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Monday, 14 September 2026

सब्र का फल मीठा होता है




ये 14 सितंबर 2020 की तारीख थी। न्यूयॉर्क के फ्लशिंग मीडोज पर यूएस ओपन का पुरुष एकल फाइनल जर्मनी के अलेक्जेंडर ज्वेरेव और ऑस्ट्रिया के डोमिनिक थिएम के बीच खेला जा रहा था। ज्वेरेव पहले दो सेट 6-2, 6-4 से जीतकर कर अपनी पहली ग्रैंड स्लैम जीत से केवल एक सेट की दूरी पर थे। लेकिन अगले दो सेट थिएम ने 6-4, 6-3 से जीतकर मैच को बहुत रोचक बना दिया। ज्वेरेव ने फाइनल सेट में एक बार फिर बेहतरीन खेल दिखाया और 5-3 की बढ़त के साथ अपनी सर्विस पर 30-0 के स्कोर से आगे थे और केवल जीत से केवल दो अंक दूर थे। लेकिन वे मैच हार गए। 

अब उनकी आँखों में दुख और पश्चाताप के आंसुओं के सिवा कुछ ना था। ट्रॉफी प्रेजेंटेशन सेरेमनी में बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए ज्वेरेव अपनी टीम को संबोधित करते हुए कह रहे थे "मुझे उम्मीद है कि एक दिन हम सब मिलकर उस ट्रॉफी को उठाएंगे।"

इस बात को छह साल बीत गए। 13 सितंबर 2026 को ज्वेरेव एक बार फिर आर्थर ऐश एरीना में फाइनल खेल रहे थे। इस बार वे चैंपियन की मानसिकता से खेल रहे थे और बेन शेल्टन को 6-3, 7-6 (7-2), 5-7,6-4 से हराकर छह साल पहले अपने खेल करियर की सबसे खराब मेमोरी को डिलीट करते हुए अपनी टीम को संबोधित करते हुए कह रहे थे “हमने 30 साल तक कोई ग्रैंड स्लैम खिताब नहीं जीता था, और अब हमने तीन महीने के भीतर दो खिताब जीत लिए हैं। मुझे लगता है कि भगवान ने हमारी मेहनत, हमारे कष्ट और हमारे दर्द को देखा है। मुझे लगता है कि 2026 उन सभी वर्षों का परिणाम है जो इससे पहले हुए हैं, इसलिए आप सभी का धन्यवाद। आप लोग सचमुच अद्भुत हैं, और आप लोगों के बिना मैं यहाँ नहीं हो सकता था।”

इस जीत के साथ वे अपना दूसरा ग्रैंड स्लैम ही नहीं जीत रहे थे बल्कि उस लोकप्रिय कहावत को कुछ और वजन भी प्रदान कर रहे थे जो कहती है 'सब्र का फल मीठा होता है।'

अपनी पहली ग्रैंड स्लैम फाइनल हार के बाद इस साल अप्रैल तक वे दो और ग्रैंड स्लैम फाइनल खेले,लेकिन जीत नहीं पाए। वे 1995-2000 के बीच जन्मे 'नेक्स्ट जेन पीढ़ी' के मेदवेदेव,सिटसिपास,डोमिनिक थिएम, रूबलेव, बेरेटिनी और कैस्पर रुड में सबसे प्रतिभाशाली थे। ये एक ऐसी पीढ़ी थी जो दो पीढ़ियों के बीच सैंडविच बन गई और जिसे बहुत सारी उपलब्धियों से महरूम कर दिया गया। एक तरफ उम्र की सीमा के पार जाकर भी बिग थ्री के राफा,नोवाक और फेडरर ने इस पीढ़ी को अपना स्थान बनाने के लिए कोई स्पेस नहीं दिया। और जब ये तीनों कुछ निस्तेज होते, उससे पहले ही इनके बाद वाली पीढ़ी की प्रतिभा ने उन्हें कोई स्पेस क्रिएट नहीं करने दिया जिसकी नुमाइंदगी यानिक सिनर और अलकराज जैसे खिलाड़ी कर रहे हैं। 

जिस समय इन दो पीढ़ियों के खिलाड़ियों की प्रतिभा के बीच इस नेक्स्ट जेन पीढ़ी के खिड़कियों की प्रतिभा फेड हो रही थी,उस समय में अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने धैर्य के साथ अपने समय की प्रतिक्षा की। संयम रखा। अपनी प्रतिभा की धार पर सान चढ़ाई। संघर्ष जारी रखा। अपनी ऊर्जा बनाए रखी। परिणाम सामने था।

2026 तक आते आते राफा और फेडरर इतिहास बन चुके थे। नोवाक इतिहास बनने के कगार पर थे। नई पीढ़ी अपनी चोटों से जूझ रही थी। ये ज्वेरेव के लिए मौका था। उनका समय आ गया था। ऑस्ट्रेलिया ओपन के वे सेमीफाइनल में हार गए। लेकिन फ्रेंच ओपन जीतकर अपने ग्रैंड स्लैम खिताब का खाता खोला। विंबलडन में वे चैंपियन की तरह खेले। फाइनल तक पहुंचे। यहां वे चूक गए। लेकिन न्यूयॉर्क में वे इस बार एक चैंपियन की ऊर्जा और मानसिकता के साथ पहुंचे थे और वैसा ही उन्होंने खेला। जहां छह साल पहले उनके हाथों से ट्रॉफी छीन ली गई थी, वो उनके हाथों की शोभा बढ़ा रही थी। उनके अधर उसे स्पर्श कर रहे थे।

कोई भी जीत ऐसे ही किसी का दामन नहीं थामती। वे खेल में इंतिहाई तरीके से खेल में इन्वॉल्व थे। वे खेल पर और हरेक अंक पर इस कदर फोकस्ड थे कि उन्हें अपनी जीत का पता ही नहीं चला। वे चैंपियनशिप अंक जीतकर अगली सर्विस के लिए बेसलाइन पर पहुंच गए थे। तब उनकी टीम से इशारा हुआ कि वे जीत चुके हैं। उनके चेहरे पर हल्का सा विस्मय फैला। मुस्कुराहट उनके चेहरे का आवरण बन गई। उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला दिए। सारा आकाश उन्होंने अपने अंक में समेट लिया। खुशी ने अपना स्पेस आंखों में ढूंढा। खुशी तरल हो आंखों में समा गई। 

एक खिलाड़ी जिसके लिए चैंपियन बनना 29 साल तक केवल एक सपना भर रह गया था। तीन महीनों के अंतराल में वो दो बार चैंपियन बन गया था। सपनों से परे। असल जिंदगी में।

अलेक्जेंडर ज्वेरेव के लिए सब्र का फल मीठा था।



पर बेन शेल्टन का क्या!

उनका क्या जिनके लिए प्रतीक्षा समाप्त नहीं होती।  वो बेचैनी पैदा करती है। कसक काँटे की तरह दिल में कचोटती है। प्रतीक्षा कुछ और लंबी होती जाती है। जैसे बेन के लिए। अमेरिका के लिए। अमेरिका के टेनिस प्रेमियों के लिए। अश्वेत अमेरिकन्स के लिए।

बेन शेल्टन स्टेडियम में बैठे उन 24 हजार अमेरिकन्स की उस उम्मीद के लिए खेल रहे थे जो कहती थी कि इस मैदान पर 2003 में एंडी रोडिक के बाद एक नया अमेरिकन खिलाड़ी चैंपियन बनेगा। वे उन अश्वेत अमेरिकन्स की उम्मीदों का बोझ लिए खेल रहे थे जो प्रतीक्षा कर रहे थे कि 1968 में आर्थर ऐश के बाद कोई अमेरिकन अश्वेत यूएस चैंपियन बनेगा। शेल्टन खुद के पहले ग्रैंड स्लैम खिताब जीत लेने के सपने को पूरा करने के लिए खेल रहे थे। 

इस उम्मीद के लिए उन सभी के पास एक वाजिब कारण था। एक स्मृति थी। एक चार महीने पहले हुए अंतहीन प्रतीक्षा की समाप्ति की स्मृति। उनकी स्मृति में एक ऐसी जीत थी जो 53 साल बाद संभव हुई थी। न्यूयॉर्क निक्स ने 1973 के बाद अपना कोई एनबीए खिताब जीता था। 13 जून को पांचवें गेम में सान एंटोनियो स्पर्स को हराकर 4-1 से। इससे पहले चौथे गेम में इसी शहर के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन एरीना में न्यूयॉर्क निक्स की टीम तीसरे क्वार्टर तक 29 अंकों से पिछड़ चुकी थी। लेकिन निक्स ने 107-106 से ये मुकाबला जीत लिया था। एनबीए के फाइनल्स के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। अमेरिकन्स जानते थे,चमत्कार होते हैं। इसी शहर में चार महीने पहले की स्मृति उनके पास थी।

पर चमत्कार हमेशा नहीं होते। उन सब के लिए प्रतीक्षा अधूरी रही।

शेल्टन उम्मीदों के बोझ तले दब गए। पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने के तनाव को ठीक तरह से हैंडल करने से चूक गए। विपक्षी के अनुभव से पिछड़ गए। 

वे हार गए क्योंकि आंकड़े और अनुभव दोनों ही ज्वेरेव के पक्ष में थे। ज्वेरेव ने शुरु से ही इसका फायदा उठाया। उनकी सर्विस इतनी जोरदार थी कि पहले दो सेटों में अपनी पहली सर्व पर केवल तीन अंक गंवाए। कोई ब्रेक प्वाइंट शेल्टन को नहीं दिया। हां,तीसरे सेट के 12वें गेम में ज़्वेरेव की सर्विस शेल्टन ने ब्रेक की और सेट जीतकर अपनी उम्मीदें जिंदा रखीं। लेकिन इससे परिणाम नहीं बदलना था। नहीं ही बदला। ज़्वेरेव ने चौथे सेट के शुरु में ही शेल्टन की सर्विस ब्रेक की और फिर सातवें गेम में दूसरी बार सर्विस ब्रेक कर साढ़े तीन घंटे के संघर्ष को विराम दिया।

यूएस ओपन को एक नया चैंपियन मिल गया था।

ये अलेक्जेंडर साशा ज्वेरेव थे।

चैंपियनशिप साशा को मुबारक।

Monday, 8 June 2026

साशा का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब

 


रात चाहे जितनी स्याह हो उसे सुबह की रोशनी में विलीन हो जाना है। शिशिर की असीम निस्सारता को बसंत की खिलखिलाहट में तब्दील हो जाना है। निराशा के बादल चाहे जितने घने हों उम्मीद की किरनों का उन बादलों को भेद ही देना है। राह लंबी हो सकती है,लेकिन धैर्य ना छूटे तो अंततः मुकाम हासिल हो ही जाना है। कल फिलिप कार्टियर की सुर्ख लाल सतह पर फ्रेंच ओपन के फाइनल में जर्मनी के एलेक्जेंडर साशा ज्वेरेव की इटली के फ्लाविया कोबोल पर 6-1, 4-6, 6-4, 6-7(4-6), 6-1 से संघर्षपूर्ण जीत कुछ ऐसी ही कहानी कहती है। साशा का ये पहला ग्रैंड स्लैम खिताब था।

साशा का फ्रेंच ओपन का ये ल खिताब दरअसल उनकी उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच की आवाजाही की कहानी है। उनके हार ना मानने के जज़्बे की कहानी है। चोटों से जूझते हुए उनके लगातार संघर्ष करने और कठोर परिश्रम की कहानी है। ये शिखर से एक साँस भर की दूरी से बार बार उनकी फिसलन की कहानी भी है। ये खिताब उनके 29 बसंत लंबे इंतजार की कहानी है। 

एक खिताब जो 555 जीत के बाद आया। चार ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने के बाद आया। दस साल के लंबे कॅरियर के बाद आया।

दरअसल ये नियति की गति की कहानी है।

इस बार के फ्रेंच ओपन के बीते एक पखवाड़े के समय ने रोला गैरों के फ़लक पर साफ़ साफ इबारत लिखी कि इस बार का पुरुष एकल का ये खिताब नियति ने साशा के लिए,उसके धैर्य के लिए और उसकी अनंत प्रतीक्षा के लिए पहले ही रिजर्व कर दिया है। वरना तो ये खिताब अलकाराज का ना हो जाता जो कलाई की चोट के चलते इस बार लाल मिट्टी पर खेलने से महरूम हो गए या यूं कहें कि नियति द्वारा कर दिए गए। इसके बाद भी साशा का कहां नंबर आता था। नंबर एक खिलाड़ी यानिक सिनर इसे ना जीत लेते और अपने ग्रैंड स्लैम खिताबों के संख्या अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी अलकराज के बराबर पहुंचा देते। लेकिन वे दूसरे दौर में अप्रत्याशित रूप से हार कर बाहर हो गए। साशा के रास्ते की एक और बाधा दूर हुई। लेकिन ठहरिए। अभी भी साशा का कहां नंबर आता है। नोवाक जोकोविच को क्यों भूले जा रहे हैं। वे अपने  25वें ग्रैंड स्लैम का शिद्दत से पीछा कर रहे थे और दो दौर में शानदार खेल दिखा कर अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर चुके थे। लेकिन नियति इस बार केवल और केवल साशा के पाले में थी। नोवाक तीसरे दौर में हारकर बाहर हो गए। अब जाकर साशा की चर्चा शुरू हुई। क्या साशा अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीत सकते हैं? साशा ने अपने खेल से दिखाया 'हाँ,क्यों नहीं'। 

याद कीजिए 2009 का फ्रेंच ओपन। इसमें पुरुष एकल खिताब  रोजर फेडरर ने जीता था। उन्होंने स्वीडन के रॉबिन सोडरिंग को हराया था। ये फेडरर का एकमात्र फ्रेंच ओपन खिताब था। दरअसल ये नियति ने तय किया था कि इस बार का खिताब रोजर फेडरर का ही होगा। इससे पहले राफेल नडाल बार बार उनके और फ्रेंच ओपन के बीच उपस्थित हो जाते। वे फेडरर को फाइनल में चार बार हरा चुके थे। फेडरर जानते थे कभी वो समय आयेगा जब फाइनल में नडाल उनके सामने नहीं होंगे। ये यही साल था। इस बार सोडरिंग ने अप्रत्याशित रूप से रफ़ाल को चौथे दौर में हराकर बाहर कर दिया। फेडरर जानते थे ईश्वरीय वरदान से कम नहीं। और उन्होंने ना केवल अपना पहला फ्रेंच ओपन जीता बल्कि करियर ग्रैंड स्लैम पूरा किया और साथ ही पीट संप्रास के 14 ग्रैंड स्लैम खिताब के रिकॉर्ड की बराबरी भी की।

इस बार साशा जानते थे कि ना तो नोवाक और ना ही अलकराज और सिनर उनके रास्ते में हैं। ये विधि का विधान रचा गया था। साशा ने चूक नहीं की।  उन्होंने हर उपाय किया। उन्होंने अपने खेल में काले रंग की ड्रेस पहनी हुई थी। आप उन्हें किसी लांग शॉट में देखेंगे तो लगेगा उनकी काले रंग की ड्रेस लाल रंग के मैदान पर काले टीके सरीखी है। एक ऐसा टीका जिसे दुनिया जहान की माएं अपने बच्चों के माथे उसे दुनिया की हर बुरी नज़र से बचाए रखने को लगाती है। क्या पता अपने हर दुर्भाग्य से बचने के लिए ही इस बार ज्वेरेव ने इस काली ड्रेस का टीका लगाना सुनिश्चित किया हो।

साशा को कोई भी चीज उतनी आसानी से नहीं मिलती। इस बार का फाइनल भी ऐसा ही था। मैच पांच सेट तक खिंचा। पूरा मैच ऊपर नीचे होता रहा। कभी साशा के पक्ष में,कभी कोबोली के पक्ष में। पहले ही गेम में साशा ने कोबोली की सर्विस ब्रेक की और आसानी से पहला सेट 6-1 से जीता। तब लगा साशा आसानी से जीतने जा रहे हैं। लेकिन साशा को कोई चीज आसानी से मिल जाए तो फिर साशा,साशा कहां रह जाते। अगला सेट कोबोली ने 6-4 से जीतकर मैच में जान फूंक दी। अब बारी साशा की थी तो उन्होंने बिल्कुल उसी अंतर यानी 6-4 से जीतकर 2-1 की बढ़त ले ली। लेकिन ये बढ़त साशा की जीत सुनिश्चित नहीं करती थी। याद कीजिए  2020 का यूएस ओपन का फाइनल। डोमिनिक थिएम के विरुद्ध भी साशा  ऐसे ही  2-1 की बढ़त बना चुके थे और अंततः हार गये थे। अब संघर्ष निर्णायक मोड पर आ रहा था। चौथे सेट में किसी ने भी अपनी सर्विस नहीं खोई और सेट टाई ब्रेक में गया और बाजी कोबोली ने मारी और सेट 7-6(6-4) से जीतकर स्कोर 2-2 की बराबरी पर ला खड़ा किया। लेकिन फाइनल सेट में अचानक साशा ने गियर बदला और कमाल का खेल दिखाया।

 दरअसल कोबोली ने चौथे सेट के बाद एक ब्रेक लिया। वे यूरिनल गए। ये पांच मिनट का ब्रेक था। इसमें साशा ने अपने को पुनर्संयोजित किया। वे जिस नर्वस क्रैंप का शिकार हो गए थे,उससे अपने शरीर को मुक्त किया और फिर क्या ही लाजवाब टेनिस खेली जिसका कोबोली के पास कोई जवाब नहीं था। उन्होंने ये सेट 6-1 से जीता,और और अपनी असाध्य इच्छा पूरी की।

ज्वेरेव और कोबोली के बीच का मुकाबला केवल दो दोस्तों या दो खिलाड़ियों के बीच का मुकाबला भर नहीं था। ये दो अलग अलग  कालखंड के बीच का मुकाबला भी था।  खेल की दुनिया में लगभग प्रौढ़ होती पीढ़ी का बिल्कुल नई युवा पीढी के बीच का मुकाबला था। ये अनुभव और युवा जोश के बीच मुकाबला था। साशा लगभग 10 साल से सर्किट में थे जबकि कोबोल ने अभी सफर शुरू ही किया था।  साशा के पास ग्रैंड स्लैम के कई फाइनल खेलने का अनुभव था और कोबोली का ये पहला पहला ही  फाइनल मुकाबला था। जहां कोबोली सेमीफाइनल में बिना खेले चार दिन के आराम के बाद कोर्ट पर आए थे, वहीं साशा एक संघर्षपूर्ण मुकाबला खेलकर फाइनल में थे। लेकिन दोनों के बीच समानता ये थी कि ये सर्किट के दो सबसे शानदार सर्विस करने वाले थे।

ये मुकाबला बहुत हद तक बेहतरीन सर्विस करने और  अपने ग्राउंड स्ट्रोक्स को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने का मुकाबला था। साशा इसमें बीस साबित हुए और  जीत ने उनका वरण किया। साशा ने 80 प्रतिशत अपनी पहली सर्विस सही की और उसमें से 73 प्रतिशत पर अंक अर्जित किए। जबकि कोबोली ने केवल 53 प्रतिशत पहली सर्विस सही की और केवल 68 प्रतिशत पर अंक हासिल किए। इसका नतीजा हुआ कि उन्हें गेम जीतने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ी और अधिक ऊर्जा खर्च की। उनकी सर्विस इतनी प्रभावशाली थी कि उनके केवल दो सर्विस गेम ड्यूस में गए। और ये भी कि साशा ने अपने स्ट्रोक्स को बेहतर ढंग से खेला और कोबोली के मुकाबले आधी बेज़ा गलतियां की। यही स्कोर का और हार जीत का अंतर है।

दरअसल पुरुष टेनिस में ज्वेरेव एक ऐसी पीढ़ी के प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं जो अपनी पूर्ववर्ती सीनियर खिलाड़ियों और परवर्ती युवा खिलाड़ियों के बीच सैंडविच बन गई और टेनिस इतिहास के दाय में अपना सही हिस्सा और स्थान नहीं बना पाई। जिन उपलब्धियों के वे हकदार थे,उनसे वे वंचित रह गए।  इस खिलाड़ियों में मुख्य हैं डेनिल मेदवेदेव,डोमिनिक थिएम, सिटसिपास और खुद अलेक्जेंडर ज्वेरेव। उनसे पहली पीढ़ी की फेडरर ,नडाल और जोकोविच की त्रयी इस कदर प्रतिभाशाली और डॉमिनेंट थी कि उनकी छाया से इस पीढ़ी को उबरने का मौका नहीं मिला। फेडरर नोवाक नडाल की त्रयी इतने लंबे समय तक मैदान में प्रभावी रही कि इन खिलाड़ियों को कोई मौका मिल पाता कि अलकाराज और सिनर जैसे प्रतिभाशाली युवा खिलाड़ियों की नई पीढ़ी मैदान में आ गई। हालांकि इन दो पीढ़ियों के बीच में इस बीच की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे दो खिलाड़ी ज्वेरेव और मेदवेदेव अभी भी डटे हैं और मजबूत चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं। 

एक खेल प्रेमी,दर्शक और प्रसंशक होने के नाते आपकी सहानुभूति और समर्थन हमेशा उस खिलाड़ी के लिए होता है जिसे जीत,खिताब और ट्रॉफी की अधिक आवश्यकता होती है। कोबोली और ज्वेरेव दोनों अपने पहले ग्रैंड स्लैम खिताब के लिए खेल रहे थे। ज्वेरेव के पास समय कम था। जो था भी वो तेजी से फिसल रहा था। इसीलिए ज्वेरेव के बड़े प्रसंशक ना होते हुए भी उनकी इस जीत से एक अलग किस्म की संतुष्टि और सुकून का अनुभव हो रहा है जो अगले कुछ समय तक मन मस्तिष्क पर तारी रहने वाला है।

फिलहाल तो साशा को लंबी प्रतीक्षा और कड़ी मेहनत से मिले इस पहले ग्रैंड स्लैम खिताब की बहुत बधाई।



एक प्रतिद्वंदिता:दो विदाई

  एक कशमकश है कि अब इख़्तिताम पज़ीर हुआ चाहती है। एक द्वंद्व है जो विराम लिया चाहता है। एक प्रतिद्वंदिता है जो अनिर्णीत समाप्त हुआ चाहती है। द...