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Thursday, 23 January 2025

प्रयाग का कुम्भ मेला

 

(25जनवरी,2025 दैनिक हिंदुस्तान)

भारतीय संस्कृति मूलतः उत्सवधर्मी है। इसमें उत्सवों का विशेष महत्व है। वर्ष भर यहां अलग अलग अवसरों पर इतने उत्सव और मेलों का आयोजन होता है कि शायद ही दुनिया के किसी कोने में होता हो। और कुंभ मेले का आयोजन इसका सबसे बड़ा प्रमाण। 

कुम्भ मेला विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला ही नहीं है, बल्कि हिंदुओं की धार्मिक परम्पराओं का,उनकी धार्मिक आस्थाओं का और उनके धार्मिक विश्वासों का सबसे बड़ा शाहकार भी है। इतना ही नहीं ये उनकी इस जीवन के पार पारलौकिक दुनिया के बारे में विश्वासों और धारणाओं के अतिरेक का प्रमाण भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो इतनी बड़ी संख्या में लोग तमाम असुविधाओं,परेशानियों,यहां तक की जीवन के जोखिम को उठाकर भी अपने इस जीवन के साथ साथ परलोक को भी साधने के लिए इसमें भाग लेने क्यों आते।  दरअसल इस मेले में एक अजब सा आकर्षण है जिससे वशीभूत हो दुनिया के कोने कोने से लोग खिंचे चले आते है। वे भी जिनकी इसमें आस्था है और वे भी जिनकी कोई आस्था नहीं है।

जीवन के प्रति अपने नज़रिए,रीति रिवाज़ों,परम्पराओं और मान्यताओं के कारण हम भारतीय पूरे संसार में यूं ही नहीं अनोखे समझे जाते हैं,अद्भुत समझे जाते हैं। गज़ब का जीवट और धैर्य होता है हम में। हम कई बार अतिवाद के ऊपरी छोर पर पहुँच कर पागलपन की चौहद्दी लांघते से लगते हैं। जीवन के सुख दुःख को इतनी समदृष्टि से देखते हैं कि दुखों का भी खुशियों की तरह उत्सव मनाते हैं। पूर्णिमा की उजली रात की तरह अमावस्या की स्याह रात का भी महा उत्सव रचते हैं। और कुम्भ मेला इसका प्रतिरूप है। इस मेले में भारतीय जनमानस के धार्मिक सांस्कृतिक जीवन भर को ही नहीं जाना जा सकता है बल्कि उसके मानस (pshyche) को भी समझा जा सकता है।


चार स्थानों पर लगने वाले ये कुम्भ मेले अपने उद्भव और अंतर्वस्तु में समान हैं। समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश वाली कथा,अखाड़े,उनकी शोभा यात्राएं,पेशवाई,शाही स्नान,भजन कीर्तन,प्रवचन,लाखों श्रद्धालु, साधु संत और श्रद्धा व आस्था की बहती अबाध  धारा। इन चारों स्थानों नासिक, उज्जैन,हरिद्वार और प्रयाग के मेले एक जैसी अंतर्वस्तु और धार्मिक भावना से अनुस्यूत होने के बावजूद अपनी प्रकृति और चरित्र में बहुत भिन्न हैं! और निसंदेह प्रयागराज में लगने वाला  कुम्भ मेला बाकी सब मेलों से से अलग, अनोखा और महत्वपूर्ण है। गंगा यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों के पवित्र संगम पर आयोजित होने के कारण इसके विशिष्ट धार्मिक महत्व के कारण ही नहीं, बल्कि अपने पूरे  स्वरूप के कारण भी।

प्रयागराज का कुम्भ मेला माघ मास में आयोजित होता है। यूं तो संगम तट पर हर साल माघ मेला आयोजित होता है और कुम्भ मेले को इस माघ मेले के वृहत और विस्तारित रूप देखा समझा जा सकता है। माघ मास में प्रयागराज की इस पावन भूमि पर कल्पवास का विधान है। कल्पवास का विधान प्रयागराज की विशिष्टता है। यहां कल्पवासी पूरे एक माह संगम की रेती पर शुचिता और संयम के साथ रहकर अपनी आत्मा को निर्मल और पवित्र करने का उपक्रम करते हैं। दरअसल ये कल्पवास का विधान केवल लोगों के मन की अधीरता को ही नहीं थामता है, वरन मेले की गतिशीलता को भी एक ठहराव प्रदान करता है। मेले के बाहरी भौतिक कलेवर के भीतर वैराग्य की एक अंतर्धारा मेले में प्रवाहित करता है। यही प्रयागराज के कुम्भ मेले की विशिष्टता बन जाती है। प्रयाग में भक्त अपनी भागती दौड़ती ज़िन्दगी में भी यहां आकर ठहर जाते हैं। ये एक माह का कल्पवास इस ठहराव का सबसे बड़ा वक्तव्य बन जाता है।

मेले की बाहरी गतिशीलता और शोर के भीतर जो ठहराव,निश्चिंतता और शांति की निर्मिति प्रयागराज के कुम्भ मेले में होती है,वो केवल कल्पवास के विधान भर से नहीं होती,बल्कि इसका भूगोल और प्रकृति भी रचती है। यहां गंगा बिना किसी बंधन या रुकावट के अपने प्राकृतिक बहाव में हैं। गंगा मां पहाड़ों से उतर कर यहां तक आते आते शांत चित्त हो जाती हैं,बेहद सुकून में,मंद मंद गति से अपनी मस्ती में बहती हुई। इसीलिए वहां के माहौल में गति नहीं है। गतिहीनता की स्थिति है,एक ठहराव है। वहां गंगा भक्तों में भी कोई हड़बड़ी या जल्दबाजी नहीं दीखती। वे ठहर जाना चाहते है और ठहरते भी हैं। शायद यही कारण है कि एक माह के कल्पवास का प्रावधान केवल यहीं है। 

एक और बात, यहां के मेला क्षेत्र का कोई भी निर्माण पक्का या स्थायी है ही नहीं।(हालांकि इस बार कुछ पक्के घाटों का निर्माण किया गया है) यहां तक कि मुख्य स्नान घाट संगम नोज भी हर बार अपना स्थान बदल लेता है। चारों तरफ रेत ही रेत है और  घाटों पर रेत की बोरियां हैं,पुआल है। ये सब यहां के ठहराव के ही अनुरूप है और वातावरण को और अधिक गतिहीन करते हैं। और ये सब मिलकर इस मेले को कहीं अधिक कोमल और पवित्र स्वरूप प्रदान करता है। अधिक सहज और सरल बनाते हैं,स्नानार्थियों के अनुभव को और आनंददायक बनाते हैं।

इस मेले का मूल स्वर अभी भी काफी हद तक ग्रामीण है। अभी भी परंपराओं का निर्वहन होता है। प्रयागराज के कुम्भ मेले में मनोरंजन और देशाटन की भावना अंतर्निहित होते हुए भी धार्मिक भावना प्रधान है।


 इसकी तुलना में हरिद्वार के कुम्भ मेले को देखिए।    हरिद्वार में मानव ने गंगा के प्राकृतिक बहाव को अवरुद्ध कर उस को बांधने का प्रयास किया। उसकी एक धारा को मोड़कर अपने अनुसार दिशा दी और उसके किनारों को ईंट,पत्थर और सीमेंट से बांधकर उसे नियंत्रित करने का प्रयास किया। नाम दिया 'हर की पैड़ी'। वहां गंगा का बहाव बहुत तीव्र है। उस वेग से जो ध्वनि वहां गूंजती है उससे बाज वक्त एक सिहरन सी पैदा होती है। ऐसा लगता है मानो इस बंधन से गंगा मां नाराज हैं, उद्विग्न हैं। इस बंधन से मुक्ति के लिए वेग से वहां से निकल जाना चाहती हैं। वहां पूरे वातावरण में एक अंतर्निहित गतिशीलता है। पूरा वातावरण ही गतिशील है। यहां सिर्फ गंगा ही गतिशील नहीं हैं बल्कि गंगा भक्त भी उतने ही गतिशील लगते हैं। यहां स्नानार्थी भी एक तरह की जल्दी में लगते हैं। कोई ठहराव नहीं है। उन्हें जल्द से जल्द स्नान पुण्य अर्जित कर शीघ्रातिशीघ्र वापस जाना है। 

हरिद्वार में सारे निर्माण स्थायी हैं। पक्के घाट हैं। यहां भरपूर चकाचौंध है। यहां रंग बिरंगा प्रकाश है। ये रोशनी यहां अंधेरा खत्म करने से कहीं ज़्यादा सजावट के लिए है। कुल मिलाकर पूरा माहौल एक प्रकार की कृत्रिमता लिए हुए है। प्रगति का,आधुनिकता का सूचक है और यहां के माहौल की अंतर्निहित गतिशीलता को और गति प्रदान करता है। हरिद्वार में हर जगह ईंट और पत्थर हैं और उसकी कठोरता है।

 एक ही कथा से उद्भूत और एक जैसी अन्तर्वस्तु लिए दो जगह लगने वाला एक ही मेला भूगोल और इतिहास के चलते अपनी प्रकृति में कितने अलग लगने लगते हैं।

यहां यूं तो पूरे कुम्भ में और विशेष रूप से विशिष्ट तिथियों पर आयोजित शाही स्नान के अवसर पर स्नानार्थियों का अपार जनसमूह स्वयं संगम का प्रतिरूप रचता है। परेड ग्राउंड और संगम क्षेत्र के मध्य बांध पर खड़े होकर इस दृश्य को देखना अपने आप में अनोखा अनुभव है। शहर में दक्षिण और पच्छिम  दिशाओं से आने वाले यात्रियों के लिए परेड क्षेत्र से होकर आने वाला काली मार्ग संगम क्षेत्र में प्रवेश का मुख्य मार्ग होता है तो दूसरी और उत्तर से शहर में प्रवेश करने वाले यात्रियों के लिए दारागंज से होकर बाँध के नीचे वाला समानांतर मार्ग है जो बाँध के ठीक नीचे काली सड़क से मिलता है। दोनों तरफ से अनवरत जन प्रवाह आता है। जो मिलकर जनसैलाब का रूप धारण करता है। चारों तरफ नरमुंड ही नरमुंड चमकते हैं। ये बिलकुल गंगा यमुना के संगम सा दृश्य प्रस्तुत करता सा प्रतीत होता है। उत्तर दिशा से दारागंज से आता जनप्रवाह मानो गंगा हो जिसमें  दक्षिण दिशा से परेड होकर काली मार्ग से आता यमुना जैसा अपेक्षाकृत बड़ा जनप्रवाह बाँध के नीचे दारागंज से आने वाले जनप्रवाह में मिलकर एक विशाल जनप्रवाह का निर्माण करता है। 

दरअसल प्रयागराज का कुम्भ मेला एक ऐसा कैनवास है जिस पर ऐसे ही अनगिनत अद्भुत, अनोखे और आनंददायक अनुभवों,दृश्यों और फ्रेमों से भारतीय समाज के धार्मिक जीवन और उसकी उत्सवधर्मिता का चित्र अंकित होता है।

लेकिन दुख इस बात का है कि इसके मूल स्वरूप के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। पूरे मेले पर व्यावसायिकता हावी हो रही है। चकाचौंध बढ़ रही है। मनोरंजन तत्व हावी हो रहा है और धार्मिकता विमुख। सादगी और सरलता का स्थान चालक दमक और क्लिष्टता ले रही है। संख्या बल पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। 

शायद प्रशासन की प्राथमिकताएं गलत दिशा में जा रही हैं। हर स्थान और आयोजन की एक सीमा होती है। उस सीमा का अतिक्रमण होने पर कितना भी प्रयास क्यों ना किया जाए,अव्यवस्था उत्पन्न होती ही है। प्रयागराज के कुम्भ मेले में बिना प्रचार प्रसार के ही करोड़ों लोग अपनी आस्था के वशीभूत स्वयं आते हैं। ये संख्या कम नहीं है। लेकिन प्रशासन का लक्ष्य अधिकाधिक संख्या बल है। अब मेला क्षेत्र दोगुने से भी अधिक कर दिया गया है। विशिष्ट तिथियों पर बहुसंख्या को संगम नोज आने ही नहीं दिया जाता बल्कि बहुत दूर पर स्नान कराकर वापस भेज दिया जाता है। संगम तक आने के लिये मीलों पैदल चलना पड़ता है। होना ये  चाहिए कि संख्याबल बढ़ाने के बजाए जो लोग आ रहे हैं उन्हें संगम क्षेत्र में आने का अवसर मिले और इस क्रम में उन्हें कम से कम असुविधा हो। इस क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए।

लेकिन आम जनता इन असुविधाओं की आदी होती है।  इन परेशानियों से दो चार होना उसकी नियति है। उसके लिए उसकी धार्मिक मान्यताओं के निर्वहन में ये असुविधाएं तो कुछ भी नहीं,असुविधाओं का पहाड़ भी सामने हो तो उसे भी लांघने का हौसला और जूनून रखती हैं। 

और आम जनता का जूनून और उसकी मेले में सहर्ष भागीदारी से ही कुम्भ मेला एक अद्भुत अहसास बनता है। इसी से तो पता चलता है कि कुम्भ मेला भारतीयों की धार्मिक आस्था और विश्वास  का,उनके हर्ष, उल्लास,उनकी सामूहिकता,विश्व बंधुत्व की भावना का शाहाकार ही नहीं है बल्कि उनकी अतिवादिता का,जो पागलपन की सीमा को छू छू जाती है, का भी उदाहरण है। ये कुम्भ मेला  एक ऐसा बयान है जो उस भारतीय मानसिकता को निदर्शित करता है जिसमें वे देश का अवाम दुःख और अभावों के इस कदर आदी हो जाता है कि सुख के अभाव में दुखों का भी उत्सव गान करता हैं और  पूर्णिमा की उजली रात की तरह अमावस की स्याह रात का भी उत्सव राग बुनता है।



Wednesday, 21 April 2021

कुंभ मेला:हरिद्वार और प्रयाग



             कुम्भ मेला विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला ही नहीं है बल्कि हिंदुओं की धार्मिक परम्पराओं का,उनकी धार्मिक आस्थाओं का और उनके धार्मिक विश्वासों का सबसे बड़ा शाहकार भी है। इतना ही नहीं ये उनकी इस जीवन के पार पारलौकिक दुनिया के बारे में विश्वासों और धारणाओं के अतिरेक का प्रमाण भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो इतनी बड़ी संख्या में लोग तमाम असुविधाओं,परेशानियों,यहां तक की जीवन के जोखिम को उठाकर भी अपने इस जीवन के साथ साथ परलोक को भी साधने के लिए इसमें भाग लेने क्यों आते!

           दरअसल इस मेले में एक अजब सा आकर्षण है जिससे वशीभूत हो दुनिया के कोने कोने से लोग खिंचे चले आते है। वे भी जिनकी इसमें आस्था है और वे भी जिनकी कोई आस्था नहीं है। चार स्थानों पर लगने वाले ये कुम्भ मेले अपने उद्भव और अंतर्वस्तु में समान हैं। समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश वाली कथा,अखाड़े,उनकी शोभा यात्राएं,पेशवाई,शाही स्नान,भजन कीर्तन,प्रवचन,लाखों श्रद्धालु, साधु संत और श्रद्धा व आस्था की बहती अबाध  धारा। इन चारों स्थानों के मेलों का तो पता नहीं पर क्या ही कमाल है कि प्रयाग और हरिद्वार के मेले एक जैसी अंतर्वस्तु और धार्मिक भावना से अनुस्यूत होने के बावजूद अपनी प्रकृति और चरित्र में कितने भिन्न हैं!

        हरिद्वार में मानव ने गंगा के प्राकृतिक बहाव को अवरुद्ध कर उस को बांधने का प्रयास किया। उसकी एक धारा को मोड़कर अपने अनुसार दिशा दी और उसके किनारों को ईंट,पत्थर और सीमेंट से बांधकर उसे नियंत्रित करने का प्रयास किया। नाम दिया 'हर की पैड़ी'। वहां गंगा का बहाव बहुत तीव्र है। उस वेग से जो ध्वनि वहां गूंजती है उससे सिहरन पैदा होती है। ऐसा लगता है मानो इस बंधन से गंगा  नाराज हैं, उद्विग्न हैं। इस बंधन से मुक्ति के लिए वेग से वहां से निकल जाना चाहती हैं। वहां पूरे वातावरण में एक अंतर्निहित गतिशीलता है। पूरा वातावरण ही गतिशील है। यहां सिर्फ गंगा ही गतिशील नहीं हैं बल्कि गंगा भक्त भी उतने ही गतिशील लगते हैं। यहां स्नानार्थी भी एक तरह की जल्दी में लगते हैं। कोई ठहराव नहीं है। उन्हें जल्द से जल्द स्नान पुण्य अर्जित कर शीघ्रातिशीघ्र वापस जाना है।

              इसके उलट प्रयाग में देखिए। वहां गंगा बिना किसी बंधन या रुकावट के अपने प्राकृतिक बहाव में हैं। वहां गंगा शांत चित्त लगती हैं,बेहद सुकून में,मंद मंद गति से अपनी मस्ती में बहती हुई। इसीलिए वहां के माहौल में गति नहीं है गतिहीनता की स्थिति है,एक ठहराव है। वहां गंगा भक्तों में भी कोई हड़बड़ी या जल्दबाजी नहीं दीखती। वे ठहर जाना चाहते है और ठहरते भी हैं। शायद यही कारण है कि एक माह के कल्पवास का प्रावधान केवल यहीं है। ये एक माह का कल्पवास इस ठहराव का सबसे बड़ा वक्तव्य है। प्रयाग में भक्त अपनी भागती दौड़ती ज़िन्दगी में भी यहां आकर ठहर जाते हैं।



            हरिद्वार में सारे निर्माण स्थायी हैं। पक्के घाट हैं। यहां भरपूर चकाचौंध है। यहां रंग बिरंगा प्रकाश है। ये रोशनी यहां अंधेरा खत्म करने से कहीं ज़्यादा सजावट के लिए है। कुल मिलाकर पूरा माहौल एक प्रकार की कृत्रिमता लिए हुए है। प्रगति का ,आधुनिकता का सूचक है और यहां के माहौल की अंतर्निहित गतिशीलता को और गति प्रदान करता है।

            इसके उलट आप प्रयाग को देखिए। यहां के मेला क्षेत्र का कोई भी निर्माण पक्का या स्थायी है ही नहीं। यहां तक कि मुख्य स्नान घाट संगम नोज भी हर बार अपना स्थान बदल लेता है। हरिद्वार में हर जगह ईंट और पत्थर हैं और उसकी कठोरता है तो प्रयाग में हर और रेत ही रेत है और उसकी कोमलता है,सहजता है सरलता है। यहां के घाटों पर रेत की बोरिया हैं और पुआल है। ये सब यहां की ठहराव के ही अनुरूप है और वातावरण को और अधिक गतिहीन करता है।

           दरअसल हरिद्वार और प्रयाग के कुम्भ का अंतर पश्चिम और पूरब का अंतर है,आधुनिकता और पररम्परा का अंतर है,शहरी और ग्रामीण संस्कृति का अंतर है। हरिद्वार में धार्मिकता अंतर्निहित होते हुए भी मनोरंजन और देशाटन की भावना प्रमुख है और प्रयाग में मनोरंजन और देशाटन की भावना अंतर्निहित होते हुए भी धार्मिक भावना प्रधान है।

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एक ही कथा से उद्भूत और एक जैसी अन्तर्वस्तु लिए दो जगह लगने वाला एक ही मेला भूगोल और इतिहास के चलते अपनी प्रकृति में कितने अलग लगने लगता है!


हरिद्वार कुम्भ_2021


कल यानी 14 तारीख को बैसाखी के अवसर पर हरिद्वार कुम्भ का शाही स्नान पर्व हरिद्वार कुम्भ का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। आकाशवाणी देहरादून को इस का आंखों देखा हाल प्रसारित करना है। आज शाम पूरी टीम पहुंच चुकी है। हम लोग हर की पैड़ी के घाट का जायजा लेने घूमने निकले हैं।हमें उम्मीद थी कि घाटों पर भारी भीड़ होगी। लेकिन उम्मीद के विपरीत काफी कम भीड़ है। शायद आम दिनों में भी इतने ही लोग रहते होंगे। दुकानदारों के चेहरों पर खासी  मायूसी है और सुरक्षाकर्मी रिलेक्स दीख रहे हैं। भीड़ कम होने का कारण शायद कल सम्पन्न हो चुका  सोमवती अमावस्या का स्नान हो या फिर कोरोना भी हो। हां जितने लोग दिखे वे सभी करने से बेफिक्र ही दिखे। 

और हां अगर आप हरिद्वार में हैं और हर की पैड़ी पर हैं तो मोहन पूरी वाले की दुकान का स्वाद लेना ना भूलें। अगर आपको पूड़ी के साथ आलू पसंद हैं वो भी हींग के तड़के के साथ तो अपरान्ह में आएं और पूरी के साथ कद्दू की भाजी पसंद है तो पूर्वाह्न में आएं। बेसन-सूजी का हलवा और पुए का कॉम्बो मीठे के शौकीनों को तृप्त कर सकता है। बाकी लस्सी और गुलाब जामुन तो हैं हीं।

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हां ये कोरोना का काल है,इसका ध्यान ज़रूर रखें।

Wednesday, 6 February 2019

ये अमावस्या की स्याह रात का महा उत्सव है

ये अमावस्या की स्याह रात का महा उत्सव है
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जीवन के प्रति अपने नज़रिए,रीति रिवाज़ों,परम्पराओं और मान्यताओं के कारण हम भारतीय पूरे संसार में यूं ही नहीं अनोखे समझे जाते हैं,अद्भुत समझे जाते हैं। गज़ब का जीवट और धैर्य होता है हम में। हम कई बार अतिवाद के ऊपरी छोर पर पहुँच कर पागलपन की चौहद्दी लांघते से लगते हैं। जीवन के सुख दुःख को इतनी समदृष्टि से देखते हैं कि दुखों का भी खुशियों की तरह उत्सव मनाते हैं। पूर्णिमा की उजली रात की तरह अमावस्या की स्याह रात का भी महा उत्सव रचते हैं।
        इन दिनों प्रयाग में कुम्भ चल रहा है और 4 फरवरी को मौनी अमावस्या थी। इस बार ये सोमवार को थी यानी सोमवती अमावस्या। ये संयोग काफी दिनों में पड़ता है और सरकार,मीडिया और निसंदेह आम जनता भी इसे महा उत्सव की तरह मनाने को आतुर थी और मनाया भी।लेकिन किस तरह !


03 फरवरी 02 बजे 

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आकाशवाणी को मकर संक्रांति के बाद मौनी अमावस्या स्नान पर्व और शाही स्नान का सजीव आँखों देखा हाल प्रसारित करना था। कमेंट्री से जुड़े लोग पहले ही कुंभ क्षेत्र पहुंच चुके हैं। लगभग डेढ़ बजे हम नौ लोग जिसमें कमेंटेटर और साथी अधिकारी लोग थे,तीन गाड़ियों से मेला क्षेत्र के लिए रवाना होते हैं।दो गाड़ियों पर पास है,एक पर नहीं। हम लोग आशंकित हैं पता नही गाड़ी कहां रोक दी जाय और फिर अपने मेला क्षेत्र स्थित कैम्प तक पहुंचने के लिए कितना पैदल चलना पड़े। आशंका थोड़ी दूर चलते ही सच साबित होती है। हिन्दू होस्टल चौराहे पर बैरिकेड लगे हैं। गाड़ियों को यहां रोका जा रहा है। संगम की यहां से दूरी 6 किलोमीटर से भी ज़्यादा है।यहां से लोगों की पैदल यात्रा शुरू होती है। अब बड़ी संख्या में लोग पैदल जाते दिखाई दिखाई देने लगे हैं। लोग पहले कोशिश करते हैं कि गाड़ियां आगे जा सकें लेकिन असफल होने पर उतर कर पैदल चल पड़ते हैं। एक हल्की सी निराशा की लकीरें उनके चेहरों पर उभरती हैं,पर गंगा दर्शन और उसमें डुबकी लगाने के उत्साह में वे कहीं छिप सी जाती हैं। हमें मीडिया पासधारी होने का लाभ मिलता है। हमारी गाड़ियाँ आगे बढ़ती हैं। जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जाते हैं, पैदल स्नानार्थियों की संख्या भी बढ़ती जाती है। सबमें बस एक ही आतुरता परिलक्षित होती है संगम पहुंचने की। बालसन चौराहे पर फिर बेरिकेडिंग है। हम पुलिस से बहस करने से बचने के लिए अल्लापुर का रास्ता पकड़ लेते हैं और बाघम्बरी गद्दी होते हुए दारागंज जाने वाली सड़क पर परेड ग्राउंड प्रवेशद्वार पर पहुंचते हैं। आश्चर्यजनक रूप से यहां पर तैनात पुलिसकर्मी मीडिया पास दिखाने पर सहजता से जाने देते हैं और हम लोग काली सड़क क्रॉसिंग पहुंचते हैं। काली सड़क पूरी तरह से संगम जाने वाले स्नानर्थियों से भरी चल रही है। सड़क पर तिल रखने की जगह नहीं है। हमें इन्हें चीर कर आगे बढ़ना है,लेकिन ये संभव नहीं हो पा रहा है। लोगों का अनवरत  प्रवाह है। उस प्रवाह में एक लय है। सब एक गति से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसा लगता है मानो कोई नदी बह रही हो  जिसमें पानी की जगह मानव प्रवाहित हो रहे हैं। उस प्रवाह का गंतव्य संगम स्थल की है जिसमें वे खुद को विलीन कर देना चाहते हैं। हम गाड़ी से उतर कर उस पार खड़े सिपाहियों के पास जाते हैं। उनसे उस पार लगी बेरिकेडिंग हटा कर जाने देने का आग्रह करते हैं। वे सहजता से मान जाते हैं और बड़ी मशक्कत के बाद उस मानव प्रवाह को रोकते हैं और हम आगे बढ़ते हैं। इसके बाद दो और जगह बेरिकेडिंग हैं,किसी तरह हम उन्हें पार करते हैं। अंततः  बांध के नीचे त्रिवेणी सड़क वाली टी पर पहुंचते हैं जहां रास्ता पूरी तरह बंद है। हम लोग गाड़ियां वापस भेज देते हैं। यहां से कैम्प पास ही है।

03 फरवरी रात्रि 08 बजे
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रात्रि के आठ बजे हैं। हम 5 साथी अक्षयवट मार्ग स्थित अपने टावर को देखने के बहाने संगम तक घूमने निकलते हैं। ये यमुना का उत्तरी किनारा है। किले से लेकर संगम तक यमुना के उत्तरी किनारे पर लगभग 50 मीटर चौड़ाई में पुआल बिछी है।उस पर कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं हैं।गाम गिराम के लोग समूहों में यहां उपस्थित हैं। अधिसंख्य क्या लगभग सभी समाजार्थिक दृष्टि से निम्न निम्न मध्यम वर्ग से हैं। तमाम बैठे बतिया रहे हैं ,बहुत से कंबल रजाई ताने सो रहे हैं।जगह जगह चूल्हे सुलगे हैं। खाना बनाने का उपक्रम हो रहा है। लिट्टी चोखा,दाल भात,खिचड़ी,चूड़ा,कुछ जगह रोटियां भी। जिनके पास बनाने का जुगाड़ नही है वे चना चबैना से काम चला रहे हैं। तो बहुत से लोग घर से ही बनवाकर लाये हैं। ये हाल सिर्फ यमुना किनारे का ही नही है बल्कि सेक्टर 3 और  4 में हर उस जगह का है जहां हुक्मरानों के कारिंदों ने लोगों को ऐसा करने की अनुमति दी है बल्कि यूं कहें कि ऐसा करने से रोका नहीं है।ठंड अपने शबाब पर है। गहराती जाती अमावस की रात में हल्की हल्की सी हवा बहने लगी है जो ठंड से लिपट कर उसकी उपस्थिति के अहसास को तीव्र से तीव्रतर कर रही है। सर के ऊपर केवल आसमान का छावा है और नीचे एक पतली पॉलीथिन का बिछौना या चादर और पुआल मिलकर लोगों को धरती से विलगाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। रेत साज़िशन पाला बदल कर ठंड के साथ हो लिया है और ठंड की मारक क्षमता को चाकू की धार की माफिक पैना कर  रहा है,और  तीक्ष्ण बना रहा है। पर क्या ही कमाल है जो उन श्रद्दालुओं पर इस बरसती ठंड और सुविधाओं की शून्य उपस्थिति का जरा भी असर हो रहा हो। वे असीम धैर्य के साथ उस दीर्घ प्रतीक्षित शुभ मुहूर्त का इंतज़ार कर रहे हैं जब वे संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाकर अपने जन्म जन्मांतरों के पाप काट देंगे और अपने इहलोक के साथ परलोक को भी साध लेंगे। इस कड़कड़ाती ठंड और विपरीत परिस्थितियों  के बावजूद लोगों के चेहरों पर असंतोष या रोष के भाव की उपस्थिति शून्य है। अगर कुछ है तो उनके चेहरों पर आतुरता है और संतोष का भाव तो छलक छलक जा रहा है। सब खुश हैं। उस कड़ाके की ठंडी रात की कठिनतम परिस्थितियां भी अपने तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी संतुष्टि के स्थायी भाव को विचलित नही कर पा रही हैं । ठीक उनके अपने जीवन की तरह। वे लगातार अभावों,कष्टों के बावजूद बेहतर दिनों की आस नही छोड़ते। अनवरत कर्म में लीन रहते हैं। इस आस में कि बस सुख उनके जीवन में आने वाला है। सुख उनके जीवन से अनुपस्थित हैं तो क्या हुआ, वे साल दर साल दुखों का ही उत्सव मना लेते हैं। आज भी ठीक वैसे ही कठिनतम परिस्थितयों के बीच अमावस की स्याह रात का भी पूर्णिमा की उजली रात की तरह उत्सव मनाने की अदमनीय इच्छा के वशीभूत हैं।
           
 हम लोग वापस कैम्प लौट आये हैं।
  
 3 फरवरी रात्रि 11बजकर 19 मिनट से अमावस शुरू हो गई है। ऐसी उद्घोषणाएं ध्वनि विस्तारक यंत्रो के माध्यम से लगातार प्रसारित की जा रही हैं। हम कैम्प में लेटे इनको सुन रहे हैं। नींद विचारों की भीड़ में गुम हो गई है। अर्धरात्रि के बाद भीड़ का दबाव शायद बढ़ गया है। ऐसा अनुमान हम लोग लेटे लेटे लगा रहे हैं। क्योंकि अब लोगों से अपील की जा रही है कि वे स्नान करके अपने गंतव्यों की और प्रस्थान करें। ये अपील स्वयं डीआईजी और मेलाधिकारी कर रहे हैं। उनके स्वर में व्यग्रता की उपस्थिति महसूस होती है।

04 फरवरी प्रातः 04 बजे
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प्रातः चार बजे यमुना पट्टी सड़क पर स्थित हम अपने कैम्प के गेट पर खड़े हैं। ये संगम वापसी मार्ग है।स्नानार्थियों का दबाव बढ़ रहा है। काली मार्ग और यमुना पट्टी क्रॉसिंग पर आने वाले स्नानार्थियों को रोकने के लिए लगे बैरिकेड हटा दिए गए हैं। बहुत से लोगों को जो संगम क्षेत्र में प्रवेश कर गए हैं उन्हें अलग अलग स्थानों पर डाइवर्ट किया जा रहा है।जमुना पट्टी सीधे किला घाट और यमुना किनारे जाती है। लोग वहीं नहाते हैं। संगम पर थोड़ा दबाव काम हो जाता है। मुख्य संगम स्थल वैसे भी कहाँ आम आदमियों के लिए उपलब्ध है। वो अखाड़ों के शाही स्नान के लिए आरक्षित है। इस समय तक यमुना पट्टी पर भी पाँव रखने की जगह नहीं बची है। एक तरफ से लोग संगम जा रहे हैं दूसरी और से वापस जा रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है दो रेलगाड़ियां समानांतर पटरियों पर विपरीत दिशा में जा रही हों। उफ्फ ये क्या !एक अधेड़ दम्पत्ति भीगे कपड़ों में चले आ रहे हैं। वे नहाकर बाहर आए तो उनके वस्त्र गायब थे। प्रातः चार बजे 4 /5 डिग्री तापमान में गीले अधो वस्त्र और धोती ब्लाउज में वे काँप रहे हैं। पर क्या ही कमाल है उनके चहरे पर अफसोस की शिकन नहीं है। वे दयनीय नहीं लग रहे हैं। संगम में स्नान करने से आत्मा की संतृप्ति के भाव उनके चहरे पर इसने प्रबल हैं कि उनके शारीरिक कष्ट का आभास नहीं होता है। वे एसएसपी ऑफिस का पता पूछते हैं और पता पाकर तेज कदमों से आगे बढ़ जाते हैं। पर हमारी देह काँप उठती है।

04 फरवरी प्रातः 05. 30 बजे
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सजीव कमेंटरी के चार स्थलों में से एक काली मार्ग बाँध स्थित संकट मोचन हनुमान मंदिर है। ये कैम्प के सबसे निकट है। यहां पहुँचना सबसे आसान है। इसीलिए हम थोड़ी देर से लगभग साढ़े पांच बजे वहां के लिए निकलते हैं। पांच मिनट बाद हम काली सड़क और जमुना पट्टी के क्रासिंग पर खड़े हैं। भीड़ को वहां रोक दिया है। शायद संगम पर अधिक भीड़ हो गयी है। सामने हमारा गंतव्य दिखाई दे रहा है। लेकिन हमें जाने नहीं दिया जा रहा है। हम चिंतित होते हैं। किसी तरह से सुरक्षा कर्मियों को कन्विंस करते हैं। हमें किनारे से लगे बेरिकेडिंग को लांघ कर जाने को कहा जाता है। किसी तरह से हम उसे पारकर अपने गंतव्य पर पहुंचते हैं। लेकिन इस बीच भीड़ इतनी अधिक हो चुकी है कि उसको संभाल पाना असंभव होता जा रहा है। पीछे से लगातार लोग आ रहे हैं और वहां पर रोक दिया गया है। अब धक्का मुक्की  के हालात हो गए हैं। जैसे पानी को रोकना असंभव होता है। वो अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है। ठीक वैसे ही भीड़ को रोकना मुश्किल है। भीड़ ने अब अपना रास्ता ढूंढ लिया है। 
उसने साइड में लगी बेरिकेडिंग तोड़ दी है। लोग उससे हा हा कार करते हुए इस तरह से जा रहे हैं जैसे पानी कोई बांध तोड़ कर हरहराकर बह निकलता है। सुरक्षाकर्मी अपने स्थान पर खड़े असहाय से देख रहे हैं और हम मंदिर की छत से। हम सिहर उठते हैं। पर भीड़ के हिस्सा बने बच्चों,युवाओं,महिलाओं,वृद्धों किसी के भी चहरे पर 'यहां आना गलत हुआ' जैसा कोई भाव नहीं है,कोई शिकन उनके माथे पर नहीं है। अजीब सा पागलपन उनके सिर पर सवार है,एक आतुरता चहरे पर पसरी है। 

04 फरवरी प्रातः 10 बजे
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प्रातः साढ़े पांच बजे से दस बजे तक मंदिर की छत से,जहां से हम सजीव आँखों देखा हाल प्रसारित कर रहे थे,संगम की ओर उमड़ते जन सैलाब को देख रहे थे। शहर में दक्षिण और पच्छिम  दिशाओं से आने वाले यात्रियों के लिए परेड क्षेत्र से होकर आने वाला काली मार्ग संगम क्षेत्र में प्रवेश का मुख्य मार्ग है तो दूसरी और उत्तर से शहर में प्रवेश करने वाले यात्रियों के लिए दारागंज से होकर बाँध के नीचे वाला समानांतर मार्ग है जो बाँध के ठीक नीचे काली सड़क से मिलता है। हम इसे मंदिर से साफ़ साफ़ देख पा रहे हैं। दोनों तरफ से अनवरत जन प्रवाह आ रहा है। जो हमारे सामने मिलकर जनसैलाब का रूप धारण कर रहा है। चारों तरफ नरमुंड ही नरमुंड चमक रहे हैं। ये बिलकुल गंगा यमुना के संगम सा दृश्य प्रस्तुत करता सा प्रतीत होता है। उत्तर दिशा से दारागंज से आता जनप्रवाह मानो गंगा हो जिसमें  दक्षिण दिशा से परेड होकर काली मार्ग से आता यमुना जैसा अपेक्षाकृत बड़ा जनप्रवाह बाँध के नीचे दारागंज से आने वाले जनप्रवाह में मिलकर एक विशाल जनप्रवाह का निर्माण करता है। दस बजे हमारी कमेंट्री ख़त्म होती है। अपना सामान समेट कर हम भी उस जन प्रवाह का हिस्सा बन जाते हैं। 
 यूँ तो काली मार्ग मुख्यतः संगम जाने का मार्ग है लेकिन हम सुबह से ही देख रहे थे कि इसी से बहुत से वापस भी जा रहे हैं। आने जाने वालों ने बड़ी ही ईमानदारी से आधा आधा मार्ग बाँट लिया है। हम संगम से आने वाले जनप्रवाह की विपरीत दिशा से जाने का प्रयास करते हैं क्यूँकि हमारा कैम्प मंदिर से संगम की और पड़ता है। बहाव के विरुद्ध तैरना हमेशा कठिन और कष्टप्रद होता है। यहां इसे हमने यथार्थ में घटित होते महसूसा। हम दो लोग भीड़ द्वारा संगम जाने वाले जनप्रवाह में धकिया दिए गए जबकि हमारे पांच साथी साइड के बेरिकेड को पार करने की फिराक में हैं। इस प्रयास में हमारे वरिष्ठ कमेंटेटर काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो राम मोहन पाठक बेहोश होते होते बचे। उनकी खराब होती हालत देखकर सुरक्षाकर्मियों ने आनन फानन में उन्हें साइड बेरिकेडिंग से उस तरफ कर दिया। उसी के साथ बाकी चार लोग भी उस तरफ कूद गए और अपनी जान बचाई। उधर हम दो लोग भीड़ में बिना किसीअपनी ऊर्जा खर्च किये आगे की और धकेले जा रहे हैं। बार बार भगदड़ के आसार बन रहे हैं। उस धक्का मुक्की में छूटे जूते चप्पल उस भयावहता के सबसे मुखर बयान लग रहे हैं। हमारे मुख भय से पीले हो गए हैं पर लोग हैं कि इस भयावह स्थिति में संगम में डुबकी लगाने की आतुरता से गीले हो रहे हैं। एक अजीबअधीरता से सबके चेहरे लाल  हैं। 
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मुझे सिर्फ एक ही अहसास होता है कि कुम्भ मेला भारतीयों की धार्मिक आस्था और विश्वास  का,उनके हर्ष, उल्लास,उनकी सामूहिकता,विश्व बंधुत्व की भावना का शाहाकार ही नहीं है बल्कि उनकी अतिवादिता का,जो पागलपन की सीमा को छू छू जाती है का भी उदाहरण है। ये एक ऐसा बयान है जो उस भारतीय मानसिकता को निदर्शित करता है जिसमें वे दुःख और अभावों के इस कदर आदी हो जाते हैं कि सुख के अभाव में दुखों का भी उत्सव गान करते हैं और  पूर्णिमा की उजली रात की तरह अमावस की स्याह रात का भी उत्सव राग बुनते हैं। 




नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...