Sunday, 4 December 2022

अकाराज_17



अकाराज_17
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 हारा थका दिन सांझ हुआ उनींदा हुआ जाता है।

कि वो रात के सीने पर सर रख कर सो जाता है।

चांद-तारों की मद्धम रोशनी से अपना दामन सजा रात किसी प्रेमिका सी उसके जागने की प्रतीक्षा करती रहती है।

र प्रतीक्षा है कि बेचैनी का सबब हुई जाती हैं और अधूरी रहने को अभिशप्त भी।

ये जानते हुए भी कि एक का जीवन दूसरे की मृत्यु है,रात है कि खुद को प्रतीक्षा में गलाती जाती है या कि सुब्ह में विलीन हुई जाती है।

वो खुश थी कि खत्म भी हुई तो क्या हुआ उसने दिन को नया जीवन तो दिया।

धर सुब्ह हुआ दिन है कि रात को भूला जाता है।



विश्व कप फुटबॉल डायरी_02

 

                                                        (गूगल से साभार)

अर्जेंटीना की हार
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     जीवन में अनहोनी खाने में नमक की तरह है। नहोनी  जीवन में ठहराव नहीं लाती,बल्कि उसे कुछ और गतिशील बनाती है। खेल जीवन का एक हिस्सा है और इस नाते अनहोनी भी।

     क़तर में चल रहे फुटबॉल विश्व कप में सऊदी अरब की टीम मेस्सी की अर्जेंटीना को 2-1 से हरा दिया है। 'ग्री फॉलकन्स' ने 'ला अलबिसेलेस्टे' का शिकार कर विश्व कप के सबसे बड़े उलटफेर कर दिया है।

     अर्जेंटीना के समर्थकों और मेस्सी के चाहने वालों के लिए ये किसी गहरे सदमे सा है। किसी वज्रपात सा आघात है। लेकिन इस परिणाम ने अब ग्रुप सी को पूरी तरह ओपन कर दिया है और इस ग्रुप के मुकाबलों को और रोचक बना दिया है,ये भी सच है।

     बीती रात क़तर की राजधानी दोहा से लगभग 40 किलोमीटर दूर लुसैल स्टेडियम में इस बार विश्व कप जीतने के प्रमुख दावेदारों में एक अर्जेंटीना सऊदी अरब की टीम के विरुद्ध अपना विश्व कप पहला मैच खेल रही थी। दसवें मिनट में मेस्सी पेनाल्टी से गोल कर अर्जेंटीना को 1-0 की बढ़त दिला देता है। 1930 में उरुग्वे के विरुद्ध फाइनल मैच के बाद 'ला अलबिसेलेस्टे' पहले हॉफ में बढ़त बनाने के बाद कोई मैच नहीं हारा था। इतना ही नहीं वो पिछले 36 मैच से अजेय था और इटली के 37 मैचों में अजेय रहने के रिकॉर्ड से एक मैच कम। लेकिन विश्व की 51 वीं रैंकिंग वाली सऊदी अरब इतिहास बनाने मैदान में उतरी थी।

     पहले गोल के बाद भी अर्जेंटीना ने लगातार दबाव बनाए रखा और तीन बार गेंद गोल पोस्ट में अंदर डाली पर तीनों बार ऑफ साइड करार दिए गए एक बार मेस्सी और दो बार लोरेटो मार्टिनेज। लेकिन दूसरे हॉफ में कहानी बदल गयी। 4-1-4-1 के फार्मेशन से रक्षात्मक खेल रही सऊदी अरब ने अर्जेंटीना पर दबाव बनाया और 48वें मिनट सालेह अल शेहरी ने बराबरी का गोल किया और फिर 53वें मिनट में सालेम अल दौसरी ने बढ़त दिलाकर विश्व कप फुटबॉल के सबसे बड़े उलटफेर को अंजाम दिया।

     सऊदी अरब के लिए ये 1994 के इतिहास की पुनरावृत्ति थी जब उसने बेल्जियम को 1-0 से हराया था और अर्जेंटीना के लिए 1990 के इतिहास का जब माराडोना की टीम को कैमरून ने 1-0 से हराया था।

     याद कीजिए 2018 के विश्व कप के अर्जेंटीना और फ्रान्स के प्री क्वार्टर फाइनल मैच की। एमबापे के खेल ने मेस्सी और अर्जेंटीना के विश्व कप को जीतने का सपना तोड़ दिया था। मैच की अंतिम सीटी बजते ही मैस्सी धीमे धीमे कदमों से मैदान से बाहर चल दिए थे। उन्होंने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा था। क्योंकि वे जानते थे कि कजान स्टेडियम में उनके विश्व कप का सफर खत्म हो चुका है।

      लेकिन लुसैल स्टेडियम में 103 मिनट बाद जब मैच की अंतिम सीटी बजी तो वे बीच मैदान में खड़े नीचे ज़मीन को निहार रहे थे। वे मैदान छोड़कर नहीं गए। क्योंकि वे जानते थे ये सफर का अंत नहीं है। कजान में नॉक आउट हो गए थे,यहां लीग मैच था। आगे बढ़ने और विश्व कप जीतने की उम्मीदें और अवसर अभी बरकरार हैं।

       मैच समाप्त होने के बाद मैस्सी मैदान को देख रहे थे तो शायद वे उन संभावनाओं को तलाश कर रहे होंगे कि क्या वे एक बार फिर 18 दिसंबर को वे वहां होंगे। फाइनल इसी मैदान पर 18 दिसंबर को जो होना है। वे उस हरी घास के नीचे के रेगिस्तानी रेत में पानी के कुछ कण देखने की कोशिश में रहे होंगे और उनमें विश्व कप जीतने की उम्मीदों का अक्स खोज रहे होंगे। 

                                                 (गूगल से साभार

     और उस रेगिस्तानी रेत में निश्चय ही उन्हें कुछ पानी की बूंदे दिखाई दी होंगी। और ये भी उन्हें अहसास हुआ होगा कि वे बूंदे विदाई के दुख से निकली बूंदे नहीं हैं,बल्कि मैस्सी के सपने के टूट जाने की आशंका से निकले स्वेद कण भर हैं।

      मैच के बाद एंजेल डि मारियो कह रहे थे 'विश्व कप शुरु होने से पहले ना हम सर्वश्रेष्ठ थे और ना है और ना हार के बाद हम निकृष्टम।' 

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म्मीद अभी कायम है - मैस्सी की भी,अर्जेंटीना की भी और उनके चाहने वालों की भी।



Wednesday, 23 November 2022

हैय्या हैय्या फुटबॉल_ विश्व कप 2022 डायरी_01



व्यक्ति के हाथ भी कितने जादुई होते हैं! उनसे कितनी जादुई करामातें की जा सकती हैं,ये हम सब जानते हैं। आखिर यूँ ही उक्तियाँ थोड़े ही बनी हैं कि 'व्यक्ति के हाथ में उसकी किस्मत होती है' या फिर 'अपना हाथ जगन्नाथ'। लेकिन यकीन मानिए दोस्तों पैर भी कम जादुई नहीं होते हैं। उनसे भी जादुई संसार रचा जाता है।

जब पैर लय से थिरकते हैं तो नृत्य जैसी खूबसूरत मनमोहक कला का जन्म होता है। जब उन पैरों की लय को गति और घुंघरुओं का साथ मिलता है तो व्यक्ति केलुचरण महापात्र,पं बिरजू महाराज,मृणालिनी साराभाई,गोपी कृष्ण, लच्छू महाराज,सोनल मानसिंह या फिर माइकल जैक्सन, मिखाइल बेरिश्निकोव, मैडोना, शकीरा और मार्था ग्राहम जैसे अद्भुत कलाकारों के रूप में दुनिया में जाने जाते हैं।

जब इन पैरों को लय के साथ गति और शक्ति मिलती है तो दुनिया को अविस्मरणीय दौड़े मिलती हैं और मिलते हैं महान धावक। ये इन पैरों की करामात थी कि फेडीपिडिस मैराथन के युद्ध के मैदान से एथेंस तक एक ऐतिहासिक दौड़ दौड़ता है। इन्हीं पैरों की अदभुत करामात से पावो नूरमी,जेसी ओवेन्स,सेबेस्टियन को,बेन जॉनसन, उसैन बोल्ट,कार्ल लेविस, ग्रिफ्फिथ जॉयनर,मो फराह,हैली गैब्रेसिलासी, मिल्खा सिंह और पी टी उषा बनते हैं,जिनके पैरों की गति,लय और शक्ति मिलकर आपको विस्मय से भर देती हैं।


ठीक ऐसे ही, जब पैरों की गति और लय को एक अदद 60 सेंटीमीटर परिधि वाली और लगभग 300 ग्राम वजन वाली गेंद मिलती है तो फुटबॉल जैसा अनोखा खेल बनता है जिसे हमारी दुनिया के हर कोने में चाहने वाले लोग होते हैं। जो दुनिया की अधिकांश जनता का सबसे प्रिय खेल बन जाता है। जब 100 गज लंबे और 65 गज चौड़े मैदान में जब एक जोड़ी पैर इस गेंद के संपर्क में आते हैं तो पैर गति और लय से कलात्मकता का एक ऐसा जादुई संसार रचते हैं कि देखने वाले आनंद के सागर में डूब डूब जाते हैं। ये पैर फुटबॉल के उन जादूगरों के होते हैं जिन्हें हम और आप पेले,माराडोना,मेस्सी,रोनाल्डो,नेमार,बेंजीमा,

पाउलो रोसी,जोहान क्रुफ,जिनेदिन ज़िदाने,फ्रांज़ बेकनबाउर,अल्फ्रेडो डी स्टिफानो या ऐसे ही ना जाने कितने नामों से जानते हैं। 

यूं तो ये करामाती पैरों के जादूगर साल दर साल अपने जादू से दर्शकों को एक रोमानी दुनिया में ले जाते रहते हैं। पर हर 4 साल में एक बार दुनिया के किसी एक कोने में इन जादूगरों का एक मेला लगता है, जहां इनमें एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ लगी रहती है। और इस होड़ में वे अपने चाहने वालों को चमत्कृत करते रहते हैं। वहां इन के पैरों की प्रतिभा की सीमा आकाश की अनंत ऊंचाई होती है। पैरों के इन जादूगरों के इस चार साला मेले को हम और आप फीफा विश्व कप के नाम से जानते हैं।


इस बार ये मेला  खाड़ी के देश क़तर में कल यानि 20 नवंबर से शुरू होने जा रहा है जो 18 दिसंबर तक चलेगा। लगभग एक महीने चलने वाली इस प्रतियोगिता में पांचों महाद्वीप की 32 सर्वश्रेष्ठ टीमें अपने अद्भुत खेल कौशल,रणनीति चातुर्य और तकनीकी श्रेष्ठता का सर्वोत्तम निदर्शन करेंगी और और फुटबॉल की दुनिया का सिरमौर बनने की कोशिश में अपना सबकुछ झोंक देने को तत्पर रहेंगी।

इस बार विश्व कप के लिए 5 कॉन्फेडरेशन से कुल 32 देशों ने अहर्ता प्राप्त की है। एशियन फुटबॉल एसोसिएशन से छह टीम,कॉन्फेडरेशन ऑफ अफ्रीकन फुटबॉल से पांच टीम,कॉन्फेडरेशन ऑफ नार्थ सेंट्रल अमेरिका एंड कैरेबियन एसोसिएशन फुटबॉल और साउथ अमेरिकन फुटबॉल असोसिएशन से चार-चार टीम और यूनियन ऑफ यूरोपियन फुटबॉल असोसिएशन से तेरह टीम शामिल हैं।

इन 32 टीमों से केवल 24 वे टीम हैं जो 2018 के विश्व कप में खेली थीं। इस बार मेज़बान क़तर की एकमात्र टीम जो विश्व कप फाइनल में पहली बार खेल रही है। वो मेजबान होने के नाते इसमें खेल रही है। अन्यथा ये पहला विश्व कप है जिसमें क्वालीफाई करने वाली टीमों में एक भी डेब्यू नहीं कर रही है। हॉलैंड,घाना,इक्वेडोर,कैमेरून और अमेरिका की पिछले विश्व कप में अनुपस्थिति के बाद फिर से वापसी कर रही हैं। कनाडा की टीम 36 साल बाद वापसी कर रही है तो वेल्स की टीम 64 साल बाद।

इस बार भी सबके ज़्यादा कमी चार बार की विश्व चैंपियन और वर्तमान यूरोपियन चैंपियन इटली की होगी। वो लगातार दूसरी बार विश्व कप के लिए क्वालीफाई करने में विफल रही है।

32 टीमों को कुल आठ ग्रुप में बांटा गया है। ये लीग काम नॉक आउट आधार पर खेला जाएगा।प्रत्येक ग्रुप से दो टीमें नॉक आउट चरण के लिए क्वालीफाई करेंगी। यूं तो इस बार किसी भी ग्रुप को 'ग्रुप ऑफ डेथ'नहीं कहा जा रहा है लेकिन बावजोइड इसके ग्रुप ई को सबसे कठिन ग्रुप माना जा रहा है। इसमें में पुर्तगाल,जर्मनी,कोस्टारिका और जापान।

इस बार विश्व रैंकिंग में नंबर एक टीम और पांच बार की चैंपियन ब्राजील सबसे फ़ेवरिट टीम मानी जा रही है। पिछली चैंपियन फ्रांस,अर्जेंटीना,पुर्तगाल  बेल्जियम भी इस बार के फ़ेवरिट हैं। इसके अलावा जर्मनी और क्रोशिया की टीम को भी कम नहीं आंका जा रहा है।

1930 में उरुग्वे से शुरू हुए फीफा विश्व कप का ये 22वां संस्करण है। क़तर को 2010 में मेजबानी सौंपी गई तब से ही उसकी मेजबानी लगातार विवादों के घेरे में रही है। ये कहा गया कि क़तर ने मेजबानी के लिए फीफा ऑफिशल्स को घूस दी थी और क़तर मेजबानी योग्य नहीं था। सामान्यतः विश्व कप जून जुलाई में होते हैं,जबकि उस समय क़तर में भीषण गर्मी पड़ती है। इसी वजह से इसका समय बदल कर नवंबर दिसंबर कर दिया गया। लेकिन ये समय अनेक बड़ी लीग का समय होता है। इसलिए के लीग को स्थगित करना पड़ा और पूरा फुटबॉल सीजन गड़बड़ा गया।

समलैंगिकों पर और शराब पर प्रतिबंध की भी पश्चिमी देशों की मीडिया में खूब आलोचना हुई। लेकिन सबसे बड़ी आलोचना स्टेडियमों और विश्व कप के अन्य निर्माण में लगे आप्रवासी मजदूरों के शोषण के लिए की जा रही है। कथित तौर पर इन निर्माण कार्यों के दौरान छह हजार से ज़्यादा मजदूरों की मौत हुई।

फिलहाल विश्व कप कुल आठ स्टेडियम में खेले जाएंगे। सबसे बड़ा स्टेडियम लुसैल स्टेडियम है जिसकी क्षमता 80 हज़ार दर्शकों की है। दूसरा बड़ा स्टेडियम अल खोर में स्थित अल बहत स्टेडियम है जिसकी क्षमता 60 हज़ार दर्शकों की है। इसके अलावा दोहा का स्टेडियम 974 और अल थमामा स्टेडियम,खलीफा इंटरनेशनल स्टेडियम,एजुकेशन सिटी स्टेडियम,अल जैनब स्टेडियम और अहमद बिन अली स्टेडियम हैं। उद्घाटन समारोह और उसके बाद प्रतियोगिता का पहला मैच मेजबान क़तर और इक्वेडोर के बीच अल बहत स्टेडियम में होगा और फाइनल मैच लुसैल स्टेडियम में। 

इस बार प्रतियोगिता का शुभंकर है लाईब(la'eeb) इस अरबी शब्द का अर्थ है 'सुपर कुशल खिलाड़ी'। ऑफिसियल बॉल है 'अल रिहला'जिसका अर्थ है 'यात्रा'। इस बार चार फीफा ने चार आधिकारिक गीत 'हैया हैया', 'हरबो', 'लाइट द स्काई' और 'तुको ताखा'जारी किए हैं।

ये विश्व कप प्रतियोगिता इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि फुटबॉल इतिहास के दो सबसे बड़े खिलाड़ी - मैस्सी और रोनाल्डो का ये पांचवा और अंतिम विश्व कप है।

जो भी हो इस विश्व कप में विश्व के सबसे शानदार खिलाड़ियों की दक्षता और प्रतिभा का मुकाबला या फिर फुटबॉल की महारथी टीमों के बीच संघर्ष भर देखने को नहीं मिलेगा बल्कि विश्व के सबसे बड़े फुटबॉल मैनेजरों की रणनीतियों और व्यूह रचना कौशल के संघर्ष की आजमाइश भी होगी। विभिन्न खेल शैलियों की टकराहट और मुकाबले का निदर्शन भी होगा और खेल के पीछे अलग अलग महाद्वीपों की सामाजार्थिक और सांस्कृतिक मूल्यों बीच श्रेष्ठता का द्वंद भी।

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ये आनंद और रोमांच में डूब जाने का समय है। भले ही आप कतर में ना हों,बस कल से टीवी का स्विच ऑन कर लीजिए और टीवी का रिमोट हाथ में धारण।



एक कदम आगे




 एक कदम आगे

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बीसीसीआई के एक निर्णय के अनुसार 'अब से महिला क्रिकेटरों को भी पुरुषों के समान पारिश्रमिक मिलेगा'। 2006 में भारतीय महिला क्रिकेट एसोसिएशन के बीसीसीआई में विलय होने के बाद से बीसीसीआई द्वारा महिला क्रिकेट के लिए पहला बड़ा और ठोस कदम है। ये लड़कियों की कड़ी मेहनत और संघर्ष का नतीजा है। ये वही लड़कियां हैं जिन्हें कभी अपनी किट और दैनिक भत्तों तक के लिए संघर्ष करना पड़ता था।

मिताली राज,हरमनप्रीत कौर ,झूलन गोस्वामी, स्मृति मंधाना जैसी खिलाड़ियों ने अपने खेल के को उन ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया कि वे 'क्रिकेटिंग आइकॉन' बन गईं। हाल के दिनों में भारतीय महिला क्रिकेट ने महत्वपूर्ण सफलताएं प्राप्त की हैं और क्रिकेट जगत में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। इसका दबाव भी इस निर्णय में ज़रूर रहा होगा।

सच बात तो ये है कि बीसीसीआई ने ये लड़कियों को सौगात खैरात में नहीं दी है। दरअसल अब उनकी उपेक्षा की ही नहीं जा सकती थी। उन्हें पता है कि अब महिला भारत में इतना लोकप्रिय हो गया है कि उसे बेचा जा सकता है। निसंदेह ये लड़कियों की कड़ी मेहनत का हासिल है। और बीसीसीआई इस महत्वपूर्ण अवसर को कैसे हाथ से जाने दे सकता था। 

ध्यान दीजिए अगले सीजन से महिला आईपीएल भी शुरू होने जा रहा है।

और हां ये समानता अभी अधूरी है। लड़ाई बाकी है। ये केवल फीस की समानता है। अनुबंध में अभी भी भारी अंतर है।

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फिर भी बहुत बधाई लड़कियों!

Sunday, 25 September 2022

थम गई चकदाह एक्सप्रेस

 


शहर लंदन भी क्या शहर है। कितना खुशकिस्मत। कितना प्रिविलेज्ड। फुटबॉल का वेम्बले इस शहर में है। टेनिस का विंबलडन इस शहर में है। क्रिकेट का लॉर्ड्स इस शहर में है।

शायद ये इस शहर का आकर्षण ही है कि लंबे समय से अनवरत दौड़ रहीं दो खेल एक्सप्रेस यहां आकर ठहर जाती हैं हमेशा हमेशा के लिए। 

ये साल 2022 है। तारीख़ 24 सितंबर की है। खेल इतिहास में दो सफे लिखे जा रहे हैं। दो खेलों के दो महान खिलाड़ी अपने अपने खेल मैदान को अलविदा कह रहे हैं।

24 साल से निरंतर दौड़ रही टेनिस की 'फ़ेडेक्स'शहर के 'द ओ टू' एरीना में आकर ठहर जाती है।

उधर कोलकाता के ईडन गार्डन से एक क्रिकेट एक्सप्रेस 'चकदा एक्सप्रेस' 20 साल लंबी अनवरत यात्रा कर क्रिकेट के मक्का 'लॉर्ड्स'पहुंचती है और यहां आकर विश्राम की मुद्रा में ठहर जाती है।


महिला क्रिकेट की दुनिया की सबसे सफल और सबसे तेज गेंदबाज झूलन निशित गोस्वामी अपने बेहद सफल और 20 साल लंबे  कॅरियर के समापन की घोषणा करती हैं।

ये बीस साल लंबा जीवन हैरतअंगेज कर देने वाला है। इस दौरान वे 12 टेस्ट मैच, 204 एकदिवसीय मैच और 68 टी20 मैच खेलती हैं। वे एकदिवसीय क्रिकेट में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाली खिलाड़ी हैं। उन्होंने कुल 255 विकेट लिए हैं। दक्षिण अफ्रीका की शबनिम इस्माइल के 191 और ऑस्ट्रेलिया की फ्रिट्ज़पेट्रिक से मीलों आगे। इतना ही नहीं क्रिकेट के सभी फॉर्मेट में कुल मिलाकर सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाली खिलाड़ी हैं। उनके नाम कुल 355 अंतरराष्ट्रीय विकेट हैं। उनके बाद कैथरीन ब्रन्ट (329),एलिस पेरी(313)शबनिम इस्माइल(309) और अनीसा मोहम्मद (305)  ही तीन सौ से अधिक विकेट लेने वाली गेंदबाज हैं।

झूलन एक बेहतरीन आल राउंडर खिलाड़ी हैं। मध्यम तेज गति की गेंदबाज और मध्यमक्रम की राइट हैंड बल्लेबाज़। गति उनकी बोलिंग का सबसे बड़ा हथियार है। वे निरंतर 120 किमी की गति से गेंद फेंकती रहीं है। तेज गति और अचूक लेंथ और लाइन उन्हें दुनिया की सबसे सफल गेंदबाज बनाती है।

झूलन साल 2002 में 19 साल की उम्र में चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ एकदिवसीय मैच से अपने अंतरराष्ट्रीय कॅरियर की शुरुआत करती हैं। तीन महीने बाद इंग्लैंड के विरुद्ध ही वे अपना पहला टी20 मैच खेलती हैं। टेस्ट क्रिकेट का आगाज़ करने के लिए उन्हें चार साल और इंतज़ार करना पड़ता है। लेकिन इसकी शुरुआत भी होती इंग्लैंड के विरुद्ध ही है।

क्या ही संयोग है वे अपने कॅरियर की समाप्ति भी इंग्लैंड के खिलाफ ही मैच से करती हैं। कितनों के भाग्य में कॅरियर की समाप्ति लॉर्ड्स के मैदान में करना लिखा होता है। ये झूलन के भाग्य में था। ये उन्हें मिला नहीं। उन्होंने इसे अर्जित किया है।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम इंग्लैंड के दौरे पर है। वो पहले दो मैच जीतकर 2-0 की बढ़त ले चुकी है। ऐसा पिछले 24 सालों में पहली बार हो रहा है।

फिर 24 सितंबर का दिन आता है। भारत इंग्लैंड के विरुद्ध सीरीज का तीसरा मैच होने जा रहा है। भारतीय बालाएं सीरीज जीत चुकी हैं। पर उनकी आंखें नम हैं। उनके हृदय मलिन हैं। लॉर्ड्स की फिजा में नमी उग आई है। सारा वातावरण सीला सीला सा है। उनकी अपनी पूर्व कप्तान, दुनिया की सबसे सफल गेंदबाज आज अंतिम बार जो मैदान पर उनके साथ उतरेगी।

झूलन गोस्वामी इस मैच के बाद क्रिकेट को विदा कह देंगी।

अब अद्भुत दृश्य आकार लेते जाते हैं।

मैच से पहले टॉस हो रहा है। भारतीय कप्तान टॉस के लिए अकेले नहीं जाती। उनके साथ झूलन जा रहीं हैं। इंग्लैंड की कप्तान एमी जोंस सिक्का उछालती हैं और झूलन 'हेड' कहती हैं। टॉस एमी जीतकर क्षेत्र रक्षण चुनती हैं। अब झूलन और एमी हाथ मिलाती हैं। झूलन के बराबर खड़ी हरमनप्रीत की आंखें डबडबा आई हैं।


अब भारतीय टीम बैटिंग कर रही है। भारत के सात विकेट आउट हो चुके हैं। पूजा वस्त्रकार आउट होकर वापस पैवेलियन लौट रही हैं और झूलन मैदान में प्रवेश कर रही हैं। सीमारेखा के अंदर इंग्लैंड की सभी खिलाड़ी दो समानांतर पंक्तियों में खड़ी हैं। वे झूलन को गार्ड ऑफ ऑनर दे रही हैं।

अब भारतीय टीम फील्डिंग के लिए मैदान में जा रही है। भारतीय खिलाड़ी कतारबद्ध खड़ी हैं और झूलन को 'गार्ड ऑफ ऑनर'दे रही हैं। वे झूलन को ऐसे ही पिच तक ले जाती हैं। 

ये इंग्लैंड की पारी का 36वां ओवर है। गेंद झूलन के हाथ में हैं। वे अपनी इस पारी का दसवां और अपने खेल कैरियर की आखिरी 6 गेंद फेंकने वाली हैं। 5 गेंद फेंक चुकी हैं। अब उन्होंने अपनी आखिरी गेंद फेंकी। ये एक डॉट बॉल थी। उनके जीवन की 10005वीं गेंद थी। अब तक किसी और गेंदबाज ने इतनी गेंद नहीं डाली हैं। पर झूलन औरों से जुदा हैं। वे ये कारनामा कर सकती हैं। उन्होंने कर दिखाया है।

आखिरी गेंद फेंकते ही हरमनप्रीत दौड़कर झूलन को बाहों में भर लेती हैं। उनकी आंखों से पानी बरस रहा है। इतने में सारे खिलाड़ी उनसे लिपट गए हैं। आंखें सबकी बरस रहीं हैं।

मैच समाप्त हो गया है। भारत ने ये मैच 16 रनों से जीतकर सीरीज क्लीन स्वीप कर ली है। खिलाड़ियों ने झूलन को कंधों पर उठा लिया है और कंधों पर झूलन को मैदान से बाहर जाए जाते हैं। ऐसी बिदाई झूलन के अलावा बस क्रिकेट के भगवान सचिन को ही नसीब हुई है।

दरअसल लॉर्ड्स के मैदान के ये अद्भुत दृश्य, अपने साथी को ऐसी विदाई, ऐसा सम्मान पाने के दृश्य ऐसे ही नहीं बनते। इसके पीछे घोर संघर्ष,कड़ी मेहनत, अदम्य इच्छाशक्ति और दृढ़ मनोबल की ज़रूरत पड़ती है। झूलन को ये सम्मान यूं ही नही मिल गया। ये उन्होंने अपने लिए अर्जित किया है।

ये सम्मान उनके द्वारा देखे गए सपने और उन सपनों को पूरा करने की उनकी लगन,उनकी कड़ी मेहनत,उनके असाधारण परिश्रम और अदम्य साहस का प्रतिफल है। ये क्रिकेट के लिए उनका जूनून था। टीन ऐज में रोजाना चकदाह से कोलकाता के विवेकानंद स्टेडियम तक का 80 किलोमीटर का फ़ासला झूलन जैसी जीवट की बालिका के बस की बात हो सकती है।

ये झूलन का जूनून, उनकी मेहनत और लगन ही थी कि चकदाह से कोलकाता का सफर चेन्नई से लॉर्ड्स लंदन तक के सफर में तब्दील हो जाता है। कि फुटबॉल की दीवानी एक लड़की विश्व की सबसे सफल गेंदबाज बन जाती है। कि वो अद्भुत सम्मान और अपूर्व प्रेम की हकदार बन जाती है।

झूलन का ये सम्मान दरअसल एक खिलाड़ी भर का सम्मान नहीं है। ये भारतीय महिला क्रिकेट का सम्मान है। झूलन का संघर्ष केवल एक खिलाड़ी का संघर्ष नहीं है,ये भारतीय महिला क्रिकेट का संघर्ष और विजयगाथा है।

भारतीय महिला क्रिकेट का सम्मान पाने और समान दर्जा पाने का संघर्ष पिछली शताब्दी में सत्तर के दशक में शांता रंगास्वामी जैसी ख़िलाडियों के साथ शुरू होता है। 2006 में महिला क्रिकेट का प्रबंधन बीसीसीआई अपने हाथों में ले लेता है। पर महिला खिलाड़ियों का संघर्ष जारी रहता है। उनकी स्थिति किस हद तक दयनीय थी इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें अपनी किट तक के लिए लड़ाई लड़नी होती थी। उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी योग्यता से उन्होंने विश्व क्रिकेट में अपनी हैसियत बनाई और वो सम्मान हासिल किया जो 24 सितंबर 2022 को लॉर्ड्स में झूलन को मिला।

झूलन  की असाधारण विदाई और सम्मान केवल झूलन का सम्मान नहीं है,ये भारतीय महिला क्रिकेट का सम्मान है,पूरी आधी आबादी का सम्मान है।

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झूलन को असाधारण क्रिकेट कॅरियर और उपलब्धियों के लिए बधाई और जीवन की नई पारी के लिए शुभकामनाएं।

खेल मैदान से अलविदा झूलन


रुक जाना 'फ़ेडेक्स' का




सुप्रसिद्ध शायर फ़िराक गोरखपुरी साहब ने कभी एक शेर कहा था-

"आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख्र करेंगी हम अशरो। 

जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने फ़िराक़ को  देखा है। "

भले ही हमने अदबी दुनिया के 'फिराक' को ना देखा हो,लेकिन हमने खेलों की दुनिया के 'फ़िराक' को देखा है। कि हमने रोजर फेडरर को खेलते हुए देखा है। यकीन मानिए आने वाली नस्लें ज़रूर उन सब पर रश्क़ करेंगी जिन्होंने फेडरर को खेलते हुए देखा है। जो उनके 24 साल के खेल जीवन के साक्षी रहे हैं। जिन्होंने 2003 में विंबलडन खिताब से लेकर 2022 में 23-24 सितंबर की रात को लेवर कप में राफा के साथ जोड़ी बनाकर यूरोप की टीम से अन्तिम मैच तक खेलते फेडरर को देखा ही नहीं उस खेल के जादू को महसूस किया है। 

ऐसी खुशनसीबी कितनों के भाग्य में बदी होती है।

कुछ साधक अपनी विधा के साधक भर नहीं होते, वे जादूगर होते हैं। वे अपने विधा से प्रभावित नहीं करते,बल्कि सम्मोहित करते हैं। एक ऐसा सम्मोहन जिसके असर से ताउम्र निकल नहीं पाते। बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का जादू हो या कुमार गंधर्व के गायन का। कहां कोई बच पाता है। उदय शंकर के पैरों की थिरकन  का जादू हो लच्छू महाराज की भंगिमाओं का जादू। कौन अछूता रह जाता हैं। बेगम अख्तर की गमकती आवाज हो या परवीन शाकिर की मखमली आवाज। कौन इसमें डूब डूब नहीं जाता। 

इनकी कला के सम्मोहन से कहाँ कोई बच पाता है।

और हां, रोजर फेडरर के खेल के जादू से भी कोई कहां बच पाता है।


स्विट्ज़रलैंड की खूबसूरत वादियों में बसे बासेल में जन्मा ये जादूगर मानो अपनी धरती की सारी खूबसूरती खुद अपने में और अपने खेल में समेटे पैदा हुआ हो जिसने आगे चलकर अपने खेल कौशल से,अपनी कला से,उसके खूबसूरत निदर्शन से सारी दुनिया को अभिभूत कर देना था। कि हर किसी को उसके सम्मोहन के मोहपाश में बंध जाना था।

ये दुनिया एक रंगमंच है जिसमें पर्दा उठता है और गिरता है। टेनिस की दुनिया भी रंगमंच से इतर कहां कुछ है। जिस पर पिछले कितने दिनों से तीन पात्रों वाले जादुई यथार्थ वाले शो का मंचन चल रहा है। एक ऐसा शो जिसका पर्दा एक बार उठा तो गिरने का नाम ही ना लेता। एक ऐसा मंच जिस पर तीन पात्रों की कला का जादू बिखर बिखर जाता है। 

ये फेडरर,राफा और नोवाक है। 

ये तीनों हैं कि थकने का नाम ही ना लेते। रंगमंच का परदा हैं कि गिरने का नाम ही ना लेता। अनवरत चलता शो। तीन अंकों का। तीन अंक,तीन पात्रों द्वारा अभिनीत। पात्र, एक दूसरे से अलग भी और एक दूसरे से प्रतिघात करते हुए भी। पात्र एक दूसरे में गुँथे हुए। पात्र एक दूसरे से स्वतंत्र होते भी एक दूसरे में एकाकार। एक दूसरे के बिना आधे अधूरे से। 

ये टेनिस के आइकॉन है। ये टेनिस के देवता है। ये टेनिस की प्रतिमूर्ति हैं। 

ये फेडरर हैं,ये राफा हैं,ये नोवाक हैं।  

अंततः 

इन तीनों में से एक 'अंक' समाप्त हो रहा है। एक पर्दा गिर रहा है। एक पात्र रंगमंच से विदा ले रहा है। टेनिस का एक युग समाप्त हो रहा है। 

कि किसी ग्रीक देवता सा एक खिलाड़ी जिसे दुनिया 'फ़ेडेक्स' कहती है, टेनिस की दुनिया को अलविदा जो कह रहा है।

फेडरर अपने सन्यास के लिए लंदन को चुनते हैं। एक ऐसा स्थान जहाँ से वे महानता की पहली सीढ़ी चढ़ते हैं। अपना पहला जूनियर खिताब जीतते हैं। अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीतते हैं।

 वे एक ऐसा समय चुनते हैं जब 19 साल का एक युवा खिलाड़ी कार्लोस अलकराज यूएस ओपन जीतकर रंगमंच से एक नए शो का पर्दा उठाता है और मंच से उदघोषणा करता है कि हम आपके योग्य उत्तराधिकारी हैं। और फेडरर हैं कि नई पीढ़ी के लिए मंच खाली कर देते हैं।

वे अपने सन्यास के लिए एक ऐसे अवसर  का चुनाव करते हैं जो टेनिस के महान खिलाड़ी रॉड लेवर के नाम पर आयोजित होता है जिनके प्रति फेडरर के मन में अगाध श्रद्धा है और जिस प्रतियोगिता को आकार लेने में वे खुद बड़ा योगदान करते हैं। वे लेवर कप में अपना आखिरी मैच खेलना चुनते हैं।

वे अपने लिए लंदन को चुनते हैं। वो लंदन जो टेनिस के जन्मस्थली इंग्लैंड की राजधानी है। लंदन जहां विम्बलडन है। वो विम्बलडन जहां वे आठ खिताब जीतते हैं। उस लंदन में जहां टेनिस अपने सबसे क्लासिक रूप में आज भी शेष है। वहां टेनिस का सबसे क्लासिक खिलाड़ी पहले टेनिस से एकाकार होता है और फिर को अलविदा कहता है। 

टेनिस है कि फेडरर हुई जाती है। फेडरर हैं कि टेनिस हुए जाते हैं। 'इन्दिरा इज इंडिया'पर बहुतेरों को गुरेज हो सकता है। पर कौन ऐसा होगा जिसे इस बात पर एतराज हो कि 'फेडरर इज टेनिस'या फिर 'टेनिस इज फेडरर'।

फेडरर 1998 में विंबलडन का जूनियर खिताब जीतते हैं। 2001 में विम्बलडन के चौथे दौर में उस समय के सबसे बड़े खिलाड़ी पीट सम्प्रास को हराकर टेनिस टूर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। और फिर 2003 का साल आता है। वे विम्बलडन खिताब जीतकर एक नए युग के आरंभ की घोषणा करते हैं। 

और फिर 2008 तक टेनिस का समय केवल फेडरर का समय होता है जब विम्बलडन फाइनल में एक ऐतिहासिक मैच में राफेल नडाल उन्हें 6-4,6-4,6-7(5-7),6-7(8-10),9-7 से हरा नहीं देते। लगभग 5 घंटे चले इस मैच को मैकनरो सहित तमाम टेनिस विशेषज्ञ टेनिस इतिहास का सर्वश्रेष्ठ मैच मानते हैं।

उसके बाद का समय उनके पराभव का नहीं बल्कि महान त्रिकोणीय प्रतिद्वंदिता का समय है। उस समय तक टेनिस परिदृश्य पर नोवाक भी नमूदार जो हो जाते हैं। हालांकि इस त्रिकोणीय प्रतिस्पर्धा को चतुष्कोणीय बनाने के लिए एंडी मरे भी जोर आजमाइश करते पाए जाते हैं। लेकिन वे जल्द ही श्रीहीन हो जाते हैं।

जिस समय फेडरर टेनिस परिदृश्य पर पदार्पण करते हैं वो संक्रमण काल था। संक्रमण इसलिए कि खेल अपना स्वरूप बदल रहा था। सर्व और वॉली का खेल बेसलाइन के खेल में बदल रहा था।

रैकेट में आई तब्दीली इस बदलाव का बायस थी। उस समय फेडरर ने सर्व और वॉली टेक्नीक को बचा कर रखा था। वे अपने आदर्श पीट सम्प्रास की तरह तेज सर्विस करते और जितना अच्छा बेसलाइन से खेलते उतना ही अच्छा नेट पर खेलते। वे शानदार ताकतवर ग्राउंड स्ट्रोक्स से विपक्षी को हतप्रभ कर देते। पर कोणीय फोरहैंड इनसाइड आउट शॉट उनका सबसे मारक हथियार था और एक हाथ वाला बैकहैंड उनका सबसे खूबसूरत और ग्रेसफुल शॉट। 

उनके खेल की सबसे खूबसूरत बात उनका कोर्ट कवरेज होता। वे  पूरे कोर्ट में पानी की तरह बहते से प्रतीत होते। एक कोने से  दूसरे कोने तक पहुंचना एकदम एफर्टलेस होता। ऐसा करते देखना एक ट्रीट से कम ना होता।


किसी भी खिलाड़ी की महानता केवल उसकी अपनी उपलब्धियों भर से निर्धारित नहीं होती,बल्कि इस बात से भी होती कि उसके प्रतिद्वन्दी कैसे थे। खेल इतिहास में हर महान खिलाड़ी की महान प्रतिद्वंद्विताएँ रही हैं। दरअसल ये प्रतिद्वंद्विताएँ एक दूसरे के खेल को समृद्ध करती चलती है और ये दोनों मिलकर अंततः खेल को समृद्ध करती हैं। खेलों की कुछ महान प्रतिद्वंद्विताओं को देखिए। मुक्केबाजी में मोहम्मद अली बनाम जो फ्रैजियर,टेनिस में मार्टिना नवरातिलोवा बनाम क्रिस एवर्ट,बैडमिंटन में लिन डान बनाम ली चोंग वेई,गोल्फ में अर्नाल्ड पामर बनाम जैक निकलस या फिर बास्केटबॉल में लॉरी बर्ड बनाम मैजिक जॉनसन। और भी ना जाने कितनी। व्यक्तिगत भी और दलगत भी।

ठीक इसी तरह की प्रतिद्वंदिता फेडरर बनाम राफा,फेडरर बनाम नोवाक और नोवाक बनाम राफा हैं। सच तो ये है इनमें से किसी एक की बात शेष दोनों का उल्लेख किए बिना पूरी हो ही नहीं सकती। इन तीनों की प्रतिद्वंदिता ने टेनिस को असीमित ऊंचाइयों पर पहुंचाया है,उसे लिमिटलेस बना दिया है। ये एक तथ्य भर है कि 2003 से लेकर अब तक के कुल 77 ग्रैंड स्लैम में से 63 इन तीनों ने जीते हैं। राफा ने 22,नोवाक ने 21 और फेडरर ने 20। 


 ये आंकड़े हैं जो रिकॉर्ड भर बनाते हैं। अपने समय के सुप्रसिद्ध खिलाड़ी रिचर्ड्स गास्केट का मानना है कि जब महानतम निर्धारित करने की बात आती है तो ग्रैंड स्लैम की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण 'एस्थेटिक्स और ग्रेस'हैं। वे कहते हैं' फेडरर को किसी से भी रिप्लेस नहीं किया जा सकता। जब मैं एस्थेटिक्स के नज़रिए से देखता हूँ या मैदान में उसका ग्रेस देखता हूं  तो मेरे लिए वो सर्वकालिक महानतम खिलाड़ी है।'

जिमी कॉनर्स इस बहस में एक और आयाम जोड़ते हैं। वे कहते है 'विशेषज्ञता के इस युग में खिलाड़ी या तो क्ले कोर्ट विशेषज्ञ है या ग्रास कोर्ट विशेषज्ञ या हार्ड कोर्ट विशेषज्ञ है या फिर आप रॉजर फेडरर हैं।'


आप इन तीनों के व्यक्तित्व का आकलन कीजिए तो पाएंगे कि नोवाक जातीय भेदभाव का शिकार होते हैं और अपने क्रियाकलापों और हाव भाव से सर्वहारा वर्ग के प्रतीत होते हैं। जबकि राफा का व्यक्तित्व मध्यमवर्गीय प्रतीत होता है। इन सब से अलहदा रॉजर फेडरर मैदान में और मैदान के बाहर अपनी शालीनता,अपने ग्रेस और एस्थेटिक सेंस में कुलीनवर्गीय प्रतीत होते हैं। टेनिस स्वयं अपने चरित्र में कुलीनवर्गीय है। टेनिस खेल और फेडरर का टेनिस दोनों क्लासिक हैं और क्लासिकता को पोषित करते हैं। फेडरर टेनिस के मानदंडों के करीब क्या वे स्वयं मानदंड हैं। वे टेनिस के सबसे प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं।


लेकिन ये कैसी प्रतिद्वंदिता है। एक प्रतिद्वंदी विदा होने वाला है और उसी के प्रतिद्वंदी उसे विदाई देने वाले हैं। विदा होने वाला उदास है और विदाई देने वाले भी। आँखें सभी की नम हैं। वे एक दूसरे के प्रेम में तरल हुए जाते हैं। आखिर ये कैसी प्रतिद्वंदिता कि फेड अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी राफा के साथ जोडी बनाकर आखिरी मैच खेलते हैं। कि फेड के इस आखिरी विदाई मैच में ये तीनों प्रतिद्वंदी एक ही टीम हैं। क्या ही दृश्य है कि मैच खत्म होने के बाद फेड राफा के गले मिल रहे हैं और नोवाक हैं कि उन्हें अपने कांधे पर उठाए जाते हैं। ये अद्भुत दृश्य हैं। ये खेल के मैदान पर साकार हो रहे हैं। ये दृश्य खेल के मैदान पर ही साकार हो सकते हैं।

अब फेडरर खेल से विदा ले रहे हैं।

फेडरर का टेनिस से विदा लेना एक युग का अवसान है।

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टेनिस उनके बगैर भी खेला जाता रहेगा। पर यकीन मानिए अब टेनिस वैसा बिल्कुल नहीं होगा जैसा उनके रहते होता था।

खेल मैदान से  अलविदा फ़ेडेक्स।



 

Thursday, 22 September 2022

गजोधर बाबू अब नहीं रहे


          राजू श्रीवास्तव को पसन्द करना या ना करना एक व्यक्तिगत बात हो सकती है। ये भी सच है कि उन्होंने कोई बहुत उच्च कोटि का हास्य व्यंग्य रचा या कहा नहीं। वे कई बार फूहड़ हो जाते  और कई बार अश्लीलता को छूते नज़र आते। और ये भी कि वे कलाकार थे,लेकिन उनकी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं भी थीं।

इस सब के बावजूद ये भी तथ्य है कि वे देश के सर्वाधिक लोकप्रिय स्टैंड अप कॉमेडियन थे और आम जनता उन्हें बेहद चाहती और प्यार करती है। दरअसल उन्होंने स्टैंड अप कॉमेडी को देश में बेहद लोकप्रिय बनाया और एक नया मकाम दिया। लॉफ्टर चेलेंज का पहला सीजन था तो उसमें वे भी एक प्रतिभागी थे। इसमें वे भले ही सुनील और अहसान कुरैशी से पिछड़ गए हों। लेकिन इस प्रतियोगिता से बाहर आकर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लोकप्रियता में सबको पीछे छोड़ दिया।

दो,उनका अपनी बात कहने या डिलीवरी का एक खास तरीका था। भदेस सा।  इसमें वे अपनी स्थानीय कानपुरी बोली जो कन्नौजी मिश्रित अवधी थी, का तड़का लगाते। ये उनकी एक ऐसी यूएसपी थी जो उन्हें अपने सभी समकालीन स्टैंड अप कॉमेडियन से विशिष्ट बनाती थी और जनता में  लोकप्रिय भी।

तीन,सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि वे आम जीवन की विसंगतियों और विडंबनाओं को उसके पूरे भदेसपन के साथ उजागर करते थे। उनके कहन और कंटेंट का जो भदेसपन था,दरअसल वही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी जो उन्हें आम जनता से कनेक्ट करती थी और उनके बीच लोकप्रिय बनाती थी।

उनकी मृत्यु के बाद जिस तरह से सोशल मीडिया और बाकी प्लेटफार्म हर छोटे बड़े आदमी ने उनके बारे में लिखा,कहा-सुना और प्रतिक्रिया दी,ये बताने के लिए पर्याप्त है कि एक कलाकार के रूप में वो कितने लोकप्रिय थे और ये कहने पर मजबूर भी करता है कि 'बंदे में दम था'।

वे स्टैंड अप कॉमेडी के काका हाथरसी हैं। जो मकाम काका हाथरसी को मंचीय हास्य कवियों में हासिल है,वही स्थान स्टैंड अप कॉमेडी में राजू श्रीवास्तव उर्फ गजोधर बाबू को हासिल है। -------------------------

अलविदा गजोधर बाबू।

सब्र का फल मीठा होता है

ये 14 सितंबर 2020 की तारीख थी। न्यूयॉर्क के फ्लशिंग मीडोज पर यूएस ओपन का पुरुष एकल फाइनल जर्मनी के अलेक्जेंडर ज्वेरेव और ऑस्ट्रिया के डोमिनि...