Saturday, 13 February 2021

रेडियो दिवस_1


 रेडियो से इश्क़ दरअसल आसमां में सरकते चांद सा होता है जो हौले हौले आपकी कल्पनाओं को सहलाता है और आपकी बेचैनियों,आपकी निराशा,आपके एकांत के अंधेरों को अपनी मखमली रोशनी से रिप्लेस कर देता है।📻🌛


Monday, 1 February 2021

मेरे घर के सामने एक फ्लाई ओवर है



             


                  घर के ठीक सामने एक ओवरफ्लाई है। मुझे समझ नहीं आता कि मैं इसे सड़क ही समझूँ या सड़क से अलग कोई स्वतंत्र अस्तित्व। या दोनों ही। एक सवालिया निगाह से जब भी मैं उसकी ओर देखता हूँ तो वो हौले से मुस्कुराता है और फिर  कहता है

'अहं ब्रह्मास्मि'। मने 'अरे भाई मैं  सड़क ही हूँ'। 

फिर मेरे चेहरे को देखता है। मेरे चेहरे पर निश्चित ही उसे असमंजस के भाव दीखते  होंगे। उसे अब थोड़ा सा आनंद आने लगता है।

वो कहता है 'इसे दूसरी तरह से समझो'।

'मतलब'?

'तत त्वं असी'। मने 'सड़क ही मुझमें है'।

ये कहते हुए उसके चेहरे की भोली मुस्कान थोड़ी गहरी हो जाती है और फिर मुझे ऐसे ही छोड़कर निरपेक्ष भाव से अपने काम में संलग्न हो जाता है। 

कुछ भारी भरकम डम्पर आ रहे हैं। उन्हें अब वो अपनी पीठ से होकर उस पार उतार रहा है।

 मैं अब भी उसका सड़क से अलग अस्तित्व खोज रहा हूँ। एक बहुत बड़ा आर्च सामने दिखाई देता है। लगता है हां ये तो कुछ अलग है। पर कोई एक ऐसा बिंदु नहीं दीख पड़ता कि निश्चित तौर पर कहा जा सके कि यहां सड़क खत्म और फ्लाई ओवर शुरू। बस लगता है सड़क ने यहां अपना कद ऊंचा कर लिया है। ये उठान एक निश्चित ऊंचाई तक जाता है, फिर ढलान और फिर समतल। ना तो इस उठान में कोई अभिमान और ना ढलान में हीनता दीनता। अगर कुछ है तो बस अपने दर्द से उबरने का प्रयास भर। कितना दर्द है इस ऊंचाई के पीछे। इस दर्द को उसकी ऊँचाई से थोड़े ही ना देखा समझा जा सकता है। किसी के दर्द को जानने के लिए उसके भीतर उतरना पड़ता है और उसकी ऊंचाई को महसूसने के लिए उसे नीचे से देखना पड़ता है।

तो क्या है उसका दुःख? एक बार फ्लाई ओवर को नीचे से देखो तो सही। पता चलेगा। कितना गहरा दर्द होता है दो टुकड़ों में बांट दिए जाने का। उसकी सहोदर रेल ने ही तो उसे बांटा। उसके सीने को ही चीर दिया। अपना रास्ता बनाने के लिए। दिल चीरने से पहले ज़रा भी ना सोचा। दर्द वो भी अपनों का दिया कितना घनीभूत होता है ना। 

लेकिन दर्द हमेशा नकार ही लाए ज़रूरी तो नहीं। 'दुःख आदमी को माँजता भी तो है'।  दुख आदमी को कितना उदात्त भी बना देता है। बहुत सारी राहें ऐसी ही होती हैं। वे दुःख देने वालों को माफ करके आगे बढ़ जाती हैं। वे ना केवल उसे ही रास्ता देती हैं,उल्टे उसे निर्बाध बना देती हैं और इस प्रक्रिया में खुद को बहुत ऊपर उठा लेती हैं। हर उस सड़क की किस्मत में,जिसके सीने को चीरकर एक दर्द दे दिया जाता है,एक फ्लाई ओवर में बदल जाना नहीं होता। दुःख को अपनी ताकत बना लेना और  अपने सारे दर्द को अपने भीतर समो लेने का स्पेस क्रिएट कर लेना हर किसी के बस की बात कहां  होती है।

पर क्या ही कमाल है कि अपने जख्मों,अपने दर्द के झंझावात को अपने भीतर समेटे वो खुद को जिंदगी के रंग बिरंगे दृश्यों के बेहद खूबसूरत कोलाज से सजाए रहता है। उसकी पीठ पर ज़िंदगी के दृश्य पल पल बदलते रहते है, केलिडोस्कोप में बदलती खूबसूरत आकृतियों से। अभी अभी एक षोडशी ने स्कूटी रोकी है। वो एक सेल्फी ले रही है। उस ऊंचाई से दिख रहे अनंत स्पेस को अपने साथ सेल्फी में बांध लेना चाहती है, जैसे मन के अनंत स्पेस में उसने अपने सपने समेटे हैं। उधर दो लड़के रुकते हैं। वे अपनी सेल्फी में अपने पीछे ऊंची ऊंची इमारतों को साधना चाहते हैं अपनी ऊंची ख्वाहिशों की तरह। एक ट्रक हांफता सा धीरे धीरे चढ़ाई चढ़ रहा है जैसे उसका चालक अपनी ज़िंदगी नाप रहा है। चालक ट्रक थाम देता है। मानो ज़िन्दगी के शिखर पर पहुंचने की ललक को कुछ पल के लिए यहीं महसूस लेना चाहता हो। वो अब एक सेल्फी ले रहा है। वो फ्रेम में पहाड़ों को अपने कंधों के पीछे लाना चाह रहा है ठीक वैसे ही जैसे पहाड़ सी ज़िन्दगी को अपने कंधों पर ढो रहा है। ऐसे ही धीरे धीरे दिन चढ़ता जाता है। सूरज उसके एकदम ऊपर आ गया है वो सूरज जो सुबह उसके एक छोर पर था। ऐसा लगता है वो सूरज को भी रोज इसी तरह से इस छोर से उस छोर की सैर कराता है अपनी पीठ पर लाद कर। और ये फ्लाईओवर है कि बिना थके, बिना रुके अपनी पीठ पर असंख्य दृश्य बनाता जाता है,बनाता जाता है। 

उधर से कुछ बच्चे पीठ पर बैग लादे स्कूल से घर वापस जा रहे हैं। बेफिक्रे से,भले ही उनकी पीठ पर भविष्य का बोझ लदा हो। शोर मचा रहे हैं। उनमें से कुछ ऊपर आसमान में देखते हैं, जहां उन्हें कुछ परिंदे दिखाई पड़ते हैं बिल्कुल उनकी तरह अलमस्त। वे भी उछल कूद करने लगते हैं। कुछ बच्चे इधर उधर झांक रहे हैं। कुछ दूर तक ढ़ेले फेंक रहे हैं। फिर सारे बच्चे दूर दूर तक फैले मकानों के मकड़जाल को देखने लगे जाते हैं मानो भविष्य उन्हें उनके सामने पड़ी लंबी मकडज़ाल सी ज़िन्दगी का आईना दिखा रहा हो। पर वे उससे बेपरवाह से चहक रहे हैं। उनकी खुशियों से जो तेज निकल रहा है उससे सूरज की रोशनी कुछ और ज़्यादा चमकीली हो गयी है।  बाइक से एक जोड़ा उतरता है। हाथों में हाथ डाले। दुनिया से अनजाने। सामने पहाड़ों पर दूर तक फैली सारी हरियाली को अपनी आंखों में समेट लेना चाहते हैं कि आगे के जीवन के हरे भरे आँगन में प्यार की बरसात होती रहे। उनकी सेल्फी के बैकग्राउंड में जंगल की हरियाली फैल गयी है। 

सूरज अब दूसरे छोर पर आ गया है। उसका ताप उसकी रोशनी कम हो चली है। एक वृद्ध दंपति टहलते हुए जा रहे हैं। कंधे ज़िन्दगी के दबाव सहते सहते झुक से गए हैं। मुश्किलों के लाख थपेड़ों को सहने के बाद भी जीवन पूरी तरह शुष्क नहीं हुआ है। अभी भी जीवन में रस बाकी है। स्निग्धता बाकी है। वृद्ध एक सेल्फी के लिए इसरार करता है। वृद्धा के चेहरे पर बालसुलभ हया नुमाया हो जाती है। वे सेल्फी लेते हैं। ढलता सूरज उनके फ्रेम में चस्पां हो जाता है। वे धीरे धीरे लेकिन सधे कदमों से ढलान पर उतरने लगते हैं,अपनी ज़िंदगी की ही तरह।

गाड़ियां लगातार इधर से उधर दौड़ी जा रही हैं उसकी पीठ से होकर। जैसे ज़िन्दगी दौड़ी जाती है समय की पीठ पर सवार होकर। रात हो चली है। अब सूरज की रोशनी के बजाय बिजली के बल्बों से फ्लाई ओवर चमचमा रहा है। ज़िन्दगी ऐसी ही होती है। ज़िन्दगी की स्याह हक़ीक़तें कृत्रिम रोशनियों से ऐसे ही ढकी जाती हैं। अब रात जवां हो चली है। हल्के वाहनों की आवाजाही कम हो गई है। खुशियों का दिन विदा हो गया है। ग़म की रात गहराने लगी है। बड़े बड़े ट्रक और डम्परों की आवाजाही बढ़ गई है।

दिन रात ऐसे ही बीतते जाते हैं। पल पल दृश्य बदलते जाते हैं। दृश्यों से बने कोलाज के फ्रेम भी बदलते जाते हैं। अगर कुछ नहीं बदलता तो बस फ्लाई ओवर की सूरत और सीरत नहीं बदलती। काले तारकोल से पुती पीठ से दिन रात लोगों को इस ओर से उस ओर पहुंचाता रहता है और हर उस व्यक्ति की ज़िंदगी में, जो उससे होकर गुजरता है खुशियों के रंग भरता जाता है।

दुनिया में कुछ लोग भी ऐसे ही होते हैं जो ज़िन्दगी के दिए दर्द और अपनों के दिये ज़ख्मों को अपने भीतर समेटकर और ज़िंदगी के मुश्किलों के तारकोल से सनी होने के बावजूद दूसरों की ज़िंदगी को खुशनुमा रंगों की बारिश से सराबोर करते रहते हैं।

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क्योंकि वे कुछ व्यक्ति मेरे घर के सामने वाला फ्लाई ओवर होते हैं।

Thursday, 21 January 2021

इस जीत के कुछ मायने हैं।

 


         इतिहास हमेशा से ही इस बात की ताईद करता रहा है कि अजेय माने जाने वाले मजबूत से मजबूत  किले और दुर्ग भी कभी ना कभी ध्वस्त हो ही जाते हैं,ढह जाते हैं और जीत लिए जाते हैं। और ये भी कि लड़ाइयां हमेशा श्रेष्ठ योद्धाओं और शस्त्रों के बल पर ही नहीं जीती जातीं बल्कि जोश,ज़ज्बे और भावनाओं के उद्वेलन से भी जीती जाती हैं। आज जब ब्रिस्बेन के गाबा में ऑस्ट्रेलिया के अजेय दुर्ग को भारतीय क्रिकेट टीम अपने श्रेष्ठ योद्धाओं के बगैर  भी तीन विकेट से ढहा रही तो इतिहास के इस सबक को ही पुनः याद करा रही थी। निसन्देह,ये भारतीय टेस्ट क्रिकेट की सबसे शानदार जीतों में से एक है जो हमेशा याद रखी जाएगी।

      1947-48 के पहले भारतीय क्रिकेट के पहले दौरे से लेकर इस मैच के पहले तक ब्रिस्बेन में खेले गए 6 मैचों में से भारत एक भी मैच नहीं जीत सका था। याद कीजिए भारतीय टीम का 1967-68 के दौरे का तीसरा टेस्ट मैच। वो आज के दिन 19 जनवरी को आरंम्भ हुआ था। उस टेस्ट मैच में भारत ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग का निर्णय लिया। चौथी पारी में उसे 394 रनों का लक्ष्य मिला और एम एल जयसिम्हा की 101  रनों की शानदार पारी के बावजूद 39 रन पीछे रह गई। उसने चौथी पारी में 355 रन बनाए। ये गाबा में खेला गया भारत का दूसरा मैच था। इससे पहले 1947-48 के पहले दौरे में गाबा में खेला गया मैच भारत पारी से हार चुका था। लेकिन 1967-68 के दौरे में गाबा में तीसरे टेस्ट मैच में 19 जनवरी को शुरू हुए उस संघर्ष को आज ठीक 52 साल बाद जीत में बदल कर अंजाम तक पहुँचाया। इतना ही नहीं पिछले 32 सालों में कोई भी देश की टीम ऑस्ट्रेलिया को गाबा के मैदान में हरा नहीं हरा सकी थी। आखिरी बार 1988 में वेस्टइंडीज की टीम ने ऑस्ट्रेलिया को 8 विकेट से हराया था। 

               4 टेस्ट मैचों की इस श्रृंखला का आगाज़ भारत के लिए इससे खराब नहीं हो सकता था। भारत ने पहली पारी के में 53 रनों की बढ़त के बावजूद दूसरी पारी में मात्रा 36 रनों पर ढेर हो गई और मैच आठ विकेट से हार गई। इस मैच के बाद कप्तान विराट कोहली वापस स्वदेश लौट चुके थे। ऐसे में टीम की कमान अजिंक्या ने संभाली। भारत ने पलटवार किया। 195 रनों पर ऑस्ट्रेलिया को आउट करके 112 रनों की शानदार कप्तानी पारी की बदौलत 131 रनों की बढ़त ली और फिर दूसरी पारी में 200 रनों पर आउट कर 70 रनों का लक्ष्य 2 विकेट खोकर आसानी से हासिल कर सीरीज 1-1 से बराबर कर उसे रोचक बना दिया। तीसरे टेस्ट में भारतीय खिलाड़ियों ने जीवट का परिचय दिया और मैच ड्रा करा लिया। इस मैच में पहली पारी में 94 रनों से पिछड़ने के बाद चौथी पारी में 407 रनों का लक्ष्य था जीतने के लिए भी और 4 सेशन सर्वाइव करके ड्रॉ करने के लिए भी और वो भी उस स्थिति में जब भारतीय खिलाड़ी घायल हों।लेकिन घायल पंत 97 और बिहारी हनुमा 23 और अश्विन 39 ने जीवट और धैर्य का परिचय देते हुए पारी को ना केवल संभाला बल्कि मैच ड्रा करा दिया। खेल समाप्ति पर भारत की चौथी पारी का स्कोर 334 रन 5 विकेट पर था। इस पारी में उसने 131 ओवर खेले।

            अब सीरीज का परिणाम चौथे टेस्ट के परिणाम पर निर्भर था। जब भारतीय टीम गाबा आई तो श्रीहीन हो चुकी थी। उसका सेनानायक तो पहले ही घर वापस जा चुका था। ये दीगर बात है कि उसके नायाब ने उस कमी को महसूस नहीं होने दिया और दाल का कुशल संचालन और नेतृत्व किया। लेकिन गाबा तक आते आते तमाम योद्धा घायल हो चुके थे और संघर्ष से बाहर थे। आप कल्पना कर सकते हैं कि विराट कोहली,बुमराह,उमेश यादव,रविन्द्र जडेजा,हनुमा बिहारी और आर अश्विन के बिना भारतीय टीम कैसी थी।ये कल्पना से परे था कि भारतीय तेज आक्रमण में सिराज,सैनी,शार्दूल और नटराजन चारों को मिलाकर कुल 8 टेस्ट मैचों के अनुभव था। लेकिन जब आपके दिल में जीत का जज्बा हो तो आप दुनिया बदलने की ताकत रखते हैं। भारतीय खिलाड़ियों ने एकदम यही किया। पहली पारी में लड़खड़ाने के बाद भी शार्दूल और सुंदर की शानदार बल्लेबाजी और दूसरी पारी में ऋषभ पंत,चेतेश्वर पुजारा और वाशिंगटन सुंदर की शानदार बल्लेबाजी और निसन्देह सिराज की शानदार गेंदबाजी की बदौलत एक इतिहास रच दिया।

           जब आप में हौसला होता है तो विपक्ष का हर हथियार बेकार हो जाता है। गाबा की पिच की अतिरिक्त तेजी और अतिरिक्त उछाल ऑस्ट्रेलियाई टीम के ऐसे हथियार हैं जिससे विपक्षी टीम को सामंजस्य बिठा पाना बहुत कठिन होता है। पर भारतीय खिलाड़ियों ने ये कर दिखाया।

             ये बात तय है कि सही और असली क्रिकेट पांच दिनी टेस्ट क्रिकेट ही है। हाँ क्रिकेट के छोटे फॉरमेट ने खेल की शास्त्रीयता को चाहे जितना नुकसान पहुंचाया हो पर एक बात जरूर है कि उसने टेस्ट क्रिकेट को परिणामोन्मुखी बनाया है जिसके कारण अब ज़्यादातर मैचों में परिणाम आ रहे हैं और उनमें रुचि बनी हुई है।

जो भी हो ये भारतीय टीम की शानदार जीत है जो भारतीय क्रिकेट इतिहास में ही नहीं बल्कि क्रिकेट प्रेमियों के स्मृतियों में भी हमेशा के लिए दर्ज हो गई है। भारतीय टीम को बधाई तो बनती है। जीत मुबारक।

Thursday, 14 January 2021

कितनी पारदर्शी होती हैं स्मृतियां

 बचपन की सबसे प्रिय और खूबसूरत चीजों में रंगबिरंगे कंचे हुआ करते थे जो अलग अलग जेबों में भरे रहते थे किसी ख़ज़ाने की तरह।

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और आज उम्र के इस पड़ाव पर दिल में समय के अलग अलग कालखंडों की जेबों में ना जाने कितनी स्मृतियां रंग बिरंगे कंचों सी बिखरी पड़ी हैं।

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कि कोई स्मृति समय के वितान पर फैली विस्मृतियों की घास के किसी तिनके पर ओस की बूंद सी आ टपकती और फिर देर तलक अतीत की एक सुबह को भिगो देती है।

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कि कोई स्मृति का नन्ही गौरैय्या सी दिल की बालकनी में आ फुदकती है और फिर देर तलक अतीत की एक दोपहरी को अपनी मधुर चहचहाहट से भर देती है।

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कि कोई स्मृति मन के आसमान पर चांद सा उदित हो जाती और देर तलक अतीत की किसी रात को रोशनी से भर जाती है।

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कि एक भोर ढेर सारी स्मृतियां मन के जंगल में उगे पेड़ से पारिजात के फूलों सी झर झर जातीं हैं और अपनी महक से अतीत की धरती को मदहोश कर देतीं है।

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स्मृतियां कितने रंग,रूप,आकार लिए खूबसूरत कंचों सी समय की जेबों में भरी होती हैं।

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कितनी पारदर्शी होती हैं ना स्मृतियां। देखा जा सकता है समय के पार। जिया जा सकता है जिया हुआ जीवन  कई कई बार।

Saturday, 9 January 2021

खेलों का बदलता स्वरूप


 
जाने माने क्रिकेटर और बीबीसीआई के अध्यक्ष सौरव गांगुली अब स्वस्थ होकर घर वापसी कर चुके है। एक इतने एक्टिव और बड़े खिलाड़ी को हृदयाघात की खबर हैरान करने वाली तो थी। लेकिन इस खबर को उनके एक विज्ञापन से जोड़कर देखने से कई और बड़े प्रश्न खड़े होते हैं। (दरअसल ये विज्ञापन एक तेल का था जिसमें दिल को स्वस्थ रखने का दावा किया गया था) प्रश्न क्या बड़े बड़े खिलाड़ी किसी चीज को इंडोर्स करते समय उसके गुण दोष को जांचते है या नहीं। प्रश्न क्या खिलाड़ियों में क्या नैतिकता बची है। प्रश्न क्या वे अपने फॉलोअर्स और चाहने वालों के प्रति अपना कोई उत्तरदायित्व समझते है। प्रश्न क्या धनार्जन ही उनका सबसे बड़ा लक्ष्य है। और सबसे बड़ा प्रश्न क्या खुद खिलाड़ी और खेल बाज़ार का टूल बन गए हैं, बाज़ार की कमोडिटी बन गए हैं। याद कीजिए युवराज की कैंसर वाली खबर को।जिस समय ये खबर ब्रेक हुई उस समय वे लोगों को स्वस्थ रखने का दावा करने वाले एक कैप्सूल्स' का विज्ञापन कर रहे थे। अंततः इस विज्ञापन को रोकना पड़ा और फिर इसे सलमान करने लगे। सचिन तेंदुलकर भारत रत्न हैं लेकिन वे तमाम छोटी बड़ी चीजों विज्ञापन करते हैं। क्या ये इतने बड़े सम्मान का दुरुपयोग और अवमूल्यन नहीं है। यही बात सदी के महानायक पर भी लागू होती है। पर यहां उ केवल खेल और खिलाड़ियों तक सीमित रखते हैं।

दरअसल खिलाड़ियों का ये रवैया या व्यवहार एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है। प्रश्न बाज़ार के अनुरूप खेलव के बदलते चरित्र का। प्रश्न खेल और खिलाड़ियों का बाज़ार की कमोडिटी में रूपांतरित होने का,रिड्यूस होने का। खिलाड़ियों द्वारा आंख मूंदकर चीजों को एंडोर्स करना दरअसल खेलों में बाज़ार के की घुसपैठ और उसके बढ़ते प्रभाव का ही परिणाम है। कोरोना से ठहरी ज़िन्दगी के बीच गतिविधियों को फिर से शुरू करने की जितनी बेचैनी आर्थिक जगत को थी उतनी ही खेल जगत में भी थी। अब आप देखिए ना आईपीएल होकर ही रहा। हिंदुस्तान में अनुकूल परिस्थितियां ना हों तो क्या यूएई में तो थीं ना। और दर्शकों का क्या! ना भी होंगे तो चलेगा। टीवी पर तो आएगा ना। खेल नहीं रुकना चाहिए। 'शो मस्ट गो ऑन।' आईपीएल अकेली ऐसी प्रतियोगिता नहीं है जो शुरू हुई है। क्रिकेट का सीजन बहुत पहले शुरू हो गया था। वेस्टइंडीज के इंग्लैंड दौरे के साथ। उधर एनबीए भी शुरू हो चुका है। टेनिस में यूएस ओपन  और फ्रेंच ओपन भी हो गए और ऑस्ट्रेलियाई ओपन शुरू होने को आया। कोरोना से थमी ज़िन्दगी के बीच खेल गतिविधियां फुटबॉल से हुई और जर्मनी की बूंदेसलीगा पहली लीग थी जिसने वैश्विक स्तर पर खेल गतिविधि शुरू की। खेल और दर्शक एक ऐसा युग्म है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। आर्थिक गतिविधियों को बहाल करना ज़रूरी हो सकता है पर बिना दर्शकों के खेलों का खेला करना ज़रूरी है तो क्यों? ये सवाल पूछा जाना लाजिमी है।

                   आलोचक शम्भूनाथ लिखते हैं "कभी राजनीति और बाज़ार धर्म के अधीन थे। एक समय आया जब धर्म और बाज़ार राजनीति के अधीन हुए। आज दिखता है धर्म और राजनीति बाज़ार के अधीन हो गए हैं।" बाज़ार की प्रभुता वाले इस समय में जब स्त्री देह और बच्चों की मासूमियत भी कमोडिटी बना दी गयी हों तो खेलों की क्या  बिसात। दरअसल खेल भी अब एक कमोडिटी से ज़्यादा,और अलग कुछ नहीं है। पिछले 40-50 सालों में खेलों में भी मूलभूत परिवर्तन हुए हैं। जिन्हें अधिकाधिक बाज़ार के अनुरूप बनाने की कोशिश की गई और की जा रही है जिससे खेलों का चेहरा एकदम बदल गया है। इसको चिन्हित करने का प्रयास हुआ या नहीं,नहीं पता। पर इसकी शिनाख्त ज़रूरी है।


दरअसल खेलों के स्वरूप में परिवर्तन की आहट भारत में खेलों में 'सेन्टर ऑफ एक्सेलेन्स'की अवधारणा के साथ सुनाई देती है। आज से 40-50 साल पहले के समय को और भारतीय खेल परिदृश्य को याद कीजिए। उस समय खेल पैसा कमाने से ज़्यादा शोहरत अर्जित करने और स्वास्थ्य बनाने का शौकिया उपक्रम हुआ करता था। उन दिनों स्कूल कॉलेजों की तो बात छोड़िए तमाम गली मोहल्लों तक में छोटे बड़े खेल मैदान होते जिसमें बच्चे खेलते मिल जाते। उस समय स्कूल और कॉलेज खेलों की नर्सरी हुआ करते थे। बड़ी संख्या में बच्चे इन मैदानों पर खेलने आते। यहीं पर उन्हें खेलने के उपकरण और सुविधाएं मिलती। इन्हीं में से बच्चे आगे बढ़ते और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नाम कमाते। लेकिन उन दिनों हॉकी जैसे एक दो खेलों को छोड़कर भारत खेलों में अच्छा नहीं कर पा रहा था। तब ये विचार आया कि खेलों का स्तर सुधारने के लिए सेन्टर ऑफ एक्सीलेंस बनाये जाएँ। पटियाला में भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना की गई और देश भर में स्पोर्ट्स हॉस्टल और स्पोर्ट्स कॉलेज बनाए गए। ये एक प्रगतिशील कदम था जिसने खेलों के स्तर को सुधारा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन इसने खेलों के चरित्र को बदल दिया। अब खेलों का केंद्र ये सेंटर हो गए। स्कूल-कॉलेजों और  गली-मोहल्लों से खेल और खेल मैदान गायब होने लगे और खेल अब इन सेंटरों के इर्द गिर्द सिमटने लगे। इन सेंटरों में सीमित संख्या में ही खिलाड़ी छात्रों की पहुंच बनती थी और है। अब खेलों में वे ही आते जिन्हें इसी में कैरियर बनाना होता। शौकिया खेलने वालों की संख्या अब दिन ब दिन कम होने लगी। केवल खेल और खिलाड़ी ही कम नहीं हुए बल्कि खेल प्रतियोगिताएं भी कम होने लगीं। इन प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों और दर्शकों का बहुत ही आत्मीय रिश्ता होता और भावनात्मक लगाव भी। इन प्रतियोगिताओं में स्थानीयता का पुट होता और मानवीय रिश्तों की खुशबू। जहां खेल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस तक सिमटने लगे वहीं प्रतियोगिता अब केवल खेल संघों की ज़िम्मेदारी के दायरे में सिमट आईं। तमाम प्रतियोगिताएं जिनसे खेलों की पहचान होती थी,जिनसे जाने माने खिलाड़ी निकलते थे और उसमें प्रतिभाग करते थे,नेपथ्य में चली गईं। याद कीजिए हॉकी की अंतर विश्वविद्यालय प्रतियोगिता,बेटन कप,आगा कप,मुरुगप्पा गोल्ड कप,क्रिकेट में मौइनुद्दोला कप,शीश महल कप,रोहिंटन बारिया कप और ऐसे ही तमाम खेलों की बहुत सारी प्रतियोगिताएं।

       

खेलों के मूल चरित्र में बदलाव और खेलों के बाज़ार के साथ गठजोड़ का एक बड़ा कारक बनी खेल मैदानों की कृत्रिम सतहें। साल 1966। अमेरिका में पहली बार बेसबॉल के खेल मैदान पर कृत्रिम खेल सतह का प्रयोग किया गया। बाद में इसे एस्ट्रो टर्फ के नाम से जाना गया। कहा गया प्राकृतिक घास के मैदानों का रख रखाव ना केवल कठिन होता है बल्कि महंगा भी होता है। फिर तो धीरे धीरे हर खेल में कृत्रिम खेल सतहें आ गयी। यहां तक कि कुश्ती और कबड्डी जैसे मिट्टी पर खेले जाने वाले खाटी खेलों में भी मैट्स का प्रयोग होने लगा। ये एक बड़ा व्यवसाय बन गया। उनकी लॉबी हर जगह सक्रिय हो गयी। हर खेल में लाने का प्रयास होने लगे और अंततः वे इसमें काफी हद तक सफल भी रहे। यहां तक कि एथलेटिक्स तक में सिंथेटिक ट्रैक आ गए। कृत्रिम सतहों से खेल में  निसंदेह कुछ तो कृत्रिमता आती ही। ये सतहें प्राकृतिक सतहों की तुलना में अधिक तेज होती हैं। इसमें अतिरिक्त उछाल भी होती है। इसने दो तरह से खेलों को प्रभावित किया। एक,अमीर और गरीब देशों के बीच खेलों के स्तर के गैप को और बड़ा  कर दिया। सभी बड़ी प्रतियोगिताएं इन्हीं सतहों पर खेली जाने लगी। अमीर देश इन्हें आसानी से अफोर्ड कर सकते थे। उनके खिलाड़ी बचपन से उनपर अभ्यास कर सकते थे। ये अमीर देश यूरोप और अमेरिकी महाद्वीप से थे। ये उन देशों के खिलाड़ियों की कद काठी और जलवायु के काफी अनुकूल थी। जबकि गरीब देश इन प्राकृतिक सतहों के खर्च को उठाने में असमर्थ थे और उन खुद खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता उन सतहों पर खेलने के उतनी अनुकूल ना होने के कारण वे देश पिछड़ते चले गए। दूसरे, इन सतहों ने खेल में एक अतिरिक्त तेजी ला दी और खेलों को पावर हाउस में तब्दील कर दिया। ये गति और ताकत उस प्रक्रिया की अनिवार्य ज़रूरत थी जिसके तहत खेलों को  बाज़ार के लिए कमोडिटी के रूप में बदला जा रहा है या बदल दिया गया है। बाज़ार की आवश्यकताओं के अनुरूप खेलों को अधिकाधिक उत्तेजना उत्प्रेरक बनाया जा रहा है। बाज़ार की इस ज़रूरत पर खिलाड़ियों की सेहत से भी कम्प्रोमाइज किया गया,खिलवाड़ किया गया। इन कृत्रिम  सतहों पर खेलने से खिलाड़ियों के स्वास्थ्य पर विपरीत पड़ता है और शरीर में वीयर टियर बहुत अधिक होता है। पर बाज़ार की शक्तियां प्रबल है। हॉकी इसका एक उदाहरण भर है जिसने खेल की कलात्मकता की कीमत पर उसमें ताकत और गति ला दी और एशियाई हॉकी और विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप की हॉकी को रसातल में पहुंचा दिया। पर बाज़ार को इसी की ज़रूरत है। फुटबॉल में भी ये कृत्रिम सतह लाई गई लेकिन जब उसमें खिलाड़ियों पर विपरीत असर पड़ना शुरू हुआ तो जल्द ही मोह भंग हो गया और वे प्राकृतिक घास पर लौट आए। पर बाजार बाज़ार होता है। उसे इतने हल्के में कहां लिया जा सकता है। फुटबाल में पुनः इसको स्थापित करने के ज़ोरदार प्रयास किए जा रहे हैं। इस बार इस बहाने के साथ कि ठंडे देशों में धूप की कमी के कारण प्राकृतिक घास का उगना कठिन होता है।


     रअसल आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में,जब समय की बहुत कमी हो और क्षणिक उत्तेजना ही उसका सबसे बड़ा पैशन हो, किस तरह के खेलों की ज़रूरत आदमी को है और खेलों को बेचने के लिए बाज़ार को है? यही ना कि खेलों के छोटे संस्करण हो और क्षणिक उत्तेजना के लिए उसमें ताकत और गति का समावेश हो। खेलों में पिछले सालों में लगातार ऐसे परिवर्तन किए गए। विशेष रूप से खेल नियमों में परिवर्तन करके। एक ओर खेलों के समय में लगातार कमी करके उन्हें छोटा किया गया और टीवी के मुफीद बनाकर उनमें ज़्यादा ब्रेक्स का प्रावधान किया गया। 

 

 क्रिकेट को ही ले लीजिए। क्रिकेट के पांच दिवसीय टेस्ट मैच के बाद एकदिनी क्रिकेट आया,फिर टी20 आया और अब तो 100 बॉल संस्करण और 10 ओवर संस्करण भी आ गया है। इन संस्करणों में सिर्फ चौके छक्कों और विकेटों के गिरने से उत्पन्न उत्तेजना भर हैं। खेल की बेसिक्स तो सिरे से नदारद है। इस प्रवृति ने खेलों के मूल रूप को ही विकृत कर दिया। हॉकी के खेल का समय 70 मिनट की जगह 60 मिनट का कर दिया गया और 35 मिनट के दो हॉफ की जगह चार क्वार्टर कर दिए गए। ठीक इसी तरह से बास्केटबॉल में 20 मिनट के दो हाफ की जगह 10 मिनट के चार क्वार्टर कर दिए गए। अब एक टीम को 24/30 सेकंड के अंदर बास्केट अटेम्प्ट करना और 6/8 सेकंड के अंदर अपने पाले से विपक्षी पाले में जाना अनिवार्य कर दिया गया। टेबल टेनिस में गेम 15 अंकों की जगह 11 अंकों का कर दिया गया और मैच बेस्ट ऑफ फाइव की जगह बेस्ट ऑफ नाइन के कर दिए गए। बैडमिंटन और वॉलीबॉल जैसे खेलों में अंक गणना के तरीकों में ही परिवर्तन कर दिया गया। पहले सर्विस ब्रेक करने के बाद अपनी सर्विस पर अंक अर्जित करना पड़ता था। लेकिन अब सर्विस ब्रेक करने का अंक भी मिलने लगा है जिसने खेल समाप्ति की अवधि कम करने का काम किया है। दरअसल नियमों में ये सारे बदलाव इस बात को ध्यान में रख कर किए जा रहे हैं कि खेलों में मैच की अवधि कम हो सके और उसमें ब्रेक अधिक हो सकें। आज लोगों के पास समय कम है। प्रयास यही है कि खेलों के छोटे संस्करण हो ताकि दर्शक उन्हें पूरा देख पाएं। तभी विज्ञापन मिलेंगे और स्पॉन्सरशिप मिलेगी।  दूसरी ओर इस कम अवधि में भी अधिकाधिक ब्रेक्स डाले जा रहे हैं ताकि खेल ज़्यादा से ज़्यादा टीवी के मुफीद हो सकें। यानी ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन दिखाए जा सकें। इसके अलावा अधिकाधिक ब्रेक और कम अवधि के कारण खिलाड़ियों में स्टेमिना बना रहता है,उन्हें अधिक समय तक स्टेमिना बचाकर नहीं रखना होता है। इससे खिलाड़ी अधिक पावर और गति का प्रयोग कर एक अतिरिक्त उत्तेजना पैदा कर सकता है। ये भी खेलों के बाज़ारीकरण की एक अनिवार्य शर्त है।


खेलों के बाज़ारीकरण या व्यवसायीकरण का एक और उपकरण है तकनीक। खेलों में तकनीक का प्रयोग वहां तक तो उचित लगता है जहां तक वे खिलाड़ियों के  कला कौशल में स्वाभाविक वृद्धि करें। लेकिन जब तकनीक का हद से ज़्यादा प्रयोग होने लगे और अप्राकृतिक रूप से खिलाड़ियों की क्षमता को बढ़ाया जाने लगे और उनको रोबोट बनाया जाने लगे तो दिक्कत की बात है। तकनीक को ज़रूरत से ज़्यादा थोपा जा रहा है। दरअसल अब हो ये रहा है कि बाज़ार के अनुरूप खेलों को अधिक गतिवान और पावरफुल बनाने के लिए खिलाड़ियों के शरीर,उनके कपड़े,खेल मैदानों की सतहें और खेलों में प्रयुक्त किए जाने वाले उपकरणों में तकनीक का इस हद तक समावेश किया जा रहा है कि खेल दो खिलाड़ियों या खिलाड़ियों की दो टीमों के बीच की स्पर्धा न होकर तकनीक की स्पर्धा हो गई है।

 

खेलों को कमोडिटी में बदलने के मूल मंत्र हैं पावर,गति और उत्तेजना। इसीलिए बाज़ार की दृष्टि से खेलों में अवकाश का,अंतरालों का और कलात्मकता का कोई स्थान नहीं रह गया है या बहुत कम रह गया है। अगर रह गया है तो सिर्फ उतना भर कि इसके एकदम खत्म होने से दर्शकों की रुचि ही ना खत्म हो जाए। खेलों से कलात्मकता खत्म होती जा रही है। खिलाड़ी मनुष्य से अधिक रोबोट होते जा रहे हैं। फिटनेस फ्रीक कोहली या कैप्टन कूल धोनी के बरअक्स कपिल गावस्कर को देखिए तो समझ आएगा। दरअसल खेलों की अवधि को कम करने और उसमें अधिक ब्रेक की आवश्यकता की भरपाई  खेलों के अंतराल खत्म करके या न्यूनतम करके की जा रही है। आपको खेलों के इस अंतराल और इसके महत्व को समझना जरूरी है। हर खेल में खिलाड़ी का लक्ष्य होता है,मसलन गोल बनाना या अंक अर्जित करना या रन या विकेट अर्जित करना। खिलाड़ी या टीम इसको अर्जित करने का और विपक्षी को अर्जित करने से रोकने का निरंतर प्रयास करते हैं। एक प्रयास शुरू करने और अर्जित करने के बीच का समय ही वो अंतराल है जिसमें एक खिलाड़ी अपने खेल कौशल,अपनी स्किल,अपनी कलात्मकता का निदर्शन कर सकता है या करता है। पर बाज़ार को सीधे परिणाम चाहिए। उनके लिए अंतराल जितने कम हों उतना अच्छा। बस इसी को नए नए नियम बनाकर कम से कम करने का प्रयास किया जा रहा है। बाज़ार के लिए हर प्रयास का जल्द से जल्द परिणाम अधिक मायने रखता है। इसे आपने कैसे हासिल किया इसका महत्व अब नहीं रहा। इसीलिये अब स्किल का स्थान ट्रिक्स ने ले लिया है। इसको खेलों के उदाहरण से समझा जा सकता है। अब क्रिकेट को लीजिए। टेस्ट मैच में इतना अवकाश/अंतराल होता था कि आप गेंद और बल्ले के बीच कला कौशल का क्लासिक संघर्ष देख सकें। बल्लेबाज़ को हर गेंद पर रन बनाने की जल्दबाजी नहीं करनी होती थी। वो हर अच्छी गेंद को आराम से क्लासिक अंदाज़ में खेल सकता था या छोड़ सकता था और रन बनाने के लिए एक ऐसी गेंद का इंतज़ार कर सकता था जिस पर एक क्लासिक स्ट्रोक्स से रन बना सके। ओवर दर ओवर इस क्रम में मैदान फेंके जा सकते थे। ठीक इसी तरह गेंदबाज अपनी गेंदबाजी की कला का निदर्शन करता और बल्लेबाज़ को गलती करने के लिए मजबूर करता। इसमें बैटिंग और बॉलिंग में एक क्लासिक और कलात्मक संघर्ष देखने को मिलता। लेकिन इसके संक्षिप्त संस्करण में हर गेंद पर रन बनाने या विकेट निकालने की जल्दबाजी करनी ही है। क्योंकि चौके छक्कों से या विकेट गिरने से ही दर्शकों का मनोरंजन होना है,उसमें एक कृत्रिम उत्तेजना पैदा होनी है। अब बल्लेबाज़ हर गेंद पर चौके छक्के लगाना है तो उसके पास इसके लिए अपनी कला का प्रयोग करने के इंतज़ार की इजाज़त या अवकाश कहां है या  गेंदबाज के पास  विकेट लेने के लिए अपनी स्किल के प्रयोग करने का। अब उसे तुरत फुरत में ट्रिक का इस्तेमाल करके बल्लेबाज़ को गेंद बाउंड्री से बाहर मारनी है और बॉलर को विकेट लेना है। 


   आप हॉकी को लीजिए। एस्ट्रो टर्फ ने खेल को पावर और गति दी। और एक नियम के खत्म कर देने भर से खेल महज 'हिट,रन एंड गोल' तक सीमित कर दिया है। हॉकी और फुटबॉल में ऑफ साइड का एक नियम होता है। ये नियम काफी जटिल होता है। लेकिन ये खेल को वांछित प्रतिस्पर्धा और कला कौशल के निदर्शन हेतु पर्याप्त अंतराल प्रदान करता है। पर इसमें गति लाने और अधिक गोल के लिए इस नियम को खत्म कर दिया गया। अब लंबे पावरफुल हिट और गोल मूलमंत्र हो गया। ड्रिब्लिंग और टेकलिंग के लिए जो अंतराल था उसका महत्व ही खत्म हो गया। बैडमिंटन और वॉलीबॉल में जो सर्विस बदलने पर भी अंक मिलने के कारण प्रतिस्पर्धा करने और कला निदर्शन का जो अंतराल था वो बहुत हद तक खत्म हो गया। बास्केटबॉल में 24/30 सेकंड के नियम ने भी यही किया। जिसने 3 पॉइंटर शॉट को इस कदर प्रोमिनेन्ट कर दिया कि ले अप और डंक को पृष्ठभूमि में धकेल दिया।


अंततः खेलों में लीग के आगमन ने खेलों और खिलाड़ियों को पूरी तरह से कमोडिटी में बदल दिया। मौज मस्ती,मनोरंजन,सट्टा और पार्टियों का पुंज आईपीएल महज एक सर्कस से इतर कुछ है क्या?  


दरअसल खेलों को कमोडिटी बनाने के क्रम में खेलों के अंतरालों को कम या खत्म करने का मतलब है खेलों से उसकी कलात्मकता को छीन लेना। उसकी आत्मा को मार देना। उसकी कोमलता को खत्म कर देना। उसके स्त्री मन को मार देना। उसकी सहजता और सरलता को खत्म कर देना। उसकी रवानी और निरंतरता को समाप्त कर देना। अब खेल शुष्क वस्तु  भर है जो देखने मे तो आकर्षक है जिसे कुछ समय के लिए आपमें उत्तेजना तो आती है पर आके दिल के करीब नहीं आ पाती। खेल एक ऐसी वस्तु में तब्दील होते जा रहे हैं जिसमें बाहरी सौंदर्य तो है जिसकी चकाचौंध आपको आकर्षित तो करती है आपमें क्षणिक आवेग भी भरती है पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं बना पाती,आपके दिल मे घर नहीं कर पाती। ये समय खेलों के एमेच्योर स्वरूप के पूरी तरह प्रोफेशनल स्वरूप में बदल जाने का है। एक पैशन, लगाव,आनंद का एक वस्तु एक कमोडिटी में बदल जाने का है। 

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बाज़ार का सिद्धांत मुनाफा है। मुनाफे में नैतिकता का क्या काम। खिलाड़ियों के विज्ञापन करने और चीजों को एंडोर्स करने को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। मुनाफा ज़िंदाबाद।

Thursday, 31 December 2020

विदा_साल_2020_1

 

स्मृतियां दृश्य होती हैं। दृश्य जितने पास होते हैं उतने ही स्पष्ट और ज़्यादा स्पेस घेरने वाले होते हैं। समय जैसे जैसे उन्हें दूर लेता जाता है, दृश्य धुंधले और छोटे होते जाते हैं और अंततः अनंत में विलीन हो जाते हैं। लेकिन कुछ दृश्यों के साथ ध्वनि भी होती है। दृश्य भले ही धुंधले या विलीन हो जाएं पर ध्वनियां मद्धिम नहीं पड़ती। वे समय की सीमाओं से टकरा बार बार लौटती हैं। वे अनुगूंजें हमेशा सुनाई पड़ती हैं। ये दीगर बात है उनमें से कुछ अनुगूंज संगीत सी मधुर,रेशम सी मुलायम,कपास सी छुईमुई,ओस सी पवित्र होती हैं तो कुछ सांझ सी उदास,रात सी निष्ठुर,अट्टाहास सी भयानक होती हैं।

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Thursday, 3 December 2020

जाना गोल्डन किड का



फुटबॉल खेल का पूरा इतिहास दो देवता तुल्य खिलाड़ियों के बीच का इतिहास है जो एक से शुरू होकर  दूसरे पर आकर रुका हुआ है। इसका प्राचीनतम छोर ब्राजील के पेले से शुरू होता है और अर्जेंटीना के लियोनेस मेस्सी पर आकर रुकता है। ये दोनों फुटबॉल के देवता है, लीजेंड हैं और मिथक हैं। लेकिन क्या मानव सभ्यता का इतिहास बिना मानव के लिखा जा सकता है? नहीं ना! देवताओं का हो या मनुष्यों का- इतिहास किसी का भी लिखा जाए उसके केंद्र में होगा आदमी ही जो अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद  सीना तान कर शान से सिर ऊंचा करके खड़ा होगा। फुटबॉल इतिहास के दो सिरों-पेले और मेसी के बीच अपनी तमाम कमजोरियों और अवगुणों के साथ एक मानुस-माराडोना सीना ताने खड़ा है जो सीना ठोक कर फुटबॉल के देवताओं को चुनौती देता है और कहता है आप चाहे जितने बड़े देवता हो जाओ, पर फुटबॉल खेल का,उसके इतिहास का केंद्रीय बिंदु मैं ही रहूंगा। दरअसल डिएगो आरमाण्डा माराडोना फुटबॉल के महान देवताओं के बीच एक असाधारण मानुस सरीखा है। जिसने 60 साल की उम्र में कल इस फानी दुनिया को अलविदा क्या कहा कि पूरा खेल जगत खालीपन के अहसास के गहरे समंदर में डूब गया।

1986 के विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मैच के बाद प्रसिद्ध फ्रेंच अखबार ला एक्विपे ने माराडोना को 'आधा देवदूत,आधा दानव'(half angel, half devil) के रूप में व्याख्यायित किया था। दरअसल ये उसके अदभुत खेल कौशल के साथ साथ उसकी  स्वभावगत कमजोरियों की और संकेत था। वो एक अद्भुत खिलाड़ी था; सार्वकालिक महान खिलाड़ियों में एक; अद्भुत खेल कौशल और चातुर्य से युक्त ऐसा खिलाड़ी जिसने एक बार नहीं तीन तीन बार गोल करने या बचाने में हाथ का प्रयोग किया हो,जो व्यक्तिगत जीवन में मादक पदार्थों के सेवन का व्यसनी हो और अपनी कृत्यों से कई बार शर्मसार भी कर देता हो। पर क्या ही कमाल है उसके पास  अद्भुत खिलाड़ी होने का एक ऐसा आभामंडल था जिसके प्रकाश की चकाचौंध में उसके जीवन की कालिख, उसका अंधेरा विलीन हो जाता था। लोगों पर उसके खेल का जादू सर चढ़ कर बोलता था। 

सच में वो फुटबॉल का जादूगर था। फुटबॉल का ध्यानचंद। वो सर्वश्रेष्ठ ड्रिबलर जो था। जब वो ड्रिबल करता तो द्रुत में क्लासिक नृत्य करता प्रतीत होता। गेंद उसकी चेरी प्रतीत होती और उसकी थाप पर झूमती प्रतीत होती। जब गेंद को लेकर आगे बढ़ता तो वो 'वन मैन आर्मी'होता था जिसके विरुद्ध विपक्षी हिंसक समूह के रूप में एकजुट हो जाते। पर वो था कि अपने अद्भुत खेल रणकौशल और खेल चातुर्य से लय और गति का एक ऐसा मनमोहक जाल फैलाता कि उसके सम्मोहन से  मंत्रमुग्ध हुए विपक्षी खिलाड़ी खेत होते जाते और वो किसी विजेता सा अपने लक्ष्य गोलपोस्ट पर खड़ा मुस्कुराता और गेंद गोलपोस्ट के अंदर चैन की सांस लेती। 

गेंद और उसके एक जोड़ी पैरों की कमाल की जुगलबंदी थी। वे एक दूसरे के प्रेम में थे। मानो वे एक दूसरे का बिछोह सहन ही नहीं कर पाते। गेंद जब देखो उन पैरों को चूमने आ जाती। इस प्रेम का एक और कोण था-वे मैदान जहां वे एक जोड़ी पैर जाते। दरअसल वे मैदान भी उसके प्यार में पड़ जाते।  मैदान उन पैरों को गति प्रदान करते तो गेंद उस गति में लय भर देती। धरती गेंद को बार बार उन पैरों से अलगाती और गेंद उन पर न्योछावर हो हो जाती। जहां वे पैर जाते वहां दो टीमों  के संघर्ष से अलहदा उस मैदान,गेंद और पैरों की त्रिकोणीय जुगलबंदी का एक अदभुत संगीत निसृत होता रहता जो देखने वालों को मदहोश करता रहता।

वो केवल 5 फुट 5 इंच का छोटे कद का खिलाड़ी था। उसका छोटा कद उसका बैलेंस बनाने में बहुत सहायक होता और वो बहुत ही तीव्र गति से गेंद पर पूरे नियंत्रण के साथ ड्रिबल कर पाता था। उसका कद ही छोटा था पर खेल उतना ही ऊंचा। वो फुटबॉल का डॉन ब्रैडमैन था,सचिन तेंदुलकर था और सुनील गावस्कर भी। जो जादू डॉन,सचिन या गावस्कर अपने बल्ले से रचते वो माराडोना अपने पैरों से रचता। 

वो 10 नंबर की जर्सी पहनता था। पेले और मेस्सी भी 10 नंबर की पहनते हैं। माने वो फुटबॉल का अतीत भी था,वर्तमान भी और भविष्य भी। सचिन भी 10 नम्बर की जर्सी पहनता था। ध्यान से देखिए ये सारे  अपनी प्रतिभा से उत्कृष्टता का एक कोमल संसार रचते। किसी कविता की तरह। ला डेसिमा की तरह। क्या ही संयोग है ना कि स्पेनिश कविता में भी 10 पंक्तियों का स्टेन्ज़ा होता है। वो फुटबॉल का जॉन मैकनरो भी था। उसी की तरह बिगड़ैल चैंपियन।

1986 के विश्व कप का इंग्लैंड के विरुद्ध क्वार्टर फाइनल का मैच उसके व्यक्तित्व का मानो आईना हो,उसके जीवन का शाहकार हो। उस मैच में उसने दो गोल दागे। पहला गोल उसने हाथ से किया। ये एक फ़ाउल था पर उस समय पकड़ में नहीं आया। बाद में उसने इसे 'हैंड ऑफ गॉड'कहा। लेकिन इस गोल के ठीक पांच मिनट बाद एक गोल किया। ये अदभुत गोल था। फुटबॉल खेल के कौशल का सर्वश्रेष्ठ निदर्शन। जिसे बाद में सदी का सर्वश्रेष्ठ गोल माना गया। उसने अपने हाफ में गेंद ली और इंग्लैंड के पांच खिलाड़ियों को मात देते हुए गोल किया। यहां तक कि गोलकीपर सेल्टन भी उसके पीछे रह गया था जब वो गेंद गोलपोस्ट के भीतर भेज रहा था। एक बेईमानी से नियम विरुद्ध और दूसरा असाधारण खेल कौशल से। ऐसे ही दो विरुद्धों से उसका जीवन बना था। एक खिलाड़ी के रूप में वो लेटिन अमेरिकी फुटबॉल की पेले और मेस्सी के बीच की कड़ी और फुटबॉल परंपरा और दीवानेपन का प्रतिनिधि खिलाड़ी ही नहीं है बल्कि उन दोनों के साथ उस महाद्वीप के फुटबॉल की महान प्रतिभाओं की त्रयी भी बनाता है। आप फुटबॉल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के लिए विश्व भर की परिकरामा कीजिए आ फिर  गणेश परिक्रमा की तरह केवल इन तीनों की। परिणाम एक ही होना है। लेटिन अमेरिका की सबसे बड़ी चंद पहचान आखिर क्या हैं साम्यवाद, फुटबॉल, कलात्मकता, मादक द्रव्य और आमजन का जीवन संघर्ष ही ना। तो लेटिन अमेरिका का माराडोना से बड़ा प्रतिनिधि चरित्र और क्या हो सकता है।  

माराडोना संघर्षों को जीता था। उसका जीवन ही संघर्षों से गढ़ा हुआ था। उसे अपने भीतर के  चारित्रिक विरुद्धों से ही संघर्ष नहीं करना था बल्कि  गरीबी और अभावों से ही लड़ना था। शायद संघर्ष उसकी नियति थी। उसे मैदान में भी सबसे कठिन और बहुत ही रफ टेकलिंग का सामना करना पड़ा। उसके विरुद्ध विपक्षी डिफेंडर उस पर टूट पड़ते। पर वो संघर्षों से तपा था। कोई भी ताप से झुलस नहीं सकता था। संघर्ष उसके जीवन की नियति थी तो क्लासिक प्रतिद्वंद्विताएँ उसके खेल जीवन की थाती थीं। फिर वो चाहे अर्जेंटीना की 'सुपर क्लासिको' हो,स्पेन की 'एल क्लासिको'हो या डर्बी डी इटेलिया की 'डर्बी डेल सोल' प्रतिद्वंदिता। उसने 16 साल की उम्र में 16 नम्बर की जर्सी से अपने प्रोफेशनल खेल की शुरुआत की अर्जेंटीनो जूनियर्स से। पर उसका सपना बोका जूनियर्स था। पूरा 1981 में हुआ। बोका से पहला सुपरक्लासिको मैच रिवर प्लेट के खिलाफ उसी साल 10 अप्रैल को खेला। पहले ही मैच में 3-0 से जीत हुई जिसमें एक गोल माराडोना का था। ये शुरुआत भर थी। 1982 के विश्व कप के बाद वो बार्सिलोना का हिस्सा हो गया तो बोका और रिवर प्लेट,बार्सिलोना और रियाल मेड्रिड में तब्दील हो गए। बस अगर कुछ नहीं बदला तो माराडोना का खेल। उसके खेल का जादू प्रतिद्वंदी प्रशंसकों पर भी इस कदर छा गया कि मेड्रिड समर्थकों से तारीफ पाने वाला पहला खिलाड़ी बन गया।  1984 में स्पेन से इटली आया नेपल्स में तो ये बार्सिलोना और मेड्रिड की प्रतिद्वंदिता अब नेपोली बनाम रोमा में तब्दील हो गयी। पर श्रेष्ठता माराडोना की टीम की ही बनी रही। उसने सेरी ए का नेपोली को सिरमौर बना दिया। यहां उसने नेपोली को ही चरम पर नहीं पहुंचाया बल्कि ये खुद माराडोना का भी सर्वश्रेष्ठ समय था।

वो सार्वकालिक फुटबॉल खिलाड़ी की फीफा वोटिंग में कई बार पेले के बाद दूसरे नंबर पर आया। पर बिना किसी संदेह के वो विश्व कप फुटबॉल का सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी था। 1986 का विश्वकप इसका प्रमाण है। 1986 में उसने अर्जेंटीना को चैंपियन बनाया। ये उसने अपने दम पर किया। ये टीम से ज़्यादा उसकी अकेले की, उसकी प्रतिभा,उसकी योग्यता की जीत थी। ये उसका अदभुत प्रदर्शन था। उसने इस प्रतियोगिता में 5 गोल और 5 असिस्ट की और हर मैच में पूरे समय खेला। ये साधारण मानव का एक असाधारण खिलाड़ी के रूप में असाधारण प्रदर्शन था। 

दरअसल  माराडोना का होना केवल एक महान खिलाड़ी का होना भर नहीं था,बल्कि फुटबॉल खेल की उत्कृष्टता का होना था। उसका होना प्रेरणा का अजस्र स्रोत होना था। उसका होना फुटबॉल के जादुई संसार का होना था। उसका होना फुटबॉल की मुहब्बत में डूब डूब जाना था। वो था तो फुटबॉल थी,फुटबॉल का खेल था,उसका संसार था,उसका खुमार था। अब वो नहीं है तो क्या ये सब ना होगा। होगा,ज़रूर होगा। किसी के जाने से दुनिया थोड़े ही ना रुक जाती है। पर यकीन मानिए वैसा बिल्कुल नहीं होगा जैसा उसके होने पर होता था।

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अलविदा 'एल पिबे डी ओरो'

ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल 2026

एक : फीके फीके से खेल इस बार के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ खेल बहुत फीके फीके से हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया द्वारा मेजबानी...