Friday, 17 May 2019

ये रंगों का बयान है


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टेस्ट मैच क्रिकेट खेल का मूल प्रारूप है। पांच दिन का ये प्रारूप इस खेल का सबसे शांत,उबाऊ और नफासत से भरा है जिसमें खिलाड़ी सफेद कपड़े पहनते हैं। ये रंग खेल के उस प्रारूप का सबसे प्रतिनिधि रंग है। मैदान में घास को छोड़कर सफेद जूतों व कपड़ों और हल्के क्रीम कलर या ऑफ व्हाइट कलर के बल्लों और विकटों के बीच बस एक ही चटख  लाल रंग होता है गेंद का। इस प्रारूप में सफेद रंग के बीच जिस अनुपात में लाल रंग होता है,मैदान में बस उतना ही रोमांच और उत्साह होता है।

 फिर टेस्ट क्रिकेट की नीरसता को तोड़ने के लिए सीमित ओवरों वाला एकदिवसीय प्रारूप आया। अब क्रिकेट में गज़ब के  रोमांच और उत्साह का समावेश हो गया। नफासत की जगह भदेसपन लेने लगा। भद्रजनों का खेल आमजनों का खेल होने लगा। तो इसी के साथ रंगों का अनुपात भी बदल गया। मैदान में रंग बिखरने लगे। सफेद कपड़े रंगीन कपड़ों में बदल गए और बॉल का रंग लाल से सफेद हो गया। अब रंगीन कपड़ों के बीच जिस अनुपात में बॉल का सफेद रंग होता है मैदान में नीरसता की भी बस उतनी ही गुंजाइश बची रह गई।

लेकिन शायद अभी भी एक कमी बाकी थी। इन रंगों में चमक की कमी थी,रंगों में ग्लेज़ नही था क्योंकि खेल के रोमांच और उत्साह में ग्लैमर की कमी थी। तब फटाफट प्रारूप टी ट्वेंटी आया।इसमें रोमांच,जोश,जुनून और गति का विस्फोट हुआ और ग्लैमर का समावेश हुआ तो कपड़ों के थोड़े फीके और कम चमक वाले रंग चटक होने लगे,रंगों की चमक और ग्लेज़ सहसा ही जोश और जुनून के अनुपात में बढ़ गया।
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क्या ही कमाल है कि रंग क्रिकेट के क्रमिक  बदलाव के सबसे गाढ़े प्रतीक हैं। निसंदेह ये देखना रोचक होगा कि आगे इसके और छोटे होते प्रारूप पर रंग कैसे अपना बयान बदलेंगे।

Monday, 6 May 2019

कि हमने एक मिथक बनते देखा है






कि हमने एक मिथक बनते देखा है
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30 जून 2018 को रूस के कजान स्टेडियम में फुटबॉल विश्व कप के दूसरे दौर में ही फ्रांस ने अर्जेंटीना को हराकर बाहर कर दिया। मैच समाप्त होने के बाद एक खिलाड़ी उदास सा धीमे धीमे कदमों से बाहर जा रहा था। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ये लियोनेस मेस्सी थे। दरअसल ये किसी खिलाड़ी का जाना नहीं था बल्कि करोड़ों फुटबॉल प्रेमियों के इष्ट देवता का समय से पूर्व रूठ कर जाने जैसा था। अब आप ही सोचिए अगर कोई गणपत बप्पा को चतुर्थी के दिन अपने घर स्थापित करता है तो फिर अनंत चतुर्दशी के दिन विधि विधान से विसर्जित करता है ना या फिर नवरात्र में दुर्गा की स्थापना करता है तो नवमी की पूजा के बाद ही विसर्जित करते हैं ना। तो फिर मेस्सी 15 जुलाई से पहले बिना जुले रीमे ट्रॉफी के बैगर कैसे जा सकता था। पर ऐसा हुआ। मेस्सी को समय से पहले ही रुखसत होना पड़ा। शायद मेस्सी की अनचाही विदाई के दुख के कारण बहते आंसुओं से ही उस दिन कज़ान के वातावरण में कुछ ज़्यादा नमी रही होगी,कराहों से हवा में सरसराहट कुछ तेज हुई होगी,हार की तिलमिलाहट से सूरज का ताप कुछ अधिक तीखा रहा होगा,दुःख से सूख कर मैदान की घास कुछ ज़्यादा मटमैली हो गयी होगी और कजान एरीना से बाहर काजिंस्का नदी वोल्गा नदी से गले लग कर जार जार रोई होगी।

लेकिन बीते बुधवार को कैम्प नोउ के मैदान में मेस्सी के जादू को देखकर बार्सिलोना में ही नही बल्कि कजान की धूप में भी मुलामियत पसर गई होगी,हवा में मुस्कराहटों का संगीत तैर गया होगा,मैदान की घास फिर से हरी हो गई होगी और हां कजिंस्का नदी फिर वोल्गा के गले लगी होगी और इस बार खुशी के आंसू बहाए होंगे।
दरअसल इस शाम बार्सिलोना एफ सी की टीम अपने मैदान कैम्प नोउ में चैंपियंस लीग के सेमीफाइनल के पहले चरण के मैच में लिवरपूल की टीम को होस्ट कर रही थी। पिछले विश्व कप की असफलता को भुला कर मेस्सी इस सीजन अपने पूरे रंग में आ चुके थे। और अब मैच दर मैच अपना जादू बिखेरा रहे थे। इस मैच से पहले वे इस सीजन 46गोल कर चुके थे। बार्सिलोना को स्पेनिश लीग का खिताब दिला चुके थे। और....और इस मैच में अपने खेल के जादू से पिछले साल की उपविजेता लिवरपूल की टीम को लगभग बाहर ही नहीं कर रहे थे बल्कि दर्शकों को हिप्नोटाइज़ कर रहे थे और अपने खेल कैरियर का एक और लैंडमार्क स्थापित कर रहे थे। जब 75वें मिनट में अपना पहला और टीम का दूसरा गोल कर रहे थे तो ये अपने क्लब के लिए 599वां गोल था। और उसके बाद 83वें मिनट में मेस्सी का ट्रेडमार्क गोल आया। उनका 600वां गोल दरअसल इससे कम शानदार नहीं ही होना चाहिए था। ये एक फ्री किक थी। वे 35 मीटर दूरी से गोल के लगभग बाएं पोल के सामने से किक ले रहे थे। सामने चार विपक्षी खिलाड़ियों की मजबूत दीवार। गोल पर सबसे महंगे और शानदार गोलकीपर एलिसन मुस्तैद। ये एक असंभव कोण था। लेकिन मेस्सी के लिए नहीं। मेस्सी ने किक ली। बॉल एक तीव्र आर्च बनाती हुए सामने खिलाड़ियों की दीवार के सबसे बाएं खिलाड़ी के ऊपर से गोल पोस्ट के पास जब पहुंची तो एक क्षण को लगा कि बॉल गोलपोस्ट से बाहर। पर ये क्या! बॉल तीक्ष्ण कोण से दांई ओर ड्रिफ्ट हुई और गोल के ऊपरी बाएं कोने से होती हुई जाल में जा धंसी। ये गोल नहीं था। एक खूबसूरत कविता थी जिसे केवल मेस्सी के कलम सरीखे पैर फुटबॉल के शब्दों से विपक्षी गोल के श्यामपट पर लिख सकते थे। दरअसल कोई एक चीज कला और विज्ञान दोनों एक साथ कैसे हो सकती है,इसे मेस्सी के फ्री किक गोलों को देखकर समझा जा सकता है। वे विज्ञान की परफेक्ट एक्यूरेसी के साथ अद्भुत कलात्मकता से अपनी पूर्णता को प्राप्त होते हैं। इस गोल के बाद एक खेल पोर्टल जब ये ट्वीट करता है कि "लिटिल जीनियस डिफाइज लॉजिक" तो आप समझ सकते हैं क्या ही खूबसूरत गोल रहा होगा।और 600 गोल के लैंडमार्क को प्राप्त करने के लिए इससे कम खूबसूरत गोल की दरकार हो सकती है भला।
ओह ! लव यू मेस्सी !
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दरअसल जब आप मेस्सी को खेलते देख रहे होते हैं तो एक खिलाड़ी को,एक फुटबॉल जीनियस या लीजेंड भर को नहीं देख रहे होते हैं बल्कि भविष्य के एक मिथक को बनते महसूस कर रहे होते हो। जब इस मैच को देखने के बाद गैरी लिनेकर जैसा फुटबॉलर ये कह सकता है कि 'मैं इतना भाग्यशाली हूँ कि अपने ग्रैंड चिल्ड्रेन्स को बता पाऊंगा मैंने मेस्सी को खेलते देखा है" तो आप भी अपने को सौभाग्यशाली मानिए कि आपने मेस्सी को खेलते देखा है,कि फुटबॉल के मैदान में एक मिथक को बनते देखा है।

Friday, 3 May 2019

भोर

   

ये तो तय है कि दिन के सारे निश्चय जो सांझ की संभावनाओं में डूब रहे हैं,वे अंततः रात्रि की अनिश्चितताओं में घुल जाएंगे।बस देखना ये है कि उम्मीद के जुगनू,तारे और एक चाँद सारे मिल के अनिश्चितताओं का भार भोर के नए स्वप्नों के उगने तक ढो पाते हैं कि नहीं।
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"चल ए नज़ीर इस तरह से कारवाँ के साथ।
जब तू न चल सके तो तेरी दास्ताँ चले।"
                                           नज़ीर
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तो ये भी तय रहा कि सकारात्मक सोच हमें मानुस बनाए रखेगी।





Wednesday, 1 May 2019

साक्षात्कार _1



   
साक्षात्कार_1
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थ्रीश कपूर देश के जाने माने छायाकार हैं। प्रकृति के सबसे कोमल और सुकुमार चितेरे सुमित्रा नंदन पंत की जन्मभूमि कौसानी उनकी जन्म और कर्मस्थली दोनों है। शायद  ये उस धरती का ही कमाल है कि वे भी प्रकृति को अपने कैमरे में उतनी ही खूबसूरती से पकड़ते हैं। वे खुद  हिमालय के प्रेम में दीख पड़ते हैं।
                                       

वे हिमालय में और हिमालय उनमें घुल गया है। उन्होंने हिमालय की और उसके जीवन की अद्भुत छटा को किसी कुशल चित्रकार की तरह अपने कैमरे के माध्यम से उकेरा है। इसके लिए उन्होंने हिमालय की लंबी लंबी यात्राएं की,उसके हर रंग को कैमरे की नज़र से देखा और फिर उसे  संजोया है। उनके चित्र हिमालय के सौंदर्य और उसके जीवन के जीवंत दस्तावेज हैं। उस पर कमाल ये कि वे जितने बड़े कैमरे के उस्ताद  हैं उतने ही सहज और सरल इंसान। उनसे मुलाकात एक उपलब्धि की तरह है।


अभी वे दून में थे। मैंने अपने कार्यक्रम के लिए उनसे एक बातचीत रिकॉर्ड की। उनसे बातचीत की है हमारे साथी अनिल भारती जी ने। इस बातचीत का प्रसारण होगा शनिवार 4 मई को प्रातः साढ़े आठ बजे आकाशवाणी देहरादून एफ एम 100.5 मेगाहर्ट्ज़ पर।


उम्मीद है ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा और अपने दो बहुत ही पंसदीदा छायाकारों से आपकी मुलाकात की कोशिश रहेगी। जिस तरह थ्रीश हिमालय के छायाकार हैं डॉ सुनील उमराव संगम के छायाकार हैं। वे गंगा,और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम स्थली के तपस्वी हैं। उनमें संगम क्षेत्र के हर क्षण,हर रंग,हर रूप को अपने कैमरे में समा लेने की दीवानगी है तो दूसरी ओर  सर नॉस्टेल्जिया के छायाकार हैं। 'हर बीत रही चीज़' को पहचानने और कैमरे से पकड़ने की उनमें गज़ब की योग्यता और ललक है। निसंदेह उनके फोटो तमाम बीती चीजों के ऐसे प्रामाणिक दस्तावेज होंगे जिनसे इतिहास लिखा जा सकेगा।

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दोनों का भी दून घाटी में इंतज़ार।

Sunday, 21 April 2019

ये महासू की धरती है



ये महासू की धरती है

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देहरादून आए एक माह से ज़्यादा बीत चुका है ।लेकिन एक खास किस्म का खालीपन अभी भी मन में पसरा पड़ा है। जब भी किसी एक जगह से विस्थापित होकर दूसरी जगह स्थापित होते हैं तो आपको अपने लिए जगह बनाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती है। आपको अपने लिए एक स्पेस क्रिएट करना होता है। ये स्पेस आपको यूं ही सहजता से नहीं मिल जाता। लोग आपको या तो स्पेस देते नहीं हैं या फिर देते हैं तो इतना कम कि वो खाँचा आपके लिए बहुत छोटा है। उसमें आप फिट नहीं हो पाते। अपनी काबिलियत से,मेहनत से अपने लायक स्पेस बनाना पड़ता हैं ।आपको खुद को साबित करना पड़ता है। तब जाकर आपकी उपस्तिथि दर्ज होती है। इसीलिए किसी भी नई जगह बनाने में एक लंबा अरसा बीत जाता है। आप हमेशा संघर्षरत रहते हैं। समय कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता।आप एक भराव में रहते हैं हमेशा।

     पर दून की बात कुछ और है। यहां स्पेस की कोई समस्या ही नहीं है। स्पेस लोगों के दिलों में भी और बाहर भी खूब है। लोग कुछ और जगहों की तरह तंग दिल जो नहीं हैं।
यहां लोग आपको आपकी क़ाबिलियत से ज़्यादा स्पेस देते हैं। खुद उनके दिलों में जो स्पेस है। दरअसल वे प्रकृति पुत्र हैं। उन्होंने देना सीखा है और खूब खूब देना सीखा है।अब ये आपके ऊपर है जो ज़्यादा स्पेस मिला है तो उसको आपको खुद कैसे भरना है। ये शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बसा शहर है। चारों और पहाड़ियां हैं। वे अक्सर धूसर रंग की दिखाई  देती हैं। ऐसा महसूस होता है मानो इन पहाड़ों पर पड़ने वाली शुभ्र बर्फ पिघलकर यहां के लोगों के मन को साफ कर निष्कलुष कर देती है और बदले में मन की सारी कलुषता सोख कर खुद को धूसर कर लेती है। क्या ही संयोग है कि ये शिवालिक पहाड़ियां महासु (महाशिव) का निवास स्थल है और ये बात शायद उसी परंपरा से आती है। ठीक वैसे ही जैसे शिव दुनिया को बचाने के लिए विष पी लेते हैं और नीलकंठी हो जाते हैं।
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देहरादून प्रवास डायरी_एक






Monday, 25 March 2019

'ये वो कतई नहीं था जो हम चाहते थे'



'ये वो कतई नहीं था जो हम चाहते थे'
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कल रात लॉस एंजिल्स लेकर्स के ब्रुकलिन नेट्स से 111-106 से हारने के बाद लेब्रोन जेम्स कह रहे थे "ये वो नही थP जिसके लिए हमें अनुबंधित किया गया था"और निसंदेह उनके चाहने वाले उनके इन्हीं शब्दों को अपने मन में दोहरा रहे होंगे "हाँ बिल्कुल, ये वो नहीं था जो हम चाहते थे"। क्या कोई भी विश्व कप फुटबॉल फाइनल्स की मेस्सी के बिना कल्पना कर सकता है। क्या किसी क्रिकेट विश्व कप की बिना सचिन के कल्पना की जा सकती थी। बिना राफेल नडाल के फ्रेंच ओपन की कल्पना की जा सकती है क्या। नहीं ना। तो फिर एनबीए पोस्ट सेशन की बिना लेब्रोन के कैसे कल्पना की जा सकती है। लेकिन यथार्थ कल्पना की तरह रंगीन और कोमल नहीं होता। यथार्थ का रंग धूसर और प्रकृति रूक्ष होती है। और यथार्थ यही है कि 2004-5 के बाद फाइनल्स की तो बात ही छोड़िए लेब्रोन जेम्स पोस्ट सेशन में भी नहीं दिखाई देंगे क्योंकि इस हार के बाद लेकर्स टीम की नॉकआउट में पहुंचने की कोई भी संभावना खत्म हो गई है।

दरअसल कुछ खिलाड़ी खेल का पर्याय बन जाते हैं। हॉकी की ध्यानचंद के बिना,क्रिकेट की ब्रैडमैन के बिना,फुटबॉल की पेले और माराडोना के बिना,बैडमिंटन की रूडी हार्तोनो और लिम स्वी किंग के बिना,टेनिस की रॉड लेबर के बिना या बास्केटबॉल की माइकेल जॉर्डन के बिना कल्पना की जा सकती है क्या। हां कालांतर में  खिलाड़ी उन्हें चुनौती देते  हैं और वे उनके समकक्ष आकर खुद भी लीजेंड बन जाते हैं। सचिन या मेस्सी और रोनाल्डो या रोजर फेडरर या लिन डान और ली चोंग वेई  या बोवलेंडर ऐसे ही लीजेंड हैं और ठीक इनकी तरह बास्केटबॉल में लेब्रोन जेम्स भी।
लेब्रोन ने पिछले चार सालों तक अकेले दम पर क्लीवलैंड केवलियर्स को फाइनल्स तक पहुंचाया और एक खिताब दिलाया। इस बार जब उन्होंने लेकर्स को जॉइन किया तो लगा कि लेकर्स के दिन बहुरने वाले हैं और कोबे ब्रायंट व शकील ओ नील वाले दिन लौटने वाले हैं। पर ऐसा हुआ नहीं। दरअसल लेब्रोन के कंधे अब झुकने लगे हैं और सांस उखड़ने।

जो भी हो इन गर्मियों में जब आप स्टीफेन करी,जेम्स हार्डन,केविन डुरंट, अन्थोनी डेविस से लेकर रसेल वेस्टब्रूक,क्वाहि लियोनार्ड और जोएल एम्बिड के खेल से रोमांचित हो रहे होंगे आपके दिल का एक कोना लेब्रोन की अनुपस्थिति के  उदासी भरे अहसास से जार जार हो रहा होगा।

Thursday, 14 March 2019

अलविदा शहरे मोहब्बत।

                      


एक शहर का यादों का समंदर हो जाना
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   13 और 14 मार्च के मध्य की रात्रि है ये। गाड़ी नं. 14163,संगम एक्सप्रेस इलाहाबाद से यात्रियों को मेरठ की ओर लिए जा रही है। रात्रि का एक बजा है। रेलगाड़ी अँधेरे का सीना चीर बढ़ी चली जा रही है। अधिकांश लोग सो रहे हैं। लेकिन एच 1 बोगी की सीट नं 9 पर मैं  केवल और केवल करवटें बदल रहा हूँ। नींद आँखों से कोसों दूर है। नींद शायद इन आँखों को अभी भी वहीं कहीं ढूंढ रही होगी जहाँ बरसों बरस से रहती आई है। उसे शायद ये इल्म ही ना हुआ हो कि जिन आँखों में उसे रैन बसेरा करना है वे अब  कहीं दूर निकल गई हैं। या फिर इल्म हो भी तो तो ये सोच कर वहीं रुक गई हो कि आज की रात वहां उसके लिए कोई जगह ही ना हो क्यूंकि आज की रात तो उनमें पानी को ही जगह जो कम पड़ जानी है। उफ्फ ये कितना पानी साथ चला आया है कि पानी से आँख भर भर जाती हैं। और ट्रेन है कि दौड़ी दौड़ी जाती है। ये रेलगाड़ी आखिर इतनी तेजी से क्यूँ दौड़ी चली जाती है।  क्या इसलिए कि इस बार का जाना वापस आने के लिए नहीं है?
                          तन जितना इस शहर से दूर भागा जा रहा है, मन उतना ही उस शहर की ओर लौट लौट जाता है। उस महबूब शहर की ओर जिसमें ज़िंदगी के सबसे महत्वपूर्ण 35 साल बिताए। वो शहर जिसमें यौवन की दहलीज़ पर आमद हुई। एक ऐसा शहर जिसमें गाँव का अल्हड़पन तो था ही, पर शहर की नफासत भी मिली थी । वो शहर होने भर को शहर था। शांत  ठहरा सा शहर।  बस शहर होने के एहसास भर से संतुष्ट शहर। ऐसा शहर जिसमें आगे बढ़ने की जल्दबाज़ी ना थी। वो शहर जो बहुत बहुत मखमली सा था और कुछ कुछ खुरदुरा सा भी।  वो शहर जो हम में रच बस गया और वो शहर जिसमें हम  रच बस गए। वो शहर जिसकी गली कूँचों में हमारी कितनी ही यादें बिखरी पड़ी हैं और हमारी यादों में उसके  गली कूँचे। वो शहर जिसमें  हम जिए। वो शहर जिसे हमने जिया। वो शहर जिसमें हमने ख्वाबों को देखना सीखा, जिसमें ख्वाब देखे और उन ख्वाबों के लिए कुछ करने गुज़रने की सलाहियत पाई। वो शहर जिसमें क ख ग सीखा पढ़ाई का भी और ज़िन्दगी का भी।
                                रेलगाड़ी दौड़ी चली जा रही है।  खिड़की के शीशे से पर्दा हटा है। बाहर कुछ ख़ास नहीं दिखाई दे रहा है। बस दरख्त साये से पीछे भागे जा रहे हैं। दिमाग में विचार भी उसी तरह भागे जा रहे हैं। यादें अतीत में गहरे और गहरे उतराना चाहती हैं। अब रेलगाड़ी धीमी हो चली है। शायद कोई शहर आने वाला है। पटरी के समानांतर लैंप पोस्ट का सिलसिला शुरू हो गया है। उनसे मंद मंद उदास सा प्रकाश फ़ैल रहा है। लगता है उदासी मन के सूनेपन से सहमकर बाहर आ गयी है और सब जगह व्याप गयी है। मन को थोड़ा सुकून मिलता है। इस उदास रात में कुछ  तो अपना सा है।  जिस तरह से हम किसी शहर के लिए उदास होते हैं तो क्या वे भी किसी के उसे छोड़ देने से मायूस होते होंगे। उसके गली कूंचे भी उदास होते होंगे। उस शहर की वे जगहें विछोह महसूसती होंगी। खालीपन के अहसास से तो ना भर जाती होंगी।
                               रेलगाड़ी ने फिर गति पकड़ ली है। एक और स्टेशन पीछे छूट गया है। दिल की धड़कनें फिर बढ़ने लगती हैं। मन कुछ और बेचैन हो उठता  है। महबूब शहर पीछे और पीछे छूटता जाता है। पर जितना ये शहर छूटता जाता है उससे कहीं ज़्यादा फिर फिर मन में बसता जाता है। दिल में यादों के निशान कुछ और गहरे होते जाते हैं। छूटने और फिर फिर बसने का ये सिलसिला अनवरत चलता जाता है। और इन दो विरुद्धों में सामंजस्य बैठाते हुए नए गंतव्य के लिए मन तैयार हो रहा होता है।  बिलकुल इस महबूब शहर की तरह जिसकी मूल प्रवृति ही विरुद्धों के सामंजस्य की है। जिसका अस्तित्व ही विरोधी भावों के मेलजोल पर टिका है और जो दो विपरीत धाराओं से मिल कर गतिमान होता है। उसका इतिहास और भूगोल बना ही इस सामंजस्य से है।

                                     अब देखिए ना प्रकृति ने उसे कुछ ऐसी ही नेमत से बख़्शा है। ये जगह ही ऐसी है जहां  विपरीत प्रकृति वाली दो  नदियाँ इसकी उत्तरी और दक्षिणी सीमाएं बनाती हैं और फिर मिलकर पूरब में बह निकलती हैं। अथाह जलराशि लिए धीर गंभीर यमुना दक्षिण में बहती है। शायद इसका स्याह रंग उसकी गहराई से ही बनता है और उसकी अथाह जलराशि का प्रतीक भी बनता है। तो उत्तर से होती हुई गंगा आती है। अपेक्षाकृत कम गहराई और कम जलराशि लेकिन विस्तार लिए। इसका विस्तीर्ण बहाव ही इसे शुभ्र रंग प्रदान करता है। विधि ने ही जब इस स्थान के लिए ऐसा विधान रचा तो मानव ही पीछे क्यों रहता। उसने शहर को ही दो भागों में बाँट दिया। सीमा बनी रेल लाइन। इसके दक्षिण का शहर पुराना और उत्तर का नया। दक्षिण वाला हिस्सा यमुना की तरह सघन और अधिक जनसंख्या वाला और उत्तर गंगा की तरह कम जनसंख्या वाला  और विरल बसावट वाला । दक्षिण यहाँ के स्थायी और मूल निवासियों का हिस्सा तो उत्तर आस पास के शहरों से आए आप्रवासियों का हिस्सा। एक स्थानीय विशेषताओं और संस्कृति का वाहक तो दूसरा आयातित विशेषताओं से भरा पूरा। एक पुरातन संस्कृति पर गर्वोन्नत होता हुआ तो एक आधुनिक भावबोध पर इतराता हुआ। एक गली कूंचो में मंथर गति से चलता तो दूसरा चौड़ी सडकों पर दौड़ता। एक पुराने घर चौबारों में बसता तो दूसरा बड़े बड़े बंगलों में रहता। एक ठहरा ठहरा सा तो दूसरा बहता बहता सा। एक मस्त मौला सा तो दूसरा उद्विग्न  अधीर अधीर सा। भूगोल की ये दो चौहद्दी एक इलाहाबाद बनाती हैं।
                                 फिर भूगोल अपना इतिहास भी अपनी तरह ही रचता है। अगर ये वत्स महाजनपद के शासकों की साम्राज्यवादी भौतिक लिप्साओं की स्थली रहा तो बुद्ध और महावीर की तपस्थली और धर्म प्रचार का केंद्र भी रहा। ये जगह अवन्ति और वत्स महाजनपदों के बीच संघर्ष की हुंकार और टंकार के कोलाहल से आक्रान्त हुई तो उदयन और वासवदत्ता के प्रेम संगीत से भीग भीग भी गयी। ऐन उस जगह जहां चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन सांसारिक इच्छाओं से विरक्त होकर अपना सर्वस्व दान कर देता था,बादशाह अकबर अपनी साम्राज्यवादी लालसाओं को पूरा करने के लिए क़िले का निर्माण करता है और अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए किलेबंदी करता है। जहां अलाउद्दीन खिलज़ी गद्दी के लालच में अपने चाचा की ह्त्या कर धोखे और षड़यंत्र के कारनामे को अंजाम देता है ,शहज़ादा खुसरू  प्रेम की खातिर जान देने का आदर्श स्थापित किया चाहता है। क्या ही कमाल है जिस जगह ब्रिटिश साम्राज्ञी ईस्ट इण्डिया कंपनी से देश का शासन अपने हाथ लेकर अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए इसे राजधानी बनाती है उसी जगह को देश की आज़ादी के लिए क्रांतिकारी देशभक्त अपना केंद्र बनाते हैं। ये ही वो शहर है जहां परिमल संस्था और प्रगतिवादी टकराते और रगड़ खाते श्रेष्ठ हिंदी साहित्य रचते हैं।
                              ये जितना लफ़्फ़ाज़ों,बकैतों,भौकालों का शहर है उतना ही संजीदा लोगों का भी। जितना बमबाज़ों का उतना ही कलमबाज़ों का। ना जाने किस जगह फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलती अधुनातन नवयौवना के साथ खांटी भोजपुरी बोलने वाला  युवा डेट करता मिल जाए। ना जाने कब आप चौड़ी चौड़ी साफ सुथरी सड़कों पर से गुजरते हुए पतली गलियों की भूल भुलैया में जा पहुंचे और कब जाने कंधे से कंधे टकराती और दम रोक देने वाली गलियों से निकल कर नीले आसमान के नीचे हरे भरे खुले वातावरण में सांस लेने लगे। कब आपकी आंखों के सामने भैसों के मस्त झूमते काफिले के ठीक पीछे विश्व के बड़े ब्रांडों की मोटर कारों के झुंड द्वारा रास्ता देने की याचना के लिए हॉर्न बजने का दृश्य नमूदार हो जाए। और फिर शहर का पॉश इलाका सिविल लाइंस तो स्वयं ही बड़े बड़े शानदार बंगलों के बीच बीच में सगरपेशा लोगों की झोपडपट्टियों के  साथ विकास की विसंगतियों का सबसे बड़ा विज्ञापन सा प्रस्तुत होता ही है।
                             अगर यहां के मूल वाशिंदे इस शहर की आत्मा हैं तो आसपास के इलाकों से लेकर दूर दराज के इलाकों से आए लोग इस शहर का दिल दिमाग हैं। ये शहर जितना स्थानीय कारोबारी और व्यापारी बनाते हैं उतना ही बाहर से आए सरकारी मुलाज़िम सजाते सवाँरते हैं। ये शहर जितना यहां के माननीय जजों और काले कोट में सजे एडवोकेट्स का है उतना ही बाहर से आए हैरान परेशान मुवक्किलों का भी है। ये शहर जितनी गृहस्थों की कर्म भूमि है उतनी ही बाहर से आए विद्यार्थियों की तपस्थली भी है। जितने लहकट इस शहर की आन है उतने ही मेधावी शहर की शान हैं।सेठ साहूकारों की अट्टालिकाएं शहर को वैभव प्रदान करती हैं तो मध्य प्रदेश,पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आये मज़दूरों की श्रम शक्ति उस वैभव का आधार बनती है। ये इस शहर में ही संभव होता है कि एक कान से आपको वैभव के अट्टहास सुनाई दे और दूसरे कान से मजबूरी की सिसकियां। एक ही साथ आपको सजा संवरा वैभव और शानों शौकत इठलाता इतराता मिलेगा तो पीठ पर नमक के दाग सजाए मानवीय श्रम की गरिमा चहलकदमी करते हुए भी मिलेगी।
                                         दरअसल ये बहुस्तरीय जीवन और संवेदनाओं का शहर है। शहर के जीवन की ये परतें अपने अस्तित्व के लिए अनेक स्तरों पर सहभाग करती हैं, टकराती हैं और आगे बढ़ती हैं। ये परतें एक दूसरे से अलहदा भी होती हैं और एक दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण भी करती हैं। अब यहां के विद्यार्थी जीवन को ही देखिए ना। यहां बड़ी संख्या में बाहर से विद्यार्थी आते हैं और यहां के समाज का अभिन्न अंग बन जाते हैं। पर फांके स्पष्ट दीख पड़ती हैं। एक ओर वे स्थानीय समाज को अर्थवृति के साधन मुहैय्या कराते हैं तो  दूसरी और उनमें अक्सर हितों का टकराव भी होता है। इलाहाबाद के छात्र समुदाय की  अपनी एक अलग पहचान है। वे एक इकाई के रूप में स्पष्टतः अलग दीख पड़ते हैं। लेकिन ये इकाई भी बहुस्तरीय है। उसके अपने खाँचें हैं,परतें हैं,अंतर्विरोध हैं।ये वर्टिकल भी हैं और होरिजेंटल भी। यहां भी ठीक समाज की तरह छात्रों का स्तरीकरण होता है। सबसे बड़ा विभाजन हॉस्टल और डेलीगेसी का।निसंदेह होस्टलर इलीट और डेलीगेसी वाले मास। फिर यूनिवर्सिटी होस्टल वाले ऊपर और ट्रस्ट होस्टल वाले नीचे। लेकिन बात दबंगई की हो तो ट्रस्ट वाले बहुत ऊपर। इसी तरह डेलीगेसी वालों के भी स्तरीकरण के कई खांचे। कुछ विश्वविद्यालय के आस पास रहने वाले ज़्यादा खुशकिस्मत और शहर के बाहरी इलाकों और कछारी मोहल्लों में रहने वाले दोयम दर्जे वाले। खांचे और भी हैं। जातीय चेतना वाले भी,क्षेत्रीय चेतना वाले भी,भाषाई चेतना वाले भी और सबसे ऊपर वर्गीय चेतना वाले तो हैं ही। पर एक बात सबमें कॉमन। कमरे हॉस्टल के हों या डेलीगेसी के ,बड़े बड़े सपने उसके इनमेट की आखों से निकलकर कमरे के कोने कोने में समाए होते हैं और इन सपनों की चमक उनसे निकलकर दूर दराज़ के गांव गिराव में रहने वाले मां बाप,भाई बहनों और कुछ की पत्नियों की आंखों तक पहुंचती है। ये सपने इनमेट के कम और उसके घर परिवार वालों के ज़्यादा करीब होने लगते हैं। गांव और छोटे छोटे कस्बों के खुले वातावरण से आकर दबड़ेनुमा कमरों की कैद में जब उनका दम घुटने लगता है तो शहर के तमाम बाजारों की रौनकें उनकी बदरंग कैद  भरी ज़िन्दगी में कुछ रंग भर देती है तो बहुत से किताबों  की दुनिया के भीतर जाकर उसके असीमित अनोखे संसार में अपने सपनों को उड़ान देने की कोशिश करते। कुछ के सपने पूरे होकर आसमान में सितारे से टंक जाते कुछ के पूरे तो होते हैं पर आधे अधूरे जो सड़क के लैंपपोस्ट,लालटेन या फिर दिए से टिमटिमाते रह जाते। लेकिन ऐसे भी कम लोग नहीं होते जिनके सपनों के चिराग जल ही नहीं पाते और शोक के करुण संगीत में बदल जाते। कुछ तो इससे भी आगे जाकर सल्फास की गोली या चादर के फंदों तक पहुँच जाते और अनंत में विलीन हो जाते।
               दिमाग में शहर की भोगी,जानी, समझी छवियों के असंख्य कोलाज बन मिट रहे हैं। कभी मुस्कान से होंठ फैल जाते हैं तो कभी आंख नम होने लगती हैं। आंखों की इस कोर से उस कोर तक फैले पानी में उन यार दोस्तों के प्रतिबिम्ब तैर रहे हैं जो इन 35 सालों के हासिल है। वे यार दोस्त जिनके होने से ज़िन्दगी है। वे जो अब यार दोस्त ना होकर विस्तारित परिवार का हिस्सा हैं। वे लोग जिन्होंने 35 सालों के रहवास में रंग भरे,खुशियों का सबब बने और मुसीबतों में साथ खड़े रहे। ज़िन्दगी के अद्भुत रंगों वाले इस शहर ने ज़िन्दगी को विविध रंगों से भर भर दिया है।दिल की ज़मीन पर इस शहर की यादों की एक ऐसी अमिट पगडंडी बन गयी है जो समय के किसी भी झंझावात से धुँधला नहीं सकती।
                    अलविदा इलाहाबाद!
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एक शहर को अलविदा कहना ज़िंदगी को अलविदा कहने जैसा क्यूँ है !

नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...