तब टीवी नहीं आया था और रेडियो का जलवा आज के मोबाइल फोन से भी बड़ा हुआ करता था।

उस समय भी तमाम इवेंट्स और खेलों का सजीव प्रसारण होता था। टीवी पर नहीं बल्कि रेडियो पर।   हम रेडियो की कमेंट्री सुनते हुए बड़े हो रहे थे। और ये रेडियो की कमेंट्री का स्वर्णकाल था।

वो समय जसदेव सिंह,स्कन्द गुप्त,मनीष देब और सुशील दोषी जैसे शानदार कमेंटेटरों का समय था जो माइक्रोफोन के जरिए खेल मैदान के दृश्यों का हूबहू चित्र अपनी आवाज की कूंची से सुदूर बैठे  श्रोताओं के मन मष्तिष्क में उकेर देते थे। 

 समय रेडियो के माध्यम से बने चित्र और स्मृतियां आज भी इतनी चमकीली और उजली हैं कि उनके सामने निकट अतीत में दृश्य माध्यमों से बने चित्र फीके और धुंधले प्रतीत होते हैं। मसलन 1975 में विश्व कप हॉकी में जीत या 1983 में क्रिकेट विश्व कप में जीत की स्मृतियां 2007 और 2011 की जीत की स्मृतियों से गहरी और उजली हैं।

ऐसी ही अमिट स्मृतियाँ उस समय के खेल जगत की तमाम हस्तियों की भी हैं। उन दिनों एक त्रयी हुआ करती थी भारतीय स्पिनरों की जिन्होंने गेंदबाजी की स्पिन विधा की नई परिभाषा गढ़ी थी और उसको अनंतिम ऊँचाईयों पर पहुँचाया था। इस त्रयी का निर्माण इरापल्ली प्रसन्ना,चंद्रशेखर और बिशन सिंह बेदी करते थे। और इससे जुड़कर वेंकट राघवन इसे चौकड़ी में तब्दील कर दिया करते थे।


अब जब बिशन पाजी के इस दुनिया को अलविदा कहे जाने की खबरें आ रही हैं,तो मन यादों के गलियारे में अपने फन के एक ऐसे फनकार की छवियों को ढूंढ रहा है,जो अपने फन का उस्ताद था। ऐसा उस्ताद जिसकी बराबरी उस समय दुनिया में कोई ना कर पाता था। एक ऐसा फनकार जिसकी उंगलियों में जादू था। ऐसा जादूगर जो गेंद को इस तरह घुमाता कि दुनिया का बड़े से बड़ा बल्लेबाज़ नाच जाता। एक ऐसा करामाती जो अपनी गेंदों को ऐसी उड़ान देता कि दिग्गज से दिग्गज बल्लेबाज का विकेट उड़ जाता।

 आज मन में अलग अलग रंग के और खास तौर पर गुलाबी और आसमानी रंग के पटके पहने बिशन पाजी की असंख्य छवियाँ बन बिगड़ रही हैं। वे बाएं हाथ के ऑर्थोडॉक्स लेग स्पिनर थे जिन्होंने 1966 से 1979 तक भारत के लिए 67 टेस्ट मैच खेले और 266 विकेट लिए। साथ ही 22 टेस्ट मैचों में कप्तानी भी की। उन्होंने प्रथम श्रेणी में 1560 विकेट लिए जो किसी भी भारतीय द्वारा लिए गए सर्वाधिक विकेट हैं।

1986 में बिशन सिंह बेदी के बारे में डी जे रत्नागर 'बार्कलेज वर्ल्ड ऑफ क्रिकेट' में लिख रहे थे कि उनकी 'गेंदबाजी बेहद खूबसूरत और ग्रेसफुल थी जिसमें चतुराई और कलात्मकता दोनों एक साथ समाई थी।' उनका बॉलिङ्ग एक्शन इतना लयात्मक होता जैसे किसी सिद्धहस्त वायलिन वादक का स्ट्रिंग पर बो को साधना। वे इतनी सहजता और कलात्मकता के साथ बॉलिंग करते कि उन्हें बॉलिङ्ग करते देखना ट्रीट होता। ठीक वैसे जैसे किसी आर्केस्ट्रा में सैकड़ों वायलिन वादकों का एक लय में वायलिन साधना।

वे क्लासिक खब्बू लेग स्पिनर थे। उनका अपनी गेंदबाजी पर अद्भुत नियंत्रण था। वे लगातार एक स्पॉट पर गेंद फेंक सकते थे और ओवर दर ओवर मेडन रख सकते रहे। वे लांस गिब्स के बाद टेस्ट क्रिकेट के सबसे किफायती गेंदबाज थे। 1975 के विश्व कप में ईस्ट अफ्रीका के विरुद्ध भारत की पहली ओडीआई जीत थी। उसमें बिशन पाजी का गेंदबाजी विश्लेषण था-12 ओवर,08 मेडन,06 रन और 01 विकेट।

दरअसल वे सर्वश्रेष्ठ शास्त्रीय लेग स्पिनर थे। और वे लेग स्पिन विधा के दिलीप कुमार ठहरते हैं। ना उससे कम ना उससे ज़्यादा। जिस तरह चाहे कितने ही शाहरुख खान आ जाएं,दिलीप साहब नहीं हो सकते। ठीक उसी तरह चाहे जितने शेन वार्न या कुंबले आ जाएं,बिशन पाजी नहीं बन सकते। कोई भी उनसे बेहतर या खराब हो सकता है, लेकिन बिशन पाजी नहीं हो सकता। बिशन बेदी दुनिया में अपनी तरह का एक हुआ और एक ही रहेगा।

क्लासिक अर्थों में वे लेग स्पिन के मोहम्मद रफी थे। रफी साहब के पक्के सुरों की तरह उनकी गेंदबाजी होती। जो अपनी लेंथ से ज़रा भी इधर उधर ना होती। हां उनकी आर्मर गेंद  लय के बीच मुरकियों की तरह होती जो उनकी गेंदबाजी को एक अतिरिक्त ऊंचाई देती।

जिस तरह उनकी गेंदबाजी धारदार होती उसी तरह उनका व्यक्त्वि भी धारदार था। वे बहुत मुखर और स्पष्ट वक्ता थे और हमेशा न्याय के पक्ष में खड़े होते। वे हर बात पर अपनी स्पष्ट राय रखते और उसे बिना किसी लाग लपेट के व्यक्त करते। उन्होंने श्रीलंका के महान स्पिनर मुरलीधरन चकर कहा और मुरलीधरन की मानहानि की धमकी के बाद भी अपनी बात पर कायम रहे। उनका स्पष्ट मानना था कि 'गेंदबाजी में चकिंग सट्टेबाजी और फिक्सिंग से भी ज़्यादा खतरनाक' है।

भले ही वे असफल रहे हों लेकिन उन्होंने दिल्ली क्रिकेट प्रशासन को सुधारने का भरसक प्रयास किया और राजनीतिक लोगों से दूर रखने का प्रयास भी। उन्होंने फिरोजशाह कोटला का नामकरण एक राजनीतिज्ञ के नाम पर रखे जाने के विरोध में उस स्टेडियम के एक प्रमुख स्टैंड को अपना नाम नहीं देने दिया।

वे टी20 फॉरमेट के हमेशा आलोचक रहे और आईपीएल के भी। आईपीएल की ऑक्शन के वे हमेशा विरोधी रहे और उसमें खिलाड़ियों की नीलामी की तुलना उन्होंने घोड़ों की नीलामी से की।

उनका ये स्पष्ट मानना था कि क्रिकेट का खेल और उसका सम्मान हार जीत से ऊपर है। फिर चाहे 1976 के वेस्टइंडीज दौरे के चौथे टेस्ट मैच में वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाजों की खतरनाक गेंदबाजी के विरोध में अपने खिलाड़ियों की सुरक्षा के मद्देनजर पारी की घोषणा करना हो, 1976-77 के इंग्लैंड के भारत दौरे में जॉन लीवर पर वैसलीन प्रयोग के आरोप हो या फिर 1978 में पाकिस्तान दौरे में अंपायरों के पक्षपात पूर्ण रैवैय पर टीम को वापस बुला लेने का निर्णय हो।

दरअसल एक खिलाड़ी के रूप में महान,एक लेग स्पिनर के रूप में सर्वश्रेष्ठ, एक व्यक्ति के रूप में मुखर और स्पष्टवक्ता जिनका व्यक्तिगत जीवन  बहुत ही बिंदास और मनमौजी था जो शराब,खाना और ठहाकों के मेल से बना था।

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जिसने भी जन्म लिया उसकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। लेकिन कुछ मृत्यु आपको गहरे अवसाद से भर देती हैं। लेकिन बिशन पाजी जैसा व्यक्तित्व भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न रहे उनकी यादें हमेशा हमारे जेहन में बनी रहेगी।

हां इस फानी दुनिया से बिशन पाजी को अलविदा कहना ही है। तो अलविदा पाजी।

Sunday, 30 July 2023

हरजीत सिंह:मुझसे फिर मिल

 



         हर शहर का एक साहित्यिक आभामंडल होता है। उस आभामंडल में तमाम सितारे होते हैं जो आंखों को चकाचौंध से भर देते हैं। लेकिन जब आप उस चकाचौंध को पार कर कुछ गहरे जाते हैं तो कुछ मद्धिम शीतल प्रकाश लिए ऐसे सितारे होते हैं जो आत्मा को दीप्त कर देते है। विस्मय से भर देते हैं। प्रेम और करुणा से सराबोर कर देते हैं

  देहरादून की अदबी जमात के प्रमुख सितारों की चकाचोंध  के पार भी दो ऐसे ही  सितारों का एक युग्म है जिसका प्रकाश आंखों को नहीं बल्कि दिल को प्रकाशमान करता है। ये युग्म  अवधेश और हरजीत का है। 

देहरादूनी अदबी जमात की हंसी के बीच किसी बच्चे की किलकारी गर आपको सुनाई दे तो आप समझ जाइए ये हरजीत है। उस जमात से कोई संगीत की उदास सी धुन सुनाई दे तो समझ लीजिए ये हरजीत है। उस जमात की सदा में कोई सदा दोस्त की सी लगे तो समझो वो हरजीत है।

कोई भी शास्त्रीय  गायन तानपुरे के बिना कहां पूरा होता है। कितना ही सिद्धहस्त गायक क्यों ना हो। तानपुरा गायक को वे अवकाश देता है जो उसकी लय को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी होते हैं। वो गैप्स को,अंतरालों को भरता है। वो बिना लाइमलाइट में आए महत्वपूर्ण काम करता है। दरअसल हरजीत देहरादून के साहित्यिक जमात के संगीत का तानपुरा है।

हरजीत की कहानी आपको विस्मित भी करती है और करुणा से भर देती है। पेशे से  बढ़ईगिरी करने वाला ये शायर बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। अभावों के बीच भी वो उम्दा शेर कहता,खूबसूरत कैलीग्राफी करता, बेहतरीन कोलाज बनाता,कमाल की फोटोग्राफी करता। वो शास्त्रीय संगीता का दीवाना था और फक्कड़ यायावर। जितना अधिक भटकाव उसके स्वभाव में था, उसकी शायरी उतनी ही सधी हुई थी।


हम जानते हैं भारतीय किस कदर उत्सवधर्मी होते हैं। अभावों से उपजा दुख इस कदर उनकी रगों में बहता है कि वे दुखों को भी सेलिब्रेट करने लग जाते हैं। क्या वजह है कि उजली पूर्णिमा के साथ अंधेरी अमावस्या का भी उसी उत्साह से उत्सव मनाते हैं। हरजीत भी ऐसा ही था। दुनियादारी के पेचोखम से नावाफ़िक वो अपने अभावों का सुखों की तरह ही उत्सव मनाता। टूटी छत से चिड़िया को घर के अंदर आते देख वो कहता है-


"आई चिड़िया तो मैंने जाना/

मेरे कमरे में आसमान भी था"। 


इससे ज़्यादा आशा और उम्मीदों से भरा हरजीत के अलावा कौन हो सकता था।

उसके भीतर एक बच्चे सा साफ शफ्फाक मन वास करता। तभी तो वो कठोर काष्ठ को सजीव खिलौनों का रूप दे देता। वो कहता-


"गेंद, गोली,गुलेल के दिन थे/

दिन अगर थे तो खेल के दिन थे"।


वो प्रेम से भरा रहता। जब वो प्रेम से उमगता तो कहता- 


"हम तुझे इतना प्यार करते हैं/

हम तेरी फ़िक्र ही नहीं करते"


उसे साथ पसंद था। दोस्ती पसंद थी। जिसको उसकी दोस्ती नसीब हुई वो कितने खुशकिस्मत थे। वो एक जगह लिखता है-


"आप हमसे मिलें तो ज़मी पर मिलें

ये तकल्लुफ़ की दुनिया मचानों की है"


एक ऐसा ही दोस्त है नवीन कुमार नैथानी। वो युग्म में एक तीसरा आयाम जोड़ता है। वो अवधेश और हरजीत के साथ मिलकर दोस्ती की त्रयी बनाता है। कभी उससे मिलिए और हरजीत का ज़िक्र भर कर दीजिए। उसकी आंखों में हर्ष और विषाद एक साथ उतर आते हैं। वो किस्सों पर किस्से कहे जाता है। वो बताता है हरजीत विचारधाराओं के पचड़े में कभी नहीं पड़ा। एक बार जब उसकी ग़ज़लों को वाम सिद्ध किया जाने लगा तो उसने अपनी वही रचनाएं धर्मयुग में छपवाकर उसका प्रतिवाद किया। 

अगर हरजीत की दोस्ती के चलते उसके दोस्त खुशनसीब थे तो हरजीत भी कम खुशनसीब कहां था। उसे ऐसे दोस्त मिले जो उसके जाने के बाद भी उसे हमेशा दिल में बसाए हैं। उनकी एक दोस्त हैं तेजी ग्रोवर। उन्होंने हरजीत के सारे दोस्तों को,उसके चाहने वालों को एकत्रित किया। फिर उन सबसे हरजीत की यादों को, उसके लिखे को बटोर कर एक किताब की शक्ल दे दी।  नाम है 'मुझसे फिर मिल'।

दरअसल ये हरजीत को उसके चाहने वालों से,नए पाठकों से और दुनिया जहान से मिलवाने का सच्चा सा उपक्रम है। उसकी यादों को जिलाए रखने का एक बेहद संजीदा प्रयास है।

इसमें हरजीत के दो पूर्व प्रकाशित संग्रह 'ये पेड़ हरे हैं' और 'एक पुल' के अलावा एक अप्रकाशित संग्रह 'खेल' और तमाम अप्रकाशित गज़लें शामिल की गई। इसके अलावा उनके कई दोस्तों व अन्य लोगों के हरजीत के बारे आत्मीय उद्गार हैं और दो आलेख भी। 

इनमें से एक शानदार संस्मरणात्मक आलेख सुप्रसिद्द चित्रकार लेखक जगजीत निशात का है 'हरजीत और उसका 'हरजीत' बनना'। इसमें निशात हरजीत को हरजीत बनाने के प्रक्रिया की पड़ताल ही नहीं करते बल्कि देहरादून के उसके समकालीन सांस्कृतिक माहौल को भी बखूबी उद्घाटित करते चलते हैं। 

एक और संस्मरणात्मक आलेख ज्ञान प्रकाश विवेक का है। ये आलेख बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। वे लिखते हैं- 'हरजीत से मिलना किसी बहुत अच्छे मौसम से मिलने जैसा था.वह खुद किसी पेड़ जैसा था-किसी दरख़्त जैसा..... एक ऐसा दरख़्त,जिसके पत्तों पर आसमान आराम कर रहा हो,जिसकी शाखों में ज़िंदगी के संघर्ष  जुड़े हों और जड़ों में कई जोड़ी पांव हों जो उसमें आवारगी और घुमक्कड़ी का अहसास पैदा करते हों.... उसमें बेचैनियों की खुशबू थी,जज़्बात की तरलता थी। उसे अपने सबसे विकट समय में भी मुस्कुराते देखना चकित करता था"। 

वो अपने समय का बेहतरीन ग़ज़लकार था जो बेहद संवेदनशील और संवेगों से भरा था और ग़ज़ल के क्षेत्र में नया मुहावरा गढ़ रहा था। ज्ञान प्रकाश आगे लिखते हैं "हिंदी ग़ज़ल  के कूड़े में अपनी अलग पहचान कराने वाला संवेदनशील,मैच्योर और समझदार ग़ज़लकार था।"

हरजीत का प्रकृति से अद्भुत जुड़ाव था। उसके पहले ही संग्रह का नाम 'ये हरे पेड़ हैं' है। वो लिखता है-


"कश्तियाँ डूब भी जाएं तो मरने वालों में

होश जब तक रहे साहिल का गुमाँ रहता है

ये हरे पेड़ हैं इनको ना जलाओ लोगों

इनके जलाने से बहुत रोज़ धुंआ रहता है"


एक जगह वो लिखता है-


"हरी ज़मीन पे तूने इमारतें बो दी

मिलेगी ताज़ा हवा पत्थरों में कहाँ"


या फिर


"ज़िंदा चेहरे भी बदल जाते हैं तस्वीरों में

पेड़ मरते हैं तो ढल जाते हैं शहतीरों में"


और फिर ऐसे हरे पेड़ के शैदाई को प्रकाशन संस्थान  संभावना प्रकाशन की इससे खूबसूरत श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि इस किताब को छापने में उसने पेड़ों को नष्ट नहीं किया। किताब को गन्ने की खोई से बने कागज़ पर छापा।

अब देहरादून में महसूस होने वाला सबसे बड़ा मलाल और कमी उस महबूब शायर से ना मिल पाना है। लेकिन आप उसे यहां महसूस कर सकते हैं। यहां के साहित्यिक माहौल में वो एक अहसास सा उपस्थित रहता है।

 और ये भी कि मेरे तईं देहरादून की तमाम पहचानों में एक बड़ी पहचान हरजीत भी है। उसको जानने के बाद जब भी देहरादून जाएंगे उसकी याद तो आएगी ही और होठों बरबस गुनगुना उठेंगे कि-


"ढूंढते फिरते हैं हम उस शख़्स का पता

जिससे हों इस शहर के माहौल की बातें बहुत।"


और

और हरजीत आपके कानों में आकर चुपके से कहेगा -


"सोचता हूँ कहां गए वो दोनों

मेरी साइकिल वो मेरा देहरादून"




Friday, 17 February 2023

अलविदा बलरामन



ये एक युग का अवसान है। एक सितारे का दुनिया की नज़रों से ओझल हो जाना है। भारतीय फुटबॉल की शानदार परंपरा का थोड़ा और छीज जाना है। उसके गौरव का कालातीत हो जाना है। ये भारतीय फुटबॉल की सुप्रसिद्ध त्रयी की आखिरी मूर्ति का ढह जाना है। भारतीय फुटबॉल के एक सबसे शानदार खिलाड़ी तुलसी बलरामन ने 86 वर्ष की उम्र में इस संसार को अलविदा जो कह दिया है। दरअसल ये एक त्रासद मायूस और अपमानित जीवन का अंत भी है।


बीती शताब्दी के 50 और 60 के दो दशकों का समय भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम युग था। और पीके बनर्जी,चुन्नी गोस्वामी और तुलसी बलरामन उस समय के सबसे चमकते सितारे थे जिन्होंने अपनी प्रतिभा से भारतीय फुटबॉल को उसके चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया था। वे भारतीय फुटबॉल की एक त्रयी बनाते हैं। वे भारतीय फुटबॉल के ब्रह्मा विष्णु महेश ठहरते थे।


पिछले तीन सालों में भारतीय फुटबॉल के इन तीन सर्वश्रेष्ठ फरवार्डों ने, तीन दोस्तों ने, भारतीय फुटबॉल के तीन 'मोशाय बाबुओं' ने एक एक करके इस दुनिया को अलविदा कह दिया। सबसे पहले 20 मार्च 2020 को पीके दा गए। फिर उसी साल 30 अप्रैल को चुन्नी गोस्वामी गए। और अब 16 फरवरी 2023 को तुलसी बलरामन। इन तीनों ही ने भारतीय फुटबॉल के मक्का कोलकाता को अपनी कर्मभूमि बनाया और यहीं से इस नश्वर संसार से विदा ली। बलराम भले ही जन्मना बंगाली ना हो,उन्होंने जन्म हैदराबाद राज्य के सिकंदराबाद के एक गांव में लिया हो, लेकिन उन्होंने ज़िंदगी भर कोलकाता में खेला और उसके ही एक उपनगर उत्तरपाड़ा को रिहाइश के लिए चुना।


नियति किस तरह से जीवन को त्रासद बना सकती है और उसे अंतर्विरोधों से भर सकती है,ये जानना हो तो एक बार बलराम के जीवन को ज़रूर देखना चाहिए। पीके और चुन्नी की तरह ही उन्होंने शानदार फुटबॉल खेली,उसे समृद्ध किया और नाम कमाया,लेकिन उन्हें कभी भी अपना दाय नहीं मिला। वे कभी भी उस तरह की प्रसिद्धि नहीं पा सके ,उस तरह का सम्मान नहीं पा सके जिस तरह का उनके दोनों साथियों को मिला। विशेष रूप से खेल से सन्यास लेने के बाद। उनकी हमेशा उपेक्षा हुई। अपमान हुआ।

उन्हें अर्जुन पुरस्कार के अलावा कोई पुरस्कार नहीं मिला। उनके दोनों साथियों को पद्मश्री मिला। उन्हें नहीं। एक बार इसके लिए बहुत सारी औपचारिकताएं भी पूरी कर ली गईं पर एन समय पर उन्हें उससे वंचित कर दिया गया। ये बिल्कुल वैसे ही था जैसे किसी के मुँह में जाते कौर को छीन लिया जाए। ऐसे ही उन्हें एक बार चयनकर्ता बनाया गया, लेकिन टीम बिना उनकी जानकारी के चुन ली जाती। ऐसे अपमान के अनेक उदाहरण हैं जब भारतीय फुटबाल प्रशासन ने उनकी उपेक्षा की एआ अपमान किया।


वे 'फुटबॉलिङ्ग सेंस' और प्रतिभा के धनी थे लेकिन जन्म से बहुत गरीब थे। जब 18 साल की उम्र में उन्हें एक स्थानीय प्रतियोगिता में खेलते देख लीजेंड कोच सैय्यद अब्दुल रहीम ने उनकी प्रतिभा पहचान उन्हें संतोष ट्रॉफी के लिए ट्रायल के लिए आमंत्रित किया तो उनके पास अपने घर बोलाराम से हैदराबाद आने के लिए पैसे नहीं थे। बाद में खुद रहीम साब ने उन्हें पैसे दिए।


ये बात 1956 की है। उनका संतोष ट्रॉफी के लिए हैदराबाद की टीम में चयन हो गया। उस साल ये प्रतियोगिता एर्नाकुलम में सम्पन्न हुई थी और फाइनल मैच हैदराबाद और बॉम्बे के बीच खेला गया। मैच अनिर्णीत रहा तो दुबारा खेला गया। इस मैच में बलराम ने शानदार खेल दिखाया। ये भारतीय फुटबॉल के नए सितारे का उदय था। उस मैच में वे आउटसाइड लेफ्ट की जगह इनसाइड राइट की पोजीशन पर खेल और 4-1 की हैदराबाद की जीत में दो गाल किए। 


उसी साल उनका चयन भारतीय टीम में हो गया। उन्होंने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मैच 1956 में मेलबोर्न ओलंपिक में यूगोस्लाविया के खिलाफ खेला और अगले 6 सालों तक भारतीय फुटबॉल टीम के अनिवार्य और महत्वपूर्ण खिलाड़ी बने रहे। 1956 से 1962 का ये समय भारतीय फुटबॉल का स्वर्णकाल माना जाता है। इस दौरान वे 1956 के मेलबोर्न और 1960 के रोम ओलंपिक,1958 के  एशियन खेल और 1962 के जकार्ता एशियन खेल में स्वर्ण पदक विजेता टीम और 1959 में मर्देका प्रतियोगिता की उपविजेता टीम के सदस्य रहे।


उन्होंने भारत के लिए 26 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले और कुल आठ गोल किए। लेकिन ये आंकड़े उनकी प्रतिभा की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं करते। वे बिला शक भारत के सार्वकालिक महानतम खिलाड़ियों में एक थे। ये वो समय था जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टोटल फुटबॉल आकार ले रही थी और क्रुयफ़ की अगुवाई में हॉलैंड की फुटबॉल टीम को इसका सर्वश्रेष्ठ निदर्शन करना था। उस समय बलराम टोटल फुटबॉल खेल रहे थे जो लेफ्ट विंग, राइट विंग, सेंटर या अटैकिंग मिडफील्डर किसी भी पोजिशन पर खेल सकते थे। उनका बॉल पर गज़ब का नियंत्रण होता था और  वे शानदार ड्रिबलिंग करते और इतनी गति से करते कि किसी भी विपक्षी टीम के लिए उन्हें रोकना मुश्किल होता। वे शानदार पासिंग करते। खिलाड़ियों की पोजीशन का वे सटीक अंदाज़ लगा लेते। उनकी शानदार पासिंग के लिए एक बार सुप्रसिद्ध फुटबॉलर अरुण घोष ने कहा था कि 'उनकी पीठ पर भी दो आंखें हैं।' जबकि उनकी विपक्षी खिलाड़ी से गेंद पुनः छीन लेने और तीव्र गति से काउंटर अटैक की उनकी काबिलयत के कारण दूसरे सुप्रसिद्ध फुटबॉलर सुभाष भौमिक उन्हें फ्रांस के हेनरी थियरी के समकक्ष रखते हैं।


अगर आपको उनकी गति और ब्रिलियंस देखनी है तो 1960 के रोम ओलंपिक के हंगरी के खिलाफ मैच की रिकॉर्डिंग देखिए। हंगरी ने ग्रुप में फ्रांस को 6-1 और पेरू की टीम 7-2 से हराया था। लेकिन भारतीय टीम को बमुश्किल 2 -1 से हरा पाई। इसमें बलराम ने अद्भुत खेल दिखाया और गेंद पर अद्भुत नियंत्रण और गज़ब की गति भी। उन्होंने 79वें मिनट में भारत के लिए गोल किया। वे इतना शानदार खेल और इतनी गति से खेल रहे थे कि हंगरी के लिए उनको रोक पाना बहुत कठिन हो रहा था और वे बार बार फिजिकल हो रहे थे। उनका एक और अविस्मरणीय मैच 1958 के एशियन खेलों में हांगकांग के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मैच है। ये मैच रेगुलर समय तक 2-2 की बराबरी पर था जिसे भारत ने अतिरिक्त समय 5-2 से जीता। अतिरिक्त समय में बलराम ने चोट के बावजूद एक गोल किया और दो असिस्ट की।


उन्होंने क्लब कॅरियर की शुरुआत 16 साल की उम्र में 1954  में  हैदराबाद की आर्मी कॉम्बैट फ़ोर्स की टीम से की। 1957 में वे कोलकाता की ईस्ट बंगाल टीम में आ गए। शीघ्र ही अपने खेल और क्लब के प्रति अपनी लॉयल्टी के कारण उसके समर्थकों में ना केवल अत्यधिक लोकप्रिय हो गए बल्कि देवता की तरह पूजे जाने लगे। वे इतने लोकप्रिय थे कि जब एक बार मोहन बागान ने अपने क्लब में शामिल करने का प्रयास किया तो हज़ारों क्लब समर्थकों ने प्रदर्शन किया और मोहन बागान के प्रयास को निष्फल कर दिया। ईस्ट बंगाल के लिए उन्होंने 1957 और 1960 में डीसीएम ट्रॉफी, 1958 में आईएफए शील्ड ट्रॉफी, 1960 में डुरंड कप,1962 में रोवर्स कप जीता। 1961 में क्लब के कप्तान बने और उस साल न केवल नौ वर्ष के अन्तराल के बाद ईस्ट बंगाल को कलकत्ता लीग जितायी बल्कि आईएफए शील्ड जिताकर डबल भी पूरा किया। लीग के फाइनल में बागान के सुप्रसिद्ध डिफेंडर जरनैल सिंह को छका कर एक अविष्मरणीय गोल किया। जरनैल सिंह उन्हें सबसे खतरनाक फारवर्ड मानते थे। उन्होंने ईस्ट बंगाल क्लब के लिए कुल 104 गोल किये और 1961 में गोल्डन बूट खिताब से उन्हें नवाजा गया।


 1963 में  आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से ईस्ट बेंगाल छोड़कर बीएनआर(बेंगाल नागपुर रेलवे) टीम में आ गए। लेकिन सांस की बीमारी के कारण उन्हें शीघ्र ही खेल को छोड़ना पड़ा।

निसंदेह वे एक शानदार खिलाड़ी थे जिन्होंने भारतीय फुटबॉल को उनके मुकाम तक पहुंचाने में अपना प्रतिभाग किया। लेकिन दुर्भाग्य है कि हम अपने सच्चे महानायकों का सम्मान करना नहीं जानते। हम ना तो उनके जीते जी सम्मान कर पाते हैं और ना ही मरने के बाद ही। तुलसी बलरामन एक उदाहरण भर हैं।


और इसीलिए एक ऐसा ख़िलाड़ी जिसने बहुत उत्साह से शानदार फुटबॉल खेली, खेल को ऊंचाइयों पर पहुंचाया, उसके जीवन की समाप्ति एक बहुत ही निराश,एकाकी,अभावग्रस्त और गुस्से से भरे व्यक्ति के रूप में हुई।

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अलविदा लीजेंड। अलविदा बलराम ।

Friday, 30 December 2022

अलविदा 'द ओ री दो फ़ुतबाल'


  


अलविदा 'द ओ री दो फ़ुतबाल
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जिस व्यक्ति के बारे में हम कह सुन रहे हैं,इतना लिख पढ़ रहे हैं,दरअसल पहले जान तो लें वो है क्या!

पेले के समकालीन और दुनिया के महानतम फुटबॉलरों में शुमार हॉलैंड के जोहान क्रुयफ़ ने एक बार कहा था 'पेले एकमात्र ऐसे फुटबॉलर हैं जो तर्क की सारी सीमाओं को पार कर गए हैं।'

तर्क की सीमा के पार मनुष्य होते हैं क्या! नहीं ना! तो क्या वे फुटबॉल के ईश्वर थे? शायद हाँ!

तभी तो एक दूसरे महानतम फुटबॉलर हंगरी के फ्रेंक पुस्कास ने कहा था ' इतिहास का महानतम खिलाड़ी डी स्टिफानो था। मैं पेले को खिलाड़ी मानने से इनकार करता हूँ। वो इन सबसे ऊपर है।' 

एक खिलाड़ी से ऊपर आखिर कौन हो सकता है! एक ईश्वर ही ना! यानी पेले एक ईश्वर ही थे ? 

1970 के विश्व कप फाइनल में ब्राज़ील ने इटली को 4-1 से हराया था। उस मैच में उन्हें मार्क कर रहे महान इतावली डिफेंडर तार्सीसिओ बर्गनिच कह रहे थे 'मैच से पहले मैंने स्वयं को समझाया आखिर है तो वो भी(पेले) औरों जैसा हाड़ मांस का बना व्यक्ति ही। पर मैं गलत था।'

यानी वो एक इंसान भी नहीं था। स्वाभाविक है ईश्वर ही होगा!

हां याद आया दो बार खुद पेले ने भी कुछ ऐसा ही कहा था। 1970 के विश्व कप के दौरान मेनचेस्टर यूनाइटेड के डिफेंडर पैडी क्रेरंद ने एक टीवी शो में पेले से पूछा कि 'पेले के हिज्जे (spelling)क्या हैं।' पेले ने कहा 'बहुत ही आसान। जी ओ डी(G O D)।' एक अन्य बार ये पूछे जाने पर कि क्या उनकी शोहरत ईसा जितनी ही है,उन्होंने कहा था कि 'दुनिया के कुछ हिस्सों में ईसा को उतनी अच्छी तरह से नहीं जाना जाता है।'

तो तय हुआ कि अगर वे तर्कातीत थे,एक खिलाड़ी से कहीं अधिक थे और हाड़ मास के इंसान भी नहीं थे,तो ईश्वर ही होंगे।

 आज तक मैं भी उसे देव तुल्य ही जानता समझता था। मेरे तईं फुटबॉल का कुल इतिहास दो देवताओं का इतिहास था। जो पेले से शुरू होकर मैस्सी पर खत्म हो जाता है। मुझे उन दोनों के बीच माराडोना ही एक ऐसा इंसान नज़र आता था जो उन देवताओं के सामने ताल ठोंकता,उन्हें चुनौती देता नज़र आता था।

लेकिन आज जब एडसन अरांतेस दो नेसीमेंतो नाम के शरीर ने पेले नाम की आत्मा को बेघर कर दिया है,तो कुछ अलग ही अहसास हुआ जाता है। दृष्टि है कि साफ हुई जाती है। मन का भ्रम है कि छंटा जाता है। मन  में बनी एक मूर्ति है जो टूट टूट जाती है। और?

और एक ईश्वर है कि जिसकी मौत हुई जाती है।

अब पेले नाम के किसी ईश्वर को मैं नहीं जानता। पेले हाड़ मांस का बना हम और आप जैसा ही एक व्यक्ति था,एक ऐसा व्यक्ति जिसकी मृत्यु भी होती है,जो खिलाड़ी था और जो फुटबॉल खेलता था। ऐसी फुटबॉल खेलता जैसी कोई दूसरा ना खेल पाता। एक ऐसा फुटबॉलर जैसा कोई दूसरा ना था। ठीक वैसा ही जैसे एक बीथोवन था,एक बाख था और  माईकेल एंजेलो। और ये सब ईश्वर की अनुपम देन ना थीं, तो क्या थीं।

दरअसल ये इंसान की फितरत है कि वो इंसानी सीमाओं को पहचानता ही नहीं।  वो नहीं जानता इंसान की क्षमताएं क्या और कितनी हैं। एक इंसान के वे कार्य जो उसके लिए जब तर्क से परे हो जाते हैं,तो उसमें देवत्व को आरोपित कर देता है।

लेकिन इंसान की तर्कातीत उपलब्धियों में देवत्व का आरोपण मनुष्यता का और खुद मनुष्य का अपमान है। ये मनुष्य की उपलब्धियों को छोटा कर देना है। मनुष्य को रिड्यूस कर देना है। शायद पेले को देवता कहना, ईश्वर  बनाना उसकी असाधारण क्षमताओं को रिड्यूस कर देना है। 

पेले हाड़ मांस का बना एक खूबसूरत इंसान था, और है और रहेगा। वो एक ऐसा इंसान था जो मानवीय गरिमा से ओतप्रोत था और जिसका चेहरा मानवीय करुणा दीप्त होता था।

वो हाड़ मांस का बना एक ऐसा खिलाड़ी था जिसने 17 साल की उम्र में पहला विश्व कप जीत लिया था। जिसने एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन विश्व  विश्व कप जीते थे। जिसने एक,दो या सौ, दो सौ नहीं बल्कि कुल 1283 गोल किए थे। एक ऐसा खिलाड़ी, फुटबॉल का ऐसा जादूगर था जिसके पैरों का जादू देखने भर को नाइजीरिया के सिविल वार में लड़ते दो पक्ष 48 घंटों का युद्ध विराम कर दिया था। ऐसा खिलाड़ी था जिसने खेल कौशल को उस सीमा तक पहुँचा दिया था वो तर्कातीत हो जाती थी।

उसने एक ऐसी  असाधारण उपलब्धि धारण की थी कि सिर्फ 29 साल की उम्र में 1000वां गोल कर सका और उसकी  इस उपलब्धि को चांद पर जाकर सेलिब्रेट किया गया। आखिर क्या ही संयोग विधि द्वारा गढ़े जाते हैं कि ऐन 19 नवंबर 1969 के दिन जब वो वास्को डी गामा के विरुद्ध सांतोस के लिए खेलते हुए  पेले अपना हजारवाँ गोल कर रहा था,तो मनुष्य अपोलो यान से चांद पर पहुंच कर इस क्षण को सेलिब्रेट करता है। ऐसा सम्मान और किसे मिल सकता था। आखिर कौन इसके काबिल हो सकता था।

वो क्या ही अद्भुत दृश्य रहा होगा जब उसने अपना हजारवाँ गोल किया तो कितने ही मिनटों तक खेल रोक दिया गया था और सांतोस और वास्को डी गामा,पक्ष और विपक्ष दोनों ही दलों के खिलाड़ी उस को अपने कांधे बिठाकर परेड कर रहे थे।

कितना खूबसूरत वो खिलाड़ी रहा होगा और कितना खूबसूरत उसका मन कि वो अपने एक हजारवें गोल का जश्न मनाने के बजाए ब्राजील के हज़ारों गरीब बच्चों और उनके भविष्य की चिंता कर रहा था। आखिरकार मदर टेरेसा की तरह दुनिया भर की करुणा से भीग रहे चेहरे को देखकर ही तो सन 1966 में पेले से मुलाकात करते हुए पोप पॉल ने कहा  होगा 'नर्वस मत होओ मेरे बेटे. मैं तुमसे ज्यादा नर्वस हूँ. बहुत लम्बे अरसे से ख़ुद तुम से मिलने का सपना देखता रहा हूँ।'

आखिर कितने खुशकिस्मत रहे होंगे वे लोग जिन्होंने उनके पैरों से होते 1283 गोल देखे होंगे। 91 हैट्रिक बनती देखी होंगी। कितने खूबसूरत रहे होंगे उनके बाइसिकल गोल। कितना खूबसूरत रहा होगा वो शॉट जब चेकोस्लोवाकिया के खिलाफ़ मध्य रेखा से लगभग गोल कर ही दिया था।

कैसा अनोखा और मूल्यवान  रहा होगा वो खिलाड़ी जिसको खो देने के भय से राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया गया हो।

ऐसी खूबसूरत फुटबॉल जिसमें अद्भुत ड्रिबलिंग हो,शक्ति,गति और नियंत्रण हो,लय हो,देवताओं को कहां रुचती है। ये तो हाड़ मांस से बने मानुस को शोभती है, हां पेले को रुचती है। 

1957 से 1974 के मध्य फुटबॉल के मैदान में एक खिलाड़ी द्वारा जो जादू बिखेरा गया, जो कीर्तिमान बने, वे देवताओं के बस की बात थोड़े ही ना थी। ये उन सीमाओं की बानगी भर है, जिन्हें एक मानव अपनी योग्यता से विस्तारित करता है,जिन्हें हम देख नहीं पाते,कल्पना नहीं कर पाते,हमें तर्कातीत लगने लगती हैं। दरअसल ये वो खूबसूरत नैरेटिव है जो ये बयान देता है कि मानव  क्या कुछ कर सकता है। उसकी क्षमताओं की क्या सीमाएं हैं।  पेले की कहानी एक ऐसी कहानी है,जो कहती है दुनिया में क्या संभव है और आदमी क्या कर सकता है। बाइडेन के शब्दों में पेले 'स्टोरी ऑफ व्हाट इस पॉसिबल' है।

आज अब जब पेले नहीं रहे तो कितने स्टेडियम उदास हो गए होंगे। कितने मैदान होंगे जो मन मसोसकर कर खेद जता रहे होंगे। कितने गोलपोस्ट होंगे जो गहन वेदना से गल रहे होंगे।कितनी फुटबॉल होंगी जो आंसू बहा रही होंगी। कितनी व्हिस्ल होंगी जो शोक गीत गा रही होंगी।

और हम में से ना जाने कितने लोग होंगे जिनके दिल जार जार करके रो रहे होंगे। ठीक ऐसे ही जैसे मेरा दिल रो रहा है। आज मन शिद्दत से चाह रहा है कि एक बार उसके शरीर से लिपटकर रो सकता। काश कि उसे एक बार अपनी आंखों से खेलते हुए देख पाता। काश एक पत्रकार के रूप में उससे एक     साक्षात्कार ले पाता। उससे उसके खेल के संबंध में ढेर सारे प्रश्न पूछ पाता। एक दोस्त  की तरह उसके गले मे हाथ डालकर सड़कों पर आवारागर्दी कर सकता। किसी नुक्कड़ की दुकान पर बैठकर चाय पी सकता। उसके साथ फुटबॉल खेल सकता। और फिर उसके उम्दा खेल पर ईर्ष्या करते हुए उससे कह पाता 'अबे तुझसे अच्छा खेलता हूँ मैं।'

और ये सब  इच्छाएं कोई देवता पूरी कहां पर पाते।एक इंसान ही पूरी कर पाता ना। 

और हां पेले कभी कहां मर सकता है। वो हमारे दिलों में,मैदानों में ,फुटबॉल खेल में और हमारी बातों में,किस्से कहानियों में हमेशा ज़िंदा रहेगा। 

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और ये भी कि सुप्रसिद्ध फुटबॉलर बॉबी चार्लटन से खूबसूरत बात और कौन कह सकता है कि 'फुटबाल खेल का जन्म इसीलिए हुआ कि पेले खेल सके।'

अलविदा द पेले। द ओरी। द ब्लैक पर्ल।



नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...