Sunday, 11 July 2021

अधूरी ख्वाहिशों वाली जीत

 


स्टॉप वाच द्वारा 90 के ऊपर 04 मिनट और दर्शाए जाने के साथ ही रैफरी द्वारा खेल समाप्त होने की अंतिम लम्बी सीटी बजाई गई और अर्जेंटीना टीवी द्वारा उद्घोष किया गया 'अर्जेंटीना चैंपियन है,मेस्सी चैंपियन है'। इसी के साथ रियो डी जेनेरो के ऐतिहासिक 'माराकाना स्टेडिया' के मैदान में एक अद्भुत दृश्य नमूदार हो उठा। 

 'अधूरी ख्वाहिशों के देवता' की आँखें ख़ुशी से नम हो आयी थीं और ये नमी इतनी भारी थी कि वो घुटनों के बल मैदान पर बैठ गया। वो शायद उस मैदान को धन्यवाद करना चाहता था जिसने इससे पहले कई बार उसकी एक अदद ख्वाइश को पूरा होने से रोका था। अब उसे उसके साथियों ने घेर लिया। अपने हाथों में उठाया। और हवा में उछाल दिया। वे उसे अनुभव कराना चाहते थे कि अनंत काल से प्रतीक्षित एक अधूरी ख़्वाहिश के पूरा होने पर कोई व्यक्ति किस तरह फील करता है,जब उसके पाँव जमीं पर नहीं होते और वो हवा में उड़ता है। निश्चित ही उन आखों की शहद सी मीठी नमी में नीली और सफ़ेद धारियों वाली जर्सी में कोई बड़ा खिताब ना जीत पाने की अब तक संचित सारी वेदना और आलोचनाओं की कड़वाहट निथर गयी होगी।  

ये कोपा अमेरिका कप 2020 का अंतिम मुकाबला था। ब्राज़ील और अर्जेंटीना की टीमों के बीच।  ये दो टीमों के बीच भर मुकाबला नहीं था बल्कि ये दो चिर प्रतिद्वंदियों के बीच मुकाबला था। विश्व फुटबॉल की दो सिरमौर टीमों के बीच मुकाबला था जिन्होंने अब तक सात विश्व कप जीते थे। ये कई मायने में आज शाम यूरो कप के फाइनल से बड़ा मुकाबला था। ये दो महान खिलाड़ियों नेमार और मेस्सी के बीच भी मुकाबला था जो 2013 से 2017 एक साथ कैम्प नाउ के लिए तमाम मुकाबलों में एक साथ खेले और जीते।

ये मैच जीता अर्जेंटीना ने 1-0 से। मैच का एकमात्र गोल 22वें मिनट में एंजेल डी मारिया ने किया। उन्हें अपने साथी मिडफील्डर रोड्रिगो डी पॉल के लम्बे पास को मारिया ने थामा,ब्राज़ीली डिफेंडर रेनान लोदी को चकमा दिया और गोलकीपर एडरसन के ऊपर से गेंद उछाल दी। गेंद नेट में जा धसीं।   गेंद का गोल नेट में धसना भर नहीं था बल्कि ब्राज़ीली खिलाड़ियों के दिल में किसी फांस का धंस जाना था जो लम्बे समय तक उन्हें चुभती रहेगी। ये मैच का एकमात्र गोल था। इस गोल के बाद अर्जेंटीना की टीम खासी रक्षात्मक हो गई।  जबकि ब्राज़ील ने बहुत आक्रामक रुख अपनाया पर गोल ना कर सकी। 

ये बहुत ही शिद्दत से खेला गया मैच था। ऐसा होना भी लाज़िमी था। ये क्लासिक प्रतिद्वंदिता जो थी। लेकिन कई बार हद से ज़्यादा इन्टेन्सिटी खेल की लय को बिगाड़ देती है। इस मैच में भी ऐसा ही हुआ। इस पूरे मैच में कुल 41 फ़ाउल हुए। जिसने खेल की गति और लय दोनों को बाधित किया। और इसी वजह से खेल उन ऊंचाइयों पर नहीं पहुँच सका जहां इसे पहुंचना चाहिए था। हालांकि इस मैच में  41 के मुक़ाबले ब्राज़ील का बॉल पजेशन 59 फीसदी रहा।  अर्जेंटीना के 06 बार के मुकाबले ब्राज़ील ने 13 बार गोल पर निशाना साधा। ये दीगर बात है कि निशाने पर दोनों टीमें केवल दो बार ही निशाना साध सकी। 

अंततः मैच अर्जेंटीना ने जीता। शायद ये उनका दिन था। या ये कि उनके पास जीतने का एक भावात्मक उद्देश्य था। फाइनल की पूर्व संध्या पर एंजेल डी मारिया कह रहे थे 'मेस्सी हमसे एक कदम आगे हैं बाकी हम सब एक नाव में सवार हैं। आप समझ सकते हैं हमारे लिए जीत के क्या मायने हैं।' वे इसे अपने लिए जीतना चाहते थे, अर्जेंटीना के लिए जीतना चाहते थे  और सबसे बड़ी बात वे इसे मेस्सी के लिए जीतना चाहते थे और उन्होंने कर दिखाया। आप 2011 के क्रिकेट विश्व कप में भारत की जीत को याद कीजिए। वे इसे अपने लिए जीतना चाहते थे,वे इसे भारत के लिए जीतना चाहते थे और वे इसे अपने भगवान सचिन के लिए जीतना चाहते थे। और उन्होंने ऐसा किया।  अब सचिन को कंधे पर उठाएं भारतीय टीम के वानखेड़े स्टेडियम के लगाए चक्कर के दृश्य से मेस्सी को हवा में उछाले जाने वाले दृश्य से कीजिए।  महानतम लोगों में ऐसी ही समानताएं हुआ करती हैं। 

निसंदेह ये जीत अर्जेंटीना के लिए, उनकी टीम के खिलाड़ियों के लिए,उनके प्रसंशकों के लिए और खुद मेस्सी के लिए भावनात्मक क्रिया थी। ये 'अभी नहीं तो कभी नहीं' वाली प्रक्रिया थी। मेस्सी के पास सब कुछ था।  उनके पास 10 ला लीगा खिताब थे,04 चैंपियंस ट्रॉफी थीं और 06 बैलन डी ओर खिताब थे।  लेकिन ये सब कुछ लाल और नीली धारी वाली जर्सी ने दिया था। हल्क़े नीले और सफ़ेद रंग की धारी वाली जर्सी के हाथ खाली थे। दरअसल उस जर्सी के ये खाली हाथ फुटबाल के देवता के देवत्व पर प्रश्नचिन्ह थे। ये दरअसल 'मेरे पास सबकुछ है पर मेरे पास माँ नहीं है' वाली बात थी। तमाम लोग ये मानते हैं वे नीली सफ़ेद जर्सी में उस शिद्दत से नहीं खेलते जिस शिद्द्त से लाल नीली जर्सी में खेलते हैं। उन्हें एक बार कोलंबिया के विरुद्ध मेस्सी को खून से सने चेहरे के साथ खेलते देखना चाहिए।  उन्हें समझ आएगा कि एक खिलाड़ी के लिए अपने देश की जर्सी पहनना क्या होता है। ये ज़रूर है कि फाइनल में मेस्सी उस लय में नहीं दिखे जिस रंग में वे पूरे टूर्नामेंट में थे। पर ये मेस्सी ही थे जिन्होंने अर्जेंटीना को फाइनल तक पहुंचाया।  उन्होंने कुल चार गोल किए और पांच असिस्ट। उन्हें प्रतियोगिता का सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर आंका गया। अर्जेंटीना टीम के मैनेजर लिओनल स्कलोनी कहते हैं 'अगर आप जानते हो कि वे (मेस्सी) कोपा अमेरिका कप में कैसा खेले तो आप उन्हें भी ज़्यादा चाहने लगोगे।' आप अंदाज़ा लगा सकते हो वे कैसा खेले होंगे। 

क्या ही कमाल है कि ब्राज़ील की सुप्रसिद्ध खेल पत्रकार फैबिओला एंड्राडे ने अर्जेंटीना की जर्सी पहने अपना फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया और लिखा वे ब्राज़ील के बजाए अर्जेंटीना का समर्थन करती हैं क्योंकि मेस्सी ये खिताब डिज़र्व करते हैं।  ऐसा करने या मानने वाली वे अकेली ब्राज़ीली नहीं थीं।  ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा थी। इसी से खीज कर नेमार ने लिखा 'मैं सबकी भावनाओं की क़द्र करता हूँ। वे भाड़ में जाएँ।' ये एक उदाहरण भर है कि विश्व फुटबॉल में मेस्सी का क्या दर्जा है।  

मेस्सी ने देश के लिए चार विश्व कप फाइनल्स और छह कोपा कप खेले।  ये दुर्भाग्य ही था कि वे इससे पहले वे एक भी नहीं जीत पाए। 2014 में अर्जेंटीना विश्व कप फाइनल्स के फाइनल में पहुंचा। लेकिन इसी मैदान पर जर्मनी ने मेस्सी का सपना तोड़ दिया। मेस्सी तीन बार कोपा कप के फाइनल में खेले 2007,2015 और 2016 में। तीनों बार चूक गए। 07 में ब्राज़ील ने और 15 व 16 में चिली ने अप्सरा की तरह मानो विश्वामित्र की पूर्ण देवत्व की अबाध साधना को भंग कर दिया।  2016 के न्यूजर्सी में चिली के विरुद्ध खेले गए फाइनल को याद कीजिए। मैच पेनाल्टी शूटआउट में पहुंचा।  मेस्सी ने पहली पेनाल्टी ली।  ये शॉट गोलपोस्ट के ऊपर से निकल गया।  इस पेनाल्टी शॉट की थोड़ी सी अतिरिक्त ऊंचाई ने उन्हें निराशा की अतल गहराइयों में धकेल दिया। उन्होंने राष्ट्रीय टीम से अलग होने का  फैसला किया। लेकिन वे जल्द ही वापस लौटे। ये अकेला अवसर नहीं था जब वे निराश होकर राष्ट्रीय टीम से हटे। पर वे हर बार वापस लौटे। अंततः उन्हें वो मिला जिसकी उन्हें सबसे ज़्यादा चाहना थी।  

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ये एक ऐसी जीत थी जिसकी मेस्सी को ही नहीं अर्जेंटीना को भी बहुत अधिक चाहना थी। ये अर्जेंटीना की 1993 बाद पहली बड़ी जीत थी। और निःसंदेह संभव किया एंजेल डी मारिया ने -अपने लिए,अर्जेंटीना के लिए और मेस्सी के लिए। मारिया खुद भी हीरो माफिक हो गए। वे चैंपियंस लीग फाइनल और कोपा कप फाइनल दोनों में मैन ऑफ़ द मैच चुने जाने वाले पहले खिलाड़ी बने।  तो बधाई एंजेल डी मारिया। अर्जेंटीना का पुराना गौरव लौटा। बधाई टीम अर्जेंटीना।  और मेस्सी एक सम्पूर्ण खिलाड़ी बनने की और अग्रसर हुए। बधाई लिओनल आंद्रेस मेस्सी। 


 

Friday, 9 July 2021

निशाने पर तीर




जब भी पेरिस की बात होती है तो राफेल नडाल,फ्रेंच ओपन और रोलां गैरों की लाल मिट्टी की बात होती है। सेंट जर्मेन फुटबॉल क्लब और उसके अद्भुत खिलाड़ी नेमार की बात होती है। उन गलियों की बात होती जिन गलियों में एमबापे अपराधियों के बीच फुटबॉल के गुर सीखता है और फ्रांस को विश्व चैंपियन बना देता है। 1900 और 1924 के ओलंपिक की बात होती है।

    और साथ ही बात होती है 2024 में होने वाले ओलंपिक की। लेकिन अब से जब भी पेरिस की बात होगी तो दीपिका कुमारी और विश्व तीरंदाजी प्रतियोगिताओं में उनके शानदार प्रदर्शन की भी बात होगी।

    21 से 27 जून तक फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित विश्व कप तीरंदाजी स्टेज 3 प्रतियोगिता में उन्होंने स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी की। सबसे पहले रिकर्व कैटेगरी में अंकिता भाकत और कोमालिका बारी के साथ महिला टीम का स्वर्ण पदक जीता। उसके बाद अपने पति और कोच अतानु दास के साथ मिश्रित टीम का स्वर्ण और अंत में व्यक्तिगत स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता। हालांकि यहां उल्लेखनीय है कि विश्व नम्बर एक दक्षिण कोरिया, चीन और ताइपे जैसी टीमें इन विश्व कप सीरीज में भाग नहीं ले रही हैं। लेकिन इससे दीपिका की उपलब्धियों का महत्व कम नहीं हो जाता। 

दरअसल वे ऐसा पहली बार नहीं कर रहीं थीं। ये विश्व कप में व्यक्तिगत स्पर्धा का उनका चौथा स्वर्ण पदक था। इससे पूर्व 2012 में अंताल्या में,2018 में साल्ट लेक सिटी में और इसी साल ग्वाटेमाला में भी सोने का तमगा जीत चुकी हैं।

विश्व कप में उनके हिस्से अब तक कुल मिलाकर 10 स्वर्ण,13 रजत और 05 कांसे के तमगे आ चुके हैं। इतना ही नहीं वे अब तक राष्टमंडल खेलों में दो स्वर्ण, एशियाई खेलों में एक कांस्य,एशियाई चैंपियनशिप में एक स्वर्ण, दो रजत और तीन कांसे और विश्व चैंपियनशिप में दो रजत पदक सहित लगभग 40 अंतरराष्ट्रीय तमगे हासिल कर चुकी हैं। 

लेकिन पेरिस में स्वर्ण पदकों की जीत की तिकड़ी सबसे न्यारी है। दरअसल जो शहर खूबसूरती  में चार चाँद लगाने के लिए नित फैशन के नए नए बाह्य उपादान प्रस्तुत करता हो,उस शहर में दीपिका बताती हैं कि वास्तविक सौंदर्य बाहर से नहीं आपके भीतर से उद्भूत होता है।

उनके भीतर के आत्मविश्वास से उनके चेहरे पर फैली ताम्बई आभा बोलती है कि कठिन परिश्रम,दृढ़ इच्छाशक्ति और लगन से ज़िन्दगी की जद्दोजहद के श्याम रंग को जीत के स्वर्णिम रंग में तब्दील किया जा सकता है। कि फर्श से अर्श तक का सफर तय किया जा सकता है। कि एक गांव से रांची तक के 15 किलोमीटर का गुमनामी का  सफर तय करते करते प्रसिद्धि के आकाश का सफर तय किया जा सकता है।

यूं तो संसार भर की स्त्रियां अपने बंधनों को काट फेंक कर अपने सपनों को उड़ान देने की इच्छा से भरी होती हैं। ये बंधन जितने ज्यादा होते हैं इच्छाएं उतनी ही प्रबल और तीव्रतर होती जाती है। शायद इसीलिए दीपिका के मन में अपने सपनों को उड़ान देने की इच्छा ज़्यादा बलवती हुई हो। अपने सपनों को उड़ान देने के लिए उन्होंने तीरों को चुना। दरअसल जब वे अपने धनुष से तीरों को टारगेट पर छोड़ रही होती हैं तो वे केवल अंक हासिल नहीं कर रही होती हैं बल्कि अपने सपनों को मंज़िल पर पहुंचा रही होती हैं। और जब वे अपने तीरों से टारगेट को भेद रही होती हैं तो सिर्फ जीत हासिल नहीं कर रही होती हैं,बल्कि पितृ सत्ता के बंधनों को भी भेद रही होती हैं,समाज की दकियानूसी रूढ़ियों की दीवारों को भेद रही होती हैं और अभावों,परेशानियों और कठिनाइयों से उपजी चुनौतियों को भी भेद रही होती हैं। वे उस चक्रव्यूह को भेद रही होती हैं जिसके आगे अनंत ऊंचाइयों का खुला आकाश है।

दरअसल पेरिस में वे अपने को दोहरा भी रही होती हैं। वे अंताल्या को दोहरा रही होती हैं। याद कीजिए 2012 में लंदन ओलंपिक  से ठीक पहले वे अंताल्या में व्यक्तिगत स्पर्धा में  स्वर्ण पदक जीतती हैं। सबको उनसे ओलंपिक में पदक की उम्मीद होती हैं। पर उम्मीदों के बोझ और बड़ी प्रतिस्पर्धा का दबाव उनके तीरों को निशाने से भटका देता है। वे एक बार फिर पेरिस में ना केवल अंताल्या को दोहरा रही हैं बल्कि उसे और आगे बढ़ा रही हैं। 2012 की तरह ही वे एक बार फिर नंबर एक पर काबिज हो जाती हैं। एक बार फिर उनसे टोक्यो में तमगों की उम्मीद है।

इतना दोहराना तो अच्छा है कि उम्मीदें जगा दी हैं। बस इससे आगे ना दोहराए। लंदन ओलंपिक की पुनरावृत्ति ना हो,बल्कि एक नया मकाम हासिल हो। 

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फिलहाल इस स्वर्णिम तिहरी जीत की दीपिका को बधाई और टोक्यो में नया इतिहास रचने के लिए शुभकामनाएं।



Monday, 21 June 2021

टेनिस

 



हम चाहे जितना प्रोग्रेसिव हो जाँए पर सामंती सोच का एक कीड़ा हमेशा हम सब के दिमाग में मौजूद रहता है। अपने को सबसे ज़्यादा जनतांत्रिक दल मानने वाले मजदूरों के एक वाम दल के एक विधायक जी का एक फोटो वायरल हुआ था जिसमें एक मजदूर खुद धूप में रहते हुए विधायक जी के ऊपर छाता ताने चल रहा था। ये एक उदाहरण भर है।



इसी तरह क्रिकेट और टेनिस जैसे कुछ खेलों का चरित्र बुनियादी तौर पर सामंती है। फटाफट क्रिकेट के साथ क्रिकेट का चरित्र तो बदला है,पर टेनिस में सामंती अवशेष बाकी हैं। खेल के दौरान बॉल उठाते और खिलाड़ियों को बॉल देते बॉल बॉय/गर्ल को तो आपने देखा ही होगा। चलिए इसे खेल के फॉर्मेट की ज़रूरत मान भी लें(हालांकि इतना ज़रूरी है भी नहीं),पर उन्हें हर दो गेम के बाद वाले ब्रेक में खिलाड़ियों के सामने हाथ बांधे या हाथ में तौलिया लिए खड़े देखना आंखों की चुभता ही नहीं है बल्कि दिल में गड़ता भी है। ऐसे दृश्य खेल का हिस्सा कतई नहीं हो सकते।
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दरअसल ड्रेस कोड के नाम पर बाज़ार का सबसे बड़ा शिकार भी महिला टेनिस खिलाड़ी ही बनी हैं।

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उस रात टेरेस पर उसे बूंदों से अठखेलियाँ करते देख मैंने हौले से उससे पूछा 'तुमने प्रेम पत्र लिखे क्या?'

वो खिलखिला उठी। अंधेरी रात में उसके हास का उजाला फैल गया।
वो चहक कर बोली 'हाँ लिखे ना। उन दिनों हम प्रेम में दरिया-ए-चिनाब हुआ करते थे। सपनों से बूंद बूंद दरिया भरता रहता और दरिया समंदर-ए महबूब की और बहता रहता। और फिर.....'
'और फिर क्या'मैंने पूछा
उसके स्वर में एक हल्की उदासी घुल गयी। बोली 'फिर अनहोनी का जलजला आया। इश्क़ का दरिया ए चिनाब सूख कर धरती में समा गया और दरिया-ए-सरस्वती हो गया।'
फिर उसने धीमे से पूछा 'और तुमने'
एक डूबी आवाज़ कहीं गहरे भीतर से निकली 'हां हमने भी। जब हम प्रेम में आवारा बादल थे। बूंद बूंद धरती पर बरसते। प्रेम का हरा रंग गहराता जाता और बदले में बादल फिर फिर उष्मा से भर भर जाता।'
'हूँ! तो फिर ?'
'फिर क्या! हरी भरी धरती बंजर हो गयी। और..और बादल हवा हो गए।'
अब मौन से यादों का मौसम उग आया था।
एक मन दरिया बन कल कल बहने लगा। एक मन बादल बन बूंद बूंद बरसने लगा।
ये पानियों का मौसम था
और प्रेम बरस रहा था।

महान एथलीट:मिल्खा सिंह

 



एथलेटिक्स में तीन तरह की स्पर्द्धाएं होती हैं दौड़ फेंक और कूद। फेंक और कूद में एक एक करके परफॉर्मेंस करता है और श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला विजेता होता है।  लेकिन दौड़ में प्रतिस्पर्धी एक साथ प्रतिभाग करते हैं और इसीलिये दौड़ एथलेटिक्स की सबसे रोमांचकारी प्रतिस्पर्धा होती है। 

और दौड़ों में यूं तो 100 मीटर दौड़ को 'दौड़ों की रानी'कहा जाता है पर सबसे खूबसूरत दौड़ 400 मीटर की ही होती है। दरअसल इसमें स्प्रिंट रेसों की गति और लंबी रेसों की लय दोनों एक साथ होती हैं। आज एथलेटिक्स की इस सबसे खूबसूरत रेस का भारत का सबसे बड़ा साधक 91 वर्षीय मिल्खा सिंह जीवन की रेस को समाप्त कर अनंत की यात्रा को निकल पड़ा।

हर व्यक्ति का जीवन विडंबनाओं से भरा होता है। मिल्खा सिंह इसका अपवाद कैसे हो सकते थे। भारतीय एथलेटिक्स के दो सबसे बड़े सितारे पुरुषों में मिल्खा सिंह और महिलाओं में पी टी उषा हैं। और ये दोनों ही अपनी उपलब्धि के लिए नहीं बल्कि उस उपलब्धि को पाने से चूक जाने के लिए जाने जाते हैं। 1960 के रोम ओलंपिक से पहले वे प्रसिद्ध हो चुके थे और 1958 में कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में उस समय के विश्व रिकॉर्ड धारी दक्षिण अफ्रीका के मैल्कम स्पेंस को हराकर स्वर्ण पदक जीत चुके थे। वे संभावित पदक विजेता थे। पर होनी को जो मंजूर हो। रोम ओलंपिक में उस रेस में पहले चार धावकों लेविस,कॉफमैन,स्पेन्स और मिल्खा सिंह ने 45.9 सेकंड के ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ दिया। लेविस और कॉफमैन ने 44.9 सेकंड का समय लिया। पर फोटो फिनिश में कॉफमैन को दूसरा स्थान मिला,स्पेन्स को 45.5 के साथ कांस्य पदक मिला और मिल्खा 45.73 के समय के साथ चौथे स्थान पर रह गए। ये राष्ट्रीय रिकॉर्ड था जिसे अगले 40 वर्षों तक बने रहना था। इसे 1998 में परमजीत सिंह ने तोड़ा। वे सेकंड के सौवें हिस्से से इतिहास बनाने से चूक गए। शायद ये नियति थी। वे आगे इस चूक के लिए याद किये गये और मिथक सरीखे हो गए। ठीक वैसे ही जैसे 1984 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक में 400 मीटर बाधा दौड़ में राष्ट्रमंडल रिकॉर्ड तोड़ कर भी सेकंड के सौवें हिस्से से कांस्य पदक चूक गईं थी और इस चूक से ही आगे जानी गयीं और प्रसिद्धी पाई।
विडम्बनाएं और भी थीं। उनका जीवन विडंबनाओं और विरोधाभासों भरा था। वे 1929 में पाकिस्तान के शहर मुज़्ज़फरगढ़ के गोविंदपुरा में जन्में थे। 1947 में विभाजन के समय उन्हें पाकिस्तान छोड़ना पड़ा। इस दौरान उनके परिवार के सदस्यों को मार डाला गया।
जीवन की एक दौड़ ने उनसे उनका घर परिवार और देस छीना और एक दौड़ ने उन्हें प्रसिद्धि की बलन्दी पर पहुंचाया। कमाल ये कि वे जीवन से निराश होकर डकैत बनना चाहते थे पर सेना में भर्ती हो गए।
वे पाकिस्तान से भागे थे। कटु स्मृतियां उनके जेहन में थीं। 1960 में रोम ओलंपिक से पहले पाकिस्तान में दौड़ने का निमंत्रण मिला। वहां के लोग चाहते थे उनका मुकाबला उस समय के एशिया के सबसे मशहूर स्प्रिंट धावक पाकिस्तान के अब्दुल ख़ालिक़ से पाकिस्तान में हो। ख़ालिक़ को वे टोक्यो एशियाई खेलों में हरा चुके थे। वे नहीं जाना चाहते थे। नेहरू के कहने पर गए। एक बार फिर पाकिस्तान की धरती पर अब्दुल ख़ालिक़ को हराया। इस रेस में मिल्खा ने अब्दुल ख़ालिक़ को 10 कदमों से पीछे छोड़ा। रेस देख रहे पाकिस्तान के जनरल याकूब खां ने कहा 'तुम दौड़ते नहीं उड़ते हो।' मिल्खा को 'उड़न सिख'की उपाधि मिली उसी धरती पर जहां वो सब कुछ खो कर गया था।
उन्होंने 1958 के टोक्यो एशियाई खेलों में दो स्वर्ण पदक जीते। उसके बाद उसी साल कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में 400 मीटर के तत्कालीन विश्व रिकॉर्ड होल्डर को हराकर स्वर्ण पदक जीता। इन खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले वे पहले भारतीय एथलीट थे।
उन्हें रोम ओलंपिक में पदक चूक जाने का ताउम्र मलाल रहा। दरअसल ये पदक चूक जाना केवल एक पदक का चूक जाना भर नहीं था,बल्कि आने वाले समय भारत के एथलीटों के लिए एक 'रोल मॉडल' का बनने से चूक जाना था,वो चूक सैकड़ों पदकों का चूक जाना था। उनकी उम्मीद अधूरी रही कि कोई भारतीय ओलंपिक में पदक जीत सके।
ज़िंदगी ऐसी ही होती है। वे विरोधभासों और विडंबनाओं से बनी ज़िन्दगी थे। वे एक अधूरे ख्वाब और एक चूक से बनी अमरत्व प्राप्त शोहरत थे और अदम्य इच्छा शक्ति,कड़ी मेहनत और एक सैनिक के अनुशासन से बने महान एथलीट थे।
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एक नेक दिल इंसान को जिसने 'बैटल ऑफ टाइगर हिल' में शहीद हवलदार बिक्रम सिंह के सात वर्षीय बेटे को गोद लिया,अश्रुपूरित अंतिम सलाम।

Tuesday, 15 June 2021

 


            जिन जगहों पर खिलाड़ी खेल रहे होते हैं,वहां बेहतर प्रदर्शन करने के लिए खिलाड़ियों को अपनी काबिलियत के साथ साथ उन जगहों को आत्मसात भी करना होता है। जोकोविच इस बार पूरी प्रतियोगिता के दौरान लाल टी शर्ट और लाल जूते पहने रहे। मानो वे रोलां गैरों की लाल मिट्टी से एक संवाद स्थापित करने का प्रयास कर रहे हों कि मैं तुम्हारे रंग में रंग चुका हूँ। अब तुम्हें मुझे अपनाना होगा और मेरे रंग में रंग जाना होगा। और इस बार ऐसा वे कर सके।

            रविवार की शाम जब ग्रीस के स्टेफानोस सितसिपास को दो सेट पिछड़ने के बावजूद 6-7(6-8),2-6,6-3,6-2 और 6-4 से हराकर अपना कुल मिलाकर 19 वां और दूसरा फ्रेंच ओपन ग्रैंड स्लैम खिताब जीत रहे थे तो जोकोविच, फिलिप कार्टियर एरीना और उसकी लाल मिट्टी सब एकाकार हो चुके थे। बस एक ही दृश्य दिखाई पड़ता था जिसमें जोकोविच की अविस्मरणीय जीत के चटक रंगों की चकाचौंध चारों और बिखरी थी और  ऐसा दृश्य जिसमें 'तीन समान' (फेडरर,राफा,जोकोविच) में जोकोविच प्रथम जान पड़ता।

            कोई भी चीज अपनी संख्या बल पर नहीं बल्कि गुणात्मकता के कारण महत्वपूर्ण होती है।जोकोविच की ये जीत भी इसी की ताईद करती है। ये फ्रेंच ओपन में जोकोविच की केवल दूसरी जीत है,लेकिन इसने राफा की 13 जीतों का रंग मानो फीका कर दिया हो। दरअसल इस दूसरी जीत ने उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। ओपन इरा यानी 1968 के बाद का वो सबसे पूर्ण खिलाड़ी जो बन चुका था। वो चारों ग्रैंड स्लैम कम से कम दो बार जीतने वाला पहला खिलाड़ी जो बन चुका था।  इससे पहले सिर्फ दो खिलाड़ी रॉड लेवर और रॉय इमर्सन ऐसा कर चुके थे लेकिन ओपन एरा से पूर्व। यानि सभी सतहों पर समान रूप से अधिकार रखने वाला खिलाड़ी। निसन्देह ये एक खिलाड़ी के रूप में उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण है। दूसरे,अब वो फेडरर और राफा के सर्वाधिक 20 खिताबों से सिर्फ एक खिताब दूर है। उसके फॉर्म को देखते हुए तो लगता है कि इसी साल वो दौड़ में सबसे आगे होगा। और ये भी कि फाइनल में 22 साल की उम्र वाला आंकड़ा भले ही सितसिपास के पक्ष में हो पर क्वालिटी जोकोविच के पास ही थी।

             दरअसल इस साल के फ्रेंच ओपन का ये संस्करण टेनिस इतिहास का एक महत्वपूर्ण काल विभाजक इवेंट होते होते रह गया। बिग थ्री के इस दबदबे वाले युग का ये पहला अवसर था जब तीनों एक ही हाफ में रखे गए थे। इनमें से केवल एक ही फाइनल में पहुंच सकता था। दूसरे हाफ में 'नेक्स्ट जेन' के सबसे बड़े खिलाड़ी मसलन सितसिपास,ज़वेरेव,मेदवेदेव थे। इस तरह ये पहली बार प्रतियोगिता के शुरू होने से पहले ही पुरनियों के जीतने की संभावना आधी हो गयी थी। ये एक महत्वपूर्ण तथ्य है। अगर यहां पर 'नेक्स्ट जेन' का खिलाड़ी विजयी होता तो निश्चय ही ये महत्वपूर्ण काल विभाजक प्रतियोगिता होती जहां से 'नेक्स्ट जेन' का दबदबा शुरू होता और बिग थ्री का ढलान। पर ऐसा हो ना सका।  जोकोविच ने बताया कि अभी 'बहुत जोर बाजुएं पुरानों में है'।

                फ्रेंच ओपन से ठीक पहले रोम ओपन के फाइनल में राफा से हारने के बाद एक पूछे गए प्रश्न के जवाब में जोकोविच ने हल्के फुल्के अंदाज़ में कहा था कि 'नेक्स्ट जेन अभी हमें ओवरटेक करने की स्थिति में है ही कहां। बल्कि हमने (यानी बिग थ्री) खुद ही 'नेक्स्ट जेन' को रीइंवेंट किया है।' फ्रेंच ओपन को जीतकर वे अपने कथन को अक्षरशः सिद्ध कर रहे थे। युवाओं को बिग थ्री के जूतों में पैर डालने में अभी और समय लगने वाला है।

              पेरिस दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक है और ये भी कि ये शहर दुनिया की 'फैशन राजधानी' है। और फैशन की एक विशेषता होती है चंचलता। वो हमेशा गतिमान होता है। ठहरता नहीं है। वो किसी एक वस्तु या स्थान पर निर्भर नहीं होता,उसका सहारा नहीं लेता। वो ना केवल अपना रूप बदलता है बल्कि अपने आलंब और अवलंब भी बदलता है। तो क्या उसी से प्रेरित होकर रोलां गैरों ने भी इसे अपनी विशेषता बनाया होगा। वो बड़े से बड़े खिलाड़ी को भी एक या दो बार से अधिक बार चैंपियन नहीं बनाती। उसे हर बार एक नया चैंपियन चाहिए होता है। बड़े बड़े खिलाड़ी यहां खेत रहते हैं। 20 ग्रैंड स्लैम जीतने वाला फेडरर एक बार और 19 खिताब जीतने वाले जोकोविच केवल दो खिताब जीत पाते हैं। पीट सम्प्रास,जिमी कॉनर्स,जॉन मैकनरो,बोरिस बेकर और स्टीफेन एडबर्ग जैसे दिग्गज खिलाड़ी तो इसे एक बार भी नहीं जीत पाए। हां 13 बार जीतने वाला राफा इसका अपवाद है। 

              तो क्या कारण है कि राफा इसे 13 बार जीत लेता है और बड़े बड़े खिलाड़ी एक दो बार ही जीत पाते हैं और कई बड़े नाम जीत भी नहीं पाते। दरअसल फैशन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी कलात्मकता और उसकी कोमलता है। पॉवर भी उसका एक तत्व है पर उतना महत्वपूर्ण नहीं। शायद उसी से रोलां गैरों की मिट्टी प्रेरणा लेकर अपना चरित्र निर्माण करती है। उसे पॉवर गेम पसंद नही आता। वो कोमल एहसास से खिलखिला उठती है,ऐसा करने वाले पर न्योछावर हो हो जाती है,उसके पैरों तले बिछ जाती है और उसमें अतिरिक्त गति भर देती है। राफा ने इसे पहचाना। उसने लाल मिट्टी को मान दिया। उसकी इच्छा का सम्मान किया। उसने अपने खेल को ताकत के बजाय कलात्मकता और कोमलता दी। बदले में लाल मिट्टी ने जीत की सौगात। 

            इस बार नोवाक ने भी यही किया। नोवाक जीत सका और राफा को हरा सका तो सिर्फ इसलिए कि उसने खेल में पावर का इस्तेमाल नहीं किया। राफा के खिलाफ उसकी जीत में उसका राफा के बाएं हाथ पर आक्रमण के साथ साथ बेस लाइन से और उसके पीछे से खेलना भी था। आप जितना आगे आकर खेलते हैं ज़्यादा पावर प्रयोग करते हैं। लेकिन पीछे से खेलने पर प्लेसिंग, ट्रिक्स और टॉप स्पिन पर निर्भर होना पड़ता है। इस बार जोकोविच ने ऐसा ही किया। लाल मिट्टी से तादात्म्य स्थापित किया और बदले में जीत से बेहतर प्रतिदान लाल मिट्टी से और क्या मिल सकता था जो इस बार लाल मिट्टी के दत्तक पुत्र राफा को भी नसीब ना हो सका।



             रोलां गैरों के इस चंचल,गतिमान और कोमल स्वरूप को पहचानना हो तो इसे महिला टेनिस से अधिक अच्छी तरह से समझा जा सकता है। बीते शनिवार को जब चेक गणराज्य की 25 वर्षीय बारबोरा क्रेजीकोवा रूस की वेटेरन 29 साल की पावलिचेंकोवा को 6-1,2-6,6-4 से हरा रहीं थी तो 2017 के बाद से तीसरी अनसीडेड खिलाड़ी थीं जिन्होंने यहां खिताब जीता। यानी महिला वर्ग में भी बड़ा नाम नहीं चलता। इस बार क्वार्टर फाइनल में आठ में से छह खिलाड़ी ऐसी थीं जो पहली बार ग्रैंड स्लैम के क्वार्टर फाइनल में खेल रहीं थी। इन 6 में से ही चार सेमीफाइनल में पहुंची। पिछले 6 बार से जो भी यहां महिला खिलाड़ी चैंपियन बनी वो कोई भी ग्रैंड स्लैम खिताब पहली बार जीत रही थी।

                   दरअसल फ्रेंच ओपन का होस्ट रोलां गैरों बाकी ग्रैंड स्लैम होस्ट की तरह कृत्रिम सतह वाला न होकर प्राकृतिक सतह वाला है। शायद इसीलिए उसकी पसंद अर्जित और कृत्रिम पावर के बजाय स्वाभाविक कोमलता है। ये पावर के रेगिस्तान में कोमलता का नखलिस्तान है जो आपके जुनून और उन्माद की जगह सहज उत्साह और उमंग का संचार करता है।

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नोवाक को 19वां और क्रेजीकोवा को पहला ग्रैंड स्लैम खिताब बहुत मुबारक हो।

Wednesday, 26 May 2021

अकारज_10

 




उस रात छत पर लेटे हुए वो देर तक आसमाँ को देखती रही। फिर सहसा उसने कहा ' कितने सुंदर झिलमिलाते तारे!'

मैंने कहा 'हमारी इच्छाएं। सुंदर तो बहुत हैं पर हाथ नहीं आतीं।'

उसने पूछा 'और ये जुगनू ?

मैंने कहा 'हमारी उम्मीद। हर पल जलती बुझती। जिस पल जले ज़िन्दगी रोशन,जिस पल बुझे ज़िन्दगी अंधेरा।

उसने कहा 'अच्छा छोड़ो। पूर्णिमा का चांद देखो। कितना सुंदर। वो तो चांद ही है ना?

मैंने कहा 'हमारा जीवन। हर रोज घटता जाएगा और फिर अमावस आ जाएगी।'

चारों और सन्नाटा था,हम थे और दो धड़कनें एक साथ कदमताल करते हुए सन्नाटे से लड़ रही थीं।


ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल 2026

एक : फीके फीके से खेल इस बार के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ खेल बहुत फीके फीके से हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया द्वारा मेजबानी...