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Sunday, 4 December 2022

फुटबॉल_विश्व_कप डायरी_5


नॉक आउट की शुरुआत

००००       

       क़तर फुटबॉल विश्व कप 2022 के दूसरे यानी नॉक आउट चरण का पहला दिन। पहला दिन और दो मैच। एक, नीदरलैंड बनाम अमेरिका। दो, अर्जेंटीना बनाम ऑस्ट्रेलिया। यानी चार देशों के फुटबॉल प्रशंसकों के सपने और उनकी उम्मीदें ही दांव पर नहीं थी बल्कि चार अलग अलग महाद्वीपों की फुटबॉल और उनकी प्रतिष्ठा भी दांव पर।

            पहला मैच तीन बार की फाइनलिस्ट नीदरलैंड और 2002 के बाद पहली बार क्वार्टर फाइनल में प्रवेश के लिए प्रयासरत अमेरिका की टीमों के बीच था। इस मैच में एक और युवा शक्ति और जोश से लबरेज अमेरिका की टीम थी जो अपने ग्रुप में इंग्लैंड के बाद नंबर दो पर थी। उसने अपने ग्रुप में ईरान को 1-0 से हराया था और इंग्लैंड से 0-0 से और वेल्स से 1-1 से ड्रा खेला था। दूसरी और नीदरलैंड एक अनुभवी टीम थी जो पिछले  साल लुइस वान गाल के कोच बनने के बाद से 18 मैचों के अपराजित रिकॉर्ड के साथ मैदान में थी। 

          मैच में अनुभव जोश पर भारी पड़ा और अमेरिकी चपलता यूरोपीय शक्ति के सामने पस्त हो गई। नीदरलैंड ने अमेरिका को 3-1 से हरा दिया और विश्व कप के अंतिम आठ यानि क्वार्टर फाइनल में पहुंचने वाली पहली टीम बन गई।

           कहावत है मिले मौकों को लपक लेना चाहिए,उन्हें गंवाना हमेशा भारी पड़ता है और उसका खामियाजा उठाना पड़ता है। इस बात को आज अमेरिका की टीम और उसके खिलाड़ियों से बेहतर कौन समझ सकता है।

            अमेरिका ने 4-3-3 के फॉर्मेशन के साथ मैच में तेज शुरुआत की। जबकि हॉलैंड की टीम 3-4-1-2 के फार्मेशन से खेल रही थी। पहले 09 मिनट का खेल  हॉलैंड के हाफ में हुआ और तीसरे ही मिनट में अमेरिका को एक बहुत ही आसान मौका मिला मैच में बढ़त बनाने का। उसके शानदार फॉर्म में चल रहे फारवर्ड पुलिसिस को बॉक्स के अंदर केवल डच गोलकीपर को मात देनी थी। लेकिन वो शॉट सीधे गोली के हाथ में मार बैठे। इसके बाद भी कई अच्छे मूव अमेरिकी टीम ने बनाए लेकिन फिनिश नहीं कर पाए। 10वें मिनट में पहली बार हॉलैंड को मौका मिला। एक काउंटर अटैक किया और 20 पासों के बाद राइट विंग से देन्ज़ेल दम्फ्रीज़ ने एक शानदार क्रॉस दिया और एक ही टच में दीपे के बॉक्स के बाहर से शानदार शॉट से गेंद जाल में समा गई। मोमेंटम पाला बदलकर हॉलैंड के पक्ष में आ चुका था। अमेरिका ने मिले मौके को गंवाकर मोमेंटम खो दिया था।

       अब हॉलैंड सुरक्षात्मक होकर काउंटर अटैक कर सकती थी और उसने ऐसा ही किया। उधर अमेरिका ने खेल की गति को धीमा किया और गेंद पर नियंत्रण रखा। लेकिन वे अच्छे मूव बनाने और  फिनिश करने में सफल नहीं हुए। गेंद पर उनके नियंत्रण को इस बात से समझा जा सकता है कि उनका बॉल पजेशन पहले हॉफ में हॉलैंड के 37 प्रतिशत के मुकाबले 643 प्रतिशत रहा। अमेरिका ने एक अच्छा मूव 42वें मिनट में फिर बनाया और बॉक्स के बाहर से वेह ने एक करारा शॉट लगाया जिसे हॉलैंड के गोलकीपर ने आसानी से रोक लिया। पहला हाफ बहुत साफ सुथरे ढंग से खेला गया और केवल एक मिनट का अतिरिक्त समय दिया गया। इस एक मिनट में हॉलैंड की टीम ने एक बार फिर शानदार मूव बनाया। एक बार फिर राइट विंग से दम्फ्रीज़ ने क्रॉस दिया जिसे इस बार  देले बलिंद गोल में डालकर हॉलैंड की बढ़त 2-0 की कर दी।

        दूसरे हाफ में संघर्ष और सघन हो गया। अमेरिका ने दबाव बनाना शुरू किया और तीसरे मिनट में अमेरिका फिर आसान मौका चूका। हॉलैंड का गोलकीपर आगे आ चुका था और खाली गोल था,लेकिन दीपे ने गोल लाइन से गोल बचाया। 

           अंततः 76 वें मिनट में अमेरिका को पहला गोल करने में सफलता मिली जब हाजी राइट ने गेंद गोल में डाल कर स्कोर 1-2 कर दिया। मैच एक बार फिर खुल गया। लेकिन 81 वें मिनट पर देले बलिंद के क्रॉस पर इस बार दम्फ्रीज़ ने गोल किया और मैच व अमेरिकी भाग्य को बंद कर दिया। मैच इस स्कोर पर खत्म हुआ।

         निसंदेह ये दम्फ्रीज़ का मैच था जिसने दो असिस्ट और एक गोल किया। ये अमेरिका के लिए मिले अवसरों को गंवाने और हार जाने का मैच था। इस पूरे टूर्नामेंट में बार बार ये सिद्ध हुआ कि अवसर चूक जाने का मतलब हार है। आप अवसर चूक जाना नॉक आउट में अफोर्ड नहीं कर सकते।अमेरिका ने अवसर चूके,खामियाजा भुगता और विश्व कप 2022 से उसका सफर समाप्त हुआ।

          आज का दूसरा मैच दो बार के विश्व चैंपियन अर्जेंटीना और दूसरी बार क्वार्टर फाइनल में पहुंचने के लिए आतुर ऑस्ट्रेलिया के बीच था। अर्जेंटीना के पास मैस्सी था। फुटबॉल का जादूगर। वो आज अपना एक हजारवाँ मैच खेल रहा था। जिस के 999 मैचों में 788 गोल और 348 असिस्ट थे। उसके पास दुनिया जहान की 41 ट्राफियां थीं। आज उसका प्रतिद्वन्दी नौसिखिया सरीखा था। वे अंतिम दो मैचों में मेक्सिको और पोलैंड को 2-0 से हराकर अपने ग्रुप में पहले स्थान पर थे। दूसरी और ऑस्ट्रेलिया केवल एक बार इससे पहले विश्व कप के इस स्टेज पर खेला था और पहले ही नॉकआउट मैच में हार गया था। इस बार के विश्व कप में उसने अपनी शुरुआत फ्रांस के हाथों 1-4 से हार के साथ की थी। लेकिन अगले दो मैचों में  ट्यूनीशिया और डेनमार्क को 1-0 से हरा कर अगले चरण में प्रवेश किया था।

           ये विश्व रैंकिंग में नंबर तीन बनाम नंबर अड़तीस का मुकाबला था। अर्जेंटीना के साथ उनका इतिहास,उनका खेल कौशल और मैस्सी था। दोनों टीमों के बीच खेले गए सात मैचों में पांच अर्जेंटीना ने जीते थे और एक ड्रा हुआ था। ऑस्ट्रेलिया केवल एक मैच जीत पाई थी, वो भी अरसे पहले 1988 में। लेकिन ऑस्ट्रेलिया के पास शारीरिक डील डौल, दमखम और ताकत थी जिसके बल पर वे किसी को भी धूल चटाने का माद्दा रखते हैं। उन्होंने क्रिकेट से लेकर हॉकी तक तमाम खेलों में अपना दबदबा कायम कायम कर सिद्ध भी किया है। लेकिन उनके पास सबसे बड़ी उम्मीद की किरण वो विश्वास था कि हर बड़ी टीम को हराया जा सकता है। लीग चरण के तमाम उदाहरण उसके सामने थे और पहले ही मैच में 51वीं रैंक वाली सऊदी अरब से उसकी आज की विपक्षी टीम  अर्जेंटीना की 1-2 से हार का उदाहरण भी। बारीक ही सही उम्मीद की एक किरण उनके जेहन को रोशन कर रही होगी कि अर्जेंटीना की टीम में सेंध लगाई जा सकती है।

           अर्जेंटीना ने 4-3-3 के फार्मेशन से और ऑस्ट्रेलिया ने 4-4-2 के फार्मेशन से खेल की शुरुआत की। आरंभ में ही लग गया था कि ये मैच पहले मैच की तुलना में अधिक इन्टेन्सिटी से खेला जाएगा और ऐसा ही हुआ भी। ऑस्ट्रेलिया ने मैस्सी को शुरू में बांधकर रखा। जब उसके पास बॉल आती दो तीन खिलाड़ी उसपर टूट पड़ते। लेकिन शेर को कितनी देर बांध कर रखा जा सकता है। मैस्सी अपनी पोजीशन से हटकर पूरे मैदान में खेले और शीघ्र ही लय में आ गए और 35वें मिनट में बॉक्स के अंदर मिले पास को तीन खिलाड़ियों के बीच से निकालकर गेंद जाल में उलझा दी। ये मैस्सी के एक हजारवें मैच का 789 वां गोल था। उसके बाद भी मेसी ने अनेक शानदार मूव बनाये पर हॉफ टाइम तक स्कोर लाइन 1-0 अर्जेंटीना के पक्ष में रही। दूसरे हॉफ में अर्जेंटीना ने 57 वें मिनट में जूलियन अल्वारेज के गोल से 2-0 की बढ़त बना ली। लेकिन औस्ट्रेलिया ने हार नहीं मानी। उसने अंतिम समय तक संघर्ष किया और अर्जेंटीना को आखिरी सीटी बजाने तक निश्चिंत नहीं होने दिया। दोनों टीमों ने अच्छे मूव बनाये पर गोल करने के मौके बनाए। 77वें मिनट में ऑस्ट्रेलिया का गोल आया जब स्थानापन्न खिलाड़ी क्रेग गुडविन ने बॉक्स के बाहर से एक तेज़ तर्रार शॉट गोल की और लगाया और गेंद अर्जेंटीना के डिफेंडर फर्नान्डीज के सिर से लग कर अपने ही गोल के जाल में जा उलझी। अंततः अर्जेंटीना ने 2-1 से जीत दर्ज की और क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया।

        आज के मैच दुनिया के दो गोलार्द्धों के अपने अपने मैच थे। पहला उत्तर बनाम उत्तर तो दूसरा दक्षिण बनाम दक्षिण। अपनी अपनी प्रकृति के हिसाब से ही मैच खेले गए। इस दोनों मैचों को देंखे तो लगेगा कि पहला मैच अपेक्षाकृत अधिक शांत,अनुशासित और कम इन्टेन्सिटी वाला था जबकि दूसरा अधिक फिजिकल,अधिक इन्टेन्सिटी, कड़े संघर्ष वाला और उग्र था। अर्जेंटीना के पास ऑस्ट्रेलिया के शारीरिक बल का बराबरी का और समुचित प्रत्युत्तर था।

         यदि पहला मैच पूरी तरह से देन्ज़ेल दम्फ्रीज़ का था  तो दूसरा मैच मैस्सी का। उन्होंने विश्व कप का कुल मिलाकर नवां और नॉक आउट दौर का पहला गोल किया। कड़ी मार्किंग और रफ टफ टेकलिंग के बावजूद शानदार मूव बनाए। अफसोस इस बात का मैस्सी को दो आसान अवसर मिस करते देखा।

         दो क्षेत्रीय संघर्षों ने एक बड़े फलक अन्तरक्षेत्रीय संघर्ष की ज़मीन तैयार कर दी है। अब ये जो अगला संघर्ष होना है वो यूरोप बनाम दक्षिण अमेरिका का संघर्ष होगा। वो उत्तर बनाम दक्षिण का संघर्ष होगा। वो अर्जेंटीना बनाम नीदरलैंड का क्वार्टर फाइनल मैच होगा।

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पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों।



फुटबॉल_विश्व_कप डायरी 04


विश्व कप का पहला भाग
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फुटबॉल विश्व कप किसी भी एकल खेल की सबसे बड़ी और निसंदेह सबसे लोकप्रिय खेल प्रतियोगिता है। कमाल ये है कि 1930 में शुरू हुई इस प्रतियोगिता को शुरुआती दौर में अधिकांश देशों ने और विशेष रूप से यूरोपीय देशों ने खास तवज्जो नहीं दी थी। आज उसी प्रतियोगिता में सबसे बड़ा प्रतिनिधित्व यूरोप महाद्वीप का ही है।

इस प्रतियोगिता का 22वां संस्करण इस समय एक खाड़ी देश कतर में चल रहा है। मध्य पूर्व में ये प्रतियोगिता पहली बार खेली जा रही है और शनै शनै अपने चर्मोत्कर्ष की और अग्रसर है। 20 नवंबर से शुरू हुई इस प्रतियोगिता का पहला चरण जो कि राउंड रोबिन लीग के आधार पर खेला जाता है,अब समाप्त हो चुका है और प्री क्वार्टर फाइनल (राउंड ऑफ 16) के मुकाबले तय हो चुके हैं।

यहां से रोमांच का एक नया दौर शुरू होने वाला है जिसमें दुनिया जहान डूब जाने वाली है। क्योंकि यहां सिर्फ एक ही नारा काम करता है 'करो या मरो'। यानि या तो जीतो और आगे बढ़ो या हारो और बाहर हो जाओ। यहां से कोई वापसी नहीं है। चूक की कोई गुंजाइश नहीं है।

राउंड रोबिन लीग में कम से कम वापसी की एक गुंजाइश होती है। टीमें कुछ हद तक रिलेक्स रहती हैं। ये राउंड रोबिन की मेहरबानी है कि अर्जेंटीना और मैस्सी अभी भी विश्व कप में बने हुए हैं और बहुतों के लिए विश्व कप में अभी भी रुचि बाकी है। 

बावजूद इसके कि पहले चरण में नॉक आउट चरण जैसा रोमांच नहीं होता,क़तर विश्व कप का पहला चरण भी कम रोमांचक नहीं रहा है। तमाम बड़ी टीमें पहले चरण में ही बाहर हो गईं। कुछ अदना टीमों ने असाधारण खेल सिखाया और आगे बढ़ गईं। खेल के परंपरागत पावर हाउस और मठ ढह गए और नए शिखर बन गए। कुछ चमकते सितारों की चमक फीकी पड़ गई और कुछ नए सितारे फुटबॉल आकाश में जगमगाने लग गए।

यूं तो कोई भी प्रतियोगिता और कोई भी फुटबॉल विश्व कप कम रोमांचक नहीं रहा है, लेकिन फुटबॉल इतिहास में इस विश्व कप को विशेष रूप से याद रखा जाना है,ये तय है। ना केवल इस बात के लिए कि इस बार पहले चरण में सबसे ज़्यादा अपसेट हुए बल्कि इस बात के लिए भी ये अब तक के सबसे विवादास्पद खेल भी रहे। उलटफेर हर बार होते हैं,विवाद हर बार होते हैं,पर इस बार जैसे पहले कब हुए और कहां हुए।

  दरअसल इस प्रतियोगिता की बुनियाद ही विवाद पर रखी गई थी। 2010 में क़तर को इस प्रतियोगिता का आबंटन हुआ तो क़तर पर इसे रिश्वत देकर अपने नाम आबंटित कराने के आरोप लगे। तब से लेकर ये प्रतियोगिता और इसका आयोजन लगातार विवादों के घेरे में रहा। स्टेडियम निर्माण और इसकी तैयारियों में भारत,पाकिस्तान, श्रीलंका,बांग्लादेश के आप्रवासी मज़दूरों के साथ अमानवीय व्यवहार के आरोप लगे। पश्चिमी मीडिया में साढ़े छह हजार से ज़्यादा मजदूरों की मौत का आरोप लगाया गया। बाद में समलैंगिकों को मान्यता ना देने और स्टेडियमों में दर्शकों के बीयर पीने पर रोक लगाने जैसे नियमों के चलते विशेषतया पश्चिमी देशों में खासी आलोचना की गई। 

दरअसल ये विवाद इतना बढ़ गया कि फीफा को भाग लेने वाले देशों से लिखित अपील करनी पड़ी कि 'विवादों के बजाय फुटबॉल को केंद्र में रहने दें'। ऐसा प्रयास किसी के द्वारा किया गया हो ये तो पता नहीं पर जब एक बार खेल शुरू हुआ तो खुद ब खुद फुटबॉल केंद्र में आ गया और सारे विवाद किनारे धरे रह गए। फुटबॉल का जादू सिर चढ़कर बोलने लगा। फुटबॉल का नशा दर्शकों पर चढ़ गया।

खेल के तीसरे दिन सऊदी अरब ने प्रतियोगिता की संभावित विजेता अर्जेंटीना को 2-1 से हराकर अविस्मरणीय जीत हासिल की। उसके बाद उलटफेर का ये सिलसिला उस समय तक नहीं थमा जब 02 दिसंबर को पहले चरण के अंतिम दिन  कैमरून ने ब्राजील को 1-0 से हरा नहीं दिया। चौथे दिन जापान ने जर्मनी को 2-1 हराकर प्रतियोगिता का दूसरा धमाका किया। फिर कोस्टारिका ने जापान को 1-0 से,विश्व नंबर दो बेल्जियम को मोरक्को ने 2-0 से,दक्षिण कोरिया ने पुर्तगाल को 2-1 से,ट्यूनीशिया ने फ्रांस को 1-0से,ऑस्ट्रेलिया ने डेनमार्क को 1-0 से हराकर पहले चरण को रोमांचक बनाने में कोई कसर ना छोड़ी। इस बार पहले चरण में  कुल 12 अपसेट हुए जो किसी भी अन्य विश्व कप से ज़्यादा हैं।

 इस पहले चरण में पुराने सितारों का जादू भी खूब चला। रोनाल्डो ने जब घाना के विरुद्ध गोल किया तो वे पांच विश्व कप में गोल करने वाले विश्व के पहले खिलाड़ी बने। पोलैंड के लेवोन्दोस्की ने अपना विश्व कप का पहला गोल किया। लेकिन पुरनियों से ज़्यादा नए चमके। स्पेन के 17 साल के गावी पेले के बाद विश्व कप में गोल करने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बने। नीदरलैंड के गकपो पहले चरण के तीनों मैचों में गोल करने वाले 2002 के बाद पहले यूरोपियन खिलाड़ी बने। कनाडा के अल्फांसो डेविस,घाना के मोहम्मद कुदुस,इंग्लैंड के फिल फोडेन और दक्षिण कोरिया के सोन हूएन मिन ने अपने खेल से सबको चमत्कृत किया।

स्पेन की कोस्टारिका पर 7-0 से और इंग्लैंड की ईरान पर 6-2 से जीत इस चरण की सबसे बड़ी जीत रहीं हालांकि इस बार पहली प्रतियोगिताओं की तुलना में इस चरण में कम गोल हुए। ये इस बार का संकेत भी माना जाना चाहिए कि यूरोप व दक्षिण अमेरिका और बाकी विश्व की टीमों के बीच खेल के स्तर का अंतर कम हो रहा है और ये भी कि खेल अधिक प्रतिस्पर्धात्मक हो रहा है। इस बार इस चरण की एक महत्वपूर्ण बात बहुत अधिक अतिरिक्त समय दिया जाना रहा। कई बार तो ये समय 13 मिनट तक पहुंच गया और इस बात की मांग उठने लगी कि इस अतिरिक्त समय की अधिकतम सीमा 10 मिनट से ज़्यादा ना रहे।


इस विश्व कप का पहला चरण अफ्रीका और विशेष रूप से एशियाई फुटबॉल के उठान के रूप में भी देखा जाएगा। मोरक्को ने शानदार खेल दिखाया और अंतिम 16 में पहुंचे। अफ्रीका से नॉक आउट दौर में पहुचने वाली दूसरी टीम है सेनेगल। लेकिन सबसे शानदार खेल एशियाई टीमों ने दिखाया और एशिया आशियाना क्षेत्र की तीन टीमें-दक्षिण कोरिया,जापान और ऑस्ट्रेलिया पहली बार नॉक आउट चरण में पहुंची। सऊदी अरब ने अर्जेंटीना को हराकर बड़ा उलटफेर किया। उसने प्रतियोगिता में शानदार खेल दिखाया,हालांकि अगले दौर में नहीं पहुंच पाई। दक्षिण कोरिया एक रोमांचक मैच में घाना से 2-3 से हार गया,पर उरुग्वे से ड्रा खेला और पुर्तगाल पर 2-1 से शानदार जीत हासिल कर अगले दौर में प्रवेश किया। सबसे शानदार खेल जापान का रहा।  ये उसका लगातार सातवां विश्व कप था। उसने पहले ही मैच में जर्मनी को 2-1 से हराकर बड़ा उलटफेर किया। हालांकि जापान कोस्टारिका से 0-1 से हार गया परंतु एक और उलटफेर में स्पेन को 2-1 से हरा दिया और नॉक आउट में जगह बनाई।

पहले चरण के  दो मुकाबले फुटबॉल के कारण नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों के चलते महत्वपूर्ण बन गए। लेकिन कुछ अलग नहीं हुआ। अमेरिका ने ईरान को 1-0 से हरा दिया और इंग्लैंड ने वेल्स को 3-0 से।

सबसे महत्वपूर्ण बात ईरान की टीम ने महासा अमिनी और हिजाब हटाने के आंदोलन के समर्थन में राष्ट्रगान गाने से इनकार कर दिया। ये पहला चरण और ये विश्व कप  स्टेडियम के अंदर ईरान सरकार के समर्थकों और विरोधियों के बीच झड़प के लिए,फिलिस्तीन के समर्थन में उसके झंडे लहराए जाने के साथ ही इजरायल के दर्शकों को क़तर में आने की अनुमति देने के लिए और क़तर के अमीर द्वारा अपने राजनीतिक विरोधी देश सऊदी अरब के मैच के दौरान सऊदी अरब के झंडे को पहनने के लिए भी याद किया जाएगा।

याद रखिए नॉक आउट में तीन एशियाई, दो दक्षिण अमेरिकी,दो अफ्रीकी और अमेरिका के अलावा आठ टीमें यानी आधी यूरोप की हैं। यूरोप का अभी भी दबदबा बना हुआ है। बावज़ूद इसके कि जर्मनी,बेल्जियम और डेनमार्क की टीमें पहले ही दौर में बाहर हो गई हैं और इटली जैसी टीम विश्व कप के लिए लगातार दूसरी बार क्वालीफाई करने में विफल रही है।

उम्मीद की जानी चाहिए जिसका आगाज़ इतना तूफानी और इतना रोमांचक हो उसका समापन भी कम रोचक और रोमांचक नहीं ही होने जा रहा है। मैस्सी,एमबापे, रोनाल्डो,लेवोन्दोस्की, सोन, नेमार जैसे खिलाड़ी मैदान में हों, वहां भरपूर संघर्ष और रोमांच के अलावा और किसकी उम्मीद की जा सकती है। 

नीलसन द्वारा एक एप्प से किए गए विश्लेषण के अनुसार एक सेमीफाइनल अर्जेंटीना व ब्राजील और दूसरा फ्रांस व स्पेन के बीच खेला जा सकता है और फाइनल ब्राजील व स्पेन के बीच जिसमें विजेता ब्राजील को होना है। ये एक रोचक भविष्यवाणी है। इसे एक ड्रीम लाइनअप माना जा सकता है। एक सेमीफाइनल दक्षिण अमेरिकी कलात्मकता का और दूसरा यूरोपियन पावर का और उसके बाद यूरोप और दक्षिण अमेरिका पारंपरिक संघर्ष  वाला फाइनल। 

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बस आप फिंगर क्रॉस कीजिये और दिल थामकर बैठ जाइए। जो कुछ होगा वो रोमांच और जादू का दूसरा नाम होना है।



फुटबॉल_विश्व_कप 2022 डायरी_03


 

                                                       (साभार गूगल)

खेलों के अनोखे रंग
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      सबसे उद्दात और मानवीय चेहरे खेल मैदान में नज़र आते आते हैं और उन चेहरों से सबसे खूबसूरत चित्र भी खेल मैदानों में ही बनते हैं।सेनेगल के सदियो माने हो,ब्रिटेन के मार्कस रशफोर्ड हों या 'ब्लैक लाइव्स मैटर' अभियान के समर्थन में घुटने टेकते खिलाड़ी,सब मैदान से आते हैं।

         ऐसा ही एक खूबसूरत दृश्य क़तर में चल रही विश्व कप प्रतियोगिता के दौरान मैदान में देखने को मिला।

       ये क़तर विश्व कप का उद्घाटन मैच था।  ग्रुप ए का मेजबान कतर और इक्वेडोर का मैच था। खेल अभी शुरू हुआ  ही था,ये मैच का तीसरा मिनट था, इक्वेडोर के कप्तान और फारवर्ड वेलेंसिया ने गेंद गोल में डाल दी। उस गोल को सेलिब्रेट करने के लिए इक्वेडोर के सभी खिलाड़ी एक घेरा बना कर घुटने के बल बैठ गए और उसके बाद उन्होंने आसमां की और अंगुली उठाई। लेकिन वीएआर के बाद ये गोल निरस्त कर दिया गया। लेकिन उसके बाद वेलेंसिया ने दो गोल किये और इक्वेडोर के खिलाड़ियों ने हर गोल वैसे ही गोल सेलिब्रेट किया। दरअसल वे अपने महरूम साथी खिलाड़ी क्रिश्चियन रोगेलिओ बेनिट्ज़ बेटनकोर्ट को याद कर रहे थे जिनकी 2013 में दोहा में ही खलीफा स्टेडियम के पास स्थित एक अस्पताल में हृदयाघात से 27 वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गई थी। ये इक्वेडोर के खिलाड़ियों के मन में अपने साथ खिलाड़ी के प्रति सम्मान और प्रेम का मार्मिक मुज़ाहिरा था।

       बेनिट्ज़ 'चूचो' के नाम से जाने जाते थे और इक्वेडोर के सबसे बड़े फुटबॉल आइकॉन । उनकी अपने देश में क्या अहमियत थी, ये इस बात से जाना जा सकता है कि उनके अंतिम संस्कार  में एक लाख से ज़्यादा लोगों ने भाग लिया था। और उनकी 11 नंबर की जर्सी को रिटायर कर दिया गया। हालांकि 2014 के विश्व कप में फीफा के नियमों के चलते ये नंबर बहाल करना पड़ा। 

       बेनिट्ज़ ने अपने प्रोफेशनल कॅरियर की शुरुआत स्पेन के  विलररियल क्लब से की । उसके बाद वे मेक्सिको प्राइमा लीग में सांतोस लगुना से खेले और तीन सीजन में सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी थे। उसके बाद वे इंग्लिश प्रीमियर लीग में बर्मिघम सिटी से खेले। 2013 में वे क़तर के अल जैश क्लब में शामिल हो गए। इस क्लब के लिए उन्होंने एक ही मैच खेला था कि उनकी मृत्यु हो गयी। 

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लेकिन खेल मैदान का ये कोई आखिरी मर्मस्पर्शी दृश्य नहीं बन रहा था। यकीन मानिए ऐसे दृश्य आगे भी आपके मन को छूते रहेंगे।


नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...