Saturday, 5 August 2023

पत्थरों में बदलते शहरों की कोमल दास्तां



दरअसल किसी शहर में रहना और किसी शहर में जीना दो मुख्तलिफ बातें हैं। जब आप किसी शहर को जी रहे होते हैं या उसमें जी रहे होते हैं,तो वो शहर अपनी संपूर्णता में आपके भीतर कहीं गहरे पैंठ जाता है। उसकी स्मृतियां आपके भीतर कहीं गहरे धंस जाती हैं। हमेशा के लिए आपके भीतर महफूज़ हो जाती हैं। और जब फिर कभी पलट कर उस शहर को आप देखते हैं,तो वो शहर आपको दिखाई ही नहीं देता। वो इस कदर बदल गया होता है कि पहचान में ही नहीं आता। शहर गतिमान होता है और हमारी स्मृतियां जड़। शहर किसी का इंतज़ार नहीं करता। किसी के लिए रुकता नहीं। शहर स्मृतियों से बहुत आगे निकल जाते हैं।

ये दीगर बात है कि उनकी गति क्या होती है और ये गति उन्हें कहां ले जाती है। अधिकांश शहर कांक्रीट के जंगल के ब्लैक हॉल की तरफ बढ़ गए होते हैं, जिनमें समा कर उन्हें अंततः अपना अस्तित्व ही खो देना है। जाने माने लेखक जितेंद्र भाटिया कुछ ऐसा ही लक्षित करते हैं और अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक 'कांक्रीट के जंगल में गुम होते शहर'में बयां करते हैं।

संभावना प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब में जितेंद्र भाटिया ने कुल पांच शहरों-लाहौर,चेन्नई,जयपुर,मुम्बई और कोलकाता के बारे में लिखा है। ये वो शहर हैं जिनमें वे जिये और जिनको उन्होंने जिया। जिन शहरों ने उन्हें गढ़ा। जिन शहरों में उनके जीवन की निर्मिति हुई।कुल चौदह अध्यायों में फैली पुस्तक के एक-एक अध्याय में चेन्नई और लाहौर, दो अध्याय में जयपुर,चार में मुम्बई और छह अध्यायों में कोलकाता को समाहित किया है। जिस विस्तार से शहरों का वर्णन उन्होंने किया है,उसी क्रम में उनके वर्णन की सांद्रता और संवेदना का विस्तार होता गया है। ज़ाहिर सी बात है कि कोलकाता उनके दिल के सबसे करीब है और इसीलिए सबसे ज़्यादा विस्तार से और सघन संवेदना से उन्होंने कोलकाता का वर्णन किया भी है।

इनमें से लाहौर शहर उनका अनदेखा शहर था जिसे उन्होंने अपने परिवार के बड़ों की आंखों और अनुभवों से देखा था। ये उनके पूर्वजों का शहर था जिसके प्रति वे एक प्रकार के रोमान से भरे हैं और उसी तरह वर्णित करते हैं। चेन्नई में वे कम रहे और वो कम विस्तार भी पाता है। शेष तीन शहर- जयपुर,मुम्बई और कोलकाता उनकी संवेदना से गहरे जुड़े हैं और अपने वर्णन में उतना ही विस्तार पाते हैं।

पर सब शहरों के वर्णन में एक बात कॉमन है,वो है शहर का इतिहास। वे हर शहर की स्थापना से लेकर वर्तमान तक का एक प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करते हैं। वे भले ही विस्तार में नहीं जाते लेकिन उनकी दृष्टि और लेखन बहुत साफ है। मुम्बई और कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर तो उन्होंने बहुत ही शानदार लिखा है। मुम्बई के फ़िल्म इतिहास के एक चैप्टर में मूक फिल्मों तथा दूसरे में बोलती फिल्मों के बारे में बेहतरीन लिखा है और उतना ही बेहतरीन कोलकाता के फ़िल्म इतिहास पर। ऋत्विक घटक,मृणाल सेन और सत्यजीत रे पर उनका लिखा इस किताब का श्रेष्ठ और सबसे सरस हिस्से हैं। 

इस किताब में शहरों का वृतांत भी है,इतिहास भी है और लेखक की आत्मकथा भी। इसमें निबंधों की वैचारिकता भी है और कहानी की किस्सागोई  भी। छोटे फॉन्ट में छपी 332 पृष्ठों की ये पुस्तक पढ़े जाने के लिए खासे समय के निवेश की मांग करती है। पर जितेंद्र भाटिया फिक्शन लेखक हैं। वे किस्सागोई जानते हैं और इसीलिए एक रोचकता पूरे समय बनी रहती है और आप एक सांस में उसे पढ़ भी जाते हैं।

इस पुस्तक में जो कमी लगती है,वो है इसमें शहर के बदलाव को,उनके कांक्रीट के जंगल में तब्दील होने को उस विस्तार से रेखांकित नहीं किया गया है जिस हिसाब से पुस्तक के शीर्षक के अनुरूप होना चाहिए था। ऐसे विवरण विरल है और सांकेतिक है। दूसरे,फ्रूफ की कमी खलती है यहां तक कि कई जगह तो सन भी गलत छपी हैं।

लेकिन कुल मिलकर एक बेहतरीन और पठनीय पुस्तक है। पुस्तक की भूमिका में प्रियंवद लिखते हैं-

               "इस किताब का शीर्षक ही मुनादी करता है कि इस नए और तेजी से बदलते दौर में ये पांच शहर धीरे धीरे अपनी पहचान,अपना इतिहास,अपना पुराना वजूद खो रहे है। कांक्रीट के जंगल इन शहरों की पुरानी इमारतों,खंडहरों,गलियों,बाजारों,थियेटर,सिनेमाहाल को तेजी से निगलकर,प्लाटिक के खिलौनों के घरों की तरह बेजान,यकरंग और बेहिस बना रहे हैं। जिनका आसमान तेजी से छोटा होता जा रहा है।.....एक से दिखते ये शहर किसी मशीन के खाँचे में ढलाई करके निकाले गए उत्पाद की तरह दिखते हैं। इनमें अब पुरानी, कुशादा इमारतें,चौड़ा,बड़ा नीला आकाश, मृत्यु का खामोश गीत गाते कब्रिस्तान,नदी के सुकून,चांदनी रातों और सुनहरी धूपों के वितान नहीं दिखते छत,मुंडेर,बरामदा,आँगन,दुछत्ती,जाल,गोलंबर,कोठा,जीना नहीं दिखता।"

दरअसल विकास की अंधी दौड़ से मरते शहर,कोमल सौंदर्य से पत्थर में तब्दील होते शहर का जो दुःख-दर्द जितेंद्र भाटिया का है,वोही प्रियंवद का है, और वो ही शहर में जीने वाले लाखों संवेदनशील आम लोगों का है, जिसको जितेंद्र भाटिया अपनी किताब में रच रहे होते हैं।

Sunday, 30 July 2023

हरजीत सिंह:मुझसे फिर मिल

 



         हर शहर का एक साहित्यिक आभामंडल होता है। उस आभामंडल में तमाम सितारे होते हैं जो आंखों को चकाचौंध से भर देते हैं। लेकिन जब आप उस चकाचौंध को पार कर कुछ गहरे जाते हैं तो कुछ मद्धिम शीतल प्रकाश लिए ऐसे सितारे होते हैं जो आत्मा को दीप्त कर देते है। विस्मय से भर देते हैं। प्रेम और करुणा से सराबोर कर देते हैं

  देहरादून की अदबी जमात के प्रमुख सितारों की चकाचोंध  के पार भी दो ऐसे ही  सितारों का एक युग्म है जिसका प्रकाश आंखों को नहीं बल्कि दिल को प्रकाशमान करता है। ये युग्म  अवधेश और हरजीत का है। 

देहरादूनी अदबी जमात की हंसी के बीच किसी बच्चे की किलकारी गर आपको सुनाई दे तो आप समझ जाइए ये हरजीत है। उस जमात से कोई संगीत की उदास सी धुन सुनाई दे तो समझ लीजिए ये हरजीत है। उस जमात की सदा में कोई सदा दोस्त की सी लगे तो समझो वो हरजीत है।

कोई भी शास्त्रीय  गायन तानपुरे के बिना कहां पूरा होता है। कितना ही सिद्धहस्त गायक क्यों ना हो। तानपुरा गायक को वे अवकाश देता है जो उसकी लय को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी होते हैं। वो गैप्स को,अंतरालों को भरता है। वो बिना लाइमलाइट में आए महत्वपूर्ण काम करता है। दरअसल हरजीत देहरादून के साहित्यिक जमात के संगीत का तानपुरा है।

हरजीत की कहानी आपको विस्मित भी करती है और करुणा से भर देती है। पेशे से  बढ़ईगिरी करने वाला ये शायर बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। अभावों के बीच भी वो उम्दा शेर कहता,खूबसूरत कैलीग्राफी करता, बेहतरीन कोलाज बनाता,कमाल की फोटोग्राफी करता। वो शास्त्रीय संगीता का दीवाना था और फक्कड़ यायावर। जितना अधिक भटकाव उसके स्वभाव में था, उसकी शायरी उतनी ही सधी हुई थी।


हम जानते हैं भारतीय किस कदर उत्सवधर्मी होते हैं। अभावों से उपजा दुख इस कदर उनकी रगों में बहता है कि वे दुखों को भी सेलिब्रेट करने लग जाते हैं। क्या वजह है कि उजली पूर्णिमा के साथ अंधेरी अमावस्या का भी उसी उत्साह से उत्सव मनाते हैं। हरजीत भी ऐसा ही था। दुनियादारी के पेचोखम से नावाफ़िक वो अपने अभावों का सुखों की तरह ही उत्सव मनाता। टूटी छत से चिड़िया को घर के अंदर आते देख वो कहता है-


"आई चिड़िया तो मैंने जाना/

मेरे कमरे में आसमान भी था"। 


इससे ज़्यादा आशा और उम्मीदों से भरा हरजीत के अलावा कौन हो सकता था।

उसके भीतर एक बच्चे सा साफ शफ्फाक मन वास करता। तभी तो वो कठोर काष्ठ को सजीव खिलौनों का रूप दे देता। वो कहता-


"गेंद, गोली,गुलेल के दिन थे/

दिन अगर थे तो खेल के दिन थे"।


वो प्रेम से भरा रहता। जब वो प्रेम से उमगता तो कहता- 


"हम तुझे इतना प्यार करते हैं/

हम तेरी फ़िक्र ही नहीं करते"


उसे साथ पसंद था। दोस्ती पसंद थी। जिसको उसकी दोस्ती नसीब हुई वो कितने खुशकिस्मत थे। वो एक जगह लिखता है-


"आप हमसे मिलें तो ज़मी पर मिलें

ये तकल्लुफ़ की दुनिया मचानों की है"


एक ऐसा ही दोस्त है नवीन कुमार नैथानी। वो युग्म में एक तीसरा आयाम जोड़ता है। वो अवधेश और हरजीत के साथ मिलकर दोस्ती की त्रयी बनाता है। कभी उससे मिलिए और हरजीत का ज़िक्र भर कर दीजिए। उसकी आंखों में हर्ष और विषाद एक साथ उतर आते हैं। वो किस्सों पर किस्से कहे जाता है। वो बताता है हरजीत विचारधाराओं के पचड़े में कभी नहीं पड़ा। एक बार जब उसकी ग़ज़लों को वाम सिद्ध किया जाने लगा तो उसने अपनी वही रचनाएं धर्मयुग में छपवाकर उसका प्रतिवाद किया। 

अगर हरजीत की दोस्ती के चलते उसके दोस्त खुशनसीब थे तो हरजीत भी कम खुशनसीब कहां था। उसे ऐसे दोस्त मिले जो उसके जाने के बाद भी उसे हमेशा दिल में बसाए हैं। उनकी एक दोस्त हैं तेजी ग्रोवर। उन्होंने हरजीत के सारे दोस्तों को,उसके चाहने वालों को एकत्रित किया। फिर उन सबसे हरजीत की यादों को, उसके लिखे को बटोर कर एक किताब की शक्ल दे दी।  नाम है 'मुझसे फिर मिल'।

दरअसल ये हरजीत को उसके चाहने वालों से,नए पाठकों से और दुनिया जहान से मिलवाने का सच्चा सा उपक्रम है। उसकी यादों को जिलाए रखने का एक बेहद संजीदा प्रयास है।

इसमें हरजीत के दो पूर्व प्रकाशित संग्रह 'ये पेड़ हरे हैं' और 'एक पुल' के अलावा एक अप्रकाशित संग्रह 'खेल' और तमाम अप्रकाशित गज़लें शामिल की गई। इसके अलावा उनके कई दोस्तों व अन्य लोगों के हरजीत के बारे आत्मीय उद्गार हैं और दो आलेख भी। 

इनमें से एक शानदार संस्मरणात्मक आलेख सुप्रसिद्द चित्रकार लेखक जगजीत निशात का है 'हरजीत और उसका 'हरजीत' बनना'। इसमें निशात हरजीत को हरजीत बनाने के प्रक्रिया की पड़ताल ही नहीं करते बल्कि देहरादून के उसके समकालीन सांस्कृतिक माहौल को भी बखूबी उद्घाटित करते चलते हैं। 

एक और संस्मरणात्मक आलेख ज्ञान प्रकाश विवेक का है। ये आलेख बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। वे लिखते हैं- 'हरजीत से मिलना किसी बहुत अच्छे मौसम से मिलने जैसा था.वह खुद किसी पेड़ जैसा था-किसी दरख़्त जैसा..... एक ऐसा दरख़्त,जिसके पत्तों पर आसमान आराम कर रहा हो,जिसकी शाखों में ज़िंदगी के संघर्ष  जुड़े हों और जड़ों में कई जोड़ी पांव हों जो उसमें आवारगी और घुमक्कड़ी का अहसास पैदा करते हों.... उसमें बेचैनियों की खुशबू थी,जज़्बात की तरलता थी। उसे अपने सबसे विकट समय में भी मुस्कुराते देखना चकित करता था"। 

वो अपने समय का बेहतरीन ग़ज़लकार था जो बेहद संवेदनशील और संवेगों से भरा था और ग़ज़ल के क्षेत्र में नया मुहावरा गढ़ रहा था। ज्ञान प्रकाश आगे लिखते हैं "हिंदी ग़ज़ल  के कूड़े में अपनी अलग पहचान कराने वाला संवेदनशील,मैच्योर और समझदार ग़ज़लकार था।"

हरजीत का प्रकृति से अद्भुत जुड़ाव था। उसके पहले ही संग्रह का नाम 'ये हरे पेड़ हैं' है। वो लिखता है-


"कश्तियाँ डूब भी जाएं तो मरने वालों में

होश जब तक रहे साहिल का गुमाँ रहता है

ये हरे पेड़ हैं इनको ना जलाओ लोगों

इनके जलाने से बहुत रोज़ धुंआ रहता है"


एक जगह वो लिखता है-


"हरी ज़मीन पे तूने इमारतें बो दी

मिलेगी ताज़ा हवा पत्थरों में कहाँ"


या फिर


"ज़िंदा चेहरे भी बदल जाते हैं तस्वीरों में

पेड़ मरते हैं तो ढल जाते हैं शहतीरों में"


और फिर ऐसे हरे पेड़ के शैदाई को प्रकाशन संस्थान  संभावना प्रकाशन की इससे खूबसूरत श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि इस किताब को छापने में उसने पेड़ों को नष्ट नहीं किया। किताब को गन्ने की खोई से बने कागज़ पर छापा।

अब देहरादून में महसूस होने वाला सबसे बड़ा मलाल और कमी उस महबूब शायर से ना मिल पाना है। लेकिन आप उसे यहां महसूस कर सकते हैं। यहां के साहित्यिक माहौल में वो एक अहसास सा उपस्थित रहता है।

 और ये भी कि मेरे तईं देहरादून की तमाम पहचानों में एक बड़ी पहचान हरजीत भी है। उसको जानने के बाद जब भी देहरादून जाएंगे उसकी याद तो आएगी ही और होठों बरबस गुनगुना उठेंगे कि-


"ढूंढते फिरते हैं हम उस शख़्स का पता

जिससे हों इस शहर के माहौल की बातें बहुत।"


और

और हरजीत आपके कानों में आकर चुपके से कहेगा -


"सोचता हूँ कहां गए वो दोनों

मेरी साइकिल वो मेरा देहरादून"




Thursday, 20 July 2023

टेनिस:एक युग का अवसान/एक युग का आगाज़



              बात 2022 की लाल मिट्टी पर खेली जाने वाली मेड्रिड ओपन प्रतियोगिता की है। इसमें एक 19 साल का नौजवान जर्मनी के एलेक्जेंडर ज्वेरेव को हराकर प्रतियोगिता जीत रहा था। क्वार्टर फाइनल में उसने राफेल नडाल को और सेमीफाइनल में नोवाक जोकोविच को हराया था।

 टेनिस इतिहास में इससे ख़ूबसूरत और क्या हो सकता था कि एक टीनएजर राफा और नोवाक को हराकर ये प्रतियोगिता जीत रहा था।

ये टीनएजर कोई और नहीं स्पेन का कार्लोस अलकराज था।

दरअसल ये जीत एक नए उगते सूरज की मानिंद थी। जिसका नरम मुलायम प्रकाश बरगद के पेड़ों की घनी छाया को चीरकर टेनिस के नए भविष्य का संकेत दे रहा था। वो टीनएजर बता रहा था कि वो एक ऐसा महत्वाकांक्षी और सक्षम बिरवा है कि वट वृक्ष सरीखे नोवाक और राफा के अनुभव और काबिलियत की सघन छाया के नीचे भी सरवाइव कर सकता है। 

उसके चार महीने बाद फ्लशिंग मीडोज के आर्थर ऐश स्टेडियम पर कैस्पर रड को हराकर अपना पहला यूएन ओपन ग्रैंड स्लैम जीतकर वो टीनएजर अपने पॉइंट को प्रूव कर रहा था। पूरा स्टेडियम 'ओले ओले ओले कार्लोस' से गूंज रहा था। ये टेनिस का भविष्य का थीम सांग बनने जा रहा था।

और विंबलडन तक आते आते उस बिरवे का कद काफी बढ़ गया था। अब वो अपना आकार बनाने लगा था। उसकी जड़ें ज़मीन में कुछ और गहरे धंस रहीं थीं। सुबह का नरम मुलायम सूरज आसमान में और ऊपर हो आया था। उसका प्रकाश अब इतना तेज हो गया था कि दुनिया की आंखे चौंधियाने लगी थीं।

विम्बलडन 2023 का फाइनल उम्मीद के अनुरूप   नोवाक और उस अलकराज के बीच ही खेला ही गया। 

ये मैच केवल एक फाइनल मैच भर नहीं था,बल्कि ये विरुद्धों का द्वंद था। ये दो अलग व्यक्तित्व,दो अलग खेल शैलियों,दो अलग समयों के बीच का द्वंद्व भी था। यहां अनुभव जोश के मुकाबिल था। नया पुराने के सामने था। ये अपने अपने अस्तित्व की रक्षा का मसला था। पुराना अपनी जड़ें और मजबूती से जमाए रखने की कोशिश में था और नया था कि पुराने को उखाड़ फेंकना चाहता  था।

मैदान पर पहले नंबर दो नोवाक आए और उनके पीछे नंबर एक अलकराज। 35 साल के नोवाक का अनुभवी चेहरा बाल सुलभ मुस्कुराहट से चमक रहा था,तो बीस साल के युवा अलकराज का बालसुलभ चेहरा विश्वास और गंभीरता से प्रदीप्त था। 

नोवाक साल की पहली दो ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता जीतकर यहां आए थे।उनके हिस्से अब तक कुल 23 ग्रैंड स्लैम आ चुकी थीं। ये उनकी सबसे प्रिय और अनुकूल सतह थी। वे अनुभव का टोकरा अपने साथ लिए थे। वे यहां 07 बार जीत चुके थे। इसके विपरीत अलकराज की ये पसंदीदा सतह नहीं थी। लेकिन वे नंबर एक टेनिस खिलाड़ी का तमगा अपने सीने से लगाए थे। जोश उनमें हिलोरें ले रहा था और प्रतिभा उनमें कूट कूट कर भरी थी।

मुकाबला शुरू हुआ। नोवाक ने शानदार शुरुआत की। पहला सेट 6-1 से अपने नाम किया। लगा ये मैच नोवाक के लिए 'केक वॉक' होने जा रहा है। वे संख्या 24 की तरफ दौड़ते दिखे। लेकिन कार्लोस की यही काबिलियत है कि वे कोई भी दबाव अपने ऊपर बनने नहीं देते। फिर चाहे ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने का दबाव हो या सामने नोवाक सरीखा कोई लीजेंड हो। अगले सेट में ज़ोरदार संघर्ष हुआ। टाईब्रेक अंततः अलकराज ने  8-6 से जीत लिया। अब मैच में जान आ गयी थी। नोवाक यहां थोड़े थके दिखे और अगला सेट वे आसानी  से 1-6 से हार गए। अब लगा कि मैच एकतरफा कार्लोस के पक्ष में हो चला है। तभी नोवाक अपनी फॉर्म में लौट आए और अगला सेट 6-3 से जीत कर मैच अत्यधिक रोमांचक बना दिया। अंतिम और निर्णायक सेट में नोवाक के दूसरे सर्विस गेम में कार्लोस ने नोवाक की सर्विस ब्रेक की। गुस्से में  आकर नोवाक ने नेट पोल पर मारकर अपना रैकेट तोड़ दिया। दरअसल नोवाक उसी समय हार गए थे। ये उनकी निराशा थी। मन ही मन हार जाने का संकेत। वही हुआ भी। अलकराज ने अंततः सेट 6-4 से जीतकर कैरियर का दूसरा ग्रैंड स्लैम अपने नाम कर लिया।

ये फाइनल कितना संघर्षपूर्ण और इंटेंस था,इसे इस बात से समझा जा सकता है कि तीसरे सेट का चौथा गेम लगभग 26 मिनट चला जिसमें कुल 13 ड्यूस हुए और 32 पॉइंट बने। नोवाक की सर्विस गेम को अलकराज ने जीता। ये मैच लगभग 5 घंटे तक चला। नोवाक के 166 के मुकाबले अलकराज ने कुल 168 अंक जीते। इस बात से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मैच कितना करीबी था और संघर्षपूर्ण भी।

इस मैच में शानदार टेनिस खेला गया। बुलेट की तेजी सी सर्विस,शानदार ग्राउंड स्ट्रोक्, एंगुलर फोरहैंड स्ट्रोक्स,वॉली,ड्राप शॉट्स,बैक हैंड स्लैश,क्या कुछ नहीं था इस मैच में।

ये एक ऐसा मैच था जिसे दो पीढ़ियों की टकराहट के सबसे शानदार उदाहरण के रूप में हमेशा याद रखा जाएगा।

2003 से लेकर 2022 तक के 20 साल के सफर में विम्बलडन का खिताब 'फेबुलस फोर' के अलावा कोई और नहीं जीत सका था। ये अलकराज ही हैं जिसने 20 सालों के 'फेबुलस फोर'के विम्बलडन पर उनके वर्चस्व को समाप्त किया। 

जो भी हो जोकोविच अपनी हार में भी ग्रेसफुल थे। उन्होंने मैच पश्चात ऑन कोर्ट इंटरव्यू में अलकराज की खूब तारीफ की। उन्होंने कहा 20 साल की उम्र में दबाव झेलने की उनकी ताकत सराहनीय है। और क्रोशियन कोच इवान लूबिसिक की उस बात की ताईद भी की कि अलकराज में स्वयं उनके यानी नोवाक,फेडरर और राफा की खूबियों का मिश्रण है।

 पिछले सालों में 'फेबुलस फोर' ने, या कहें कि 'बिग थ्री' ने इतनी शानदार टेनिस  खेली  कि उन्होंने ज्वेरेव, सितसिपास,थिएम,मेदवेदेव जैसे खिलाड़ियों की पूरी एक पीढ़ी को लगभग खत्म कर दिया। उन्हें अपनी छाया से बाहर आने ही नहीं दिया। लेकिन उसके बाद की पीढ़ी के खिलाड़ियों-कैस्पर रड,रुन, बेरेटिनी,आगर अलिसिमे  से पार पा पाना मुश्किल होगा। हालांकि अभी भी नोवाक की फिटनेस शानदार है। उनमें बहुत टेनिस बाकी है। उन्हें अभी खारिज़ कतई नहीं किया जा सकता।

ये अलकराज की स्वप्न सरीखी यात्रा पूरी दुनिया अपनी खुली आँखों से देख रही है। ऐसी ना जाने कितनी स्वप्निल सफलताएं अभी उनके हाथ आने वाली हैं ये तो भविष्य ही बताएगा।

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अभी तो बस कार्लोस अलकराज को उनके दूसरे ग्रैंड स्लैम की बधाई।


Thursday, 6 July 2023

अकारज_19

 


उस दिन किशोर प्रेमी युगल को देखते हुए उसने कहा 'आजकल का प्रेम भी कोई प्रेम होता है! आज प्रेम,कल ब्रेकअप। प्रेम तो हमारे ज़माने में होता था।'

मैंने उसकी ओर शरारत भरी दृष्टि से देखा और पूछा 'तुम्हारा ज़माना!'

उसने भी शरारतन कहा 'हाँ, तुम्हारे बैलगाड़ी वाले समय के बाद साइकिल वाला ज़माना।'

मेरे ओंठ मुस्कुराहट से फैल गए। मैंने फिर पूछा 'और कैसा था वो तुम्हारा साइकल वाला ज़माना!'

'हमारा ज़माना आज के मल्टीप्लेक्स,मोबाइल,ओटीटी,बाइक वाला फटाफट इंस्टा ज़माना थोड़े ही ना था। वो तो रेडियो वाला 'हौले हौले चलो रे बालमा' वाला ज़माना था।' कहते कहते उसकी आवाज़ अतीत में धंस गईं और आंखें यादों से चमक उठीं।

उसकी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं खुद अतीत में गहरे उतर आया था। मैंने कहा 'यानि तुम्हारे  समय का प्रेम धीमे धीमे सींझते हुए परिपक्व होता था। जैसे गांवों में हारे पर धीमी धीमी आंच में पकती दाल या औटता हुआ दूध।'

उसने उत्साह से भरते हुए कहा 'और क्या ! तब प्रेम खतो-किताबत से धीमे धीमे परवान चढ़ता था। क्या समय हुआ करता था वो भी। क्या प्रेम पत्र लिखे जाते थे उन दिनों। दरअसल वो समय ही 'प्रेम पत्रों' का समय था।'

फिर उसने बाल सुलभ उत्सुकता से पूछा 'तुम्हें याद है तुमने अपने पहले पत्र में क्या लिखा था?'

अब यादें अतीत के गलियारे तय करने लगीं। और फिर यादों ने उन शब्दों को अतीत की भूलभुलैया से ढूंढ निकाला। मैंने कहा 'हां वो एक लाइन की पाती थी- 'लिखे जो खत तुझे'

उसने खिलखिलाकर कहा 'और उसके बाद तुम तीन दिन कॉलेज नहीं आए थे।'

मैंने ठहाका लगाया 'तुम्हारी याददाश्त कमाल है।'

'और तुम्हें वो वाली चिठ्ठी भी याद है ना जो तुमने घर जाते हुए लिखी थी।' उसने फिर पूछा।

यादें एक बार फिर छटपटाईं और स्थिर हो गईं। मैंने मुस्कुराते हुए कहा 'वो भी वन लाइनर ही था कि 'तुम भी खत लिखना'।'

अब शरारत उसकी आँखों से उतर कर उसके ओंठों पर ठहर गई। उसने शोखी से पूछा - 'तो खत आया क्या!' इसमें  सवाल कम उत्तर अधिक था।

मैंने कहा 'हां उसमें बस इतना ही लिखा था- 'इन दिनों यहां बादल खूब बरस रहे हैं। और आंखें भी।'

वो फिर अतीत में डूब गई। एक बार प्रेम फिर आंखों से बरसने लगा। वो प्रेम की नमी से गल चुकी थी। 'तो तुमने जवाब भेजा!' उसने तरल हुई रेशम सी आवाज़ में पूछा।

 मैंने यादों के हवाले से कहा 'केवल एक शब्द लिखा था '....तुम्हारा'

वो जवाब सुन खिलखिला उठी कि पास के खिले फूलों का रंग कुछ और गहरा हो उठा। पत्तियां कुछ और हरी हो गईं। चिड़िया कुछ और चहक उठीं। घास के तिनको पर ठहरी ओस की बूंदें उसकी ऊष्मा से सुध बुध खोकर अपना अस्तित्व ही खो बैठी। सूरज कुछ और तेजस्वी हो उठा और सुबह कुछ और जवान। 

उसके स्वर में बरसों से ठहरी जिज्ञासा मुखर हो आई - 'ये तुम्हारे 'प्रेम पत्र' वन लाइनर क्यूं होते थे।'

'उन दिनों मौन अधिक वाचाल जो होता था।अनलिखा ही सब कह जो देता था।' मैंने  हँसते हुए कहा।

°°°°°°

अब पूछने को कुछ बाकी रहा भी हो तो पूछा ना गया। शब्दों ने मौन जो धारण कर लिया था। 

 मौन के बीच एक धड़कता दिल 'पाती' हुआ जाता था, दूसरा 'कलम'। कलम से शब्द शब्द प्रेम पाती पर रिसता जाता।

उधर मौन था कि 'कलम' से लिखी जा रही इस 'प्रेम पाती' को बांच रहा था। 

और 

और यादों की आंख से निकले आंसू थे कि अतीत की पीठ को भिगो भिगो जाते थे।



Wednesday, 14 June 2023

मैनचेस्टर डर्बी और सिटी का डबल



              बात सन् 1764-65 की है. जेम्स हरग्रीव्ज़ ने ‘स्पिनिंग जेनी’ नाम के एक जादुई यंत्र का आविष्कार किया. 18वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में पूरे यूरोप और विश्व में सूती कपड़े की मांग ज़ोर पकड़ रही थी. उस समय केवल आठ हज़ार की आबादी वाला इंग्लैंड का एक क़स्बानुमा शहर मैनचेस्टर सूती कपड़ों के उत्पादन का केंद्र बनने की कोशिश में था. वहां के बुनकर हस्तचालित पुराने हथकरघों से उस बढ़ती मांग को पूरा करने में ख़ुद को असमर्थ पा रहे थे. ऐसे में ‘जेनी’ ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी.

    हरग्रीव्ज़ की जेनी में आठ स्पांडल थे. यानी अब पहले जितने समय में आठ गुना सूत काता जा सकता था. इसने वहां टेक्सटाइल कारख़ानों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया. देखते ही देखते वहां बड़ी संख्या में सूती कपड़ों के कारख़ाने लग गए. उसके साथ ही कपड़ों को रंगने और ब्लीच करने के लिए ज़रूरी केमिकल्स की मांग बढ़ने से केमिकल फ़ैक्ट्री भी लगने लगीं और उन कारख़ानों के लिए आवश्यक संयंत्र बनाने के कारख़ाने भी स्थापित हुए. कच्चे माल के लाने के लिए परिवहन नहर प्रणाली का विकास हुआ और पहली रेल लाइन की स्थापना भी यहीं हुई.

    अब देश के कोने-कोने से लोग बड़ी संख्या में कारख़ानों में काम पाने के लिए मैनचेस्टर आने लगे.

    19वीं शताब्दी के शुरू होते होते मैनचेस्टर औद्योगिक क्रांति का प्रमुख केंद्र बन गया और इंग्लैंड के सबसे बड़े तीन शहरों में एक. अब उसकी आबादी तीन लाख से ऊपर हो चुकी थी. इसमें ज़्यादातर मजदूर थे जिन्हें बारह घंटों से भी अधिक समय तक कारख़ानों में काम करना पड़ता था और कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन. ऐसे में उनके मनोरंजन के साधनों की ज़रूरत महसूस होने लगी. इससे अनेक खेलों के आयोजनों की शुरुआत हुई, जिसमें घुड़सवारी से लेकर फ़ुटबॉल तक शामिल थे.

    मजदूरों के बीच फ़ुटबॉल तेजी से लोकप्रिय होने लगा. और देखते ही देखते वहां कई फ़ुटबॉल क्लब बन गए. इनमें से दो क्लब ऐसे थे, जिन्हें आगे चलकर न केवल विश्व प्रसिद्ध फ़ुटबॉल क्लबों में तब्दील हो जाना था बल्कि प्रसिद्ध खेल प्रतिद्वंद्विता में भी बदल जाना था, जिसे ‘मैनचेस्टर डर्बी’ के नाम से जाना जाना था.

   सन् 1878 में लंकाशायर व यॉर्कशायर रेलवे के मज़दूरों ने ‘न्यूटन हीथ एलवाईआर फ़ुटबॉल क्लब’ बनाया. 1892-93 में एक स्वतंत्र कंपनी बन जाने के कारण नाम से एलवाईआर शब्द हटा दिया गया. सन् 1902 तक आते आते क्लब का घाटा बहुत बढ़ गया और इसको बंद करने की नौबत आ गई. उस समय चार स्थानीय व्यापारियों ने इसमें निवेश किया और आधिकारिक रूप से इसका नाम ‘मैनचेस्टर यूनाइटेड फ़ुटबॉल क्लब’ पड़ा.

    उधर सन् 1880 में एक अन्य फ़ुटबॉल क्लब ‘सेंट मार्क्स’ (वेस्ट गोर्टन) की स्थापना हुई. सन् 1887 में इसका नाम ‘ऑर्डिक एसोसिएशन फ़ुटबॉल क्लब’ हो गया. और फिर 16 अप्रैल 1894 को ये क्लब ‘मैनचेस्टर सिटी फ़ुटबॉल क्लब ‘ नाम से जाना जाने लगा.

    इन दोनों टीमों के बीच पहला मुक़ाबला 1881 में हुआ, जिसमें न्यूटन हीथ ने सेंट मार्क्स की टीम को 3-0 से हरा दिया. ये एक दोस्ताना मैच था और प्रतिद्वंद्विता जैसी कोई बात न थी. लेकिन इसी दशक में दोनों टीमों ने प्रगति करना शुरू किया और मैनचेस्टर क्षेत्र की दो सर्वश्रेष्ठ टीमें बन गईं. इनमें से ही कोई एक टीम मैनचेस्टर कप जीतती. यहां से दोनों टीमों में श्रेष्ठता के लिए प्रतिद्वंद्विता स्थापित हो गई. और दोनों टीमों के बीच मुकाबले ‘मैनचेस्टर डर्बी’ के नाम से जाने जाने लगे. समय के साथ-साथ यह प्रतिद्वंद्विता सघन और तीव्र होती गई और विश्व भर में खेलों की और विशेषकर फ़ुटबॉल की सबसे प्रसिद्ध खेल प्रतिद्वंद्विताओं में शुमार हो गई.

    ऐसी प्रतिद्वंद्विताएं कभी भी एकतरफ़ा कहां हो पाती हैं. पलड़ा कभी इस ओर झुक जाता तो कभी उस ओर. पर कुल मिलाकर मैनचेस्टर डर्बी में रेड डेविल्स यानी यूनाइटेड का पलड़ा भारी रहा. डर्बी में अब तक कुल 190 मुकाबलों में से 78 यूनाइटेड ने और 59 सिटी ने जीते. शेष 53 मुकाबले अनिर्णीत रहे. इस दौरान यूनाइटेड ने 67 खिताब जीते तो सिटी ने 31 खिताब.

    लेकिन 2023 का साल मानो इस प्रतिद्वंद्विता का निर्णायक साल था. 142 साल पुरानी प्रतिद्वंद्विता का चर्मोत्कर्ष था. लेकिन ये साल सिटी की बुलंदियों का भी साल है.

    इंग्लैंड की सबसे प्रतिष्ठित फ़ुटबॉल प्रतियोगिताओं में एफए कप शुमार है, जो विश्व की सबसे पुरानी प्रतियोगिता है. इस प्रतियोगिता के 142 साल के इतिहास में पहली बार फ़ाइनल में मैनचेस्टर की ये दो टीमें आमने-सामने थीं. ये मैनचेस्टर डर्बी का महामुक़ाबला था. मानो ये एफए कप का फाइनल न होकर, डर्बी फ़ाइनल हो.

    यह मैच 03 जून को लंदन के वेम्बले स्टेडियम में खेला गया.

    सुप्रसिद्ध मैनेजर पेप गोर्डियाला के निर्देशन और जर्मन मिडफ़ील्डर इल्के गुंडोगन के नेतृत्व में जब सिटी की टीम हरी घास पर अपनी पारंपरिक आसमानी रंग की जर्सी में मैदान पर उतरी तो इस साल की प्रीमियर लीग की जीत के गर्व से आसमान से ऊंचे उनके सिर थे और किसी महासमुद्र से संतुष्ट और शांत प्रतीत होते थे. यह और बात है उनके सीने में प्रतिद्वंद्वियों को हराने के लिए ज़ज्बात की एक सुनामी थी.

    दूसरी और मैनेजर एरिक तेन हाग के निर्देशन में और पुर्तगाली अटैकिंग मिडफ़ील्डर ब्रूनो फ़र्नांडीज के नेतृत्व में यूनाइटेड की टीम इतिहास के अपने पक्ष में होने के गौरव की रक्तिम आभा लिए और फ़रवरी में ही ईएफएल में जीत की अग्नि से दावानल हुए प्रतिद्वंद्वी टीम को भस्म कर देने की मुद्रा में थी.

    ये आसमानी रंग के हरहराते महासागर और लाल रंग की लपलपाती दावानाल के बीच का मुकाबला जो था.

    मैच शुरू हुआ. सिटी के कप्तान गुंडोगन ने किक ऑफ़ किया. गेंद गोलकीपर के पास पहुंची. उसने जोरदार किक से बॉल को यूनाइटेड के पेनाल्टी एरिया के पास पहुंचा दिया. एक हैडर से बॉल गुंडोगन के पास पहुँची और उसने शानदार वॉली से गैंद गोल में पहुंचा दी. अभी मैच शुरु हुए केवल 13 सेकंड हुए थे. ये एफए कप फ़ाइनल का सबसे तेज गोल था.

    सिटी ने 1-0 की बढ़त ले ली थी. लगा मानो स्टेडियम में आसमानी समुद्र गर्जना कर रहा था और दहकती दावानल निस्तेज हुई जाती थी. हालांकि दावानल निस्तेज भले ही हो गई हो, पर अभी भी बहुत आग उसमें बाक़ी थी.

     इधर सिटी ने मोमेंटम बनाए रखा. जल्दी ही उसने गोल करने के दो और मौक़े बनाए. पहले ब्रुएने के फ्री किक पर रोडरी ने हैडर बाहर मार दिया. उसके तुरंत बाद हालैंड ने मौक़ा गंवाया. इधर यूनाइटेड ने गेंद पर नियंत्रण बढ़ाकर दबाव बनाना शुरू किया. एक के बाद एक कई आक्रमण किए. इसका प्रतिफल उन्हें पेनाल्टी के रूप में मिला. हालांकि ये पेनाल्टी वीएआर से मिली. कप्तान फ़र्नांडीज ने बराबरी का गोल दाग दिया. ये गोल 33वें मिनट में आया.

    दूसरे हाफ़ में 51 वें मिनट में ब्रुएने का फ्री किक एक बार फिर गुंडोगन को पेनाल्टी एरिया में मिला और एक बार फिर वॉली पर गोल कर सिटी को फिर बढ़त दिला दी. इसके बाद दोनों ही टीमों ने मूव बनाए और गोल के मौक़े भी. लेकिन अंततः मैच 2-1 से सिटी ने जीत लिया.

    मैनचेस्टर सिटी ने प्रीमियर लीग के बाद एफए कप जीत कर अपना डबल पूरा किया. ऐसा उसने दूसरी बार किया. इससे पहले ये कारनामा 2018-19 में किया था. जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी ये कारनामा तीन बार 1993-94, 1995-96 और 1998-99 में किया था.

    मैनचेस्टर डर्बी में इस बार बाज़ी सिटी के हाथ रही. लेकिन इससे बड़ी प्रतिष्ठा अभी भी दांव पर है. इस शनिवार यूएफा कप चैपियनशिप के फ़ाइनल में उसका मुक़ाबला इंटर मिलान से है. सवाल ये है कि क्या ये फ़ाइनल जीतकर सिटी अपना ट्रिपल पूरा कर पाएगी या नहीं.

    अभी तक विश्व के कुल 21 क्लब ने 29 बार ट्रिपल पूरा किया है. पर इंग्लैंड की केवल एक टीम है, जिसने ये किया है और वो सिटी की डर्बी प्रतिद्वंद्वी यूनाइटेड है जिसने 1998-99 में ये ट्रिपल किया था.

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    सिटी की बारी है. ये शनिवार और रविवार के बीच की जो रात है न, कम रोमांचक नहीं होने जा रही है.

याद रखिएगा!


लाजवाब जोकोविच

 


मानवीय क्षमताएं असीमित हैं। इस हद तक कि जो चीजें किसी समय अकल्पनीय लगती हैं,आगे चलकर वे यथार्थ में तब्दील हो जाती हैं। मानव ने अपने विकास क्रम में ये बात अलग अलग समय पर अलग अलग क्षेत्रों में बार बार सिद्ध की है।

 ऐसा भी होता है कि मानव की बहुत सी उपलब्धियां इस हद तक अविश्वसनीय होती हैं कि तर्कातीत हो जाती हैं। हम उनमें तब देवत्व का आरोपण कर देते हैं। 

और खेल भी इससे अछूते कहाँ रह पाते हैं। जब सचिन या पेले या माराडोना या मेस्सी या शुमाकर या माइकेल जॉर्डन या लेब्रों जेम्स या मोहम्मद अली जैसे खिलाड़ी खेलों में मानवीय क्षमताओं के तर्कातीत मानक स्थापित करते हैं तो उन्हें भगवान का दर्ज़ा दे दिया जाता है। 

बीते रविवार फिलिप कार्टियर अरीना पर 36 साल के नोवाक जोकोविच फ्रेंच ओपन के फाइनल में कैस्पर रड को 7-6(7-1),6-3,7-5 से हराकर जब अपना 23वां ग्रैंड स्लैम जीत रहे थे तो कुछ ऐसा ही अविश्वसनीय कर रहे थे। कि उस उपलब्धि को बयां करने के लिए कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं हो सकता था। उसके लिए कोई तर्क प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था। 

नोवाक अपने प्रतिद्वंदी राफा के 22 ग्रैंड स्लैम से  एक खिताब अधिक जीत रहे थे,तो राफा नोवाक को बधाई देते हुए ट्वीट कर कह रहे थे  "23 एक नंबर है जिसके बारे में कुछ समय पहले तक सोचना भी असंभव था, तुमने इसे कर दिखाया।"

निःसंदेह वे कुछ असंभव ही कर रहे थे। कुछ समय पहले तक के अकल्पनीय को हकीकत में तब्दील कर रहे थे।  वे टेनिस ही नहीं,पूरे खेल इतिहास का पुनर्लेखन कर रहे थे। एक खिलाड़ी की क्षमताओं की नई परिभाषा गढ़ रहे थे जिसका एक छोर असंभव और अविश्वसनीय शब्दों को छूता है।

याद कीजिए 2002 का यूएस ओपन। आंद्रे अगासी को हराकर पीट सम्प्रास अपना 14वां ग्रैंड स्लैम जीत रहे थे, तो टेनिस के जानकार और प्रसंशक विस्मय से भर उठे थे। वे कह रहे थे इससे अब कौन पार पाएगा। तब रोज़र फ़ेडरर आए। उन्होंने पहले 14 की बराबरी की और 20 पर जाकर रुके। लोगों को लगा ये असंभव है और तब राफा आए। 22 पर रुके। लगा ये संख्या असंभव है। लेकिन जो 22 को असंभव मान रहे थे वे एक भूल कर रहे थे। वे नोवाक को या तो विस्मृत कर रहे थे या खारिज़। और तब नोवाक आए। हां उनके आगे कौन पर लगा प्रश्रचिन्ह असीमित समय तक लगा रह सकता है,ये यकीन मानिए।

इस बात पर गौर कीजिए कि नोवाक 23 पर रुके नहीं है। वे कहां तक जाएंगे,वे कौन सी संख्या पर रुकेंगे,ये भविष्य तय करेगा। जिस तरह की उनकी फिटनेस है और जिस तरह से वे खेल रहे हैं, कोई भी संख्या असंभव नहीं है। 30 भी नहीं।

उनके 23 ग्रैंड स्लैम जीत में दो बातें उल्लेखनीय हैं। एक, आखिरी 11 खिताब उन्होंने 30 साल की उम्र के बाद जीते हैं। दो, इन सालों में उन्होंने 05 ग्रैंड स्लैम मिस किए। एकऑस्ट्रेलियन और एक अमेरिकन कोविड टीकाकरण ना कराने की वजह से एक विंबलडन कोरोना की वजह से हुआ ही नहीं और एक विम्बलडन थकान के कारण छोड़ दिया। जबकि एक अमेरिकन क्वार्टर फाइनल में गेंद बॉल बॉय को मारने के कारण डिसक्वालिफाई कर दिए गए। अन्यथा आप समझ सकते हैं वे कहां पर इस समय होते।

दरअसल  दिनांक 11 अप्रैल,2023 दिन रविवार को पेरिस के  स्थानीय समय के अनुसार लगभग शाम के चार बजे फिलिप कार्टियर अरीना पर फ्रेंच ओपन के फाइनल मुकाबले के लिए अहर्ता पाने वाले दो खिलाड़ी अलग अलग भाव भंगिमाओं से मैदान में प्रवेश कर रहे थे। 

24 साल के युवा खिलाड़ी नॉर्वे के कैस्पर रड का चेहरा आत्मविश्वास से दमक रहा था। वे क्ले कोर्ट के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं और जैसा वे दो सालों से खेल रहे थे उससे उनका आत्मविश्वास आसमान पर ना होता तो कहां होता। वे अब इस साल के संभावित विजेता माने जा रहे थे क्योंकि कार्लोस अलकराज सेमीफाइनल में हार चुके थे।

दूसरी और सर्बिया के 36 साल के किशोर नोवाक जोकोविच सारी दुनिया जहान की मासूमियत अपने चेहरे में समेटे प्रवेश कर रहे थे। लेकिन उनके मन की बेचैनी और उद्विग्नता को उनकी सारी मासूमियत भी मिलकर छिपाने में असमर्थ हो रही थी। ये इतिहास रचने की बेचैनी थी। एक ऐसे मुकाम पर पहुंचने की उद्विग्नता थी जहां तक कोई नहीं पहुंचा था। उस आसमां को छूने की लालसा थी जिसे कभी किसी ने ना छुआ हो और ना ही कोई छू सके।

खेल शुरू हुआ। पहले सेट का दूसरा गेम लगभग 11 मिनट चला। रड ने नोवाक की सर्विस ब्रेक की और अपना गेम जीतकर स्कोर 3-0 किया। लेकिन चौथे गेम में रड ने एक ओवरहेड शॉट मिस किया। यहां से मोमेंटम शिफ्ट हुआ। नोवाक रंग में आने लगे। उनके शक्तिशाली फोरहैंड शॉट्स का अब रड के पास कोई जवाब नहीं रह गया था। पहला सेट टाई ब्रेक में गया। नोवाक ने टाई ब्रेक 7-1 से जीता। फिर  अगले दो सेट आसानी से जीत लिए। जो नोवाक पहले सेट में थके से लग रहे थे। इस सेट की जीत ने उनमें अपूर्व उत्साह भर दिया। वे अगले दो सेटों में उससे एकदम अलग अपनी ऊर्जा और अपने खेल को उस ऊंचाई पर ले गए जिस तक रड नहीं पहुंच सकते थे और नहीं पहुंच पाए।

तीन घंटों के संघर्ष के बाद नोवाक के चेहरे की मासूमियत और मायूसी रड के चेहरे पर नमूदार हो गयी थी और नोवाक का चेहरा आत्मविश्वास और खुशी से दहक रहा था। लाल मिट्टी पर लाल जूतों और लाल टी शर्ट के साथ उनका चेहरा भी रक्तिम हुआ जाता था। हां इन सब के बीच उनका काला शॉर्ट्स किसी नजरबट्टू सा उन्हें बुरी नज़र से बचाता नज़र आता था।

उस जीत के बाद नोवाक नोवाक कहां रह गए थे। उनका चेहरा असीमित खुशी से दीप्त हो रहा था। वे टेनिस जगत के आकाश में सूर्य से चमक रहे थे जिसके सामने टेनिस जगत के सारे सितारे श्रीहीन हुए जाते थे। और रोलां गैरों की लाल मिट्टी नोवाक के प्रेम में पड़कर लजाती हुई कुछ और अधिक लाल हुई जाती थी।

उनकी जीत दरअसल एक डिफाईनिंग मोमेंट था। एक निर्णायक पल। निर्णायक मोमेंट उस त्रिकोणीय संघर्ष का जिसके दो अन्य कोण फेडरर और राफा बनाते थे। 2003 में शुरू हुए फेडरर और राफा की प्रतिद्वंदिता को 2010 में नोवाक त्रिकोणीय आयाम देते हैं और फिर तीनों मिलकर पिछले बीस सालों के काल को टेनिस इतिहास के स्वर्णिम काल में बदल देते हैं।

अगर आप ध्यान से देखेंगे तो ये प्रतिद्वंदिता खेल शैलियों भर की नहीं है,बल्कि तीन अलग अलग व्यक्तित्वों की भी है। वे अपनी खेल शैली और अपने पूरे व्यक्तित्व से तीन अलग वर्गों का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं। आप इन तीनों के व्यक्तित्व का आंकलन कीजिए तो पाएंगे कि  रोजर फेडरर मैदान में और मैदान के बाहर अपनी शालीनता, अपने ग्रेस और एस्थेटिक सेंस में कुलीन प्रतीत होते हैं। टेनिस ख़ुद ही अपने चरित्र में कुलीन है। टेनिस खेल और फेडरर का टेनिस दोनों क्लासिक हैं और क्लासिकता को पोषित करते हैं। फेडरर टेनिस के मानदंडों के क़रीब क्या, वे स्वयं मानदंड हैं। वे टेनिस के सबसे प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं। जबकि राफा अपने चेहरे मोहरे,वस्त्र विन्यास और अपने चपल,चंचल,अधीर स्वभाव जिसमें हर शॉट पर ज़ोर से आवाज़ करना और हर हारे या जीते पॉइंट पर प्रतिक्रिया करते मध्य वर्ग के प्रतिनिधि से प्रतीत होते।

इन दोनों से अलग नोवाक जातीय भेदभाव का शिकार होते हैं और अपने क्रियाकलापों और हाव-भाव से सर्वहारा वर्ग के प्रतीत होते हैं। वैसे भी उनका बचपन बेहद विषम परिस्तिथियों से गुजरा है। उनका पूरा बचपन बाल्कान संघर्ष के बीच बीता है। जब वे बड़े हो रहे थे तो वे अपना समय बंकर में बिता रहे थे। परिस्थितियों ने उन्हें अजेय योद्धा बनाया। वे खेल मैदान में अंतिम समय तक संघर्ष करते हैं और अंतिम समय तक हार नहीं मानते। 

उनकी अपनी सोच और मान्यताएं उन्हें विवादास्पद और अलोकप्रिय के साथ साथ आम से जोड़ती है। वे कोविड टीकारण के खिलाफ थे। वे कोसोवा के उस मंदिर में जाकर शक्ति और शांति पाने जाते हैं जिसके बारे में मान्यता है कि वो एक दैवीय स्थल है। वे पिछले 10 वर्षों से ग्लूटन  रहित खाना खा रहे हैं। जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

लेकिन आप कह सकते है कि वे अपनी मान्यताओं के प्रति लॉयल हैं। उसके लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं। वे अपने टीकाकरण ना करने पर दृढ़ रहे। इसकी कीमत दो ग्रैंड स्लैम थी।

ट्रॉफी प्रेजेंटेशन सेरेमनी में वे लाल काली जैकेट में आए जिसकी दाईं और 23 लिखा था। विक्ट्री स्टैंड पर एक हाथ में मस्केटियर ट्रॉफी थी और दूसरे हाथ से 23 नंबर की ओर इशारा कर रहे थे। 


वे बता रहे थे कि टेनिस इतिहास में ये एक अनोखी,अद्भुत और अविश्वसनीय संख्या है। और ये भी मैं नोवाक हूँ। मुझे जान लीजिए। ये संख्या मैंने और केवल मैंने अर्जित की है।

और

और,वे बता रहे थे कि मैं आप की तरह हाड़ मांस का बना व्यक्ति हूँ। मुझे भगवान मानने की भूल मत करना। और ये भी कि निश्चिंत रहिए मुझमें अभी भी बहुत टेनिस बाकी है। नई पीढ़ी को अभी और काबिलियत हासिल करनी है। पुरानों का समय अभी खत्म नहीं हुआ है। हम वे वटवृक्ष हैं जिनके साये से निकलने में बहुत मेहनत लगती है।

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फिलहाल तो 23वे ग्रैंड स्लैम की बधाई स्वीकार करो दोस्त।

Tuesday, 7 March 2023

आग और पानी



ज़्यादातर लोग किसी शहर में रहते भर हैं। लेकिन कुछ लोग उस शहर में जीते हैं,उस शहर को जीते हैं। वो शहर उनमें और वे शहर में घुल जाते हैं।  शहर उनकी आत्मा में उतर जाता है और वे शहर की आत्मा में। शहर उनकी शिराओं में खून की माफ़िक बहने लगता है। फिर किसी एक दिन वो शहर कलम की मार्फत शब्द शब्द सफ़े दर सफ़े उतरता जाता है और शहर एक खूबसूरत किताब में तब्दील हो जाता है। 


ऐसी ही एक किताब को हम नाम 'आग और पानी'के नाम से जानते हैं। शहर है बनारस। और उसका रहवासी व्योमेश शुक्ल एक दूसरे में घुले हुए। व्योमेश बनारस को जीते हैं और बनारस उनमें। वही बनारस जब उनके दिल से होता हुआ उनकी कलम से शब्द दर शब्द बाहर आता तो 'आग और पानी' में तब्दील ना हो जाता तो और क्या हो जाता।


व्योमेश से कभी मिला नहीं। फेसबुक पर उन्हें फॉलो करता हूँ। उसी से जाना वे आला दर्ज़े के रंगकर्मी हैं। वे मंच पर खूबसूरत और भव्य दृश्य बनाने में सिद्धहस्त हैं। वे अपनी लेखनी से भी बनारस शहर के ऐसे ही खूबसूरत दृश्य बनाते।


किताब की सबसे सुंदर बात ये है कि इसमें कुछ लंबे आलेख हैं,साक्षात्कार है,ससंस्मरण हैं, चरित्र चित्रण हैं और स्निपेट्स भी हैं। ये विविधता रुचती है,मन मोहती है। इसमें संगीत अंतर्धारा के रूप में बहता है,कंटेंट में भी और भाषा में भी। संगीत और संगीतकारों पर कितना कुछ है और कितना समृद्ध करता चलता है आपको। और हो भी क्यों ना।  वे राम की शक्तिपूजा जैसे कालजयी रचना की देशभर में लाजवाब  संगीतमयी प्रस्तुति देते हैं। संगीत के निःसंदेह जानकार हैं और इसीलिए उनके गद्य में लय है, वो किसी संगीत सा बहता है।


'आग और पानी' दरअसल बनारस के सांस्कृतिक इतिहास का दस्तावेज है।


जब आपको कुछ अच्छा मिलता है तो और ज़्यादा की आस होने लगती है। बनारस केवल धार्मिक सांस्कृतिक नगरी भर नहीं है। इसलिए कुछ मिसिंग लगता है। बनारस और भी बहुत कुछ है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और सीमांत बिहार की आर्थिक राजधानी है ये। घाट हैं, पंडे हैं। नाव हैं, नाविक हैं।   जुलाहे हैं,बनारसी साड़ियां हैं। विश्वनाथ मंदिर है,ज्ञानवापी मस्जिद है। बुद्ध हैं,सारनाथ है। और भी बहुत कुछ है बनारस। व्योमेश की नज़र और उनकी कलम से देखना निश्चित ही रोचक होगा।

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और अंत में एक बात रुख़ प्रकाशन की। अब तक दो किताबें पढ़ी हैं। एक 'आग और पानी'। दूसरी सुशोभित की 'मिडफील्ड'। दोनों बेहतरीन किताबें हैं। कंटेंट से भी और रूप सज्जा से भी। किताबों पर खासी मेहनत की गई है। आवरण से लेकर प्रिंटिंग तक। सबसे बड़ी बात प्रूफ की गलती सिरे से नदारद है जो आज के समय की बड़ी बहुत बड़ी बात है। पढ़ने का आनंद द्विगुणित हो जाता है। निःसंदेह बेहतरीन पुस्तकों के लिए अनुराग वत्स भी बधाई के पात्र हैं।



नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...