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Tuesday, 29 September 2026

०समूचे पहाड़ मेरा दागिस्तान है०

 


इस फानी दुनिया को अलविदा कह देने के बाद भी व्यक्ति कहाँ पूरी तरह से इस दुनिया से विदा ले पाता है। कितना कुछ वो छूट जाता है। तमाम चीजों में। अपनी अनुपस्थिति में कितनी बार उपस्थित हो आता है। बार बार। मानो वो यहीं कहीं हो। सबसे ज्यादा स्मृति की तहों में लिपटा हुआ।

विजय एक ऐसे व्यक्ति हैं,जो जब-तब स्मृतियों के दरवाजे पर दस्तक देते रहते हैं। विजय यानी विजय कुमार गौड़। इस बार एक यात्रा संस्मरण के बहाने। यात्रा संस्मरण 'अपने वतन का नाम बताओ'।

विजय भाई को मैं देहरादून आने से पहले जानता था। फेसबुक के माध्यम से। वे उन लोगों में से एक थे जिनसे इलाहाबाद से देहरादून आने के बाद मिलना था। आने के बाद जल्द ही मुलाकात भी हो गई। ये साल था 2019। और फिर मिलने का ये सिलसिला अगले पांच सालों तक बदस्तूर चलता रहा। हर तीन चार महीने के अंतराल पर तो उनसे मुलाकात होती ही रही। 2024 के फरवरी में देहरादून छोड़ने तक। फिर एक दिन उनके ना रहने की खबर आई। जितना दुख उससे कहीं ज्यादा ये आश्चर्य की इतना जिंदादिल,घुम्मकड़,एक बहुत ही उत्साही ट्रैकर और स्वस्थ व्यक्ति के साथ ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन जिंदगी में दुख अक्सर अचानक  और अप्रत्याशित रूप में ही सामने आते हैं। 

आज जब उनका सद्य प्रकाशित यात्रा संस्मरण हाथ में आया तो स्मित मुस्कान लिए उनका चेहरा आंखों के सामने हो आया। उनकी आवाज कानों में घुलने लगी। मानो वे संस्मरण स्वयं बांच रहे हों। किताब को खोलकर सबसे पहले अनुक्रमणिका देखी तो एक अनजाने सुख का अनुभव हुआ। नंबर चार पर एक संस्मरण ज्यों का त्यों सुरक्षित रखा है। 'चंद्रशिला से कम ऊँचा है खांखरखेत'।

वे बहुत ही तार्किक और विवेकी व्यक्ति थे। लोकतांत्रिक मूल्यों में उनका गहरा विश्वास था। सच्चे जनवादी लेखक। जिनकी मानवीयता और मानवीय मूल्यों में गहरी आस्था थी। सबसे बड़ी बात उनके लेखन और वैयक्तिक आचरण में कोई फांक नहीं थी।  जितने ईमानदार वे लेखन में थे,उतने ही ईमानदार आचरण से। वे देहरादून के उन चंद लेखकों में से थे जिनसे मैं संपर्क में आया और जिनकी ईमानदारी ने मुझे प्रभावित किया। इसीलिए मन में उनके लिए बहुत ज्यादा सम्मान था।


बात मार्च 2022 की है। साहित्यिक रेडियो पत्रिका के लिए एक संस्मरण की रिकॉर्डिंग के लिए मैंने विजय भाई को फोन किया। फोन उठाते ही उन्होंने कहा '

भाईसाहब माफ़ कीजिए मेरे पास कोई नई कहानी या कविताएं नहीं हैं। इसलिए मैं नहीं आ पाऊंगा। रेडियो के किसी भी कार्यक्रम अधिकारी को विजय भाई की इस बात से घोर अचरज हो आता। दरअसल आकाशवाणी में नियमानुसार कोई भी पूर्व प्रकाशित या प्रसारित रचना प्रसारित नहीं हो सकती। लेकिन जब मूल्य का क्षरण होता है तो उसका असर हर क्षेत्र में होता है। और रेडियो इसका कोई अपवाद नहीं है। अब लेखक रेडियो के लूपहोल्स,अपनी वरिष्ठता और संबंधों का फायदा उठाकर न केवल प्रकाशित रचनाओं को रिकॉर्ड करा देते हैं, बल्कि एक ही रचना को कई कई बार रिकॉर्ड करा देते हैं।

उनकी बात से मुझे हैरानी नहीं हुई। मैं ये बात उससे पहले अरुण कुमार असफल जी और दो एक और वरिष्ठ लेखकों से भी सुन चुका था। मुझे देहरादून की लेखकीय ईमानदारी का आभास था। मैंने हंसते हुए कहा 'इस बार मुझे आपका यात्रा संस्मरण चाहिए।' लेकिन उन्होंने इस वायदे के साथ उससे भी इंकार कर दिया कि 'जैसे ही इस बार मैं यात्रा पर निकलूंगा तो रेडियो के लिए एक संस्मरण लिखने की कोशिश करूंगा।' उस दिन मन उनके लिए सम्मान से भर गया। उनकी लेखकीय ईमानदारी का मुरीद हुआ।

मई खत्म होते होते उनका फोन आया। उन्होंने बताया एक संस्मरण तैयार है। मैंने तुरंत ही उन्हें रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया और जून की साहित्यिकी में उस संस्मरण को प्रसारित किया। संस्मरण  'चंद्रशिला से कम ऊँचा है खांखरखेत'। उनके अपने पैतृक गांव के पास स्थित दो अपूर्व पहाड़ी सौंदर्य वाली जगहों की यात्रा का संस्मरण। एक ऐसा यात्रा संस्मरण जिसमें उन स्थानों के सौंदर्य से कहीं अधिक उन जगहों की कठिनाइयों का दुख था। खाली होते गांव और पलायन की पीड़ा थी। और दरकते पहाड़ी जीवन की सिसकियाँ थी। ये एक कमाल का संस्मरण था।

दरअसल विजय की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे एक बेहतरीन कवि थे। एक उम्दा कहानीकार थे। प्रतिभाशाली रंगकर्मी थे। खेल प्रेमी और शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे। और। और एक बहुत ही उत्साही और हिम्मती घुमक्कड़,यायावर,ट्रैकर और अन्वेषक थे। अक्सर दुख मिश्रित अचरज हो आता है कि एक ऐसा घुमक्कड़ जिसने जीवन भर पता नहीं कितने दुर्गम दर्रों और पहाड़ों को पार किया,वो अपने हृदयाघात से कैसे पार नहीं पा पाया। शायद ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है। ज़िन्दगी ऐसी ही होती है। 

वे बार बार पहाड़ों पर जाते हैं। पर्यटक बनकर नहीं। यायावर की तरह। राहुल की तरह अन्वेषक बनकर। हमजातोव की तरह जन्मभूमि के दुख दर्द को समझने बूझने,महसूस करने। पहाड़ उनका जन्मस्थान जो था।  उत्तराखंड से लेकर कश्मीर तक के पहाड़ उनके लिए वही स्थान रखते हैं जो हमजातोव के लिए दागिस्तान का था। पहाड़ उनका अपना ' दागिस्तान ' था। वे लिखते हैं- "...पहाड़ों की यात्राएं मेरे लिए मुक्ति की कामना ही नहीं। यात्राओं के बहाने ही तो मैं अक्सर अपने अतीत में झाँकने की कोशिश करता हूँ। माँ,पिता,चाचा,चाची और ढेरों पहाड़वासियों की उस ज़िंदगी में झाँकना चाहता हूं जो उन्हें पहाड़ छोड़ने के लिए मजबूर करती रही हैं। मुझे लगता है इसे जानने के लिए दुनिया भर के पहाड़ों से पलायन करते लोगों की ज़िंदगी में झाँकना होगा। किसी भी देश का पहाड़ी जीवन उस देश के कुलीन जीवन से अलग है।" 

ये यात्राएं उनके अपने भीतर के अंधेरों से लड़ने की प्रेरणा हैं- "अपने भीतर के जंगलों से बाहर निकलने का क्रम ही मेरी यात्राएं हैं जिसकी स्मृतियां हर वक़्त  मथती रहती हैं और जीवन को गति देती हैं।"

आखिर वे इतने दुर्गम प्रदेशों की यात्राएं कैसे सम्पन्न करते हैं। कैसे बार बार दुर्गम दर्रे पार करते है। कैसे पहाड़ों की अलंघ्य चोटियां पार करते हैं। वे एक सूत्र देते हैं। पहाड़ों को नापने का। उन्हें पार करने का। जो अंततः जिंदगी को जीने का भी सूत्र हो आता है। वे कहते हैं- "पहाड़ ताकत से नहीं,हिम्मत से होते हैं पार।"

वे अपने इन यात्रा वृत्तांतों में पहाड़ों के भूगोल को बताते हैं। उसके इतिहास का पाठ करते हैं। लेकिन वे भूगोल से कहीं अधिक उस भूगोल को जीने वालों की बात करते हैं। इतिहास से कहीं अधिक इतिहास को बनाने वालों की ज़िंदगी की कथा कहते हैं। और अपनी इस विशेषता में ये किताब अनिल कुमार यादव के चर्चित यात्रा विवरणों 'कीड़ाजड़ी' और 'वो भी कोई देस है महराज' से गहरा साम्य रखती है।

ये यात्रा संस्मरण 'अपने वतन का नाम बताओ' अपने कलेवर में बहुत छोटा है। 134 पन्नों में सिमटा हुआ। कुल 12 संस्मरणों और यात्रा कथाओं में बंटा हुआ। सभी एक दूसरे से अलग। एक दूसरे से जुदा। अपने आप में मुकम्मल। लेकिन एक सूत्र से आपस में गुंथी हुई। पहाड़ी जीवन के सूत्र में। एक लंबी गाथा की तरह। कंटेंट में बहुत ही समृद्ध। पाठकों को विषय की अंतर्दृष्टि से लैस करती हुई।

अपने पहले संस्मरण में जिससे इस पुस्तक का नामकरण हुआ हिमाचल प्रदेश के लमखागा दर्रे की यात्रा का वृतांत है। एक ऐसा दर्रा जो भारत के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण पर्वतीय दर्रों में से एक है। दर्रा जो समुद्र तल से लगभग 17 हजार फुट से भी अधिक ऊंचाई पर स्थित है। यह दर्रा पारंपरिक रूप से हिमाचल के किन्नौर जिले में स्थित छितकुल गांव को उत्तराखंड की हर्षिल घाटी से जोड़ता है। भारत-तिब्बत सीमा के बेहद करीब होने के कारण यह भौगोलिक और रणनीतिक दोनों दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ये अत्यधिक कठिन श्रेणी का ट्रेक है जहां ग्लेशियर,विशाल बर्फ के मैदान,मोरेन और तीखी ढलानें मिलती हैं। निसंदेह इसके लिए तकनीकी अनुभव और बेहतरीन शारीरिक सहनशक्ति की जरूरत होती है। वृतांत बेहद रोमांचक और दृश्यात्मक है।

दो यात्रा वृतांत मिनकियानी दर्रे की यात्रा पर आधारित हैं। ये हिमाचल प्रदेश में धौलाधार पर्वत श्रृंखला में स्थित एक प्रसिद्ध दर्रा है जो समुद्र तल से लगभग 14 हज़ार की ऊंचाई पर है। ये दर्रा कांगड़ा घाटी को चंबा घाटी से जोड़ता है। इसकी खड़ी चढ़ाई और पथरीले रास्ते ट्रैकिंग को बेहद दुष्कर बनाते हैं। इन वृत्तांतों को पढ़कर महसूस होता है कि वे किस हद तक पहाड़ में धंसे हैं कि वे दर्रे को पिता के काँधे के रूप में कल्पित करते हैं और दर्रे व उसकी चोटियों को पिता पुत्र के अकल्पनीय और खूबसूरत रूपक में बदल देते हैं। एक ऐसे पिता के जो पुत्र को मेला दिखाने के लिए आपने काँधे चढ़ाए है। पुत्र और ज्यादा दृश्य देखने को पिता के कांधे पर खड़ा हो जाता है और पिता पुत्र को संभालने के लिए अपने हाथों को अधिकतम ऊंचाई तक ले आता है। पिता का कांधा एक दर्रा है। उसके दो हाथ ऊंची चोटियां। बच्चा ट्रैकर।

 जांस्कर घाटी लद्दाख के बीहड़ भूभाग में गहराई में बसी हिमालय के सबसे मनमोहक जगहों में से एक है। बर्फ से ढके पहाड़ों, प्राचीन मठों,घाटियों और निर्मल नदियों से घिरी यह घाटी रोमांच और सांस्कृतिक जीवन के अन्वेषण का अविस्मरणीय अनुभव है। वे जांस्कर घाटी में बार बार जाते हैं। यहां की तीन बार की यात्राओं के कुल पांच विवरण हैं। वे वाया मनाली,दारचा अपनी यात्राएं संपन्न करते हैं। इन पांच यात्रा विवरणों में दुर्गम भौगोलिक संरचनाओं के रोमांचक विवरणों के अलावा यहां के सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन पर भी बहुत कुछ कहा गया है। इसमें युवा हैं। रोजगार की समस्या है। विभिन्न क्षेत्रों के पोर्टरों की आपसी प्रतिद्वंदिता और संघर्ष है। गोम्पेल लामा,तेनजिंग, नाम्बगिल,छुवेगा जैसे युवा हैं। जीवन के संघर्षों की और सरवाइव करने की जद्दोजहद है। ये वृतांत बहुत मार्मिक बन पड़ा है।

गौतम गर्ब्याल उर्फ आनंद नांबियाल के शीर्षक से एक यात्रा वृतांत अपने अंत में एक छोटे से पत्र से बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। ये छोटा सा पत्र पहाड़ी जीवन की दुश्वारियां आकस्मिक आपदाओं और जीवन की अनिश्चितता और मृत्यु के शोक को बहुत ही मुखर  लेकिन कारुणिक अभिव्यक्ति देता है।

पत्र कुछ यूं पढ़ता है "सर,मालपा अब वो मालपा नहीं रहा जो आपने देखा था। जिस दुकान में बसेरा किया था,मलबे का ढेर है। काली नदी ने मालपा के पहाड़ों को तोड़ दिया है। उन्हीं  दुकानों के भीतर ठहरे थे गर्ब्यांग,गुंजी, बुद्धी,कुटी, नांबी और व्यास-चौदास घाटी के ढेरों साथी,जो अब नहीं रहे। आनंद भी उन्हीं में था सर। लिपुलेख के पार तिब्बत के पहाड़ों को देखने की इच्छा रही हो या पढ़ाई के लिए फीस जुटाने की इच्छा,मलबे के नीचे वो भी दफन हो गई। इस वक्त धारचूला एकदम सूना है। काली नदी का बहाव अभी भी पहाड़ों को कंपा रहा है। आगे लिख पाना इस वक्त मेरे लिए संभव नहीं है। आपका गौतम गर्ब्याल।"

निसंदेह ये एक शानदार यात्रा संस्मरण जिसमें किताबों और गजेटियरों में मिल जाने वाले यांत्रिक और रेडीमेड विवरण नहीं,बल्कि स्वयं के देखे,जाने,भोगे,अनुभूत किए वास्तविक और सच्चे विवरण हैं। यही बात इसे किताब को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाती है।





Sunday, 13 September 2026




अनुवाद विधा अपने पाठकों को दूसरी भाषाओं और उसके साहित्य संसार में आवा जाही की सुविधा प्रदान करती है। इन दिनों अन्य भाषाओं से और विशेष रूप से अंग्रेजी से हिंदी में खूब अनुवाद हो रहा है। इधर अंग्रेजी में लिखी गई चार पुस्तकें और उनका हिंदी अनुवाद खूब चर्चा में रहा।

नेहा दीक्षित एक प्रसिद्ध पत्रकार हैं, जिन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं और इन दिनों फ्रीलांसिंग कर रही हैं। उन्होंने नौ साल के गहन रिसर्च और लगभग नौ सौ लोगों से साक्षात्कार करने के बाद एक पुस्तक लिखी 'द स्टोरी ऑफ अननोन इंडियन : द मैनी लाइव्स ऑफ सईदा एक्स '। इसका हिंदी में 'कोई एक सईदा' के नाम से अनुवाद आया। दूसरी किताब जानी मानी अंग्रेजी लेखिका और बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय की आत्म कथा 'मैरी कम्स टू मी' है जिसका हिंदी अनुवाद 'मेरी मां गैंगस्टर' शीर्षक से आया। रस्किन बॉन्ड अपनी तरह के अनोखे और सुप्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक हैं। उनकी आत्मकथा 'लोन  फॉक्स डांसिंग:माई ऑटो बायोग्राफी' का हिंदी अनुवाद 'अपनी धुन में'  शीर्षक से आया। चौथी किताब जाने माने पत्रकार मार्क टली की 'अपकंट्री टेल्स:वंस अपऑन अ टाईम इन द हर्ट ऑफ़ इंडिया'  है जिसका अनुवाद 'धीमी वाली फास्ट पैसेंजर' के नाम से आया है। 


1.कोई एक सईदा

नेहा दीक्षित की किताब 'कोई एक सईदा' बहुत शानदार है। ये नामालूम सी महिला श्रमिक सईदा (बदला नाम) की बायोग्राफी और डॉक्यूमेंट्री है। सईदा बनारस के एक बुनकर परिवार की महिला है जो साल 1992 में 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों से उत्पन्न परिस्थितियों के कारण बनारस से विस्थापित होकर परिवार सहित दिल्ली में शरण लेती है। यहां उसके सामने सबसे बड़ा संकट अपना और अपने परिवार के सर्वाइवल का आता है क्योंकि उसके पास सर ढंकने के लिए ना कोई छत है, ना ही कोई नौकरी या रोजगार। पूंजी के नाम पर कुल जमा तीन हजार रुपए। 

अब उसका संघर्ष शुरू होता है। यहां जो वो पहला काम शुरू करती है वो है लांड्री का। होटल में विदेशी सैलानियों के कपड़े धोने का। जल्द ही आशियाना बदलता है और काम भी। दूसरा काम मसालों को साफ करने का मिलता है। और फिर जिदगी को ढर्रे पर लाने की जद्दोजहद में कभी वो खुद काम छोड़ देती है और कभी छूट जाता है। इस तरह उसे हर बार एक अलग काम पकड़ना पड़ता है जिसमें किशमिश की डंठल बीनना,नमकीन बनाना,बादाम गिरी निकालना,जींस के धागों की तुरपाई,जरी का काम शादी के कार्ड बनाना,अगरबत्ती,सॉफ्ट टॉय,गजक, अगरबत्ती बनाने जैसे काम शामिल हैं। इस दौरान वो केवल अपने परिवार के अस्तित्व की लड़ाई ही नहीं लड़ती बल्कि मजदूरों के हक़ और हुकूक की लड़ाई भी लड़ती है। 

ज़री,किशमिश,गजक, डोर नॉब,बादाम,सॉफ्ट टॉय, अगरबत्ती,तिरंगा और शादी के कार्ड नाम से नौ भागों में लिखी गई ये किताब एक अत्यंत साधारण महिला की एक ऐसी असाधारण कहानी कहती है कि जो 1990 के बाद के तीन दशकों के उत्तर भारत के राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज बन जाती है। 1992 के बाबरी मस्जिद के बाद हुए दंगे और 2020 के दिल्ली दंगों के बीच किस तरह भारतीय समाज और  हिन्दू-मुस्लिम संबंध विकसित हुए,उसकी सूक्ष्म और गहरी पड़ताल भी इस किताब में है। ये निम्न वर्ग की एक महिला के अपने जीवन और अपने परिवार के जीवन को चलाने और सरवाइव करने के लिए किए गए संघर्षों का उम्मीद से भरा बयान है। विस्थापन की मार्मिक कहानी भी है कि किस तरह परिस्थितियां लोगों को अपनी भूमि से उजड़ कर दूसरी जगह पलायित होने को मज़बूर करती हैं और अपने जीवन संघर्षों में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि वापसी की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। विडंबना ये कि अगर कोई वापस लौटना भी चाहे तो खुद उसके परिवार वाले ही उसे असंभव बना देंगे क्योंकि जीवन की खुरदुरी वास्तविकता उन्हें परिजन नहीं प्रतिस्पर्धी बना देती है। आर्थिक उदारीकरण के बाद वाले इस दौर में जीवन यापन किस कदर कठिन हो गया है कि बनारस से दिल्ली पलायन के बाद सईदा को अपनी जीविका के लिए कितने ही काम करने पड़ते हैं। उसे बार बार अपना काम बदलना होता है। इसमें एक तरफ बनारस के बुनकर समाज की झलक है तो दूसरी और दिल्ली आउटसोर्सिंग से काम कराए जाने की पद्धति के ब्यौरे भी हैं। इसमें अगर दिल्ली के बाहरी इलाकों में औद्योगिक विकास का कुरूप चेहरा है तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्या और बदहाली भी अपनी विद्रूपता के साथ उपस्थित होती है। 


2. मेरी माँ गैंगस्टर

जानी मानी अंग्रेजी लेखिका अरुंधति रॉय की आत्मकथा है। इस किताब के हाथ में आते ही उसके हिंदी शीर्षक से दो सवाल मन में उठते हैं। पहला, क्या ये किताब उनकी माँ के बारे में है। और दूसरा, क्या गैंगस्टर शब्द का प्रयोग रुचिकर है। दूसरे सवाल के बारे में क्या ही कहा जा सकता है लेकिन, हां, आत्मकथा में माँ  केंद्र की तरह उपस्थित हैं जिसके इर्द गिर्द लेखिका की जिंदगी अपना रास्ता बनाती है। मां को केंद्र में रखकर लिखी गई ये आत्मकथा दरअसल उनके अपनी माँ के साथ प्रेम और बेरुखी के बीच झूलते संबंध का बेबाक बयान है। माँ बेटी का ये सम्बन्ध बहुत ही जटिल है। एक तरफ उनकी माँ उनके साथ एक डिक्टेटर की तरह व्यवहार करती है और उन्हें गाली तक देती है। संबंधों में इतनी कटुता है कि वे अठारह साल की उम्र में घर छोड़ देती हैं तो सात आठ साल तक माँ से मिलती तक नहीं हैं और ना ही माँ इस दौरान उनकी कोई खोज खबर लेती हैं। दूसरी और वे माँ से बहुत प्रभावित हैं और अपने में उनका अक्स देखती हैं और अपने व्यक्तिव के निर्माण में माँ के योगदान को स्वीकृति हैं। वे सीरियाई ईसाई समाज के उत्तराधिकार नियम में बदलाव के लिए माँ के संघर्ष,उनके अनोखे स्कूल की स्थापना और सिंगल पेरेंट के रूप दो बच्चों की परवरिश का विस्तार से ना केवल वर्णन करती हैं बल्कि उससे बहुत मुत्तासिर भी होती हैं। 

लेकिन ये आत्मकथा केवल अपने और माँ के जटिल संबंधों पर ही बात नहीं करती बल्कि इसमें खुद के जीवन निर्मिति की बेबाक और यथार्थ आत्म स्वीकृति भी है। स्त्री गरिमा और अस्मिता का आख्यान भी है। साथ ही नर्मदा बचाव आंदोलन जैसे तमाम सामाजिक राजनीतिक आंदोलन में भागीदारी और उस पर बेबाक राय भी है।


3.अपनी धुन में 

जहां अरुंधति की आत्मकथा रूक्ष भूमि पर लिखी गई है,वहीं अंग्रेजी के प्रसिद्ध  लेखक रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा कोमल भूमि पर लिखी गई है। एंग्लो इंडियन रस्किन अपनी तरह के अनूठे और बहुत ही लोकप्रिय लेखक हैं। ये आत्मकथा अपने आप में एक सुरीली धुन है जिसे एक बार सुनना शुरू किया तो इसमें इस कदर डूब जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कब खत्म हो आती है। इसमें आजादी से पहले और बाद का,दोनों भारत उपस्थित हैं। इसमें जामनगर है।देहरादून है। शिमला है। मसूरी है। दिल्ली है। लंदन और वेल्स भी है। उन्हें पहाड़ से प्रेम है और पहाड़ इसमें अनिवार्यतः आते हैं। वे अविवाहित हैं। इसलिए अकेलेपन की एक उदास अनुगूंज उनकी इस जीवन धुन की पृष्ठभूमि में अंतर्निहित है। 

चार खंडों में लिखी गयी आत्मकथा के पहले खंड में जन्म से लेकर पिता की मृत्यु तक की कहानी है। दूसरे खंड में पिता की मृत्यु के बाद से उनके इंग्लैंड जाने तक के जीवन का वृतांत है। तीसरे खंड में अपने इंग्लैंड प्रवास और वापसी पर एक पूर्णकालिक लेखक के रूप में स्थापित होने के वृतांत हैं और अंतिम भाग में उनके बाद के जीवन का आत्मकथ्य है। हां, जितनी मार्मिक और सुंदर कथा अपने जीवन के पूर्वार्ध की कही है,वैसी उत्तरार्ध की नहीं कह पाये। शायद दूर का जीवन अधिक सूक्ष्म से दिखाई देता रहा होगा और निकट भूत ने उन्हें उस तरह से कहने लायक ना लगा हो। 

निसंदेह एक उम्दा आत्मकथा है।


4.धीमी वाली तेज पैसेंजर 

सभी जानते हैं कि मार्क टली एक प्रख्यात पत्रकार थे। वे भारत में बीबीसी के प्रतिनिधि की हैसियत से आए थे। हालांकि बाद में बहुत समय तक फ्रीलांसिंग भी की। वे लंबे समय तक भारत में रहे और यहां से उनका गहरा लगाव था। उन्होंने भारत को,यहाँ के जीवन को बहुत गहराई से समझा था। धीमी वाली पैसेंजर की कहानियां इस बात की पुष्टि करती प्रतीत होती हैं। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश  का सामाजिक राजनीतिक जीवन अपने पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित है।  ये कहानियां पिछली सदी के अस्सी के दशक के पूर्वी उत्तर प्रदेश के कस्बाई जीवन का आइना हैं।

इसमें कुल मिलाकर सात कहानियां हैं। इस संग्रह का शीर्षक संग्रह की छठी कहानी के नाम पर जिसमें एक सांसद अपनी फैक्ट्री चलने के लिए पैसेंजर ट्रेन को बंद कराना चाहता है और जनता उसके खिलाफ संघर्ष करती है। पहली कहानी टीले वाले मंदिर की है जिसमें दलित बुधराम द्वारा गांव में संत रैदास के मंदिर बनवाने,उसमें अगड़ों के अड़ंगे और उनसे संघर्ष की कहानी है। दूसरी कहानी मिलन पुर में क़त्ल ग्रामीण जीवन में पुलिस और सीआईडी जैसी संस्थाओं की भूमिका और भ्रष्टाचार की कहानी कहती है। हलवाहे का संताप शीर्षक वाली कहानी उस दौर की कहानी है जब किसान के लिए बैंक से लोन लेना महाभारत था।किसान अपनी इज्ज़त के लिए कर्जदार होता जाता और अंततः कोर्ट कचहरी के चक्कर में सब कुछ गंवा देता है। खानदानी धंधा बाहर पढ़े लिखे एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो अपने पिता की राजनीतिक विरासत से अपना करियर बनाना चाहता है लेकिन हवा हवाई ख्याल और जमीनी हक़ीकत की जानकारी के अभाव में मुँह की खाता है। वो समझ पाता है कि राजनीति खानदानी पेशा नहीं है। दो अन्य कहानियां हैं  एक गांधवादी की प्रेम कथा और किस्सा एक भिक्षु का।

ये कहानियां बताती हैं उन्होंने यहां रहकर केवल अपना काम भर नहीं किया बल्कि इसे जिया भी है।

ये चारों किताबें अलग अलग जॉनर की किताबें हैं। लेकिन इनमें कुछ समानताएं हैं। ये चारों किताबें अंग्रेजी में लिखी गईं और इन चारों का हिंदी अनुवाद जाने माने छायाकार,पत्रकार, लेखक-अनुवादक प्रभात सिंह ने किया है। ये चारों ही शानदार अनुवाद हैं। बहुत ही सहज और सरल। प्रवाहमान। लगता है आप मूल हिंदी में लिखी किताब ही पढ़ रहे हैं। हां आज हिंगलिश के ज़माने में उर्दू शब्दों का खूब प्रयोग किसी को खल सकता है क्योंकि हमने उर्दू के सामान्य शब्दों का उपयोग करना भी बंद कर दिया है। लेकिन ये शब्द सही मायने में गद्य के स्वाभाविक प्रवाह को बनाए रखते हैं। इन किताबों के अनुवाद के लिए प्रभात सर को साधुवाद कहना तो बनता है।



(अक्षत पत्रिका के लिए फिर से लिखा गया आलेख)




Friday, 11 September 2026

 



पिछले सप्ताह चार पुस्तकें पढ़कर पुस्तकें समाप्त की। नेहा दीक्षित की 'कोई एक सईदा', अरुंधति रॉय की 'मेरी मां गैंगस्टर', रस्किन बॉन्ड की अपनी धुन में' और मार्क टली की किताब 'धीमी वाली फास्ट पैसेंजर'।

नेहा दीक्षित की किताब शानदार है। ये एक नामालूम सी महिला श्रमिक सईदा (बदला नाम) की बायोग्राफी और डॉक्यूमेंट्री है। ये किताब एक अत्यंत साधारण महिला की एक ऐसी असाधारण कहानी कहती है कि ये 1990 के बाद के तीन दशकों के उत्तर भारत के राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज बन जाती है। 1992 के बाबरी मस्जिद ढहने के बाद हुए दंगे और 2020 के दिल्ली दंगों के बीच किस तरह भारतीय समाज और  हिन्दू-मुस्लिम संबंध विकसित हुए,उसकी सूक्ष्म और गहरी पड़ताल इस किताब में है। ये निम्न वर्ग की एक महिला के अपने जीवन और अपने परिवार के जीवन को चलाने और सरवाइव करने के लिए किए गए संघर्षों का बयान है। ये विस्थापन की मार्मिक कहानी भी है कि किस तरह परिस्थितियां लोगों को अपनी भूमि से उजड़ कर दूसरी जगह पलायित होने को मज़बूर करती हैं और फिर वे अपने जीवन संघर्षों में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि वापसी की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। विडंबना ये कि अगर कोई वापस लौटना भी चाहे तो खुद उसके परिवार वाले ही उसे असंभव बना देंगे क्योंकि जीवन की खुरदुरी वास्तविकता उन्हें परिजन नहीं प्रतिस्पर्धी बना देती है। इस आर्थिक उदारीकरण के बाद वाले दौर में जीवन यापन किस कदर कठिन हो गया है कि बनारस से दिल्ली पलायन के बाद सईदा अपनी जीविका के लिए अलग अलग पचास से अधिक काम करती है। उसे बार बार अपना काम बदलना होता है। इसमें एक तरफ बनारस के बुनकर समाज की झलक है तो दूसरी और दिल्ली आउटसोर्सिंग से काम कराए जाने की पद्धति के ब्यौरे भी हैं। इसमें अगर दिल्ली के बाहरी इलाकों में औद्योगिक विकास का कुरूप चेहरा है तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्या और बदहाली भी अपनी विद्रूपता के साथ उपस्थित होती है।

'मेरी मां गैंगस्टर' जानी मानी अंग्रेजी लेखिका अरुंधति रॉय की आत्मकथा है। अपनी मां को केंद्र में रखकर लिखी गई इस आत्मकथा में अपनी मां के साथ प्रेम और बेरुखी के बीच झूलते सम्बंधों का बेबाक बयान ही नहीं है, बल्कि भारत के सीरियाई ईसाई समाज और खुद के जीवन निर्मिति की बेबाक और यथार्थ आत्म स्वीकृति भी है।

जहां अरुंधति की आत्मकथा रूक्ष भूमि पर लिखी गई हैं,वहीं अंग्रेजी के प्रसिद्ध  लेखक रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा 'अपनी धुन में' कोमल भूमि पर लिखी गई है। एंग्लो इंडियन लेखक रस्किन बॉन्ड अपनी तरह के अनूठे और बहुत ही लोकप्रिय लेखक हैं। ये आत्मकथा अपने आप में एक सुरीली धुन है जिसे एक बार सुनना शुरू किया तो इसमें इस कदर डूब जाते हैं कि पता ही नहीं चलता खत्म हो जाती है। इसमें आजादी से पहले और बाद का,दोनों भारत उपस्थित हैं। इसमें जामनगर है। देहरादून है। शिमला है। मसूरी है। दिल्ली है। लंदन और वेल्स भी है। उन्हें पहाड़ से प्रेम है और इसलिए पहाड़ इसमें अनिवार्यतः आते हैं। वे अविवाहित हैं। इसलिए अकेलेपन की एक उदास अनुगूंज उनकी इस जीवन धुन की पृष्ठभूमि में अंतर्निहित है। हां, जितनी मार्मिक और सुंदर कथा अपने जीवन के पूर्वार्ध की कही है,वैसी उत्तरार्ध की नहीं कह पाए। शायद दूर का जीवन अधिक सूक्ष्म से दिखाई देता रहा होगा और निकट भूत ने उन्हें उस तरह से कहने लायक ना लगा हो। निसंदेह एक उम्दा आत्मकथा है।

सभी जानते हैं कि मार्क टली एक प्रख्यात पत्रकार थे। वे भारत में बीबीसी के प्रतिनिधि की हैसियत से आए थे। हालांकि बाद में बहुत समय तक उन्होंने फ्रीलांसिंग भी की। वे लंबे समय तक भारत में रहे और यहां से उनका गहरा लगाव था। उन्होंने भारत को   यहाँ के जीवन को बहुत गहराई से समझा था। 'धीमी वाली पैसेंजर' की कहानियां इस बात की पुष्टि करती प्रतीत होती हैं। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश  का सामाजिक राजनीतिक जीवन अपने पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित है। ये कहानियां बताती हैं उन्होंने यहां रहकर केवल अपना काम भर नहीं किया,बल्कि इसे जिया भी है। 

ये चारों किताबें अलग अलग समय पर खरीदी गईं और अब जाकर एक साथ ही पढ़ी गईं,ये संयोग ही है।  लेकिन इन चारों किताबों में समानता ये है कि ये चारों ही किताबें मूलतः अंग्रेजी में लिखी गईं और ये इन चारों के हिंदी अनुवाद हैं। इन चारों ही किताबें का अनुवाद जाने माने छायाकार,पत्रकार, लेखक प्रभात सिंह ने किया है। ये चारों ही शानदार अनुवाद हैं। बहुत ही सहज और सरल। प्रवाहमान। लगता है आप हिंदी में लिखी किताब ही पढ़ रहे हैं। हां आज हिंगलिश के ज़माने में कुछ उर्दू शब्दों का प्रयोग किसी को खल सकता है,क्योंकि हमने उर्दू के सामान्य शब्दों का उपयोग करना भी बंद कर दिया है। लेकिन ये शब्द सही मायने में गद्य के स्वाभाविक प्रवाह को बनाए रखते हैं।

इन किताबों के अनुवाद के लिए प्रभात सर को साधुवाद कहना तो बनता है।


Tuesday, 11 March 2025



अनुराग वत्स के संग्रह 'उम्मीद प्रेम का अन्न है' को पढ़ना वसंत से होकर गुजरना है। इससे होकर जाना संवेदनाओं के विविध रंगों से मन का रंग  जाना है।


ये काव्यात्मक सौंदर्य की ऊष्मा और गद्यात्मक तटस्थता के शीत से बने समताप का वसंत है- 


'तुम सुंदर हो

यह अनुभव किया जा सकता है

कहा नहीं जा सकता

तुम जिन वजहों से सुंदर और करीब हो

उन वजहों की भाषा में 

समाई संभव नहीं है।' 

००

'दोपहर बारिश हुई। बारिश इतना और यह करती है कि सब एक छत के नीचे खड़े हो जाएं। वह मेरी बग़ल में आकर खड़ी रहे। मुझे पहली बार ऐसा लगा कि उसे यहीं,ऐसे ही,बहुत पहले से होना चाहिए था। और अभी, इसे दर्ज करते हुए यह इच्छा मेरे भीतर बच रहती ही कि हर बारिश में वह मेरे साथ हो।' 


 ये मुस्कानों के ताप और उदासियों के शीत से बना  वसंत है। ये प्रेम की ऊष्मा और इतर संवेदनाओं के शीत से बने समताप का वसंत है - 


'तुम्हारे चेहरे पर इकलौता तिल

जैसे सफ़ेद सफ़े पर स्याही की पहली बूँद

कविता का पहला शब्द :

तुम।' 

००

'हम प्रेम करते हुए अक्सर अकेले पड़ जाते हैं। दुःख इस बात का नहीं कि यह अकेलापन असह्य है। दुःख इस बात का है कि इसे सहने का हमारा ढंग इतना बोदा है कि वह आलोक तक हमसे छिन जाता है, जो प्रेम के सुनसान में हमारे साथ चलता।' 


इस संग्रह को पढ़ना वसंत के भीतर वसंत को महसूस करना है जिसमें प्रेम और इतर अनुभूतियों के विविध रंगी फूल मन के भीतर खिलते और झरते रहते हैं। इस वसंत प्रेम के इस संग्रह को पढ़ने से बेहतर और क्या हो सकता है कि


'तुम बहुत देर से आईं मेरी पंक्ति में

जैसे बहुतेरे शब्दों के बाद आता है

दुबला-लजीला पूर्ण-विराम

पिछले बाक़ी का अर्थ-भार सम्भालता

प्रेम के पन्ने पर सबसे अन्तिम अंकन।'

Tuesday, 11 February 2025

खत ओ किताबत के पतझड़ में वसंत


प्रिय भाई कैलाश 

और

पंकज भाई

आप लोगों को पता चल ही गया होगा कि वसंत आ चुका है। जब शहर में रहने वालों को पता चल गया है कि वसंत आ गया है तो आप लोग तो गांव में रहते हैं आपको क्यूं कर ना पता चल पाया होगा। 

शहरों में तो इस कदर भीड़ है कि वसंत को उतरने की कोई जगह ही कहां मिल पाती है। इसीलिए शहरों में वसंत धीरे धीरे और बहुत कम उतरता है। कई बार तो इतना कम कि पता ही नहीं चलता कि कब वसंत आया और कब गया। कई बार लोग इस बात से अंदाज़ा लगाते हैं कि ये फागुन का महीना है यानी वसंत आ गया है।


लेकिन गांव में। वहां वसंत का स्वागत करने को कितना कुछ है। पहाड़,नदियां,जंगल,पेड़,पक्षी और मनुष्य। खेत खलिहान तो हैं ही। तो फिर क्यों ना वसंत वहां झोर कर गिरे।

लेकिन मैं इस वसंत की बात नहीं कर रहा। मैं उस वसंत की बात कर रहा हूं जो वसंत आप लोगों ने वसंत के भीतर वसंत गिराया है। चिट्ठियों पर शब्द-शब्द फूल खिले हैं ज्यों खेत-खेत सरसों के पीले फूल। 

किसी पतझड़ के मौसम में वसंत को उतार लाना किसी अजूबे कम थोड़े ही ना है। पर मन में कुछ कुछ प्रेम,कुछ कुछ आस,कुछ कुछ उदासी की स्याही हो, और चाहत की कलम हो तो क्या नहीं हो सकता है। चिट्ठि लिखने के इस पतझड़ वाले समय में 'स्मृतिलोक से चिट्ठियां' वसंत से कम तो नहीं। 

विज्ञान और प्रगति ने हमारा सामने भले ही हमारे लिए सुख सुविधाओं के अंबार लगा दिए हों। पर हमसे हमारी बहुत सी कोमलताएं छीन ली हैं। चिट्ठियों के पते उनमें से एक है। पर क्या ही कमाल है कि कुछ ऐसे लोग अब भी बाकी हैं जो उन कोमलताओं को सहेज सके हैं। वे अभी भी चिट्ठियों से प्यार करते हैं,भरोसा करते हैं,उन्हें बहुत सारे पते अभी भी याद हैं और वे उन पतों पर आज भी चिट्ठियां भेजते हैं।

चिट्ठियों में कुछ उल्लास,कुछ उम्मीद,कुछ उदासी तब भी हुआ करती थी, जब बहुत सारे लोग बहुत सारी चिट्ठियां लिखा करते थे। आज जब ' स्मृतिलोक से चिट्ठियां' पढ़ी जा रही हैं, तो कुछ वैसा ही लग रहा है जैसा कभी एक वक्त लगा करता था, जो अब बीत गया है। पर इन चिट्ठियों को पढ़ते हुए लग रहा है, बीता वक्त लौट आया है। 

इनमें भावनाओं का ज्वार है। मिलन की आस है। विछोह की उदासी है। दोस्ती की उमंग है। मोहब्बत की खुशबू है। बीते वक्त की छाया है और आने वाले समय की धूप। कुछ अपनी है। कुछ जग की। 

 'स्मृतिलोक से चिट्ठियां' दरअसल जादू की एक पोटली है।

आप दोनों को मोहब्बत पहुंचे। और बहुत सारी चिट्ठियों के इंतजार में।

और हां 'कम लिखे को ज्यादा समझना'।


                                                  एक पाठक

Wednesday, 5 February 2025

जीरो माइल बरेली



हर शहर का एक भूगोल होता है और उस भूगोल का स्थापत्य  ये दोनों ही किसी शहर के वजूद के लिए ज़रूरी शर्तें हैं। इस वजूद की कई-कई पहचानें होती हैं। लेकिन ऐसी पहचानें किसी शहर का मुकम्मल परिचय नहीं करा सकतीं, बस एक हद तक उस शहर के बारे में जाना जा सकता है।

शहर केवल कुछ ख़ास पहचान भर नहीं है। यदि किसी शहर को उसकी समग्रता में जानना है, तो उन लोगों के बारे में जानना होता है जो उस शहर को शहर बनाते हैं। उसमें जान फूंकते हैं। जो उसकी धड़कन हैं। जो उस शहर को एक ‘लाइव आइडेंटिटी’ देते हैं। हमें उसके चरित्र को समझना पड़ता है जो उस शहर के रहवासी सामूहिक रूप से अपनी आदतों, अपने रहन-सहन, अपनी रवायतों से और क्रियाकलापों से बनाते हैं।

और इसको तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक किसी शहर को आप ‘जीने’ नहीं लगते. उस शहर में जीने नहीं लगते। बिना शहर में धंसे और बिना उस शहर को अपने भीतर धंसाए किसी शहर को कहां समझा जा सकता है। कैसे उसे बताया जा सकता है। कैसे उसकी क़िस्सागोई की जा सकती है।

पत्रकार, अनुवादक, लेखक और फ़ोटोग्राफ़र प्रभात की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘ज़ीरो माइल बरेली’ को पढ़कर समझा जा सकता है कि उन्होंने इस शहर को किस तरह जिया है। वाम प्रकाशन की शहरों के बारे में रोचक सीरीज़ ‘ज़ीरो माइल’ की यह पांचवीं पुस्तक है। इससे पहले पटना, अयोध्या, मेरठ और अलीगढ़ शहरों पर किताबें आ चुकी हैं।

प्रभात सर मूलतः एक छायाकार हैं। उनके कैमरे के पीछे उनकी बहुत पैनी निगाह होती है, जो बहुत ही सूक्ष्म बातों को लक्षित करती हैं और कमाल के दृश्य बनाती हैं। लेकिन वे ऐसा सिर्फ़ कैमरे से ही नहीं करते, बल्कि अपने दिलोदिमाग़ में देखे, भोगे, महसूसे को अपने शब्दों और भाषा से भी काग़ज़ पर उतने ही बेहतरीन दृश्य बनाते हैं, जैसे कि वे कैमरे से बनाते हैं।

इस किताब में उन्होंने बरेली शहर को बहुत ही जीवंत तरीक़े से प्रस्तुत किया है। इस किताब को पढ़ते हुए आप को लगता है कि किसी बाइस्कोप के माध्यम से बरेली शहर को देख रहे हैं. बस माध्यम बदल जाते हैं। होता इतना है यहां आंख कैमरे की नहीं होती, बल्कि मन की होती है और लेंस की जगह शब्द होते हैं।

शहर कोई निर्जीव चीज़ नहीं, बल्कि सजीव शय है। वो सांस लेता है। बढ़ता है। बदलता है। और जीवन के अनेक पड़ाव पार करता है। इस बदलाव को देखना बहुत रोचक भी होता है। कष्टकारी भी होता है। और कई बार सुखद भी। समय के साथ बदलते बरेली शहर की


तस्वीर को उन्होंने इस किताब के माध्यम से बहुत ही ख़ूबसूरती से प्रस्तुत किया है। शहर किस तरह किन हालात में बदल रहे हैं, यह किताब इस बात का प्रामाणिक बयान है। उन्होंने बरेली में अपना बचपन जिया और अब अपने जीवन का उत्तरार्ध जी रहे हैं। उन्होंने बदलते शहर को बहुत ही सूक्ष्म और गहरी नज़र से देखा है और उसे यहां कलमबद्ध किया है। इस किताब में दर्ज ब्यौरों को पढ़कर कोई भी पाठक इसे अपने शहर से रिलेट कर सकता है।

इस किताब की ख़ूबसूरत बात यह है कि एक ओर तो वे उन विवरणों को अंकित करते हैं जो सार्वभौमिक हैं. जो हर शहर, हर क़स्बे और हर गांव पर लागू होते हैं। दूसरी और वे उन बातों को कहते हैं जो बरेली शहर की ख़ास विशेषताएं हैं, एकदम स्थानीय। उनकी दृष्टि कितनी बारीक़ चीज़ों को पकड़ती है, उसे यहां दर्ज़ उस एक छोटे से वाक़ये से समझा जा सकता है, जिसमें वे उस पंसारी के बारे में लिखते हैं जो अपनी दुकान पर आए बच्चे को सामान ख़रीदने के बाद गुड की डली देता है। यह पहले हर गांव और शहर की रवायत थी, जो अब ख़त्म हो गई है। मुझे आज भी याद है कि जब भी हम छुट्टियों में गांव जाते तो वहां पर पंसारी ऐसे ही बच्चों को नमकीन दिया करता था, जिसे वहां ‘लुभाभ’ कहा जाता था।

पुस्तक 12 भागों में विभक्त है. लेकिन उससे पहले उन्होंने एक़ रोचक भूमिका लिखी है जो इस किताब को पढ़ने का टेम्पो बना देती है। वे अनेक लोगों के उदाहरण के ज़रिए बताते हैं कि लोगों की नज़र में बरेली की पहचान किस रूप में हैं। और फिर इस बात को भी कहते हैं कि कोई भी एक पहचान बरेली की मुकम्मल पहचान नहीं है। बल्कि बरेली के रहवासियों का जीवन और उनके द्वारा बनाई गई सामासिक संस्कृति ही बरेली की असल पहचान है।

इन 12 भागों में पहले दो भाग शहर की स्थापना से लेकर आज़ादी तक के इतिहास का बयान करते हैं। वे न केवल इस इतिहास को बहुत ही सरल रूप प्रस्तुत करते हैं बल्कि यह भी स्थापित करते हैं कि मेल-जोल की गंगा-जमुनी संस्कृति इस शहर की सदियों पुरानी रवायत है जो आज तक क़ायम है। उसके बाद के भागों में हर वो बात है जो आप एक शहर के बारे में जानना चाहते हैं। गली, मोहल्ले, चौराहे, नई-पुरानी पहचान, बाज़ार, विशिष्ट और आम आदमी, धार्मिक रवायतें और पूजा स्थल, शिक्षा और शिक्षण संस्थान, विशिष्ट संस्थान, सड़कें और फ्लाईओवर्स, जाम, भीड़, पार्क, तीज-त्योहार, सिनेमा और संगीत, और अपनी पत्रकारिता की भोगी तस्वीरें भी। सुरमा और झुमका का होना तो लाज़मी है। हां, कोई एक चीज़ जो इस किताब में अनुपस्थित है वो है बरेली का खेल परिदृश्य।

इस किताब की एक जो बहुत ही उल्लेखनीय बात है वो है इसमें कोई भी टाइपिंग मिस्टेक, वर्तनी या प्रिंटिंग मिस्टेक या व्याकरणिक ग़लती का न होना। यह एक ऐसी बात है जो आपके पढ़ने के अनुभव को बेहतरीन बनाती है। नहीं तो आजकल बड़े से बड़े प्रकाशन की किताबों में ग़लतियां आम हैं. इसके लिए वाम प्रकाशन को और उनके प्रूफ़ रीडर को साधुवाद कहा जा सकता है।

कुल मिलाकर यह किताब बरेली शहर के बारे में एक ऐसा बयान है, जिसे पढ़कर उस शहर की एक ऐसी इमेज आपके दिल और दिमाग़ पर अंकित हो जाएगी कि जब कभी बाद में आपको उस शहर में जाने का अवसर मिलेगा तो आपको लगेगा कि आप किसी अजनबी नहीं बल्कि किसी जाने-पहचाने और भोगे हुए शहर में हैं।

अगर आपकी रुचि शहरों को जानने में है तो आपको इस सीरीज़ की सारी किताबें और विशेष रूप से ‘ज़ीरो माइल बरेली’ ज़रूर पढ़नी चाहिए।



Friday, 30 August 2024

साझे अतीत की तलाश का सफरनामा






यात्रा वृतांत हमेशा से बहुत रुचिकर लगते रहे हैं। वे अक्सर बहुत समृद्ध कर जाते हैं। रोचकता तो उनका अंतर्निहित गुण है ही। जिन जगहों को आपने ख़ुद नहीं देखा है,इन वृतांतों के माध्यम से देखा समझा जा सकता है। और भविष्य में उन जगहों पर अगर जाना हुआ तो वे मार्गदर्शक के रूप में काम में लाए जा सकते हैं।

दूसरे, जगहों को देखने समझने का हर व्यक्ति का अपना एक उद्देश्य होता है और अपना एक दृष्टिकोण भी। इस यात्रा वृतांतों से होकर जाते हुए चीजों और जगहों को अलग अलग कोनों से देख समझ कर ख़ुद को समृद्ध होते हुए पाया जा सकता है।

अभी अभी लेखक पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव का यात्रा वृतांत 'कच्छ कथा' पढ़कर समाप्त किया है। ये एक शानदार यात्रा वृतांत है। पूरा कच्छ और उसका लोक आंखों के सामने पसरा है। एक ऐसा वृतांत जो आपके भीतर उसे खुद अपनी आंखों से देखने की तीव्र उत्कंठा से भर देता है। ऐसा वृतांत जो कच्छ और वहां के जीवन को पूरी समग्रता से सामने उपस्थित करता है। फिर वो चाहे कच्छ का इतिहास हो,भूगोल हो,सामाजिक जीवन हो,अर्थव्यवस्था हो,राजनीति हो या फिर सांस्कृतिक जीवन।

वे कमाल के किस्सागो हैं। वे वहां की बातों को किस्सों में सुनाते हैं और वहां के किस्सों को कविता में बदल देते हैं। वे मैक्रो और माइक्रो दोनों स्तरों पर अपने देखे को बयां करते चलते हैं। कभी उनके विवरणों का फलक इतना विस्तारित होता है कि लगता है वे कच्छ की नहीं, बल्कि देश दुनिया की बात कर रहे हैं। और कभी किसी चीज के इतने सूक्ष्म ब्यौरे प्रस्तुत कर रहे होते हैं कि पढ़कर अचरज में डूबने लगते हैं। उनकी लेखनी में मानो कोई कैमरा लगा हो जो मौके के अनुसार जूम इन और जूम आउट होता रहता है।

वे एक साझा संस्कृति की तलाश में बार बार कच्छ जाते हैं । लगातार दस सालों तक। और इस कच्छ की साझा विरासत की तलाश में दस सालों तक कच्छ के भूगोल से होते हुए उसके इतिहास,पुरातात्विक अवशेषों,साहित्य,अर्थ,धर्म,समाज और संस्कृति से गुजरते हुए राजनीति तक जाते हैं। जिन चीजों से वे गुजरते हैं, उसे खुद आत्मसात ही नहीं करते बल्कि उसे पाठकों के सामने भी हुबहू रख देते हैं।

ये वृतांत उन्हीं के शब्दों में 'साझे अतीत की तलाश का सफरनामा' है। वे अपने यात्रा वृतांत के आरंभ में लिखते हैं  "...मुंद्रा और मांडवी के बीच मरद पीर के कई मंदिर और दरगाहें हैं। कहानी तक़रीबन सभी की एक जैसी है, जैसी हमें विक्रम ने रामदेव पीर के बारे में बताई थी या जो रण के मशहूर हाजी पीर के बारे में प्रसिद्ध है। ऐसी हर कहानी में एक लाचार बूढ़ी औरत होती है और उसकी गायें होती हैं। गायों को डकैत उठा ले जाते हैं और उसकी मालकिन फ़रियाद लेकर पीर के पास पहुंचती है। पीर घोड़े पर बैठकर जाते हैं और औरत की गायों को बचाने के चक्कर में शहीद हो जाते हैं। हाजी पीर की कहानी में औरत हिंदू है। रामदेव पीर की कहानी में औरत मुसलमान है। दोनों में ही गायों को लूटने वाले डकैत मुसलमान हैं। ऐसी कथाएं आपको समूचे कच्छ में सुनने को मिलेंगी।"

लेकिन इन दस सालों की यात्रा का हासिल क्या है। इन दस सालों में कच्छ के हजारों सालों के साझे अतीत का ये साझापन दरकने लगता है। इस दरार को वे खुद देखते हैं और महसूस करते हैं। वृतांत के अंतिम पृष्ठों पर वे लिखने को मजबूर हो जाते हैं - "कच्छ में दुख की कई परतें हैं। यहां के सिखों का सबसे ज़ाहिर दुख यह है कि उनके ऊपर किसी कलंक की तरह 'पर-प्रांती' की मुहर लगाई जा चुकी है। इनके दुख यहीं से निकलते हैं और यहीं जाकर पनाह पाते हैं। जो लोग ख़ुद को कच्छी मानते हैं और सिखों को बाहरी,ऐसा नहीं है कि उनके दुख काम हों। वे ख़ुद गुजरातियों की तुलना में देखकर दुखी होते हैं। फिर तीसरी परत कच्छी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच रह रह कर उभारे जाने वाले उपजे दुख की है। ये तमाम दुख जिन जगहों पर पनाह पाते हैं,वहां अलगाव के खतरे और बढ़ जाते हैं।"

इस अर्थ में ये यात्रा वृतांत कच्छ के साझे अतीत का सफरनामा भर नहीं है बल्कि उससे आगे ये कच्छ के समसामयिक इतिहास, समाज और राजनीति का एक रूपक भी है और भविष्य का संकेत भी जो प्रकारांतर से पूरे देश काल और समाज को भी प्रतिविंबित करता है।

एक बेहतरीन यात्रा वृतांत जिसे यात्राओं में रुचि रखने वाले हर पाठक को अवश्य पढ़ना चाहिए।

Friday, 23 August 2024

सुनो जोगी व अन्य कविताएं




आकाशवाणी में काम करते हुए कुछ बहुत ही जीनियस और होनहार युवाओं के साथ काम करने का अवसर मिला। ऐसे युवा जिन्हें आगे चलकर अपने-अपने क्षेत्रों में बेहतरीन काम करना था और एक मकाम हासिल करना था। 

उनमें एक नाम संध्या नवोदिता है।

संध्या की पहली पहचान एक बहुत ही 'आत्मविश्वास से भरी लड़की' है जिसे अपने होने और अपनी काबिलियत पर पूरा भरोसा है।

दूसरी पहचान एक बेहतरीन रेडियो ' कार्यक्रम प्रस्तुतकर्ता ' की है। वो रेडियो से पहले पहल  युववाणी कॉम्पियर के रूप में  जुड़ीं। वे इस कार्यक्रम की शानदार स्क्रिप्टिंग करती और बेहतरीन तरीके से पेश करतीं। रेडियो में नई होने के बावजूद उनमें आत्मविश्वास झलकता। शायद वे पहले से ही मंच संचालन में दक्ष थीं। और ये आत्मविश्वास रेडियो पर कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए झलकता।

तीसरी पहचान एक 'एक्टिविस्ट' की है।  इलाहाबाद में कहीं भी कोई महत्वपूर्ण कार्यक्रम हो या धरना-प्रदर्शन हो,एक चेहरा हमेशा मौजूद होता। और वो चेहरा  संध्या का होता। वे हर जगह मौजूद होतीं। अगर मैं गलत नहीं हूँ तो उन्होंने सोनभद्र जिले में कन्हर नदी पर बनने वाले बांध के लिए भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आंदोलन में भी सक्रिय भाग लिया और वहां के हालातों पर एक महत्वपूर्ण  रपट भी जारी की। 

चौथी पहचान एक बहुत ही संवेदनशील और आला दर्ज़े की युवा 'कवयित्री' की है। 

संध्या की जो बात सबसे ज़्यादा मुत्तासिर करती हैं वे छोटे से छोटे मनोभावों को बड़ी आसानी से पकड़ती हैं। खासकर विसंगतियों को। और फिर उसको बहुत सॉफ्ट से लहज़े में लेकिन मारक जुमलों में ज़ाहिर भी कर देती हैं।

क्योंकि वे एक्टिविस्ट हैं तो जाहिर सी बात है उनकी कविता में  राजनीतिक स्वर होना स्वाभाविक है। उनकी कविता है 'बाश्शा'। कविता जो सन 14/15 के आसपास पढ़ी गई होगी। लेकिन आज भी स्मृति में ताज़ा है। दस सालों बाद भी ये कविता उतनी ही मारक है। इतने सालों में  मानो कुछ भी ना बदला हों। इसमें बादशाह के लिए स्लैंग शब्द 'बाश्शा' का प्रयोग जिस तरह से किया गया है, वो अद्भुत है। इस एक शब्द ने कविता को बेहद मारक बना दिया है।

'....मुलुक बाश्शा का , हुकुम बाश्शा का/ 

सो बस रौंदने चला आ रहा है बाश्शा/ 

इतिहास को, भूगोल को, पूरी कायनात को../

बाश्शा के शौक अजीब हैं/ 

बाश्शा की भूख अजीब है/ 

बाश्शा की प्यास अजीब है।'


लेकिन राजनीतिक स्वर उनकी कविताओं का मुख्य स्वर नहीं है। उसका फलक विशाल है। वे देश, समाज और अपने समय से गुजरती हुई प्रेम तक जाती हैं और एक बहुत ही कोमल संसार की निर्मिति करती हैं।

इस बात को उनके अभी हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह 'सुनो जोगी और अन्य कविताएं' में लक्षित किया जा सकता है। संग्रह में दो भाग हैं। पहले भाग 'एक दिन हमने खेल किया था' में विविध विषयों पर 55 कविताएं हैं। जबकि दूसरे  भाग 'सुनो जोगी' में इसी नाम की कविता श्रृंखला की बहुत  ही चर्चित 45 कविताएं हैं।

उनकी कविताओं में समय किसी इतिहास की तरह दर्ज़ होता चलता है। 'देश-देश' का अंश देखिए-


'यह देश जो अपने खेतों में झूमता रहा/ 

जंगलों में,बीहड़ों में,गॉवों में पलता रहा/ 

कब उग आया कंक्रीट के कैक्टसों में/ 

और डेढ़ सौ खम्बों वाली एक विशालकाय गोल इमारत में कैद हो गया/ 

यह देश/ 

क्रिकेट के भगवानों/ 

सदी के महानायकों/ 

आइडलों और आइकनों के चक्रव्यूह में/ 

मासूम बच्चे सा फँसा लिया गया।'


अफ्रीका के सुप्रसिद्ध साहित्यकार चिनुआ अचेबे का एक प्रसिद्ध कथन है 'जब तक हिरण अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे, तब तक हिरणों के इतिहास में शिकारियों की बहादुरी के किस्से गाए जाते रहेंगे'। ये एक सर्वकालिक और सार्वभौमिक सत्य है। संध्या इस कथन को भारतीय संदर्भ में कितनी ख़ूबसूरती विस्तारित करती हैं अपनी कविता 'चिनुआ अचेबे के नाम' में कि

'हिरण जाएंगे जान से

ठगे जाएंगे

घायल किए जाएंगे पीढ़ियों से

इतिहास में साबित होंगे सर्वोत्तम शिकार

मुलायम मांस और अलबेली खाल वाले

मासूम,सुंदर,चितचोर

अपनी हत्या के लिए खुद ही दोषी

 करार दिए जायेंगे

हिरण जब भी दायर करेंगे मुकदमा शिकारियों के खिलाफ

 बदतमीज,नाकारा,विकास विरोधी कहे जाएंगे। 


वे समसामयिक घटनाओं पर केवल पैनी नज़र ही नहीं रखतीं, बल्कि बेहद मार्मिक संवेदना से उसे दर्ज़ भी करती हैं-

'आरे के पेड़ कटते हैं

अमेज़न के जंगल जलते हैं

....एक पेड़ कटता है/

 सौ बरस का इतिहास कटता है/ 

पानी कटता है/ 

शर्म कटती है/ 

विवेक कटता है/

 प्यार कटता है...'


 स्त्री विमर्श उनकी कविताओं का एक मुख्य स्वर है। लेकिन वे स्त्री विमर्श के बने बनाए रूढ़ ढांचे को तोड़ती हैं और स्त्री के दुःख दर्द को,सवालों को तरल संवेदना के साथ प्रस्तुत करती हैं-

'औरतों ने अपने तन का/ 

सारा नामक और रक्त/ 

इकट्ठा किया अपनी आंखों में/ 

और हर दुख को दिया/ 

उसमें हिस्सा/ 

हज़ारों साल में बनाया एक मृत सागर/ 

आंसुओं ने कतरा कतरा जुड़कर/

 कुछ नहीं डूबा जिसमें/

औरतों के सपनों और उम्मीदों/ 

के सिवाय।'


वे इस संग्रह की पहली ही कविता में ही लिखती हैं 'सबसे ज़्यादा मुखर हो जाऊंगी मैं आपके मौन में'। उनकी कविताएं मुखर मौन की तरह ही आती हैं। उनकी कविताएं कहीं भी लाऊड नहीं होती। वे बहुत सहजता और धीमे स्वर में अपनी बात कहती हैं लेकिन अधिकतम बेधक क्षमता के साथ।

 वे बहुत ही सहज और कम शब्दों में गंभीर से गंभीर बात कह जाती हैं। देश की,समाज की, उनकी विसंगतियों की, विडंबनाओं की। कमाल ये है कि परिस्थितियां चाहे जितनी विषम हों, निराश करने वाली हों, उनकी कविता एक आशा में खत्म होती हैं-

'ऊष्मा से भरा हुआ दिन हुआ जा सकता है/

ठंड की नरम भाप भी/ 

सवेरे की मीठी ओस भी/

आदमी को भरोसे की आवाज होना चाहिए।'


संग्रह के दूसरे भाग 'सुनो जोगी' में इसी नाम की श्रृंखला की 45 प्रेम कविताएं  हैं।

ये अद्भुत प्रेम कविताएं हैं। ये कविताएं बाकी सभी प्रेम कविताओं से इस  मायने में अलग हैं कि दैहिक और भौतिक प्रेम की कविताएं ना होकर प्रेम के उच्चतर स्तर की कविताएं हैं। ऐसी कविताएं जहां  व्यष्टि में समिष्ट समाहित हो जाता है। वैयक्तिक कामनाओं में विश्व कल्याण समाहित हो जाता है।

भारतीय संस्कृति में जोगी की अवधारणा एक ऐसे सिद्ध पुरुष की है जो सांसारिक रागद्वेष से ऊपर उठ गया है। सामान्य जन से ऊपर। सिद्ध। ईश्वर प्रेम में अनुरक्त। कबीर के जोगी सा। 'सुनो जोगी' का जोगी भी ऐसा ही है -

 'कबीर के रास्ते आते हो तुम/ 

सांवरिया को खोजते/ 

राग बरसाते हो / 

जादू जगाते हो/ 

जोगी दीवाना किए जाते हो।


उनकी भाषा में ताजगी हैं। उन्होंने कमाल के बिंब और मेटाफर प्रयोग किए हैं। एक दम नए। एकदम अनूठे। ऐसे जैसे अब तक किसी ने ना किए। ऐसे जो अब तक कवियों की नज़र से ओझल थे। उनकी कल्पना से परे कि

 'लंबी परछाइयाँ,लंबे डग/ 

पलक झपकते धरती  नापते हो/ 

जो है तुम्हारे गुरुत्व से ढकी/

 पखावज बजाते हो/ 

जादू जगाते हो/ 

मल्हार गाते हो/ 

सारी चेतना पर फूंक देते हो मंतर/'


उनकी कविताओं में कमाल की लय है। कुछ कविताओं को पढ़ कर संगीत का सुख मिलता जैसे आप केदारनाथ अग्रवाल को पढ़कर पाते हैं 'मांझी ने बजाओ बंशी/ मेरा मन डोलता/ जैसे मेरा तन डोलता'। संध्या की कविता देखिए- 

'एक कहानी मैंने लिखी एक कहानी तू भी पढ़/

आंसू आंसू मैंने लिखी पानी पानी तू भी पढ़/'


सुनो जोगी कविताएं प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति हैं

'आंखों की तरलता,तुम बहो/ 

मुस्कान,तुम खिलो/

हँसी,तुम छा जाओ/ 

स्पर्श,तुम जादू बन जाओ/

उंगलियों,तुम वाद्य पर बारिश बन बजना/

आवाज, तुम झरने सी होना/

आत्मा तुम अरुणोदय बनना..... 

सुनो मन रंगना।'


तो आपको भी प्रेम के रंग में मन को रंगना है। आपको भी प्रेम में डूब जाना है। तो एक बार 'सुनो जोगी और अन्य कविताओं' से होकर ज़रूर गुज़रना चाहिए।




Tuesday, 13 August 2024

मैंने मांडू नहीं देखा





 स्वदेश दीपक की पुस्तक 'मैंने मांडू नहीं देखा' पढ़ रहा हूँ। ये पुस्तक खुद में एक 'मायाविनी' है,'सीडक्ट्रेस' है। अगर इससे प्रेम किया तो तो आत्मा मानवीय संवेदना से चांदनी सी खिल जाएगी और इसे नापसंद किया कि ये तो बाइपोलर डिसऑर्डर से ग्रस्त व्यक्ति की खंडित जीवन की कथा है तो बहुत संभव है कि आप पहले से ही किसी 'मायाविनी' से शापग्रस्त हों।

अद्भुत पुस्तक है।

मैंने स्वदेश दीपक के बारे में इलाहाबाद रहवास के समय से ही सुन रखा था। मैं उन्हें उनके उनके नाटक 'कोर्ट मार्शल' के लिए जानता था जिसकी इलाहाबाद में शानदार प्रस्तुतियां हुई थीं। और इस किताब का शीर्षक तो हमेशा से ही आकर्षित करता था। पर पढ़ने को अब मिली।

 किताब पढ़ते हुए इसके ' सीडक्ट्रेस' होने का आभास होता है और इसके 365 पन्ने उसके द्वारा मारे धरे गए बोसे, जिनमें से कुछ आत्मा को सघन वेदना की घनघोर बारिश से डुबोते हैं और कुछ सुकून की रिमझिम बौछार से भिगोते हैं।

जिस दिन ये किताब घर आई,उससे अगले दिन किसी काम से गुरुग्राम जाना पड़ा था। इसे साथ ले जाना चाहता था। लेकिन लेकर नहीं गया। लौटकर आया तो 102 बुखार था। किताब चिढ़ा रही थी देखा मेरे अपमान का नतीजा।

देहरादून से पटियाला बेटी को छोड़ने और लाने के लिए ना जाने कितनी बार अंबाला से गुजरा लेकिन जाम से भरी सड़कें और एयरफोर्स स्टेशन और बायपास व फ्लाईओवर की भूल भुल्लैया जिसमें अक्सर देहरादून जाने वाले सही रास्ते से भटक जाया करता था, के अलावा कोई स्मृति इस शहर की नहीं बनी थी। पर अचानक ये शहर इतना प्रिय हो गया है और स्वदेश के घर को एक नजर देखने को इच्छा इतनी बलवती कि अब इस शहर एक बार जरूर जाना है।

लग रहा है काश एक बार स्वदेश लौट आए और उससे मिलना हो सके। फिर लगता है ठीक ही है।अपने प्रिय लेखक से कभी मिलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और उसके सुकून में खलल नहीं डालनी चाहिए। वो जहां हो सुकून में हो।

अफसोस रहेगा स्वदेश के बारे में विस्तार से पहले क्यों नहीं जाना।

Wednesday, 12 June 2024

हसबैंड ऑन ड्यूटी'




 दो महीने पहले खरीदी गई विपिन भाई की किताब 'हाउस हसबैंड ऑन ड्यूटी'आज पढ़ी जा सकी। अब दो बातें - एक लेखक के बारे में। दूसरी किताब के बारे में।


एक,लेखक उस समाज और  वर्ग से आता है जहां पितृसत्ता की जड़ें बहुत गहरी और मजबूत हैं। जहां एक ग्लास पानी स्वयं से लेकर पीना मर्द के लिए अपमानजनक होता है। जहां लड़कों के लिए 'लड़की की तरह रोता है' एक शर्मनाक वाक्य है और 'घर जवांई' शब्द एक गाली। ऐसे में एक लड़के के लिए अपनी नौकरी छोड़कर घर की जिम्मेदारी ओढ़ लेना और पत्नी को नौकरी करने देना कितनी बड़ी और साहस की बात उनके लिए रही होगी इसे समझा जा सकता है। विपिन धनकड़ ने ना केवल हाउस हसबैंड होना चुना बल्कि उससे उपजे अनुभव सबसे साझा किए। ये इतनी ख़ूबसूरत  बात है कि उनके इस जैस्चर पर कई स्त्री विमर्श फीके पड़ सकते हैं।


दो,जब किताब पढ़ेंगे तो एक बारगी को लगेगा कि अरे इतने साधारण से किस्से। लेकिन ये साधारणता ही इस पुस्तक की असाधारणता है। ये किस्से हमारी रोजमर्रा जिंदगी के वे खूबसूरत क्षण हैं जिन्हें हम अक्सर पकड़ नहीं पाते। महसूस नहीं कर पाते। जी नहीं पाते। जबकि होते सबके पास हैं। लेकिन विपिन ने उन लम्हों को भोगा, महसूस किया, जिया और फिर हूबहू कागजों पर उतार दिया। वे बढ़िया किस्सागो हैं। कहन की रोचक शैली है। साथ ही आसपास के घटित होने पर एक पत्रकार की सूक्ष्म दृष्टि भी।  यहां वे नाममात्र के हाउस हसबैंड नहीं होते बल्कि वास्तविक रूप से घर की सारी जिम्मेदारी उसी निष्ठा और ईमानदारी से निभाते हैं जितना कि एक स्त्री। ये सुंदर बात है कि वे उन जिम्मेदारियों को निभाते हुए  लगातार इस बात को महसूस करते हैं और अभिव्यक्त करते हैं कि एक स्त्री के लिए हाउसवाइफ का किरदार कितना कठिन और जिम्मेदारी का होता है और फिर भी वे उसे कितनी सहजता से निभाती जाती हैं। उनके सूक्ष्म से सूक्ष्मतर ब्यौरे उनकी बात को प्रामाणिक बनाते हैं।


एक साधारण गृहस्थ के साधारण जीवन के साधारण लेकिन रोचक किस्सों की एक उम्दा पुस्तक है 'हाउस हसबैंड ऑन ड्यूटी'।

ज़रूर पढ़ें।



विनम्र विद्रोही

 



आकाशवाणी में जिन बहुत ही प्रतिभाशाली युवाओं के साथ काम करने का अवसर मिला उसमें से एक है मेहेर वान राठौर। उनसे पहली मुलाकात आकाशवाणी इलाहाबाद में हुई जब वो युववाणी के प्रस्तुतकर्ता के रूप में आकाशवाणी से जुड़े। वे मितभाषी थे लेकिन उनका सहज,सरल और सौम्य व्यवहार किसी को भी अपनी और आकर्षित करता था। ये बात काबिलेगौर है कि मितभाषी होने के बाद भी उन्होंने रेडियो पर बोलने के कार्य का चयन किया।


 दरअसल वो बंदा ही ऐसा था जो लीक से हटकर और चुनौतीपूर्ण कार्य पसंद करता था। इलाहाबाद आने वाला लगभग हर छात्र सरकारी नौकरी हेतु प्रतियोगिताओं की तैयारी करता है। लेकिन मेहेर वान इलाहाबाद आए उन थोड़े से अपवादों में से एक थे जिनका लक्ष्य प्रशासनिक सेवाओं में चयनित होना नहीं था। उनका विज्ञान से लगाव ज़ाहिर था और शोध कार्य कर रहे थे। अगर मैं सही हूँ तो ये कार्य वे अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध कर रहे थे। एक अर्थ में वो स्वयं 'विनम्र विद्रोही' थे।


ये उन दिनों की बात है जब भारत में पहचान पत्र 'आधार कार्ड' की शुरुआत हुई ही थी । मेहेर वान ने उस समय पहचान पत्र पर एक बहुत ही शानदार शोधपरक पुस्तक लिखी थी जिसमें दुनिया के करीब करीब हर देश के पहचान पत्रों के साथ-साथ भारत की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी थी। क्योंकि मेहेर वान की रुचि विज्ञान अनुसंधान और उसके प्रचार प्रसार में थी तो एक तरफ तो वो इलाहाबाद से आईआईटी खड़गपुर में नैनो टेक्नोलॉजी में रिसर्च करने गए और दूसरी ओर विज्ञान से संबंधित विषयों पर लेखन और अनुवाद करने लगे। उनके जो महत्वपूर्ण कार्य हैं उनमें आइंस्टीन के कुछ पत्रों का अनुवाद भी शामिल है। 


अभी हाल ही में उनकी सम्पादित,अनुदित और लिखित कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इनमें एक है भारत के प्रख्यात गणितज्ञ श्रीनिवास राजानुजन की जीवनी 'विनम्र विद्रोही'। इसे उन्होंने भारती राठौर के साथ लिखा है।  इसे अभी पढ़कर खत्म किया है। कहना ना होगा ये एक महान व्यक्तित्व पर शानदार काम है।


इस किताब की दो खूबियां जरूर रेखांकित होनी 

चाहिए। 


एक, इसकी भाषा। बहुत ही सहज सरल लेकिन बहुत ही लालित्यपूर्ण और बिम्बात्मक। कितनी ही बात वे सूत्र रूप में कहते हैं। कितनी ही सूक्तियां आप इस पुस्तक से उदाहरण के तौर पर दे सकते हैं। मसलन वे अपनी बात शुरुआत ही करते हैं - 'विलक्षण रूप से प्रतिभावान होना एक प्रकार की त्रासदी है'। गणित के इस महानायक की बात करते करते उनकी भाषा बेहद काव्यात्मक हो जाती है। अक्सर लगता है कोई कविता पढ़ी जा रही है। रामानुजन जैसे असाधारण व्यक्तित्व और उसके जीवन को रेखांकित करने के लिए इसी तरह की समर्थ भाषा की दरकार होती है। निसंदेह ये एक मर्मस्पर्शी 'त्रासदी' है।


दो,इसमें केवल रामानुजन का जीवन,उनके संघर्ष,उनके जीवन की त्रासदी और उनकी उपलब्धियों का प्रामाणिक और शोधपरक लेखा जोखा है ही साथ ही उनका पूरा सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश है। इतिहास और भूगोल तो है ही। जब आप ये जीवनी पढ़ रहे होते हैं तो पाठक को लगता है कि वे एक दक्षिण भारतीय व्यक्तित्व से ही रूबरू हो रहे हैं। ये केवल रामानुजन के जीवन की घटनाओं का प्रामाणिक दस्तावेज ही नहीं बल्कि तत्कालीन समय और समाज का भी दस्तावेज है।


फिलहाल ये पुस्तक वैली ऑफ वर्ड्स पुरस्कार हेतु नॉन फिक्शन कैटेगरी में नामांकित हुई है। 

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लेखक द्वय को हिंदी में एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्तित्व पर एक महत्वपूर्ण किताब के लिए बहुत बधाई।



Saturday, 5 August 2023

पत्थरों में बदलते शहरों की कोमल दास्तां



दरअसल किसी शहर में रहना और किसी शहर में जीना दो मुख्तलिफ बातें हैं। जब आप किसी शहर को जी रहे होते हैं या उसमें जी रहे होते हैं,तो वो शहर अपनी संपूर्णता में आपके भीतर कहीं गहरे पैंठ जाता है। उसकी स्मृतियां आपके भीतर कहीं गहरे धंस जाती हैं। हमेशा के लिए आपके भीतर महफूज़ हो जाती हैं। और जब फिर कभी पलट कर उस शहर को आप देखते हैं,तो वो शहर आपको दिखाई ही नहीं देता। वो इस कदर बदल गया होता है कि पहचान में ही नहीं आता। शहर गतिमान होता है और हमारी स्मृतियां जड़। शहर किसी का इंतज़ार नहीं करता। किसी के लिए रुकता नहीं। शहर स्मृतियों से बहुत आगे निकल जाते हैं।

ये दीगर बात है कि उनकी गति क्या होती है और ये गति उन्हें कहां ले जाती है। अधिकांश शहर कांक्रीट के जंगल के ब्लैक हॉल की तरफ बढ़ गए होते हैं, जिनमें समा कर उन्हें अंततः अपना अस्तित्व ही खो देना है। जाने माने लेखक जितेंद्र भाटिया कुछ ऐसा ही लक्षित करते हैं और अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक 'कांक्रीट के जंगल में गुम होते शहर'में बयां करते हैं।

संभावना प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब में जितेंद्र भाटिया ने कुल पांच शहरों-लाहौर,चेन्नई,जयपुर,मुम्बई और कोलकाता के बारे में लिखा है। ये वो शहर हैं जिनमें वे जिये और जिनको उन्होंने जिया। जिन शहरों ने उन्हें गढ़ा। जिन शहरों में उनके जीवन की निर्मिति हुई।कुल चौदह अध्यायों में फैली पुस्तक के एक-एक अध्याय में चेन्नई और लाहौर, दो अध्याय में जयपुर,चार में मुम्बई और छह अध्यायों में कोलकाता को समाहित किया है। जिस विस्तार से शहरों का वर्णन उन्होंने किया है,उसी क्रम में उनके वर्णन की सांद्रता और संवेदना का विस्तार होता गया है। ज़ाहिर सी बात है कि कोलकाता उनके दिल के सबसे करीब है और इसीलिए सबसे ज़्यादा विस्तार से और सघन संवेदना से उन्होंने कोलकाता का वर्णन किया भी है।

इनमें से लाहौर शहर उनका अनदेखा शहर था जिसे उन्होंने अपने परिवार के बड़ों की आंखों और अनुभवों से देखा था। ये उनके पूर्वजों का शहर था जिसके प्रति वे एक प्रकार के रोमान से भरे हैं और उसी तरह वर्णित करते हैं। चेन्नई में वे कम रहे और वो कम विस्तार भी पाता है। शेष तीन शहर- जयपुर,मुम्बई और कोलकाता उनकी संवेदना से गहरे जुड़े हैं और अपने वर्णन में उतना ही विस्तार पाते हैं।

पर सब शहरों के वर्णन में एक बात कॉमन है,वो है शहर का इतिहास। वे हर शहर की स्थापना से लेकर वर्तमान तक का एक प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करते हैं। वे भले ही विस्तार में नहीं जाते लेकिन उनकी दृष्टि और लेखन बहुत साफ है। मुम्बई और कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर तो उन्होंने बहुत ही शानदार लिखा है। मुम्बई के फ़िल्म इतिहास के एक चैप्टर में मूक फिल्मों तथा दूसरे में बोलती फिल्मों के बारे में बेहतरीन लिखा है और उतना ही बेहतरीन कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर। ऋत्विक घटक,मृणाल सेन और सत्यजीत रे पर उनका लिखा इस किताब का श्रेष्ठ और सबसे सरस हिस्से हैं। 

इस किताब में शहरों का वृतांत भी है,इतिहास भी है और लेखक की आत्मकथा भी। इसमें निबंधों की वैचारिकता भी है और कहानी की किस्सागोई  भी। छोटे फॉन्ट में छपी 332 पृष्ठों की ये पुस्तक पढ़े जाने के लिए खासे समय के निवेश की मांग करती है। पर जितेंद्र भाटिया फिक्शन लेखक हैं। वे किस्सागोई जानते हैं और इसीलिए एक रोचकता पूरे समय बनी रहती है और आप एक सांस में उसे पढ़ भी जाते हैं।

इस पुस्तक में जो कमी लगती है,वो है इसमें शहर के बदलाव को,उनके कांक्रीट के जंगल में तब्दील होने को उस विस्तार से रेखांकित नहीं किया गया है जिस हिसाब से पुस्तक के शीर्षक के अनुरूप होना चाहिए था। ऐसे विवरण विरल है और सांकेतिक है। दूसरे,फ्रूफ की कमी खलती है यहां तक कि कई जगह तो सन भी गलत छपी हैं।

लेकिन कुल मिलकर एक बेहतरीन और पठनीय पुस्तक है। पुस्तक की भूमिका में प्रियंवद लिखते हैं-

               "इस किताब का शीर्षक ही मुनादी करता है कि इस नए और तेजी से बदलते दौर में ये पांच शहर धीरे धीरे अपनी पहचान,अपना इतिहास,अपना पुराना वजूद खो रहे है। कांक्रीट के जंगल इन शहरों की पुरानी इमारतों,खंडहरों,गलियों,बाजारों,थियेटर,सिनेमाहाल को तेजी से निगलकर,प्लाटिक के खिलौनों के घरों की तरह बेजान,यकरंग और बेहिस बना रहे हैं। जिनका आसमान तेजी से छोटा होता जा रहा है।.....एक से दिखते ये शहर किसी मशीन के खाँचे में ढलाई करके निकाले गए उत्पाद की तरह दिखते हैं। इनमें अब पुरानी, कुशादा इमारतें,चौड़ा,बड़ा नीला आकाश, मृत्यु का खामोश गीत गाते कब्रिस्तान,नदी के सुकून,चांदनी रातों और सुनहरी धूपों के वितान नहीं दिखते छत,मुंडेर,बरामदा,आँगन,दुछत्ती,जाल,गोलंबर,कोठा,जीना नहीं दिखता।"

दरअसल विकास की अंधी दौड़ से मरते शहर,कोमल सौंदर्य से पत्थर में तब्दील होते शहर का जो दुःख-दर्द जितेंद्र भाटिया का है,वोही प्रियंवद का है, और वो ही शहर में जीने वाले लाखों संवेदनशील आम लोगों का है, जिसको जितेंद्र भाटिया अपनी किताब में रच रहे होते हैं।

Sunday, 30 July 2023

हरजीत सिंह:मुझसे फिर मिल

 



         हर शहर का एक साहित्यिक आभामंडल होता है। उस आभामंडल में तमाम सितारे होते हैं जो आंखों को चकाचौंध से भर देते हैं। लेकिन जब आप उस चकाचौंध को पार कर कुछ गहरे जाते हैं तो कुछ मद्धिम शीतल प्रकाश लिए ऐसे सितारे होते हैं जो आत्मा को दीप्त कर देते है। विस्मय से भर देते हैं। प्रेम और करुणा से सराबोर कर देते हैं

  देहरादून की अदबी जमात के प्रमुख सितारों की चकाचोंध  के पार भी दो ऐसे ही  सितारों का एक युग्म है जिसका प्रकाश आंखों को नहीं बल्कि दिल को प्रकाशमान करता है। ये युग्म  अवधेश और हरजीत का है। 

देहरादूनी अदबी जमात की हंसी के बीच किसी बच्चे की किलकारी गर आपको सुनाई दे तो आप समझ जाइए ये हरजीत है। उस जमात से कोई संगीत की उदास सी धुन सुनाई दे तो समझ लीजिए ये हरजीत है। उस जमात की सदा में कोई सदा दोस्त की सी लगे तो समझो वो हरजीत है।

कोई भी शास्त्रीय  गायन तानपुरे के बिना कहां पूरा होता है। कितना ही सिद्धहस्त गायक क्यों ना हो। तानपुरा गायक को वे अवकाश देता है जो उसकी लय को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी होते हैं। वो गैप्स को,अंतरालों को भरता है। वो बिना लाइमलाइट में आए महत्वपूर्ण काम करता है। दरअसल हरजीत देहरादून के साहित्यिक जमात के संगीत का तानपुरा है।

हरजीत की कहानी आपको विस्मित भी करती है और करुणा से भर देती है। पेशे से  बढ़ईगिरी करने वाला ये शायर बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। अभावों के बीच भी वो उम्दा शेर कहता,खूबसूरत कैलीग्राफी करता, बेहतरीन कोलाज बनाता,कमाल की फोटोग्राफी करता। वो शास्त्रीय संगीता का दीवाना था और फक्कड़ यायावर। जितना अधिक भटकाव उसके स्वभाव में था, उसकी शायरी उतनी ही सधी हुई थी।


हम जानते हैं भारतीय किस कदर उत्सवधर्मी होते हैं। अभावों से उपजा दुख इस कदर उनकी रगों में बहता है कि वे दुखों को भी सेलिब्रेट करने लग जाते हैं। क्या वजह है कि उजली पूर्णिमा के साथ अंधेरी अमावस्या का भी उसी उत्साह से उत्सव मनाते हैं। हरजीत भी ऐसा ही था। दुनियादारी के पेचोखम से नावाफ़िक वो अपने अभावों का सुखों की तरह ही उत्सव मनाता। टूटी छत से चिड़िया को घर के अंदर आते देख वो कहता है-


"आई चिड़िया तो मैंने जाना/

मेरे कमरे में आसमान भी था"। 


इससे ज़्यादा आशा और उम्मीदों से भरा हरजीत के अलावा कौन हो सकता था।

उसके भीतर एक बच्चे सा साफ शफ्फाक मन वास करता। तभी तो वो कठोर काष्ठ को सजीव खिलौनों का रूप दे देता। वो कहता-


"गेंद, गोली,गुलेल के दिन थे/

दिन अगर थे तो खेल के दिन थे"।


वो प्रेम से भरा रहता। जब वो प्रेम से उमगता तो कहता- 


"हम तुझे इतना प्यार करते हैं/

हम तेरी फ़िक्र ही नहीं करते"


उसे साथ पसंद था। दोस्ती पसंद थी। जिसको उसकी दोस्ती नसीब हुई वो कितने खुशकिस्मत थे। वो एक जगह लिखता है-


"आप हमसे मिलें तो ज़मी पर मिलें

ये तकल्लुफ़ की दुनिया मचानों की है"


एक ऐसा ही दोस्त है नवीन कुमार नैथानी। वो युग्म में एक तीसरा आयाम जोड़ता है। वो अवधेश और हरजीत के साथ मिलकर दोस्ती की त्रयी बनाता है। कभी उससे मिलिए और हरजीत का ज़िक्र भर कर दीजिए। उसकी आंखों में हर्ष और विषाद एक साथ उतर आते हैं। वो किस्सों पर किस्से कहे जाता है। वो बताता है हरजीत विचारधाराओं के पचड़े में कभी नहीं पड़ा। एक बार जब उसकी ग़ज़लों को वाम सिद्ध किया जाने लगा तो उसने अपनी वही रचनाएं धर्मयुग में छपवाकर उसका प्रतिवाद किया। 

अगर हरजीत की दोस्ती के चलते उसके दोस्त खुशनसीब थे तो हरजीत भी कम खुशनसीब कहां था। उसे ऐसे दोस्त मिले जो उसके जाने के बाद भी उसे हमेशा दिल में बसाए हैं। उनकी एक दोस्त हैं तेजी ग्रोवर। उन्होंने हरजीत के सारे दोस्तों को,उसके चाहने वालों को एकत्रित किया। फिर उन सबसे हरजीत की यादों को, उसके लिखे को बटोर कर एक किताब की शक्ल दे दी।  नाम है 'मुझसे फिर मिल'।

दरअसल ये हरजीत को उसके चाहने वालों से,नए पाठकों से और दुनिया जहान से मिलवाने का सच्चा सा उपक्रम है। उसकी यादों को जिलाए रखने का एक बेहद संजीदा प्रयास है।

इसमें हरजीत के दो पूर्व प्रकाशित संग्रह 'ये पेड़ हरे हैं' और 'एक पुल' के अलावा एक अप्रकाशित संग्रह 'खेल' और तमाम अप्रकाशित गज़लें शामिल की गई। इसके अलावा उनके कई दोस्तों व अन्य लोगों के हरजीत के बारे आत्मीय उद्गार हैं और दो आलेख भी। 

इनमें से एक शानदार संस्मरणात्मक आलेख सुप्रसिद्द चित्रकार लेखक जगजीत निशात का है 'हरजीत और उसका 'हरजीत' बनना'। इसमें निशात हरजीत को हरजीत बनाने के प्रक्रिया की पड़ताल ही नहीं करते बल्कि देहरादून के उसके समकालीन सांस्कृतिक माहौल को भी बखूबी उद्घाटित करते चलते हैं। 

एक और संस्मरणात्मक आलेख ज्ञान प्रकाश विवेक का है। ये आलेख बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। वे लिखते हैं- 'हरजीत से मिलना किसी बहुत अच्छे मौसम से मिलने जैसा था.वह खुद किसी पेड़ जैसा था-किसी दरख़्त जैसा..... एक ऐसा दरख़्त,जिसके पत्तों पर आसमान आराम कर रहा हो,जिसकी शाखों में ज़िंदगी के संघर्ष  जुड़े हों और जड़ों में कई जोड़ी पांव हों जो उसमें आवारगी और घुमक्कड़ी का अहसास पैदा करते हों.... उसमें बेचैनियों की खुशबू थी,जज़्बात की तरलता थी। उसे अपने सबसे विकट समय में भी मुस्कुराते देखना चकित करता था"। 

वो अपने समय का बेहतरीन ग़ज़लकार था जो बेहद संवेदनशील और संवेगों से भरा था और ग़ज़ल के क्षेत्र में नया मुहावरा गढ़ रहा था। ज्ञान प्रकाश आगे लिखते हैं "हिंदी ग़ज़ल  के कूड़े में अपनी अलग पहचान कराने वाला संवेदनशील,मैच्योर और समझदार ग़ज़लकार था।"

हरजीत का प्रकृति से अद्भुत जुड़ाव था। उसके पहले ही संग्रह का नाम 'ये हरे पेड़ हैं' है। वो लिखता है-


"कश्तियाँ डूब भी जाएं तो मरने वालों में

होश जब तक रहे साहिल का गुमाँ रहता है

ये हरे पेड़ हैं इनको ना जलाओ लोगों

इनके जलाने से बहुत रोज़ धुंआ रहता है"


एक जगह वो लिखता है-


"हरी ज़मीन पे तूने इमारतें बो दी

मिलेगी ताज़ा हवा पत्थरों में कहाँ"


या फिर


"ज़िंदा चेहरे भी बदल जाते हैं तस्वीरों में

पेड़ मरते हैं तो ढल जाते हैं शहतीरों में"


और फिर ऐसे हरे पेड़ के शैदाई को प्रकाशन संस्थान  संभावना प्रकाशन की इससे खूबसूरत श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि इस किताब को छापने में उसने पेड़ों को नष्ट नहीं किया। किताब को गन्ने की खोई से बने कागज़ पर छापा।

अब देहरादून में महसूस होने वाला सबसे बड़ा मलाल और कमी उस महबूब शायर से ना मिल पाना है। लेकिन आप उसे यहां महसूस कर सकते हैं। यहां के साहित्यिक माहौल में वो एक अहसास सा उपस्थित रहता है।

 और ये भी कि मेरे तईं देहरादून की तमाम पहचानों में एक बड़ी पहचान हरजीत भी है। उसको जानने के बाद जब भी देहरादून जाएंगे उसकी याद तो आएगी ही और होठों बरबस गुनगुना उठेंगे कि-


"ढूंढते फिरते हैं हम उस शख़्स का पता

जिससे हों इस शहर के माहौल की बातें बहुत।"


और

और हरजीत आपके कानों में आकर चुपके से कहेगा -


"सोचता हूँ कहां गए वो दोनों

मेरी साइकिल वो मेरा देहरादून"




नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...