Wednesday, 27 September 2023

अफ्रीका के धावक

 

ये 24 सितंबर 2023 का दिन था। दुनिया के तमाम हिस्सों में अलग-अलग देश और खिलाड़ी खेलों में अपना परचम लहरा रहे थे या उसका प्रयास कर रहे थे। 

हांगजू में एशियाई खेलों के पहले ही दिन 12 स्वर्ण पदक जीतकर चीन एशिया में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर रहा था और भारत 5 पदक जीतकर अपने को उभरती खेल शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा था।

उधर एशिया कप जीतने के बाद भारत पहले दो एकदिवसीय मैचों में ऑस्ट्रेलिया को लगभग रौंद कर क्रिकेट के तीनों फॉरमेट में सिरमौर होने दुंदुभी बजा रहा था।

इंग्लैंड में प्रीमियर लीग में मेनचेस्टर सिटी नॉटिंघम फारेस्ट को 2-0 से हराकर शीर्ष पर थी और पिछले साल अपने ट्रेबल का औचित्य सिद्ध कर रही थी।

जबकि फ्रांस में फुटबॉल के ही दूसरे रूप रग्बी में विश्व की 20 सर्वश्रेष्ठ टीमें विश्व खिताब जीतने के लिए होड़ कर रही थीं।

और

और ऐन उसी दिन बर्लिन जर्मनी में अफ्रीका के धावक अपने पैरों की कलम और पसीने की स्याही से खेलों के मैराथन दौड़ वाले पन्ने पर नया इतिहास लिख रहे थे।

 पुरुष वर्ग में केन्या के 38 वर्षीय एलिउद किपचोगे बर्लिन मैराथन पांचवी बार जीत रहे थे और  इथियोपिया के महान धावक हैले गब्रेसिलासी के चार बार जीत के रिकॉर्ड को तोड़ रहे थे। साल 2022 में यहीं बर्लिन में किपचोगे ने 02 घंटे 01 मिनट और 09 सेकंड  का विश्व रिकॉर्ड बनाया था। 5 फुट 4 इंच लंबाई और 54 किलोग्राम वजन वाला 38 साल का ये दुबला पतला धावक मैराथन का महानतम धावक है जिसने 11 से ज़्यादा मैराथन जीती हैं। वे पिछले दो ओलंपिक में मैराथन जीत चुके हैं और पेरिस में जीतकर ओलंपिक मैराथन जीत की तिकड़ी बनाना उनका सपना है। 


वे दुनिया के एकमात्र ऐसे मैराथन धावक हैं जिन्होंने 2 घंटे का बैरियर तोड़कर पूरी दुनिया को आश्चर्य में डाल दिया था। साल 2019 में विएना में उन्होंने मैराथन  01 घंटे 59 मिनट और 03 सेकंड में पूरी की। हालांकि तकनीकी कारणों से इस समय को मान्यता नहीं मिली।

किपचोगे की ये असाधारण उपलब्धि उन्हें बैनिस्टर जैसे महान एथलीट के समकक्ष रखती है। याद कीजिए रोजर बैनिस्टर को जिन्होंने एक मील की दौड़ 1954 में पहली बार 4 मिनट से कम समय में पूरी कर दुनिया को अचंभित कर दिया था।


लेकिन किपचोगे की रिकॉर्ड पांचवीं बार बर्लिन मैराथन जीत भी नेपथ्य में चली जाए तो सोच सकते हैं कि निश्चित ही कुछ बहुत बड़ा हुआ होगा। उस दिन सच में बहुत बड़ा हुआ था और ये कमाल किया था इथियोपिया की मैराथन धाविका तिजिस्त आसेफा ने। वे बर्लिन में अपने कॅरियर की  तीसरी मैराथन दौड़ रहीं थीं। यहाँ उन्होंने 2 घंटे 11 मिनट और 53 सेकंड का नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। उन्होंने 2019 में ब्रिजिड कोसेगे के पुराने रिकॉर्ड  को 02 मिनट और 11 सेकंड से बेहतर किया और साथ ही 02 घंटे 12 मिनट के असंभव से बैरियर को भी तोड़ा। कमाल की बात ये है 37 किलोमीटर तक उनकी गति पुरुष मैराथन विजेता किपचोगे से केवल 03 सेकंड प्रति  किलोमीटर कम थी।

 यहां उल्लेखनीय बात ये भी है कि पुरुष और  महिला मैराथन दौड़ के समय में अंतर अब लगभग दस मिनट का रहा गया है। 1900 के आसपास ये अंतर लगभग 90 मिनट का था।

कमाल की बात तो ये भी है कि महिला पुरुष दोनों वर्गों में पहले आठ स्थान पर केन्या,इथियोपिया और तंजानिया के धावक थे। अगर कहीं से भी हिटलर की आत्मा इस दौड़ को देख रही होगी तो उसके 'आर्यन श्रेष्ठता के सिद्धांत' को एक बार फिर कलर्ड लोगों द्वारा ध्वस्त होते देख जार जार रो रही होगी।

क्या ही अद्भुत दृश्य होते हैं वे जहां कि लगभग बिना मांस मज्जा के काले चमड़ी वाले पसीने से सराबोर अफ्रीकी धावकों के शरीर सूर्य की रोशनी में काले संगमरमर से चमक रहे होते हैं। उनके शरीर में भले ही सुविधाओं और संपन्नता के मांस का अभाव हो, पर अभावों और गरीबी की आग में तपी और साहस, हिम्मत और कड़ी मेहनत के हथौड़ों के प्रहारों से बनी वज्र सी हड्डियां उनके शरीर में विद्यमान होती हैं। जो उन्हें संघर्ष करने का होंसला देती हैं और उन्हें अजेय बना देती हैं।

अफ्रीका के इन काले चमड़ी वाले खिलाड़ियों को  और विशेष रूप से लंबी दौड़ के धावकों को ध्यान से देखिए। ये दौड़े उनके लिए जीने मरने का प्रश्न होती हैं। जीत जीवन और हार मृत्यु। जीत सुनहरे भविष्य  का आश्वासन और हार बीते नारकीय जीवन की बाध्यता। उनकी आंखों में झांकिए। उसमें जीतने की अदम्य लालसा के अलावा और कुछ नहीं दिखाई देगा।

आखिर उनमें संघर्ष का ये जज़्बा और हौंसला आता कहां से है। निश्चित ही ये उनके परिवेश से ही आता होगा। वे दुनिया की सबसे कठिन और दुरूह भौगोलिक परिवेश से आते हैं। वे प्राकृतिक संसाधन जो उनके लिए होने चाहिए, पश्चिम की बहुराष्ट्रीय कंपनी के लालच की भेंट चढ़ जाते हैं और उनके हिस्से आते हैं बचे खुचे संसाधनों पर अधिकार जमाने के लिए सबसे भयानक,कठिन और कभी ना खत्म होने वाले गृह युद्ध और उसके परिणामस्वरूप घोर गरीबी और अभावों भरा जीवन। ऐसे में उनके भीतर अदम्य जिजीविषा पैदा होती है और उससे पैदा होता है कड़ा संघर्ष करने हौंसला और कभी ना हार मानने का जज़्बा।

°°°°°

और हां कुछ कुछ यही हौंसला और जज़्बा तीसरी दुनिया के देशों के खिलाड़ियों में भी होता है जो निम्न मध्यम वर्ग से आते हैं। ये दूसरी बात है वे अफ्रीका के इन खिलाड़ियों से संघर्ष में पिछड़ जाते हैं।

तो अफ्रीकी देशों के मध्यम और लंबी दूरी के धावकों के हौंसलों और अद्भुत सफलता को सलाम करना तो बनता हैं ना।



Thursday, 21 September 2023

जेंटलमैन गेम क्रिकेट



 क्रिकेट अब जेंटलमैन गेम रह गया है या नहीं, इस पर बहस की जा सकती है। लेकिन 1983 में जब भारत ने पहली बार विश्व कप जीता, तो निश्चित ही उस समय ये जेंटलमैन गेम रहा होगा। उस समय एक अम्पायर टेलेंडर को बाउंसर फेंकने पर बॉलर को डांट सकता था। जाने माने पत्रकार और ब्रॉडकास्टर रेहान फज़ल बीबीसी डॉट कॉम में अपने एक लेख में भारत और वेस्टइंडीज के बीच खेले गए फाइनल मैच की एक घटना का जिक्र करते हैं-

'तेज़ गेंदबाज़ मैल्कम मार्शल किरमानी और बलविंदर सिंह संधु की साझेदारी से इतने खिसिया गए कि उन्होंने नंबर 11 खिलाड़ी संधू को बाउंसर फेंका जो उनके हेलमेट से टकराया। संधू को दिन में तारे नज़र आ गए। अंपायर डिकी बर्ड ने मार्शल को टेलएंडर पर बाउंसर फेंकने के लिए बुरी तरह डाँटा. उन्होंने मार्शल से ये भी कहा कि तुम संधू से माफ़ी माँगो।

मार्शल उनके पास आकर बोले, ‘मैन आई डिड नॉट मीन टु हर्ट यू. आईएम सॉरी.’(मेरा मतलब तुम्हें घायल करने का नहीं था. मुझे माफ़ कर दो).

संधू बोले, ‘मैल्कम, डू यू थिंक माई ब्रेन इज़ इन माई हेड, नो इट इज़ इन माई नी.’(मैल्कम क्या तुम समझते हो, मेरा दिमाग़ मेरे सिर में है? नहीं ये मेरे घुटनों में है)।

ये सुनते ही मार्शल को हँसी आ गई और माहौल हल्का हो गया।'

रअसल खेल मैदान में केवल प्रतिद्वंदिता ही नहीं होती बल्कि दोस्ताना माहौल भी साथ साथ चलता  है। सिर्फ तनाव ही व्याप्त नहीं रहता बल्कि सहजता और जीवंतता भी व्याप्ति है।

.............

च तो ये है खेल जीवन का ही एक हिस्सा है और खेल मैदान में सिर्फ खेल और प्रतिद्वंदिता ही नहीं रहती बल्कि जीवन भी साथ साथ चलता है।



खेल भावना


 

यूं देखा जाए तो रविवार की रात विश्व एथलेटिक्स प्रतियोगिता की जैवलिन थ्रो स्पर्धा का फाइनल भारत और पाकिस्तान के बीच फाइनल भी था। ये भारत के नीरज चोपड़ा और पाकिस्तान के अरशद नदीम के बीच स्पर्धा थी। इस स्पर्धा में नीरज ने स्वर्ण और नदीम ने रजत जीता। यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि नदीम बेहद प्रतिभावान हैं और उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 90+ मीटर है जो नीरज के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ से अधिक है।

लेकिन क्या ही कमाल है कि बेलग्रेड के नेशनल एथलेटिक्स सेंटर पर  क्रिकेट और हॉकी की स्पर्धाओं के उन्मादी माहौल के बरक्स सहयोग,अपनेपन और प्यार के खूबसूरत दृश्य थे। फाइनल थ्रो के बाद वे दोनों प्यार से गले मिले और एक दूसरे के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। उसके बाद जब फोटो सेशन में नदीम बिना राष्ट्रीय झंडे के अलग खड़े थे,तब नीरज उन्हें अपने साथ लेकर आए और फोटो सेशन पूरा किया। इससे पहले टोक्यो ओलंपिक में नीरज के जैवलिन से नदीम अभ्यास कर रहे थे।

क्या ये कारण है कि सामूहिकता और भीड़ ही उन्माद पैदा करती है जबकि एक अकेला व्यक्ति अधिक विवेकशील होता है। इसीलिए टीम खेल और उनके समर्थक उन्माद फैलाते हैं,जबकि व्यक्तिगत प्रतियोगिताओं में उस तरह का उन्माद नहीं होता। या फिर एथलेटिक्स जैसे खेलों में जहां विश्व स्तर पर भारत और पाक का कम या बहुत कम प्रतिनिधित्व होता है, वहां वो अकेलेपन का भाव आपस में एक जुड़ाव पैदा करता है। या फिर हर व्यक्ति का एक अलग मानसिक गठन होता है जो उसके परिवेश और परिवार से आता है।

नीरज इस जीत के बाद भारत के महानतम एथलीट कहे जा सकते हैं। और इसलिए उनमें  एक 'एटीट्यूड'पैदा हो सकता है। लेकिन ऐसा है नहीं। वे बेहद विनम्र,ज़मीन से जुड़े फोकस्ड खिलाड़ी हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे गोट (आल टाइम ग्रेटेस्ट एथलीट) हैं तो उन्होंने बेहद विनम्रता से कहा 'मुझे नहीं लगता कि मैं महानतम खिलाड़ी हूं। हमेशा कुछ ना कुछ कसर रह जाती है। अभी और ज्यादा इम्प्रूवमेंट करने हैं और काफ़ी कुछ करना है। फिलहाल उसी पर फ़ोकस करूंगा।'

आईपीएल के सट्टेबाजी के चार पैसे आने पर जहां नए से नया क्रिकेटर भी सीना खोले,गले में मोटी मोटी चैन, अंगुलियों में अंगूठी,हाथों में कड़े और पूरे शरीर पर टैटू खुदवाए दंभी 'छक्का छैला' बना फिरता है,वहीं नीरज चोपड़ा जैसे खिलाड़ी अपनी एक सफलता के बाद अपने अगले लक्ष्य की और नज़र गड़ाए होते हैं। 

दरअसल महान व्यक्तित्व ऐसे ही विनम्र, सरल और प्यार से भरे होते हैं। नीरज भी ऐसे ही हैं। वे चैंपियन हैं, खिलाड़ी भी और व्यक्ति भी।

---------------

नीरज को मोहब्बत पहुंचे।



एथलेटिक्स



 दरअसल यही असली भारत है और असली खेल हैं। जिस समय क्रिकेटर धोनी और कोहली अमीर खिलाड़ियों की सूची में शुमार हो रहे थे,ठीक उसी समय कुछ नॉन सेलिब्रिटी खिलाड़ी हमें गर्व करने के कई मौके दे रहे थे। 

एच एस प्रनॉय विश्व नं एक विक्टर एक्सेलसन को हराकर विश्व बैडमिंटन प्रतियोगिता के सेमीफ़ाइनल में पहुंचकर कांस्य पदक पक्का कर रहे थे, तो प्रज्ञान नंदा विश्व नं दो हिकारू नाकामुरा और विश्व नं तीन खिलाड़ी फैबियानो कारूआना को हराकर विश्व शतरंज प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंच कर उपविजेता बन रहे थे।

और फिर कल रात बुडापेस्ट हंगरी में नीरज चोपड़ा 88.17 मीटर की भाले की उड़ान के साथ भारत के सार्वकालिक महानतम एथलीट ही नहीं बल्कि भारत के महानतम खिलाड़ियों में शुमार हो रहे थे।

विश्व एथलेटिक्स में भाला फेंक में नीरज स्वर्ण पदक जीतकर ओलंपिक स्वर्ण के साथ अपना डबल पूरा कर भारतीय खेल जगत के आसमान में जो स्वर्णिम आभा बिखेर रहे थे, उस आभा को निःसंदेह 4×400 मीटर में पांचवां स्थान प्राप्त कर मो अनस,अमोज जैकब,मो अजमल और राजेश रमेश और चमकदार बना रहे थे। 

वे पदक भले ही ना जीत पाएं हो,वे हमारे दिलों को रोशन कर रहे थे और भारतीय एथलेटिक्स के लिए संभावनाओं के नए द्वार भी खोल रहे थे।

------------

बिला शक ये प्रदर्शन  आश्वस्तकारी हैं। शानदार प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को बधाई।



Saturday, 5 August 2023

पत्थरों में बदलते शहरों की कोमल दास्तां



रअसल किसी शहर में रहना और किसी शहर में जीना दो मुख्तलिफ बातें हैं। जब आप किसी शहर को जी रहे होते हैं या उसमें जी रहे होते हैं,तो वो शहर अपनी संपूर्णता में आपके भीतर कहीं गहरे पैंठ जाता है। उसकी स्मृतियां आपके भीतर कहीं गहरे धंस जाती हैं। हमेशा के लिए आपके भीतर महफूज़ हो जाती हैं। और जब फिर कभी पलट कर उस शहर को आप देखते हैं,तो वो शहर आपको दिखाई ही नहीं देता। वो इस कदर बदल गया होता है कि पहचान में ही नहीं आता। शहर गतिमान होता है और हमारी स्मृतियां जड़। शहर किसी का इंतज़ार नहीं करता। किसी के लिए रुकता नहीं। शहर स्मृतियों से बहुत आगे निकल जाते हैं।

ये दीगर बात है कि उनकी गति क्या होती है और ये गति उन्हें कहां ले जाती है। अधिकांश शहर कांक्रीट के जंगल के ब्लैक हॉल की तरफ बढ़ गए होते हैं, जिनमें समा कर उन्हें अंततः अपना अस्तित्व ही खो देना है। जाने माने लेखक जितेंद्र भाटिया कुछ ऐसा ही लक्षित करते हैं और अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक 'कांक्रीट के जंगल में गुम होते शहर'में बयां करते हैं।

संभावना प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब में जितेंद्र भाटिया ने कुल पांच शहरों-लाहौर,चेन्नई,जयपुर,मुम्बई और कोलकाता के बारे में लिखा है। ये वो शहर हैं जिनमें वे जिये और जिनको उन्होंने जिया। जिन शहरों ने उन्हें गढ़ा। जिन शहरों में उनके जीवन की निर्मिति हुई।कुल चौदह अध्यायों में फैली पुस्तक के एक-एक अध्याय में चेन्नई और लाहौर, दो अध्याय में जयपुर,चार में मुम्बई और छह अध्यायों में कोलकाता को समाहित किया है। जिस विस्तार से शहरों का वर्णन उन्होंने किया है,उसी क्रम में उनके वर्णन की सांद्रता और संवेदना का विस्तार होता गया है। ज़ाहिर सी बात है कि कोलकाता उनके दिल के सबसे करीब है और इसीलिए सबसे ज़्यादा विस्तार से और सघन संवेदना से उन्होंने कोलकाता का वर्णन किया भी है।

नमें से लाहौर शहर उनका अनदेखा शहर था जिसे उन्होंने अपने परिवार के बड़ों की आंखों और अनुभवों से देखा था। ये उनके पूर्वजों का शहर था जिसके प्रति वे एक प्रकार के रोमान से भरे हैं और उसी तरह वर्णित करते हैं। चेन्नई में वे कम रहे और वो कम विस्तार भी पाता है। शेष तीन शहर- जयपुर,मुम्बई और कोलकाता उनकी संवेदना से गहरे जुड़े हैं और अपने वर्णन में उतना ही विस्तार पाते हैं।

र सब शहरों के वर्णन में एक बात कॉमन है,वो है शहर का इतिहास। वे हर शहर की स्थापना से लेकर वर्तमान तक का एक प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करते हैं। वे भले ही विस्तार में नहीं जाते लेकिन उनकी दृष्टि और लेखन बहुत साफ है। मुम्बई और कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर तो उन्होंने बहुत ही शानदार लिखा है। मुम्बई के फ़िल्म इतिहास के एक चैप्टर में मूक फिल्मों तथा दूसरे में बोलती फिल्मों के बारे में बेहतरीन लिखा है और उतना ही बेहतरीन कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर। ऋत्विक घटक,मृणाल सेन और सत्यजीत रे पर उनका लिखा इस किताब का श्रेष्ठ और सबसे सरस हिस्से हैं। 

स किताब में शहरों का वृतांत भी है,इतिहास भी है और लेखक की आत्मकथा भी। इसमें निबंधों की वैचारिकता भी है और कहानी की किस्सागोई  भी। छोटे फॉन्ट में छपी 332 पृष्ठों की ये पुस्तक पढ़े जाने के लिए खासे समय के निवेश की मांग करती है। पर जितेंद्र भाटिया फिक्शन लेखक हैं। वे किस्सागोई जानते हैं और इसीलिए एक रोचकता पूरे समय बनी रहती है और आप एक सांस में उसे पढ़ भी जाते हैं।

स पुस्तक में जो कमी लगती है,वो है इसमें शहर के बदलाव को,उनके कांक्रीट के जंगल में तब्दील होने को उस विस्तार से रेखांकित नहीं किया गया है जिस हिसाब से पुस्तक के शीर्षक के अनुरूप होना चाहिए था। ऐसे विवरण विरल है और सांकेतिक है। दूसरे,फ्रूफ की कमी खलती है यहां तक कि कई जगह तो सन भी गलत छपी हैं।

लेकिन कुल मिलकर एक बेहतरीन और पठनीय पुस्तक है। पुस्तक की भूमिका में प्रियंवद लिखते हैं-

               "स किताब का शीर्षक ही मुनादी करता है कि इस नए और तेजी से बदलते दौर में ये पांच शहर धीरे धीरे अपनी पहचान,अपना इतिहास,अपना पुराना वजूद खो रहे है। कांक्रीट के जंगल इन शहरों की पुरानी इमारतों,खंडहरों,गलियों,बाजारों,थियेटर,सिनेमाहाल को तेजी से निगलकर,प्लाटिक के खिलौनों के घरों की तरह बेजान,यकरंग और बेहिस बना रहे हैं। जिनका आसमान तेजी से छोटा होता जा रहा है।.....एक से दिखते ये शहर किसी मशीन के खाँचे में ढलाई करके निकाले गए उत्पाद की तरह दिखते हैं। इनमें अब पुरानी, कुशादा इमारतें,चौड़ा,बड़ा नीला आकाश, मृत्यु का खामोश गीत गाते कब्रिस्तान,नदी के सुकून,चांदनी रातों और सुनहरी धूपों के वितान नहीं दिखते छत,मुंडेर,बरामदा,आँगन,दुछत्ती,जाल,गोलंबर,कोठा,जीना नहीं दिखता।"

रअसल विकास की अंधी दौड़ से मरते शहर,कोमल सौंदर्य से पत्थर में तब्दील होते शहर का जो दुःख-दर्द जितेंद्र भाटिया का है,वोही प्रियंवद का है, और वो ही शहर में जीने वाले लाखों संवेदनशील आम लोगों का है, जिसको जितेंद्र भाटिया अपनी किताब में रच रहे होते हैं।

Sunday, 30 July 2023

हरजीत सिंह:मुझसे फिर मिल

 



         र शहर का एक साहित्यिक आभामंडल होता है। उस आभामंडल में तमाम सितारे होते हैं जो आंखों को चकाचौंध से भर देते हैं। लेकिन जब आप उस चकाचौंध को पार कर कुछ गहरे जाते हैं तो कुछ मद्धिम शीतल प्रकाश लिए ऐसे सितारे होते हैं जो आत्मा को दीप्त कर देते है। विस्मय से भर देते हैं। प्रेम और करुणा से सराबोर कर देते हैं

  देहरादून की अदबी जमात के प्रमुख सितारों की चकाचोंध  के पार भी दो ऐसे ही  सितारों का एक युग्म है जिसका प्रकाश आंखों को नहीं बल्कि दिल को प्रकाशमान करता है। ये युग्म  अवधेश और हरजीत का है। 

देहरादूनी अदबी जमात की हंसी के बीच किसी बच्चे की किलकारी गर आपको सुनाई दे तो आप समझ जाइए ये हरजीत है। उस जमात से कोई संगीत की उदास सी धुन सुनाई दे तो समझ लीजिए ये हरजीत है। उस जमात की सदा में कोई सदा दोस्त की सी लगे तो समझो वो हरजीत है।

कोई भी शास्त्रीय  गायन तानपुरे के बिना कहां पूरा होता है। कितना ही सिद्धहस्त गायक क्यों ना हो। तानपुरा गायक को वे अवकाश देता है जो उसकी लय को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी होते हैं। वो गैप्स को,अंतरालों को भरता है। वो बिना लाइमलाइट में आए महत्वपूर्ण काम करता है। दरअसल हरजीत देहरादून के साहित्यिक जमात के संगीत का तानपुरा है।

रजीत की कहानी आपको विस्मित भी करती है और करुणा से भर देती है। पेशे से  बढ़ईगिरी करने वाला ये शायर बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। अभावों के बीच भी वो उम्दा शेर कहता,खूबसूरत कैलीग्राफी करता, बेहतरीन कोलाज बनाता,कमाल की फोटोग्राफी करता। वो शास्त्रीय संगीता का दीवाना था और फक्कड़ यायावर। जितना अधिक भटकाव उसके स्वभाव में था, उसकी शायरी उतनी ही सधी हुई थी।


म जानते हैं भारतीय किस कदर उत्सवधर्मी होते हैं। अभावों से उपजा दुख इस कदर उनकी रगों में बहता है कि वे दुखों को भी सेलिब्रेट करने लग जाते हैं। क्या वजह है कि उजली पूर्णिमा के साथ अंधेरी अमावस्या का भी उसी उत्साह से उत्सव मनाते हैं। हरजीत भी ऐसा ही था। दुनियादारी के पेचोखम से नावाफ़िक वो अपने अभावों का सुखों की तरह ही उत्सव मनाता। टूटी छत से चिड़िया को घर के अंदर आते देख वो कहता है-


"आई चिड़िया तो मैंने जाना/

मेरे कमरे में आसमान भी था"। 


ससे ज़्यादा आशा और उम्मीदों से भरा हरजीत के अलावा कौन हो सकता था।

सके भीतर एक बच्चे सा साफ शफ्फाक मन वास करता। तभी तो वो कठोर काष्ठ को सजीव खिलौनों का रूप दे देता। वो कहता-


"गेंद, गोली,गुलेल के दिन थे/

दिन अगर थे तो खेल के दिन थे"।


वो प्रेम से भरा रहता। जब वो प्रेम से उमगता तो कहता- 


"हम तुझे इतना प्यार करते हैं/

हम तेरी फ़िक्र ही नहीं करते"


से साथ पसंद था। दोस्ती पसंद थी। जिसको उसकी दोस्ती नसीब हुई वो कितने खुशकिस्मत थे। वो एक जगह लिखता है-


"आप हमसे मिलें तो ज़मी पर मिलें

ये तकल्लुफ़ की दुनिया मचानों की है"


क ऐसा ही दोस्त है नवीन कुमार नैथानी। वो युग्म में एक तीसरा आयाम जोड़ता है। वो अवधेश और हरजीत के साथ मिलकर दोस्ती की त्रयी बनाता है। कभी उससे मिलिए और हरजीत का ज़िक्र भर कर दीजिए। उसकी आंखों में हर्ष और विषाद एक साथ उतर आते हैं। वो किस्सों पर किस्से कहे जाता है। वो बताता है हरजीत विचारधाराओं के पचड़े में कभी नहीं पड़ा। एक बार जब उसकी ग़ज़लों को वाम सिद्ध किया जाने लगा तो उसने अपनी वही रचनाएं धर्मयुग में छपवाकर उसका प्रतिवाद किया। 

गर हरजीत की दोस्ती के चलते उसके दोस्त खुशनसीब थे तो हरजीत भी कम खुशनसीब कहां था। उसे ऐसे दोस्त मिले जो उसके जाने के बाद भी उसे हमेशा दिल में बसाए हैं। उनकी एक दोस्त हैं तेजी ग्रोवर। उन्होंने हरजीत के सारे दोस्तों को,उसके चाहने वालों को एकत्रित किया। फिर उन सबसे हरजीत की यादों को, उसके लिखे को बटोर कर एक किताब की शक्ल दे दी।  नाम है 'मुझसे फिर मिल'।

रअसल ये हरजीत को उसके चाहने वालों से,नए पाठकों से और दुनिया जहान से मिलवाने का सच्चा सा उपक्रम है। उसकी यादों को जिलाए रखने का एक बेहद संजीदा प्रयास है।

समें हरजीत के दो पूर्व प्रकाशित संग्रह 'ये पेड़ हरे हैं' और 'एक पुल' के अलावा एक अप्रकाशित संग्रह 'खेल' और तमाम अप्रकाशित गज़लें शामिल की गई। इसके अलावा उनके कई दोस्तों व अन्य लोगों के हरजीत के बारे आत्मीय उद्गार हैं और दो आलेख भी। 

नमें से एक शानदार संस्मरणात्मक आलेख सुप्रसिद्द चित्रकार लेखक जगजीत निशात का है 'हरजीत और उसका 'हरजीत' बनना'। इसमें निशात हरजीत को हरजीत बनाने के प्रक्रिया की पड़ताल ही नहीं करते बल्कि देहरादून के उसके समकालीन सांस्कृतिक माहौल को भी बखूबी उद्घाटित करते चलते हैं। 

क और संस्मरणात्मक आलेख ज्ञान प्रकाश विवेक का है। ये आलेख बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। वे लिखते हैं- 'हरजीत से मिलना किसी बहुत अच्छे मौसम से मिलने जैसा था.वह खुद किसी पेड़ जैसा था-किसी दरख़्त जैसा..... एक ऐसा दरख़्त,जिसके पत्तों पर आसमान आराम कर रहा हो,जिसकी शाखों में ज़िंदगी के संघर्ष  जुड़े हों और जड़ों में कई जोड़ी पांव हों जो उसमें आवारगी और घुमक्कड़ी का अहसास पैदा करते हों.... उसमें बेचैनियों की खुशबू थी,जज़्बात की तरलता थी। उसे अपने सबसे विकट समय में भी मुस्कुराते देखना चकित करता था"। 

वो अपने समय का बेहतरीन ग़ज़लकार था जो बेहद संवेदनशील और संवेगों से भरा था और ग़ज़ल के क्षेत्र में नया मुहावरा गढ़ रहा था। ज्ञान प्रकाश आगे लिखते हैं "हिंदी ग़ज़ल  के कूड़े में अपनी अलग पहचान कराने वाला संवेदनशील,मैच्योर और समझदार ग़ज़लकार था।"

रजीत का प्रकृति से अद्भुत जुड़ाव था। उसके पहले ही संग्रह का नाम 'ये हरे पेड़ हैं' है। वो लिखता है-


"कश्तियाँ डूब भी जाएं तो मरने वालों में

होश जब तक रहे साहिल का गुमाँ रहता है

ये हरे पेड़ हैं इनको ना जलाओ लोगों

इनके जलाने से बहुत रोज़ धुंआ रहता है"


क जगह वो लिखता है-


"हरी ज़मीन पे तूने इमारतें बो दी

मिलेगी ताज़ा हवा पत्थरों में कहाँ"


या फिर


"ज़िंदा चेहरे भी बदल जाते हैं तस्वीरों में

पेड़ मरते हैं तो ढल जाते हैं शहतीरों में"


र फिर ऐसे हरे पेड़ के शैदाई को प्रकाशन संस्थान  संभावना प्रकाशन की इससे खूबसूरत श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि इस किताब को छापने में उसने पेड़ों को नष्ट नहीं किया। किताब को गन्ने की खोई से बने कागज़ पर छापा।

ब देहरादून में महसूस होने वाला सबसे बड़ा मलाल और कमी उस महबूब शायर से ना मिल पाना है। लेकिन आप उसे यहां महसूस कर सकते हैं। यहां के साहित्यिक माहौल में वो एक अहसास सा उपस्थित रहता है।

 र ये भी कि मेरे तईं देहरादून की तमाम पहचानों में एक बड़ी पहचान हरजीत भी है। उसको जानने के बाद जब भी देहरादून जाएंगे उसकी याद तो आएगी ही और होठों बरबस गुनगुना उठेंगे कि-


"ढूंढते फिरते हैं हम उस शख़्स का पता

जिससे हों इस शहर के माहौल की बातें बहुत।"


और हरजीत आपके कानों में आकर चुपके से कहेगा -


"सोचता हूँ कहां गए वो दोनों

मेरी साइकिल वो मेरा देहरादून"




Thursday, 20 July 2023

टेनिस:एक युग का अवसान/एक युग का आगाज़



              बात 2022 की लाल मिट्टी पर खेली जाने वाली मेड्रिड ओपन प्रतियोगिता की है। इसमें एक 19 साल का नौजवान जर्मनी के एलेक्जेंडर ज्वेरेव को हराकर प्रतियोगिता जीत रहा था। क्वार्टर फाइनल में उसने राफेल नडाल को और सेमीफाइनल में नोवाक जोकोविच को हराया था।

 टेनिस इतिहास में इससे ख़ूबसूरत और क्या हो सकता था कि एक टीनएजर राफा और नोवाक को हराकर ये प्रतियोगिता जीत रहा था।

ये टीनएजर कोई और नहीं स्पेन का कार्लोस अलकराज था।

रअसल ये जीत एक नए उगते सूरज की मानिंद थी। जिसका नरम मुलायम प्रकाश बरगद के पेड़ों की घनी छाया को चीरकर टेनिस के नए भविष्य का संकेत दे रहा था। वो टीनएजर बता रहा था कि वो एक ऐसा महत्वाकांक्षी और सक्षम बिरवा है कि वट वृक्ष सरीखे नोवाक और राफा के अनुभव और काबिलियत की सघन छाया के नीचे भी सरवाइव कर सकता है। 

सके चार महीने बाद फ्लशिंग मीडोज के आर्थर ऐश स्टेडियम पर कैस्पर रड को हराकर अपना पहला यूएन ओपन ग्रैंड स्लैम जीतकर वो टीनएजर अपने पॉइंट को प्रूव कर रहा था। पूरा स्टेडियम 'ओले ओले ओले कार्लोस' से गूंज रहा था। ये टेनिस का भविष्य का थीम सांग बनने जा रहा था।

र विंबलडन तक आते आते उस बिरवे का कद काफी बढ़ गया था। अब वो अपना आकार बनाने लगा था। उसकी जड़ें ज़मीन में कुछ और गहरे धंस रहीं थीं। सुबह का नरम मुलायम सूरज आसमान में और ऊपर हो आया था। उसका प्रकाश अब इतना तेज हो गया था कि दुनिया की आंखे चौंधियाने लगी थीं।

विम्बलडन 2023 का फाइनल उम्मीद के अनुरूप   नोवाक और उस अलकराज के बीच ही खेला ही गया। 

ये मैच केवल एक फाइनल मैच भर नहीं था,बल्कि ये विरुद्धों का द्वंद था। ये दो अलग व्यक्तित्व,दो अलग खेल शैलियों,दो अलग समयों के बीच का द्वंद्व भी था। यहां अनुभव जोश के मुकाबिल था। नया पुराने के सामने था। ये अपने अपने अस्तित्व की रक्षा का मसला था। पुराना अपनी जड़ें और मजबूती से जमाए रखने की कोशिश में था और नया था कि पुराने को उखाड़ फेंकना चाहता  था।

मैदान पर पहले नंबर दो नोवाक आए और उनके पीछे नंबर एक अलकराज। 35 साल के नोवाक का अनुभवी चेहरा बाल सुलभ मुस्कुराहट से चमक रहा था,तो बीस साल के युवा अलकराज का बालसुलभ चेहरा विश्वास और गंभीरता से प्रदीप्त था। 

नोवाक साल की पहली दो ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता जीतकर यहां आए थे।उनके हिस्से अब तक कुल 23 ग्रैंड स्लैम आ चुकी थीं। ये उनकी सबसे प्रिय और अनुकूल सतह थी। वे अनुभव का टोकरा अपने साथ लिए थे। वे यहां 07 बार जीत चुके थे। इसके विपरीत अलकराज की ये पसंदीदा सतह नहीं थी। लेकिन वे नंबर एक टेनिस खिलाड़ी का तमगा अपने सीने से लगाए थे। जोश उनमें हिलोरें ले रहा था और प्रतिभा उनमें कूट कूट कर भरी थी।

मुकाबला शुरू हुआ। नोवाक ने शानदार शुरुआत की। पहला सेट 6-1 से अपने नाम किया। लगा ये मैच नोवाक के लिए 'केक वॉक' होने जा रहा है। वे संख्या 24 की तरफ दौड़ते दिखे। लेकिन कार्लोस की यही काबिलियत है कि वे कोई भी दबाव अपने ऊपर बनने नहीं देते। फिर चाहे ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने का दबाव हो या सामने नोवाक सरीखा कोई लीजेंड हो। अगले सेट में ज़ोरदार संघर्ष हुआ। टाईब्रेक अंततः अलकराज ने  8-6 से जीत लिया। अब मैच में जान आ गयी थी। नोवाक यहां थोड़े थके दिखे और अगला सेट वे आसानी  से 1-6 से हार गए। अब लगा कि मैच एकतरफा कार्लोस के पक्ष में हो चला है। तभी नोवाक अपनी फॉर्म में लौट आए और अगला सेट 6-3 से जीत कर मैच अत्यधिक रोमांचक बना दिया। अंतिम और निर्णायक सेट में नोवाक के दूसरे सर्विस गेम में कार्लोस ने नोवाक की सर्विस ब्रेक की। गुस्से में  आकर नोवाक ने नेट पोल पर मारकर अपना रैकेट तोड़ दिया। दरअसल नोवाक उसी समय हार गए थे। ये उनकी निराशा थी। मन ही मन हार जाने का संकेत। वही हुआ भी। अलकराज ने अंततः सेट 6-4 से जीतकर कैरियर का दूसरा ग्रैंड स्लैम अपने नाम कर लिया।

ये फाइनल कितना संघर्षपूर्ण और इंटेंस था,इसे इस बात से समझा जा सकता है कि तीसरे सेट का चौथा गेम लगभग 26 मिनट चला जिसमें कुल 13 ड्यूस हुए और 32 पॉइंट बने। नोवाक की सर्विस गेम को अलकराज ने जीता। ये मैच लगभग 5 घंटे तक चला। नोवाक के 166 के मुकाबले अलकराज ने कुल 168 अंक जीते। इस बात से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मैच कितना करीबी था और संघर्षपूर्ण भी।

स मैच में शानदार टेनिस खेला गया। बुलेट की तेजी सी सर्विस,शानदार ग्राउंड स्ट्रोक्, एंगुलर फोरहैंड स्ट्रोक्स,वॉली,ड्राप शॉट्स,बैक हैंड स्लैश,क्या कुछ नहीं था इस मैच में।

ये एक ऐसा मैच था जिसे दो पीढ़ियों की टकराहट के सबसे शानदार उदाहरण के रूप में हमेशा याद रखा जाएगा।

2003 से लेकर 2022 तक के 20 साल के सफर में विम्बलडन का खिताब 'फेबुलस फोर' के अलावा कोई और नहीं जीत सका था। ये अलकराज ही हैं जिसने 20 सालों के 'फेबुलस फोर'के विम्बलडन पर उनके वर्चस्व को समाप्त किया। 

जो भी हो जोकोविच अपनी हार में भी ग्रेसफुल थे। उन्होंने मैच पश्चात ऑन कोर्ट इंटरव्यू में अलकराज की खूब तारीफ की। उन्होंने कहा 20 साल की उम्र में दबाव झेलने की उनकी ताकत सराहनीय है। और क्रोशियन कोच इवान लूबिसिक की उस बात की ताईद भी की कि अलकराज में स्वयं उनके यानी नोवाक,फेडरर और राफा की खूबियों का मिश्रण है।

 पिछले सालों में 'फेबुलस फोर' ने, या कहें कि 'बिग थ्री' ने इतनी शानदार टेनिस  खेली  कि उन्होंने ज्वेरेव, सितसिपास,थिएम,मेदवेदेव जैसे खिलाड़ियों की पूरी एक पीढ़ी को लगभग खत्म कर दिया। उन्हें अपनी छाया से बाहर आने ही नहीं दिया। लेकिन उसके बाद की पीढ़ी के खिलाड़ियों-कैस्पर रड,रुन, बेरेटिनी,आगर अलिसिमे  से पार पा पाना मुश्किल होगा। हालांकि अभी भी नोवाक की फिटनेस शानदार है। उनमें बहुत टेनिस बाकी है। उन्हें अभी खारिज़ कतई नहीं किया जा सकता।

ये अलकराज की स्वप्न सरीखी यात्रा पूरी दुनिया अपनी खुली आँखों से देख रही है। ऐसी ना जाने कितनी स्वप्निल सफलताएं अभी उनके हाथ आने वाली हैं ये तो भविष्य ही बताएगा।

°°°°°°

भी तो बस कार्लोस अलकराज को उनके दूसरे ग्रैंड स्लैम की बधाई।


Thursday, 6 July 2023

अकारज_19

 


उस दिन किशोर प्रेमी युगल को देखते हुए उसने कहा 'आजकल का प्रेम भी कोई प्रेम होता है! आज प्रेम,कल ब्रेकअप। प्रेम तो हमारे ज़माने में होता था।'

मैंने उसकी ओर शरारत भरी दृष्टि से देखा और पूछा 'तुम्हारा ज़माना!'

उसने भी शरारतन कहा 'हाँ, तुम्हारे बैलगाड़ी वाले समय के बाद साइकिल वाला ज़माना।'

मेरे ओंठ मुस्कुराहट से फैल गए। मैंने फिर पूछा 'और कैसा था वो तुम्हारा साइकल वाला ज़माना!'

'हमारा ज़माना आज के मल्टीप्लेक्स,मोबाइल,ओटीटी,बाइक वाला फटाफट इंस्टा ज़माना थोड़े ही ना था। वो तो रेडियो वाला 'हौले हौले चलो रे बालमा' वाला ज़माना था।' कहते कहते उसकी आवाज़ अतीत में धंस गईं और आंखें यादों से चमक उठीं।

उसकी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं खुद अतीत में गहरे उतर आया था। मैंने कहा 'यानि तुम्हारे  समय का प्रेम धीमे धीमे सींझते हुए परिपक्व होता था। जैसे गांवों में हारे पर धीमी धीमी आंच में पकती दाल या औटता हुआ दूध।'

उसने उत्साह से भरते हुए कहा 'और क्या ! तब प्रेम खतो-किताबत से धीमे धीमे परवान चढ़ता था। क्या समय हुआ करता था वो भी। क्या प्रेम पत्र लिखे जाते थे उन दिनों। दरअसल वो समय ही 'प्रेम पत्रों' का समय था।'

फिर उसने बाल सुलभ उत्सुकता से पूछा 'तुम्हें याद है तुमने अपने पहले पत्र में क्या लिखा था?'

अब यादें अतीत के गलियारे तय करने लगीं। और फिर यादों ने उन शब्दों को अतीत की भूलभुलैया से ढूंढ निकाला। मैंने कहा 'हां वो एक लाइन की पाती थी- 'लिखे जो खत तुझे'

उसने खिलखिलाकर कहा 'और उसके बाद तुम तीन दिन कॉलेज नहीं आए थे।'

मैंने ठहाका लगाया 'तुम्हारी याददाश्त कमाल है।'

'और तुम्हें वो वाली चिठ्ठी भी याद है ना जो तुमने घर जाते हुए लिखी थी।' उसने फिर पूछा।

यादें एक बार फिर छटपटाईं और स्थिर हो गईं। मैंने मुस्कुराते हुए कहा 'वो भी वन लाइनर ही था कि 'तुम भी खत लिखना'।'

अब शरारत उसकी आँखों से उतर कर उसके ओंठों पर ठहर गई। उसने शोखी से पूछा - 'तो खत आया क्या!' इसमें  सवाल कम उत्तर अधिक था।

मैंने कहा 'हां उसमें बस इतना ही लिखा था- 'इन दिनों यहां बादल खूब बरस रहे हैं। और आंखें भी।'

वो फिर अतीत में डूब गई। एक बार प्रेम फिर आंखों से बरसने लगा। वो प्रेम की नमी से गल चुकी थी। 'तो तुमने जवाब भेजा!' उसने तरल हुई रेशम सी आवाज़ में पूछा।

 मैंने यादों के हवाले से कहा 'केवल एक शब्द लिखा था '....तुम्हारा'

वो जवाब सुन खिलखिला उठी कि पास के खिले फूलों का रंग कुछ और गहरा हो उठा। पत्तियां कुछ और हरी हो गईं। चिड़िया कुछ और चहक उठीं। घास के तिनको पर ठहरी ओस की बूंदें उसकी ऊष्मा से सुध बुध खोकर अपना अस्तित्व ही खो बैठी। सूरज कुछ और तेजस्वी हो उठा और सुबह कुछ और जवान। 

उसके स्वर में बरसों से ठहरी जिज्ञासा मुखर हो आई - 'ये तुम्हारे 'प्रेम पत्र' वन लाइनर क्यूं होते थे।'

'उन दिनों मौन अधिक वाचाल जो होता था।अनलिखा ही सब कह जो देता था।' मैंने  हँसते हुए कहा।

°°°°°°

अब पूछने को कुछ बाकी रहा भी हो तो पूछा ना गया। शब्दों ने मौन जो धारण कर लिया था। 

 मौन के बीच एक धड़कता दिल 'पाती' हुआ जाता था, दूसरा 'कलम'। कलम से शब्द शब्द प्रेम पाती पर रिसता जाता।

उधर मौन था कि 'कलम' से लिखी जा रही इस 'प्रेम पाती' को बांच रहा था। 

और 

और यादों की आंख से निकले आंसू थे कि अतीत की पीठ को भिगो भिगो जाते थे।



Wednesday, 14 June 2023

मैनचेस्टर डर्बी और सिटी का डबल



              बात सन् 1764-65 की है. जेम्स हरग्रीव्ज़ ने ‘स्पिनिंग जेनी’ नाम के एक जादुई यंत्र का आविष्कार किया. 18वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में पूरे यूरोप और विश्व में सूती कपड़े की मांग ज़ोर पकड़ रही थी. उस समय केवल आठ हज़ार की आबादी वाला इंग्लैंड का एक क़स्बानुमा शहर मैनचेस्टर सूती कपड़ों के उत्पादन का केंद्र बनने की कोशिश में था. वहां के बुनकर हस्तचालित पुराने हथकरघों से उस बढ़ती मांग को पूरा करने में ख़ुद को असमर्थ पा रहे थे. ऐसे में ‘जेनी’ ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी.

    हरग्रीव्ज़ की जेनी में आठ स्पांडल थे. यानी अब पहले जितने समय में आठ गुना सूत काता जा सकता था. इसने वहां टेक्सटाइल कारख़ानों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया. देखते ही देखते वहां बड़ी संख्या में सूती कपड़ों के कारख़ाने लग गए. उसके साथ ही कपड़ों को रंगने और ब्लीच करने के लिए ज़रूरी केमिकल्स की मांग बढ़ने से केमिकल फ़ैक्ट्री भी लगने लगीं और उन कारख़ानों के लिए आवश्यक संयंत्र बनाने के कारख़ाने भी स्थापित हुए. कच्चे माल के लाने के लिए परिवहन नहर प्रणाली का विकास हुआ और पहली रेल लाइन की स्थापना भी यहीं हुई.

    अब देश के कोने-कोने से लोग बड़ी संख्या में कारख़ानों में काम पाने के लिए मैनचेस्टर आने लगे.

    19वीं शताब्दी के शुरू होते होते मैनचेस्टर औद्योगिक क्रांति का प्रमुख केंद्र बन गया और इंग्लैंड के सबसे बड़े तीन शहरों में एक. अब उसकी आबादी तीन लाख से ऊपर हो चुकी थी. इसमें ज़्यादातर मजदूर थे जिन्हें बारह घंटों से भी अधिक समय तक कारख़ानों में काम करना पड़ता था और कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन. ऐसे में उनके मनोरंजन के साधनों की ज़रूरत महसूस होने लगी. इससे अनेक खेलों के आयोजनों की शुरुआत हुई, जिसमें घुड़सवारी से लेकर फ़ुटबॉल तक शामिल थे.

    मजदूरों के बीच फ़ुटबॉल तेजी से लोकप्रिय होने लगा. और देखते ही देखते वहां कई फ़ुटबॉल क्लब बन गए. इनमें से दो क्लब ऐसे थे, जिन्हें आगे चलकर न केवल विश्व प्रसिद्ध फ़ुटबॉल क्लबों में तब्दील हो जाना था बल्कि प्रसिद्ध खेल प्रतिद्वंद्विता में भी बदल जाना था, जिसे ‘मैनचेस्टर डर्बी’ के नाम से जाना जाना था.

   सन् 1878 में लंकाशायर व यॉर्कशायर रेलवे के मज़दूरों ने ‘न्यूटन हीथ एलवाईआर फ़ुटबॉल क्लब’ बनाया. 1892-93 में एक स्वतंत्र कंपनी बन जाने के कारण नाम से एलवाईआर शब्द हटा दिया गया. सन् 1902 तक आते आते क्लब का घाटा बहुत बढ़ गया और इसको बंद करने की नौबत आ गई. उस समय चार स्थानीय व्यापारियों ने इसमें निवेश किया और आधिकारिक रूप से इसका नाम ‘मैनचेस्टर यूनाइटेड फ़ुटबॉल क्लब’ पड़ा.

    उधर सन् 1880 में एक अन्य फ़ुटबॉल क्लब ‘सेंट मार्क्स’ (वेस्ट गोर्टन) की स्थापना हुई. सन् 1887 में इसका नाम ‘ऑर्डिक एसोसिएशन फ़ुटबॉल क्लब’ हो गया. और फिर 16 अप्रैल 1894 को ये क्लब ‘मैनचेस्टर सिटी फ़ुटबॉल क्लब ‘ नाम से जाना जाने लगा.

    इन दोनों टीमों के बीच पहला मुक़ाबला 1881 में हुआ, जिसमें न्यूटन हीथ ने सेंट मार्क्स की टीम को 3-0 से हरा दिया. ये एक दोस्ताना मैच था और प्रतिद्वंद्विता जैसी कोई बात न थी. लेकिन इसी दशक में दोनों टीमों ने प्रगति करना शुरू किया और मैनचेस्टर क्षेत्र की दो सर्वश्रेष्ठ टीमें बन गईं. इनमें से ही कोई एक टीम मैनचेस्टर कप जीतती. यहां से दोनों टीमों में श्रेष्ठता के लिए प्रतिद्वंद्विता स्थापित हो गई. और दोनों टीमों के बीच मुकाबले ‘मैनचेस्टर डर्बी’ के नाम से जाने जाने लगे. समय के साथ-साथ यह प्रतिद्वंद्विता सघन और तीव्र होती गई और विश्व भर में खेलों की और विशेषकर फ़ुटबॉल की सबसे प्रसिद्ध खेल प्रतिद्वंद्विताओं में शुमार हो गई.

    ऐसी प्रतिद्वंद्विताएं कभी भी एकतरफ़ा कहां हो पाती हैं. पलड़ा कभी इस ओर झुक जाता तो कभी उस ओर. पर कुल मिलाकर मैनचेस्टर डर्बी में रेड डेविल्स यानी यूनाइटेड का पलड़ा भारी रहा. डर्बी में अब तक कुल 190 मुकाबलों में से 78 यूनाइटेड ने और 59 सिटी ने जीते. शेष 53 मुकाबले अनिर्णीत रहे. इस दौरान यूनाइटेड ने 67 खिताब जीते तो सिटी ने 31 खिताब.

    लेकिन 2023 का साल मानो इस प्रतिद्वंद्विता का निर्णायक साल था. 142 साल पुरानी प्रतिद्वंद्विता का चर्मोत्कर्ष था. लेकिन ये साल सिटी की बुलंदियों का भी साल है.

    इंग्लैंड की सबसे प्रतिष्ठित फ़ुटबॉल प्रतियोगिताओं में एफए कप शुमार है, जो विश्व की सबसे पुरानी प्रतियोगिता है. इस प्रतियोगिता के 142 साल के इतिहास में पहली बार फ़ाइनल में मैनचेस्टर की ये दो टीमें आमने-सामने थीं. ये मैनचेस्टर डर्बी का महामुक़ाबला था. मानो ये एफए कप का फाइनल न होकर, डर्बी फ़ाइनल हो.

    यह मैच 03 जून को लंदन के वेम्बले स्टेडियम में खेला गया.

    सुप्रसिद्ध मैनेजर पेप गोर्डियाला के निर्देशन और जर्मन मिडफ़ील्डर इल्के गुंडोगन के नेतृत्व में जब सिटी की टीम हरी घास पर अपनी पारंपरिक आसमानी रंग की जर्सी में मैदान पर उतरी तो इस साल की प्रीमियर लीग की जीत के गर्व से आसमान से ऊंचे उनके सिर थे और किसी महासमुद्र से संतुष्ट और शांत प्रतीत होते थे. यह और बात है उनके सीने में प्रतिद्वंद्वियों को हराने के लिए ज़ज्बात की एक सुनामी थी.

    दूसरी और मैनेजर एरिक तेन हाग के निर्देशन में और पुर्तगाली अटैकिंग मिडफ़ील्डर ब्रूनो फ़र्नांडीज के नेतृत्व में यूनाइटेड की टीम इतिहास के अपने पक्ष में होने के गौरव की रक्तिम आभा लिए और फ़रवरी में ही ईएफएल में जीत की अग्नि से दावानल हुए प्रतिद्वंद्वी टीम को भस्म कर देने की मुद्रा में थी.

    ये आसमानी रंग के हरहराते महासागर और लाल रंग की लपलपाती दावानाल के बीच का मुकाबला जो था.

    मैच शुरू हुआ. सिटी के कप्तान गुंडोगन ने किक ऑफ़ किया. गेंद गोलकीपर के पास पहुंची. उसने जोरदार किक से बॉल को यूनाइटेड के पेनाल्टी एरिया के पास पहुंचा दिया. एक हैडर से बॉल गुंडोगन के पास पहुँची और उसने शानदार वॉली से गैंद गोल में पहुंचा दी. अभी मैच शुरु हुए केवल 13 सेकंड हुए थे. ये एफए कप फ़ाइनल का सबसे तेज गोल था.

    सिटी ने 1-0 की बढ़त ले ली थी. लगा मानो स्टेडियम में आसमानी समुद्र गर्जना कर रहा था और दहकती दावानल निस्तेज हुई जाती थी. हालांकि दावानल निस्तेज भले ही हो गई हो, पर अभी भी बहुत आग उसमें बाक़ी थी.

     इधर सिटी ने मोमेंटम बनाए रखा. जल्दी ही उसने गोल करने के दो और मौक़े बनाए. पहले ब्रुएने के फ्री किक पर रोडरी ने हैडर बाहर मार दिया. उसके तुरंत बाद हालैंड ने मौक़ा गंवाया. इधर यूनाइटेड ने गेंद पर नियंत्रण बढ़ाकर दबाव बनाना शुरू किया. एक के बाद एक कई आक्रमण किए. इसका प्रतिफल उन्हें पेनाल्टी के रूप में मिला. हालांकि ये पेनाल्टी वीएआर से मिली. कप्तान फ़र्नांडीज ने बराबरी का गोल दाग दिया. ये गोल 33वें मिनट में आया.

    दूसरे हाफ़ में 51 वें मिनट में ब्रुएने का फ्री किक एक बार फिर गुंडोगन को पेनाल्टी एरिया में मिला और एक बार फिर वॉली पर गोल कर सिटी को फिर बढ़त दिला दी. इसके बाद दोनों ही टीमों ने मूव बनाए और गोल के मौक़े भी. लेकिन अंततः मैच 2-1 से सिटी ने जीत लिया.

    मैनचेस्टर सिटी ने प्रीमियर लीग के बाद एफए कप जीत कर अपना डबल पूरा किया. ऐसा उसने दूसरी बार किया. इससे पहले ये कारनामा 2018-19 में किया था. जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी ये कारनामा तीन बार 1993-94, 1995-96 और 1998-99 में किया था.

    मैनचेस्टर डर्बी में इस बार बाज़ी सिटी के हाथ रही. लेकिन इससे बड़ी प्रतिष्ठा अभी भी दांव पर है. इस शनिवार यूएफा कप चैपियनशिप के फ़ाइनल में उसका मुक़ाबला इंटर मिलान से है. सवाल ये है कि क्या ये फ़ाइनल जीतकर सिटी अपना ट्रिपल पूरा कर पाएगी या नहीं.

    अभी तक विश्व के कुल 21 क्लब ने 29 बार ट्रिपल पूरा किया है. पर इंग्लैंड की केवल एक टीम है, जिसने ये किया है और वो सिटी की डर्बी प्रतिद्वंद्वी यूनाइटेड है जिसने 1998-99 में ये ट्रिपल किया था.

-----------------------------

    सिटी की बारी है. ये शनिवार और रविवार के बीच की जो रात है न, कम रोमांचक नहीं होने जा रही है.

याद रखिएगा!


लाजवाब जोकोविच

 


मानवीय क्षमताएं असीमित हैं। इस हद तक कि जो चीजें किसी समय अकल्पनीय लगती हैं,आगे चलकर वे यथार्थ में तब्दील हो जाती हैं। मानव ने अपने विकास क्रम में ये बात अलग अलग समय पर अलग अलग क्षेत्रों में बार बार सिद्ध की है।

 ऐसा भी होता है कि मानव की बहुत सी उपलब्धियां इस हद तक अविश्वसनीय होती हैं कि तर्कातीत हो जाती हैं। हम उनमें तब देवत्व का आरोपण कर देते हैं। 

और खेल भी इससे अछूते कहाँ रह पाते हैं। जब सचिन या पेले या माराडोना या मेस्सी या शुमाकर या माइकेल जॉर्डन या लेब्रों जेम्स या मोहम्मद अली जैसे खिलाड़ी खेलों में मानवीय क्षमताओं के तर्कातीत मानक स्थापित करते हैं तो उन्हें भगवान का दर्ज़ा दे दिया जाता है। 

बीते रविवार फिलिप कार्टियर अरीना पर 36 साल के नोवाक जोकोविच फ्रेंच ओपन के फाइनल में कैस्पर रड को 7-6(7-1),6-3,7-5 से हराकर जब अपना 23वां ग्रैंड स्लैम जीत रहे थे तो कुछ ऐसा ही अविश्वसनीय कर रहे थे। कि उस उपलब्धि को बयां करने के लिए कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं हो सकता था। उसके लिए कोई तर्क प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था। 

नोवाक अपने प्रतिद्वंदी राफा के 22 ग्रैंड स्लैम से  एक खिताब अधिक जीत रहे थे,तो राफा नोवाक को बधाई देते हुए ट्वीट कर कह रहे थे  "23 एक नंबर है जिसके बारे में कुछ समय पहले तक सोचना भी असंभव था, तुमने इसे कर दिखाया।"

निःसंदेह वे कुछ असंभव ही कर रहे थे। कुछ समय पहले तक के अकल्पनीय को हकीकत में तब्दील कर रहे थे।  वे टेनिस ही नहीं,पूरे खेल इतिहास का पुनर्लेखन कर रहे थे। एक खिलाड़ी की क्षमताओं की नई परिभाषा गढ़ रहे थे जिसका एक छोर असंभव और अविश्वसनीय शब्दों को छूता है।

याद कीजिए 2002 का यूएस ओपन। आंद्रे अगासी को हराकर पीट सम्प्रास अपना 14वां ग्रैंड स्लैम जीत रहे थे, तो टेनिस के जानकार और प्रसंशक विस्मय से भर उठे थे। वे कह रहे थे इससे अब कौन पार पाएगा। तब रोज़र फ़ेडरर आए। उन्होंने पहले 14 की बराबरी की और 20 पर जाकर रुके। लोगों को लगा ये असंभव है और तब राफा आए। 22 पर रुके। लगा ये संख्या असंभव है। लेकिन जो 22 को असंभव मान रहे थे वे एक भूल कर रहे थे। वे नोवाक को या तो विस्मृत कर रहे थे या खारिज़। और तब नोवाक आए। हां उनके आगे कौन पर लगा प्रश्रचिन्ह असीमित समय तक लगा रह सकता है,ये यकीन मानिए।

इस बात पर गौर कीजिए कि नोवाक 23 पर रुके नहीं है। वे कहां तक जाएंगे,वे कौन सी संख्या पर रुकेंगे,ये भविष्य तय करेगा। जिस तरह की उनकी फिटनेस है और जिस तरह से वे खेल रहे हैं, कोई भी संख्या असंभव नहीं है। 30 भी नहीं।

उनके 23 ग्रैंड स्लैम जीत में दो बातें उल्लेखनीय हैं। एक, आखिरी 11 खिताब उन्होंने 30 साल की उम्र के बाद जीते हैं। दो, इन सालों में उन्होंने 05 ग्रैंड स्लैम मिस किए। एकऑस्ट्रेलियन और एक अमेरिकन कोविड टीकाकरण ना कराने की वजह से एक विंबलडन कोरोना की वजह से हुआ ही नहीं और एक विम्बलडन थकान के कारण छोड़ दिया। जबकि एक अमेरिकन क्वार्टर फाइनल में गेंद बॉल बॉय को मारने के कारण डिसक्वालिफाई कर दिए गए। अन्यथा आप समझ सकते हैं वे कहां पर इस समय होते।

दरअसल  दिनांक 11 अप्रैल,2023 दिन रविवार को पेरिस के  स्थानीय समय के अनुसार लगभग शाम के चार बजे फिलिप कार्टियर अरीना पर फ्रेंच ओपन के फाइनल मुकाबले के लिए अहर्ता पाने वाले दो खिलाड़ी अलग अलग भाव भंगिमाओं से मैदान में प्रवेश कर रहे थे। 

24 साल के युवा खिलाड़ी नॉर्वे के कैस्पर रड का चेहरा आत्मविश्वास से दमक रहा था। वे क्ले कोर्ट के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं और जैसा वे दो सालों से खेल रहे थे उससे उनका आत्मविश्वास आसमान पर ना होता तो कहां होता। वे अब इस साल के संभावित विजेता माने जा रहे थे क्योंकि कार्लोस अलकराज सेमीफाइनल में हार चुके थे।

दूसरी और सर्बिया के 36 साल के किशोर नोवाक जोकोविच सारी दुनिया जहान की मासूमियत अपने चेहरे में समेटे प्रवेश कर रहे थे। लेकिन उनके मन की बेचैनी और उद्विग्नता को उनकी सारी मासूमियत भी मिलकर छिपाने में असमर्थ हो रही थी। ये इतिहास रचने की बेचैनी थी। एक ऐसे मुकाम पर पहुंचने की उद्विग्नता थी जहां तक कोई नहीं पहुंचा था। उस आसमां को छूने की लालसा थी जिसे कभी किसी ने ना छुआ हो और ना ही कोई छू सके।

खेल शुरू हुआ। पहले सेट का दूसरा गेम लगभग 11 मिनट चला। रड ने नोवाक की सर्विस ब्रेक की और अपना गेम जीतकर स्कोर 3-0 किया। लेकिन चौथे गेम में रड ने एक ओवरहेड शॉट मिस किया। यहां से मोमेंटम शिफ्ट हुआ। नोवाक रंग में आने लगे। उनके शक्तिशाली फोरहैंड शॉट्स का अब रड के पास कोई जवाब नहीं रह गया था। पहला सेट टाई ब्रेक में गया। नोवाक ने टाई ब्रेक 7-1 से जीता। फिर  अगले दो सेट आसानी से जीत लिए। जो नोवाक पहले सेट में थके से लग रहे थे। इस सेट की जीत ने उनमें अपूर्व उत्साह भर दिया। वे अगले दो सेटों में उससे एकदम अलग अपनी ऊर्जा और अपने खेल को उस ऊंचाई पर ले गए जिस तक रड नहीं पहुंच सकते थे और नहीं पहुंच पाए।

तीन घंटों के संघर्ष के बाद नोवाक के चेहरे की मासूमियत और मायूसी रड के चेहरे पर नमूदार हो गयी थी और नोवाक का चेहरा आत्मविश्वास और खुशी से दहक रहा था। लाल मिट्टी पर लाल जूतों और लाल टी शर्ट के साथ उनका चेहरा भी रक्तिम हुआ जाता था। हां इन सब के बीच उनका काला शॉर्ट्स किसी नजरबट्टू सा उन्हें बुरी नज़र से बचाता नज़र आता था।

उस जीत के बाद नोवाक नोवाक कहां रह गए थे। उनका चेहरा असीमित खुशी से दीप्त हो रहा था। वे टेनिस जगत के आकाश में सूर्य से चमक रहे थे जिसके सामने टेनिस जगत के सारे सितारे श्रीहीन हुए जाते थे। और रोलां गैरों की लाल मिट्टी नोवाक के प्रेम में पड़कर लजाती हुई कुछ और अधिक लाल हुई जाती थी।

उनकी जीत दरअसल एक डिफाईनिंग मोमेंट था। एक निर्णायक पल। निर्णायक मोमेंट उस त्रिकोणीय संघर्ष का जिसके दो अन्य कोण फेडरर और राफा बनाते थे। 2003 में शुरू हुए फेडरर और राफा की प्रतिद्वंदिता को 2010 में नोवाक त्रिकोणीय आयाम देते हैं और फिर तीनों मिलकर पिछले बीस सालों के काल को टेनिस इतिहास के स्वर्णिम काल में बदल देते हैं।

अगर आप ध्यान से देखेंगे तो ये प्रतिद्वंदिता खेल शैलियों भर की नहीं है,बल्कि तीन अलग अलग व्यक्तित्वों की भी है। वे अपनी खेल शैली और अपने पूरे व्यक्तित्व से तीन अलग वर्गों का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं। आप इन तीनों के व्यक्तित्व का आंकलन कीजिए तो पाएंगे कि  रोजर फेडरर मैदान में और मैदान के बाहर अपनी शालीनता, अपने ग्रेस और एस्थेटिक सेंस में कुलीन प्रतीत होते हैं। टेनिस ख़ुद ही अपने चरित्र में कुलीन है। टेनिस खेल और फेडरर का टेनिस दोनों क्लासिक हैं और क्लासिकता को पोषित करते हैं। फेडरर टेनिस के मानदंडों के क़रीब क्या, वे स्वयं मानदंड हैं। वे टेनिस के सबसे प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं। जबकि राफा अपने चेहरे मोहरे,वस्त्र विन्यास और अपने चपल,चंचल,अधीर स्वभाव जिसमें हर शॉट पर ज़ोर से आवाज़ करना और हर हारे या जीते पॉइंट पर प्रतिक्रिया करते मध्य वर्ग के प्रतिनिधि से प्रतीत होते।

इन दोनों से अलग नोवाक जातीय भेदभाव का शिकार होते हैं और अपने क्रियाकलापों और हाव-भाव से सर्वहारा वर्ग के प्रतीत होते हैं। वैसे भी उनका बचपन बेहद विषम परिस्तिथियों से गुजरा है। उनका पूरा बचपन बाल्कान संघर्ष के बीच बीता है। जब वे बड़े हो रहे थे तो वे अपना समय बंकर में बिता रहे थे। परिस्थितियों ने उन्हें अजेय योद्धा बनाया। वे खेल मैदान में अंतिम समय तक संघर्ष करते हैं और अंतिम समय तक हार नहीं मानते। 

उनकी अपनी सोच और मान्यताएं उन्हें विवादास्पद और अलोकप्रिय के साथ साथ आम से जोड़ती है। वे कोविड टीकारण के खिलाफ थे। वे कोसोवा के उस मंदिर में जाकर शक्ति और शांति पाने जाते हैं जिसके बारे में मान्यता है कि वो एक दैवीय स्थल है। वे पिछले 10 वर्षों से ग्लूटन  रहित खाना खा रहे हैं। जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

लेकिन आप कह सकते है कि वे अपनी मान्यताओं के प्रति लॉयल हैं। उसके लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं। वे अपने टीकाकरण ना करने पर दृढ़ रहे। इसकी कीमत दो ग्रैंड स्लैम थी।

ट्रॉफी प्रेजेंटेशन सेरेमनी में वे लाल काली जैकेट में आए जिसकी दाईं और 23 लिखा था। विक्ट्री स्टैंड पर एक हाथ में मस्केटियर ट्रॉफी थी और दूसरे हाथ से 23 नंबर की ओर इशारा कर रहे थे। 


वे बता रहे थे कि टेनिस इतिहास में ये एक अनोखी,अद्भुत और अविश्वसनीय संख्या है। और ये भी मैं नोवाक हूँ। मुझे जान लीजिए। ये संख्या मैंने और केवल मैंने अर्जित की है।

और

और,वे बता रहे थे कि मैं आप की तरह हाड़ मांस का बना व्यक्ति हूँ। मुझे भगवान मानने की भूल मत करना। और ये भी कि निश्चिंत रहिए मुझमें अभी भी बहुत टेनिस बाकी है। नई पीढ़ी को अभी और काबिलियत हासिल करनी है। पुरानों का समय अभी खत्म नहीं हुआ है। हम वे वटवृक्ष हैं जिनके साये से निकलने में बहुत मेहनत लगती है।

--------------------

फिलहाल तो 23वे ग्रैंड स्लैम की बधाई स्वीकार करो दोस्त।

Tuesday, 7 March 2023

आग और पानी


 

ज़्यादातर लोग किसी शहर में रहते भर हैं। लेकिन कुछ लोग उस शहर में जीते हैं,उस शहर को जीते हैं। वो शहर उनमें और वे शहर में घुल जाते हैं।  शहर उनकी आत्मा में उतर जाता है और वे शहर की आत्मा में। शहर उनकी शिराओं में खून की माफ़िक बहने लगता है। फिर किसी एक दिन वो शहर कलम की मार्फत शब्द शब्द सफ़े दर सफ़े उतरता जाता है और शहर एक खूबसूरत किताब में तब्दील हो जाता है। 

ऐसी ही एक किताब को हम नाम 'आग और पानी'के नाम से जानते हैं। शहर है बनारस। और उसका रहवासी व्योमेश शुक्ल एक दूसरे में घुले हुए। व्योमेश बनारस को जीते हैं और बनारस उनमें। वही बनारस जब उनके दिल से होता हुआ उनकी कलम से शब्द दर शब्द बाहर आता तो 'आग और पानी' में तब्दील ना हो जाता तो और क्या हो जाता।

व्योमेश से कभी मिला नहीं। फेसबुक पर उन्हें फॉलो करता हूँ। उसी से जाना वे आला दर्ज़े के रंगकर्मी हैं। वे मंच पर खूबसूरत और भव्य दृश्य बनाने में सिद्धहस्त हैं। वे अपनी लेखनी से भी बनारस शहर के ऐसे ही खूबसूरत दृश्य बनाते।

किताब की सबसे सुंदर बात ये है कि इसमें कुछ लंबे आलेख हैं,साक्षात्कार है,ससंस्मरण हैं, चरित्र चित्रण हैं और स्निपेट्स भी हैं। ये विविधता रुचती है,मन मोहती है। इसमें संगीत अंतर्धारा के रूप में बहता है,कंटेंट में भी और भाषा में भी। संगीत और संगीतकारों पर कितना कुछ है और कितना समृद्ध करता चलता है आपको। और हो भी क्यों ना।  वे राम की शक्तिपूजा जैसे कालजयी रचना की देशभर में लाजवाब  संगीतमयी प्रस्तुति देते हैं। संगीत के निःसंदेह जानकार हैं और इसीलिए उनके गद्य में लय है, वो किसी संगीत सा बहता है।

'आग और पानी' दरअसल बनारस के सांस्कृतिक इतिहास का दस्तावेज है।

जब आपको कुछ अच्छा मिलता है तो और ज़्यादा की आस होने लगती है। बनारस केवल धार्मिक सांस्कृतिक नगरी भर नहीं है। इसलिए कुछ मिसिंग लगता है। बनारस और भी बहुत कुछ है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और सीमांत बिहार की आर्थिक राजधानी है ये। घाट हैं, पंडे हैं। नाव हैं, नाविक हैं।   जुलाहे हैं,बनारसी साड़ियां हैं। विश्वनाथ मंदिर है,ज्ञानवापी मस्जिद है। बुद्ध हैं,सारनाथ है। और भी बहुत कुछ है बनारस। व्योमेश की नज़र और उनकी कलम से देखना निश्चित ही रोचक होगा।

°°°°

और अंत में एक बात रुख़ प्रकाशन की। अब तक दो किताबें पढ़ी हैं। एक 'आग और पानी'। दूसरी सुशोभित की 'मिडफील्ड'। दोनों बेहतरीन किताबें हैं। कंटेंट से भी और रूप सज्जा से भी। किताबों पर खासी मेहनत की गई है। आवरण से लेकर प्रिंटिंग तक। सबसे बड़ी बात प्रूफ की गलती सिरे से नदारद है जो आज के समय की बड़ी बहुत बड़ी बात है। पढ़ने का आनंद द्विगुणित हो जाता है। निःसंदेह बेहतरीन पुस्तकों के लिए अनुराग वत्स भी बधाई के पात्र हैं।

Friday, 17 February 2023

अलविदा बलरामन



ये एक युग का अवसान है। एक सितारे का दुनिया की नज़रों से ओझल हो जाना है। भारतीय फुटबॉल की शानदार परंपरा का थोड़ा और छीज जाना है। उसके गौरव का कालातीत हो जाना है। ये भारतीय फुटबॉल की सुप्रसिद्ध त्रयी की आखिरी मूर्ति का ढह जाना है। भारतीय फुटबॉल के एक सबसे शानदार खिलाड़ी तुलसी बलरामन ने 86 वर्ष की उम्र में इस संसार को अलविदा जो कह दिया है। दरअसल ये एक त्रासद मायूस और अपमानित जीवन का अंत भी है।

बीती शताब्दी के 50 और 60 के दो दशकों का समय भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम युग था। और पीके बनर्जी,चुन्नी गोस्वामी और तुलसी बलरामन उस समय के सबसे चमकते सितारे थे जिन्होंने अपनी प्रतिभा से भारतीय फुटबॉल को उसके चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया था। वे भारतीय फुटबॉल की एक त्रयी बनाते हैं। वे भारतीय फुटबॉल के ब्रह्मा विष्णु महेश ठहरते थे।

पिछले तीन सालों में भारतीय फुटबॉल के इन तीन सर्वश्रेष्ठ फरवार्डों ने, तीन दोस्तों ने, भारतीय फुटबॉल के तीन 'मोशाय बाबुओं' ने एक एक करके इस दुनिया को अलविदा कह दिया। सबसे पहले 20 मार्च 2020 को पीके दा गए। फिर उसी साल 30 अप्रैल को चुन्नी गोस्वामी गए। और अब 16 फरवरी 2023 को तुलसी बलरामन। इन तीनों ही ने भारतीय फुटबॉल के मक्का कोलकाता को अपनी कर्मभूमि बनाया और यहीं से इस नश्वर संसार से विदा ली। बलराम भले ही जन्मना बंगाली ना हो,उन्होंने जन्म हैदराबाद राज्य के सिकंदराबाद के एक गांव में लिया हो, लेकिन उन्होंने ज़िंदगी भर कोलकाता में खेला और उसके ही एक उपनगर उत्तरपाड़ा को रिहाइश के लिए चुना।


नियति किस तरह से जीवन को त्रासद बना सकती है और उसे अंतर्विरोधों से भर सकती है,ये जानना हो तो एक बार बलराम के जीवन को ज़रूर देखना चाहिए। पीके और चुन्नी की तरह ही उन्होंने शानदार फुटबॉल खेली,उसे समृद्ध किया और नाम कमाया,लेकिन उन्हें कभी भी अपना दाय नहीं मिला। वे कभी भी उस तरह की प्रसिद्धि नहीं पा सके ,उस तरह का सम्मान नहीं पा सके जिस तरह का उनके दोनों साथियों को मिला। विशेष रूप से खेल से सन्यास लेने के बाद। उनकी हमेशा उपेक्षा हुई। अपमान हुआ।

न्हें अर्जुन पुरस्कार के अलावा कोई पुरस्कार नहीं मिला। उनके दोनों साथियों को पद्मश्री मिला। उन्हें नहीं। एक बार इसके लिए बहुत सारी औपचारिकताएं भी पूरी कर ली गईं पर एन समय पर उन्हें उससे वंचित कर दिया गया। ये बिल्कुल वैसे ही था जैसे किसी के मुँह में जाते कौर को छीन लिया जाए। ऐसे ही उन्हें एक बार चयनकर्ता बनाया गया, लेकिन टीम बिना उनकी जानकारी के चुन ली जाती। ऐसे अपमान के अनेक उदाहरण हैं जब भारतीय फुटबाल प्रशासन ने उनकी उपेक्षा की एआ अपमान किया।

वे 'फुटबॉलिङ्ग सेंस' और प्रतिभा के धनी थे लेकिन जन्म से बहुत गरीब थे। जब 18 साल की उम्र में उन्हें एक स्थानीय प्रतियोगिता में खेलते देख लीजेंड कोच सैय्यद अब्दुल रहीम ने उनकी प्रतिभा पहचान उन्हें संतोष ट्रॉफी के लिए ट्रायल के लिए आमंत्रित किया तो उनके पास अपने घर बोलाराम से हैदराबाद आने के लिए पैसे नहीं थे। बाद में खुद रहीम साब ने उन्हें पैसे दिए।

ये बात 1956 की है। उनका संतोष ट्रॉफी के लिए हैदराबाद की टीम में चयन हो गया। उस साल ये प्रतियोगिता एर्नाकुलम में सम्पन्न हुई थी और फाइनल मैच हैदराबाद और बॉम्बे के बीच खेला गया। मैच अनिर्णीत रहा तो दुबारा खेला गया। इस मैच में बलराम ने शानदार खेल दिखाया। ये भारतीय फुटबॉल के नए सितारे का उदय था। उस मैच में वे आउटसाइड लेफ्ट की जगह इनसाइड राइट की पोजीशन पर खेल और 4-1 की हैदराबाद की जीत में दो गाल किए। 

सी साल उनका चयन भारतीय टीम में हो गया। उन्होंने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मैच 1956 में मेलबोर्न ओलंपिक में यूगोस्लाविया के खिलाफ खेला और अगले 6 सालों तक भारतीय फुटबॉल टीम के अनिवार्य और महत्वपूर्ण खिलाड़ी बने रहे। 1956 से 1962 का ये समय भारतीय फुटबॉल का स्वर्णकाल माना जाता है। इस दौरान वे 1956 के मेलबोर्न और 1960 के रोम ओलंपिक,1958 के  एशियन खेल और 1962 के जकार्ता एशियन खेल में स्वर्ण पदक विजेता टीम और 1959 में मर्देका प्रतियोगिता की उपविजेता टीम के सदस्य रहे।

न्होंने भारत के लिए 26 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले और कुल आठ गोल किए। लेकिन ये आंकड़े उनकी प्रतिभा की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं करते। वे बिला शक भारत के सार्वकालिक महानतम खिलाड़ियों में एक थे। ये वो समय था जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टोटल फुटबॉल आकार ले रही थी और क्रुयफ़ की अगुवाई में हॉलैंड की फुटबॉल टीम को इसका सर्वश्रेष्ठ निदर्शन करना था। उस समय बलराम टोटल फुटबॉल खेल रहे थे जो लेफ्ट विंग, राइट विंग, सेंटर या अटैकिंग मिडफील्डर किसी भी पोजिशन पर खेल सकते थे। उनका बॉल पर गज़ब का नियंत्रण होता था और  वे शानदार ड्रिबलिंग करते और इतनी गति से करते कि किसी भी विपक्षी टीम के लिए उन्हें रोकना मुश्किल होता। वे शानदार पासिंग करते। खिलाड़ियों की पोजीशन का वे सटीक अंदाज़ लगा लेते। उनकी शानदार पासिंग के लिए एक बार सुप्रसिद्ध फुटबॉलर अरुण घोष ने कहा था कि 'उनकी पीठ पर भी दो आंखें हैं।' जबकि उनकी विपक्षी खिलाड़ी से गेंद पुनः छीन लेने और तीव्र गति से काउंटर अटैक की उनकी काबिलयत के कारण दूसरे सुप्रसिद्ध फुटबॉलर सुभाष भौमिक उन्हें फ्रांस के हेनरी थियरी के समकक्ष रखते हैं।

गर आपको उनकी गति और ब्रिलियंस देखनी है तो 1960 के रोम ओलंपिक के हंगरी के खिलाफ मैच की रिकॉर्डिंग देखिए। हंगरी ने ग्रुप में फ्रांस को 6-1 और पेरू की टीम 7-2 से हराया था। लेकिन भारतीय टीम को बमुश्किल 2 -1 से हरा पाई। इसमें बलराम ने अद्भुत खेल दिखाया और गेंद पर अद्भुत नियंत्रण और गज़ब की गति भी। उन्होंने 79वें मिनट में भारत के लिए गोल किया। वे इतना शानदार खेल और इतनी गति से खेल रहे थे कि हंगरी के लिए उनको रोक पाना बहुत कठिन हो रहा था और वे बार बार फिजिकल हो रहे थे। उनका एक और अविस्मरणीय मैच 1958 के एशियन खेलों में हांगकांग के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मैच है। ये मैच रेगुलर समय तक 2-2 की बराबरी पर था जिसे भारत ने अतिरिक्त समय 5-2 से जीता। अतिरिक्त समय में बलराम ने चोट के बावजूद एक गोल किया और दो असिस्ट की।

न्होंने क्लब कॅरियर की शुरुआत 16 साल की उम्र में 1954  में  हैदराबाद की आर्मी कॉम्बैट फ़ोर्स की टीम से की। 1957 में वे कोलकाता की ईस्ट बंगाल टीम में आ गए। शीघ्र ही अपने खेल और क्लब के प्रति अपनी लॉयल्टी के कारण उसके समर्थकों में ना केवल अत्यधिक लोकप्रिय हो गए बल्कि देवता की तरह पूजे जाने लगे। वे इतने लोकप्रिय थे कि जब एक बार मोहन बागान ने अपने क्लब में शामिल करने का प्रयास किया तो हज़ारों क्लब समर्थकों ने प्रदर्शन किया और मोहन बागान के प्रयास को निष्फल कर दिया। ईस्ट बंगाल के लिए उन्होंने 1957 और 1960 में डीसीएम ट्रॉफी, 1958 में आईएफए शील्ड ट्रॉफी, 1960 में डुरंड कप,1962 में रोवर्स कप जीता। 1961 में क्लब के कप्तान बने और उस साल न केवल नौ वर्ष के अन्तराल के बाद ईस्ट बंगाल को कलकत्ता लीग जितायी बल्कि आईएफए शील्ड जिताकर डबल भी पूरा किया। लीग के फाइनल में बागान के सुप्रसिद्ध डिफेंडर जरनैल सिंह को छका कर एक अविष्मरणीय गोल किया। जरनैल सिंह उन्हें सबसे खतरनाक फारवर्ड मानते थे। उन्होंने ईस्ट बंगाल क्लब के लिए कुल 104 गोल किये और 1961 में गोल्डन बूट खिताब से उन्हें नवाजा गया।

 1963 में  आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से ईस्ट बेंगाल छोड़कर बीएनआर(बेंगाल नागपुर रेलवे) टीम में आ गए। लेकिन सांस की बीमारी के कारण उन्हें शीघ्र ही खेल को छोड़ना पड़ा।

निसंदेह वे एक शानदार खिलाड़ी थे जिन्होंने भारतीय फुटबॉल को उनके मुकाम तक पहुंचाने में अपना प्रतिभाग किया। लेकिन दुर्भाग्य है कि हम अपने सच्चे महानायकों का सम्मान करना नहीं जानते। हम ना तो उनके जीते जी सम्मान कर पाते हैं और ना ही मरने के बाद ही। तुलसी बलरामन एक उदाहरण भर हैं।

र इसीलिए एक ऐसा ख़िलाड़ी जिसने बहुत उत्साह से शानदार फुटबॉल खेली, खेल को ऊंचाइयों पर पहुंचाया, उसके जीवन की समाप्ति एक बहुत ही निराश,एकाकी,अभावग्रस्त और गुस्से से भरे व्यक्ति के रूप में हुई।

-----------------

लविदा लीजेंड। अलविदा बलराम ।

Monday, 30 January 2023

छोटी छोटी कहानियां का बड़ा संसार

 


खेल मैदान की अभी हाल की तीन खबरें-सानिया मिर्ज़ा के शानदार खेल जीवन का समापन,विनेश फोगाट की बगावत और अंडर 19 क्रिकेट विश्व कप में भारतीय लड़कियों की जीत,इस बात की ताईद करती हैं कि देश बदल रहा हो या नहीं, समाज बदल रहा हो या नहीं, पर लड़कियां बदल रही हैं,उनकी सोच बदल रही है और उनकी ज़िंदगी बदल रही है।

अब लड़कियों के हाथों को चूल्हा,चौका और चूड़ियां नहीं रुचती


बल्कि बैट और बॉल शोभते हैं,रैकेट शोभते हैं, मैट और मैदान शोभते हैं।

पहले अंडर 19 क्रिकेट विश्व कप जीतने वाली लड़कियों की चेहरों पर फैली खुशी देखिए और फिर उनके जीवन में झांकिए,तो आपको पता चलेगा कि ये सफलता लड़कियों की लगन,उनके परिश्रम,उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति,कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी हार ना मानने का जज़्बा और सबसे ऊपर उनकी नई और बदलती का परिणाम है।

उन लड़कियों में एक मन्नत है। गांव चिल ज़िला पटियाला। खेलने के लिए पैसा पास नहीं।  लड़कों की कोचिंग में जुगाड़ हुई तो लड़के साथ खिलाने को तैयार नहीं। पर उसने हार नहीं मानी। अड़ी रही। कोचिंग जाती रही। अब वो टीम की 'जोंटी रोड्स'है।

एक और लड़की है सोनम यादव। उम्र केवल 15 साल। पिता मजदूर। पता ज़िला फिरोजाबाद,उत्तर प्रदेश। देश दुनिया की लड़कियों की कलाइयों को सजाने वाली चूड़ियां बनाने के लिए विश्व प्रसिद्ध शहर की इस लड़की को कांच की चूड़ियों की जगह रास गुगली। जीवन की पिच पर भी और खेल की पिच पर भी।

एक लड़की है फलक नाज़। संगम नगरी प्रयागराज की ही नहीं देश की शान बन चुकी है अब। चपरासी पिता ने नाज़ों से पाला पर नाजुक नहीं बनाया। उसकी तेज गेंदें विपक्षी बल्लेबाजों पर कहर बरपाती हैं।

इस लड़की का नाम है अर्चना। पता ग्राम रतई पुरवा ज़िला उन्नाव। पिता बचपन में छोड़ बस चले। मां ने हार नहीं मानी। नतीजा विश्व विजेता भारतीय टीम की जान।

एक लड़की दिल्ली की-श्वेता सहरावत। वॉलीबॉल,बैडमिंटन,स्केटिंग तक में हाथ आजमाया। पर रास आया क्रिकेट। नतीजा विश्व कप में 140 की स्ट्राइक और 99 की औसत से सर्वाधिक 297 रन।



भोपाल की सौम्या तिवारी। कपड़े धोने की थपकी से गली मोहल्ले में क्रिकेट खेलने से लेकर भारतीय टीम के उपकप्तान का सफर करने वाली लड़की। एक योद्धा लड़की। कोच द्वारा कोचिंग देने से इनकार करने पर भी हार ना मानने वाली लड़की। नतीजा विश्व कप के फाइनल में विजयी रन बनाने वाली बैटर।

और अंत में, कप्तान शेफाली वर्मा।  15 साल और 285 दिन की सबसे कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय अर्धशतक बना कर सचिन का रिकॉर्ड तोड़ने वाली लड़की। अंडर 19 विश्व कप,सीनियर विश्व कप और राष्ट्रमंडल प्रतियोगिता के फाइनल में खेलने वाली अकेली खिलाड़ी।

छोटी छोटी लड़कियों की ये छोटी छोटी कहानियां उनके बड़े बड़े सपनों और बड़े बड़े संघर्षों की कहानियां हैं। ये छोटी छोटी जगहों की छोटी छोटी कहानियां सफलता का इतना बड़ा संसार रचती हैं कि उन्हें खुद भी कहाँ विश्वास हो पाता होगा। क्या पता उनका खुद का रचा संसार उन्हें ही 'लार्जर दैन लाइफ' प्रतीत होता हो।

-------------

और हां, भारत में दो लड़कियों के एक पिता को लड़कियों की ये सफलता बरसात की पहली फुहार  की भीगी भीगी रेशम सी मुलामियत का अहसास ना कराती होगी तो और क्या कराती होगी।

Saturday, 28 January 2023

सानिया मिर्जा : स्पोर्ट्स आइकॉन

                                (गूगल से साभार)

 आखिर क्या होता है खेल को 'अलविदा' कहना। खेल से 'सन्यास' लेना। इसे हम,आप या कोई भी खेल प्रेमी कहां समझ पाएंगे। उनके लिए इसे समझ पाना इसलिए मुमकिन नहीं होता कि मैदान से उनका एक चहेता रुखसत होता है,तो दो और खिलाड़ी उसकी जगह भरने को आ जाते हैं।  प्रसंशक हैं कि पहले को भुला नए के साथ हो लेते हैं।

र एक खिलाड़ी के लिए ऐसा कहाँ संभव होता है। खेल से सन्यास का मतलब एक आम आदमी के लिए चाहे जो हो, लेकिन एक खिलाड़ी के लिए ये उसकी सबसे प्रिय वस्तु से विछोह है। एक यात्रा का अंत है। अपने सबसे प्रिय सपने का अचानक से लुप्त हो जाना है। एक ऐसा सपना जो उसके दिल में जन्मा और बरसो बरस बड़े जतन से पाला पोसा और फिर अचानक एक दिन उससे दूर कहीं बहुत दूर चला जाता है। फिर कभी ना मिल पाने को। 

ये अंत है। ये बिछोह है। ये दुख है। ये संताप है। ये भय भी है।

च तो ये है 'खेल से सन्यास' की इस 'पर्वत सी पीर'को सिर्फ और सिर्फ वो खिलाड़ी ही समझ और महसूस कर पाता है जो खेल से सन्यास लेता है। उसे अलविदा कहता है। 

से समझना है तो एक बार महान इतावली फुटबॉलर फ़्रांचेस्को तोत्ती के विदाई वक्तव्य को ध्यान से देखें। वे एएस रोमा से 25 साल खेलने के बाद खेल को अलविदा लेते हुए कह रहे थे- "आपको पता नहीं है पिछले दिनों में पागलों की तरह अकेले में बैठकर कितना रोया हूँ। काश कि मैं कविता लिख पाता। लेकिन ये मुझे नहीं आता। पिछले 25 सालों से में फुटबॉल के मैदान में पैरों की ठोकर से कविता लिखने की कोशिश कर रहा था,और अब सबकुछ खत्म हो गया है।....अब मैं घास की गंध को इतने करीब से नहीं अनुभव कर पाऊंगा। अब जब मैं दौडूंगा तो सूर्य मेरे चेहरे को ऊष्मा नहीं देगा। मैं बार बार खुद से पूछ रहा हूँ मुझे इस सपने से क्यूं जगाया जा रहा है। लेकिन ये सपना नहीं सच है,और अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मैं डर गया हूँ। मुझे डरने की मोहलत दीजिए।"

सौरव गांगुली अपनी किताब 'एक सेंचुरी काफी नहीं'मैं अपने सन्यास के बारे में लिख रहे थे "मेरे दिल में तरह तरह के जज़्बात थे। मैं बेहद गमज़दा था मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा प्यार दूर जा रहा था।"

बीते सितंबर लंदन में लेवर कप के बाद सन्यास लेते समय के महानतम टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर को जार जार रोते हुए देखिए तो एहसास होगा कि एक खिलाड़ी के खेल से सन्यास के मायने क्या होते हैं। 

फिर बीते शुक्रवार, 27 जनवरी 2023 को मेलबर्न पार्क के रॉड लेवर अरीना में भारत की सानिया मिर्ज़ा की आखों से बहते पानी को देखिए। और एक खिलाड़ी को खेल से विदा कहने का मतलब समझिए।

स दिन मिश्रित युगल के फाइनल में ब्राजील के लुईसा स्तेफानी और राफेल मतोस की जोड़ी से 6-7(2-7),2-7 से हार जाने के बाद ट्रॉफी प्रेजेंटेशन स्पीच में सानिया के साथी खिलाड़ी रोहन बोपन्ना कह रहे थे "ये सच है, सानिया के साथ खेलना स्पेशल है। हमने पहला मिश्रित युगल उस समय साथ खेला था जब वो 14 साल की थी और खिताब जीता था। आज यहां हम आखिरी ग्रैंड स्लैम मैच खेल रहे हैं। दुर्भाग्य से हम खिताब नहीं जीत सके। लेकिन शुक्रिया उस सब के लिए जो तुमने भारतीय टेनिस के लिए किया।" पास खड़ी सानिया थी कि अपने आसुंओं को बहने से रोकने की असफल कोशिश किए जा रही थीं। और आंसू थे कि बहे जाते जाते थे।

                               (गूगल से साभार)

सानिया की आंखों के ये आंसू हार के आंसू नहीं थे बल्कि ये अपने पैशन अपने सपने अपनी ज़िंदगी के सबसे अज़ीज हिस्से से बिछोह से उपजे दुख के आंसू थे। हालांकि वे कह रही थीं "अगर मैं रो रहीं हूँ ये दुख के नहीं खुशी के आंसू हैं। मैं विजेताओं की खुशी के रंग को भंग नहीं करना चाहती।"वे ऐसी ही हैं । इतनी ही उद्दात्त। दुख ऐसे ही उद्दात्त बना देता है मनुष्य को।

ये 36 वर्षीया सानिया का आखिरी ग्रैंड स्लैम मैच  था। उनके 18 साल लंबे खेल जीवन का समापन। खेल से सन्यास। भले ही औपचारिक रूप से उनका आखिरी प्रतियोगिता फरवरी में दुबई इंटरनेशनल हो। पर वास्तव में  उनके खेल जीवन का वास्तविक समापन यही था। 

न्होंने खेल से विदा कहने को वही मैदान चुना जहां से उन्होंने अपने ग्रैंड स्लैम कॅरियर की शुरुआत की थी साल 2005 में। तब वे तीसरे राउंड तक पहुंची थी। जहां वे उस साल की चैंपियन सेरेना विलियम्स से हार गईं थी। वे हार ज़रूर गई थीं। लेकिन इस हार ने उनमें विश्वास भरा था कि उनके लिए एक खुला आसमां सामने है उड़ान भरने के लिए। उस मैच के बाद सेरेना ने रिपोर्टर्स  से बात करते हुए कहा था "मैं विशेष रूप से भारत से एक खिलाड़ी को इतना अच्छा खेलते हुए देखकर रोमांचित हूँ। उसका खेल बहुत सॉलिड है और वह अभी केवल 18 साल की है। उसका भविष्य उज्जवल है।"

6 साल की उम्र से टेनिस खेलना शुरू करने वाली सानिया सीनियर वर्ग में खेलने से पहले ही जूनियर स्तर पर अनेक उपलब्धि हासिल कर चुकी थी। जूनियर लेवल पर 10 एकल और 13 युगल खिताब वे जीत चुकी थीं जिसमें 2003 का  जूनियर विम्बलडन युगल खिताब भी शामिल था जो उन्होंने एलिसा क्लेबिनोवा के साथ जीता था।

2005 में ऑस्ट्रेलियन ओपन में खेलने के बाद  फरवरी में हैदराबाद में डब्ल्यूटीए खिताब जीता और कोई डब्ल्यूटीए खिताब जीतने वाली वे पहली भारतीय महिला बनी। उसी साल वे यूएस ओपन में प्री क्वार्टर फाइनल तक पहुंची जहां अंततः चैंपियन मारिया शारापोवा से हारीं। उस साल की सफलता ने उन्हें 2005 की 'डब्ल्यूटीए नवोदित खिलाड़ी' के खिताब से नवाजा। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने व देश के लिए अनेक उपलब्धियां हासिल कीं।

गस्त 2007 में उन्होंने 27वीं रैंकिंग हासिल की। सौ के अंदर रैंकिंग हासिल करने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं। इससे पहले केवल दो भारतीय पुरुष खिलाड़ी, रमेश कृष्णन (उच्चतम 23वीं) और विजय अमृतराज (उच्चतम 18वीं), 30 के अंदर रैंकिंग हासिल कर सके थे। अगले चार सालों तक वे 35वीं रैंकिंग के भीतर रहीं और दुनिया की श्रेष्ठ महिला खिलाड़ियों में उनकी गणना होती रही। 2012 में कलाई में चोट के बाद एकल को छोड़कर पूरी तरह युगल खिलाड़ी बन गईं। उन्हें अपने कॅरियर के शीर्ष पर जो पहुंचना था। उन्होंने डबल्स में 6 ग्रैंड स्लैम खिताब जीते। 2009 में ऑस्ट्रेलियन ओपन और 2012 में फ्रेंच ओपन महेश के साथ और 2014 में यूएस ओपन ब्राज़ील के ब्रूनो सोरेस के साथ मिश्रित युगल के तीन खिताब।

हिला युगल में भी उन्होंने तीन ग्रैंड स्लैम जीते। उनकी सबसे सफल और शानदार जोड़ी स्विट्जरलैंड की मार्टिना हिंगिस के साथ बनी जिसे 'संतीना'के नाम से जाना गया(सानिया का SAN और मार्टिना का TINA)। इस जोड़ी ने ना केवल 14 खिताब जीते जिसमें 2015 के विम्बलडन और यूएस तथा 2016 का ऑस्ट्रेलियन खिताब शामिल हैं बल्कि लगातार 44 मैच जीतने का रिकॉर्ड भी बनाया।

स दौरान वे 91 हफ्तों तक डबल्स की नंबर एक खिलाड़ी रहीं और अपने खेल जीवन में कुल 43 डब्ल्यूटीए खिताब जीते।

वे एक असाधारण खिलाड़ी थीं जिन्होंने अपनी उपलब्धियों और अपने खेल से भारत में टेनिस के स्वरूप को ही बदल दिया। वे मार्टिना नवरातिलोवा और स्टेफी ग्राफ के खेल को देखते हुए बड़ी हो रही थीं और उनके समय तक विलियम्स बहनें परिदृश्य पर आ चुकी थीं। उन्होंने भी आक्रामक खेल को अपनाया। उनके फोरहैंड शॉट बहुत शक्तिशाली होते थे। वे उनके समकालीन किसी खिलाड़ी जितने ही शक्तिशाली होते। सर्विस रिटर्न्स भी बहुत शक्तिशाली और कोणीय होते। दरअसल उनके खेल की एक कमजोरी थी कोर्ट में मूवमेंट की। उनका कोर्ट में मूवमेंट बहुत धीमा था और इसकी भरपाई अपने शक्तिशाली फोरहैंड और आक्रामक खेल से करतीं। उनके पहले तक भारत में टेनिस एक एलीट और नर्म मिजाज़ खेल  था  जिसे सानिया ने पावर और रफ टफ खेल में बदल दिया।

क्रामकता, बिंदासपन और साफगोई उनमें जन्मजात थी और उनके स्वाभाविक चारित्रिक गुण। वे जितनी आक्रामक मैदान में प्रतिद्वंदी के प्रति होती, उतनी ही आक्रामक मैदान के बाहर अपने विरोधियों के प्रति। वे अपेक्षाकृत संभ्रांत परिवार से थीं इसलिए उन्हें उस तरह से संसाधनों के अभावों का सामना नहीं करना पड़ा जैसे अमूमन भारतीय महिला खिलाड़ियों को करना पड़ता है। फिर उनके माता पिता हर समय उनके साथ खड़े रहे। 

रअसल उनके संघर्ष दूसरी तरह के थे। वे महिला थी और मुस्लिम भी। और वे एक ऐसे ग्लैमरस खेल को चुन रही थीं जिसके ड्रेसकोड को लेकर रूढ़िवादी परंपरागत मुस्लिम समाज सहज नहीं हो सकता था। उनका विरोध होना स्वाभाविक था। और खूब हुआ। उनके खिलाफ फतवे जारी किए गए। 2005 में वे केवल 18 साल की थीं और उस साल सितंबर में कोलकाता में सनफीस्ट ओपन खेलने गईं तो उनके कपड़ों को लेकर पहला  फतवा जारी किया गया। लेकिन वे गईं वहां। वे वहां कड़ी सुरक्षा में रहीं। एक 18 साल की लड़की जो चारों और से सुरक्षा घेरे में रहती हो कैसी मानसिकता में जी और खेल रही होगी। लेकिन वो किसी और मिट्टी की बनी थी। उसने 'गिव अप'नहीं किया। उसने टेनिस की ऑफिसियल ड्रेसकोड का पालन किया। स्कर्ट और शॉर्ट में खेली। उसने साहसिक इबारत वाली टी शर्ट पहनने से भी गुरेज नहीं किया। 

विवाद और विरोध उसके साथ साये की तरह थे। फिर वो हॉफमैन कप के एक मैच के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप हो,विवाह पूर्व संबंधों का या पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक का उनके साथ विवाह पूर्व हैदराबाद में रहना हो या उनके साथ विवाह का हो,उन्होंने सभी का सामना किया और आगे बढ़ीं।  खेल प्रशासन और टीम कम्पोज़िशन को लेकर भी विवाद हुए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने हर बार स्टैंड लिया और स्पष्ट स्टैंड लिया।

नका सबसे बड़ा और स्पष्ट स्टैंड महिलाओं की स्थिति को लेकर था। अखबारों में कहा गया कि सानिया मिर्जा मानती हैं  'भारत में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता।' इस बात पर उनकी कड़ी आलोचना हुई। पर उन्होंने कहा 'मैने ये नहीं कहा भारत में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता। अगर ऐसा होता तो मैं आज यहां नहीं होती। लेकिन मैं बहुत भाग्यशाली हूँ,बहुत ज़्यादा। लेकिन हज़ारों अन्य स्त्रियां इतनी भाग्यशाली नहीं हैं। उनका शारीरिक और यौन शोषण होता है और उन्हें अपने सपनों को पूरा करने की आज़ादी नहीं है क्योंकि वे स्त्रियां हैं।' आज भी उनका स्टैंड स्पष्ट है। 

पीटी उषा के बाद वे भारत की सबसे बड़ी स्पोर्ट्स वीमेन आइकॉन थीं। सानिया मैरी कॉम और साइना नेहवाल के साथ स्टार स्पोर्ट्स वोमेन की त्रयी बनाती हैं। पीवी सिंधु उनके बाद आईं। अपने साहसिक,कभी हार ना मानने,सतत संघर्ष शील और फेमिनिस्ट सानिया नई पीढ़ी की भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी प्रेरणा स्रोत हैं। तभी तो स्टार रेसलर विनेश फोगाट जो खुद खेल प्रशासन और डब्ल्यूएफआई के बाहुबली और दबंग माने जाने वाले अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली उनके सन्यास पर इतनी खूबसूरत बात कह सकीं कि "शुक्रिया सानिया,युवा भारतीय लड़कियों की एक पूरी पीढ़ी को ये बताने के लिए कि सपने कैसे देखे जाते हैं।उनमें से मैं भी एक हूँ। आप तमाम चुनौतियों के बीच पूरे जुनून के साथ खेलीं। आपका दाय भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए बहुत मायने रखता है। सम्मान और बधाई !"

-----------

खेल मैदान में हमेशा तुम्हारी कमी खलेगी। नई पारी के लिए बहुत बधाई सानिया

अफ्रीका के धावक

  ये 24 सितंबर 2023 का दिन था। दुनिया के तमाम हिस्सों में अलग-अलग देश और खिलाड़ी खेलों में अपना परचम लहरा रहे थे या उसका प्रयास कर रहे थे।  ...