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Thursday, 22 December 2022

विश्व कप फुटबॉल डायरी_08

 



अस्सी मिनट बनाम चालीस मिनट बनाम पेनाल्टी शूट आउट

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              अगर मैं शिक्षक होता तो अपने विद्यार्थियों को सिखाता कि जीवन का एक पर्यायवाची 'फुटबॉल का खेल' होता है और एक फुटबॉल मैच वो बाइस्कोप होता है जिससे केवल उस जीवन को देखा भर नहीं जाता बल्कि उसे महसूस भी किया जाता है। हर वो आदमी जिसने कल लुसैल स्टेडियम में विश्व कप फुटबॉल का फाइनल देखा होगा,इस बात की ताईद करता पाया जाएगा।

          आखिर ऐसा कौन सा संवेग बच रहा होगा जो इस मैच में दौरान देह मन ने अनुभव ना किया होगा, ज़िंदगी के वे कौन से पाठ रहे होंगे, जो ये एक मैच ना सिखा पाया होगा या वो कौन सा रंग होगा जो इस एक मैच ना बिखरा होगा। जिसने भी कल का फाइनल मैच देखा होगा,इससे अलग क्या सोच पा रहा होगा।

           बीती रात फुटबॉल विश्व कप के बीच अर्जेंटीना और पिछली चैंपियन फ्रांस के बीच खेला गया मैच 120 मिनट के बाद भी 3-3 गोल की बराबरी पर छूटा,तो निर्णय पेनाल्टी शूट आउट से हुआ और अर्जेंटीना फ्रांस को 4-2 से हराकर विश्व चैंपियन बना। ये अर्जेंटीना का तीसरा विश्व खिताब था।

           दरअसल इस मैच को तीन भागों में अलग करके देखा जा सकता है। एक,पहले 80 मिनट। दो, 30 अतिरिक्त मिनट सहित अंतिम 40 मिनट। तीन,पेनाल्टी शूटआउट। ये तीन भाग इस मैच के आरंभ, उत्कर्ष और समापन थे। 

           ये मैच दो अलग फुटबॉल शैलियों और तीन महाद्वीपों के बीच का मुकाबला था। एक तरफ दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल  की कलात्मकता थी। दूसरी तरफ यूरोप की गति और शक्ति थी। उस गति और शक्ति में अफ्रीकियों की किसी भी परिस्थिति से हार ना माने की अदम्य जिजीविषा और अंतिम समय तक संघर्ष करने के हौंसले का समावेश था।

          पहले भाग में अर्जेंटीना किसी विश्व चैंपियन की तरह खेला। इस भाग में अर्जेंटीना का खेल कौशल अपने उठान पर था, जिसने यूरोपीय गति और शक्ति को हतप्रभ कर दिया। ये अर्जेंटीना का इस प्रतियोगिता का सबसे शानदार प्रदर्शन था। उनके मूव और उनके पासेस का खेल देखना अदभुत अनुभव था। गेंद पर नियंत्रण और पासेस की दिशा कमाल की थी। ऐसा लग रहा था मानो अर्जेंटीनी खिलाड़ी एक दूसरे के मष्तिष्क को पढ़ ले रहे हैं। वे किसी धुन पर थिरकते प्रतीत होते। एक लय में। एक अन्विति में। सम्मोहन बिखेरते हुए। सम्मोहित करते हुए। इस दौरान अगर अर्जेंटीना का आक्रमण धुन पर थिरक रहा था तो डिफेंस किसी चट्टान की तरह अडिग खड़ा था जिससे टकरा कर फ्रांसीसी गति और ताकत बेबस हुई जाती थी। इस भाग में अधिकांश समय खेल फ्रांस के हाफ और उसके बॉक्स के आसपास सिमट गया था। उनका कमिटमेंट अविश्वसनीय था। मानो वे ये दृढ़ प्रतिज्ञा करके आएं हों कि फीफा ट्रॉफी का अगला गंतव्य केवल और केवल ब्यूनस आयर्स ही होना है।

             अर्जेंटीना के सामने फ्रांस की टीम दोयम दर्जे की प्रतीत हो रही थी। पहले 80 मिनट में एमबापे के केवल 11 टचेज जो अब तक का सबसे कम थे। वे खेल से अनुपस्थित से थे। फ्रांस की असहायता इस बात से समझी जा सकती हैं कि इन 80 मिनटों में फ्रांस की टीम केवल एक बार वो भी 71वें मिनट में गोल पर शॉट ले सकी और एमबापे का ये शॉट टारगेट से बहुत ऊपर से निकल गया।

             इस प्रतियोगिता में अब तक फ्रांसीसी जीत के कर्णधार रहे ग्रीजमान,देम्बेले और थियो हर्नांडेज इस समय तक बाहर जा चुके थे और उनकी जगह थुरम, कोमेन और कमाविन्गा ले चुके थे। ये बदलाव दरअसल कलात्मकता और गति व ताकत के द्वंद्व में तीसरे आयाम का जुडना था। अब अफ्रीकी जज्बा और संघर्ष करने की अदम्य लालसा भी फ्रांसीसी टीम में समाविष्ट हो चुकी थी। मृतप्राय गति व ताकत में सब्सिट्यूशन से फिर से प्राण फूंके जा चुके थे। अब मुकाबला दक्षिण अमेरिका बनाम यूरोप से आगे बढ़कर दक्षिण अमेरिका बनाम यूरोप व अफ्रीका हो चुका था।

           अंतिम 10 मिनट बचे थे। अर्जेंटीना दो गोल से आगे था। उस की जीत लगभग पक्की मानी जा रही थी कि समय चक्र ने पलटा खाया।  क्या पता उस समय फ्रांस के खिलाड़ियों में मष्तिष्क में अपने महानायक नेपोलियन के वे शब्द भी गूंज रहे हों कि   'असंभव जैसा शब्द उनकी डिक्शनरी में नहीं होता।' जो भी हो 79वें मिनट में एक मौका मिला फ्रांस को। मौनी अर्जेंटीना के बॉक्स में अकेले गेंद के साथ थे। अर्जेंटीना के ओटामेंदी के पास गोल बचाने का उन्हें गिराने के अलावा कोई चारा नहीं था। फ्रांस को पेनाल्टी मिली और एमबापे का गोल नंबर 06 आया। मैच में जान आ गयी। एक मिनट बीतते बीतते एमबापे का गोल नंबर 07 आया और स्कोर 2-2 से बराबर।

             गति और जोश ने अर्जेंटीना की लय को भंग कर दिया था। अगले 09 मिनट एक तरह से अफरा तफरी के थे। जो लय टूट चुकी थी,उसे फिर से बांधने में और गति ने जो लय पकड़ ली थी, उसे रोकने के लिए अर्जेंटीना को भी समय चाहिए था। इसी अफरा तफरी में रेगुलर समय समाप्त हुआ। दोनों टीमों को नए सिरे से रणनीति बनाने का मौका मिला।

              अतिरिक्त समय का खेल अर्जेंटीना ने ठीक वहीं से शुरू किया जहां उन्होंने उसे 80वें मिनट में छोड़ा था। वे एक बार फिर लय में थे और फ्रांसीसी गति और ताकत कुछ हद तक दिशाहीन। 109वें मिनट में एक बार फिर मैस्सी ने गोल गेंद के अंदर की। ये मेसी का मैच का गोल नबर दो और प्रतियोगिता का गोल नंबर 07 था। एक बार फिर लगा अर्जेंटीना जीत चुका है। अब केवल 05 मिनट शेष थे। खेल खत्म हुआ ही चाहता था। पर नियति को ये मंजूर ना था। ये फ्रांस की किस्मत थी कि बॉक्स के अंदर मोन्टीएल की कोहनी में गेंद लगी और एक और पेनाल्टी फ्रांस को। एमबापे की हैट्रिक गोल नंबर 08 के साथ आई। अब स्कोर 3-3 बराबरी पर था। अगर 80 मिनट का पहला भाग इस मैच की प्रस्तावना थी तो  40 मिनट का ये भाग मैच का उत्कर्ष था जिसमें खेल का रुख दोनों और झुकता रहा।

               अब इस मैच का उपसंहार लिखा जाना था। प्रस्तावना में पहले ही लिखा जा चुका था मैच अर्जेंटीना का है। निष्कर्ष इससे भिन्न कहां होना था। पेनाल्टी शूट आउट में एक बार फिर अर्जेंटीना ने फ्रांस को, उसके भाग्य को और फिर से चैंपियन बनने की उसकी किसी भी संभावना को शूटआउट कर दिया था। अब 4-2 जीतकर अर्जेंटीना नया चैंपियन था।

             याद कीजिए 2018 के विश्व कप को। प्री क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना का फ्रांस से खेलना तय पाया गया था। वो शनिवार का दिन था। तातारिस्तान की राजधानी कज़ान का कज़ान एरिना था। ये क़यामत की शाम थी जिसमें लोगों ने एक क्लासिक मैच देखा था। उन्होंने उम्मीदों के उफान को देखा था और उसे बहते हुए भी देखा था। ये भी दो महाद्वीपों के बीच मुकाबला था। ये फुटबाल की दो अलग शैलियों के बीच मुकाबला था। ये उम्मीदों की विश्वास से टकराहट थी। उम्रदराज़ों का युवाओं से सामना था। अनुभव जोश के मुक़ाबिल था। कलात्मकता रफ़्तार और शक्ति से रूबरू थी। जो मुकाबला मैदान में दो टीमों के बीच हो रहा था वो लाखों लोगों के लिए मेस्सी का फ्रांस से मुकाबला बन गया था। अगर लोग अर्जेंटीना को मेस्सी के लिए जीतता देखना चाहते थे तो खुद मेस्सी अर्जेंटीना के लिए जीतना चाहता था। मेस्सी ने अपना सब कुछ झोंक दिया। उसने कुल मिला कर दो असिस्ट किये। लेकिन अर्जेंटीना और जीत के बीच 19 साल का नौजवान एमबापा आ खड़ा हुआ। उसने केवल दो गोल ही नहीं दागे बल्कि एक पेनाल्टी भी अर्जित की। उसकी गति के तूफ़ान में अर्जेंटीना का रक्षण तिनके सा उड़ गया। मेस्सी का अर्जेंटीना 4 के मुकाबले 3 गोल से हार गया। लोगों की उम्मीदें हार गई। हताश निराश मेस्सी मैदान से बाहर निकले तो एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मानो वे इस असफलता को पलटकर देखना ही नहीं चाहते थे। 

         लेकिन क्या ही स्वीट रिवेंज था ये। एक बार फिर मानो वही मुकाबला दोहराया जा रहा हो। बिल्कुल उस जगह से शुरू हो रहा हो,जहां कजान में खत्म हुआ था।  19 साल का टीनएजर अब 23 साल का गबरू जवान हो चुका था। एक बार फिर  वो फुटबॉल के देवता की राह  में रोडा बनने का दुस्साहस कर रहा था। उसने अपनी टीम के 05 में से 04 गोल किए। लेकिन इस बार देवता से,अनुभव से,अदम्य चाहना से वो हार गया। इस बार समय और नियति मैस्सी के साथ थी। हुनर के साथ थी। इस बार एमबापे उदास थे। और मैस्सी अपने हाथों में फीफा कप उठाए उसे चूमते जाते थे। दोनों किरदारों के रोल बदल गए थे।

              कला और क्लास के आगे ताकत और गति पस्त हो चुके थे। नियति अपना खेल दिखा चुकी थी। आप भले ही कहें नियति क्रूर होती है। लेकिन इतनी भी नहीं कि एक असाधारण प्रतिभा को, खेल के महानतम खिलाड़ी को और उसके जादूगर को उस सम्मान से,उस हक़ से महरूम रख सके जिस पर उसका हक बनता था। मैस्सी की झोली में अब एक विश्व कप ट्रॉफी थी। जिस कला का वो सर्वश्रेष्ठ व्याख्याता था,अब  वो उसके शिखर पर था। अधूरी इच्छाओं का एक देवता पूर्णत्व को प्राप्त हो चुका था। वे हाथों में फीफा कप लेकर उसे चूम रहे थे। वे कह रहे थे 'मैं इसे बेइंतेहा चाहता था। मैं जानता था कि ईश्वर ये मुझे देंगे। ये लम्हा मेरा है।' सच में वो मैस्सी का लम्हा था।

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दरअसल यही फुटबॉल है। यही खेल है। यही जीवन है। 

और हम हैं कि अर्जेंटीना के कुछ और ज़्यादा समर्थक हुए जाते हैं। कि मैस्सी को कुछ और ज़्यादा चाहने वाले हुए जाते हैं। कि फुटबॉल के कुछ और अधिक दीवाने हुए जाते हैं।


Tuesday, 20 December 2022

फुटबॉल विश्व कप 2022 डायरी_07

                                 (साभार गूगल)
                       
अंतिम चार का द्वंद्व
००००

विश्व कप फुटबॉल के पहले सेमीफाइनल में अर्जेंटीना ने क्रोशिया को 3-0 से हराकर फाइनल में प्रवेश कर लिया है। निःसंदेह अर्जेंटीना की जीत महत्वपूर्ण है,लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण मैच की स्कोरलाइन है।

स्कोर लाइन देखकर ऐसा लगता है कि अर्जेंटीना ने किसी नौसिखिया टीम को हराया है। जबकि सारी दुनिया जानती है,वास्तविकता ये नहीं है। क्रोशिया  की गणना फुटबॉल की दुनिया की सबसे ताकतवर टीमों में की जाती है। वो इस बार की संभावित विजेताओं में शुमार थी और पिछली बार की उपविजेता। जिस टीम का नेतृत्व दुनिया के सबसे शानदार मिडफील्डर लुका मोद्रीच कर रहे हों, जिसके पास दुनिया के सबसे बड़े डिफेंडरों में से एक, और प्रतियोगिता में सबसे शानदार खेल रहे जोस्को ग्वार्डिओल हों,और जिसके पास लिवकोविच जैसा बेहतरीन गोलकीपर हो जिसने इस विश्व कप में सबसे ज़्यादा 24 बचाव किए हों, वो टीम कमज़ोर हो भी कैसे सकती है।

निःसंदेह क्रोशिया की टीम एक बहुत मजबूत और शानदार टीम है जो दुनिया की किसी भी टीम को हराने का माद्दा रखती है। लेकिन खेल का परिणाम केवल एक टीम के खिलाड़ियों के मैदान में खेल कौशल भर से निर्धारित नहीं होते। ये विपक्षी टीम के खिलाड़ियों के खेल कौशल,उसकी रणनीति,उसके द्वारा अपने सामने वाली टीम की रणनीति को समझने और उसमें छिद्र ढूंढ लेने के साथ साथ रैफरी के निर्णयों और अंततः नियति द्वारा भी निर्धारित होते हैं। 

अगर मैदान में कुछ अप्रत्याशित ना हो तो कवि केशव तिवारी  के शब्दों में कहा जा सकता है 'काहे का खेल और काहे की फुटबॉल'। यही खेल है और यही फुटबॉल। 

मैच के पहले हॉफ के आधे से अधिक समय तक गेंद पर नियंत्रण और खेल का नियंत्रण क्रोशिया के पास था। खेल अर्जेंटीना के हॉफ में खेला जा रहा था। पर मुकाबला फुटबॉल लीजेंड मैस्सी और चतुर रणनीतिकार लियोनेल स्कलोनी से था। वे खेल के इस क्रोशियाई अधिपत्य के बीच में अपनी टीम के लिए अवसर खोज रहे थे और वे उन्होंने ढूंढ निकाले। यही फुटबॉल की समझ है।फुटबॉल है।

गेंद पर पूरी तरह नियंत्रण के अपने खतरे हैं। ऐसे में जब आप गेंद पर से नियंत्रण खोते हैं तो आप रक्षण के लिए उस तरह एकबद्ध नहीं हो पाते जिस तरह से होना चाहिए। नियंत्रण छूटने से आपकी लय टूट जाती है। आप अपने रक्षण में गैप छोड़ देते हो। मैस्सी और उनके साथियों ने वे गैप ढूंढ लिए।उन गैप से उन्होंने प्रतिआक्रमण किए, अपनी टीम के लिए मौके बनाए और विपक्षी टीम को तहस नहस कर दिया। मैच समाप्ति के बाद मैस्सी ऐसा ही कुछ कह रहे थे।

 कई प्रतिआक्रमणों में से ऐसा ही एक प्रतिआक्रमण अर्जेंटीना ने 34वें मिनट में किया। मैनचेस्टर सिटी के लिए खेलने अर्जेंटीना के नवोदित स्टार जूलियन अल्वारेज ने इतना तेज आक्रमण किया कि बाकि एक रक्षक को मात दी,उसे पीछे छोड़ा। अब वे बॉक्स में अकेले गोलकीपर के सामने थे। गोलकीपर डॉमिनिक लिवकोविच अल्वारेज को टैकल करने के लिए मजबूर हुए। रैफरी ने इसे खतरनाक माना। अर्जेंटीना को पेनाल्टी मिली। अब मैस्सी के बाएं पैर का जादू था। सही दिशा में छलांग लगाने के बाद भी गोलकीपर गति और ऊंचाई से मात खा गए। अर्जेंटीना 1-0 से आगे हो गया। अब मैच का रुख अर्जेंटीना के पक्ष में झुक गया। उनके पक्ष में मोमेंटम बन चुका था और क्रोशिया के हाथ से मैच फिसलने लगा था।

पेनाल्टी का निर्णय रैफरी का था। बहुत से लोगों का मानना था ये टैकल इतना खतरनाक नहीं था कि पेनाल्टी दी जाती। लेकिन रैफरी का निर्णय अर्जेंटीना के पक्ष में गया। यही भाग्य था,नियति थी और फुटबॉल भी।

पांच मिनट बाद अर्जेंटीना ने एक और प्रतिआक्रमण किया। 39वें मिनट में एक बार फिर अल्वारेज ने काउंटर अटैक पर शानदार मूव बनाया और लगभग अकेले दम पर गोल कर टीम को 2-0 से आगे कर दिया। ये युवा अल्वारेज की स्किल और गति हैं जिसने वन मैन आर्मी मैस्सी के बोझ को ना केवल कम किया है,बल्कि उन्हें आक्रमण और रणनीति बनाने के अतिरिक्त अवसर भी दिए हैं।

क्रोशिया एक फाइटर टीम है। उसने 2-0 से पिछड़ने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी थी। क्वार्टर फाइनल में नीदरलैंड भी अर्जेंटीना के विरुद्ध 0-2 से पीछे थी और वो मैच को पेनाल्टी शूट तक ले गई थी। दूसरे हॉफ में भी क्रोशिया ने गेंद पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। कुछ अच्छे मूव भी बनाए। पर मूव बनाना और उसे फिनिश करना दो बातें हैं। वे फिनिश करने में असफल रहे। इधर अर्जेंटीना ने क्रोशिया डिफेंस में छिद्र ढूंढ लिए थे। वे प्रतिआक्रमण करते रहे। इस बीच मैच के 69वें मिनट में क्रोशिया के हॉफ में लगभग मध्य रेखा से बॉल मैस्सी को मिली। दुनिया का एक बेहतरीन डिफेंडर ग्वार्डिओल,मैस्सी को मार्क कर रहा था। लेकिन यहां मैस्सी था,मैस्सी की ड्रिब्लिंग थी,मैस्सी के पैरों का जादू था। ग्वार्डिओल की मार्किंग के साथ ही मेसी गेंद को बॉक्स में ले गए,उसके बाद वे एक क्षण के लिए रुके,फिर दाएं गए, फिर बाएं गए और फिर दाएं गए, ग्वार्डिओल को पूरी तरह युक्तिहीन और असहाय छोड़ गेंद अल्वारेज को सरका दी। अल्वारेज ने गेंद आगे गोल में सरका दी। स्कोर अब 3-0 था और इसने क्रोशिया की किसी भी संभावना को खत्म कर दिया था।

मैस्सी का ये असिस्ट इस विश्व कप की सबसे खूबसूरत मूव था। इस मूव को देखना किसी खूबसूरत कविता को देखना,किसी बेहतरीन नृत्य को देखना और किसी उम्दा संगीत को सुनने जैसा था। ये मैस्सी की स्किल थी। उनके पैरों का जादू था। ये फुटबॉल का खेल था। फुटबॉल था।

इस विश्व कप में मैस्सी क्या ही कमाल खेल रहे हैं। पहले मैच में हार के बाद पांच मैच और पांचों में मैन ऑफ द मैच। अविश्वसनीय प्रदर्शन। मैस्सी का दूसरा फाइनल पक्का हुआ। अर्जेंटीना तीसरे विश्व खिताब की और बढ़ी और निसंदेह मैस्सी सार्वकालिक महानतम खिलाड़ी। मैं जानता हूँ ,आप जानते हैं,सारी दुनिया जानती है,आखिर 'गोट' कौन है।

तो तय हुआ कि खिलाड़ियों की प्रतिभा और खेल कौशल में जब भाग्य और अनिश्चितता का तड़का लगता है,तो फुटबॉल के खेल में रोमांच पैदा होता है। फुटबॉल का खेल बनता है। फुटबॉल बनता है।
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तो रविवार तक अनिश्चितता में झूलते रहिए और दिल को थामे रखिए। पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों।

Tuesday, 13 December 2022

फुटबॉल विश्व कप डायरी_06

 

                           (साभार गूगल)

सेमीफाइनल :टीमें जो यहां हो सकती थीं, पर हैं नहीं

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         खेल केवल खेल भर नहीं हैं। और फुटबॉल भी केवल खेल भर नहीं है। ये खिलाड़ियों का अथक परिश्रम भी है,उनका अदम्य होंसला भी है,उनका अद्भुत खेल कौशल और विस्फोटक प्रतिभा भी है,ये खेल मैनेजरों की नित नवीन रणनीतियां भी है,उनकी शतरंजी चालें भी हैं,विपक्षी टीम की चालबाजियों को समझने की उनकी गहन अंतर्दृष्टि और उसे भोथरा कर देने की अद्भुत समझ भी है। इतना ही नहीं,ये नियति भी है,भाग्य भी है और अनहोनियाँ भी हैं। इन सब के मिलने पर ही फुटबॉल जैसा खेल बनता है। और इसे समझना है तो फुटबॉल विश्व कप देखने से बेहतर और क्या हो सकता है।

            जी हां , क़तर फुटबॉल विश्व कप अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। फुटबॉल का सरताज बनने के संघर्ष में अब केवल चार टीम बची हैं और तीन मैच। 

           और इस बार बात बची चार टीमों के बारे में नहीं बल्कि बात उन तमाम टीमों की,जिन्हें यहाँ होना चाहिए था या जो यहां हो सकती थीं,पर हैं नहीं। 

            सबसे पहली टीम जिसे इस विश्व कप में होना चाहिए था और जो यहां हो सकती थी, पर है नहीं, वो इटली की टीम है। ये हम हम टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही जान गए थे कि इटली यहां नहीं होगी। तमाम जद्दोजहद के बाद भी चार बार की विश्व चैंपियन और वर्तमान यूरो चैंपियन टीम लगातार दूसरी बार विश्व कप  में क्वालीफाई नहीं कर सकी। 'कैटेनेसियो' जैसी अभेद्य रक्षा पद्धति को ईजाद करने वाले और जीनो डोफ़ व बुफों जैसे गोलकीपर और बरेसी, पाओली माल्दिनी, फेबियो कैनावरो व चेलिनी जैसे डिफेंडर देने वाली इटली की टीम का यहां ना होना बहुत सारे खेल प्रेमियों के लिए गहन दुख का विषय हो सकता है और आश्चर्य का भी,पर ये बहुत पहले तय हो चुका था कि वो यहां नहीं ही होगी। यही नियति है। यही फुटबॉल है।

               दूसरी टीम जो यहां हो सकती थी और नहीं हैं वो जर्मनी की टीम है। चार बार की चैंपियन ये टीम सही मायने में यूरोपीय फुटबॉल का प्रतिनिधित्व करती है और अपनी शारीरिक श्रेष्ठता के बूते शारीरिक बल और गति से किसी भी टीम को मात देने की क्षमता रखने वाली टीम लगातार दूसरी बार पहले चरण से आगे बढ़ने में नाकामयाब रही है। पहले ही मैच में जापान ने हराकर उसके आगे बढ़ने की संभावना को क्षीण कर दिया था और स्पेन से ड्रा ने रही सही कसर पूरी कर दी। यही  दुर्भाग्य है। यही फुटबॉल है।

             एक और टीम जो यहां हो सकती थी और नहीं है वो स्पेन की टीम है। जिसे प्री क्वार्टर फाइनल में मोरक्को ने हराकर आगे बढ़ने से रोक दिया। छोटे छोटे पासों वाली टिकी - टाका तकनीक वाले खूबसूरत खेल पद्धति को इज़ाद करने वाली स्पेन की टीम ने अपने पहले ही मैच में कोस्टारिका को 7-0 से हराकर अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। लेकिन टीम उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई। स्पेन की जो टीम सेमीफाइनल में हो सकती थी, वो क्वार्टर फाइनल में भी नहीं पहुंच सकी। क्वार्टर फाइनल में पहुंचने वाली मोरक्को के अलावा बाकी सातों टीमें उम्मीद के अनुरूप ही पहुंची। यही किस्मत है। यही फुटबॉल है।

            इंग्लैंड की टीम भी सेमीफाइनल में हो सकती थी और होना चाहिए था,पर दुख की बात है कि वो भी यहां नहीं है। 2018 में वो सेमीफाइनल तक पहुंची थी जहां क्रोशिया ने 2-1 से हरा कर उसके सफर को रोक दिया था और 1966 के बाद दूसरे विश्व कप को जीतने से भी। इस बार फ्रांस उसके रास्ते में आया और उसका भाग्य भी। इस बार उसका सफर क्वार्टर फाइनल में समाप्त हुआ। इस बार उसने शानदार फुटबॉल खेली। दरअसल शनिवार 10 दिसंबर की रात फ्रांस और इंग्लैंड के बीच खेला गया क्वार्टर फाइनल मैच इस विश्व कप का सबसे शानदार मैच था। निसंदेह खेल के आधार पर इंग्लैंड को आगे बढ़ना चाहिए था, लेकिन भाग्य फ्रांस के साथ था। फ्रांस के 43 प्रतिशत बॉल पजेशन के मुकाबले इंग्लैंड का बॉल पजेशन 57 प्रतिशत था। फ्रांस के गोल पर 08 शॉट के मुकाबले इंग्लैंड ने 16 शॉट लगाए जिनमें से इंग्लैंड के 05 के मुकाबले 08 शॉट टारगेट पर थे। इंग्लैंड ने 02 के मुकाबले 05 कॉर्नर अर्जित किए। इस सब के बावजूद इंग्लैंड हार गया। दरअसल ये मौके चूक जाने का मामला था। हैरी केन ने दूसरी पेनाल्टी मिस की और बराबरी का मौका ही नहीं खोया बल्कि आगे बढ़ने का रास्ता भी बंद कर लिया। यही भाग्य है। यही फुटबॉल है।

            और निःसंदेह विश्व नंबर एक नेमार की टीम ब्राजील को सेमीफाइनल में होना ही चाहिए था,पर घोर निराशा का सबब है कि वो भी नहीं है। उसका सफर पिछली उपविजेता क्रोशिया ने क्वार्टर फाइनल में खत्म किया। ये दोनों टीमों द्वारा शिद्दत से खेला गया मैच था जिसने पहले 90 मिनट में दोनों टीम ने गोल करने के मौके खोए। उसके बाद जैसे ही अतिरिक्त समय शुरू हुआ नेमार का जादू देखने को मिला। उसने अपने बॉक्स के पास से गेंद ली और तीन क्रोशियाई खिलाड़ियों को छकाते हुए ब्राजील को 1-0  की बढ़त दिला दी। ये गोल ऐसा शानदार ही होना चाहिए था क्योंकि ये नेमार का 77वां अंतर्राष्ट्रीय गोल था और पेले के ब्राजील की और से सर्वाधिक गोल करने के रिकॉर्ड की बराबरी वाला गोल भी। अब ब्राजील जीत जाने ही वाला था और अतिरिक्त समय खत्म ही हुआ चाहता था कि स्थानापन्न खिलाड़ी ब्रूनो पेतकोविच ने 3 मिनट शेष रहते बराबरी का गोल दाग दिया। अब मैच शूट आउट में गया। क्रोशिया शूटआउट में एक बेहतरीन टीम है और ये उसने एक बार फिर सिद्ध किया। 2018 में भी उसने शूटआउट में शानदार खेल दिखाया था और यहां भी प्री क्वार्टर फाइनल मैच में भी वो जापान को शूट आउट में हराकर आगे बढ़ी थी। इस बार उसने ब्राजील को 4-2 से हराया और उसे सेमीफाइनल में जाने से रोक दिया। ये पिछले पांच विश्व कप में चौथा अवसर था कि उसकी क्वार्टर फाइनल से विदाई हो रही थी। ये लाखों फुटबॉल प्रेमियों का दिल टूट जाना था। विश्व कप का अचानक खत्म हो जाना था। ये कोई अनहोनी थी। कोई गहरा आघात था जी हां ये फुटबॉल था। ये खेल था।

         सीआर7 की टीम पुर्तगाल को भी सेमीफाइनल में होना चाहिए था और दुनिया ऐसी ख्वाहिश रखने वालों की कमी ना थी। अफसोस वे भी नहीं है। मोरक्को ने एक बार फिर असंभव को संभव कर दिखाया। इस बार पुर्तगाल शिकार बना। तीसरे क्वार्टर फाइनल में मोरक्को ने पुर्तगाल को 1-0 से हराकर बड़ा उलटफेर किया। पहले हाफ में खेल पुर्तगाल ने नियंत्रण अपने हाथ में रखा। जबकि मोरक्को कुछ काउंटर अटैक मूव ही बना सकने में समर्थ हुई। लेकिन मौका मोरक्को ने भुनाया और 44वें मिनट में डिफेंडर याह्या अत्तिअल्लाह के क्रॉस को सेविला के  लिए खेलने वाले फारवर्ड एन नसीरी ने हैडर से गेंद गोल में डालकर मोरक्को को 1-0 की बढ़त दिला दी। इसके बाद पुर्तगाल ने गोल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। दूसरे हाफ के 45 मिनट और 8 अतिरिक्त मिनट में अधिकांश समय खेल मोरक्को के बॉक्स के इर्द गिर्द  हुआ। पर मोरक्को का डिफेंस और गोलकीपर बोनो की दीवार को पुर्तगाली खिलाड़ी नहीं भेद सके। यहां तक कि दूसरे हॉफ में बहुत जल्द ही सीआर7 को भी खिलाया गया। पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। एक और बड़ा अपसेट हुआ। 2016 की यूरोपियन चैंपियन खेत रही। यही सपनों का टूट कर किरिच किरिच बिखर जाना था। इच्छाओं का गहन दुःख में विगलित हो जा एआ था। यही फुटबॉल है।

        हां, पिछली विजेता फ्रांस, पिछली उपविजेता क्रोशिया और दो बार की विश्व विजेता अर्जेंटीना की टीम को यहाँ होना था। और वो यहां हैं। लेकिन यहां मोरक्को भी है। तो क्या उसे यहाँ नहीं होना चाहिए था?

         निःसंदेह विश्व कप शुरू होने से पहले शायद ही किसी ने इस बात की कल्पना की होगी कि मोरक्को सेमीफाइनल खेलेगा। लेकिन वो खेल रहा है। यही खुशकिस्मती है। यही किसी सपने का यथार्थ में तब्दील हो जाना है। यही हकीकत है। यही खेल है। यही फुटबॉल है।

         मोरक्को इस बार का जॉइंट किलर है। उसने इस विश्व कप में शानदार शुरुआत की। अपने पहले ही मैच में पिछली उपविजेता क्रोशिया से 0-0 से ड्रा खेला। उसके बाद विश्व नंबर दो टीम  बेल्जियम को 2-0 से पीटा और फिर कनाडा को 2-1 से। प्री क्वार्टर फाइनल में स्पेन को शूटआउट में 3-0 और क्वार्टर फाइनल में पुर्तगाल को 1-0 से हराकर सेमीफाइनल में पहुंचने वाली पहली अफीकी टीम बनी। अपनी सेमी फाइनल तक की इस यात्रा में उसने तीन तीन बड़ी टीम को पराजित किया और एक बड़ी टीम को ड्रा के लिए मजबूर। उसने यूरोपीय दर्प का मानमर्दन किया और अफ़्रीकी गौरव को स्थापित भी। इस टीम का हीरो उनका गोलकीपर बोनो है। अफ्रीकी व अरब जगत का हीरो टीम मोरक्को।

       अभी तक जो भी हुआ वो भाग्य, नियति,और खेल के संयोग से बना फुटबॉल था,फुटबॉल का अद्भुत खेल था। आगे जो होगा वो भी नियति,भाग्य, होनी - अनहोनी के संयोग के आवरण में लिपटा और खिलाड़ियों के अद्भूत खेल कौशल व प्रतिभा और रणनीतियों से बना संवरा वो खेल होगा जिसके पीछे पूरी दुनिया दीवानी है, जिसे वो फुटबॉल के नाम से जानती है और जो उनके लिए खेल से बढ़कर जीवन मरण जैसी कोई भावना बन जाती है।

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हम उत्कर्ष देख चुके हैं। चर्मोत्कर्ष देखना बाकी है।


Sunday, 4 December 2022

विश्व कप फुटबॉल डायरी_02

 

                                                        (गूगल से साभार)

अर्जेंटीना की हार
००००

     जीवन में अनहोनी खाने में नमक की तरह है। अनहोनी  जीवन में ठहराव नहीं लाती,बल्कि उसे कुछ और गतिशील बनाती है। खेल जीवन का एक हिस्सा है और इस नाते अनहोनी भी।

     क़तर में चल रहे फुटबॉल विश्व कप में सऊदी अरब की टीम मेस्सी की अर्जेंटीना को 2-1 से हरा दिया है। 'ग्रीन फॉलकन्स' ने 'ला अलबिसेलेस्टे' का शिकार कर विश्व कप के सबसे बड़े उलटफेर कर दिया है।

     अर्जेंटीना के समर्थकों और मेस्सी के चाहने वालों के लिए ये किसी गहरे सदमे सा है। किसी वज्रपात सा आघात है। लेकिन इस परिणाम ने अब ग्रुप सी को पूरी तरह ओपन कर दिया है और इस ग्रुप के मुकाबलों को और रोचक बना दिया है,ये भी सच है।

     बीती रात क़तर की राजधानी दोहा से लगभग 40 किलोमीटर दूर लुसैल स्टेडियम में इस बार विश्व कप जीतने के प्रमुख दावेदारों में एक अर्जेंटीना सऊदी अरब की टीम के विरुद्ध अपना विश्व कप पहला मैच खेल रही थी। दसवें मिनट में मेस्सी पेनाल्टी से गोल कर अर्जेंटीना को 1-0 की बढ़त दिला देता है। 1930 में उरुग्वे के विरुद्ध फाइनल मैच के बाद 'ला अलबिसेलेस्टे' पहले हॉफ में बढ़त बनाने के बाद कोई मैच नहीं हारा था। इतना ही नहीं वो पिछले 36 मैच से अजेय था और इटली के 37 मैचों में अजेय रहने के रिकॉर्ड से एक मैच कम। लेकिन विश्व की 51 वीं रैंकिंग वाली सऊदी अरब इतिहास बनाने मैदान में उतरी थी।

     पहले गोल के बाद भी अर्जेंटीना ने लगातार दबाव बनाए रखा और तीन बार गेंद गोल पोस्ट में अंदर डाली पर तीनों बार ऑफ साइड करार दिए गए एक बार मेस्सी और दो बार लोरेटो मार्टिनेज। लेकिन दूसरे हॉफ में कहानी बदल गयी। 4-1-4-1 के फार्मेशन से रक्षात्मक खेल रही सऊदी अरब ने अर्जेंटीना पर दबाव बनाया और 48वें मिनट सालेह अल शेहरी ने बराबरी का गोल किया और फिर 53वें मिनट में सालेम अल दौसरी ने बढ़त दिलाकर विश्व कप फुटबॉल के सबसे बड़े उलटफेर को अंजाम दिया।

     सऊदी अरब के लिए ये 1994 के इतिहास की पुनरावृत्ति थी जब उसने बेल्जियम को 1-0 से हराया था और अर्जेंटीना के लिए 1990 के इतिहास का जब माराडोना की टीम को कैमरून ने 1-0 से हराया था।

     याद कीजिए 2018 के विश्व कप के अर्जेंटीना और फ्रान्स के प्री क्वार्टर फाइनल मैच की। एमबापे के खेल ने मेस्सी और अर्जेंटीना के विश्व कप को जीतने का सपना तोड़ दिया था। मैच की अंतिम सीटी बजते ही मैस्सी धीमे धीमे कदमों से मैदान से बाहर चल दिए थे। उन्होंने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा था। क्योंकि वे जानते थे कि कजान स्टेडियम में उनके विश्व कप का सफर खत्म हो चुका है।

      लेकिन लुसैल स्टेडियम में 103 मिनट बाद जब मैच की अंतिम सीटी बजी तो वे बीच मैदान में खड़े नीचे ज़मीन को निहार रहे थे। वे मैदान छोड़कर नहीं गए। क्योंकि वे जानते थे ये सफर का अंत नहीं है। कजान में नॉक आउट हो गए थे,यहां लीग मैच था। आगे बढ़ने और विश्व कप जीतने की उम्मीदें और अवसर अभी बरकरार हैं।

       मैच समाप्त होने के बाद मैस्सी मैदान को देख रहे थे तो शायद वे उन संभावनाओं को तलाश कर रहे होंगे कि क्या वे एक बार फिर 18 दिसंबर को वे वहां होंगे। फाइनल इसी मैदान पर 18 दिसंबर को जो होना है। वे उस हरी घास के नीचे के रेगिस्तानी रेत में पानी के कुछ कण देखने की कोशिश में रहे होंगे और उनमें विश्व कप जीतने की उम्मीदों का अक्स खोज रहे होंगे। 

                                                 (गूगल से साभार

     और उस रेगिस्तानी रेत में निश्चय ही उन्हें कुछ पानी की बूंदे दिखाई दी होंगी। और ये भी उन्हें अहसास हुआ होगा कि वे बूंदे विदाई के दुख से निकली बूंदे नहीं हैं,बल्कि मैस्सी के सपने के टूट जाने की आशंका से निकले स्वेद कण भर हैं।

      मैच के बाद एंजेल डि मारियो कह रहे थे 'विश्व कप शुरु होने से पहले ना हम सर्वश्रेष्ठ थे और ना है और ना हार के बाद हम निकृष्टम।' 

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उम्मीद अभी कायम है - मैस्सी की भी,अर्जेंटीना की भी और उनके चाहने वालों की भी।



Wednesday, 23 November 2022

हैय्या हैय्या फुटबॉल_ विश्व कप 2022 डायरी_01



व्यक्ति के हाथ भी कितने जादुई होते हैं! उनसे कितनी जादुई करामातें की जा सकती हैं,ये हम सब जानते हैं। आखिर यूँ ही उक्तियाँ थोड़े ही बनी हैं कि 'व्यक्ति के हाथ में उसकी किस्मत होती है' या फिर 'अपना हाथ जगन्नाथ'। लेकिन यकीन मानिए दोस्तों पैर भी कम जादुई नहीं होते हैं। उनसे भी जादुई संसार रचा जाता है।

जब पैर लय से थिरकते हैं तो नृत्य जैसी खूबसूरत मनमोहक कला का जन्म होता है। जब उन पैरों की लय को गति और घुंघरुओं का साथ मिलता है तो व्यक्ति केलुचरण महापात्र,पं बिरजू महाराज,मृणालिनी साराभाई,गोपी कृष्ण, लच्छू महाराज,सोनल मानसिंह या फिर माइकल जैक्सन, मिखाइल बेरिश्निकोव, मैडोना, शकीरा और मार्था ग्राहम जैसे अद्भुत कलाकारों के रूप में दुनिया में जाने जाते हैं।

जब इन पैरों को लय के साथ गति और शक्ति मिलती है तो दुनिया को अविस्मरणीय दौड़े मिलती हैं और मिलते हैं महान धावक। ये इन पैरों की करामात थी कि फेडीपिडिस मैराथन के युद्ध के मैदान से एथेंस तक एक ऐतिहासिक दौड़ दौड़ता है। इन्हीं पैरों की अदभुत करामात से पावो नूरमी,जेसी ओवेन्स,सेबेस्टियन को,बेन जॉनसन, उसैन बोल्ट,कार्ल लेविस, ग्रिफ्फिथ जॉयनर,मो फराह,हैली गैब्रेसिलासी, मिल्खा सिंह और पी टी उषा बनते हैं,जिनके पैरों की गति,लय और शक्ति मिलकर आपको विस्मय से भर देती हैं।


ठीक ऐसे ही, जब पैरों की गति और लय को एक अदद 60 सेंटीमीटर परिधि वाली और लगभग 300 ग्राम वजन वाली गेंद मिलती है तो फुटबॉल जैसा अनोखा खेल बनता है जिसे हमारी दुनिया के हर कोने में चाहने वाले लोग होते हैं। जो दुनिया की अधिकांश जनता का सबसे प्रिय खेल बन जाता है। जब 100 गज लंबे और 65 गज चौड़े मैदान में जब एक जोड़ी पैर इस गेंद के संपर्क में आते हैं तो पैर गति और लय से कलात्मकता का एक ऐसा जादुई संसार रचते हैं कि देखने वाले आनंद के सागर में डूब डूब जाते हैं। ये पैर फुटबॉल के उन जादूगरों के होते हैं जिन्हें हम और आप पेले,माराडोना,मेस्सी,रोनाल्डो,नेमार,बेंजीमा,

पाउलो रोसी,जोहान क्रुफ,जिनेदिन ज़िदाने,फ्रांज़ बेकनबाउर,अल्फ्रेडो डी स्टिफानो या ऐसे ही ना जाने कितने नामों से जानते हैं। 

यूं तो ये करामाती पैरों के जादूगर साल दर साल अपने जादू से दर्शकों को एक रोमानी दुनिया में ले जाते रहते हैं। पर हर 4 साल में एक बार दुनिया के किसी एक कोने में इन जादूगरों का एक मेला लगता है, जहां इनमें एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ लगी रहती है। और इस होड़ में वे अपने चाहने वालों को चमत्कृत करते रहते हैं। वहां इन के पैरों की प्रतिभा की सीमा आकाश की अनंत ऊंचाई होती है। पैरों के इन जादूगरों के इस चार साला मेले को हम और आप फीफा विश्व कप के नाम से जानते हैं।


इस बार ये मेला  खाड़ी के देश क़तर में कल यानि 20 नवंबर से शुरू होने जा रहा है जो 18 दिसंबर तक चलेगा। लगभग एक महीने चलने वाली इस प्रतियोगिता में पांचों महाद्वीप की 32 सर्वश्रेष्ठ टीमें अपने अद्भुत खेल कौशल,रणनीति चातुर्य और तकनीकी श्रेष्ठता का सर्वोत्तम निदर्शन करेंगी और और फुटबॉल की दुनिया का सिरमौर बनने की कोशिश में अपना सबकुछ झोंक देने को तत्पर रहेंगी।

इस बार विश्व कप के लिए 5 कॉन्फेडरेशन से कुल 32 देशों ने अहर्ता प्राप्त की है। एशियन फुटबॉल एसोसिएशन से छह टीम,कॉन्फेडरेशन ऑफ अफ्रीकन फुटबॉल से पांच टीम,कॉन्फेडरेशन ऑफ नार्थ सेंट्रल अमेरिका एंड कैरेबियन एसोसिएशन फुटबॉल और साउथ अमेरिकन फुटबॉल असोसिएशन से चार-चार टीम और यूनियन ऑफ यूरोपियन फुटबॉल असोसिएशन से तेरह टीम शामिल हैं।

इन 32 टीमों से केवल 24 वे टीम हैं जो 2018 के विश्व कप में खेली थीं। इस बार मेज़बान क़तर की एकमात्र टीम जो विश्व कप फाइनल में पहली बार खेल रही है। वो मेजबान होने के नाते इसमें खेल रही है। अन्यथा ये पहला विश्व कप है जिसमें क्वालीफाई करने वाली टीमों में एक भी डेब्यू नहीं कर रही है। हॉलैंड,घाना,इक्वेडोर,कैमेरून और अमेरिका की पिछले विश्व कप में अनुपस्थिति के बाद फिर से वापसी कर रही हैं। कनाडा की टीम 36 साल बाद वापसी कर रही है तो वेल्स की टीम 64 साल बाद।

इस बार भी सबके ज़्यादा कमी चार बार की विश्व चैंपियन और वर्तमान यूरोपियन चैंपियन इटली की होगी। वो लगातार दूसरी बार विश्व कप के लिए क्वालीफाई करने में विफल रही है।

32 टीमों को कुल आठ ग्रुप में बांटा गया है। ये लीग काम नॉक आउट आधार पर खेला जाएगा।प्रत्येक ग्रुप से दो टीमें नॉक आउट चरण के लिए क्वालीफाई करेंगी। यूं तो इस बार किसी भी ग्रुप को 'ग्रुप ऑफ डेथ'नहीं कहा जा रहा है लेकिन बावजोइड इसके ग्रुप ई को सबसे कठिन ग्रुप माना जा रहा है। इसमें में पुर्तगाल,जर्मनी,कोस्टारिका और जापान।

इस बार विश्व रैंकिंग में नंबर एक टीम और पांच बार की चैंपियन ब्राजील सबसे फ़ेवरिट टीम मानी जा रही है। पिछली चैंपियन फ्रांस,अर्जेंटीना,पुर्तगाल  बेल्जियम भी इस बार के फ़ेवरिट हैं। इसके अलावा जर्मनी और क्रोशिया की टीम को भी कम नहीं आंका जा रहा है।

1930 में उरुग्वे से शुरू हुए फीफा विश्व कप का ये 22वां संस्करण है। क़तर को 2010 में मेजबानी सौंपी गई तब से ही उसकी मेजबानी लगातार विवादों के घेरे में रही है। ये कहा गया कि क़तर ने मेजबानी के लिए फीफा ऑफिशल्स को घूस दी थी और क़तर मेजबानी योग्य नहीं था। सामान्यतः विश्व कप जून जुलाई में होते हैं,जबकि उस समय क़तर में भीषण गर्मी पड़ती है। इसी वजह से इसका समय बदल कर नवंबर दिसंबर कर दिया गया। लेकिन ये समय अनेक बड़ी लीग का समय होता है। इसलिए के लीग को स्थगित करना पड़ा और पूरा फुटबॉल सीजन गड़बड़ा गया।

समलैंगिकों पर और शराब पर प्रतिबंध की भी पश्चिमी देशों की मीडिया में खूब आलोचना हुई। लेकिन सबसे बड़ी आलोचना स्टेडियमों और विश्व कप के अन्य निर्माण में लगे आप्रवासी मजदूरों के शोषण के लिए की जा रही है। कथित तौर पर इन निर्माण कार्यों के दौरान छह हजार से ज़्यादा मजदूरों की मौत हुई।

फिलहाल विश्व कप कुल आठ स्टेडियम में खेले जाएंगे। सबसे बड़ा स्टेडियम लुसैल स्टेडियम है जिसकी क्षमता 80 हज़ार दर्शकों की है। दूसरा बड़ा स्टेडियम अल खोर में स्थित अल बहत स्टेडियम है जिसकी क्षमता 60 हज़ार दर्शकों की है। इसके अलावा दोहा का स्टेडियम 974 और अल थमामा स्टेडियम,खलीफा इंटरनेशनल स्टेडियम,एजुकेशन सिटी स्टेडियम,अल जैनब स्टेडियम और अहमद बिन अली स्टेडियम हैं। उद्घाटन समारोह और उसके बाद प्रतियोगिता का पहला मैच मेजबान क़तर और इक्वेडोर के बीच अल बहत स्टेडियम में होगा और फाइनल मैच लुसैल स्टेडियम में। 

इस बार प्रतियोगिता का शुभंकर है लाईब(la'eeb) इस अरबी शब्द का अर्थ है 'सुपर कुशल खिलाड़ी'। ऑफिसियल बॉल है 'अल रिहला'जिसका अर्थ है 'यात्रा'। इस बार चार फीफा ने चार आधिकारिक गीत 'हैया हैया', 'हरबो', 'लाइट द स्काई' और 'तुको ताखा'जारी किए हैं।

ये विश्व कप प्रतियोगिता इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि फुटबॉल इतिहास के दो सबसे बड़े खिलाड़ी - मैस्सी और रोनाल्डो का ये पांचवा और अंतिम विश्व कप है।

जो भी हो इस विश्व कप में विश्व के सबसे शानदार खिलाड़ियों की दक्षता और प्रतिभा का मुकाबला या फिर फुटबॉल की महारथी टीमों के बीच संघर्ष भर देखने को नहीं मिलेगा बल्कि विश्व के सबसे बड़े फुटबॉल मैनेजरों की रणनीतियों और व्यूह रचना कौशल के संघर्ष की आजमाइश भी होगी। विभिन्न खेल शैलियों की टकराहट और मुकाबले का निदर्शन भी होगा और खेल के पीछे अलग अलग महाद्वीपों की सामाजार्थिक और सांस्कृतिक मूल्यों बीच श्रेष्ठता का द्वंद भी।

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ये आनंद और रोमांच में डूब जाने का समय है। भले ही आप कतर में ना हों,बस कल से टीवी का स्विच ऑन कर लीजिए और टीवी का रिमोट हाथ में धारण।



नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...