
Tuesday, 2 July 2024
ये जीत भी कमतर तो नहीं

Monday, 30 January 2023
छोटी छोटी कहानियां का बड़ा संसार
खेल मैदान की अभी हाल की तीन खबरें-सानिया मिर्ज़ा के शानदार खेल जीवन का समापन,विनेश फोगाट की बगावत और अंडर 19 क्रिकेट विश्व कप में भारतीय लड़कियों की जीत,इस बात की ताईद करती हैं कि देश बदल रहा हो या नहीं, समाज बदल रहा हो या नहीं, पर लड़कियां बदल रही हैं,उनकी सोच बदल रही है और उनकी ज़िंदगी बदल रही है।
अब लड़कियों के हाथों को चूल्हा,चौका और चूड़ियां नहीं रुचती
बल्कि बैट और बॉल शोभते हैं,रैकेट शोभते हैं, मैट और मैदान शोभते हैं।
पहले अंडर 19 क्रिकेट विश्व कप जीतने वाली लड़कियों की चेहरों पर फैली खुशी देखिए और फिर उनके जीवन में झांकिए,तो आपको पता चलेगा कि ये सफलता लड़कियों की लगन,उनके परिश्रम,उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति,कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी हार ना मानने का जज़्बा और सबसे ऊपर उनकी नई और बदलती का परिणाम है।
उन लड़कियों में एक मन्नत है। गांव चिल ज़िला पटियाला। खेलने के लिए पैसा पास नहीं। लड़कों की कोचिंग में जुगाड़ हुई तो लड़के साथ खिलाने को तैयार नहीं। पर उसने हार नहीं मानी। अड़ी रही। कोचिंग जाती रही। अब वो टीम की 'जोंटी रोड्स'है।
एक और लड़की है सोनम यादव। उम्र केवल 15 साल। पिता मजदूर। पता ज़िला फिरोजाबाद,उत्तर प्रदेश। देश दुनिया की लड़कियों की कलाइयों को सजाने वाली चूड़ियां बनाने के लिए विश्व प्रसिद्ध शहर की इस लड़की को कांच की चूड़ियों की जगह रास गुगली। जीवन की पिच पर भी और खेल की पिच पर भी।
एक लड़की है फलक नाज़। संगम नगरी प्रयागराज की ही नहीं देश की शान बन चुकी है अब। चपरासी पिता ने नाज़ों से पाला पर नाजुक नहीं बनाया। उसकी तेज गेंदें विपक्षी बल्लेबाजों पर कहर बरपाती हैं।
इस लड़की का नाम है अर्चना। पता ग्राम रतई पुरवा ज़िला उन्नाव। पिता बचपन में छोड़ बस चले। मां ने हार नहीं मानी। नतीजा विश्व विजेता भारतीय टीम की जान।
एक लड़की दिल्ली की-श्वेता सहरावत। वॉलीबॉल,बैडमिंटन,स्केटिंग तक में हाथ आजमाया। पर रास आया क्रिकेट। नतीजा विश्व कप में 140 की स्ट्राइक और 99 की औसत से सर्वाधिक 297 रन।
भोपाल की सौम्या तिवारी। कपड़े धोने की थपकी से गली मोहल्ले में क्रिकेट खेलने से लेकर भारतीय टीम के उपकप्तान का सफर करने वाली लड़की। एक योद्धा लड़की। कोच द्वारा कोचिंग देने से इनकार करने पर भी हार ना मानने वाली लड़की। नतीजा विश्व कप के फाइनल में विजयी रन बनाने वाली बैटर।
और अंत में, कप्तान शेफाली वर्मा। 15 साल और 285 दिन की सबसे कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय अर्धशतक बना कर सचिन का रिकॉर्ड तोड़ने वाली लड़की। अंडर 19 विश्व कप,सीनियर विश्व कप और राष्ट्रमंडल प्रतियोगिता के फाइनल में खेलने वाली अकेली खिलाड़ी।
छोटी छोटी लड़कियों की ये छोटी छोटी कहानियां उनके बड़े बड़े सपनों और बड़े बड़े संघर्षों की कहानियां हैं। ये छोटी छोटी जगहों की छोटी छोटी कहानियां सफलता का इतना बड़ा संसार रचती हैं कि उन्हें खुद भी कहाँ विश्वास हो पाता होगा। क्या पता उनका खुद का रचा संसार उन्हें ही 'लार्जर दैन लाइफ' प्रतीत होता हो।
-------------
और हां, भारत में दो लड़कियों के एक पिता को लड़कियों की ये सफलता बरसात की पहली फुहार की भीगी भीगी रेशम सी मुलामियत का अहसास ना कराती होगी तो और क्या कराती होगी।
Wednesday, 23 November 2022
एक कदम आगे
एक कदम आगे
000
बीसीसीआई के एक निर्णय के अनुसार 'अब से महिला क्रिकेटरों को भी पुरुषों के समान पारिश्रमिक मिलेगा'। 2006 में भारतीय महिला क्रिकेट एसोसिएशन के बीसीसीआई में विलय होने के बाद से बीसीसीआई द्वारा महिला क्रिकेट के लिए पहला बड़ा और ठोस कदम है। ये लड़कियों की कड़ी मेहनत और संघर्ष का नतीजा है। ये वही लड़कियां हैं जिन्हें कभी अपनी किट और दैनिक भत्तों तक के लिए संघर्ष करना पड़ता था।
मिताली राज,हरमनप्रीत कौर ,झूलन गोस्वामी, स्मृति मंधाना जैसी खिलाड़ियों ने अपने खेल के को उन ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया कि वे 'क्रिकेटिंग आइकॉन' बन गईं। हाल के दिनों में भारतीय महिला क्रिकेट ने महत्वपूर्ण सफलताएं प्राप्त की हैं और क्रिकेट जगत में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। इसका दबाव भी इस निर्णय में ज़रूर रहा होगा।
सच बात तो ये है कि बीसीसीआई ने ये लड़कियों को सौगात खैरात में नहीं दी है। दरअसल अब उनकी उपेक्षा की ही नहीं जा सकती थी। उन्हें पता है कि अब महिला भारत में इतना लोकप्रिय हो गया है कि उसे बेचा जा सकता है। निसंदेह ये लड़कियों की कड़ी मेहनत का हासिल है। और बीसीसीआई इस महत्वपूर्ण अवसर को कैसे हाथ से जाने दे सकता था।
ध्यान दीजिए अगले सीजन से महिला आईपीएल भी शुरू होने जा रहा है।
और हां ये समानता अभी अधूरी है। लड़ाई बाकी है। ये केवल फीस की समानता है। अनुबंध में अभी भी भारी अंतर है।
----------
फिर भी बहुत बधाई लड़कियों!
Sunday, 25 September 2022
थम गई चकदाह एक्सप्रेस
शहर लंदन भी क्या शहर है। कितना खुशकिस्मत। कितना प्रिविलेज्ड। फुटबॉल का वेम्बले इस शहर में है। टेनिस का विंबलडन इस शहर में है। क्रिकेट का लॉर्ड्स इस शहर में है।
शायद ये इस शहर का आकर्षण ही है कि लंबे समय से अनवरत दौड़ रहीं दो खेल एक्सप्रेस यहां आकर ठहर जाती हैं हमेशा हमेशा के लिए।
ये साल 2022 है। तारीख़ 24 सितंबर की है। खेल इतिहास में दो सफे लिखे जा रहे हैं। दो खेलों के दो महान खिलाड़ी अपने अपने खेल मैदान को अलविदा कह रहे हैं।
24 साल से निरंतर दौड़ रही टेनिस की 'फ़ेडेक्स'शहर के 'द ओ टू' एरीना में आकर ठहर जाती है।
उधर कोलकाता के ईडन गार्डन से एक क्रिकेट एक्सप्रेस 'चकदा एक्सप्रेस' 20 साल लंबी अनवरत यात्रा कर क्रिकेट के मक्का 'लॉर्ड्स'पहुंचती है और यहां आकर विश्राम की मुद्रा में ठहर जाती है।
महिला क्रिकेट की दुनिया की सबसे सफल और सबसे तेज गेंदबाज झूलन निशित गोस्वामी अपने बेहद सफल और 20 साल लंबे कॅरियर के समापन की घोषणा करती हैं।
ये बीस साल लंबा जीवन हैरतअंगेज कर देने वाला है। इस दौरान वे 12 टेस्ट मैच, 204 एकदिवसीय मैच और 68 टी20 मैच खेलती हैं। वे एकदिवसीय क्रिकेट में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाली खिलाड़ी हैं। उन्होंने कुल 255 विकेट लिए हैं। दक्षिण अफ्रीका की शबनिम इस्माइल के 191 और ऑस्ट्रेलिया की फ्रिट्ज़पेट्रिक से मीलों आगे। इतना ही नहीं क्रिकेट के सभी फॉर्मेट में कुल मिलाकर सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाली खिलाड़ी हैं। उनके नाम कुल 355 अंतरराष्ट्रीय विकेट हैं। उनके बाद कैथरीन ब्रन्ट (329),एलिस पेरी(313)शबनिम इस्माइल(309) और अनीसा मोहम्मद (305) ही तीन सौ से अधिक विकेट लेने वाली गेंदबाज हैं।
झूलन एक बेहतरीन आल राउंडर खिलाड़ी हैं। मध्यम तेज गति की गेंदबाज और मध्यमक्रम की राइट हैंड बल्लेबाज़। गति उनकी बोलिंग का सबसे बड़ा हथियार है। वे निरंतर 120 किमी की गति से गेंद फेंकती रहीं है। तेज गति और अचूक लेंथ और लाइन उन्हें दुनिया की सबसे सफल गेंदबाज बनाती है।
झूलन साल 2002 में 19 साल की उम्र में चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ एकदिवसीय मैच से अपने अंतरराष्ट्रीय कॅरियर की शुरुआत करती हैं। तीन महीने बाद इंग्लैंड के विरुद्ध ही वे अपना पहला टी20 मैच खेलती हैं। टेस्ट क्रिकेट का आगाज़ करने के लिए उन्हें चार साल और इंतज़ार करना पड़ता है। लेकिन इसकी शुरुआत भी होती इंग्लैंड के विरुद्ध ही है।
क्या ही संयोग है वे अपने कॅरियर की समाप्ति भी इंग्लैंड के खिलाफ ही मैच से करती हैं। कितनों के भाग्य में कॅरियर की समाप्ति लॉर्ड्स के मैदान में करना लिखा होता है। ये झूलन के भाग्य में था। ये उन्हें मिला नहीं। उन्होंने इसे अर्जित किया है।
भारतीय महिला क्रिकेट टीम इंग्लैंड के दौरे पर है। वो पहले दो मैच जीतकर 2-0 की बढ़त ले चुकी है। ऐसा पिछले 24 सालों में पहली बार हो रहा है।
फिर 24 सितंबर का दिन आता है। भारत इंग्लैंड के विरुद्ध सीरीज का तीसरा मैच होने जा रहा है। भारतीय बालाएं सीरीज जीत चुकी हैं। पर उनकी आंखें नम हैं। उनके हृदय मलिन हैं। लॉर्ड्स की फिजा में नमी उग आई है। सारा वातावरण सीला सीला सा है। उनकी अपनी पूर्व कप्तान, दुनिया की सबसे सफल गेंदबाज आज अंतिम बार जो मैदान पर उनके साथ उतरेगी।
झूलन गोस्वामी इस मैच के बाद क्रिकेट को विदा कह देंगी।
अब अद्भुत दृश्य आकार लेते जाते हैं।
मैच से पहले टॉस हो रहा है। भारतीय कप्तान टॉस के लिए अकेले नहीं जाती। उनके साथ झूलन जा रहीं हैं। इंग्लैंड की कप्तान एमी जोंस सिक्का उछालती हैं और झूलन 'हेड' कहती हैं। टॉस एमी जीतकर क्षेत्र रक्षण चुनती हैं। अब झूलन और एमी हाथ मिलाती हैं। झूलन के बराबर खड़ी हरमनप्रीत की आंखें डबडबा आई हैं।
अब भारतीय टीम बैटिंग कर रही है। भारत के सात विकेट आउट हो चुके हैं। पूजा वस्त्रकार आउट होकर वापस पैवेलियन लौट रही हैं और झूलन मैदान में प्रवेश कर रही हैं। सीमारेखा के अंदर इंग्लैंड की सभी खिलाड़ी दो समानांतर पंक्तियों में खड़ी हैं। वे झूलन को गार्ड ऑफ ऑनर दे रही हैं।
अब भारतीय टीम फील्डिंग के लिए मैदान में जा रही है। भारतीय खिलाड़ी कतारबद्ध खड़ी हैं और झूलन को 'गार्ड ऑफ ऑनर'दे रही हैं। वे झूलन को ऐसे ही पिच तक ले जाती हैं।
ये इंग्लैंड की पारी का 36वां ओवर है। गेंद झूलन के हाथ में हैं। वे अपनी इस पारी का दसवां और अपने खेल कैरियर की आखिरी 6 गेंद फेंकने वाली हैं। 5 गेंद फेंक चुकी हैं। अब उन्होंने अपनी आखिरी गेंद फेंकी। ये एक डॉट बॉल थी। उनके जीवन की 10005वीं गेंद थी। अब तक किसी और गेंदबाज ने इतनी गेंद नहीं डाली हैं। पर झूलन औरों से जुदा हैं। वे ये कारनामा कर सकती हैं। उन्होंने कर दिखाया है।
आखिरी गेंद फेंकते ही हरमनप्रीत दौड़कर झूलन को बाहों में भर लेती हैं। उनकी आंखों से पानी बरस रहा है। इतने में सारे खिलाड़ी उनसे लिपट गए हैं। आंखें सबकी बरस रहीं हैं।
मैच समाप्त हो गया है। भारत ने ये मैच 16 रनों से जीतकर सीरीज क्लीन स्वीप कर ली है। खिलाड़ियों ने झूलन को कंधों पर उठा लिया है और कंधों पर झूलन को मैदान से बाहर जाए जाते हैं। ऐसी बिदाई झूलन के अलावा बस क्रिकेट के भगवान सचिन को ही नसीब हुई है।
दरअसल लॉर्ड्स के मैदान के ये अद्भुत दृश्य, अपने साथी को ऐसी विदाई, ऐसा सम्मान पाने के दृश्य ऐसे ही नहीं बनते। इसके पीछे घोर संघर्ष,कड़ी मेहनत, अदम्य इच्छाशक्ति और दृढ़ मनोबल की ज़रूरत पड़ती है। झूलन को ये सम्मान यूं ही नही मिल गया। ये उन्होंने अपने लिए अर्जित किया है।
ये सम्मान उनके द्वारा देखे गए सपने और उन सपनों को पूरा करने की उनकी लगन,उनकी कड़ी मेहनत,उनके असाधारण परिश्रम और अदम्य साहस का प्रतिफल है। ये क्रिकेट के लिए उनका जूनून था। टीन ऐज में रोजाना चकदाह से कोलकाता के विवेकानंद स्टेडियम तक का 80 किलोमीटर का फ़ासला झूलन जैसी जीवट की बालिका के बस की बात हो सकती है।
ये झूलन का जूनून, उनकी मेहनत और लगन ही थी कि चकदाह से कोलकाता का सफर चेन्नई से लॉर्ड्स लंदन तक के सफर में तब्दील हो जाता है। कि फुटबॉल की दीवानी एक लड़की विश्व की सबसे सफल गेंदबाज बन जाती है। कि वो अद्भुत सम्मान और अपूर्व प्रेम की हकदार बन जाती है।
झूलन का ये सम्मान दरअसल एक खिलाड़ी भर का सम्मान नहीं है। ये भारतीय महिला क्रिकेट का सम्मान है। झूलन का संघर्ष केवल एक खिलाड़ी का संघर्ष नहीं है,ये भारतीय महिला क्रिकेट का संघर्ष और विजयगाथा है।
भारतीय महिला क्रिकेट का सम्मान पाने और समान दर्जा पाने का संघर्ष पिछली शताब्दी में सत्तर के दशक में शांता रंगास्वामी जैसी ख़िलाडियों के साथ शुरू होता है। 2006 में महिला क्रिकेट का प्रबंधन बीसीसीआई अपने हाथों में ले लेता है। पर महिला खिलाड़ियों का संघर्ष जारी रहता है। उनकी स्थिति किस हद तक दयनीय थी इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें अपनी किट तक के लिए लड़ाई लड़नी होती थी। उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी योग्यता से उन्होंने विश्व क्रिकेट में अपनी हैसियत बनाई और वो सम्मान हासिल किया जो 24 सितंबर 2022 को लॉर्ड्स में झूलन को मिला।
झूलन की असाधारण विदाई और सम्मान केवल झूलन का सम्मान नहीं है,ये भारतीय महिला क्रिकेट का सम्मान है,पूरी आधी आबादी का सम्मान है।
-----------------
झूलन को असाधारण क्रिकेट कॅरियर और उपलब्धियों के लिए बधाई और जीवन की नई पारी के लिए शुभकामनाएं।
खेल मैदान से अलविदा झूलन।
Saturday, 13 March 2021
'राज' मिताली का
2006 में दुनिया के सबसे अमीर और प्रोफ़ेशनल क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई ने भारतीय महिला क्रिकेट की बागडोर अपने हाथ में थामी और 'वूमेन्स क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया' का बीसीसीआई में विलय कर दिया गया। इस उम्मीद के साथ कि जिस तरह भारतीय पुरुषों ने क्रिकेट के महासागर में महारत और शोहरत की अनंत गहराई नापी है,ठीक उसी तरह भारतीय बालाएं क्रिकेट के आकाश में प्रसिद्धि की बलन्दी को छु पाएंगी। ये उम्मीद कितनी पूरी हुई और बीसीसीआई का इसमें कितना योगदान रहा,ये सवाल बहसतलब है। पर ये बात जरूर है कि भारतीय बालाओं ने खुद पर भरोसा करना सीख लिया है और उन्होंने अपने भरोसे,अपनी योग्यता के बूते अपने पंखों को इतना मजबूत बना लिया है कि वे अपनी स्वच्छंद उड़ान भर सकें और नित नए मुकाम हासिल कर सकें।
12 मार्च को दक्षिण अफ्रीका के साथ लखनऊ के इकाना स्टेडियम में खेली जा रही वर्तमान सीरीज के तीसरे एक दिवसीय मैच में मिताली दुराई राज एक ऐसा मील का पत्थर स्थापित कर रहीं थीं जिस पर महिला खिलाड़ी तो क्या पुरुष खिलाड़ी भी रश्क कर उठें। भारतीय इनिंग का 28वां ओवर चल रहा था। ऐनी बॉश के सामने मिताली राज थीं। वे अपने 32 रन के व्यक्तिगत स्कोर पर थीं। उनके 10 हज़ार अंतरराष्ट्रीय रन में सिर्फ 03 की कमी थी। उन्होंने एक चौका लगाया और 10 हज़ार रन पूरे किए। अब वे 10 हज़ार रन बनाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी और इंग्लैंड की चार्लोट एडवर्ड्स के बाद विश्व की दूसरी खिलाड़ी बन गई हैं। 10 हज़ार अंतरराष्ट्रीय रन बनाना निसन्देह एक असाधारण उपलब्धि है।
वे एक गेंद पर चौका लगाकर एक असाधारण उपलब्धि हासिल करती हैं और ठीक अगली गेंद पर आउट होकर वापस पवैलियन लौट जाती हैं। ये दो गेंद ज़िन्दगी का और विशेष रूप से महिला ज़िन्दगी का रूपक गढ़ती हैं। ज़िन्दगी पल में तोला पल में माशा। ज़िन्दगी चाहे जैसी ही लेकिन मिताली राज की क्रिकेट यात्रा तो कम से कम ऐसी नहीं है। उन्होंने 1999 में एक बार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे कदम दर कदम प्रसिद्धि के शिखर पर चढ़ती गई और अब तक शिखर पर पहुंच कर ठहर गई हैं। और वे अब उस ऊंचाई पर हैं जिस पर पहुंच पाना किसी और के लिए नामुमकिन नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है।
मिताली ने 16 साल की उम्र में पहला अन्तर्राष्ट्रीय मैच आयरलैंड के विरुद्ध एकदिवसीय मैच था जिसमें उन्होंने नॉट आउट 114 रन बनाए। पहला टेस्ट मैच 2002 में इंग्लैंड के विरुद्ध और पहला टी20 मैच 2006 में इंग्लैंड के विरुद्ध खेला था। उन्होंने कुल 10 टेस्ट मैच खेले जिसमें 01 शतक और चार अर्धशतकों की सहायता से 51 की औसत से 663 रन बनाए। उन्होंने 89 टी20 मैचों में 17 अर्धशतकों की सहायता से 37.52 की औसत से 2364 रन और 211 टेस्ट मैच में 6974 रन बनाए हैं। वे 7हज़ार एकदिवसीय रन बनाने से केवल 26 रन दूर हैं और जब आप ये पढ़ रहे होंगे तो सकता है ये माइलस्टोन भी उन्होंने प्राप्त कर लिया हो। महिला क्रिकेट इतिहास की वे ऐसा करने वाली एकमात्र खिलाड़ी होंगी। साथ ही दो एकदिवसीय विश्व कप के फाइनल में टीम को पहुंचाने वाली एकमात्र भारतीय कप्तान।
वे अपनी उपलब्धियों के लिए 'लेडी सचिन'के नाम से जानी जाती हैं। पर वे भारतीय महिला क्रिकेट की गावसकर ठहरती हैं। वे गावस्कर की तरह अपनी असाधारण खेल और उपलब्धियों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होने वाली और प्रसिद्धि पाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। हरमनप्रीत कौर उनके बाद आईं।अपनी कॉपी बुक स्टाइल,शानदार स्ट्रोक्स और एक छोर से पारी को थामे रखने में गावस्कर सरीखी ही लगती हैं। सिर्फ इतना भर ही नहीं। जिस तरह का पुराने के जाने और नए के आने के दो कालों का, दो महान व्यक्तित्वों की टकराहट का और खेल की दो शैलियों के बीच का द्वंद और संघर्ष पुरुष क्रिकेट में गावस्कर और कपिल रचते हैं,उसका प्रतिरूप महिला क्रिकेट में मिताली और हरमनप्रीत कौर रचती हैं।
वे एक वायुसैनिक की पुत्री हैं। उन्होंने बचपन से आसमान में उड़ते वायुयानों को देखा होगा। बहुत करीब से देखा होगा। निसन्देह वे उससे प्रभावित होती होंगी। उससे एक आत्मीयता बनी होगी। अवचेतन में ऊंचाइयों को छूने की चाह जन्मी होगी। इस चाह को पूरा करने के लिए नीला आसमां ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है। क्रिकेट का हरा मैदान तो था। रनवे ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है,22 ग़ज़ की पिच तो थी ना। और कोई यान ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है,एक अदद बल्ला तो था ना। बस चाहना और होंसला के पंख होने चाहिए होते हैं। वे मिताली के पास थे। हां,उन पंखों को कोई खोलने वाला चाहिए था। वो भी मिला। उन पंखों को खोला संपत कुमार ने। उन्हें असीमित उड़ान भरने की काबिलियत दी। दरअसल संपत कुमार कमाल के पारखी थे।उन्होंने पहली नज़र में हीरे को पहचान लिया था। फिर मेहनत से उसको तराश दिया। आज वो हीरा भारतीय महिला क्रिकेट के माथे सजा है।
पर जीवन में कुछ दुर्योग भी आते हैं। बात 1997 की है। 14 साल की उम्र ही मिताली को विश्व कप के संभावितों में चुना लिया गया था। उस के कुछ समय बाद ही संपत कुमार की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। शायद उनका काम पूरा हो गया था। कहते हैं शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे। ताकि कोई दूसरा ताजमहल ना बन सके। तो क्या यहां ईश्वर को लगा कि एक नायाब हीरा तराशा जा चुका है। और ऐसा कोई दूसरा हीरा नहीं होना चाहिए। शायद हां। शायद ना। पर संपत चले गए।
इसे एक संयोग ही मानना चाहिए कि एक लड़की नर्तकी बनते बनते क्रिकेटर बन गई। दरअसल मिताली भरतनाट्यम में प्रशिक्षित हैं। पहले वे डांसर बनना चाहती थीं। पर वे क्रिकेटर बन गईं। उनके खेल में लय है,गति है,नियमों की बंदिश है और सबसे ऊपर खेल में कमाल का ग्रेस है। वे एक क्लासिक नृत्य की गति,लय, शास्त्रीयता और ग्रेस को खेल में समाविष्ट कर देतीं हैं और खेल को नृत्य की तरह दर्शनीय और मोहक बना देती हैं।
--------------
दरअसल वे क्रिकेट की रुक्मणि देवी हैं। एक असाधारण उपलब्धि के लिए उनको बधाई और अगली के लिए शुभकामनाएं।
Tuesday, 10 March 2020
सुपर वीमेन इन ब्लूज
फीफा विश्व कप 2026 डायरी 16: ओरलैंडो गिल
ये विश्व कप जितना फॉरवर्ड्स का है,उतना ही गोलकीपर्स का भी है। जितना मेस्सी,क्रिश्चियनों रोनाल्डो,म्बापे,हॉलैंड,विनिसियस जूनियर, उस्मान डेंब...
-
आप चाहे जितना कहें कि खेल खेल होते हैं और खेल में हार जीत लगी रहती है। इसमें खुशी कैसी और ग़म कैसा। लेकिन सच ये हैं कि अपनी टीम की जीत आपको ...
-
पि छले दिनों दो खिलाड़ी लोगों के निशाने पर रहे और आलोचना के शिकार बने। इनमें एक हैं नए विश्व शतरंज चैंपियन डी गुकेश। और दूसरे भारतीय क्रिक...
-
हर शहर का एक भूगोल होता है और उस भूगोल का स्थापत्य ये दोनों ही किसी शहर के वजूद के लिए ज़रूरी शर्तें हैं। इस वजूद की कई-कई पहचानें होती है...









