Friday, 12 June 2026

जसपाल राणा:लक्ष्य जो नहीं उन्हें नहीं चुकना था

 



बहुत बार लिखे से बहुत बहुत ज्यादा गंभीर और महत्वपूर्ण बात छायाकार के कैमरे की आँख से पकड़ा गया कोई एक लम्हा या कोई एक फ्रेम बोल देता है। वे ऐसे अविस्मरणीय और यादगार लम्हे अपने कैमरे से कैद कर देते हैं कि वे आपके दिलोदिमाग पर हमेशा के लिए चस्पां हो जाते हैं। ऐसे लम्हे जिन्हें शब्दों में बांधा ही नहीं जा सकता। किसी भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता सिवाय छायाचित्र के।

आज जब हमारे समय के एक बहुत ही महत्वपूर्ण और जाने माने निशानेबाज जसपाल राणा ने इतनी कम उम्र में इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया तो उनके दो ऐसे ही अविस्मरणीय छायाचित्र लगातार आंखों के सामने घूम रहे हैं। ये दो चित्र उनके पूरे खेल जीवन को कहने के लिए पर्याप्त हैं।

एक


पहला छायाचित्र 2024 के पेरिस ओलंपिक का है। पेरिस में मनु भाकर निशानेबाजी में एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने की अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल करती हैं। ऐसा कारनामा करने वाली वे एकमात्र भारतीय एथलीट होती हैं। उसके बाद वे रेंज से वापस जा रही होती हैं। उनके साथ उनके कोच जसपाल राणा हैं। ये उसी समय का छायाचित्र है। जसपाल बहुत ही सजग और सीधे बैठे हैं और मनु आँखें बंद किये बेपरवाह सी उनके काँधे पर सर टिकाए हैं।

गुरु शिष्य संबंध को इससे बेहतर ढंग से और किसी भी तरह नहीं कहा जा सकता था या यूं कहें कि नहीं कहा जा सकता है। मानो अपने शिष्य की सारी जिम्मेदारी,सारा बोझ गुरु अपने कांधे उठाए है। उधर मनु भाकर का चेहरा निश्चिंतता और खुशी दमक रहा है। उनको अपने गुरु पर इस कदर विश्वास है कि गुरु का कांधा उसे हर फ़िक्र और हर चिंता से मुक्त कर देता है। इतना ही नहीं गुरु अपना कांधा प्रस्तुत कर इतना स्पेस भी देता है कि अभी अभी जो अविस्मरणीय उपलब्धि उसने हासिल की है,उसे अपनी बंद आंखों से फिर फिर जी ले। बंद आंखों से उस उपलब्धि को जी लेने का अनिर्वचनीय सुख उनके चेहरे से छलका छलका जाता है। 

 गुरु शिष्या का ये संबंध इकहरा नहीं है। बल्कि द्वंदात्मक है। वहाँ केवल समर्पण,लगाव और प्रतिबद्धता भर नहीं है, बल्कि मत विभिन्नता,मन मुटाव और अलगाव भी है।  टोक्यो ओलंपिक से पहले जसपाल राणा को जूनियर टीम का हाई परफॉर्मेंस प्रशिक्षक नियुक्त किया जाता है और मनु भाकर भी उनकी प्रशिक्षु होती हैं। लेकिन दिल्ली में आयोजित विश्व निशानेबाजी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले इवेंट्स को लेकर मनमुटाव होता है। उनके रास्ते अलग अलग हो जाते हैं। ये मनमुटाव टोक्यो ओलंपिक के दौरान चरम पर पहुंच जाता है जब मनु भाकर की राइफल इवेंट के बीच में खराब हो जाती है और उन्हें इवेंट बीच में ही छोड़ना पड़ता है।

लेकिन दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। गुरु शिष्या की प्रतिभा को पहचानता है और शिष्या गुरु की महिमा को। मनु को अपनी गलती का अहसास होता है। वो फिर फिर जसपाल के पास लौटती है और प्रशिक्षण शुरू करती है। नतीजा दुनिया के सामने होता है।

दरअसल ये कहानी ये बताती है कि वे आला दर्जे के प्रशिक्षक थे। अहंकार उन्हें छू नहीं गया था। वे अपने प्रशिक्षु की प्रतिभा को ना केवल पहचानते थे, बल्कि उसे तराशना भी जानते थे। उन्होंने मनु भाकर को स्वीकार कर उन्हें ऊँचाइयों तक पहुंचाया। जब उन्हें जूनियर टीम का प्रशिक्षक बनाया गया तो उन्होंने बड़ी संख्या में निशानेबाजों की प्रतिभा को निखारा  जिन्होंने आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपूर्व उपलब्धियां हासिल की। इनमें मनु भाकर के अलावा सौरव चौधरी,अनीश भानवाला पिंकी यादव जैसे नाम शामिल हैं। 

उनके असामयिक निधन से बड़ी संख्या में होनहार प्रशिक्षुओं को एक बहुत ही योग्य प्रशिक्षक की कमी हमेश सालती रहेगी।

दो

ये 2006 के दोहा एशियाई खेलों का है। इस प्रतियोगिता में उन्होंने तीन सोने के और एक चांदी का तमगा जीता था। ये प्रदर्शन उन्होंने उस समय किया था जब अन्य भारतीय निशानेबाज बहुत अच्छ प्रदर्शन नहीं कर रहे थे और वे खुद बीमार थे। वे सेंटर-फायर पिस्टल स्पर्धा में विश्व रिकॉर्ड बनाने के कगार पर थे, लेकिन जसपाल अपने आखिरी दो निशानों पर केवल 9 अंक ही हासिल कर पाए और विश्व रिकॉर्ड बनाने से चूक गए लेकिन सोना तो जीता ही। इस उपलब्धि के बाद वे किसी बच्चे की तरह फूट फूट कर रोये। उस समय उनके चेहरे पर बाल सुलभ भोलापन था। उन आँसुओं के पीछे छिपी आत्म संतुष्टि और खागी को सहज ही महसूस किया जा सकता था। उनके आंख से छलके आंसू कह रहे थे कि भावनाओं के अतिरेक से धैर्य का बांध टूट ही जाता है,फिर चाहे दुख हो सुख।

उन्होंने एक शूटर के रूप में असाधारण उपलब्धियां हासिल की। उनकी मुख्य स्पर्धा 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल थी। उन्होंने 1994 से 2006 तक कुल 15 पदक जीते हैं, जिनमें 9 स्वर्ण पदक, 4 रजत पदक और 2 कांस्य पदक शामिल हैं। उनका सबसे सफल प्रदर्शन 2002 में मैनचेस्टर में रहा, जहां उन्होंने छह पदक जीते थे। जसपाल के नाम भारत के सबसे अधिक पदक जीतने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के एथलीट के रूप में रिकॉर्ड है, उन्होंने चार संस्करणों में कुल 15 पदक जीते हैं, जिनमें नौ स्वर्ण, चार रजत और दो कांस्य पदक शामिल हैं। 1994 में मिलान में जूनियर विश्व चैंपियनशिप के दौरान जसपाल के घुटने पर दर्दनाक फोडा निकल आया था, जिससे उनके लिए खड़े होना भी असहनीय हो गया था। फिर भी उन्होंने अविस्मरणीय प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता और जूनियर विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की।

निसंदेह वे भारत के सबसे सफल और बड़े निशानेबाजों में थे। लेकिन उनकी उपलब्धियों का महत्व पदकों की संख्या में उतना नहीं जितना इस बात में है कि एक महंगे खेल को जिसमें अब तक धनवानों और राजघरानों का प्रभुत्व था,साधारण और आम व्यक्ति के लिए उपलब्ध कराया। 

तीन

वे हमेशा खिलाड़ियों के पक्ष और उनके हितों के लिए खड़े रहे। 2017 में इंपोर्टेड  शूटिंग उपकरणों पर  जीएसटी लागू होने पर वे उसके सबसे मुखर आलोचकों में से एक थे। उनका मानना था कि इन पर भारी कर लगाने से शूटिंग युवा खिलाड़ियों के लिए बेहद महंगी हो जाएगी और उभरती प्रतिभाओं को नुकसान होगा।

चार

एक प्रशिक्षक, एक निशानेबाज और खेल वो खिलाड़ियों के प्रवक्ता के रूप में उनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनकी कमी हर क्षेत्र में खलेगी। ये उम्र उनके जाने की कतई नहीं थी। लेकिन होनी को कोई टाल नहीं सकता।

उनका असामयिक निधन भारतीय खेल और विशेष रूप से शूटिंग में एक बड़ा निर्वात बनाता है।

उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

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