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Sunday, 29 December 2019

मैरीकॉम बनाम निखत ज़रीन



हमारे जीवन के सद्भावना, मैत्री, प्रेम और सहयोग के सबसे खूबसूरत दृश्य खेल मैदानों से ही आते हैं। क्रिकेट में कतारबद्ध होकर एक दूसरे से हाथ मिलाते खिलाड़ी,बॉक्सिंग और कुश्ती में गले मिलते खिलाड़ी,  फुटबॉल में तो एक कदम और आगे जाकर अपनी जर्सियों की अदला बदली करते खिलाड़ी,यहां तक कि एथेलेटिक्स में भी विजेता को बधाई देते खिलाड़ी। खेल खत्म होने के बाद हाथ मिलाना और गले मिलना सबसे सामान्य लेकिन वांछित दृश्य हैं। खेल के दौरान खिलाड़ियों में, दर्शकों में, प्रशंसकों में प्रतिद्वंदिता और संघर्ष की जो भावना घनीभूत होती है और उसकी वजह से जिस तनाव की व्याप्ति होती है, उसे खत्म करने में या फिर कम से कम उसे कुछ हद तक तरल करने में ये दृश्य सहायक होते हैं। सही अर्थों में यही खेल की वो मूल भावना होती है जिसे हम खेल भावना के नाम से जानते हैं। लेकिन ज़रूरी नहीं हर बार ऐसा ही होता हो। कई बार स्थापित परंपराओं में विचलन होता है, भले ही वो वांछित हो या ना हो। कल राजधानी के इंदिरा  गांधी इंडोर स्टेडियम में एक बार फिर विचलन हुआ। एक बार खेल भावना फिर आहत हुई।

कल यहाँ चीन में होने वाली ओलंपिक क्वालीफाइंग प्रतियोगिता के लिए मुक्केबाजी के ट्रायल मुकाबले चल रहे थे। इन मुकाबलों में सबसे प्रतीक्षित और महत्वपूर्ण मुक़ाबला निसंदेह 51 किलोग्राम वर्ग के फाइनल का था जो दो बहुत ही प्रतिभावान मुक्केबाज़ों के बीच होना था। ये मुकाबला अनुभव का युवा जोश के बीच होना था।ये मुक़ाबला एम सी मेरी कॉम और निखत ज़रीन के बीच होना था।

एक तरफ 36 साल की वेटेरन मुक्केबाज मेरीकॉम थीं जिन्होंने अब तक भारत के लिए विश्व प्रतियोगिताओं में 6 स्वर्ण सहित 8 पदक जीते हैं ।ये विश्व रिकॉर्ड है। आज तक कोई भी मुक्केबाज़ विश्व मुक्केबाज़ी प्रतियोगिता में इतने पदक नहीं  जीत सका है। यहां तक कि मुक्केबाज़ी की नर्सरी और मुक्केबाजों की खदान कहे जाने वाले देश क्यूबा का कोई मुककबाज़ भी इतने पदक नहीं जीत सका है। इन पदकों के अलावा 2012 के ओलंपिक में कांसे का एक पदक,एशियाड में एक  स्वर्ण सहित दो पदक , एशियाई
मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में 5 स्वर्ण सहित 6 पदक  और कॉमनवेल्थ प्रतियोगिता में 1 स्वर्ण पदक जीता है। निसंदेह वे भारत की सबसे महान खिलाडियों में से एक हैं। ये उपलब्धियां इस तथ्य से और भी ज़्यादा चमकदार हो जाती हैं कि वे उत्तर पूर्व के निर्धन किसान परिवार से हैं। ज़िन्दगी के तमाम संघर्षों के बाद वे इस मुकाम पर पहुंची। सबसे बड़ी बात तो ये कि उन्होंने ये उपलब्धियां उस उम्र में  हासिल कीं जिस उम्र में  विवाह के बाद लड़कियां अपनी इच्छाओं को परिवार के लिए कुर्बान कर देती हैं, अपनी उम्मीदों को दादी नानी की तरह मन के ट्रंक की सबसे निचली तहों में किसी भूली बिसरी चीज़ की तरह संभाल कर रख देती है और महत्वाकांक्षाओं को घर के पिछले कमरे में किसी खूंटी पर पुराने कपड़ों की तरह उतार कर टांग देती हैं।

तो दूसरी तरफ युवा 23 साल की निखत ज़रीन थीं जो 2011 की जूनियर विश्व चैंपियन होने के अलावा इसी साल एशियाई बॉक्सिंग प्रतियोगिता में कांसे का पदक जीत चुकी हैं। वे एक ऐसे समाज से आती हैं जहां कई देशों में खेलना तो दूर स्टेडियम में खेल देखने की आज़ादी नहीं है, कई बार इस तरह के प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर सजाए मौत मुक़र्रर कर दी जाती है। कहीं अगर  खेलने की आज़ादी है भी तो सिर तक हिजाब  ढँकने के बाद। लेकिन ये भारतीय समाज और उनके परिवार की आज़ाद ख़्याली और उनकी खुशकिस्मती थी कि वे खेलों में अपने कॅरियर को आगे बढ़ा सकीं। नहीं तो भारत में भी उनके और सानिया मिर्ज़ा के अलावा और कितने नाम हैं जो गिनाए जा सकते हैं। पिछले दिनों जब अन्तर्राष्ट्रीय मुक्केबाज़ी संघ ने महिलाओं के लिए पोशाक पहनने के नियमों में कुछ ढील दी थी तो ज़रीन ने उम्मीद जताई थी कि अब अधिक लड़कियां बॉक्सिंग में आ सकेंगी।

दोनों ही खिलाड़ियों ने महिलाओं के सामने आने वाली मुश्किलों और बाधाओं को कुछ हद खुद झेला होगा और शिद्दत  से महसूसा होगा। उसके प्रति एक आक्रोश भी उनके मन के किसी कोने में ज़रूर ही पनपा होगा और उस आक्रोश को ही उन्होंने अपनी और अपने खेल की  ताकत बनाया होगा। जब भी वे दोनों रिंग में उतरती होंगी तो शायद उन्हें रिंग की वे रस्सियां बंधन नज़र आती होंगी जिन्हें तोड़ने को वे बेताब होती होंगी और ये बेताबी अपने विपक्षी पर जोरदार प्रहार करने की प्रेरणा देती होगी।

पर कल जब वे दोनों रिंग में उतरीं तो शायद जीत के लिए वो आक्रोश और ज़ज़्बा नहीं बल्कि उनके वे 'अहम' उन्हें परिचालित कर रहे होंगे जो पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम  से उपजे थे। तभी ये मुक़ाबला उन ऊंचाइयों  पर नही पहुंच पाया जहां उसे पहुंचना चाहिए था। और शायद इसीलिए ये बॉक्सिंग से ज़्यादा रेसलिंग का मुकाबला होने वाला था। दरअसल हुआ ये था कि कुछ माह पूर्व भारतीय मुक्केबाज़ी संघ ने 51 किलोग्रामम वर्ग में मेरीकॉम के पिछले प्रदर्शन के आधार पर ट्रायल से छूट देकर सीधे चयन कर लिया था। ज़रीन इसी फ्लाईवेट कैटेगरी में खेलती हैं और उन्होंने उनको ट्रायल से छूट देने पर आपत्ति दर्ज कराई। इससे दोनों के बीच रिंग से बाहर तनातनी हो गई। अंततः भारतीय मुक्केबाज़ी संघ मेरीकॉम को भी ट्रायल में शामिल करने का निर्णय किया। उम्मीद के मुताबिक दोनों के बीच फाइनल हुआ जिसमें मेरीकॉम ने ज़रीन को 9-1 अंकों से हरा दिया।

निसंदेह ये मुक़ाबला जीतकर मेरीकॉम ने ट्रायल से छूट के औचित्य को सिद्ध  किया। 36 साल की उम्रमें उनका  ये हौसला और जज़्बा तथा जीत का के ज़ुनून ही उन्हें  विशिष्ट बनाता है। लेकिन इस मुकाबले के दौरान रिंग के अंदर-बाहर जो कुछ हुआ वो कतई वांछित ना था। मुक़ाबला खत्म होने के बाद जब ज़रीन ने परंपरा के अनुसार हाथ मिलाना चाहा तो मेरीकॉम ने हाथ मिलाने से इनकार कर दिया। मेरीकॉम एक बहुत ही परिपक्व खिलाड़ी हैं। मुझे लगता है उन्हें अपनी जूनियर खिलाड़ी के समक्ष अपना बड़प्पन दिखाना चाहिए था भले ही ज़रीन से कितनी भी शिकायतें क्यों ना हों। हाथ मिलाना वो न्यूनतम शिष्टाचार है जिसे दोनों खिलाड़ियों को निभाना चाहिए होता है। ऐसी घटनाओं से केवल खिलाड़ियों के कद पर ही असर नहीं पड़ता,बल्कि प्रशंसक आहत होते हैं,खेल आहत होता हैं,खेल की मूल भावना आहत होती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ये घटना अपवाद भर होगी और इनकी पुनरावृति नहीं ही होगी।











Sunday, 22 September 2019

पंघल के पंच



रूस के एकातेरिनबर्ग में विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में 52 किलोग्राम वर्ग में अमित पंघल ने अपना पहला ही मुकाबला जीता था कि उन्होंने  प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को जन्मदिन की बधाई देते हुए ट्वीट किया कि वो पदक जीत कर उनके(प्रधानमंत्री) हाथों से केक खाएंगे। उनका ये विश्वास दरअसल उनकी कड़ी मेहनत और 2017 से अब तक उनको मिली अभूतपूर्व सफलता से उपजा था। उस विश्वास को उन्होंने टूटने नहीं दिया और इस विश्व प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त किया। वे विश्व मुक्केबाजी प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज बने। 

और जब वे फाइनल में ओलंपिक चैंपियन उज्बेकिस्तान के शाखोबिदिन जोइरोव से हारे तो वे लड़कर हारे और कड़े संघर्ष के बाद हारे। हारने के  बाद वे एक बार फिर दुनिया से कह रहे थे'मेरे पंच थोड़े से कमज़ोर रहे। मैं अपनी कमजोरी जनता हूँ और उन पर काम करूंगा। जब जोइरोव से अगली बार मुकाबला होगा तो मैं जोइरोव को  हराऊंगा।' जब वे ऐसा कह रहे थे तो निश्चित रूप से ये उनका बड़बोलापन नहीं था बल्कि ये भी उसी उनकी योग्यता,अनथक परिश्रम और हालिया सफलताओं से उपजा आत्मविश्वास था जिसके बल पर वे सफलता के इस मुकाम पर अब तक पहुंचे हैं। महत्वपूर्ण बात ये है कि वे अपनी जीत से अपनी कमियों को विस्मृत नहीं करते और अपनी हार से मायूस या हतोत्साहित नहीं होते बल्कि उसके उलट उससे सबक लेते हैं और अपनी सफलता की सीढ़ी बना लेते हैं। 

23 साल का ये युवा सैनिक इस हद तक अभ्यास करता है कि कोच को 'बस भी कर' बोलना पड़ता है। उनका ये जूनून निश्चित ही एक सुनहरे भविष्य की आश्वस्ति देता है। 
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यानि केवल लुहार और सुनार के प्रहारों से ही तमगे नहीं बनते हैं बल्कि पंघल जैसे मुक्केबाजों के दमदार मुक्कों से भी ये तमगे आकार लेते हैं।
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अमित पंघल को बहुत शुभकामनाएं।

Monday, 26 November 2018

मैरी कॉम


 मैरी कॉम

विश्व चैंपियनशिप में 1 चांदी और 6 सोने के तमग़े जीतने,अपने मेल काउंटरपार्ट क्यूबा के महानतम मुक्केबाज़ फेलिक्स सवोना की  बराबरी करने और एक शानदार बायोपिक अपने खाते में दर्ज़ कराने जैसी असाधारण उपलब्धियों के बाद भी मैरी कॉम आधी आबादी की खेल दुनिया की सानिया या सिंधु या गुट्टा या मिताली या फिर साक्षी या फोगट बहनों जैसी ग्लैमरस आइकॉन नहीं बन पायी हैं। इसका कारण शायद उनकी सहजता,सरलता और साधारण चेहरा मोहरा बाजार और मीडिया के लिए उतना सेलेबल ना होना हो पर अदम्य उत्साह,इच्छा शक्ति,धैर्य,लगन और परिश्रम से बना उनका खूबसूरत सहज और सरल व्यक्तित्व दरअसल भारतीय समाज के आधे हिस्से की खेल दुनिया का सबसे सच्चा और वास्तविक प्रतिनिधि है,उसका है। 
           उन्होंने 2001 में विश्व प्रतियोगिता में पहला रजत पदक जीता। उसके बाद 2002,2005 2006,2008 के बाद 27 साल की उम्र में 2010 में अपना पाँचवा स्वर्ण पदक जीता। उसके 8 साल बाद अब 2018 में 35 वर्ष की उम्र में अपना छठा सोने का तमगा हासिल कर ये विशिष्ट उपलब्धि हासिल की। इस 18 साल के खेल जीवन में विश्व चैम्पियनशिप के अलावा ओलम्पिक,एशियाड और कॉमनवेल्थ खेलों में भी तमगे हासिल किए। 2002 की विश्व मुक्केबाज़ी चैम्पियनशिप में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में वे अकेली हैं जो अभी भी रिंग के भीतर सक्रिय हैं।इतना ही नहीं वे 2020 के ओलम्पिक में भाग लेने के लिए भी आश्वस्त दिखती हैं। ये दिखाता है कि वे किस मिट्टी की बनी हैं। 
 35 साल की उम्र में तीन बच्चों की माँ होकर भी ये असाधारण उपलब्धि हासिल कर उन्होंने दिखाया कि जिस उम्र में महिलाएं अपने परिवार की खातिर अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को पुराने कपड़ों की तरह खूंटी पर टांग देती हैं और अपनी प्रतिभा तथा योग्यता को किसी बक्से में छुपाए गहनों की पोटली की तरह गाढ़े समय के लिए अपने अवचेतन के भीतरी तहों में छुपा देती हैं उस समय भी अपनी इच्छा शक्ति मेहनत और जज़्बे के बुते कोई भी दुनिया जीती जा सकती है। 
    दरअसल जब वे अपने मजबूत हाथों से प्रहार करती हैं तो वे केवल अपने प्रतिद्वंदी पर ही प्रहार नहीं करती बल्कि अपनी सफलता के रास्ते में आने वाले हर बाधा और चुनौती पर प्रहार करती हैं और उसे भी परास्त करती चलती हैं फिर वो बाधा उम्र की हो समाज की हो या अभावों की हो।विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति उन कठिनाइयों को ही अपनी ताक़त और प्रेरणा बना लेता है। ये संयोग ही है कि उन्होंने अपने लिए रिंग को चुना जिसमे चारों और रस्सियां होती हैं। ये वे बंधन होते हैं जिनसे मुक्केबाज़ बाहर नहीं जा सकता है और निश्चय ही इन रस्सियों को वे अपने जीवन के बंधनों की तरह देखती रही होंगी और उन्हीं को अपनी ताकत बना और उनसे प्रेरणा लेकर उन बंधनों से मुक्त होने के लिए विपक्षी पर ज़ोरदार प्रहार करती होंगी और विजयी होकर निकलती होंगी। 
भले  ही वे सेलेबल कोहलियों या धोनियों की तरह सेलेबल ना हों भर सही मायने में पंकज आडवाणी और मैरी कॉम जैसे खिलाड़ियों की उपलब्धियां उनसे बीस  ही ठहरती हैं। 
 मैरी कॉम को इस असाधारण उपलब्धि के लिए सलाम! 

नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...