Monday, 8 June 2026

साशा का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब

 


रात चाहे जितनी स्याह हो उसे सुबह की रोशनी में विलीन हो जाना है। शिशिर की असीम निस्सारता को बसंत की खिलखिलाहट में तब्दील हो जाना है। निराशा के बादल चाहे जितने घने हों उम्मीद की किरनों का उन बादलों को भेद ही देना है। राह लंबी हो सकती है,लेकिन धैर्य ना छूटे तो अंततः मुकाम हासिल हो ही जाना है। कल फिलिप कार्टियर की सुर्ख लाल सतह पर फ्रेंच ओपन के फाइनल में जर्मनी के एलेक्जेंडर साशा ज्वेरेव की इटली के फ्लाविया कोबोल पर 6-1, 4-6, 6-4, 6-7(4-6), 6-1 से संघर्षपूर्ण जीत कुछ ऐसी ही कहानी कहती है। साशा का ये पहला ग्रैंड स्लैम खिताब था।

साशा का फ्रेंच ओपन का ये ल खिताब दरअसल उनकी उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच की आवाजाही की कहानी है। उनके हार ना मानने के जज़्बे की कहानी है। चोटों से जूझते हुए उनके लगातार संघर्ष करने और कठोर परिश्रम की कहानी है। ये शिखर से एक साँस भर की दूरी से बार बार उनकी फिसलन की कहानी भी है। ये खिताब उनके 29 बसंत लंबे इंतजार की कहानी है। 

एक खिताब जो 555 जीत के बाद आया। चार ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने के बाद आया। दस साल के लंबे कॅरियर के बाद आया।

दरअसल ये नियति की गति की कहानी है।

इस बार के फ्रेंच ओपन के बीते एक पखवाड़े के समय ने रोला गैरों के फ़लक पर साफ़ साफ इबारत लिखी कि इस बार का पुरुष एकल का ये खिताब नियति ने साशा के लिए,उसके धैर्य के लिए और उसकी अनंत प्रतीक्षा के लिए पहले ही रिजर्व कर दिया है। वरना तो ये खिताब अलकाराज का ना हो जाता जो कलाई की चोट के चलते इस बार लाल मिट्टी पर खेलने से महरूम हो गए या यूं कहें कि नियति द्वारा कर दिए गए। इसके बाद भी साशा का कहां नंबर आता था। नंबर एक खिलाड़ी यानिक सिनर इसे ना जीत लेते और अपने ग्रैंड स्लैम खिताबों के संख्या अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी अलकराज के बराबर पहुंचा देते। लेकिन वे दूसरे दौर में अप्रत्याशित रूप से हार कर बाहर हो गए। साशा के रास्ते की एक और बाधा दूर हुई। लेकिन ठहरिए। अभी भी साशा का कहां नंबर आता है। नोवाक जोकोविच को क्यों भूले जा रहे हैं। वे अपने  25वें ग्रैंड स्लैम का शिद्दत से पीछा कर रहे थे और दो दौर में शानदार खेल दिखा कर अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर चुके थे। लेकिन नियति इस बार केवल और केवल साशा के पाले में थी। नोवाक तीसरे दौर में हारकर बाहर हो गए। अब जाकर साशा की चर्चा शुरू हुई। क्या साशा अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीत सकते हैं? साशा ने अपने खेल से दिखाया 'हाँ,क्यों नहीं'। 

याद कीजिए 2009 का फ्रेंच ओपन। इसमें पुरुष एकल खिताब  रोजर फेडरर ने जीता था। उन्होंने स्वीडन के रॉबिन सोडरिंग को हराया था। ये फेडरर का एकमात्र फ्रेंच ओपन खिताब था। दरअसल ये नियति ने तय किया था कि इस बार का खिताब रोजर फेडरर का ही होगा। इससे पहले राफेल नडाल बार बार उनके और फ्रेंच ओपन के बीच उपस्थित हो जाते। वे फेडरर को फाइनल में चार बार हरा चुके थे। फेडरर जानते थे कभी वो समय आयेगा जब फाइनल में नडाल उनके सामने नहीं होंगे। ये यही साल था। इस बार सोडरिंग ने अप्रत्याशित रूप से रफ़ाल को चौथे दौर में हराकर बाहर कर दिया। फेडरर जानते थे ईश्वरीय वरदान से कम नहीं। और उन्होंने ना केवल अपना पहला फ्रेंच ओपन जीता बल्कि करियर ग्रैंड स्लैम पूरा किया और साथ ही पीट संप्रास के 14 ग्रैंड स्लैम खिताब के रिकॉर्ड की बराबरी भी की।

इस बार साशा जानते थे कि ना तो नोवाक और ना ही अलकराज और सिनर उनके रास्ते में हैं। ये विधि का विधान रचा गया था। साशा ने चूक नहीं की।  उन्होंने हर उपाय किया। उन्होंने अपने खेल में काले रंग की ड्रेस पहनी हुई थी। आप उन्हें किसी लांग शॉट में देखेंगे तो लगेगा उनकी काले रंग की ड्रेस लाल रंग के मैदान पर काले टीके सरीखी है। एक ऐसा टीका जिसे दुनिया जहान की माएं अपने बच्चों के माथे उसे दुनिया की हर बुरी नज़र से बचाए रखने को लगाती है। क्या पता अपने हर दुर्भाग्य से बचने के लिए ही इस बार ज्वेरेव ने इस काली ड्रेस का टीका लगाना सुनिश्चित किया हो।

साशा को कोई भी चीज उतनी आसानी से नहीं मिलती। इस बार का फाइनल भी ऐसा ही था। मैच पांच सेट तक खिंचा। पूरा मैच ऊपर नीचे होता रहा। कभी साशा के पक्ष में,कभी कोबोली के पक्ष में। पहले ही गेम में साशा ने कोबोली की सर्विस ब्रेक की और आसानी से पहला सेट 6-1 से जीता। तब लगा साशा आसानी से जीतने जा रहे हैं। लेकिन साशा को कोई चीज आसानी से मिल जाए तो फिर साशा,साशा कहां रह जाते। अगला सेट कोबोली ने 6-4 से जीतकर मैच में जान फूंक दी। अब बारी साशा की थी तो उन्होंने बिल्कुल उसी अंतर यानी 6-4 से जीतकर 2-1 की बढ़त ले ली। लेकिन ये बढ़त साशा की जीत सुनिश्चित नहीं करती थी। याद कीजिए  2020 का यूएस ओपन का फाइनल। डोमिनिक थिएम के विरुद्ध भी साशा  ऐसे ही  2-1 की बढ़त बना चुके थे और अंततः हार गये थे। अब संघर्ष निर्णायक मोड पर आ रहा था। चौथे सेट में किसी ने भी अपनी सर्विस नहीं खोई और सेट टाई ब्रेक में गया और बाजी कोबोली ने मारी और सेट 7-6(6-4) से जीतकर स्कोर 2-2 की बराबरी पर ला खड़ा किया। लेकिन फाइनल सेट में अचानक साशा ने गियर बदला और कमाल का खेल दिखाया।

 दरअसल कोबोली ने चौथे सेट के बाद एक ब्रेक लिया। वे यूरिनल गए। ये पांच मिनट का ब्रेक था। इसमें साशा ने अपने को पुनर्संयोजित किया। वे जिस नर्वस क्रैंप का शिकार हो गए थे,उससे अपने शरीर को मुक्त किया और फिर क्या ही लाजवाब टेनिस खेली जिसका कोबोली के पास कोई जवाब नहीं था। उन्होंने ये सेट 6-1 से जीता,और और अपनी असाध्य इच्छा पूरी की।

ज्वेरेव और कोबोली के बीच का मुकाबला केवल दो दोस्तों या दो खिलाड़ियों के बीच का मुकाबला भर नहीं था। ये दो अलग अलग  कालखंड के बीच का मुकाबला भी था।  खेल की दुनिया में लगभग प्रौढ़ होती पीढ़ी का बिल्कुल नई युवा पीढी के बीच का मुकाबला था। ये अनुभव और युवा जोश के बीच मुकाबला था। साशा लगभग 10 साल से सर्किट में थे जबकि कोबोल ने अभी सफर शुरू ही किया था।  साशा के पास ग्रैंड स्लैम के कई फाइनल खेलने का अनुभव था और कोबोली का ये पहला पहला ही  फाइनल मुकाबला था। जहां कोबोली सेमीफाइनल में बिना खेले चार दिन के आराम के बाद कोर्ट पर आए थे, वहीं साशा एक संघर्षपूर्ण मुकाबला खेलकर फाइनल में थे। लेकिन दोनों के बीच समानता ये थी कि ये सर्किट के दो सबसे शानदार सर्विस करने वाले थे।

ये मुकाबला बहुत हद तक बेहतरीन सर्विस करने और  अपने ग्राउंड स्ट्रोक्स को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने का मुकाबला था। साशा इसमें बीस साबित हुए और  जीत ने उनका वरण किया। साशा ने 80 प्रतिशत अपनी पहली सर्विस सही की और उसमें से 73 प्रतिशत पर अंक अर्जित किए। जबकि कोबोली ने केवल 53 प्रतिशत पहली सर्विस सही की और केवल 68 प्रतिशत पर अंक हासिल किए। इसका नतीजा हुआ कि उन्हें गेम जीतने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ी और अधिक ऊर्जा खर्च की। उनकी सर्विस इतनी प्रभावशाली थी कि उनके केवल दो सर्विस गेम ड्यूस में गए। और ये भी कि साशा ने अपने स्ट्रोक्स को बेहतर ढंग से खेला और कोबोली के मुकाबले आधी बेज़ा गलतियां की। यही स्कोर का और हार जीत का अंतर है।

दरअसल पुरुष टेनिस में ज्वेरेव एक ऐसी पीढ़ी के प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं जो अपनी पूर्ववर्ती सीनियर खिलाड़ियों और परवर्ती युवा खिलाड़ियों के बीच सैंडविच बन गई और टेनिस इतिहास के दाय में अपना सही हिस्सा और स्थान नहीं बना पाई। जिन उपलब्धियों के वे हकदार थे,उनसे वे वंचित रह गए।  इस खिलाड़ियों में मुख्य हैं डेनिल मेदवेदेव,डोमिनिक थिएम, सिटसिपास और खुद अलेक्जेंडर ज्वेरेव। उनसे पहली पीढ़ी की फेडरर ,नडाल और जोकोविच की त्रयी इस कदर प्रतिभाशाली और डॉमिनेंट थी कि उनकी छाया से इस पीढ़ी को उबरने का मौका नहीं मिला। फेडरर नोवाक नडाल की त्रयी इतने लंबे समय तक मैदान में प्रभावी रही कि इन खिलाड़ियों को कोई मौका मिल पाता कि अलकाराज और सिनर जैसे प्रतिभाशाली युवा खिलाड़ियों की नई पीढ़ी मैदान में आ गई। हालांकि इन दो पीढ़ियों के बीच में इस बीच की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे दो खिलाड़ी ज्वेरेव और मेदवेदेव अभी भी डटे हैं और मजबूत चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं। 

एक खेल प्रेमी,दर्शक और प्रसंशक होने के नाते आपकी सहानुभूति और समर्थन हमेशा उस खिलाड़ी के लिए होता है जिसे जीत,खिताब और ट्रॉफी की अधिक आवश्यकता होती है। कोबोली और ज्वेरेव दोनों अपने पहले ग्रैंड स्लैम खिताब के लिए खेल रहे थे। ज्वेरेव के पास समय कम था। जो था भी वो तेजी से फिसल रहा था। इसीलिए ज्वेरेव के बड़े प्रसंशक ना होते हुए भी उनकी इस जीत से एक अलग किस्म की संतुष्टि और सुकून का अनुभव हो रहा है जो अगले कुछ समय तक मन मस्तिष्क पर तारी रहने वाला है।

फिलहाल तो साशा को लंबी प्रतीक्षा और कड़ी मेहनत से मिले इस पहले ग्रैंड स्लैम खिताब की बहुत बधाई।



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साशा का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब

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