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Friday, 18 September 2026

जैवलिन थ्रो और दक्षिण पूर्वी एशियाई देश

 


हंगरी के बुडापेस्ट में आयोजित विश्व एथलेटिक्स अल्टीमेट चैंपियनशिप के दौरान पुरुषों की जैवलिन थ्रो में जीतकर टर्की एयरलाइंस से घर वापसी करते समय श्रीलंका के एथलीट रूमेश थरंगा पथिरागे के जैवलिन टूट जाने की ख़बर खूब चर्चा में है।

इससे याद आया कि दक्षिण पूर्वी एशियाई देश एथलेटिक्स में कहां स्टैंड करते हैं। कुछ साल पहले तक ये देश विश्व एथलेटिक्स परिदृश्य पर कहीं नहीं थे। यदा कदा अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा पाते थे। लेकिन एक इवेंट और तीन एथलीटों ने सारा परिदृश्य बदल दिया। ये इवेंट हैं - जैवलिन थ्रो। और एथलीट हैं - नीरज चोपड़ा,अरशद नदीम और रूमेश थरंगा पथिरागे।

सबसे पहले नीरज चोपड़ा आए। वे 2016 में 86.48 मी नए रिकॉर्ड के साथ अंडर ट्वेंटी विश्व चैंपियन बने। 2020 के टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड और 2024 के पेरिस ओलंपिक में सिल्वर जीता। 2023 बुडापेस्ट में विश्व चैंपियन बने और  2022 ज्यूरिख में डायमंड लीग का स्वर्ण जीता। 90 मीटर उनका जिंक्स था जिसे अंततः 2025 में दोहा डायमंड लीग में पार किया और 90.23 मी की अपनी बेस्ट थ्रो की।

उसके बाद अरशद नदीम आए पाकिस्तान से। उन्होंने 2023 की विश्व चैंपियनशिप में सिल्वर जीता। पेरिस में रिकॉर्ड 92.97 मी के साथ ओलंपिक चैंपियन बने। उनकी ये उपलब्धि इस मायने में उल्लेखनीय है कि उन्हें नीरज चोपड़ा की तरह ना तो उच्च स्तरीय प्रशिक्षण हासिल था और ना ही उपकरण। यहां तक कि वे पेरिस ओलंपिक में क्राउड फंडिंग के जरिए पहुंच सके।

और फिर आए रूमेश थरंगा पथिरागे श्रीलंका से। वे क्रिकेट छोड़कर एथलेटिक्स में आए। वे पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तब उभरे जब अगस्त 2025 में भुवनेश्वर में आयोजित 2025 इंडियन ओपन में 86.50 मीटर के थ्रो के साथ नया श्रीलंकाई राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। फिर इस साल ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड जीता। बुडापेस्ट में विश्व अल्टीमेट चैंपियनशिप जीती और ब्रुसेल्स में आयोजित डायमंड लीग जीती। उनका सर्वश्रेष्ठ 92.62 मी है और वे तीनों में सबसे ज़्यादा कंसिस्टेंट हैं। उन्होंने इस साल ही तीन नब्बे प्लस थ्रो की हैं। वे तीनों में सबसे प्रतिभाशाली है।

फिलहाल तो नीरज,नदीम और नए चैंपियन रूमेश विश्व जैवलिन परिदृश्य पर राज कर रहे हैं। 

बस सवाल इतना कि कब तक।



Monday, 14 September 2026

सब्र का फल मीठा होता है




ये 14 सितंबर 2020 की तारीख थी। न्यूयॉर्क के फ्लशिंग मीडोज पर यूएस ओपन का पुरुष एकल फाइनल जर्मनी के अलेक्जेंडर ज्वेरेव और ऑस्ट्रिया के डोमिनिक थिएम के बीच खेला जा रहा था। ज्वेरेव पहले दो सेट 6-2, 6-4 से जीतकर कर अपनी पहली ग्रैंड स्लैम जीत से केवल एक सेट की दूरी पर थे। लेकिन अगले दो सेट थिएम ने 6-4, 6-3 से जीतकर मैच को बहुत रोचक बना दिया। ज्वेरेव ने फाइनल सेट में एक बार फिर बेहतरीन खेल दिखाया और 5-3 की बढ़त के साथ अपनी सर्विस पर 30-0 के स्कोर से आगे थे और केवल जीत से केवल दो अंक दूर थे। लेकिन वे मैच हार गए। 

अब उनकी आँखों में दुख और पश्चाताप के आंसुओं के सिवा कुछ ना था। ट्रॉफी प्रेजेंटेशन सेरेमनी में बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए ज्वेरेव अपनी टीम को संबोधित करते हुए कह रहे थे "मुझे उम्मीद है कि एक दिन हम सब मिलकर उस ट्रॉफी को उठाएंगे।"

इस बात को छह साल बीत गए। 13 सितंबर 2026 को ज्वेरेव एक बार फिर आर्थर ऐश एरीना में फाइनल खेल रहे थे। इस बार वे चैंपियन की मानसिकता से खेल रहे थे और बेन शेल्टन को 6-3, 7-6 (7-2), 5-7,6-4 से हराकर छह साल पहले अपने खेल करियर की सबसे खराब मेमोरी को डिलीट करते हुए अपनी टीम को संबोधित करते हुए कह रहे थे “हमने 30 साल तक कोई ग्रैंड स्लैम खिताब नहीं जीता था, और अब हमने तीन महीने के भीतर दो खिताब जीत लिए हैं। मुझे लगता है कि भगवान ने हमारी मेहनत, हमारे कष्ट और हमारे दर्द को देखा है। मुझे लगता है कि 2026 उन सभी वर्षों का परिणाम है जो इससे पहले हुए हैं, इसलिए आप सभी का धन्यवाद। आप लोग सचमुच अद्भुत हैं, और आप लोगों के बिना मैं यहाँ नहीं हो सकता था।”

इस जीत के साथ वे अपना दूसरा ग्रैंड स्लैम ही नहीं जीत रहे थे बल्कि उस लोकप्रिय कहावत को कुछ और वजन भी प्रदान कर रहे थे जो कहती है 'सब्र का फल मीठा होता है।'

अपनी पहली ग्रैंड स्लैम फाइनल हार के बाद इस साल अप्रैल तक वे दो और ग्रैंड स्लैम फाइनल खेले,लेकिन जीत नहीं पाए। वे 1995-2000 के बीच जन्मे 'नेक्स्ट जेन पीढ़ी' के मेदवेदेव,सिटसिपास,डोमिनिक थिएम, रूबलेव, बेरेटिनी और कैस्पर रुड में सबसे प्रतिभाशाली थे। ये एक ऐसी पीढ़ी थी जो दो पीढ़ियों के बीच सैंडविच बन गई और जिसे बहुत सारी उपलब्धियों से महरूम कर दिया गया। एक तरफ उम्र की सीमा के पार जाकर भी बिग थ्री के राफा,नोवाक और फेडरर ने इस पीढ़ी को अपना स्थान बनाने के लिए कोई स्पेस नहीं दिया। और जब ये तीनों कुछ निस्तेज होते, उससे पहले ही इनके बाद वाली पीढ़ी की प्रतिभा ने उन्हें कोई स्पेस क्रिएट नहीं करने दिया जिसकी नुमाइंदगी यानिक सिनर और अलकराज जैसे खिलाड़ी कर रहे हैं। 

जिस समय इन दो पीढ़ियों के खिलाड़ियों की प्रतिभा के बीच इस नेक्स्ट जेन पीढ़ी के खिड़कियों की प्रतिभा फेड हो रही थी,उस समय में अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने धैर्य के साथ अपने समय की प्रतिक्षा की। संयम रखा। अपनी प्रतिभा की धार पर सान चढ़ाई। संघर्ष जारी रखा। अपनी ऊर्जा बनाए रखी। परिणाम सामने था।

2026 तक आते आते राफा और फेडरर इतिहास बन चुके थे। नोवाक इतिहास बनने के कगार पर थे। नई पीढ़ी अपनी चोटों से जूझ रही थी। ये ज्वेरेव के लिए मौका था। उनका समय आ गया था। ऑस्ट्रेलिया ओपन के वे सेमीफाइनल में हार गए। लेकिन फ्रेंच ओपन जीतकर अपने ग्रैंड स्लैम खिताब का खाता खोला। विंबलडन में वे चैंपियन की तरह खेले। फाइनल तक पहुंचे। यहां वे चूक गए। लेकिन न्यूयॉर्क में वे इस बार एक चैंपियन की ऊर्जा और मानसिकता के साथ पहुंचे थे और वैसा ही उन्होंने खेला। जहां छह साल पहले उनके हाथों से ट्रॉफी छीन ली गई थी, वो उनके हाथों की शोभा बढ़ा रही थी। उनके अधर उसे स्पर्श कर रहे थे।

कोई भी जीत ऐसे ही किसी का दामन नहीं थामती। वे खेल में इंतिहाई तरीके से खेल में इन्वॉल्व थे। वे खेल पर और हरेक अंक पर इस कदर फोकस्ड थे कि उन्हें अपनी जीत का पता ही नहीं चला। वे चैंपियनशिप अंक जीतकर अगली सर्विस के लिए बेसलाइन पर पहुंच गए थे। तब उनकी टीम से इशारा हुआ कि वे जीत चुके हैं। उनके चेहरे पर हल्का सा विस्मय फैला। मुस्कुराहट उनके चेहरे का आवरण बन गई। उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला दिए। सारा आकाश उन्होंने अपने अंक में समेट लिया। खुशी ने अपना स्पेस आंखों में ढूंढा। खुशी तरल हो आंखों में समा गई। 

एक खिलाड़ी जिसके लिए चैंपियन बनना 29 साल तक केवल एक सपना भर रह गया था। तीन महीनों के अंतराल में वो दो बार चैंपियन बन गया था। सपनों से परे। असल जिंदगी में।

अलेक्जेंडर ज्वेरेव के लिए सब्र का फल मीठा था।



पर बेन शेल्टन का क्या!

उनका क्या जिनके लिए प्रतीक्षा समाप्त नहीं होती।  वो बेचैनी पैदा करती है। कसक काँटे की तरह दिल में कचोटती है। प्रतीक्षा कुछ और लंबी होती जाती है। जैसे बेन के लिए। अमेरिका के लिए। अमेरिका के टेनिस प्रेमियों के लिए। अश्वेत अमेरिकन्स के लिए।

बेन शेल्टन स्टेडियम में बैठे उन 24 हजार अमेरिकन्स की उस उम्मीद के लिए खेल रहे थे जो कहती थी कि इस मैदान पर 2003 में एंडी रोडिक के बाद एक नया अमेरिकन खिलाड़ी चैंपियन बनेगा। वे उन अश्वेत अमेरिकन्स की उम्मीदों का बोझ लिए खेल रहे थे जो प्रतीक्षा कर रहे थे कि 1968 में आर्थर ऐश के बाद कोई अमेरिकन अश्वेत यूएस चैंपियन बनेगा। शेल्टन खुद के पहले ग्रैंड स्लैम खिताब जीत लेने के सपने को पूरा करने के लिए खेल रहे थे। 

इस उम्मीद के लिए उन सभी के पास एक वाजिब कारण था। एक स्मृति थी। एक चार महीने पहले हुए अंतहीन प्रतीक्षा की समाप्ति की स्मृति। उनकी स्मृति में एक ऐसी जीत थी जो 53 साल बाद संभव हुई थी। न्यूयॉर्क निक्स ने 1973 के बाद अपना कोई एनबीए खिताब जीता था। 13 जून को पांचवें गेम में सान एंटोनियो स्पर्स को हराकर 4-1 से। इससे पहले चौथे गेम में इसी शहर के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन एरीना में न्यूयॉर्क निक्स की टीम तीसरे क्वार्टर तक 29 अंकों से पिछड़ चुकी थी। लेकिन निक्स ने 107-106 से ये मुकाबला जीत लिया था। एनबीए के फाइनल्स के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। अमेरिकन्स जानते थे,चमत्कार होते हैं। इसी शहर में चार महीने पहले की स्मृति उनके पास थी।

पर चमत्कार हमेशा नहीं होते। उन सब के लिए प्रतीक्षा अधूरी रही।

शेल्टन उम्मीदों के बोझ तले दब गए। पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने के तनाव को ठीक तरह से हैंडल करने से चूक गए। विपक्षी के अनुभव से पिछड़ गए। 

वे हार गए क्योंकि आंकड़े और अनुभव दोनों ही ज्वेरेव के पक्ष में थे। ज्वेरेव ने शुरु से ही इसका फायदा उठाया। उनकी सर्विस इतनी जोरदार थी कि पहले दो सेटों में अपनी पहली सर्व पर केवल तीन अंक गंवाए। कोई ब्रेक प्वाइंट शेल्टन को नहीं दिया। हां,तीसरे सेट के 12वें गेम में ज़्वेरेव की सर्विस शेल्टन ने ब्रेक की और सेट जीतकर अपनी उम्मीदें जिंदा रखीं। लेकिन इससे परिणाम नहीं बदलना था। नहीं ही बदला। ज़्वेरेव ने चौथे सेट के शुरु में ही शेल्टन की सर्विस ब्रेक की और फिर सातवें गेम में दूसरी बार सर्विस ब्रेक कर साढ़े तीन घंटे के संघर्ष को विराम दिया।

यूएस ओपन को एक नया चैंपियन मिल गया था।

ये अलेक्जेंडर साशा ज्वेरेव थे।

चैंपियनशिप साशा को मुबारक।

Sunday, 13 September 2026




शनिवार की दोपहर न्यूयार्क के फ्लशिंग मीडोज के आर्थर ऐश एरीना में खेला गया 2026 के यूएस ओपन का महिला एकल फाइनल अपने आप में कमाल का था। कमाल का इसलिए कि ये मैच योग्यता में एकदम समान दोनों नंबर एक लेकिन व्यक्तित्व में एकदम विपरीत स्वभाव वाली खिलाड़ियों के बीच मुकाबला था।

एक समान स्तर पर खेला गए बेहद संघर्षपूर्ण मैच। जो दो घंटे तेरह मिनट और तीन सीटों तक चला। जिसे अंततः रायबाकिना ने 6-4,5-7,6-2 से जीत लिया। और जीतकर ना केवल सबालेंका को लगातार 99 सप्ताह तक नुमाबरपर रहने के बाद उससे पदच्युत कर दिया बल्कि यूएस ओपन की चैंपियन होने के गौरव से भी वंचित कर दिया।

सबालेंका एक लंबी और मजबूत कद काठी की खिलाड़ी हैं जो अपने उग्र और आक्रामक स्वभाव के लिए जानी जाती हैं। अपने स्वभाव के अनुरूप ही उनकी पोशाक गहरे लाल रंग की थी। फाइनल में जब वे कोर्ट में प्रवेश कर रहीं थीं तो उनकी जैकेट भी वैसी ही गहरे लाल रंग की थी। उनके ठीक विपरीत रायबाकिना दुबली-पतली छछहरी काया वाली सौम्य सी खिलाड़ी हैं। शांत और गंभीर स्वभाव की। बर्फ की मानिंद अपनी भावनाओं को फ्रीज़ किए हुए। जब वे फाइनल में कोर्ट में प्रवेश कर रही थीं तो उनकी सफेद जैकेट उनके स्वभाव से के अनुरूप ही थी। वे इस बार पीले रंग के टॉप में खेल रही थीं। मानो उन्हें अपने नंबर एक बन जाने और ये खिताब जीत लेने का आभास हो गया था और वे अपनी जीत के बसंत का उत्सव मनाने मैदान में उतरी हों। उनका पीला टॉप और काली स्कर्ट बीच मैदान मधुमक्खी का एक शानदार रूपक प्रस्तुत कर रही होती थीं जो अपने शानदार खेल के डंक से विपक्षी खिलाड़ी की उम्मीदों के मकरंद को चुरा लेती और उसे अपनी जीत के आनन्द के मधु में परिवर्तित कर देती।

सबालेंका पिछले 99 हफ्तों से नंबर एक की पोजीशन पर हैं। औपचारिक रूप से फाइनल खेले जाने तक वे नंबर एक हैं। लेकिन जैसे ही एलिना रायबाकिना ने यहां सेमीफाइनल में प्रवेश किया,वे अनौपचारिक रूप से नंबर एक खिलाड़ी हो गई थीं। ये क्या ही मज़ेदार स्थिति थी कि शनिवार को जिस समय दो खिलाड़ी अपना फाइनल खेल रही थीं तो उस समय औपचारिक रूप से सबालेंका नंबर एक और रायबाकिना नंबर दो थीं। जबकि अनौपचारिक रूप से स्थित इसके एकदम विपरीत थी। इतना ही नहीं वे इससे पहले दो ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल चुकी थीं। और दोनों ने एक-एक बार एक दूसरे को हराकर ऑस्ट्रेलिया ओपन जीता था। सबालेंका ने 2023 में और रायबाकिना ने 2026 में। इस साल दोनों चार बार एक दूसरे के साथ खेली थीं और दोनों ने बराबर जीत हासिल की थीं। रायबाकिना ने ऑस्ट्रेलिया ओपन और डब्ल्यूटीए टूर्स फाइनल में जीत हासिल की तो सबालेंका ने मियामी ओपन के सेमीफाइनल और इंडियन वेल्स ओपन के फाइनल में रायबाकिना को हराया। इतना ही नहीं दोनों पावर खेल की चैंपियन खिलाड़ी हैं। और तेज सर्विस के लिए और बेसलाइन के शानदार खेल के लिए जानी जाती हैं।

ये रायबाकिना का दृढ़ संकल्प और इच्छा शक्ति ही थी कि वे यहां लगभग असंभव जीत हासिल करती हैं। वे यूएस ओपन में पैर की चोट के साथ आती थीं और एक हफ्ते तक तो टेनिस खेल तक नहीं पातीं। वे यूएस ओपन से पहले होने वाले सिनसिनाटी ओपन के क्वार्टर फाइनल में इगा स्वीयेक के खिलाफ चोट के चलते हट गई थी। लेकिन एक बार जब उन्होंने प्रतियोगिता में अपना विजयी अभियान शुरु किया तो मुड़कर नहीं देखा। वे बिना एक भी सेट गंवाए क्वार्टर फाइनल में पहुंचती हैं। और फिर क्वार्टर फाइनल में नाओमी ओसाका और सेमीफाइनल में ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता झेंग के विरुद्ध एक सेट से पिछड़ने के बावजूद जीत हासिल करती हैं।

ये एक संयोग ही कहा जायेगा कि पूर्व सोवियत यूनियन के दो संघटक देशों बेला रूस और कज़ाकिस्तान से दो बालाएं  हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका आती हैं और सबालेंका पेगुला को और रायबाकिना कोको गफ को सेमीफाइनल में हराकर अमेरिकी उम्मीदों को मटियामेट कर देती हैं। 

रायबाकिना की ये जीत उन्हें विश्व महिला टेनिस परिदृश्य पर अब सबसे मजबूत और शानदार खिलाड़ी के रूप में ही स्थापित नहीं करती,बल्कि महिला टेनिस की नंबर एक खिलाड़ी के रूप में भी स्थापित करती है। इतना ही नहीं ये महिला टेनिस की एक और शानदार प्रतिद्वंदिता की नींव भी रखती है। सबालेंका बनाम रायबाकिना।

रायबाकिना को ये शानदार जीत मुबारक।



Monday, 7 September 2026





जाने माने फुटबॉल कोच पेप गार्डियोला ने एक बार मेस्सी के बारे में कहा था “उनके बारे में मत लिखो। उनका वर्णन करने की कोशिश मत करो। उन्हें खेलते हुए देखो।”

कुछ खिलाड़ी खेल मैदान में खेल नहीं रहे होते हैं,वे एक जादू की निर्मिति कर रहे होते हैं और दर्शक उसके सम्मोहन में होते हैं। उन खिलाड़ियों की अपने विरोधियों से नहीं बल्कि समय से मुठभेड़ हो रही होती है। शमशेर बहादुर सिंह की पंक्तियां हैं "काल, तुझसे होड़ है मेरी। अपराजित तू— तुझमें अपराजित मैं वास करूँ। "

कुछ खिलाड़ियों को मैदान में खेलते हुए देखकर लगता है मानो ये पंक्तियां उनके लिए ही लिखी गई हों।
चालीस की उम्र में लेब्रान जेम्स जिस तरह की बास्केटबॉल खेल रहे हैं, लगता है, वे समय के विपरीत दिशा में दौड़ रहे हों। वे समय के सीने पर सफलता के नए मानक गढ़ रहे होते हैं। नोवाक जोकोविक भी लगभग इतनी ही उम्र में उस को चुनौती देते हुए सफलताओं के नए पैमाने तय कर रहे होते हैं। और उन्तालीस साल के मेस्सी का क्या। मेस्सी ने इस साल के फीफा विश्व कप में  दिखाया कि मानवीय क्षमता की सीमा को कहां तक विस्तारित किया जा सकता है।

भौतिक रूप से हर किसी को समय से पराजित हो जाना होता है। चाहे लेब्रान हों,नोवाक हों या मेस्सी हों। उन्हें समय के सामने नतमस्तक हो जाना है। मेस्सी ने भी समय के सामने सिर झुकाया और राष्ट्रीय टीम को विदा कहा। लेकिन बात इतनी भर नहीं है। काल से होड़ के इन इक्कीस सालों में वे काल के कपाल पर जीत की कहानी लिख चुके होते हैं। अपनी प्रतिभा और क्षमता से सफलता की उन अनंत ऊंचाइयों को नाप चुके होते हैं, जहां समय के हाथ नहीं पहुंचने वाले हैं। वे प्रसिद्धि की इबारत इतनी गाढ़ी रोशनाई से लिख चुके होते हैं कि इसे मिटा पाना अब किसी के बस की बात कहां। अपराजित वे काल की आत्मा में समा चुके होते हैं। 

अब जब तक फुटबॉल का खेल है,तब तक मेस्सी हैं। उनका नाम है। उनके खेल के जादू का सम्मोहन है।

आप इसे नियति कहिए या काल या फिर समय,उनकी बार बार उससे मुठभेड़ होती है। वे बार-बार उदास होते हैं। पानी उनकी आंखों में तैरता है। उनके कांधे झुकते हैं। पर वे हारते नहीं है। वे बार बार नियति से द्वंद्व में लौटते हैं। सफलता के नए प्रतिमान गढ़ते हैं। और अंततः एक महानायक की छवि के साथ अपने फुटबॉल खेल का ही नहीं बल्कि काल के साथ आंख मिचौली के खेल का भी समापन करते हैं।

मेस्सी की उम्र उस समय लगभग दस वर्ष रही होगी। वे तब तक ग्रैंडोली क्लब से नेवेल्स ओल्ड बॉयज क्लब में शामिल हो चुके थे। वे अपनी प्रतिभा के वहां झंडे गाड़ रहे थे और सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों में शुमार हो गए थे कि लियो को अपनी एक बीमारी का पता चलता है-ग्रोथ हार्मोन्स डेफिशिएंसी का। खर्चा बड़ा था जिसे ना परिवार उठा सकता था और ना क्लब। लगा एक शानदार प्रतिभा का अंत है ये।

ऐसे में बार्सीलोना के खेल निदेशक कार्ल रिक्सेस ने लियो की प्रतिभा को पहचाना,उसके साथ अनुबंध किया और उसके इलाज का प्रबंध भी। परिवार यूरोप आ गया। ये वर्ष 2000 था। बार्सिलोना अकादमी ने उस बालक की नैसर्गिक प्रतिभा को निखार दिया। और तब वर्ष 2005  में नीदरलैंड में आयोजित फीफा अंडर-20 विश्व कप जीतने में मेस्सी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने टूर्नामेंट में सबसे अधिक छह गोल किए जिसमें नाइजीरिया के खिलाफ 2-1 से फाइनल में जीत में किए गए दोनों गोल भी शामिल थे। इसके लिए उन्हें गोल्डन बूट और गोल्डन बॉल से सम्मानित किया गया।

लेकिन काल से द्वंद्व बना रहा। कुछ समय बाद ही 17 अगस्त 2005 को सीनियर टीम में उनका पदार्पण बेहद खराब रहा। हंगरी के खिलाफ दोस्ताना मैच में वे 63वें मिनट में स्थानापन्न खिलाड़ी के रूप में अर्जेंटीना के लिए मैदान में उतरे। एक मिनट से भी कम समय में उन्हें सीधा लाल कार्ड दिखाया गया,जब उन्होंने अपना हाथ घुमाया और उनकी कोहनी फुल-बैक विल्मोस वैन्ज़ाक से टकरा गई।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद खराब और कठिन शुरुआत के बावजूद, अंततः मेस्सी सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में से एक बन गए। और बहुत सारे लोगों के लिए महानतम।

उनके 21 साल के अंतरराष्ट्रीय करियर के दो मुख्तलिफ हिस्से हैं। पहला, 2005 से 2016 तक। इसमें वे और बार्सिलोना क्लब एक दूसरे का पर्याय बन जाते हैं। इस समय वे विश्व फुटबॉल परिदृश्य पर छा जाते हैं और उनकी गणना फुटबॉल इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में की जाने लगती है। अब एक तरफ मेस्सी और रोनाल्डो के बीच प्रतिद्वंदिता स्थापित होती है,तो दूसरी तरफ 'दूसरे माराडोना' के रूप में अपने पूर्वज फुटबॉलर की विरासत के वाहक बन जाते हैं। माराडोना कहते थे कि 'उन्हें मेस्सी के शरीर में अपनी आत्मा का आभास होता है।' 

इस समय में उन्होंने बार्सिलोना के लिए और अपने लिए कोई ऐसा खिताब नहीं था,जो ना जीता हो। उन्होंने ला लीगा के आठ,यूईएफए चैंपियंस लीग के चार,कोपा डेल रे के चार,फीफा क्लब वर्ल्ड कप के तीन खिताब जीते। इतना ही नहीं,एक ही सीजन में ला लीगा, कोपा डेल रे और चैंपियंस लीग तीनों जीतकर दो बार 'ट्रेबल' हासिल किया। इस समय में पांच बार 'बैलोन डी'ओर' पुरस्कार और तीन बार यूरोपियन गोल्डन शू अवार्ड जीते। 2012 में एक कैलेंडर वर्ष में  सर्वाधिक गोल 91 गोल का विश्व रिकॉर्ड भी मेस्सी ने हासिल किया।

लेकिन जिस समय वे बार्सिलोना के लिए खिताबों का अम्बार लगा रहे थे,उस समय वे अर्जेंटीना को कोई भी खिताब नहीं दिला सके। इस दौरान एकमात्र उपलब्धि 2008 में ओलंपिक गोल्ड रहा।  

2016 में एक बार फिर वे नियति के समक्ष नतमस्तक हुए। अपने 29वें जन्मदिन के ठीक दो दिन बाद कोपा अमेरिका कप के फाइनल में चिली के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में अर्जेंटीना की हार गया। स्वयं मेस्सी चूक गए थे। हार के बाद मेस्सी की आँखें नम थीं और वे कह रहे थे 'मेरे लिए राष्ट्रीय टीम का सफर खत्म हो गया है। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। चैंपियन न बन पाना दुखद है।'

ये निराशा स्वाभाविक थी। अर्जेंटीना 2014 विश्व कप के फाइनल में हार चुका था। साथ ही 2007, 2015 और अब 2016 के कोपा अमेरिका कप फाइनल में भी हार गया था। एक खिलाड़ी जो दुनिया का महानतम खिलाड़ी माना जाता हो,वो उन मौकों पर असफल रहा जो उसके लिए सबसे ज्यादा मायने रखते थे।

2016 में राष्ट्रीय टीम से विदा के अपने फैसले को अंततः उन्हें बदलना पड़ा। आखिर उन्हें अपने और अपने देश के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियां पानी बाकी जो थी। 

अब उनके खेल करियर का दूसरा हिस्सा शुरू होता है। 2016 से 2026 तक का। वे बार्सिलोना से अलग होते हैं। ये उनके लिए सबसे उदास कर देने वाली बात थी। और उन के लिए भी जिन्हें मेस्सी को नीली लाल धारियों वाली टी शर्ट से अलगाना मुश्किल था। उसके बाद वे सेंट जर्मेन पेरिस और इंटर मियामी के लिए खेले जरूर। पर उस तरह मन नहीं रमा पाए जैसे बार्सिलोना में रमा था। उनके सामने अब विकल्प के तौर पर राष्ट्रीय टीम थी। उनके पास सब कुछ था सिवाय राष्ट्रीय टीम के साथ कोई बड़े खिताब के। ये उनके खेल का अधूरापन था जिसे उन्हें मुकम्मल करना था। और कमाल है कि वे ऐसा कर पाते हैं। अब वे क्लब से कहीं ज्यादा राष्ट्रीय उपलब्धियों को हासिल करते हैं। वे उपलब्धियां जो उनकी सबसे बड़ी चाहना थीं और जो उनसे लगातार दूर भाग रही थीं।


मेस्सी की राष्ट्रीय टीम में वापसी से अर्जेंटीना टीम की  किस्मत रातों रात बदल गई हो,ऐसा नहीं था। 2018 के विश्व कप में अर्जेंटीना एक बार फिर राउंड ऑफ़ 16 से बाहर हो गई और 2019 के कोपा अमेरिका कप में उसे तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। लेकिन उसके बाद अर्जेंटीना और मेस्सी ने 2021 और 2024 में दो बार कोपा अमेरिका कप जीता। और फिर कतर में 2022 का फीफा विश्व कप जीता। हर फुटबॉलर का सबसे बड़ा सपना। मेस्सी का अपना खुद का अधूरा सपना। इतना ही नहीं,फिर 39 साल की उम्र में अमेरिका में आयोजित फीफा विश्व कप में अर्जेंटीना को अकेले दम पर लगातार दूसरी बार फाइनल तक पहुंचाया। उनके प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि उम्र के साथ मेस्सी की गोल करने की क्षमता में कोई कमी नहीं आई है। टूर्नामेंट में उनके आठ गोल केवल म्बाप्पे से कम थे। साथ ही मेस्सी ने चार असिस्ट भी किए।

और तब नियति को मेस्सी ने एक बार फिर अपने रास्ते में खड़ा पाया। जिस शानदार विदाई की वे और उनके चाहने वाले उमीद कर रहे थे,उससे वे वंचित रह गए। अर्जेंटीना फाइनल में स्पेन से हार गई। एक बार फिर मेस्सी की आँखें नम थीं। दो दिन बाद समय के समक्ष वे नतमस्तक हुए। नियति के सम्मान में उन्होंने अपने हाथों से तीन पन्नों का एक समर्पण पत्र लिखा। लेकिन उस समय तक नियति के कपाल पर अपना नाम हमेशा हमेशा के लिए अंकित कर चुके थे। स्वर्णाक्षरों में।

आखिर वो क्या चीज थी जो मेस्सी को मेस्सी बनाती है। वे एक नैसर्गिक खिलाड़ी थे जिनमें  प्रतिभा जन्मजात 'इन बिल्ट' थी। उसे उन्होंने अर्जित नहीं किया था। वे छोटे कद के थे। पांच फुट सात इंच के। कद काठी में भी वैसे मजबूत नहीं थे जैसे कि आज के खेल में एक खिलाड़ी को होना होता है। जैसे माराडोना थे। रोनाल्डो हैं। अर्लिंग हॉलैंड हैं। एमबापे हैं। दरअसल वे आधुनिक पावर खेल को अपनी कलात्मकता से स्थानापन्न कर देते हैं। और अपनी गति से भी। वे अपने पैरों से गेंद को ठीक उसी तरह से बरतते हैं जैसे ध्यान चंद अपनी हॉकी से गेंद को। वे खूबसूरत ड्रिबलिंग करते। माराडोना की तरह। उनकी विरासत को और आगे ले जाते हुए। गेंद उनके पैरों से ऐसे चिपकी रहती मानो वो उनसे विछोह सह ही नहीं सकती। उनमें कम लंबे होने के कारण अतिरिक्त चपलता थी। वे एक ऐसे खिलाड़ी थे जो गेंद ड्रिबल करते हुए बिना गेंद के दौड़ने से अधिक तेजी से दौड़ते थे। 

वे गेंद को बहुत कोमलता से बरतते। उनके खेल में एक खास तरह की कोमलता थी। उनके खेल में वो निर्ममता नदारद थी,जैसी माराडोना में थी। रोनाल्डो में है। या फिर एम्बाप्पे और हॉलैंड में है। 

 उनके खेल में सहजता थी। सरलता थी। कलात्मकता थी। गति थी। कमाल का नियंत्रण था। अगर कुछ ना था तो कठोरता नहीं थी। निर्ममता नहीं थी। ताकत का गर्वीला एहसास नहीं था। हां,एक मानवीय अनुभूति का गहरा अहसास था। वे दिल से खेलते लगते थे। उनके खेल में एक अद्भुत लय थी। वे गोल करते समय अपनी कला से विज्ञान के नियमों को धता बताते लगते।

वे मैदान में एक साथ कई भूमिका निभाते। वे एक शानदार फॉरवर्ड तो थे ही जो असंभव से गोल करते। लेकिन वे एक बेहतरीन प्लेमेकर भी थे। एक शानदार टीम प्लेयर जो अपने साथियों को तीव्र गति से,सही समय पर,अचूकता के साथ गेंद पहुंचाते कि विपक्षी खिलाड़ी हैरान-परेशान, भ्रमित और असहाय से रह जाते। उनमें एक विशेष गुण ये था कि वे विपक्षी रक्षण की उन दरारों को पहली नजर में ही भांप लेते थे जो बाकी खिलाड़ी सोच भी नहीं सकते थे। बार्सिलोना में पैप गार्डियोला ने उनके लिए एक साथ कई भूमिकाएं तय की। वे एक ही समय में स्ट्राइकर, विंगर और फैसिलिटेटर की तरह खेलते। ये फुटबॉल में नया प्रयोग था। 

उनके खेल के ये गुण उनके व्यक्तित्व का अविभाज्य हिस्सा हैं। वे एक शर्मीले और सहज व सरल व्यक्ति थे। मेस्सी की छवि उनके दिल, उनकी ईमानदारी और उनकी विनम्रता से बनती है। एक पत्रकार ने एक बार लिखा था कि 'रोनाल्डो अपनी ईमानदारी में इतने बुरे हैं कि लोग उनका मजाक उड़ाते हैं, जबकि मेस्सी अपनी अच्छाई में इतने अच्छे हैं कि लोग उनका मजाक उड़ाते हैं।' वे एक इंसान के रूप में उनका व्यक्तित्व शानदार था। 

उनके भीतर का एक उम्दा इंसान और उनके भीतर का एक अद्भुत खिलाड़ी दोनों मिलकर मेस्सी की एक ऐसी खूबसूरत छवि बनाते हैं जो लाखों करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में हमेशा के लिए चस्पां हो गई है। अब वे खेलें या ना खेलें,ये छवि अमिट है।

उनके संन्यास पर इंग्लैंड के महान फुटबॉलर गैरी लिनेकर से खूबसुरत और क्या ही कहा जा सकता है कि "फुटबॉल आगे बढ़ता रहेगा, जैसा कि हमेशा होता है, लेकिन अर्जेंटीना और दुनिया को आपने जो यादें दी हैं, वे कभी नहीं मिटेंगी। धन्यवाद, लियो।"

हां, 

धन्यवाद लियो।

विदा लियो।

Thursday, 30 July 2026

ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल 2026

एक : फीके फीके से खेल

इस बार के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ खेल बहुत फीके फीके से हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया द्वारा मेजबानी  से पीछे हट जाने के बाद  किसी तरह से ये खेल बहुत कम समय और बजट में ग्लासगो ने आयोजित किए हैं। 2022 में बर्मिंघम में आयोजित खेलों के मुकाबले लगभग आधी स्पर्धाएं और खिलाड़ी भाग ले रहे हैं।

फिलहाल अभी तक भारत की लड़कियां और लड़कों ने 5-5 पदक जीते हैं। लेकिन लड़कियां दो स्वर्ण,एक रजत और दो कांस्य पदक जीतकर लड़कों को पीछे धकेलकर पहले स्थान पर बनी हुई हैं।

और हां लड़कियों के पदकों की चमक के बीच भारतीय उम्मीदों का बोझ उठाए दो भारोत्तोलक मीराबाई चानू और ज्ञानेश्वरी यादव की तिरंगे रंगों की हेयरक्लिप और हेयरबैंड भी ना केवल दर्शकों के दिलों को छू रहे हैं बल्कि आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

दो : गुमनामी से शोहरत तक की लंबी दौड़ 


ज़िंदगी की जद्दोजहद की दौड़ें अक्सर गुमनामी के अंधेरों में दम तोड़ देती हैं। लेकिन वैसी ही कोई एक दौड़ शोहरत और बलंदी की रोशन दुनिया अता कर जाती है। अलीगढ़ जिले के सिरसा गांव के गुलबीर सिंह से बेहतर इसे और कौन जान सकता है।

गुलबीर जब अपने गांव की पगडंडियों पर सेना में सिपाही की भर्ती के लिए दौड़ का अभ्यास कर रहे थे,तो वो घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने की जद्दोजहद भर थी। लेकिन 2018 में 18 वर्ष की उम्र में जब खेल कोटे में वे ग्रेनेडियर रेजिमेंट में भर्ती हो रहे थे,तो एथलेटिक्स ट्रैक उनकी प्रतीक्षा में खड़ा था और शोहरत उनकी आगवानी कर रही थी।

अरुणाचल में अंतर यूनिट स्पर्धाओं के दौरान आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट पुणे के कोच यूनुस खान ने उनकी प्रतिभा को लक्षित किया और उन्हें इंस्टीट्यूट ले आए। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

हांगजू एशियाई खेल 2023 में 10 हज़ार मीटर का कांस्य पदक जीता। उसके बाद वे अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग स्थित हाई परफॉर्मेंस सेंटर में हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग लेने गए। वहां से जब वे भारत वापस आए,तो एक नए अवतार में लौटे। अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने भारत के कई दशकों पुराने 3,000 मीटर, 5,000 मीटर और 10,000 मीटर के राष्ट्रीय  रिकॉर्ड्स को एक-एक करके तोड़ दिया।

उसके बाद आए ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल। यहां वे अपने शानदार प्रदर्शन से जगी उम्मीदों का बोझ साथ लेकर आए। लेकिन वे उस बोझ तले दबे नहीं,उससे और ज्यादा निखरे। उन्होंने यहां 10 हजार मीटर दौड़ का रजत पदक जीता। समय था 27:49.78। ये रजत भी एक बड़ी उपलब्धि की तरह आया। इसलिए कि ये इस प्रतियोगिता की इस स्पर्धा का 90 साल में पुरुषों का पहला भारतीय पदक था। बड़ी बात ये कि ये कारनामा अफ्रीकी धावकों के बीच किया था। इस स्पर्धा में वे डेनियल एबेनयो जैसे कई नामचीन अफ्रीकी धावकों के मुकाबिल थे। कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में 1986 के बाद ये पहला अवसर था कि इस स्पर्धा में कोई अफ्रीकी धावक पोडियम पर नहीं खड़ा था।  

वे मात्र .85 सेकेंड के अंतर से ऑस्ट्रेलिया के धावक से स्वर्ण पदक चूक गए। आज उनका रजत पदक एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन आगे आने वाले समय में रजत की खुशी से ज्यादा स्वर्ण चूक जाने की टीस सालती रहेगी।

ग्लासगो में वे उम्मीदों का बोझ लेकर आए थे। लेकिन वे उसके तले दबे नहीं,उससे और ज्यादा निखरे। उन्होंने यहां 10 हजार मीटर दौड़ का रजत पदक जीता। ये इस प्रतियोगिता की इस स्पर्धा का 90 साल में पहला भारतीय पदक था। सबसे बड़ी उपलब्धि ये कारनामा अफ्रीकी धावकों के बीच किया था। इस स्पर्धा में वे डेनियल एबेनयो जैसे कई नामचीन अफ्रीकी धावकों के मुकाबिल थे। कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में 1986 के बाद ये पहला अवसर था कि कोई अफ्रीकी धावक पोडियम पर नहीं खड़ा था। 

वे मात्र .85 सेकेंड के अंतर से ऑस्ट्रेलिया के धावक के. रॉबिन्सन से स्वर्ण पदक चूक गए। आज उनका रजत पदक एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन आगे आने वाले समय में रजत की खुशी से ज्यादा स्वर्ण चूक जाने की टीस सालती रहेगी

तीन : ऊंचाई का नया नाम सर्वेश अनिल कुशारे



भारतीय एथलीट अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता की जो रोमानी कहानियां लिखते हैं,वे अपनी निर्मिति में उतनी रोमानी होती नहीं हैं। वे अक्सर ग्रामीण पृष्ठभूमि,अभावों,संघर्षों,कठिनाइयों और खेल प्रशासन की निष्क्रियता,उदासीनता और बेईमानी के खुरदुरे धरातल पर कठोर परिश्रम,लगन,धैर्य और दृढ़ इच्छाशक्ति जैसी क्रियाओं से लिखी जाती हैं

सर्वेश अनिल कुशारे एक ऐसे ही एथलीट हैं। वे नासिक के देवरगांव में एक प्याज की खेती करने वाले साधारण किसान के घर जन्म लेते हैं,कृषि अपशिष्ट के लैंडिंग पिट बनाकर ऊंची उड़ान का अभ्यास करते हैं और विश्व के सर्वश्रेष्ठ लैंडिंग पिटों पर अपनी प्रतिभा की उड़ान से सबको चमत्कृत कर देते हैं।

दो वर्ष की बेटी के 31 वर्षीय पिता सर्वेश इस समय शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। 27 जून को अंतर राज्य एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 2.31 मीटर ऊंची उड़ान के साथ आठ साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड ही नहीं बनाते हैं,बल्कि 2.30 मीटर के मनोवैज्ञानिक बैरियर को भी पार कर जाते हैं। फिर 11 जुलाई को 2.26 मीटर की छलांग के साथ मोनाको में आयोजित  डायमंड लीग में अपने पहले ही प्रतिभाग में कांस्य पदक जीतकर पहले भारतीय हाई जम्पर बनकर इतिहास लिखते हैं। उल्लेखनीय ये है कि कुशारे ने यहां टोक्यो ओलंपिक के संयुक्त चैंपियन जियानमार्को टैम्बेरी और मुताज़ बरशिम जैसे सितारों को पीछे छोड़ देते हैं।

और फिर ग्लासगो में 28 जुलाई को 2.25 मीटर की छलांग के साथ अपना पहला राष्ट्रमंडल खेलों का रजत पदक जीतते हैं। ये उनका दुर्भाग्य कि वे काउंटबैक के आधार पर स्वर्ण पदक चूक जाते हैं। स्वर्ण पदक विजेता जमैका के रोमेन बैकफोर्ड भी कुशारे की तरह 2.28 मीटर की ऊंचाई पार करने में असफल रहते हैं, लेकिन 2.25 की ऊंचाई पहले प्रयास में पार कर जाते हैं और कुशारे अपने तीसरे प्रयास में।

31 साल की उम्र में जब एथलीट रिटायरमेंट ले रहे होते हैं, उस समय कुशारे सफलता के नए मानदंड तय कर रहे हैं। गांव में कृषि अपशिष्ट से बने लैंडिंग पिट से अंतरराष्ट्रीय मंच पर इतिहास रचने की ये यात्रा जितनी रोमानी है उतनी ही प्रेरणादायी भी।




Thursday, 23 July 2026

फुटबॉल नर्सरी मिनर्वा अकादमी और रंजीत बजाज

 


एक बड़ी चकाचौंध में छोटी सी कोई गहमागहमी अनदेखी रह जाती है। बड़े इवेंट के बीच छोटा सा इवेंट अनचिह्ना रह जाता है। बड़े बड़े संघर्षों के बीच एक छोटी सी लड़ाई बिला जाती है। बड़े बड़े सपनों के बीच उम्मीद की एक छोटी सी किरण अनचाही सी रह जाती है। जैसे बड़े लोगों के बीच बच्चे उपेक्षित रह जाते हैं। कि बच्चों की प्रतिभा के घर्षण से पैदा हुई कोई चिंगारी आँखो का नूर बनने से रह जाती है।

जिस समय उत्तरी अमेरिका के 16 शहरों में फुटबॉल के सितारे अपनी चमक बिखेर रहे थे,ठीक उसी समय यूरोप के हेलसिंकी में भारत की किशोर प्रतिभाएं फुटबॉल के ही खेल में अपनी प्रतिभा से एक ऐसा स्पार्क' एक चिंगारी पैदा कर रहे थे,जिसे देश में भले ही व्यापक रूप से लक्षित ना किया जा सका,मगर जिसने उम्मीद की लौ जला दिभाई। अगर इस स्पार्क को भारतीय खेल सिस्टम बचा कर रख सका, तो इसके बड़ी आग में तब्दील हो जाने और देश की प्रतिष्ठा को रोशन किए जाने की उम्मीद तो बनती ही है। एक बड़ी उम्मीद। 

कहते हैं कई बार जो काम बड़े नहीं कर पाते वो अक्सर छोटे बच्चे कर दिखाते हैं। जिस समय भारतीय फुटबॉल टीम की प्रतियोगिता जीतना तो दूर की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति तक दर्ज नहीं करा पा रही है(इस समय सीनियर भारतीय मेंस टीम की फीफा रैंकिंग 136वीं है),उस समय हमारे छोटे बच्चे दुनिया के प्रतिष्ठित टूर्नामेंट जीत रहे हैं। 




बीती 11 जुलाई को फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में यूरोप के तीसरे सबसे बड़े और प्रतिष्ठित युवा फुटबॉल प्रतियोगिता 'हेलसिंकी कप' को चंडीगढ़ स्थित मिनर्वा क्लब की अंडर 12 टीम फिनलैंड की सबसे सफल और दो बार की मौजूदा चैंपियन टीम एच जे के हेलसिंकी टीम को हराकर जीत रही थी। पिछली बार ये प्रतियोगिता वो जीतते-जीतते रह गई थी। वो फाइनल में इसी मेजबान टीम से हार गई थी। 

इस भारतीय टीम ने पूरी प्रतियोगिता में शानदार खेल दिखाया। उसने  भाग लेने वाली 125 टीमों में सबसे ज्यादा 50+ गोल किए। मिनर्वा अकादमी की टीम ने प्री क्वार्टर फाइनलमें 'हेलसिंघिन पोनिसटस' को रिकॉर्ड 19–0 से करारी हराया। भारतीय टीम यहीं नहीं रुकी। क्वार्टर फाइनल में एचजेके को 6–0 और सेमीफाइनल में कप्यलान पल्लो को 9–0 से हराया। वांगशेम कोन्याक और टी. किपगेन  जैसे युवा खिलाड़ियों ने शानदार खेल दिखाया।

इसके तुरंत बाद 12 से 18 जुलाई तक स्वीडन के गोथनबर्ग शहर में आयोजित 'गोथिया कप' भी लगातार दूसरी बार जीत रहे थे। जिस दिन न्यूजर्सी में स्पेन विश्व कप जीत रहा था उससे एक दिन पहले भारत के ये बच्चे ब्राजील के आरएस स्पोर्ट्स क्लब की टीम को 2-1 से हराकर अपना यूरोपीय डबल पूरा कर रहे थे। टीम ने इस प्रतियोगिता में भी शानदार खेल दिखाया और कुल नौ मैचों में 87 गोल किए।


भारतीय टीम की इस सफलता के पीछे एक शख़्स खड़ा है, और वो है रंजीत बजाज। एक ऐसा उद्यमी, एक ऐसा खेल मैनेजर, एक ऐसा खेल प्रशासक जो भारतीय फुटबॉल खेल प्रबंधन को,उसकी खामियों को चुनौती देने का साहस रखता है। उसे ठीक करने का खम ठोंकता है। और खुद एक उदाहरण बन कर सामने आता है।

भारतीय फुटबॉल खेल प्रबंधन में उन्हें एक 'रिबेल', एक 'विद्रोही'  के रूप में देखा और जाना जाता है। वे भारतीय फुटबॉल महासंघ की गलत नीतियों,खराब प्रबंधन और दरकते बुनियादी ढांचे के आलोचक रहे हैं। उनका मानना रहा है कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है,बल्कि सही विजन और एक सही सिस्टम की कमी है। भारत में फुटबॉल के विकास के लिए उनका मूलमंत्र है ग्रासरूट स्तर पर मेहनत की जाए। 

अपने विजन को हकीकत में बदलने के लिए ही उन्होंने चण्डीगढ़ में मिनर्वा अकादमी की स्थापना की। इसके माध्यम से ही वे देशभर के गांवों और कस्बों से प्रतिभाओं को लक्षित कर उन्हें एक मंच प्रदान कर रहे हैं और तराशकर वैश्विक एक्सपोजर देने का काम कर रहे हैं। उनकी अकादमी में बहुत सारे बच्चे पूर्वोत्तर राज्यों से हैं। उनकी अकादमी ने 250 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी देश को दिए हैं। 2017 में भारत में आयोजित अंडर 17 फीफा विश्व कप में शामिल भारतीय टीम के नौ खिलाड़ी इसी अकादमी से थे। मिनर्वा एकेडमी की अंडर-15 टीम स्पेन के एमआईसी कप में लिवरपूल एफसी की अंडर-15 टीम को 6-0 से हरा चुकी है। मिनर्वा एकेडमी की अंडर 14 टीम ने अपराजित रहते हुए यूरोप के तीन प्रतिष्ठित खिताब—गोथिया कप, डाना कप और नॉर्वे कप जीतकर ट्रेबल पूरा किया है। और इसी साल अंडर 12 टीम ने हेलसिंकी और गोथिया कप जीतकर डबल पूरा किया।

वे फुटबॉल को लेकर इस हद तक जुनूनी हैं कि जब उनकी टीम को यूरोपीय दौरे के लिए कोई स्पॉन्सरशिप नहीं मिली तो व्यक्तिगत रूप से ऋण लेकर टीमों का दौरा सुनिश्चित किया।

 वे देश के हर ज़िले में अकादमी खोले जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनका सपना और उनका लक्ष्य भारत को 2034 फीफा विश्व कप के लिए क्वालीफाई कराना है। वे निरंतर युवा खिलाड़ियों का एक बड़ा पूल तैयार करने और आधुनिक, विज्ञान-आधारित प्रशिक्षण को लागू करने में व्यस्त हैं।

एक जूनून का नाम है रंजीत बजाज और उसका परिणाम है मिनर्वा अकादमी। बस  देखना है अपनी भीतर की ये आग वे कब तक बचाए रखते हैं।



Monday, 20 July 2026

फीफा विश्व कप डायरी 27: फ़ाइनल

 



फाइनल मैच की पूर्व संध्या पर आयोजित एक विशेष प्रेस कार्यक्रम में स्पेन और अर्जेंटीना के कोच और कप्तानों के अलावा खेल शख्सियतें भी मंच पर थीं। उनमें से एनएफएल के दिग्गज टॉम ब्रैडी और एनबीए के दिग्गज खिलाड़ी केविन ड्यूरेंट के अलावा महानतम टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच भी थे। वे मेस्सी से सवाल पूछ रहे थे, ' इतने बड़े फाइनल से पहले के प्रेशर को वे कैसे संभालते हैं।'

दरअसल ये समस्या मंच साझा कर रहे अपने अपने खेल के दो महानतम खिलाड़ियों की साझा समस्या थी। वे दोनों हो गोट को दर्जा पा चुके हैं और अमरत्व को पा लेने की चाह में डूबे हैं। वे दोनों 39 बसंत पार 40वें साल में हैं। पर हार नहीं मान रहे हैं। वे खेल नहीं छोड़ रहे हैं और खेल उन्हें। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे   शानदार खेल दिखा रहे हैं।

अगर मेस्सी लगातार दो विश्व कप जीतकर अमर हो जाना चाहते थे, तो नोवाक अपना 25 वा ग्रैंड स्लैम जीतकर। नोवाक ने जनवरी 23 में अपना 24 वां ग्रैंड स्लैम जीता था। उसके बाद से वे ग्रैंड स्लैम के दो फाइनल और छह सेमीफाइनल हार चुके हैं। वे खिताब के करीब आते हैं और चूक जाते हैं। उधर मेस्सी भी अपने दूसरे खिताब से एक कदम की दूरी से चूक जाते हैं। दोनों खेलों के इतिहास में अमर होते-होते रह जाते हैं। ये विधि का विधान जो ठहरा। अमरत्व देवताओं का विशेषाधिकार है। माणुस की देवता बनने की चाह कहाँ पूरी होती है। मेस्सी और नोवाक अपनी समस्त मानवीय कमजोरियों के साथ सामान्य माणुस ही ठहरे। 

रविवार की शाम को अमेरिका के न्यूजर्सी में खेले गए फीफा विश्व कप फुटबॉल के फाइनल को जीतकर अर्जेंटीना की टीम मेस्सी की विश्व कप से विदाई को अविस्मरणीय बना देना चाहती थी। पर ऐसा हो ना सका। ये एक बेहद कठिन मुकाबला था। मैच 120 मिनट तक गया और एक गोल हुआ। तीसरा स्थान निर्धारित करने वाला फ्रांस और इंग्लैंड का मैच मनोरंजन से भरपूर था, जिसमें 10 गोल हुए। ये फुटबॉल का टी ट्वेंटी मैच था। जबकि फाइनल तनाव से भरा लेकिन कुछ हद तक नीरस मैच था। फुटबॉल का टेस्ट मैच।

ये फाइनल मैच दो महाद्वीप की फुटबॉल और उसकी श्रेष्ठता का द्वंद्व  भर नहीं था,बल्कि रक्षण और आक्रमण के बीच का द्वंद्व भी था। एक तरफ कोपा कप विजेता अर्जेंटीना का आक्रमण था जिसने फाइनल से पूर्व 19 गोल किए थे,तो दूसरी तरफ यूरो चैंपियन का रक्षण था जिसने अब तक केवल एक गोल खाया था। एक तरफ संयमित और अनुशासित टीम वर्क था, तो दूसरी तरफ कुछ उच्छृंखल और वैयक्तिक प्रतिभा और पराक्रम का उपक्रम था। ये एक बीती जाती पीढ़ी और नवागत पीढ़ी के बीच का द्वंद्व था। ये विदाई लेते मेस्सी और उदित होते नए सितारे यमल के बीच मुकाबला था। ये बार्सिलोना बनाम बार्सिलोना था।

स्पेन की टीम निर्विवाद रूप से तकनीकी रूप से श्रेष्ठ थी। ये उन्होंने पिछले सात मैचों में दिखाया था। अर्जेंटीना उनसे पार पा सकने में असमर्थ थी।@@ ये अर्जेंटीना की टीम जानती थी। उन्होंने पराग्वे वाली शैली को अपनाया। फ्रांस शानदार खेलकर और पूरे मैच पर अपना नियंत्रण रखते हुए भी बमुश्किल 1-0 से जीत पाई थी। पैराग्वे ने फिजिकल होना चुना, रफ टफ खेलना चुना। अर्जेंटीना के सामने और कोई रास्ता नहीं था। फाइनल पहुंचकर कोई हारना नहीं चाहता। उन्होंने भी पैराग्वे का रास्ता चुना। पूरे मैच पर स्पेन ने खेल पर पूरा नियंत्रण रखा। बस वे गोल करने में असमर्थ रहे। इसका कारण अर्जेंटीना की आक्रामक व फिजिकल टैक्लिंग के अलावा गोलकीपर मार्टिनेज भी रहे। मार्टिनेज़ ने इस मैच में कुल 11 सेव किए। जबकि गोल्डन ग्लव्स के विजेता स्पेन के गोलकीपर उनाई सिमोन ने पूरे टूर्नामेंट में 10 सेव किए। ये मैच उन्होंने अपने लिए अविस्मरणीय बना दिया। वे अर्जेंटीना के एकमात्र खिलाड़ी थे, जिन्होंने अंतिम समय तक संघर्ष किया।

स्पेन के दबदबे को इस बात से समझ जा सकता है कि स्पेन के गोल पर 20 अटेम्प्ट के मुकाबले अर्जेंटीना के कुल जमा दो अटेम्प्ट थे। उसकी स्थिति इतनी दयनीय हो गई थी कि वे रेगुलर समय में तो गोल पर एक अटेम्प्ट भी नहीं ले पाए।

 स्पेन ने फाइनल जीता। फीफा ट्रॉफी जीती। खेल जीता। श्रेष्ठता की लड़ाई जीती। उसने अपने सुंदर खेल से लोगों का दिल भी जीता। दरअसल स्पेन की ये जीत टीम की जीत है। टीम में ना कोई मेस्सी था,ना एम्बाप्पे था,ना अर्लिंग हॉलैंड था,ना केन था। ये एक टीम थी और उसके 11 सदस्य थे। जीत में सबका बराबरी का योगदान था। यमल का भी। जितना योगदान बेहतरीन गोलकीपर का था, उतना फुल बैक का,उतना ही मिडफील्ड का और उसी अनुपात में फॉरवर्ड का। यहां टीम पहले और खिलाड़ी की इमेज बाद में थी। स्पेन के लिए सबसे ज्यादा गोल करने वाले ओयरजाबल को 60 मिनट बाद ही रिप्लेस कर दिया गया।

 ये अनुशासन की जीत थी,धैर्य की जीत थी, आपसी तालमेल और समन्वय की जीत थी,एकता की जीत थी। ये एक टीम की जीत थी। ये फुटबॉल की जीत थी।

जिस तरह के दृश्य  मैच की समाप्ति के बाद आंखों के सामने आए,वे शर्मनाक थे। खेल हमें हार में भी विनत होना सिखाता है। शालीन होना सिखाता है। ग्रेसफुल होना सिखाता है। हार को भी गरिमामय तरीके से स्वीकार करने का साहस होना चाहिए। यहां खेल शर्मसार हुआ। 

 एक ऐसा फाइनल जिसे अर्जेंटीना से कहीं ज्यादा उसके समर्थक भूलना चाहेंगे। हार के कारण नहीं। खेल भावना से च्युत होने के कारण भी। 

और हां मेस्सी के आंसुओं के कारण भी।



फीफा विश्व कप डायरी 27: मेस्सी की विश्व कप से विदाई

 


दो आंखों से निकले पानी ने संसार भर में फैले करोड़ों प्रशंसकों को दुख और अवसाद के गहरे समंदर में डूबने के लिए छोड़ दिया।

दो आंखों से पानी निकला और असंख्य हृदय नम हो आए।

दो आंखों से बार बार पानी बहा। असंख्य मन पीड़ा से भर उठे।

ये विदाई की गहरी वेदना के आंसू थे। वो एक लक्षित उद्देश्य के सपने के बार बार टूटने से बच जाने का सुख और अंततः उस स्वप्न के टूट जाने की वेदना थी और उसका पानी था 

पहली बार वे दो आँखें नम हुई तो वो एक पश्चाताप की अग्नि और अंत में एक स्वप्न को बचा पाने की खुशी का गीलापन था। इसमें दुख का नमक और सुख की मिठास का मिश्रण था।

दूसरी बार गीली हुईं तो ये हारी बाजी जीत लेने की ऊष्मा की आर्द्रता थी जिसमें अपने सबसे बड़े विपक्षी पर विजय और एक जिए जा रहे  स्वप्न को लगभग पा लेने के सुख की शहद सी मिठास थी।

और अंततः एक जिए जा रहे स्वप्न के तिड़क कर टूट जाने  की आह का खारा पानी था जिसमें ग़म छिपाए ना छुपता था। डुबाए ना डूबता था। 

जब समय को,नियति को उसके साथ होना था,उसका साथ छोड़ दिया।

एक चाह अनचाही खत्म हुई।

एक युग खत्म हुआ।

दो आँखें की विदाई हुई। निराशा के खारेपन के साथ। विश्व कप से हमेशा हमेशा के लिए।



Thursday, 16 July 2026

फीफा विश्व कप डायरी 26 : सेमीफ़ाइनल दो

 



अक्सर खेल केवल खेल के मैदान में ही नहीं खेले जाते बल्कि एक समानांतर खेल खिलाड़ियों के सीने में भी चल रहा होता है। कई बार फुटबॉल जितनी पैरों से खेली जाती उतनी ही मनोभावों और उद्वेगों से भी खेली जाती है। ऐसे मैचों में खिलाड़ियों की स्किल के ऊपर उसका आवेग हावी हो जाता है। इंटेंसिटी हद से ज्यादा बढ़ जाती है। और खेल है कि फिजिकल होने लगता है। और अगर मैदान में इंग्लैंड और अर्जेंटीना जैसे प्रतिद्वंदी आमने सामने हों तो फिर क्या ही बात है। इस बात की ताईद कल अटलांटा में खेला गया फीफा विश्व कप का दूसरा सेमीफ़ाइनल करता है।

जैसे जैसे अर्जेंटीना और इंग्लैंड की टीमें आगे बढ़ रही थीं,दोनों टीमों के मुकाबले की संभावनाएं बढ़ती जा रही थीं। और भावनाओं की तीव्रता भी। अर्जेंटीना के समर्थक जहाँ भी जाते वे अपना नया विश्व कप एंथम 'ला कुआर्ता एस्ट्रेला' द फोर्थ स्टार गाते कि "मैं जन्म से मृत्यु तक अर्जेंटीना का हूँ। माल्वीनास के लिए, डिएगो के लिए, लियो की आखिरी ट्रॉफी के लिए, अर्जेंटीना, मैं तुम्हें दो बार का चैंपियन देखना चाहता हूँ।" इस गाने में माराडोना और मेस्सी के साथ साथ माल्वीनास यानी फ़ॉकलैंड द्वीप समूह का भी जिक्र है। माल्वीनास की ग्रंथि अर्जेंटीना के सामान्य समर्थकों के मन में ही नहीं बल्कि खिलाड़ियों में भीतर भी किसी कोने में बैठी थी। मिस्र पर जीत के बाद अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने अपने ड्रेसिंग रूम में ये गाना गया। और उसके बाद ये मैच शुरू होने से पहले अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने अपने राष्ट्र गान को जिस जोश ओ जूनून और हाव भाव से गाया,उससे ये लग गया था कि टीम के लिए ये मैच सेमीफ़ाइनल से कुछ ज्यादा है।

स्कोलिनी ने अपने पुराने 4-4-2 के फॉर्मेशन से टीम उतारी। लेकिन टीम में एक बदलाव किया। मैदान के भीतर मेस्सी के बॉडी गार्ड कहे जाने वाले मिडफील्डर रोड्रिगो डी पॉल की जगह गुलियानी सिमोने को खिलाया। दूसरी और इग्लैंड ने अपनी टीम में तीन बदलाव किए। फुल बैक रीस जेम्स और जेड स्पेंस तथा विंगर मॉर्गन रोजर्स को टीम में शामिल किया।

कोच थॉमस ट्यूशेल ने 4-2-3-1 फॉर्मेशन के साथ शुरुआत की। इंग्लैंड की रणनीति मिडफील्ड को कंट्रोल करने और मेस्सी को रोकने की थी।

पहले हॉफ के खेल की इंटेंसिटी बताती है कि भावनाओं ने प्राथमिकता ग्रहण कर ली थी। इस हॉफ में एक भी गोल नहीं हुआ। केवल तीन शॉट लिए गए। दो इंग्लैंड ने। एक अर्जेंटीना ने। कोई भी शॉट दोनों टीमों का टारगेट पर नहीं लगा। और 19 फाउल हुए। ये हॉफ भावनाओं के अतिरेक में खेला गया हॉफ था। खेल फिजिकल हुआ और दोनों में से कोई भी टीम लय नहीं पा सकी। कुछ हद तक ये हॉफ नीरस रहा। 

लेकिन पहले हॉफ के बाद मध्यांतर में खिलाड़ियों के दिमाग से भावनाओं का ज्वार उतरा,तो उन्हें फुटबॉल की याद आई। याद आई तो फुटबॉल का खेल आया और आई उसकी लय, उसकी गति, उसकी ताल और बाकी सब कुछ भी आया। खेल रोमांचक और संघर्षपूर्ण हो आया। 

डेडलॉक इंग्लैंड ने 55 वें मिनट में तोड़ा जब मॉर्गन रोजर्स ने दाहिनी ओर से शानदार क्रॉस डाला जिसे  एंथनी गॉर्डन ने पकड़ा और कुटी रोमेरो को चकमा देते हुए सटीक गोल दाग दिया। यहां पर खेल इंग्लैंड के नियंत्रण में था। और अर्जेंटीना बैकफुट पर थी।

बस यहीं पर इंग्लिश कोच थॉमस ट्यूशेल और टीम चूक गई। यहां से टीम एकदम रक्षात्मक हो गई। वे एक और गोल के लिए गए ही नहीं। उस समय तक 35 मिनट और इंजरी टाइम का खेल बाकी था। इतने लंबे समय तक एक गोल की लीड को बचाना किसी भी रक्षा पंक्ति के लिए बहुत दुष्कर कार्य होता है। वो भी अर्जेंटीना जैसी टीम और मेस्सी के खिलाफ।

72वें मिनट में थॉमस ट्यूशेल ने गोल करने वाले एंथोनी गॉर्डन की जगह डिफेंडर एजरी कोंसा को मैदान में उतारकर लो ब्लॉक बनाकर अर्जेंटीना को रोकने का प्रयास किया। उसके दस मिनट बाद थॉमस ट्यूशेल एक और रक्षात्मक बदलाव किया और मिडफील्डर डेक्लान राइस की जगह डिफेंडर निको ओ'रेली को मैदान में उतारा। साथ ही रीस जेम्स की जगह डैन बर्न को भी।


इसके विपरीत स्कोलिनी ने आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने पहले निकोलस गोंजालेज को और फिर 81वें मिनट में लेफ्ट-बैक निकोलस टैग्लियाफिको की जगह स्ट्राइकर लोटारो मार्टिनेज को मैदान में उतारा। इससे खेल पर पूरी तरह से नियंत्रण अर्जेंटीना का हो गया। गॉर्डन के 55वें मिनट में किए गए पहले गोल और लोटारो मार्टिनेज के 90+2वें मिनट में किए गए विजयी गोल के बीच, इंग्लैंड के पास केवल 12 प्रतिशत गेंद का कब्ज़ा रहा क्योंकि अर्जेंटीना ने इस बीच हमलों की झड़ी लगा दी। इसका परिणाम अर्जेंटीना को 85वें मिनट में मिला जब  मेस्सी के पास पर बॉक्स से बाहर से एंज़ो फर्नांडीज ने शानदार लांग रेंज शॉट लगाकर मैच बराबरी पर ला दिया। सात मिनट बाद ही इंजरी टाइम के दूसरे मिनट में मेस्सी ने  दाहिनी ओर से जेड स्पेंस को पछाड़ते हुए एक जादुई क्रॉस दिया जिस पर लोटारो मार्टिनेज ने हेडर से गोल कर दिया और टीम को फाइनल में पहुंचा दिया। ये शायद मेस्सी के खेल जीवन के सबसे सुंदर और जादुई क्रॉस में से एक होगा। ये अर्जेंटीना का नॉक आउट दौर का सबसे अच्छा और कन्विंसिंग खेल था जिसमें वो सही मायने में चैंपियन की तरह खेल रही थी।


ये अर्जेंटीना का लगातार चौथा नॉक आउट मैच था जिसमें बिल्कुल अंत समय में जादू सा खेल दिखाकर विपक्षी टीम को ना केवल हतप्रभ किया बल्कि पूरी तरह पछाड़ दिया। वे किसी सोए शेर की तरह उठते और कुछ ही समय में विपक्ष के पूरे खेल को तहस नहस कर देते। राउंड ऑफ 32 में कोबे वर्डे के खिलाफ 110वें मिनट तक 2-2 की बराबरी पर थे। राउंड ऑफ 16 में 78 वें मिनट मिस्र से 0-2 से पीछे थे। क्वार्टर फाइनल में स्विट्ज़रलैंड से 111 वें मिनट तक 1-1 की बराबरी पर थे और सेमीफाइनल में इंग्लैंड से 85 वें मिनट तक 0-1 से पीछे थे। अंतिम परिणाम हम सब जानते हैं।

अर्जेंटीना की टीम ने बताया आखिरी समय तक हार नहीं माननी चाहिए और प्रयास करते रहना चाहिए। सफलता मिलती ही है। कोई हार जब तक अंतिम नहीं होती जब तक समाप्ति की व्हिस्ल ना बज जाए।

नॉकआउट मैचों में अर्जेंटीना की टीम एक रूपक गढ़ती है, उस बुझते दिए का जो बुझने से पहले जोरदार तरीके से फड़कता है। मैदान (दिए) में जब समय( तेल) खत्म होने को ही होता है तो अर्जेंटीना की टीम (बाती) अचानक से अपनी सारी ऊर्जा और काबिलियत से फड़फड़ा उठती है और विपक्ष को ध्वस्त करके उत्पन्न प्रकाश रूपी आनंद से अपने प्रशंसकों के दिलों को दीप्त कर देती है। और फिर अगले मैदान की खोज में चल देते हैं।

और अर्जेंटीना के समर्थक खुशी से झूमकर कह उठते हैं -वामोस मेस्सी। वामोस अर्जेंतीना।

Wednesday, 15 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी 25 : सेमीफाइनल एक


 


फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल की बात करने से पहले समय को थोड़ा पीछे लिए चलते हैं और स्मृति बन चुके दो मैचों को एक बार फिर याद कर लेते हैं।

एक, बात 5 जून 2025 के यूएफा नेशंस लीग की है। इस का दूसरा सेमीफाइनल फ्रांस और स्पेन के बीच खेला गया था। इस बहुत ही रोमांचक और संघर्षपूर्ण मुकाबले में कुल नौ गोल हुए। ये मैच स्पेन ने 5-4 से जीता।

दो,समय को थोड़ा और पीछे लिए चलते हैं। तारीख आती है 9 जुलाई 2024। स्थान एलियांज स्टेडियम म्यूनिख। एक और सेमीफाइनल। इस बार यूएफा यूरो 2024 प्रतियोगिता का। प्रतिद्वंदी वही स्पेन और फ्रांस। नतीजा भी वही। एक बहुत ही संघर्षपूर्ण व रोचक मुकाबले में स्पेन ने फ्रांस को 2-1 से हरा दिया।

इतिहास अपने को दोहराता है। एक बार नहीं बार बार।

इस बार स्थान अमेरिका का डलास। एक बार फिर सेमीफाइनल। इस बार फीफा विश्व कप 2026 का। प्रतिद्वंदी वही फ्रांस और स्पेन। नतीजा भी वही। स्पेन ने फ्रांस को 2-0 से हरा दिया।

इतिहास की घटनाओं से कुछ निष्कर्ष निकाले जाते हैं। कुछ सबक सीखे जाते हैं। कुछ प्रेरणाएं ले जाती हैं। लोगों ने और विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि ये इस विश्व कप का सबसे शानदार मैच होने जा रहा है। एक ऐसा मैच जो आगे के समय में उद्धृत किया जाता रहेगा। एक फाइनल जो फाइनल से पहले होने जा रहा है। एक ऐसा मैच जिसका हाइप क्रिएट हो गया था। लेकिन निष्कर्ष गलत भी साबित होते हैं। इस बार वहीं हुआ।

ये स्पेन की एकतरफा जीत थी। कई बार आंकड़े घटनाओं की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर पाते। इस मैच की स्कोरलाइन भी नहीं कर रही है। स्पेन ने फ्रांस को कहीं टिकने नहीं दिया। याद कीजिए 8 जुलाई 2014 को बेलो होराइजेंटो के मिनईराको स्टेडियम में फीफा विश्व कप के पहले सेमीफाइनल को। जर्मनी ने मेजबान ब्राजील को 7-1 से हराकर जिस तरह ह्यूमिलेट किया था, ये उससे कम ना था।

नहीं पता स्पेन ने फ्रांस पर पहली दो जीत से सबक सीखे थे या नहीं। या फिर उससे कुछ सीखने की जरूरत थी भी या नहीं, क्योंकि वे विजेता थे। और विजेता की दृष्टि धुंधली हो जाती है। लेकिन वे उन जीतों से एक चीज अवश्य लेकर आए थे। वो था उनका आत्मविश्वास।

मैच से पहले स्पेन के स्टार खिलाड़ी लामिन यामाल से फ्रांस से होने वाले मुकाबले के बारे में पूछा गया। ये सवाल बनता था। फ्रांस की टीम लगातार तीसरे विश्व कप के सेमीफाइनल में थी और लगातार तीसरे फाइनल तथा एक और विश्व कप जीतने का सपना देख रही थी। ऐसा सपना देखना गैर वाजिब नहीं था। उन्होंने 2018 का विश्व कप जीता था। 2022 के विश्वकप फाइनल में पेनाल्टीशूट आउट में अर्जेंटीना से हारे थे। यानी तीन विश्व कप में वे रेगुलर समय में अजेय थे। और यहां अमेरिका में वे तो विपक्षी दल में भय उत्पन्न कर देने की हद तक शानदार खेल दिखा रहे थे। वे सभी मैच बहुत आसानी से और बहुत ही कन्विंसिंग अंतर के साथ जीतकर यहां तक पहुंचे थे।

लेकिन स्पेन की टीम और उसके खिलाड़ी इस सब से निश्चिंत थे। लामिन यामाल ने पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा था कि 'हम फ्रांस से नहीं डरते। हमने निकट अतीत में उन्हें कई बार हराया है।'  ये यामाल का दंभ या अहंकार नहीं था। ये जमीनी हकीकत थी। वे निकट अतीत में फ्रांस को दो बार हरा चुके थे। ये निकट अतीत की जीत से अपने साथ यहां विश्व कप में लाया गया आत्मविश्वास बोल रहा था। अपनी योग्यता, अपनी काबिलियत पर उन्हें भरोसा था। इसी भरोसे वे इस सेमीफाइनल में फ्रांस के मुकाबिल थे। निडर। निशंक। दृढ़ प्रतिज्ञ। स्थितप्रज्ञ।

दरअसल फ्रांस और स्पेन के बीच का ये सेमीफाइनल दो टीमों के फाइनल में पहुंचने और अपने विश्व कप को जीत लेने के सपने को वास्तविकता के और करीब ले आने का रास्ता भर नहीं था,बल्कि यूरोपियन फुटबॉल में श्रेष्ठता स्थापित करने की लड़ाई भी थी। ये अपराजित रक्षण और अजेय आक्रमण के बीच का द्वंद्व था। ये वैयक्तिक हीरोइज़्म और सामूहिक सामंजस्य के मध्य की होड़ थी। ये दो टीमों के खिलाड़ियों के बीच का द्वंद्व भर नहीं था,बल्कि दो दिग्गज प्रशिक्षकों के बीच का,उनके विचारों का, उनकी रणनीतियों का, उनकी काबिलियत की परीक्षा भी थी। ये दिदियेर डेसचैम्प्स और लुइस दे ला फुएंते के बीच संघर्ष था। ये लेस ब्लेस और ला रोजा के बीच मुकाबला था। यहां लाल रंग नीले रंग से मुकाबिल था।

फ्रांस ने 4-2-1-3 के और स्पेन 4-1-2-3 के फॉर्मेशन से खेल शुरू किया। दोनों टीमों के इरादे साफ थे। दोनों अटैकिंग खेलना चाहते थे। लेकिन अलग अलग संभावनाओं के साथ। 

इस पूरे विश्व कप में फ्रांस ने शानदार अटैकिंग खेल दिखाया था। उनके पास अनस्टॉपेबल फॉरवर्ड की चौकड़ी थी - एम्बाप्पे, डेम्बेले, ओलिसे और बारकोला। उन्होंने अर्जेंटीना के बाद सबसे ज्यादा 16 गोल बनाये थे। उनको अपनी आक्रमण पंक्ति पर पूरा भरोसा था। उस आक्रमण पंक्ति पर जिसे रोक पाना किसी भी डिफेंस के लिए अब तक तो नामुमकिन रहा था। लेकिन जितनी चर्चा उनके अटैक की थी, उतनी ही डिफेंस की थी। डिफेंस उनका कमजोर माना जा रहा था। उनकी सोच रही होगी कि भले ही एकाध गोल हो जाएं पर अटैक इतना पावरफुल है कि विपक्षी पर ज्याद गोल मार देंगे। वे अपनी स्ट्रेंथ पर खेल रहे थे।

दूसरी तरफ स्पेन की सोच उलट थी। इस प्रतियोगिता में उनका डिफेंस लगभग अजेय रहा है। चट्टान की तरह। जिसे भेद पाना विपक्ष के लिए लगभग नामुमकिन था। उन्होंने केवल एक गोल खाया था। पूरी प्रतियोगिता की दौरान उनके डिफेंस की चर्चा रही थी।जबकि आक्रमण उनका शांत सा रहा था। लामिन यामाल ने केवल एक गोल किया था। केवल मिकेल ओयारज़ाबल ने चार गोल किए थे। और कोई भी खिलाड़ी गोल्डन बूट की दौड़ में शामिल नहीं था। वे अटैकिंग इसलिए ही खेल रहे थे कि शुरुआत में ही एक बार बढ़त बना लें, तो फिर वे अपना किला विपक्षी को नहीं ही भेदने देंगे। वे अपनी कमजोरी पर खेल रहे थे। उसे एड्रेस कर रहे थे। अजेय आक्रमण के सामने  अभेद्य रक्षण खड़ा था।

स्पेन की टीम मैदान में उतरते ही बॉल पर ऐसे कब्जा जमाती है मानो बॉल केवल उसकी मिल्कियत हो। वो ज़्यादा से ज्यादा बॉल पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती है। इसके लिए उसकी छोटे-छोटे पासों वाली 'टिकी-टाका' खेल शैली सबसे मुफीद बैठती है। इस मैच  में भी ऐसा ही हुआ। स्पेन ने शुरू से ही गेंद पर अपना दबदबा बनाए रखा। डेडलॉक को तोड़ने में स्पेन को केवल 22 मिनट लगे, जब फ्रांस के पेनल्टी क्षेत्र में लुकास डिग्ने ने लामिन यामाल पर फाउल किया और ओयारजाबल ने पेनल्टी से गोल बनाया।

ये लुकास डिग्ने की इतने करीबी मैच की ऐसी लापरवाही भरी भूल थी, जो अक्षम्य है। डिग्ने का यामाल से कोई क्लोज कॉन्टैक्ट नहीं था। उन्होंने या तो यामाल को नोटिस नहीं किया या फिर उन्हें लगा कि वे पहले ही गेंद क्लियर कर देंगे। ये एक गलती मैच का टर्निंग प्वाइंट था। इस गोल के आते ही स्पेन दोगुनी उत्साहित हुई और आत्मविश्वास आसमान पर था। उसके बाद दूसरे हॉफ के शुरू में 58वें मिनट में ओल्मा के पास पर पोरो ने गोलकर मैच के निर्णय पर अंतिम मुहर लगा दी। ये गोल स्पेन के लंबे मूव का परिणाम था और उसकी 'टिकी-टाका' शैली का सबसे शानदार निर्देशन भी।

स्पेन का पूरे मैच पर दबदबा रहा। उन्होंने गेंद पर पूरा नियंत्रण रखा और खेल की गति को अपने अनुसार नियंत्रित किया। स्पेन के दबदबे को इस बात से समझा जा सकता है कि फ्रांस के केवल दो शॉट लक्ष्य पर लगे। उन्होंने फ्रांस की मजबूत अग्रिम पंक्ति को हमला करने का कोई मौका ही नहीं दिया। अब तक की फ्रांस की जीतों में माइकल ओलिसे की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। वे शानदार प्लेमेकर थे। लेकिन इस मैच में कुकुरेला ने उन्हें पूरी तरह से मार्क करके रखा। उन्होंने बार-बार गेंद का पजेशन खोया और एक भी ड्रिबल पूरा नहीं कर पाए। औस्मान डेम्बेले को गेंद लेने के लिए बार बार पीछे आना पड़ रहा था। और एम्बाप्पे को गेंद मिल ही नहीं पा रही थी। 

इस मैच पर रॉयटर्स की रोचक टिप्पणी थी कि 'स्पेन ने फ्रांस को अनाकोंडा की तरह जकड़ लिया था।'  एक और रोचक कमेन्ट एक्स पर डॉ रमाकांत राय का है। उन्होंने लिखा 'स्पेन ने अपने गोलपोस्ट पर काला जादू कर रखा है।' हां निसंदेह ये जादू ही है। काला जादू। इसमें क्या शक हो सकता है कि स्पेन पर अब तक केवल एक गोल हुआ है। हां ये जरूर है कि ये जादू किसी तंत्र मंत्र से सिद्ध नहीं है,बल्कि उनकी उस अभेद्य रक्षापंक्ति से सिद्ध हुआ है जिसमें कहीं कोई दरार नहीं है। जो चट्टान की माफिक है। वो जादू जो कप्तान रोड्री,फेबियन रूइज, ओल्मो  के मिडफील्ड तथा कुकुरेला, कुबारसी, लेपोर्टे और पोरो के बैक लाइन से बना है।

ये स्पेन की एक शानदार जीत है जो वैयक्तिक प्रतिभा के ऊपर टीम की सामूहिकता,उनके खिलाड़ियों के बीच बेहतरीन सामंजस्य और तालमेल की जीत है। ये स्पेन की फ्रांस पर बड़ी प्रतियोगिताओं के लगातार तीसरे सेमीफाइनल में जीत थी।

हार के बाद एम्बाप्पे कह रहे थे "हमने वो प्रदर्शन नहीं किया जो हम चाहते थे, न तो सामरिक दृष्टि से, न तकनीकी दृष्टि से और न ही समग्र स्तर पर। जब आप विश्व कप के सेमीफाइनल में वो करने में विफल रहते हैं जो आपको करना चाहिए, तो आप जीत नहीं सकते। स्पेन अपनी योजना और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहा। हमारी प्रेसिंग में संवाद की कमी थी... यहां तक ​​कि जब हमने गेंद पर दोबारा कब्जा जमाया, तब भी हमारे पहले पास और पहले टच विश्व कप सेमीफाइनल के लायक नहीं थे।"

अब फाइनल में उनका मुकाबला इंग्लैंड और अर्जेंटीना के बीच के होने वाले विजेता से होगा। फाइनल मैच की प्रकृति क्या होगी ये इस बात पर निर्भर करेगा कि दूसरे सेमीफाइनल में कौन जीतता है। इंग्लैंड जीतता है तो ये यूरो 24 का रेप्लिका होगा और यूरोप में फुटबॉल की श्रेष्ठता के लिए संघर्ष  बन जाएगा। और अगर अर्जेंटीना जीतती है तो ये दो महाद्वीपों यूरोप और दक्षिण अमेरिका के बीच फुटबॉल की पारंपरिक प्रतिद्वंदिता, दो फुटबॉल परंपराओं का द्वंद्व होगा। 

तो कल का इंतजार करिए।



Monday, 13 July 2026

फीफा विश्व कप 2026 डायरी_24: क्वार्टर फाइनल मैच

 



फीफा विश्व कप के तीन रोमांचक दिन और बीते। चार संघर्षपूर्ण मुकाबले संपन्न हुए। और वो सब इतिहास का हिस्सा बना जो रात रात भर जाग कर फुटबॉल देखने के लिए चाहिए होता है। शानदार गोल। बेहतरीन बचाव। रणनीतिक चातुर्य। खिलाड़ियों का अद्भुत कौशल। कमाल की टैक्लिंग। और मोहक ड्रिबलिंग। करीबी और कड़े मुकाबले। और विवादों का चोली दामन का साथ। जीत और हार,खुशी और गम,उम्मीद और निराशा के बीच से होते हुए अंततः विश्व कप अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचा। मैचों का शतक पूरा हुआ। और बची विश्व की श्रेष्ठ चार टीमें। ताज के लिए अंतिम चार मुकाबले। फुटबॉल का खेल। उसका रोमांच। और फुटबॉल की अतरंगी दुनिया। 

एक 

1992 में फीफा रैंकिंग की शुरुआत के बाद ये पहला अवसर है जबकि श्रेष्ठ चार टीमें सेमीफाइनल में पहुंची हैं। फ्रांस,अर्जेंटीना,स्पेन और इंग्लैंड। अब मुकाबला होगा नंबर 1और 3 के बीच और नंबर 2 और 4 के बीच। देखना ये है कि क्या इस में अब कोई क्रम व्यतिक्रम होता है या नहीं। आखिर इन चारों टीमों का अंतिम चार में पहुंचना क्या प्रदर्शित करता है। यही कि फीफा रैंकिंग काफी हद तक विश्वसनीय है या फिर ये कि टीमों ने अपनी रैंकिंग और प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रदर्शन किया है। शायद दोनों ही।

दो

पहले दो क्वार्टर फाइनल मैच दो अलग अलग दिन खेले गए। दोनों मैच रेगुलर टाइम में समाप्त हुए। फ्रांस ने मोरक्को को 2-0 से और स्पेन ने बेल्जियम को 2-1 से हराया। बाकी दो मैच एक ही दिन में संपन्न हुए और दोनों ही मैचों में निर्णय के लिए अतिरिक्त समय की तो आवश्यकता आन पड़ी,लेकिन पेनाल्टी शूट आउट तक नहीं जाना पड़ा। अर्जेंटीना ने स्विट्जरलैंड को 3-1 से और इंग्लैंड ने नॉर्वे को 2-1 से हराया। 

तीन

पहला क्वार्टर फाइनल बोस्टन में फ्रांस और मोरक्को के बीच हुआ। उसने 2-0 से आसान जीत हासिल की। अभी तक फ्रांस के सामने कोई भी बड़ी परेशानी सामने नहीं आई है। उसने सभी मैच अपेक्षाकृत आसानी से जीते हैं। ये इस विश्व कप की सबसे शक्तिशाली और शानदार टीम है,इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है। इसीलिए उसे जीत का सबसे प्रबल और बड़ा दावेदार माना जा रहा है। उसके पास शानदार अटैकर है। भरोसेमंद मिडफील्डर हैं। और मजबूत रक्षापंक्ति है।


इस मैच में मोरक्को के सबसे भरोसेमंद फॉरवर्ड इस्माइल सैबारी चोट लगने के कारण नहीं खेल रहे थे। लेकिन इस मैच का सबसे आश्चर्यजनक पहलू ये था कि मोरक्को ने अपनी फर्स्ट इलेवन में एक भी रेगुलर फॉरवर्ड नहीं खिलाया। उनके रेगुलर फॉरवर्ड 60वें मिनट में पहला गोल खाने के बाद आए। ये गोल एम्बाप्पे ने पेनाल्टी से किया। दूसरा गोल छह मिनट बाद ही उस्मान डैंबेले ने किया।

 चार

लॉस एंजिलिस में खेले गए दूसरे मैच में स्पेन ने अंतिम क्षणों में विजयी गोल दागकर बेल्जियम को हरा दिया। स्पेन ने 30वें मिनट में पहला गोल किया। लामिन यामल और पेड्रो पोरो ने दाहिनी ओर से शानदार तालमेल बिठाते हुए डैनी ओल्मो के लिए गोल का मौका बनाया। हालांकि कर्टोइस ने ओल्मो के पहले शॉट को रोक दिया, लेकिन फैबियान रुइज़ ने रिबाउंड पर सटीक शॉट लगाकर गोल कर दिया।


 इस मैच से पहले स्पेन ने लगातार पांच मैचों में एक भी गोल नहीं खाया था। यानी गोलकीपर उनाई सिमोन ने विश्व कप में रिकॉर्ड बनाते हुए 650 मिनट तक कोई गोल नहीं खाया। ये सिलसिला मैच के 41वें मिनट में तब टूटा जब बेल्जियम के चार्ल्स डी केटेलेरे ने क्यूबार्सी को पछाड़ते हुए टिमोथी कास्टाग्ने के सटीक क्रॉस पर हेडर से गोल किया। 

मैच का निर्णायक क्षण मेरिनो के मैदान में उतरने के दो मिनट बाद आया। 88वें मिनट में, पाउ कुबार्सी ने एक जोरदार लॉन्ग-रेंज शॉट लगाया। बेल्जियम के सब्स्टीट्यूट गोलकीपर सेने लैमेंस रिबाउंड को रोक नहीं पाए, जिससे आर्सेनल के फॉरवर्ड मरिनो ने मैच के अपने दूसरे ही टच में गेंद को गोल में डाल दिया। इससे पहले मेरिनो ने राउंड ऑफ 16 में पुर्तगाल के खिलाफ भी 91वें मिनट में विजयी गोल किया था। 

बेल्जियम के लिए यह बेहद निराशाजनक अंत था। 71वें मिनट में उनके स्टार गोलकीपर थिबाउट कर्टोइस के चोटिल हो जाने के कारण उनकी जगह लैमेंस को मैदान में उतारा गया था।

पांच

मियामी में खेले गए तनावपूर्ण मैच में इंग्लैंड ने अतिरिक्त समय के बाद नॉर्वे को हराकर जीत हासिल की। जूड बेलिंघम ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन किया।

पहला गोल  36वें मिनट में एंड्रियास शेल्डरुप के गोल ने नॉर्वे को बढ़त दिला दी। शेल्डरुप ने एक क्रॉस को गलत तरीके से हिट किया जो जॉर्डन पिकफोर्ड के पोस्ट से टकराकर ऊपरी कोने में जा लगा। लेकिन सामान्य समय के हाफ-टाइम से ठीक पहले बेलिंगहैम ने एंथनी गॉर्डन के शानदार पास पर गोल दागकर इंग्लैंड ने बराबरी कर ली।  

90 मिनट के रेगुलर समय के बाद 1-1 से बराबर रहने के बाद, अतिरिक्त आधे घंटे के खेल में तीसरे मिनट में ओरजान नाइलैंड की गलती से मिले रिबाउंड पर बेलिंगहैम ने निर्णायक गोल किया।

ये मैच जितना इंग्लैंड के सेमीफाइनल में पहुंचने और विश्व कप अभियान जारी रह जाने के लिए याद किया जायेगा उससे कहीं ज्यादा नॉर्वे के दूसरे गोल को रद्द किए जाने और बॉल के तार को छू जाने के विवाद के लिए याद किया जाएगा।

नॉर्वे को टोरब्योर्न हेगेम के गोल से 2-1 की बढ़त मिल सकती थी, लेकिन कॉर्नर किक पर एर्लिंग हालैंड द्वारा इलियट एंडरसन को धक्का देने के कारण इसे रद्द कर दिया गया। वहीं, इस बात पर भी विवाद रहा कि क्या इंग्लैंड के पहले गोल पर पिच के ऊपर लगे तारों का कोई असर पड़ा था। नॉर्वे के कोच स्टाले सोलबक्केन का मानना ​​था कि नॉर्वे की गोल किक किसी तार से छू गई जिससे गेंद सीधे आसमान से गिरी,लेकिन फीफा के बॉल सेंसर ने कोई संपर्क नहीं दिखाया।

छह

केन्सास में खेले गए आखिरी क्वार्टर फाइनल मैच में पिछली चैंपियन अर्जेंटीना ने स्विट्जरलैंड को 3-1 से हराकर लगातार दूसरी बार सेमीफाइनल में जगह बनाई।

जूलियन अल्वारेज़ और लौतारो मार्टिनेज़ ने अतिरिक्त समय में गोल करके अर्जेंटीना के विजय अभियान को जारी रखा। मैच नियमित समय के अंत में 1-1 से समाप्त हुआ। पहला गोल दसवें मिनट में लियोनेल मेस्सी के क्रॉस पर एलेक्सिस मैक एलिस्टर ने किया। लेकिन 67 वें मिनट में डैन दोये ने बराबरी का गोल कर दिया।


दोये के गोल के तुरंत बाद ही वीएआर निर्णय के बाद ब्रेल एम्बोलो को फाउल का नाटक करने के लिए मैदान से बाहर भेज दिया गया। ब्रील एम्बोलो को 'डाइव' लगाने के लिए पीला कार्ड दिखाया गया ।क्योंकि इस मैच का ये उनका दूसर पीला कार्ड थे जो स्वतः ही रेड कार्ड में तब्दील हो गया। विश्व कप की शुरुआत से ठीक पहले संशोधित किए गए 'गलत पहचान नियम' के कारण रेफरी के पास पीला कार्ड दिखाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। टूर्नामेंट के दौरान ऐसा निर्णय पहली बार नहीं लिया गया था। इससे पहले, अमेरिका और पैराग्वे के बीच समूह चरण के एक मैच में, अमेरिकी डिफेंडर टिम रीम को दिया गया पीला कार्ड वीएआर द्वारा मिगुएल अल्मियन की डाइव की समीक्षा के बाद रद्द कर दिया गया था, जिसके बाद अल्मियन को चेतावनी दी गई थी।

तो फुटबॉल जारी है। उसका रोमांच सब पर तारी है। यानी गेम ऑन है और उसका रोमांच फुल ऑन। बस थोड़ी सी नींद में खलल डालिए और फुटबॉल के खेल का आनंद लीजिए।



नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...