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Tuesday, 2 October 2018
Sunday, 25 March 2018
Tuesday, 29 August 2017
चश्मे का भार
भ्रम
आसमाँ की ओर
थोड़ा उठा सा मुँह
उसका
ऐसे लगता मानो
दो कान
और एक नाक
चश्मे का भार
नहीं सँभाल पा रहे हैं
हक़ीक़त
दरअसल ये उसका चश्मा नहीं
उसकी आँखों में
छलक छलक जाते
अनगिनत सपने हैं
जिन्हें संभालने के फेर में
ऊंचा हो जाता हैं मुँह
और छूट जाती हैं जमीं
कि ठोकर खाती है बार बार
सपने बचाने की एवज में ।
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तो क्या दिखने वाला हमेशा सच नहीं होता ?
Monday, 25 August 2014
भस्मासुर
वो जो सबसे शक्तिशाली है
मन के किसी कोने में सबसे बुझदिल है
उसे सताता है डर
हर पल
अपने जैसे ही किसी दूसरे के अपने मुक़ाबिल खड़े होने का
डरता है हर किसी से
ना जाने कौन सा निहत्था उसे कर दे निरुत्तर
ना जाने कौन सा बच्चा खड़ा हो जाए उसके ख़िलाफ़ लेकर हथियार
ना जाने कौन सा किसान छीन ले उसकी मुँह का निवाला
ना जाने कौन सा नागरिक छीन ले उसकी आज़ादी
ना जाने कौन सा शासक छीन ले उसकी सत्ता
गिराता है परमाणु बम
चलाता है ड्रोन से मिसाइलें
जलाता है तेल के कुँए
रोकना चाहता है आत्महत्या करते किसानों की सब्सिडी
करता है हवाई हमले मातृभूमि की मांग करते बच्चों और औरतों पर
बंद कर देना चाहता है अभिव्यक्ति के सारे साधन
चाहता है हर किसी को रौंदना
चाहता है कुचलना
कर देना चाहता है नेस्तनाबूद
मिटा देना चाहता है अस्तित्व
पर वो नहीं जानता
भस्मासुर भी नहीं बचा था
एक दिन
अपनी शक्ति के मद में चूर
वो भी उसी की तरह नाचेगा
अपने सर हाथ रखकर
और खुद ही भस्म हो जाएगा।
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