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Sunday, 15 June 2025

गेट वेल सून सोनम

 



पत्रकार लेखक विपिन धनकड़ का सद्य प्रकाशित उपन्यास ' गेट वेल सून सोनम ' अभी पढ़कर अभी समाप्त किया है। ये उनकी दूसरी पुस्तक है। इससे पहले उनके रोचक अनुभवों व संस्मरणों पर एक पुस्तक 'हाउस हसबैंड ऑन ड्यूटी' आ चुकी है। 

विपिन एक ऐसे परिवेश से आते हैं जहां  कृषि भूमि का मालिक होना सबसे गौरवपूर्ण माना जाता है और खेती करना सबसे बड़ा और सुगम जीविकोपार्जन का साधन। उससे इतर पुलिस या सेना में भर्ती को लेकर भी जहां खासा रोमान होता है। उनके पास ये दोनों रास्ते सहज ही सुलभ थे। लेकिन वे पारंपरिक सोच से हटकर अपने लिए पत्रकारिता का रास्ता चुनते हैं। ये एक साहसिक निर्णय था। इससे ज्यादा साहसिक निर्णय वे तब लेते हैं जब 17 साल के जमे जमाए पत्रकारिता के करियर को छोड़ स्वतंत्र लेखन को अपनाते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं वे पत्नी को नौकरी करने और खुद के लिए 'हाउस हसबैंड'  की भूमिका चुनने का निर्णय लेते है। भारतीय समाज के पर्याप्त प्रगतिशील हो जाने के बावजूद ये अपने आप में एक साहसिक निर्णय कहा जा सकता है। 

वे हाउस हसबैंड बनने के अपने इस  निर्णय को ना केवल उजागर करते हैं,बल्कि एक हाउस हसबैंड की भूमिका को निभाने के दौरान के अनुभवों को बहुत ही ईमानदारी से कलमबद्ध करते हैं और दुनिया से साझा करते हैं।

 ये भूमिका इसलिए कि किसी भी लेखक के लिए लीक से हटकर और अधिक प्रासंगिक विषयों पर लेखन का साहस और अपने अनुभवों का ईमानदारी से अंकन उसके लेखन को प्रामाणिक बनाता है और बेहतर भी। साहस और ईमानदारी अच्छे लेखन के जरूरी गुण की तरह है। विपिन में और उनके लेखक में ये गुण खूब हैं।

इस उपन्यास के केंद्र में हमारे आस पास का  चिकित्सा परिदृश्य है। पिछले 50 सालों में  चिकित्सा परिदृश्य में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है। जैसे-जैसे उपभोक्तावादी संस्कृति हावी होती चली गई,वैसे वैसे चिकित्सा क्षेत्र एक बाजार में तब्दील होता गया जिसमें मरीज एक व्यक्ति ना रह कर ग्राहक बन गया और चिकित्सा सुविधाएं उपभोक्ता वस्तु। डॉक्टर और मरीज के बीच का जो एक मानवीय सूत्र था वो बाजार की शक्तियों के दबाव टूट गया और उन दोनों के बीच का संवेदनशील रिश्ता क्षीण होता चला गया। वे संबंध विशुद्ध रूप से क्रेता और विक्रेता के संबंधों में बदलते गए जिसमें मुख्य भूमिका उपयोगिता और मुनाफे की है। सेवा भाव का विलोप होता चला गया। 

इस उपन्यास के प्राक्कथन में जाने माने अनुवादक,लेखक,संपादक प्रभात सिंह सर इसको चिह्नते हुए लिखते हैं 'गुज़रे ज़माने के एमबीबीएस डॉक्टर मर्ज़ का इलाज तो खैर करते ही थे,हाथ में शिफ़ा होने के बाद भी उनका मानवीय चेहरा  हमेशा नुमायां रहता था,उनकी हिदायतों पर अमल ना करने वाले मरीज़ डांट भी खाते थे। बच्चों और बड़ों के इलाज के लिए अमूमन एक ही डॉक्टर के आसरे रहते थे। विशेषज्ञता वाले इस दौर में,तमाम तरह की उपलब्धियों के बीच डॉक्टर का इंसानी चेहरा कहीं छूट गया क्यों लगता है।' 

दरअसल ये उपन्यास चिकित्सा क्षेत्र की तमाम तरह की उपलब्धियों और तरक्की के बीच छूट गए इस मानवीय चेहरे को पहचानने की कोशिश है। उसको शिनाख्त करने की कयावद है। छोटी सी सही,लेकिन एक महत्वपूर्ण कोशिश। 

आज के बहुत ही विडंबनापूर्ण और चुनौती भरे समय में  चिकित्सा क्षेत्र की चालबाजियां,चालाकियां,शोषण के नित रोज ईजाद होते तरीके, सारी कमियां और दुर्गुण तो बहुत लाउड हैं। सिस्टम की सारी कठोरताएं बहुत आसानी से पहचानी जा सकती हैं। उन्हें चिह्नित किया जा सकता है। आज की असल जरूरत ही उस कोमलता को छूने की है जो इनके पीछे अभी भी मौजूद है। उसे पहचानने की जरूरत है जो मानवीयता अभी भी सांस ले रही है।

आज के नकारात्मकता के इस वातावरण में सकारात्मक चीजों को हाइलाइट करना कहीं अधिक जरूरी है। विपिन का ये उपन्यास उस जरूरत को पूरा करने का एक प्रयास है।

अस्पतालों में बाजार और मुनाफे से इतर एक पूरा  जीवन भी सांस लेता रहता है। रोजमर्रा का जीवन। आम आदमी का जीवन। उस स्थान के जीवन के समानांतर जहां वो अस्पताल स्थित है। अपने सारे दुख सुख के साथ। अपनी जिजीविषा से उम्मीद पाता हुआ। जिसमें शामिल हैं बीमार,उनके तीमारदार,नर्स,गार्ड,वार्ड बॉय,कैंटीन कर्मी,डॉक्टर और उसका स्टाफ तो है ही।

इस उपन्यास के दो भाग है। पहले भाग में नायिका सोनम के बीमार होने के पर अस्पताल में भर्ती होने से लेकर ठीक होकर वापस घर जाने की कथा और दूसरे भाग में ऑपरेशन के लिए पुनः भर्ती होने से लेकर ठीक होकर वापस घर जाने तक। पहले में केवल अस्पताल और उसका जीवन है। दूसरे भाग में अस्पताल के जीवन के साथ-साथ  फ्लैशबैक में नायक नायिका की प्रेम कहानी भी चलती रहती है।

इस उपन्यास की एक खूबी ये भी है कि इसमें वे सारे पात्र स्पेस पाते हैं जो बहुत सामान्य हैं और कहन में छूट जाते हैं या उपेक्षित रह जाते हैं,जैसे नर्सेज,वार्ड बॉय,गार्ड आदि। क्योंकि  विपिन एक पत्रकार हैं,वे विवरण प्रमाणिक देते हैं। निःसंदेह उपन्यास में अस्पताल के अंदर और बाहर के जीवन का बहुत सुंदर और सजीव चित्रण है। तमाम जगहें ऐसी हैं जो मन में कहीं अटकी रह जाती हैं। एक जगह वे लिखते हैं। 'चाय उनके लिए सिर्फ एक पेय पदार्थ ना होकर यादों का एक गुलदस्ता थी। जिसमें सुख दुख के फूल जड़े थे।' 


लेकिन ऐसा नहीं है कि इस पेशे से जुड़े स्याह पक्ष इसमें नहीं ही हैं। हैं, लेकिन संकेतों में। शुरू में ही नायिका को बेड खाली होते हुए भी मिलने में परेशानी का एक प्रसंग आता है जो साफ तौर पर बड़े अस्पतालों का मरीज को लूटने और उनकी  असंवेदनशीलता का साफ संकेत है। अनावश्यक टेस्ट कराने,लापरवाही,लूट खसोट,असंवेदनशीलता, सभी के तो संकेत हैं। वे एक जगह लिखते हैं 'अस्पताल में बीमारी के साथ बिल भी चिंता का विषय है।' एक अन्य जगह वे लिखते हैं अस्पताल में पेड़ों के पैसे हैं। जिधर देखो लटके हैं और बरस रहे हैं। नर्स,डॉक्टर,स्टाफ दिन - पैसे उठाने में लगे हैं। जितने बेड पर मरीज,उतने पेड़। हिलाओ और उठाओ।' किसी और जगह लिखते हैं ' काम के घंटे ज्यादा और सैलरी कम होना एक वैश्विक समस्या बन चुकी है और अस्पताल भी ऐसा करके मरीजों को बीमार बना रहे हैं।' 

कुल मिलाकर उपन्यास पठनीय बन पड़ा है। उसकी भाषा में रवानी है। शुरू करने के बाद एक बार में पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता। निःसंदेह विपिन संभावनाओं से भरे लेखक हैं। लिखना उनका पैशन है। निकट भविष्य में उससे कुछ और बेहतर किताबों की उम्मीद की जा सकती है।

फिलहाल इस उम्दा उपन्यास के लिए लेखक को बधाई।

Sunday, 25 August 2024

प्रोफेसर की डायरी, तदर्थवाद और प्रसार भारती का प्रोग्राम कैडर







डॉ लक्ष्मण यादव की किताब 'प्रोफेसर की डायरी' अभी पढ़कर खत्म की है। ये इस किताब का चौथा संस्करण है। पहली बार किताब 08 फरवरी 2024 को प्रकाशित होती है और 29 फरवरी को इसका चौथा संस्करण आ जाता है। इसके कवर पर नीचे एक कोने में अंकित है 20 दिन में 26 हज़ार+  प्रतियां बिकी। यानी प्रतिदिन एक हज़ार से अधिक प्रतियों की बिक्री। ये एक हैरान कर देने वाला आंकड़ा है।

यूं तो अन्याय और भ्रष्टाचार अब इतना ज्यादा और इतना सामान्य हो गया है कि ऐसी कोई खबर हमें उस तरह से विचलित नहीं करती जितना कि एक इंसान को करना चाहिए। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जब हमारी संवेदनाएं भोथरी हो चुकी हैं। लेकिन अगर इस किताब की लोकप्रियता को कोई पैमाना माना जाए तो ये पुस्तक इस बात की ताईद करती है, नहीं अभी भी हमारी संवेदना मरी नहीं है। हम अभी भी अन्याय देखकर विचलित भी होते हैं और उसे देखना समझना भी चाहते हैं।

दरअसल डॉ लक्षमण यादव को दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में 14 वर्षों तक एडहॉक अध्यापन करने के बाद नियमित करने के बजाय नौकरी से निकाल दिया जाता है। वे पैर छूने की संस्कृति के बजाय अपनी काबिलियत से नियमित होना चाहते हैं, और बकौल उनके पिछड़े और दलित वर्ग के लिए काबिलियत के आधार पर नौकरी पाना असम्भव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। उनका एक्टिविज्म भी इसका एक कारक बना। ये किताब उनके 14 वर्षों के अध्यापन के दौरान उनके द्वारा उनकी अपनी डायरी में दर्ज़ किया गया ब्यौरा है। डायरी का पहला पन्ना अगस्त 2010 का है और आखिरी 06 दिसंबर 2023 का। 

उनकी ये पुस्तक दो मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित है। एक, दिल्ली विश्विद्यालय में एडहॉक व्यवस्था और दो, नियुक्तियों में वंचित तबकों के लिए आरक्षण रोस्टर। लेकिन इन दो बिंदुओं पर केंद्रित होते हुए भी ये अपने समय और समाज को भी रेखांकित करती है। समकाल उसमें साथ-साथ दर्ज़ होता चलता है।

इन दो केंद्रीय बिंदुओं के इर्द गिर्द वंचित तबके और अन्याय से पीड़ित आम आदमी के दुख-दर्द और संघर्षों की छोटी-छोटी कहानियों के सूक्ष्म ब्यौरे कथ्य को अधिक मार्मिक और सघन बना देते हैं।

बहुत ही सहज और सरल भाषा में बिना किसी अभिव्यंजना के अभिधा में वे अपनी बात कहते हैं। लेकिन विषय इतना गंभीर और ज़रूरी है कि बात सीधे दिल पर चोट करती है। दरअसल ये हमारी या हमारे इर्द गिर्द रहने वाले हर व्यक्ति की व्यथा कथा है।

लेकिन इस किताब की एक सीमा है। बावजूद इसके कि किताब में एडहॉक लोगों के साथ अन्याय और कठिनाइयों की बात वे बखूबी उठाते हैं, इस समस्या के मूल में नहीं जाते और इस पर उतनी गंभीरता या विस्तार से विचार नहीं करते जितनी गंभीर ये समस्या है। या तो वे अपने प्रति अन्याय को शीघ्रातिशीघ्र सबके सामने लाने की उत्कंठा से प्रेरित होंगे या अपने प्रति हुए अन्याय से मिली सहानुभूति का लाभ लेना चाहते हो। वे दिसंबर 23 में नौकरी से निकाले जाते हैं और 8 फरवरी 2024 को किताब का पहला संस्करण आ जाता है। शायद उन्होंने इस किताब को लाने में जल्दबाजी की। एक वजह ये भी हो सकती है कि उनके लिए एडहॉक व्यवस्था से अधिक महत्वपूर्ण पिछड़े और दलित वर्ग की समस्याओं को रेखांकित करना हो।

जो भी हो एडहॉक व्यवस्था पर बात करना भी बहुत ज़रूरी है।

एडहॉक व्यवस्था एक पुरानी सरकारी व्यवस्था है। ये व्यवस्था सरकार की लालफीताशाही का नतीजा थी। क्योंकि सरकारी महकमों में स्थाई व्यवस्था करने में पर्याप्त समय लग जाता है। अतः जब तक स्थाई व्यवस्था हो, तब तक तदर्थ नियुक्ति से काम चलाने की व्यवस्था की गई। क्योंकि ये स्थायी नियुक्ति नहीं होती थी,इसकी चयन प्रक्रिया आसान और स्थानीय रखी गई। आगे चलकर इस व्यवस्था का भरपूर दुरुपयोग किया जाना था और इसे भ्रष्टाचार और नौकरी में बैकडोर एंट्री का जरिया भी हो जाना था। कम से कम शिक्षा विभाग में एडहॉकवाद खूब चला। और शिक्षण कार्य में तमाम नाकाबिल लोग घुस गए। शिक्षा में गिरावट के तमाम कारणों में एक कारण ये भी था। ना केवल प्राइवेट माध्यमिक विद्यालयों में बल्कि डिग्री कालेजों में भी प्रबंधन ने अपने परिवार वालों को, सगे संबंधियों को या फिर पैसे लेकर एडहॉक नियुक्ति दी। ये सभी कुछ साल एडहॉक सर्विस कर न्यायालय का दरवाजा खटखटाते और और स्थाई नियुक्ति पा जाते। ये बात मैं उत्तर प्रदेश के संदर्भ में कह रहा हूं। उत्तर प्रदेश में शिक्षा की क्या स्थिति है ये किसी से छुपी नहीं है। कहने को ये कहा जा सकता है कि स्थाई नियुक्ति में भी गड़बड़ियां हो सकती हैं और होती भी हैं। लेकिन एडहॉक व्यवस्था  इन गड़बड़ियों को करने का बहुत ही सरल और आसान रास्ता है। ये प्रक्रिया बैकडोर एंट्री यानी चोर दरवाजे से नौकरी पाने की सुविधा देती है।

यहां याद रखना चाहिए कि 'एडहॉक' एक प्रक्रिया भर नहीं है बल्कि एक मनोवृति है जिसने पूरी प्रसाशनिक व्यवस्था को बुरी तरह जकड़ रखा है। ये एक ऐसी व्यवस्था है जो शोषण को पोषित करती है। जो अंततः संस्था को और व्यक्ति को बर्बाद कर देती है। और ये एडहॉकिज़्म यथास्थितिवाद के साथ मिलकर संस्थाओं को बर्बाद कर रहा है। पहले सबसे आसान और बैकडोर की हिमायती प्रक्रिया एडहॉक के माध्यम से अपनी मनचाही व्यवस्था बना लो और उसके बाद उसे अनंत काल तक चलने दो।

इसका एक सबसे बड़ा उदाहरण प्रसार भारती है। इस तदर्थवाद और उसके सहोदर यथास्थितिवाद ने देश की दो प्रीमियर संचार संस्थाओं आकाशवाणी और दूरदर्शन और विशेष रूप से आकाशवाणी को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। ये इसलिए कि एडहॉकवाद और कैजुअल अप्रोच द्वारा इन संस्थानों के कार्यक्रम निर्माण के लिए उत्तरदाई प्रोग्राम कैडर को बर्बाद किया जा रहा है और कर दिया गया है।

कैसे? आइए समझने का प्रयास करते हैं।

प्राइवेट मीडिया के आने से पहले आकाशवाणी और दूरदर्शन ही संचार माध्यम थे जो देश की 90 फीसद से ज़्यादा आबादी और क्षेत्रफल को आच्छादित करते थे। ये दोनों सरकारी विभाग थे और सरकार के नियंत्रण में थे। विपक्ष का आरोप था कि ये दोनों संस्थान पक्षपात करते हैं। ये विपक्ष को कम स्थान देते हैं और सरकार के भोपू की तरह काम करते हैं। ज़ाहिर है ये आरोप काफी हद तक सही भी था। मांग हुई कि इन संस्थाओं को स्वायत्त किया जाय बीबीसी की तर्ज़ पर। कई आयोगों और कमेटी की सिफारिशों के बाद 1990 में इन संस्थाओं को स्वायत्त बनाने वाला बिल संसद में पास हुआ और सात साल बाद 1997 में 24 नवंबर को प्रसार भारती बोर्ड का गठन हुआ। आकाशवाणी व दूरदर्शन प्रसार भारती को सौंप दिए गए।

बिल के पास होने और प्रसार भारती बोर्ड के गठन में लगभग सात साल का फासला था। लेकिन कमाल की बात ये है कि इतना समय मिलने के बावजूद इसके बोर्ड का गठन जल्दबाजी में किया गया फैसला था जिसे आधी-अधूरी तैयारी के साथ शुरू किया गया था। इसमें आगे के कर्मचारियों की भर्ती , उनकी सेवाओं,पुराने कर्मचारियों की स्थिति, उनके प्रमोशन, सेवा शर्तें आदि के बारे में कुछ भी तय नहीं हुआ था। और कमोवेश आज भी वही स्थिति है। जो भी बने या बाद में बने उनमें इतनी अनिश्चितता और अस्पष्टता थी कि वे आगे चलकर और ज़्यादा स्थिति खराब करने वाले थे।

नए कर्मचारियों की भर्ती के लिए कोई निकाय प्रसार भारती के पास नहीं था। और आज भी नहीं है। लंबे समय तक नियुक्तियां हुई ही नहीं। यूपीएससी ने ये कहकर इनकार कर दिया कि हमारा काम सरकार के विभागों के लिए नियुक्ति करना है ना कि स्वायत्त संस्था के लिए काम करना। साल 2015 में भर्ती हुईं। ये भर्तियां बहुत ही कैज़ुअल तरीके से हुईं। इसमें इतनी ज़्यादा विसंगतियां थीं। ये भर्तियां एसएससी से करवाई गईं। इसमें प्रसारण निष्पादक की भर्ती तो ठीक है क्योंकि पहले से ही इन की भर्ती यही एजेंसी करती रही थी। लेकिन कार्यक्रम अधिकारियों की जो कि राजपत्रित अधिकारियों होते हैं, नियुक्ति भी इसी एजेंसी ने की। सबसे दयनीय बात ये थी कि इन दोनों पदों की का एक ही भर्ती एक ही एग्जाम द्वारा हुई। बस जो स्नातकोत्तर थे उन्हें पैक्स के लिए अर्ह माना गया,बाकी सब को ट्रैक्स के लिए। हुआ ये कि बहुत सारे अभ्यर्थी जो मेरिट लिस्ट में ऊपर थे वे निचले पद ट्रैक्स में चयनित हुए और जो मेरिट में नीचे थे वे ऊंचे पद पैक्स के लिए चयनित हुए। ये प्रोग्राम कैडर की प्रसार भारती की एकमात्र भर्ती थी। इसमें भी चयनित लगभग एक चौथाई लोगों ने नौकरी छोड़ दी। हां, इससे पहले 2007 के आसपास विशेष नियुक्ति हुई थीं। 

इस भर्ती की गंभीरता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि कार्यक्रम अधिकारियों की पोस्ट जो कि राजपत्रित होते थे,डिग्रेड करके अराजपत्रित कर दिया गया। अब प्रसार भारती में दो तरह के कार्यक्रम अधिकारी हो गए। एक वे जो पहले से थे वे राजपत्रित थे। । दूसरे वे जिन्हें प्रसार भारती ने चुना, वे अराजपत्रित रह गए। एक ही कैडर या पद पर दो तरह के अधिकारी।

एक और तो नई भर्तियां प्रोग्राम कैडर में नहीं हुई तो दूसरी और लगातार लोग सेवानिवृत होते रहे। इससे कई तरह की विसंगतियां पैदा हुईं।

एक, प्रोग्राम कैडर में लोगों की भारी कमी हो गई। जो लोग बचे उन पर काम का बोझ बहुत अधिक बढ़ गया। स्वाभाविक था कार्यक्रम की गुणवत्ता प्रभावित हुई।

दो, संस्थान का मूलभूत स्वरूप ही बदल गया। बीबीसी की तर्ज़ पर बनाया गया प्रसार भारती उसके एकदम उलट गया। बीबीसी में कुल मैन पॉवर का 80 फीसद कार्यक्रम के लोगों का है और 20 फीसद में बाकी सब लोग। यहां कार्यक्रम के लोग 20 फीसद भी नहीं बचे। देश भर में 400 से भी ज़्यादा केंद्रों पर कुल मिलाकर लगभग दो हज़ार भी कार्यक्रम कैडर के लोग नहीं हैं।
 
कमाल की बात ये है कि प्रसार भारती ने करोड़ों रुपए खर्च करके एक प्राइवेट कंपनी शायद अर्नेस्ट यंग से प्रसार भारती में मैन पावर ऑडिट कराया। पर इतना खर्च करने के बाद भी आज तक उस रिपोर्ट को लागू करना तो दूर,उसे पब्लिश तक नहीं किया गया। ये तदर्थवाद का एक और उदाहरण है।

दरअसल प्रसार भारती के कर्मचारियों के तीन विंग हैं -कार्यक्रम,अभियांत्रिकी और प्रशासनिक। अभियांत्रिकी विंग में सबसे अधिक कर्मचारी हैं। इसके दो कारण हैं। एक लगातार तकनीकी विकास के कारण मैन पावर की उतनी जरूरत नहीं रह गई है जितनी पहले थी। हालांकि पदों में अभी भी किसी प्रकार की कटौती नहीं हुई। दो, तकनीकी विकास के चलते और नई तकनीकी के आगमन के कारण बहुत सारे रिले केंद्र बंद कर दिए गए जिनकी बदली हुई परिस्थितियों में कोई जरूरत नहीं रह गई थी। रिले सेंटर होने के कारण यहां पर केवल अभियांत्रिकी वर्ग के लोग ही तैनात थे। वे अब सरप्लस हो गए और उन पर छंटनी का खतरा मंडराने लगा। उन्हें हर कैडर के खाली पदों पर ना केवल एडजस्ट किया गया बल्कि बहुत सारे पद सृजित भी किए गए। 

दूसरी और कार्यक्रम कैडर में नई भर्ती ना होने या बहुत कम होने से बहुत सारे पद रिक्त पड़े रह गए और अंततः उनको खत्म कर दिया गया या दूसरे कैडर की भेंट चढ़ा दिया गया।

एक बात ये भी कि प्रसारण के घंटे बढ़ाए जा रहे हैं। उसके लिए और ज्यादा कार्यक्रमों के निर्माण की जरूरत है। दूसरी ओर प्रोग्राम कैडर में लोग लगातार कम हो रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव ये हुआ कि जो बचे लोग थे उन पर काम का अतिरिक्त बोझ पड़ा। ये बोझ थोड़ा नहीं बहुत अधिक था। इससे कार्यक्रमों की गुणवत्ता पर फ़र्क पड़ना स्वाभाविक था।

प्रोग्राम कैडर का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि पहले आकाशवाणी का महानिदेशक प्रोग्राम कैडर का ही होता था। आज की तारीख में प्रोग्राम का कोई भी व्यक्ति उप निदेशक से ऊपर के पद पर नहीं है। वे भी गिनती के बीसेक।इसका कारण ये है कि कार्यक्रम के अधिकारियों के प्रमोशन किए ही नहीं गए या उसमें इतने अड़ंगे लगा दिए गए कि वे हुए ही नहीं। इससे पैंतीस साल की नौकरी वाले लोग बिना किसी प्रमोशन या एक प्रमोशन के साथ रिटायर होते गए। ऊपर के पदों पर वे जा ही नहीं पाए। कमाल की बात ये कि जो प्रमोशन भी हुए वे रेगुलर नहीं होते बल्कि एडहॉक होते और उसी से सेवानिवृत होते जाते। यहां उल्लेखनीय ये है कि बाकी कैडर में नियमित रूप से प्रमोशन होते रहे और वो भी रेगुलर ना कि एडहॉक।

 प्रोग्राम कैडर के लोगों का प्रमोशन ना होने का परिणाम ये हुआ कि कार्यक्रम कैडर के इन ऊपर के सभी पदों पर या तो अभियांत्रिकी कैडर के लोग आ गए या फिर  बाहर से प्रतिनियुक्ति पर आए लोग बैठा दिए गए। मजे की बात ये है कि निर्णय लेने वाले इन महत्वपूर्ण पदों पर प्रतिनियुक्ति या अभियांत्रिकी कैडर के लोगों की कार्यक्रमों की अंतर्दृष्टि या तो है ही नहीं या बहुत ही कैजुअल तरीके की है। कम से कम वैसी तो नहीं ही है जैसी प्रोग्राम कैडर के लोगों की होती है या जैसी प्रोग्राम के लिए होनी चाहिए।

इससे दो तरह की समस्या हुईं। एक, या तो ये अधिकारियों  कार्यक्रम की तरफ से उदासीन रहे। इससे कार्यक्रम के मसले उपेक्षित होते गए। दो, या उनका गैर जरूरी हस्तक्षेप हुआ। इससे एक ओर प्रोग्राम कैडर के लोगों को अपनी साख और अधिकार बचाने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा खर्च करनी पड़ी,दूसरी ओर कार्यक्रम और उसके मसले उपेक्षित होते गए। इसका असर स्वाभाविक रूप से कार्यक्रमों की गुणवत्ता पर पड़ना था।

आखिर ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर प्रोग्राम कैडर में मैनपावर की कमी को कैसे पूरा किया जा रहा है।

दरअसल इसके लिए भी बहुत ही कैजुअल तरीका प्रयुक्त किया जा रहा है। ये कमी कैजुअल मैन पावर के द्वारा पूरी की जा रही है। ये भी एक तरह का एडहॉकवाद का ही एक रूप है। जो कैजुएल्स का पैनल बनता है,उसमें युवाओं के लिए जीवन यापन की बड़ी संभावना नहीं बनती है। उनकी महीने में अधिकतम छ बुकिंग हो सकती है। और कम से कम सालों साल कोई बुकिंग नहीं। आप एक तरफ नए लोगों को ट्रेंड करने में अपने रिसोर्सेज को खर्चते हैं और वो बेहतर अवसर पाते ही दूसरी जगह चला जाता है। इतना खर्च करने और मेहनत करने के बाद टैलेंट बाहर चला गया। कैजुअल में बहुत सारा ऐसा टैलेंट होता है जिसे अगर बेहतर अवसर प्रसार भारती में मिले तो वे बहुत अच्छा कर सकते हैं और प्रोग्राम कैडर को बेहतरीन बनाया जा सकता है। लेकिन जब बोर्ड का पूर्णकालिक प्रोग्रामर के प्रति ही रवैया कैजुअल हो तो कैजुअल मैनपावर की कौन कहे।

प्रसार भारती के एडहॉकवाद का एक बड़ा उदाहरण ये है कि वो एक निश्चित निर्णय अभी तक नहीं ले पाया है। और प्रोग्राम कैडर की ये सबसे बड़ी दुविधा हो गई है। ये चयन प्रसार भारती को ' पब्लिक ब्रॉडकास्टर' बनाए रखने और ' कमाऊ संस्था' बनाने के बीच का चयन है। एक तरफ वे इस पर से पब्लिक ब्रॉडकास्टर होने का ठप्पा भी नहीं हटाना चाहते हैं और दूसरी और उससे कमाई भी करना चाहते हैं। एक तरफ वे सरकार का भोंपू भी बने रहते हैं और दूसरी तरफ अपने को स्वायत्त संस्था का लेबल भी देना चाहते हैं। एक तरफ प्रोग्राम कैडर को साठ सत्तर साल पुराने पब्लिक ब्रॉडकास्टर वाले एआईआर मैनुअल से बांधने रखा गया है, तो दूसरी ओर उनके लिए साल दर साल राजस्व अर्जन के बड़े बड़े लक्ष्य तय किए जा रहे हैं। प्रोग्राम कैडर है कि उसे समझ ही नहीं आता वो पब्लिक कल्याण के लिए कार्यक्रम करे या राजस्व अर्जन के लिए।

बोर्ड की कैजुअल और एडहॉक दृष्टि और विचारों की विसंगति का सबसे अच्छा उदाहरण उसकी नवनिर्मित क्लस्टर व्यवस्था है। एक तरफ सब कुछ केंद्रीकृत किया जा रहा है। स्थानीय महत्व के निर्णय तक अब केंद्र स्तर पर निदेशालय या प्रसार भारती बोर्ड/सचिवालय को दे दिए गए हैं। कार्यक्रम को स्थानीय स्तर से खत्म करके राज्य स्तर पर और केंद्र स्तर पर करने का प्रयास किया जा रहा है। इसकी शुरुआत मध्य प्रदेश से हुई। जहां स्थानीय केंद्रों के कार्यक्रम चंक खत्म करके मध्य प्रदेश रेडियो के नाम से राज्य स्तरीय कार्यक्रम शुरू किया गया। स्वाभाविक है इससे स्थानीय प्रतिभाओं के अवसर कम हुए। ऐसा हर जगह होने की योजना थी,लेकिन हो हल्ला हो जाने के कारण योजना खटाई में पड़ गई। दूसरी तरफ दो चार केंद्रों को मिलाकर एक क्लस्टर व्यवस्था की गई है। यानी हर राज्य में अब कई क्लस्टर ऑफिस भी काम करने लगे हैं। कहा ये गया कि इससे निर्णय लेने की शक्ति को विकेंद्रित किया जा रहा है। लेकिन हुआ उलटा। केंद्रों  के अधिकार क्लस्टर को सौंप दिए गए। निर्णयों में अनावश्यक देरी होने लग गई लालफीता शाही चरम पर पहुंच गई।

कुल मिलाकर प्रसार भारती में प्रोग्राम कैडर बहुत दयनीय स्थिति में है। प्रसार भारती बोर्ड और उसके नियंताओं के एडहॉक़िज़्म ने उसे रसातल में पहुंचा दिया है। प्रोग्राम कैडर अपनी अस्वाभाविक मौत मर रहा है। इसे तत्काल प्राणवायु पहुंचाने की नितान्त आवश्यकता है। जान लीजिए प्रोग्राम कैडर की मृत्यु दरअसल देश के दो प्रीमियर संचार संस्थानों की मौत भी है। क्योंकि इनकी प्राणवायु कार्यक्रम और गुणवत्ता वाले कार्यक्रम ही है। और प्रोग्राम कैडर के बीमार होने का मतलब इन संस्थानों का बीमार होना और कैडर की मृत्यु इन संस्थानों की मृत्यु है। 




Wednesday, 12 June 2024

हसबैंड ऑन ड्यूटी'




 दो महीने पहले खरीदी गई विपिन भाई की किताब 'हाउस हसबैंड ऑन ड्यूटी'आज पढ़ी जा सकी। अब दो बातें - एक लेखक के बारे में। दूसरी किताब के बारे में।


एक,लेखक उस समाज और  वर्ग से आता है जहां पितृसत्ता की जड़ें बहुत गहरी और मजबूत हैं। जहां एक ग्लास पानी स्वयं से लेकर पीना मर्द के लिए अपमानजनक होता है। जहां लड़कों के लिए 'लड़की की तरह रोता है' एक शर्मनाक वाक्य है और 'घर जवांई' शब्द एक गाली। ऐसे में एक लड़के के लिए अपनी नौकरी छोड़कर घर की जिम्मेदारी ओढ़ लेना और पत्नी को नौकरी करने देना कितनी बड़ी और साहस की बात उनके लिए रही होगी इसे समझा जा सकता है। विपिन धनकड़ ने ना केवल हाउस हसबैंड होना चुना बल्कि उससे उपजे अनुभव सबसे साझा किए। ये इतनी ख़ूबसूरत  बात है कि उनके इस जैस्चर पर कई स्त्री विमर्श फीके पड़ सकते हैं।


दो,जब किताब पढ़ेंगे तो एक बारगी को लगेगा कि अरे इतने साधारण से किस्से। लेकिन ये साधारणता ही इस पुस्तक की असाधारणता है। ये किस्से हमारी रोजमर्रा जिंदगी के वे खूबसूरत क्षण हैं जिन्हें हम अक्सर पकड़ नहीं पाते। महसूस नहीं कर पाते। जी नहीं पाते। जबकि होते सबके पास हैं। लेकिन विपिन ने उन लम्हों को भोगा, महसूस किया, जिया और फिर हूबहू कागजों पर उतार दिया। वे बढ़िया किस्सागो हैं। कहन की रोचक शैली है। साथ ही आसपास के घटित होने पर एक पत्रकार की सूक्ष्म दृष्टि भी।  यहां वे नाममात्र के हाउस हसबैंड नहीं होते बल्कि वास्तविक रूप से घर की सारी जिम्मेदारी उसी निष्ठा और ईमानदारी से निभाते हैं जितना कि एक स्त्री। ये सुंदर बात है कि वे उन जिम्मेदारियों को निभाते हुए  लगातार इस बात को महसूस करते हैं और अभिव्यक्त करते हैं कि एक स्त्री के लिए हाउसवाइफ का किरदार कितना कठिन और जिम्मेदारी का होता है और फिर भी वे उसे कितनी सहजता से निभाती जाती हैं। उनके सूक्ष्म से सूक्ष्मतर ब्यौरे उनकी बात को प्रामाणिक बनाते हैं।


एक साधारण गृहस्थ के साधारण जीवन के साधारण लेकिन रोचक किस्सों की एक उम्दा पुस्तक है 'हाउस हसबैंड ऑन ड्यूटी'।

ज़रूर पढ़ें।



विनम्र विद्रोही

 



आकाशवाणी में जिन बहुत ही प्रतिभाशाली युवाओं के साथ काम करने का अवसर मिला उसमें से एक है मेहेर वान राठौर। उनसे पहली मुलाकात आकाशवाणी इलाहाबाद में हुई जब वो युववाणी के प्रस्तुतकर्ता के रूप में आकाशवाणी से जुड़े। वे मितभाषी थे लेकिन उनका सहज,सरल और सौम्य व्यवहार किसी को भी अपनी और आकर्षित करता था। ये बात काबिलेगौर है कि मितभाषी होने के बाद भी उन्होंने रेडियो पर बोलने के कार्य का चयन किया।


 दरअसल वो बंदा ही ऐसा था जो लीक से हटकर और चुनौतीपूर्ण कार्य पसंद करता था। इलाहाबाद आने वाला लगभग हर छात्र सरकारी नौकरी हेतु प्रतियोगिताओं की तैयारी करता है। लेकिन मेहेर वान इलाहाबाद आए उन थोड़े से अपवादों में से एक थे जिनका लक्ष्य प्रशासनिक सेवाओं में चयनित होना नहीं था। उनका विज्ञान से लगाव ज़ाहिर था और शोध कार्य कर रहे थे। अगर मैं सही हूँ तो ये कार्य वे अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध कर रहे थे। एक अर्थ में वो स्वयं 'विनम्र विद्रोही' थे।


ये उन दिनों की बात है जब भारत में पहचान पत्र 'आधार कार्ड' की शुरुआत हुई ही थी । मेहेर वान ने उस समय पहचान पत्र पर एक बहुत ही शानदार शोधपरक पुस्तक लिखी थी जिसमें दुनिया के करीब करीब हर देश के पहचान पत्रों के साथ-साथ भारत की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी थी। क्योंकि मेहेर वान की रुचि विज्ञान अनुसंधान और उसके प्रचार प्रसार में थी तो एक तरफ तो वो इलाहाबाद से आईआईटी खड़गपुर में नैनो टेक्नोलॉजी में रिसर्च करने गए और दूसरी ओर विज्ञान से संबंधित विषयों पर लेखन और अनुवाद करने लगे। उनके जो महत्वपूर्ण कार्य हैं उनमें आइंस्टीन के कुछ पत्रों का अनुवाद भी शामिल है। 


अभी हाल ही में उनकी सम्पादित,अनुदित और लिखित कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इनमें एक है भारत के प्रख्यात गणितज्ञ श्रीनिवास राजानुजन की जीवनी 'विनम्र विद्रोही'। इसे उन्होंने भारती राठौर के साथ लिखा है।  इसे अभी पढ़कर खत्म किया है। कहना ना होगा ये एक महान व्यक्तित्व पर शानदार काम है।


इस किताब की दो खूबियां जरूर रेखांकित होनी 

चाहिए। 


एक, इसकी भाषा। बहुत ही सहज सरल लेकिन बहुत ही लालित्यपूर्ण और बिम्बात्मक। कितनी ही बात वे सूत्र रूप में कहते हैं। कितनी ही सूक्तियां आप इस पुस्तक से उदाहरण के तौर पर दे सकते हैं। मसलन वे अपनी बात शुरुआत ही करते हैं - 'विलक्षण रूप से प्रतिभावान होना एक प्रकार की त्रासदी है'। गणित के इस महानायक की बात करते करते उनकी भाषा बेहद काव्यात्मक हो जाती है। अक्सर लगता है कोई कविता पढ़ी जा रही है। रामानुजन जैसे असाधारण व्यक्तित्व और उसके जीवन को रेखांकित करने के लिए इसी तरह की समर्थ भाषा की दरकार होती है। निसंदेह ये एक मर्मस्पर्शी 'त्रासदी' है।


दो,इसमें केवल रामानुजन का जीवन,उनके संघर्ष,उनके जीवन की त्रासदी और उनकी उपलब्धियों का प्रामाणिक और शोधपरक लेखा जोखा है ही साथ ही उनका पूरा सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश है। इतिहास और भूगोल तो है ही। जब आप ये जीवनी पढ़ रहे होते हैं तो पाठक को लगता है कि वे एक दक्षिण भारतीय व्यक्तित्व से ही रूबरू हो रहे हैं। ये केवल रामानुजन के जीवन की घटनाओं का प्रामाणिक दस्तावेज ही नहीं बल्कि तत्कालीन समय और समाज का भी दस्तावेज है।


फिलहाल ये पुस्तक वैली ऑफ वर्ड्स पुरस्कार हेतु नॉन फिक्शन कैटेगरी में नामांकित हुई है। 

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लेखक द्वय को हिंदी में एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्तित्व पर एक महत्वपूर्ण किताब के लिए बहुत बधाई।



Saturday, 5 August 2023

पत्थरों में बदलते शहरों की कोमल दास्तां



दरअसल किसी शहर में रहना और किसी शहर में जीना दो मुख्तलिफ बातें हैं। जब आप किसी शहर को जी रहे होते हैं या उसमें जी रहे होते हैं,तो वो शहर अपनी संपूर्णता में आपके भीतर कहीं गहरे पैंठ जाता है। उसकी स्मृतियां आपके भीतर कहीं गहरे धंस जाती हैं। हमेशा के लिए आपके भीतर महफूज़ हो जाती हैं। और जब फिर कभी पलट कर उस शहर को आप देखते हैं,तो वो शहर आपको दिखाई ही नहीं देता। वो इस कदर बदल गया होता है कि पहचान में ही नहीं आता। शहर गतिमान होता है और हमारी स्मृतियां जड़। शहर किसी का इंतज़ार नहीं करता। किसी के लिए रुकता नहीं। शहर स्मृतियों से बहुत आगे निकल जाते हैं।

ये दीगर बात है कि उनकी गति क्या होती है और ये गति उन्हें कहां ले जाती है। अधिकांश शहर कांक्रीट के जंगल के ब्लैक हॉल की तरफ बढ़ गए होते हैं, जिनमें समा कर उन्हें अंततः अपना अस्तित्व ही खो देना है। जाने माने लेखक जितेंद्र भाटिया कुछ ऐसा ही लक्षित करते हैं और अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक 'कांक्रीट के जंगल में गुम होते शहर'में बयां करते हैं।

संभावना प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब में जितेंद्र भाटिया ने कुल पांच शहरों-लाहौर,चेन्नई,जयपुर,मुम्बई और कोलकाता के बारे में लिखा है। ये वो शहर हैं जिनमें वे जिये और जिनको उन्होंने जिया। जिन शहरों ने उन्हें गढ़ा। जिन शहरों में उनके जीवन की निर्मिति हुई।कुल चौदह अध्यायों में फैली पुस्तक के एक-एक अध्याय में चेन्नई और लाहौर, दो अध्याय में जयपुर,चार में मुम्बई और छह अध्यायों में कोलकाता को समाहित किया है। जिस विस्तार से शहरों का वर्णन उन्होंने किया है,उसी क्रम में उनके वर्णन की सांद्रता और संवेदना का विस्तार होता गया है। ज़ाहिर सी बात है कि कोलकाता उनके दिल के सबसे करीब है और इसीलिए सबसे ज़्यादा विस्तार से और सघन संवेदना से उन्होंने कोलकाता का वर्णन किया भी है।

इनमें से लाहौर शहर उनका अनदेखा शहर था जिसे उन्होंने अपने परिवार के बड़ों की आंखों और अनुभवों से देखा था। ये उनके पूर्वजों का शहर था जिसके प्रति वे एक प्रकार के रोमान से भरे हैं और उसी तरह वर्णित करते हैं। चेन्नई में वे कम रहे और वो कम विस्तार भी पाता है। शेष तीन शहर- जयपुर,मुम्बई और कोलकाता उनकी संवेदना से गहरे जुड़े हैं और अपने वर्णन में उतना ही विस्तार पाते हैं।

पर सब शहरों के वर्णन में एक बात कॉमन है,वो है शहर का इतिहास। वे हर शहर की स्थापना से लेकर वर्तमान तक का एक प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करते हैं। वे भले ही विस्तार में नहीं जाते लेकिन उनकी दृष्टि और लेखन बहुत साफ है। मुम्बई और कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर तो उन्होंने बहुत ही शानदार लिखा है। मुम्बई के फ़िल्म इतिहास के एक चैप्टर में मूक फिल्मों तथा दूसरे में बोलती फिल्मों के बारे में बेहतरीन लिखा है और उतना ही बेहतरीन कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर। ऋत्विक घटक,मृणाल सेन और सत्यजीत रे पर उनका लिखा इस किताब का श्रेष्ठ और सबसे सरस हिस्से हैं। 

इस किताब में शहरों का वृतांत भी है,इतिहास भी है और लेखक की आत्मकथा भी। इसमें निबंधों की वैचारिकता भी है और कहानी की किस्सागोई  भी। छोटे फॉन्ट में छपी 332 पृष्ठों की ये पुस्तक पढ़े जाने के लिए खासे समय के निवेश की मांग करती है। पर जितेंद्र भाटिया फिक्शन लेखक हैं। वे किस्सागोई जानते हैं और इसीलिए एक रोचकता पूरे समय बनी रहती है और आप एक सांस में उसे पढ़ भी जाते हैं।

इस पुस्तक में जो कमी लगती है,वो है इसमें शहर के बदलाव को,उनके कांक्रीट के जंगल में तब्दील होने को उस विस्तार से रेखांकित नहीं किया गया है जिस हिसाब से पुस्तक के शीर्षक के अनुरूप होना चाहिए था। ऐसे विवरण विरल है और सांकेतिक है। दूसरे,फ्रूफ की कमी खलती है यहां तक कि कई जगह तो सन भी गलत छपी हैं।

लेकिन कुल मिलकर एक बेहतरीन और पठनीय पुस्तक है। पुस्तक की भूमिका में प्रियंवद लिखते हैं-

               "इस किताब का शीर्षक ही मुनादी करता है कि इस नए और तेजी से बदलते दौर में ये पांच शहर धीरे धीरे अपनी पहचान,अपना इतिहास,अपना पुराना वजूद खो रहे है। कांक्रीट के जंगल इन शहरों की पुरानी इमारतों,खंडहरों,गलियों,बाजारों,थियेटर,सिनेमाहाल को तेजी से निगलकर,प्लाटिक के खिलौनों के घरों की तरह बेजान,यकरंग और बेहिस बना रहे हैं। जिनका आसमान तेजी से छोटा होता जा रहा है।.....एक से दिखते ये शहर किसी मशीन के खाँचे में ढलाई करके निकाले गए उत्पाद की तरह दिखते हैं। इनमें अब पुरानी, कुशादा इमारतें,चौड़ा,बड़ा नीला आकाश, मृत्यु का खामोश गीत गाते कब्रिस्तान,नदी के सुकून,चांदनी रातों और सुनहरी धूपों के वितान नहीं दिखते छत,मुंडेर,बरामदा,आँगन,दुछत्ती,जाल,गोलंबर,कोठा,जीना नहीं दिखता।"

दरअसल विकास की अंधी दौड़ से मरते शहर,कोमल सौंदर्य से पत्थर में तब्दील होते शहर का जो दुःख-दर्द जितेंद्र भाटिया का है,वोही प्रियंवद का है, और वो ही शहर में जीने वाले लाखों संवेदनशील आम लोगों का है, जिसको जितेंद्र भाटिया अपनी किताब में रच रहे होते हैं।

Sunday, 30 July 2023

हरजीत सिंह:मुझसे फिर मिल

 



         हर शहर का एक साहित्यिक आभामंडल होता है। उस आभामंडल में तमाम सितारे होते हैं जो आंखों को चकाचौंध से भर देते हैं। लेकिन जब आप उस चकाचौंध को पार कर कुछ गहरे जाते हैं तो कुछ मद्धिम शीतल प्रकाश लिए ऐसे सितारे होते हैं जो आत्मा को दीप्त कर देते है। विस्मय से भर देते हैं। प्रेम और करुणा से सराबोर कर देते हैं

  देहरादून की अदबी जमात के प्रमुख सितारों की चकाचोंध  के पार भी दो ऐसे ही  सितारों का एक युग्म है जिसका प्रकाश आंखों को नहीं बल्कि दिल को प्रकाशमान करता है। ये युग्म  अवधेश और हरजीत का है। 

देहरादूनी अदबी जमात की हंसी के बीच किसी बच्चे की किलकारी गर आपको सुनाई दे तो आप समझ जाइए ये हरजीत है। उस जमात से कोई संगीत की उदास सी धुन सुनाई दे तो समझ लीजिए ये हरजीत है। उस जमात की सदा में कोई सदा दोस्त की सी लगे तो समझो वो हरजीत है।

कोई भी शास्त्रीय  गायन तानपुरे के बिना कहां पूरा होता है। कितना ही सिद्धहस्त गायक क्यों ना हो। तानपुरा गायक को वे अवकाश देता है जो उसकी लय को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी होते हैं। वो गैप्स को,अंतरालों को भरता है। वो बिना लाइमलाइट में आए महत्वपूर्ण काम करता है। दरअसल हरजीत देहरादून के साहित्यिक जमात के संगीत का तानपुरा है।

हरजीत की कहानी आपको विस्मित भी करती है और करुणा से भर देती है। पेशे से  बढ़ईगिरी करने वाला ये शायर बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। अभावों के बीच भी वो उम्दा शेर कहता,खूबसूरत कैलीग्राफी करता, बेहतरीन कोलाज बनाता,कमाल की फोटोग्राफी करता। वो शास्त्रीय संगीता का दीवाना था और फक्कड़ यायावर। जितना अधिक भटकाव उसके स्वभाव में था, उसकी शायरी उतनी ही सधी हुई थी।


हम जानते हैं भारतीय किस कदर उत्सवधर्मी होते हैं। अभावों से उपजा दुख इस कदर उनकी रगों में बहता है कि वे दुखों को भी सेलिब्रेट करने लग जाते हैं। क्या वजह है कि उजली पूर्णिमा के साथ अंधेरी अमावस्या का भी उसी उत्साह से उत्सव मनाते हैं। हरजीत भी ऐसा ही था। दुनियादारी के पेचोखम से नावाफ़िक वो अपने अभावों का सुखों की तरह ही उत्सव मनाता। टूटी छत से चिड़िया को घर के अंदर आते देख वो कहता है-


"आई चिड़िया तो मैंने जाना/

मेरे कमरे में आसमान भी था"। 


इससे ज़्यादा आशा और उम्मीदों से भरा हरजीत के अलावा कौन हो सकता था।

उसके भीतर एक बच्चे सा साफ शफ्फाक मन वास करता। तभी तो वो कठोर काष्ठ को सजीव खिलौनों का रूप दे देता। वो कहता-


"गेंद, गोली,गुलेल के दिन थे/

दिन अगर थे तो खेल के दिन थे"।


वो प्रेम से भरा रहता। जब वो प्रेम से उमगता तो कहता- 


"हम तुझे इतना प्यार करते हैं/

हम तेरी फ़िक्र ही नहीं करते"


उसे साथ पसंद था। दोस्ती पसंद थी। जिसको उसकी दोस्ती नसीब हुई वो कितने खुशकिस्मत थे। वो एक जगह लिखता है-


"आप हमसे मिलें तो ज़मी पर मिलें

ये तकल्लुफ़ की दुनिया मचानों की है"


एक ऐसा ही दोस्त है नवीन कुमार नैथानी। वो युग्म में एक तीसरा आयाम जोड़ता है। वो अवधेश और हरजीत के साथ मिलकर दोस्ती की त्रयी बनाता है। कभी उससे मिलिए और हरजीत का ज़िक्र भर कर दीजिए। उसकी आंखों में हर्ष और विषाद एक साथ उतर आते हैं। वो किस्सों पर किस्से कहे जाता है। वो बताता है हरजीत विचारधाराओं के पचड़े में कभी नहीं पड़ा। एक बार जब उसकी ग़ज़लों को वाम सिद्ध किया जाने लगा तो उसने अपनी वही रचनाएं धर्मयुग में छपवाकर उसका प्रतिवाद किया। 

अगर हरजीत की दोस्ती के चलते उसके दोस्त खुशनसीब थे तो हरजीत भी कम खुशनसीब कहां था। उसे ऐसे दोस्त मिले जो उसके जाने के बाद भी उसे हमेशा दिल में बसाए हैं। उनकी एक दोस्त हैं तेजी ग्रोवर। उन्होंने हरजीत के सारे दोस्तों को,उसके चाहने वालों को एकत्रित किया। फिर उन सबसे हरजीत की यादों को, उसके लिखे को बटोर कर एक किताब की शक्ल दे दी।  नाम है 'मुझसे फिर मिल'।

दरअसल ये हरजीत को उसके चाहने वालों से,नए पाठकों से और दुनिया जहान से मिलवाने का सच्चा सा उपक्रम है। उसकी यादों को जिलाए रखने का एक बेहद संजीदा प्रयास है।

इसमें हरजीत के दो पूर्व प्रकाशित संग्रह 'ये पेड़ हरे हैं' और 'एक पुल' के अलावा एक अप्रकाशित संग्रह 'खेल' और तमाम अप्रकाशित गज़लें शामिल की गई। इसके अलावा उनके कई दोस्तों व अन्य लोगों के हरजीत के बारे आत्मीय उद्गार हैं और दो आलेख भी। 

इनमें से एक शानदार संस्मरणात्मक आलेख सुप्रसिद्द चित्रकार लेखक जगजीत निशात का है 'हरजीत और उसका 'हरजीत' बनना'। इसमें निशात हरजीत को हरजीत बनाने के प्रक्रिया की पड़ताल ही नहीं करते बल्कि देहरादून के उसके समकालीन सांस्कृतिक माहौल को भी बखूबी उद्घाटित करते चलते हैं। 

एक और संस्मरणात्मक आलेख ज्ञान प्रकाश विवेक का है। ये आलेख बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। वे लिखते हैं- 'हरजीत से मिलना किसी बहुत अच्छे मौसम से मिलने जैसा था.वह खुद किसी पेड़ जैसा था-किसी दरख़्त जैसा..... एक ऐसा दरख़्त,जिसके पत्तों पर आसमान आराम कर रहा हो,जिसकी शाखों में ज़िंदगी के संघर्ष  जुड़े हों और जड़ों में कई जोड़ी पांव हों जो उसमें आवारगी और घुमक्कड़ी का अहसास पैदा करते हों.... उसमें बेचैनियों की खुशबू थी,जज़्बात की तरलता थी। उसे अपने सबसे विकट समय में भी मुस्कुराते देखना चकित करता था"। 

वो अपने समय का बेहतरीन ग़ज़लकार था जो बेहद संवेदनशील और संवेगों से भरा था और ग़ज़ल के क्षेत्र में नया मुहावरा गढ़ रहा था। ज्ञान प्रकाश आगे लिखते हैं "हिंदी ग़ज़ल  के कूड़े में अपनी अलग पहचान कराने वाला संवेदनशील,मैच्योर और समझदार ग़ज़लकार था।"

हरजीत का प्रकृति से अद्भुत जुड़ाव था। उसके पहले ही संग्रह का नाम 'ये हरे पेड़ हैं' है। वो लिखता है-


"कश्तियाँ डूब भी जाएं तो मरने वालों में

होश जब तक रहे साहिल का गुमाँ रहता है

ये हरे पेड़ हैं इनको ना जलाओ लोगों

इनके जलाने से बहुत रोज़ धुंआ रहता है"


एक जगह वो लिखता है-


"हरी ज़मीन पे तूने इमारतें बो दी

मिलेगी ताज़ा हवा पत्थरों में कहाँ"


या फिर


"ज़िंदा चेहरे भी बदल जाते हैं तस्वीरों में

पेड़ मरते हैं तो ढल जाते हैं शहतीरों में"


और फिर ऐसे हरे पेड़ के शैदाई को प्रकाशन संस्थान  संभावना प्रकाशन की इससे खूबसूरत श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि इस किताब को छापने में उसने पेड़ों को नष्ट नहीं किया। किताब को गन्ने की खोई से बने कागज़ पर छापा।

अब देहरादून में महसूस होने वाला सबसे बड़ा मलाल और कमी उस महबूब शायर से ना मिल पाना है। लेकिन आप उसे यहां महसूस कर सकते हैं। यहां के साहित्यिक माहौल में वो एक अहसास सा उपस्थित रहता है।

 और ये भी कि मेरे तईं देहरादून की तमाम पहचानों में एक बड़ी पहचान हरजीत भी है। उसको जानने के बाद जब भी देहरादून जाएंगे उसकी याद तो आएगी ही और होठों बरबस गुनगुना उठेंगे कि-


"ढूंढते फिरते हैं हम उस शख़्स का पता

जिससे हों इस शहर के माहौल की बातें बहुत।"


और

और हरजीत आपके कानों में आकर चुपके से कहेगा -


"सोचता हूँ कहां गए वो दोनों

मेरी साइकिल वो मेरा देहरादून"




Tuesday, 7 March 2023

आग और पानी



ज़्यादातर लोग किसी शहर में रहते भर हैं। लेकिन कुछ लोग उस शहर में जीते हैं,उस शहर को जीते हैं। वो शहर उनमें और वे शहर में घुल जाते हैं।  शहर उनकी आत्मा में उतर जाता है और वे शहर की आत्मा में। शहर उनकी शिराओं में खून की माफ़िक बहने लगता है। फिर किसी एक दिन वो शहर कलम की मार्फत शब्द शब्द सफ़े दर सफ़े उतरता जाता है और शहर एक खूबसूरत किताब में तब्दील हो जाता है। 


ऐसी ही एक किताब को हम नाम 'आग और पानी'के नाम से जानते हैं। शहर है बनारस। और उसका रहवासी व्योमेश शुक्ल एक दूसरे में घुले हुए। व्योमेश बनारस को जीते हैं और बनारस उनमें। वही बनारस जब उनके दिल से होता हुआ उनकी कलम से शब्द दर शब्द बाहर आता तो 'आग और पानी' में तब्दील ना हो जाता तो और क्या हो जाता।


व्योमेश से कभी मिला नहीं। फेसबुक पर उन्हें फॉलो करता हूँ। उसी से जाना वे आला दर्ज़े के रंगकर्मी हैं। वे मंच पर खूबसूरत और भव्य दृश्य बनाने में सिद्धहस्त हैं। वे अपनी लेखनी से भी बनारस शहर के ऐसे ही खूबसूरत दृश्य बनाते।


किताब की सबसे सुंदर बात ये है कि इसमें कुछ लंबे आलेख हैं,साक्षात्कार है,ससंस्मरण हैं, चरित्र चित्रण हैं और स्निपेट्स भी हैं। ये विविधता रुचती है,मन मोहती है। इसमें संगीत अंतर्धारा के रूप में बहता है,कंटेंट में भी और भाषा में भी। संगीत और संगीतकारों पर कितना कुछ है और कितना समृद्ध करता चलता है आपको। और हो भी क्यों ना।  वे राम की शक्तिपूजा जैसे कालजयी रचना की देशभर में लाजवाब  संगीतमयी प्रस्तुति देते हैं। संगीत के निःसंदेह जानकार हैं और इसीलिए उनके गद्य में लय है, वो किसी संगीत सा बहता है।


'आग और पानी' दरअसल बनारस के सांस्कृतिक इतिहास का दस्तावेज है।


जब आपको कुछ अच्छा मिलता है तो और ज़्यादा की आस होने लगती है। बनारस केवल धार्मिक सांस्कृतिक नगरी भर नहीं है। इसलिए कुछ मिसिंग लगता है। बनारस और भी बहुत कुछ है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और सीमांत बिहार की आर्थिक राजधानी है ये। घाट हैं, पंडे हैं। नाव हैं, नाविक हैं।   जुलाहे हैं,बनारसी साड़ियां हैं। विश्वनाथ मंदिर है,ज्ञानवापी मस्जिद है। बुद्ध हैं,सारनाथ है। और भी बहुत कुछ है बनारस। व्योमेश की नज़र और उनकी कलम से देखना निश्चित ही रोचक होगा।

°°°°

और अंत में एक बात रुख़ प्रकाशन की। अब तक दो किताबें पढ़ी हैं। एक 'आग और पानी'। दूसरी सुशोभित की 'मिडफील्ड'। दोनों बेहतरीन किताबें हैं। कंटेंट से भी और रूप सज्जा से भी। किताबों पर खासी मेहनत की गई है। आवरण से लेकर प्रिंटिंग तक। सबसे बड़ी बात प्रूफ की गलती सिरे से नदारद है जो आज के समय की बड़ी बहुत बड़ी बात है। पढ़ने का आनंद द्विगुणित हो जाता है। निःसंदेह बेहतरीन पुस्तकों के लिए अनुराग वत्स भी बधाई के पात्र हैं।



Wednesday, 18 May 2022

बुक मार्क_मारीना

 



'...कोई ऐसा जो मेरे झरते हुए जीवन में वसंत की तरह था...'

एक किताब के भीतर की यात्रा के दौरान जो भी सहायक उपकरण होते हैं,उनमें बुकमार्क मुझे सबसे अहम और आकर्षक  लगता है।
मेरे जाने ये एक अभिनव प्रयोग है। जब आप 'मारीना' पढ़ते हैं तो आपको कहीं बाहर से बुकमार्क नहीं जुगाड़ना पड़ता। ये कहन में 'इन बिल्ट' हैं। ऐसे खूबसूरत बुकमार्क जो पढ़ते हुए शायद ही कभी आपके हाथ लगे हों। ये मारीना की जीवन यात्रा से होकर गुजरने वाले पाठक के लिए ठहरने के ठिकाने हैं। अगले पड़ाव के प्रस्थान स्थल हैं। ये आपको यात्रा के एक हिस्से को पूरा करने का सुकून ही नहीं देते,  बल्कि एक व्यग्रता, एक बेचैनी,छटपटाहट भी पैदा करते हैं और आगे जाने की,ज़ियादा और ज़ियादा  जानने की। ये दिमाग को मथते जाते हैं और दिल को सहलाते भी चलते हैं, एक साथ।
अगर इस किताब में सिर्फ और सिर्फ बुकमार्क होते और कुछ भी ना होता तो भी ये अपने आप में मुकम्मल किताब होती। 
आप पूछेंगे ऐसे खूबसूरत बुकमार्क भी होते हैं क्या? 
मैं कहूंगा मारीना पढ़ो ना।
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एक बुकमार्क की इबारत है-
'वापसी शब्द अजीब है। वापसी देह की संभव है,लेकिन वापसी पर सब कुछ वैसा ही हो-जैसा हम छोड़कर गए थे,ऐसा कहां होता है।' मारीना ने अपने कटे हुए बालों की लटों को कान के पीछे अटकाते हुए कहा।
'हां, जीवन की तरह।'बेसाख्ता मेरे मुंह से निकला।
'बिल्कुल।' उसने मेरी और देखते हुए कहा
'जीवन की ही तरह। हम आते हैं एक तरह से ही दुनिया में,लेकिन वापसी तक सबकी अलग अलग यात्रा होती है। जीवन यात्रा।'
'निर्वासन भी यात्रा ही थी।' मैं कहती हूँ। इस कहन में सवाल भी है।
'हां, निर्वासन भी यात्रा रही,कठिन बीहड़ यात्रा,बचपन से निर्वासन,देश से निर्वासन,जीवन से निर्वासन।'
हम दोनों खामोश हो गए। सूरज हमारे सामने ढल रहा था। ढल रहा था हमारे भीतर भी बहुत कुछ।

Sunday, 27 March 2022

जहाँआरा:एक ख्वाब एक हक़ीक़त




प्रो हेरंब चतुर्वेदी जाने माने इतिहासकार हैं और लेखन के क्षेत्र में अति सक्रिय हैं। हाल के वर्षों में इतिहास और इतिहासेतर विषयों पर उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।

2013 में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी 'दास्तान मुग़ल महिलाओं की'। इसे नया ज्ञानोदय और बीबीसी ने उस साल की सबसे चर्चित पुस्तकों में शामिल किया था। ये पुस्तक अपने कथ्य में इस दृष्टि से विशिष्ट थी कि ये मुग़ल राजपरिवार की कम चर्चित महिलाओं पर केंद्रित थी। ऐसे मध्यकालीन समाज में जब महिलाओं की स्थिति किसी 'ऑब्जेक्ट' से इतर कुछ नहीं हो और मुग़ल इतिहास में भी जिन महिलाओं का नाम मुग़ल नामावली को पूरा करने भर के लिए शामिल किया जाता रहा हो,इस पुस्तक में उसी काल की छह ऐसी ही बहुत कम चर्चित या अचर्चित महिलाओं के मुग़ल इतिहास में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप को रेखांकित करने का प्रयास किया गया था। कहन की दृष्टि से ये इसलिए अलग थी कि ये इतिहास का शुष्क  इतिवृत्तात्मक वर्णन ना होकर कथा कहानी के रूप में बहुत ही रोचक और सरस बयान थी।

अब इसी विषय पर उनकी एक और पुस्तक आयी है 'जहाँआरा:एक ख़्वाब एक हक़ीक़त'। एक तरह से इसे पहली पुस्तक का विस्तार  माना जाना चाहिए। इस पुस्तक में भी उन्होंने एक अन्य मुग़ल महिला 'जहाँआरा' के अपने समय, इतिहास और व्यक्तियों के जीवन में उसके हस्तक्षेप और उसकी भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास किया है। भिन्नता केवल आकार की दृष्टि से है। जहां पहली पुस्तक के 183 पृष्ठों में छह कहानियों में छह मुग़ल महिलाओं का ज़िंदगीनामा है,वहाँ इस पुस्तक के 308 पृष्ठों में केवल एक मुग़ल महिला का आत्मकथ्य शैली में औपन्यासिक रोज़नामचा।

ये स्वाभाविक और ज़रूरी भी था। मुग़ल बादशाह शाहजहां की बेटी और दारा शिकोह व औरंगजेब की बहन जहाँआरा का कृतित्व और व्यक्तित्व है ही इतना विराट कि किसी कहानी/अध्याय में वो समा ही नहीं सकता था। उसे एक औपन्यासिक कृति की ही ज़रूरत थी जिसे प्रो चतुर्वेदी ने पूरा किया।

 जहाँआरा अपनी नानी और बादशाह जहांगीर की सबसे प्रिय बेग़म नूरजहां के बाद मुग़ल इतिहास की दूसरी सबसे प्रभावशाली महिला हैं। लेकिन वो अपनी नानी नूरजहां से कहीं अधिक पढ़ी लिखी,समझदार,विचारवान और शालीन व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं। नूरजहां ने मुग़ल इतिहास को बहुत गहरे से प्रभावित किया, लेकिन उसका ये प्रभाव मुख्यतः राजनीतिक और नकारात्मक है। इसके विपरीत जहाँआरा ने अपने समय के हर क्षेत्र में दखल दिया और सकारात्मक रूप से प्रभावित किया। और इस दृष्टि से वो नूरजहां से भी ज़्यादा प्रभावी और बड़ा व्यक्तित्व दिख पड़ती हैं। वो नेपथ्य में रहकर अपनी भूमिका का निर्वहन करती हैं और अपने समय की ना केवल राजनीति में बल्कि समाज,अर्थ,साहित्य और संस्कृति सभी क्षेत्रों में समान रूप से सकारात्मक हस्तक्षेप करती हैं। 

उनकी केवल दर्शन और सूफीवाद में ही रुचि नहीं है,बल्कि साहित्य, इतिहास, चिकित्सा, गणित, राजनीति सभी विषयों में गति है। वो मल्लिका के रूप में ना केवल हरम का प्रबंधन करती हैं बल्कि राजनीति में भी हस्तक्षेप करती हैं। उन्हें एक तरफ मुग़ल राजवंश की उसकी प्रतिष्ठा का ख़्याल है तो दूसरी तरफ अपनी रियाया,अपने अधीनस्थों और अपने परिवार की परवाह भी है। वो जितना अध्ययन में डूबती हैं,उतनी ही प्रकृति के साहचर्य में जाती हैं। वो जितनी रुचि बाग बगीचों और नहरों के निर्माण में लेती हैं उतनी ही स्थापत्य में भी। ये कमाल ही है कि हरम और राज दरबार के लौकिक षडयंत्रकारी शुष्क जीवन के बीच भी वो अपने भीतर आध्यात्मिक और नैतिकता की नमी को बनाये रखती हैं। अपनी पुस्तक में प्रो चतुर्वेदी मध्यकालीन समय की ऐसी गरिमामय मुग़ल शहज़ादी जहाँआरा के  बेहद खूबसूरत व्यक्तित्व का खूबसूरत चित्र अपनी कलम से उकेरते हैं।

ऐतिहासिक कथ्य को कहने की अपनी दिक्कतें हैं। जब ऐतिहासिक तथ्यों पर ज़ोर दिया जाता है तो कथ्य शुष्क और इतिवृत्तात्मक होता जाता है और कहन पर ज़ोर दिया जाता है तो ऐतिहासिक तथ्य से समझौता करना पड़ता है। तमाम ऐतिहासिक कृतियों में ऐतिहासिक तथ्यों को गलत रूप के प्रस्तुत किया गया है। इससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐतिहासिक कृति को पढ़ते हुए चाहे आप जितना सजग रहें कि आप इतिहास नहीं साहित्यिक कृति पढ़ रहे हैं, पर अवचेतन में इतिहास हावी रहता है और आपके दिमाग में एक गलत इतिहास की निर्मिति होती ही है।

लेकिन प्रो चतुर्वेदी एक मंजे हुए इतिहासकार तो हैं ही, एक हुनरमंद कवि भी हैं। भाषा पर उनकी गज़ब की पकड़ है। उनकी भाषा में बहते पानी की गति है और गज़ब का लालित्य भी। इसीलिए उन्हें अपने कहन में रोचकता के लिए ऐतिहासिक तथ्यों से समझौते की ज़रूरत नहीं पड़ती। वो खुद ब खूब चली आती है। वे लिख इतिहास ही रहे होते हैं। शोधपरक प्रामाणिक इतिहास। लेकिन वे इसे कविता में लिख रहे होते हैं। दरअसल जब हम उनकी ऐतिहासिक कृति को पढ़ रहे होते हैं तो इतिहास को कविता के माध्यम से पढ़ रहे होते हैं। और ये भी कि हम व्यक्ति और घटनाओं के रूप में नीरस इतिवृत नहीं पढ़ रहे होते बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण और घटनाओं की निर्मिति के पीछे की परिस्थितियों का गंभीर विश्लेषण पढ़ रहे होते हैं।

जहाँआरा अपनी रियाया और विशेष तौर पर किसानों के हितों का ध्यान रखने की बात करती हैं। वो इस बात का उल्लेख करती है कि अकबर सहित तमाम बादशाह समय समय पर किसानों के हितों से संबंधित आदेश जारी करते रहे हैं। पुस्तक के 157 पृष्ठ पर उल्लिखित इस संदर्भ का उल्लेख आदरणीय असगर वज़ाहत साहब ने किया है और इसे अभी हाल के किसान आंदोलन से जोड़ते हुए वे कहते हैं कि तब और अब के शासकों की सोच  में किसान हित को लेकर कितना अन्तर है। दरअसल ये अंतर सोच का नहीं बल्कि कथनी और करनी का है। किसान हित की बात प्राचीन काल से होती आयी है। लेकिन इस संबंध में धरातल पर शायद ही कभी कुछ हुआ हो। किसान आत्महत्या के लिए हमेशा मजबूर होते आये हैं। कल भी आज भी। इसी पुस्तक में एक जगह संदर्भ है कि जहाँआरा अपनी प्रिय सेविका फिदा के कहने पर कश्मीर की अपनी जागीर के किसानों का लगान  किसानों की परेशानी को देखते हुए 50 फीसद से 40 फीसद कर देती हैं। इसके अलावा किसानों को अपने जागीरदारों को जो समय समय पर अन्य कर और नज़राने देने पड़ते,वे अलग से। विचारणीय प्रश्न ये है कि 50 फीसद लगान के बाद किसान कितना सुखी हो सकता था। सारे अध्ययन अभी तक यही बताते हैं किसी भी काल में किसान सुखी नहीं थे। यानि कथनी और करनी का अंतर हर काल में रहा है,जो आज तक जारी है।

मानव की मूल प्रवृति और विचार हर युग में एक से होते हैं। एक संदर्भ आता है कि  जहाँआरा  स्वयं अपना समुद्री व्यापार शुरू करती हैं। इसके लिए वो अपनी बचत और साथ ही अपनी परिचारिकाओं की बचत का निवेश अपने इस व्यापार में लाभ के लिए करती हैं। इससे लाभ होता है और हरम की बाकी दासियाँ और महिलाएं भी इससे प्रेरित होकर अपनी बचत को व्यापार में निवेशित करने को उद्धत होती हैं। यानि बचत, निवेश और लाभ की प्रवृति हर काल और स्थान पर समान हैं। जहाँआरा ना केवल अपना व्यापार शुरू करती हैं बल्कि उसके लिए एक पानी का जहाज 'साहिबी' का निर्माण भी करवाती हैं। हम आज के समय में तमाम सफल 'महिला उद्यमियों' की बात करते हैं। मध्यकाल में भी सफल महिला उद्यमी हुआ करती थीं।

इस पुस्तक की शुरुआत भी 'दास्तान...'की तरह शुष्क सी होती है। उस पुस्तक में ये शुष्कता कथ्य की भौगोलिक पृष्ठभूमि के कारण होती है तो यहां पर कथ्य की भूमिका तैयार करने की ज़रूरत से। इस पुस्तक के कुछ पृष्ठ उस भूमिका के निर्माण हेतु तत्कालीन समय और परिस्थितियों के वर्णन में खर्च होते हैं जिसमें जहाँआरा जैसे व्यक्तित्व का आविर्भाव होता है। लेकिन जैसे जहाँआरा का व्यक्तित्व परिदृश्य पर नमूदार होता हैं और उनके आत्मकथ्य शब्दों में पृष्ठ पर अवतरित होने लगते हैं,शुष्क इतिवृत कविता में तब्दील होता जाता है।

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'जहाँआरा:एक ख्वाब एक हक़ीक़त'दरअसल ख्वाब के हक़ीक़त में तब्दील होने के बजाय हक़ीक़त के ख्वाब में बदल जाने की बात है। ये इतिहास की किताब से शुरू होकर महाकाव्य में बदल जाने की बात है।

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दरअसल ये किताब जहाँआरा के बहुमुखी व्यक्तित्व के अलग अलग पहलुओं की खूबसूरत गज़लों का एक निहायत संजीदा दीवान है। ये एक व्यक्ति के चरित्र को समझने का प्रयास भर नहीं है बल्कि उसके माध्यम से तत्कालीन इतिहास,राजनीति,समाज और जीवन को समझने की युक्ति भी है।

Sunday, 23 February 2020

ये समाज और मानव मन की यात्राएं हैं



किसी जगह की यात्रा या किसी स्थान पर रहवास के तमाम कारण हो सकते हैं। निश्चित ही अधिकतर मौज मस्ती या कार्यवृति की अनिवार्यता के कारण  ही होता है। लेकिन जब ये यात्राएं और रहवास इन स्थूल कारणों से आगे बढ़कर एक व्यापक दृष्टिकोण और सरोकारों से प्रेरित होती हैं तो ये यात्राएं और रहवास वहां की संस्कृति और समाज को समझने बूझने का सबब बनते हैं। उस समाज की निर्मिति और मानसिकता को समझने का कारक होते हैं। और उसके माध्यम से मानव मन के भीतर और स्वयं के भीतर की यात्रा करने  रहने की कोशिश होती है।

ओमा शर्मा की यात्राएं और उनके रहवास इन्हीं वृहत्तर परिप्रेक्ष्य के वायस हैं। इसकी परिणति एक पुस्तक के रूप में होती है-'अन्तरयात्राएं वाया वियना'। लेकिन ये पुस्तक केवल वियना या ऑस्ट्रिया तक सीमित नहीं है। इसका भूगोल  कहीं ज़्यादा विस्तार लिए है।  हां इसके आयतन का एक बड़ा हिस्सा वियना घेरे है। 192 पृष्ठों में से 88 पृष्ठ  लेखक के प्रिय साहित्यकार स्टीफेन स्वाइग का शहर वियना ही घेरे है। 

ऑस्ट्रिया के महान साहित्यकार स्टीफेन स्वाइग(1881-1942) ओमा शर्मा के सबसे प्रिय और पसंदीदा साहित्यकार हैं। उन्होंने ना केवल उनकी जीवनी बल्कि उनकी कहानियों तथा अन्य पुस्तकों का अनुवाद किया है। स्वाइग का अधिकांश समय वियना में बीता। इसलिए ओमा शर्मा उनसे जुड़ी जगहों और चीजों को देखने के बहाने वियना की यात्रा करते हैं और उस यात्रा के बारे में लिखते हैं। यहां कई उपकथाओं से मिलकर एक कथा बनती है। दरअसल स्वाइग के व्यक्तिगत और लेखकीय जीवन और उनसे जुड़े स्थलों की कथा तो नेपथ्य में चलती है। इसके ऊपर कई उपकथाएं चलती जाती हैं। एक उपकथा स्वाइग की जीवनी की है जिसे वे बार बार उद्धृत करते चलते हैं। एक उपकथा यूरोप के उन महान कलाकारों और साहित्यकारों से बनती है जिनकी महान कृतियां अब वियना की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं और जिनसे स्वाइग को खोजने के क्रम में ओमा की मुठभेड़ होती है और फिर उस कृति और रचनाकार से एकाकार होते हैं। इसमें अंतोनियो कनोवा हैं,रेम्ब्रां हैं, टीशियस हैं,वेरोनीस हैं,पीटर ब्रुगेल हैं,बाल्जाक हैं,दोस्तोवस्की हैं,वेरहारन हैं,फ्रायड, मोज़ार्ट,बीथोवीन हैं। एक उपकथा वियना की सांस्कृतिक विरासत की,विश्व प्रसिद्ध संग्रहालयों की, बर्गथिएटर की,मारिया टेरेसा की भी है।

दरअसल इस किताब में एक तरफ वियना या कहें यूरोप है और दूसरी तरफ भारत। वे आस्ट्रिया के अलावा स्विट्ज़रलैंड भी जाते हैं और टॉलस्टॉय के बहाने रूस भी। स्विट्जरलैंड का वर्णन करते
 हुए वे  लिखते हैं '....जहाँ दुख-दर्द,संघर्ष-शोषण,जात-पात,रंगभेद या लैंगिक झमेले हैरत करने की हद तक नदारद हों,वहाँ किसी लेखक-कलाकार की प्रेरणाएं और बेचैनियाँ कैसी उड़ान भरती होंगी..।' और शायद यही कारण है कि जब जब वे भारत में -असम,गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश या मुम्बई आते हैं,वे विवरण कहीं ज़्यादा सरस, करुणा से भरे और मार्मिक बन पड़े हैं। यहाँ देश काल समाज प्रमुखता से है व्यक्ति पृष्ठभूमि में। इसके विपरीत वियना और योरुप में व्यक्ति प्रमुख हैं और समाज पृष्ठभूमि में है। यूरोप के विवरण आपके दिमाग को मथते हैं तो भारत के विवरण दिल को,मन को छूते हैं,द्रवित करते हैं। निसंदेह ओमा जिस समाज को देखते महसूसते हैं और जिस तरह के चित्र उनके मन में बनते हैं वैसे ही कागज़ पर उतर आए हैं।

कुल मिलाकर ये एक रोचक पुस्तक है जो आपके अनुभव को और समृद्ध करती है। 
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आपको बहुत साधुवाद ओमा शर्मा

Saturday, 14 September 2019

ये आपकी अपनी ज़िंदगी के खोए पन्नों के पते हैं



              सुश्री मीनू खरे विज्ञान में प्रशिक्षित हैं और लंबे समय से आकाशवाणी में कार्यरत हैं। निश्चित ही इन दोनों ने उनके स्वयं को अभिव्यक्त करने के तरीके को परिष्कृत और परिमार्जित किया होगा और एक दिशा दी होगी। शायद यही कारण है कि वे बड़ी से बड़ी बात को भी कम से कम शब्दों में कहना पसंद करती हैं और कहती भी हैं। और इसीलिये जब उन्होंने अपने अंतस को अभिव्यक्त करना चाहा तो इसके लिए  कहने की सबसे छोटी फॉर्म हाइकू को चुनती हैं जो उसके सबसे अनुकूल था। सोने पे सुहागा ये कि वे संगीत में प्रशिक्षित हैं जो उनकी संवेदना को ना केवल रागात्मकता प्रदान करता है बल्कि उनकी संवेदना को तीक्ष्णता और सूक्ष्मता भी प्रदान करता है। 
               वे लिखती हैं 'विशाल पुल/और नीचे बहती/ सूखी सी नदी' तो क्या ही ख़ूबसूरत बिम्ब बनाती हैं। एक तरफ वे उस यथार्थ को बयां कर रही होती हैं कि किस तरह हमारी बड़ी बड़ी नदियां मर रहीं हैं,बरसात को छोड़ कर बाकी समय उनमें पानी ना के बराबर होता है और उनके चौड़े पाटों पर बने विशाल पुल निरर्थक से लगते हैं। लेकिन उसी समय वे एक और गंभीर बात भी कह रही होती हैं कि किस तरह मनुष्य अंदर से खोखला होता जा रहा है,संवेदनहीन होता जा रहा है,उनकी संवेदनाएं सूख रही हैं और दूसरी तरफ भौतिक उपादानों से  बाह्याडंबर के विशाल पुल निर्मित कर रहा होता है। दरअसल वे एक बहुत ही पैनी,सूक्ष्म और चौकन्ना दृष्टि अपने आस पास घट रही घटनाओं पर और साथ ही अपने समय की विसंगतियों और विद्रूपताओं पर रखती हैं, उसे महसूसती हैं और अभिव्यक्ति देती हैं। उनकी इन अभिव्यक्तियों  का पता है उनका अभी हाल ही में आया संग्रह 'खोयी कविताओं के पते'। इस संग्रह में अनेकानेक विषयों पर रचित हायकू हैं। किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की सबसे पहले नज़र अपने आस पास के वंचित,शोषित,मज़दूर की तरफ जाती है और वे जब भी उनकी तरफ देखती हैं कुछ मार्मिक रचती हैं- 'रोटी गोल थी/मुफ़लिसी नुकीली/चुभी पेट में' या फिर  'बोझ नहीं ये/कई पेट हैं लड़े/सिर पर मेरे'। इसे पढ़ते हुए अनायास ही स्व. नंदल हितैषी की कविता रिक्शावाला याद आ जाती है। वे लिखते हैं- 'रिक्शा पैर से नहीं पेट से चलती है'। वे सामाजिक सरोकारों से हमेशा जुड़ी रहीं,केवल लेखन के स्तर पर ही नहीं बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी। उन्होंने इन मुद्दों पर रेडियो के लिए तमाम प्रोग्राम भी बनाए और पुरस्कृत भी हुए। वे लिखतीं हैं-'बिटिया रानी/कभी गेट से विदा/कभी पेट से' या फिर 'कामकाजी स्त्री/दो नावों में सवार/फिर भी पर' या फिर 'बड़ी उदासी/ हैं सात समंदर/ धरती प्यासी'। 
               उनकी अभिव्यक्ति की रेंज बहुत ही विस्तृत है। वे हर समसामयिक विषय और समस्याओं पर लिखती हैं बहुत ही खूबसूरती से लिखती हैं।उनका संग्रह'खोयी कविताओं के पते' दरअसल आपकी अपनी ज़िंदगी के खोए पन्ने के पते हैं। जब आप इन कविताओं को पढ़ रहे होते हैं तो आप अपने आस पास के परिवेश को महसूस रहे होते हैं और खुद अपने ज़िन्दगी के खोए पन्नों के पतों से रूबरू हो रहे होते हैं। 
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इन पतों को एक बार ढूंढने का प्रयास आप भी जरूर करें।

नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...