दो आंखों से निकले पानी ने संसार भर में फैले करोड़ों प्रशंसकों को दुख और अवसाद के गहरे समंदर में डूबने के लिए छोड़ दिया।
दो आंखों से पानी निकला और असंख्य हृदय नम हो आए।
दो आंखों से बार बार पानी बहा। असंख्य मन पीड़ा से भर उठे।
ये विदाई की गहरी वेदना के आंसू थे। वो एक लक्षित उद्देश्य के सपने के बार बार टूटने से बच जाने का सुख और अंततः उस स्वप्न के टूट जाने की वेदना थी और उसका पानी था
पहली बार वे दो आँखें नम हुई तो वो एक पश्चाताप की अग्नि और अंत में एक स्वप्न को बचा पाने की खुशी का गीलापन था। इसमें दुख का नमक और सुख की मिठास का मिश्रण था।
दूसरी बार गीली हुईं तो ये हारी बाजी जीत लेने की ऊष्मा की आर्द्रता थी जिसमें अपने सबसे बड़े विपक्षी पर विजय और एक जिए जा रहे स्वप्न को लगभग पा लेने के सुख की शहद सी मिठास थी।
और अंततः एक जिए जा रहे स्वप्न के तिड़क कर टूट जाने की आह का खारा पानी था जिसमें ग़म छिपाए ना छुपता था। डुबाए ना डूबता था।
जब समय को,नियति को उसके साथ होना था,उसका साथ छोड़ दिया।
एक चाह अनचाही खत्म हुई।
एक युग खत्म हुआ।
दो आँखें की विदाई हुई। निराशा के खारेपन के साथ। विश्व कप से हमेशा हमेशा के लिए।

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