Saturday, 5 August 2023

पत्थरों में बदलते शहरों की कोमल दास्तां



रअसल किसी शहर में रहना और किसी शहर में जीना दो मुख्तलिफ बातें हैं। जब आप किसी शहर को जी रहे होते हैं या उसमें जी रहे होते हैं,तो वो शहर अपनी संपूर्णता में आपके भीतर कहीं गहरे पैंठ जाता है। उसकी स्मृतियां आपके भीतर कहीं गहरे धंस जाती हैं। हमेशा के लिए आपके भीतर महफूज़ हो जाती हैं। और जब फिर कभी पलट कर उस शहर को आप देखते हैं,तो वो शहर आपको दिखाई ही नहीं देता। वो इस कदर बदल गया होता है कि पहचान में ही नहीं आता। शहर गतिमान होता है और हमारी स्मृतियां जड़। शहर किसी का इंतज़ार नहीं करता। किसी के लिए रुकता नहीं। शहर स्मृतियों से बहुत आगे निकल जाते हैं।

ये दीगर बात है कि उनकी गति क्या होती है और ये गति उन्हें कहां ले जाती है। अधिकांश शहर कांक्रीट के जंगल के ब्लैक हॉल की तरफ बढ़ गए होते हैं, जिनमें समा कर उन्हें अंततः अपना अस्तित्व ही खो देना है। जाने माने लेखक जितेंद्र भाटिया कुछ ऐसा ही लक्षित करते हैं और अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक 'कांक्रीट के जंगल में गुम होते शहर'में बयां करते हैं।

संभावना प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब में जितेंद्र भाटिया ने कुल पांच शहरों-लाहौर,चेन्नई,जयपुर,मुम्बई और कोलकाता के बारे में लिखा है। ये वो शहर हैं जिनमें वे जिये और जिनको उन्होंने जिया। जिन शहरों ने उन्हें गढ़ा। जिन शहरों में उनके जीवन की निर्मिति हुई।कुल चौदह अध्यायों में फैली पुस्तक के एक-एक अध्याय में चेन्नई और लाहौर, दो अध्याय में जयपुर,चार में मुम्बई और छह अध्यायों में कोलकाता को समाहित किया है। जिस विस्तार से शहरों का वर्णन उन्होंने किया है,उसी क्रम में उनके वर्णन की सांद्रता और संवेदना का विस्तार होता गया है। ज़ाहिर सी बात है कि कोलकाता उनके दिल के सबसे करीब है और इसीलिए सबसे ज़्यादा विस्तार से और सघन संवेदना से उन्होंने कोलकाता का वर्णन किया भी है।

नमें से लाहौर शहर उनका अनदेखा शहर था जिसे उन्होंने अपने परिवार के बड़ों की आंखों और अनुभवों से देखा था। ये उनके पूर्वजों का शहर था जिसके प्रति वे एक प्रकार के रोमान से भरे हैं और उसी तरह वर्णित करते हैं। चेन्नई में वे कम रहे और वो कम विस्तार भी पाता है। शेष तीन शहर- जयपुर,मुम्बई और कोलकाता उनकी संवेदना से गहरे जुड़े हैं और अपने वर्णन में उतना ही विस्तार पाते हैं।

र सब शहरों के वर्णन में एक बात कॉमन है,वो है शहर का इतिहास। वे हर शहर की स्थापना से लेकर वर्तमान तक का एक प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करते हैं। वे भले ही विस्तार में नहीं जाते लेकिन उनकी दृष्टि और लेखन बहुत साफ है। मुम्बई और कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर तो उन्होंने बहुत ही शानदार लिखा है। मुम्बई के फ़िल्म इतिहास के एक चैप्टर में मूक फिल्मों तथा दूसरे में बोलती फिल्मों के बारे में बेहतरीन लिखा है और उतना ही बेहतरीन कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर। ऋत्विक घटक,मृणाल सेन और सत्यजीत रे पर उनका लिखा इस किताब का श्रेष्ठ और सबसे सरस हिस्से हैं। 

स किताब में शहरों का वृतांत भी है,इतिहास भी है और लेखक की आत्मकथा भी। इसमें निबंधों की वैचारिकता भी है और कहानी की किस्सागोई  भी। छोटे फॉन्ट में छपी 332 पृष्ठों की ये पुस्तक पढ़े जाने के लिए खासे समय के निवेश की मांग करती है। पर जितेंद्र भाटिया फिक्शन लेखक हैं। वे किस्सागोई जानते हैं और इसीलिए एक रोचकता पूरे समय बनी रहती है और आप एक सांस में उसे पढ़ भी जाते हैं।

स पुस्तक में जो कमी लगती है,वो है इसमें शहर के बदलाव को,उनके कांक्रीट के जंगल में तब्दील होने को उस विस्तार से रेखांकित नहीं किया गया है जिस हिसाब से पुस्तक के शीर्षक के अनुरूप होना चाहिए था। ऐसे विवरण विरल है और सांकेतिक है। दूसरे,फ्रूफ की कमी खलती है यहां तक कि कई जगह तो सन भी गलत छपी हैं।

लेकिन कुल मिलकर एक बेहतरीन और पठनीय पुस्तक है। पुस्तक की भूमिका में प्रियंवद लिखते हैं-

               "स किताब का शीर्षक ही मुनादी करता है कि इस नए और तेजी से बदलते दौर में ये पांच शहर धीरे धीरे अपनी पहचान,अपना इतिहास,अपना पुराना वजूद खो रहे है। कांक्रीट के जंगल इन शहरों की पुरानी इमारतों,खंडहरों,गलियों,बाजारों,थियेटर,सिनेमाहाल को तेजी से निगलकर,प्लाटिक के खिलौनों के घरों की तरह बेजान,यकरंग और बेहिस बना रहे हैं। जिनका आसमान तेजी से छोटा होता जा रहा है।.....एक से दिखते ये शहर किसी मशीन के खाँचे में ढलाई करके निकाले गए उत्पाद की तरह दिखते हैं। इनमें अब पुरानी, कुशादा इमारतें,चौड़ा,बड़ा नीला आकाश, मृत्यु का खामोश गीत गाते कब्रिस्तान,नदी के सुकून,चांदनी रातों और सुनहरी धूपों के वितान नहीं दिखते छत,मुंडेर,बरामदा,आँगन,दुछत्ती,जाल,गोलंबर,कोठा,जीना नहीं दिखता।"

रअसल विकास की अंधी दौड़ से मरते शहर,कोमल सौंदर्य से पत्थर में तब्दील होते शहर का जो दुःख-दर्द जितेंद्र भाटिया का है,वोही प्रियंवद का है, और वो ही शहर में जीने वाले लाखों संवेदनशील आम लोगों का है, जिसको जितेंद्र भाटिया अपनी किताब में रच रहे होते हैं।

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