Friday, 30 May 2025

मर्सी राफा



दुनिया भर के खेल मैदान दुनिया की सबसे खूबसूरत जगहों में से होते हैं। घोर प्रतिद्वंदिताओं और भीषण संघर्षों के वातावरण में भी इन मैदानों में सद्भाव, मैत्री और प्रेम की भीनी भीनी खुशबू जो फैली रहती है। ये खेल मैदान ही होते हैं जहां हर जीत के बाद भी गले मिलने के दृश्य नमूदार होते हैं और हर हार के बाद भी। आंखें सबकी बहती हैं जीत में भी,हार में भी। और फिर ये मैदान  प्रेम के शहर पेरिस का हो,तो बात ही अलग है।

हां,ये पिछले रविवार की ही तो बात है। दिवस का अवसान होने को है। और साथ ही एक कहानी का समापन भी। एक प्रेम कहानी का। एक मैदान से उसके सबसे बड़े चैंपियन की जुदाई की कहानी का। शायद तभी पेरिस के रोलां गैरों के फिलिप कार्टियर एरीना के सेंटर कोर्ट की लाल मिट्टी शर्म ओ हया से थोड़ी ज्यादा ही लाल हुई जाती है। उत्साह और खुशी से उसकी चमक थोड़ी और ज्यादा हुई जाती है और विछोह की उदासी से थोड़ी थोड़ी नम  भी हुई जाती है। आज उसे कुछ ऐसे दृश्य उद्भूत जो करने हैं, जो लोगों की स्मृति में अनंत काल के लिए अंकित हो जाने हैं। उसे आज इस मैदान के सबसे बड़े विजेता को आखिरी बार होस्ट करना है। ये विजेता कोई और नहीं, फ्रेंच ओपन के चौदह बार के विजेता राफेल नडाल हैं।

एक के बाद एक दृश्य बन मिट रहे हैं। इन्हीं एक फ्रेम में राफा बीच कोर्ट में खड़े हैं। वे इंतजार कर रहे हैं। इसी बीच उनके तीन प्रतिद्वंदी मैदान में प्रवेश करते हैं। ये कोई और नहीं रोजर फेडरर,नोवाक जोकोविच और एंडी मरे हैं। कोर्ट में उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंदी। टेनिस के महानतम खिलाड़ी। वे खिलाड़ी जिनके विरुद्ध खेलते हुए संघर्ष के नए प्रतिमान रचे गए। सफलता के नए पैमाने स्थापित हुए। टेनिस खेल को नई ऊंचाइयां मिली। और उस खेल का  इतिहास ही नए सिरे से लिखा गया। लेकिन आज वे संघर्ष के लिए नहीं आए थे। वे आते हैं और आते ही बारी बारी से राफा को गले लगाते हैं। आंखें सबकी नम हो आती हैं और वातावरण कुछ कुछ गीला। प्रेम,मैत्री और सौहार्द्र से वातावरण महक महक जाता है। उसके बाद राफा अंपायरों और ग्राउंड स्टाफ से मिलते हैं और अंत में, अपने दो साल के बेटे को गोद में लेते हुए धीरे धीरे कदमों से कोर्ट से बाहर चले जाते हैं। 

नाटक का पर्दा गिर गया है। एक युग का समापन हो रहा है। किरदार चला जाता है। बाकी कुछ रह जाता है तो एक उदास जाल। कुछ फीकी सी सफेद चूने की लाइने। नम लाल मिट्टी। एक इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड। और,और एक सफेद रंग की आयताकार पट्टिका। जिस पर अंकित हैं राफा के पदचिह्न, उनका नाम, 14 का अंक, जीती गई 14 ट्राफियों का विवरण और ट्रॉफी कूप  डी मस्केटियर का चित्र भी। उसकी स्मृति को उसके चाहने वालों के ही नहीं बल्कि उनसे ईर्ष्या करने वालों के मन में भी हमेशा के लिए जीवित रखने के लिए। 


उद्घोषक उद्घोषणा कर रहा है ' आपके पदचिह्न सदैव यहां रहेंगे।' 

इस साल के फ्रेंच ओपन के पहले दिन इस कोर्ट के सबसे बड़े खिलाड़ी को एक शानदार विदाई से नवाजा जा रहा है। ये स्पेन के राफेल नडाल हैं। 

लेकिन ऐसे दृश्य ना तो पहले थे और ना ही अंतिम होंगे। याद कीजिए साल 2022 के 24 सितंबर के दिन को। उस दिन लंदन के प्रसिद्ध विंबलडन मैदान में लेवर कप के आखिरी मैच को खेल कर रोजर फेडरर विदा हो रहे थे। उनके दो सबसे बड़े प्रतिद्वंदी राफा और नोवाक के साथ साथ खुद रोजर की आँखें बह रही थीं। और उनके वे दोनों प्रतिद्वंदी उनको अपने काँधे बिठाए मैदान से विदा किए जाते थे। 

लंदन अतीत था। वहां फेडरर थे। पेरिस वर्तमान है। यहां राफा हैं। भविष्य शायद मेलबर्न हो और उसके किरदार नोवाक। 

आखिर वो क्या बात है जो राफा को एक बड़ा और बहुत बड़ा खिलाड़ी बनाती है और उतना ही लोकप्रिय भी।

किसी खिलाड़ी की इमेज केवल खेल मैदान के अंदर उसके खेल भर से नहीं बनती। ये बनती है उसके खेल और खेल मैदान के बाहर उसके आचार विचार और व्यवहार से । ये बनती है उसके संपूर्ण व्यक्तित्व से। 

राफा टेनिस के महान खिलाड़ी हैं। इसमें कोई संदेह नहीं। बहुतों के लिए तो वे टेनिस के सार्वकालिक महानतम खिलाड़ी हैं। उनके हिस्से 22 ग्रैंड स्लैम खिताब हैं। नोवाक से दो कम और फेडरर से दो ज्यादा। नोवाक के अलावा सिर्फ वे ही हैं जिन्होंने दो बार ग्रैंड स्लैम पूरा किया। दोनों के पास ही गोल्डन ग्रैंड स्लैम हैं यानी ग्रैंड स्लैम के साथ ओलंपिक गोल्ड भी। लेकिन राफ़ा अकेले हैं जिनके पास एकल और युगल दोनों ओलंपिक गोल्ड हैं। 

लेकिन खेल में उनका सबसे बड़ा प्लस किसी एक खेल सतह पर उनका प्रभुत्व। जैसा डॉमिनेंस उनका मिट्टी वाली सतह पर है, वैसा किसी का भी किसी भी सतह पर नहीं है। वे 14 बार फ्रेंच ओपन जीतते हैं। वे यहां 116 में से 112 मैच जीते हैं और केवल चार बार हारे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने फ्रेंच ओपन के अलावा 12 बार्सिलोना ओपन,11 मोंटे कार्लो और 10 रोम ओपन खिताब जीते। क्ले कोर्ट पर उनको अजेय बनाती है उनकी टॉप स्पिन की कला। उनके फोरहैंड शॉट्स 4000 आरपीएम से भी ज्यादा गति से स्पिन होते हैं। ये गति अविश्वसनीय थी। इससे उन्हें उछाल भी अधिक मिलती जिसे विपक्षी संभालने में असमर्थ होते। और वे अजेय प्रतीत होते।

लेकिन जितना कूल वे खेल मैदान में रहते हैं उससे कहीं अधिक कूल मैदान के बाहर होते हैं। यहां तक कि फेडरर को भी कभी कभी निराशा में रैकेट पटकते हुए देखा जा  सकता है,लेकिन राफा को कभी नहीं। वे खेल मैदान में अपने शानदार खेल से खेल प्रेमियों का दिल जीतते हैं तो मैदान के बाहर अपने डिसेंट व्यवहार से अपने प्रशंसकों का दिल।

 इस शताब्दी के पहले 25 वर्ष नोवाक,राफा और फेडरर की त्रयी के डॉमिनेंस के हैं। इनमें से फेडरर और नोवाक दो विपरीत ध्रुवों के नाम हैं। फेडरर बहुत ही नफासत वाले खिलाड़ी हैं। दर्शकों और मीडिया के सबसे चहेते। उनका हावभाव,व्यवहार ही नहीं बल्कि पूरा खेल नफासत भरा है। वे एलीट खेल के प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं। इसके उलट नोवाक  जोकोविच इस खेल के मास का प्रतिनिधि चेहरा हैं। अंतिम समय तक संघर्ष करने का जज्बा, ख़ांटी व्यवहार,गुस्सैल,मीडिया और टेनिस जगत के विलेन की तरह। लेकिन असाधारण खेल प्रतिभा और उपलब्धियां ऐसी कि उसके आगे हर कोई नतमस्तक।

राफा उन दोनों के बीच कहीं ठहरते हैं। उन दोनों में संतुलन साधते। उन दोनों की विशेषताओं को अपने में समाहित करते। वे फेडरर की तरह खेल और व्यवहार में नफासत से भरे, लेकिन संघर्ष करने और अंतिम समय तक हार ना मानने वाला जज्बा लिए,बहुत ही विनीत और 'डाउन टू अर्थ ' व्यक्तित्व वाले।  एलीट और मास दोनों तत्वों को एक साथ साधते हुए।

12 साल की उम्र तक वे एक साथ फुटबॉल और टेनिस खेलते हैं। एक एलीट खेल और दूसरा मास का खेल। उनके खेल में फुटबॉल की ताकत और गति है और टेनिस की नफासत भी। वे नफासत के खेल टेनिस को चुनते हैं लेकिन उसमें फुटबॉल की गति और ताकत का समावेश करा देते हैं। वे संतुलन साधने में सिद्धहस्त हैं। खेल में भी और व्यवहार में भी। वे मूलतः रक्षात्मक खिलाड़ी हैं लेकिन आक्रमण में करने में भी उस्ताद। 

वे लेफ्टी थे। ये उनके खेल का सबसे बड़ा आकर्षण था। खेल चाहे कोई भी हो लेफ्टी को खेलते देखना सबसे बड़ा ट्रीट है। उसमें गजब का सौंदर्य होता है। एलिगेंस होता है। नफासत होती है। राफा के खेल में भी सब कुछ है। राफा का लेफ्टी होना उनकी अतिरिक्त विशेषता है जो उनके खेल को ज्यादा खूबसूरत और आकर्षक बनाती है। 

तो अब,जब राफा कोर्ट में नहीं होंगे तो यकीन मानिए टेनिस खेल वैसा बिल्कुल नहीं रह जायेगा जैसा उनके कोर्ट में उपस्थित होने से होता था। 

'मर्सी राफा'। खेल को इतना खूबसूरत और आकर्षक बनाने के लिए।


Wednesday, 14 May 2025

किंग कोहली



खिलाड़ी बहुत से आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन इतिहास के सफहों पर और लोगों की स्मृति में केवल वे ही अमिट रह पाते हैं जो ना केवल खेल को गहरे से प्रभावित करते हैं,बल्कि अपनी प्रतिभा की स्थायी छाप भी छोड़ जाते हैं।

 'जेंटलमैन एलीट क्रिकेट' की शास्त्रीयता के सबसे बड़े नायक सुनील गावस्कर और 'मास क्रिकेट' के सबसे बड़े जननायक कपिलदेव ठहरते हैं, तो सचिन तेंदुलकर अपने संपूर्ण खेल से कपिल के 'मास क्रिकेट' को धर्म की ऊंचाइयों तक पहुंचाकर 'भगवान' कहलाने लगते हैं।

इतना होने पर भी भारतीय क्रिकेट दबा सहमा सा था, तो सौरव गांगुली ने उस पर ' किलिंग इंस्टिंक्ट' की सान चढ़ाई और प्रतिपक्ष की आंख में आंख डालने का हौसला रखने वाले 'दादा' कहाए। इस बीच वीरेंद्र सहवाग ने इसे नैसर्गिक स्वछंदता की खुशबू से महकाया, तो युवराज ने 'लेफ्टी एलिगेंस' की आब दी।

बुनियाद तैयार थी। एक ऐसे नायक की जरूरत अभी बाकी थी जिसे इसको शिखर तक पहुंचाना था। तब थाला 'कैप्टन कूल' आए। धोनी ने इसका परचम पूरी दुनिया में लहराया।

गुंजाइश अभी बाकी थी। तब किंग आया। बदलती दुनिया और बदलते क्रिकेट को अब कोहली जैसे ही खिलाड़ी की जरूरत थी। आधुनिक खेलों की सबसे बड़ी आवश्यकता है फिटनेस और प्रतिबद्धता। कोहली जैसा फिटनेस फ्रीक खेलों की दुनिया में और कौन दूजा था और प्रतिबद्धता का दूसरा नाम कोहली ना था तो और क्या था। वे अपनी फिटनेस और प्रतिबद्धता से केवल क्रिकेट को ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय खेल परिदृश्य को प्रभावित करते हैं और खेल की दुनिया में नए प्रतिमान गढ़ते हैं। सुनील क्षेत्री इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं। बाकी उनका खेल और खेल से बने आंकड़े अपनी कहानी खुद कहते हैं। 

हैरी केन,वीरेंद्र सहवाग और रिकी पोंटिंग उन्हें यूंही  'गोट' तो नहीं कहते। कोहली को सफेद शफ़्फाक पोशाक में देखना एक अद्भुत अनुभव था। अब इसकी कमी हमेशा खेलेगी। 

कोहली क्रिकेट का 'खुदा' ना सही पर 'खुदा' से कम भी तो नहीं।

लव यू कोहली।

Monday, 31 March 2025

राकेश ढौंडियाल

 



पिछले शुक्रवार को राकेश ढौंढियाल सर आकाशवाणी के अपने लंबे शानदार करियर का समापन कर रहे थे। वे सेवानिवृत हो रहे थे।

 कोई एक संस्था और उससे संबद्ध लोग एक दूसरे के पूरक होते हैं। वे एक दूसरे को बहुत कुछ देते हैं और समृद्ध करते चलते हैं। लेकिन एक सच ये भी है कि इन्हीं लोगों में से कुछ ऐसे प्रतिभाशाली लोग होते हैं जो संस्था से लेते कम हैं और उसे देते बहुत हैं। राकेश सर उन चंद गिने चुने प्रोग्रामर में से हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा और योग्यता से आकाशवाणी को समृद्ध किया। उसे बलंदियों तक पहुंचाने में अवदान किया।

वे एक शानदार ब्रॉडकास्टर हैं। जो उन्हें शानदार बनाता है, वो है रेडियो के लिए उनका पैशन। परफेक्शनिस्ट। वे किसी प्रोग्राम को और उसके प्रसारण को पूरी तरह निर्दोष,त्रुटिरहित बनाना चाहते । इसके लिए किसी भी हद तक जाते। उस पर अंतिम समय तक काम करते। और छोटी छोटी डिटेल्स पर मेहनत करते। काम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता बेमिसाल है।

आकाशवाणी की प्रसारण की अपनी कुछ विशिष्टता परंपराएं हैं जो रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में आकाशवाणी को विशेष दर्जा प्रदान करती हैं। वे आकाशवाणी की उन परंपराओं को सहेजने वाले बब्रॉडकास्टर्स की जमात के हैं। लेकिन एक प्रसारक के रूप में  उनकी विशिष्टता इस बात में है कि परंपराओं का अनुकरण करते हुए,उसे सहेजते हुए भी नित नवीन प्रयोग किए और बदलते समय में प्रसारण को और खुद को प्रासंगिक बनाए रखा। 

वे एक शानदार फोटोग्राफर हैं। उन्होंने अपने कैमरे से शानदार तस्वीरें उतारी हैं। इसमें उन्हें महारत हासिल है। जिस तरह से कैमरे से वे अद्भुत चित्र बनाते हैं, ठीक वैसे ही सजीव दृश्य वे ध्वनियों से रचते। उन्होंने ध्वनियों साध जो लिया था। उनकी शब्दों से दोस्ती जो थी। वे आवाजों से खेलते और शानदार प्रोग्राम बनाते। उनको मिले तमाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार इस बात की ताईद करते हैं।


वे रेडियो फीचर्स के मास्टर थे। भोपाल में रहते हुए  'उज्जैन कुंभ' के अवसर पर 'पानी' पर एक अद्भुत सीरीज की थी। पानी के हर पहलू को उन्होंने पकड़ा था। उसके भौतिक पक्ष को, अध्यात्म पक्ष को,दर्शन को भी।

छोटे कद का ये पहाड़ी पहाड़ सी ऊंचाई से व्यक्तित्व का मालिक है। सहज और सरल। बहते झरने सा। देहरादून प्रवास को जिन दो व्यक्तियों ने आसान और आनन्ददायक बनाया उनमें अनिल भाई के अलावा वे ही थे। आकाशवाणी देहरादून में साथ काम करते वे अकसर कहते यार साथ साथ मकान बनाया जाए। मेरठ में रहते हुए पिछले एक साल से हर रोज उनकी ये बात याद आती है और बात ना माने का अफसोस भी। लेकिन जिंदगी में हर मुराद पूरी होने के लिए नहीं होती।

किसी की सेवानिवृति पर 'सरकारी बंधन से मुक्त होने' और 'अब अपने शौक पूरे करने' जैसे जुमले कह देना आसान होता है। लेकिन  तीस पैंतीस सालों के पैशन,अनुशासन,आदत के एक लम्हे में खत्म हो जाने से सामंजस्य बैठाना उतना आसान भी नहीं होता। लेकिन हम जानते हैं कि वे बहुत ही क्रिएटिव हैं। घूमना उनका पैशन है। पहाड़ दर पहाड़ वे खाक छानते हैं। तस्वीरें उतारना उन्हें भाता है। उनका अपना एक लोकप्रिय यू ट्यूब चैनल है। निश्चित ही उन्हें अपने जीवन के इस दूसरे हिस्से से तादात्मय बैठाना अधिक सहज और सरल होगा। हमारी भी यही कामना है।

फ़िलवक्त तो एक शानदार ब्रॉडकास्टर,उम्दा अधिकारी और बहुत ही ज़हीन इंसान के आकाशवाणी के शानदार और सफल सफर के निर्बाध अंत पर हार्दिक बधाई और आगे के जीवन के लिए ढेरों शुभकामनाएं। 

आपका आगामी समय शुभ हो।


Tuesday, 11 March 2025



अनुराग वत्स के संग्रह 'उम्मीद प्रेम का अन्न है' को पढ़ना वसंत से होकर गुजरना है। इससे होकर जाना संवेदनाओं के विविध रंगों से मन का रंग  जाना है।


ये काव्यात्मक सौंदर्य की ऊष्मा और गद्यात्मक तटस्थता के शीत से बने समताप का वसंत है- 


'तुम सुंदर हो

यह अनुभव किया जा सकता है

कहा नहीं जा सकता

तुम जिन वजहों से सुंदर और करीब हो

उन वजहों की भाषा में 

समाई संभव नहीं है।' 

००

'दोपहर बारिश हुई। बारिश इतना और यह करती है कि सब एक छत के नीचे खड़े हो जाएं। वह मेरी बग़ल में आकर खड़ी रहे। मुझे पहली बार ऐसा लगा कि उसे यहीं,ऐसे ही,बहुत पहले से होना चाहिए था। और अभी, इसे दर्ज करते हुए यह इच्छा मेरे भीतर बच रहती ही कि हर बारिश में वह मेरे साथ हो।' 


 ये मुस्कानों के ताप और उदासियों के शीत से बना  वसंत है। ये प्रेम की ऊष्मा और इतर संवेदनाओं के शीत से बने समताप का वसंत है - 


'तुम्हारे चेहरे पर इकलौता तिल

जैसे सफ़ेद सफ़े पर स्याही की पहली बूँद

कविता का पहला शब्द :

तुम।' 

००

'हम प्रेम करते हुए अक्सर अकेले पड़ जाते हैं। दुःख इस बात का नहीं कि यह अकेलापन असह्य है। दुःख इस बात का है कि इसे सहने का हमारा ढंग इतना बोदा है कि वह आलोक तक हमसे छिन जाता है, जो प्रेम के सुनसान में हमारे साथ चलता।' 


इस संग्रह को पढ़ना वसंत के भीतर वसंत को महसूस करना है जिसमें प्रेम और इतर अनुभूतियों के विविध रंगी फूल मन के भीतर खिलते और झरते रहते हैं। इस वसंत प्रेम के इस संग्रह को पढ़ने से बेहतर और क्या हो सकता है कि


'तुम बहुत देर से आईं मेरी पंक्ति में

जैसे बहुतेरे शब्दों के बाद आता है

दुबला-लजीला पूर्ण-विराम

पिछले बाक़ी का अर्थ-भार सम्भालता

प्रेम के पन्ने पर सबसे अन्तिम अंकन।'

Monday, 10 March 2025

चैंपियन



खेलों में हार जीत लगी रहती है। पर ये दिल ओ दिमाग पर प्रभाव ना डालें, ऐसा नहीं हो सकता। वे बहुत गहरे से मन में पैठ जाती हैं। फिर हार हो या जीत। कोई एक जीत बहुत सारे जख्मों पर मरहम का काम करती है। घायल ईगो को सहलाती है। पिछली उदासियों को मुस्कान में तब्दील कर देती है। ठीक वैसे ही जैसे कोई एक हार दिल पर गहरी चोट कर जाती है। मन पर उदासियों को पसार देती है। खेल में ऐसा होता है। 

रविवार नौ मार्च की रात दुबई के इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में भारत की क्रिकेट टीम एक इतिहास रच रही थी। आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी के बहुत ही रोमांचक और उतार चढ़ाव भरे फाइनल में न्यूजीलैंड को चार विकेट से हराकर भारतीय टीम तीसरी बार ये चैंपियनशिप जीत रही थी। इससे पहले भारत 2002 में चैंपियंस ट्रॉफी का श्रीलंका के साथ संयुक्त विजेता था और उसके बाद 2013 में दूसरा खिताब जीता था। 

ये एक तरह का स्वीट रिवेंज था। याद कीजिए 2000 की दूसरी चैंपियंस ट्रॉफी का फाइनल जो नैरोबी केन्या में खेला गया था। उसमें भी भारत और न्यूजीलैंड आमने सामने थे। न्यूजीलैंड की टीम 264 रनों का पीछा करते हुए 132 रनों पर पांच विकेट खो चुकी थी। लेकिन क्रिस केर्न्स के नाबाद 102 रन और क्रिस हैरिस के साथ 122 रनों की साझेदारी ने भारत को चैंपियंस ट्रॉफी जीतने से वंचित कर दिया था। लेकिन इस बार न्यूजीलैंड इतिहास को ना दोहरा सका।


इससे पहले पहले ही मैच में भारत ने पाकिस्तान को हराया था। पाकिस्तान पहले मैच में न्यूजीलैंड से हार चुका था। मेजबान बाहर हो चुका था। भारत की सेमीफाइनल की जीत ने ट्रॉफी को भी पाकिस्तान से बाहर कर दिया था। जिस समय भारत की टीम न्यूजीलैंड को हराकर ये ट्रॉफी जीत रही थी तो उनकी यादों में इस ट्रॉफी का पिछला फाइनल भी तैर रहा होगा। 18 जून 2017 को खेले गए फाइनल में पाकिस्तान के विरुद्ध हार गए थे। उस समय कप्तान कोहली थे भारतीय खिलाड़ियों के चेहरे उतरे हुए थे और कंधे झुके हुए। वो हार कप्तान विराट कोहली के साथ-साथ हर भारतीय क्रिकेट प्रेमी के दिल में चुभी थी। लेकिन इस बार पहले ही मैच में उसे हरा दिया। ये जीत सामान्य जीत से कहीं अधिक स्वीट थी या उन्हें महसूस हुई होगी।

 जब वे सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हरा रहे थे जरूर उनके जहां में 2024 का विश्व कप क्रिकेट का फाइनल घूम रहा होगा जिसमें ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हरा दिया था। निश्चित रूप से ये जीत सामान्य से कुछ अधिक रही होगी। कई बार जीत और हार सामान्य से कुछ अधिक हो जातीभाईं ठीक वैसे ही जैसे कुछ खास प्रतिद्वंदियों के विरुद्ध जीत और हार सामान्य से कुछ अधिक होती है। 

निःसंदेह ये जीत कई मायनों में सामान्य से अधिक ही थी।

आज एक बार फिर भारतीय कप्तान रोहित शर्मा टॉस हार गए। न्यूजीलैंड के कप्तान सेंटनर ने जीता और बैटिंग करने का फैसला किया। उनका ये फैसला उनके ओपनर बल्लेबाजों के ताबड़तोड़ खेल से सही साबित किया। सलामी बल्लेबाज विल यंग और रचिन रविंद्र की जोड़ी ने आठ ओवरों में ही 57 रन की साझेदारी की। 



तब इस टूर्नामेंट में भारत के संकटमोचक बने वरुण चक्रवर्ती ने भारत को पहली सफलता दिलाई। उन्होंने यंग (15) को पवेलियन का रास्ता दिखाया। रचिन रविंद्र 29 गेंद में 37 रन बनाकर आउट हुए। कुलदीप ने उन्हें क्लीन बोल्ड किया। उसके बाद जल्द ही केन विलियमसन को भी 11 रन पर चलता कर दिया। टॉम लैथम ने 30 गेंद में 14 रन का योगदान दिया। ग्लेन फिलिप्स ने 34 रन की पारी खेली। 46 वें ओवर में मोहम्मद शमी ने डैरिल मिचेल को आउटकर भारत को बड़ी सफलता दिलाई। डैरिल मिचेल ने 101 गेंदों में तीन चौके लगाते हुये 63 रनों की जूझारू पारी खेली। सातवें विकेट के रूप में 49वें में कप्तान मिचेल सैंटनर आठ रन बनाकर आउट हुए। माइकल ब्रेसवेल ने 40 गेंदों में तीन चौके और दो छक्के लगाते हुए नाबाद 53 रनों की महत्वपूर्ण पारी खेली। न्यूजीलैंड ने निर्धारित 50 ओवरों में सात विकेट पर 251 रन का स्कोर खड़ा किया। उन्होंने आखिरी पांच ओवरों में 50 रन जोड़े और और टीम को ढाई सौ के पार पहुंचाने में मदद की।

भारत की ओर वरूण चक्रवर्ती और कुलदीप यादव ने दो-दो विकेट लिये। रविंद्र जडेजा और मोहम्मद शमी ने एक-एक बल्लेबाज को आउट किया। आज पिच ने तेज गेंदबाजों का साथ नहीं दिया। वे खासे महंगे साबित हुए और निष्प्रभावी भी। शामी ने नौ ओवरों में 74 रन और हार्दिक ने तीन ओवरों में तीस रन दिए। लेकिन तेज गेंदबाज जितने महंगे और निष्प्रभावी साबित हुए स्पिनर्स ने उतनी प्रभावी और शानदार गेंदबाजी की और न्यूजीलैंड को एक बड़ा स्कोर बनाने से रोक दिया। स्पिनर्स ने कुल मिला कर 38 ओवर फेंके जो भरता की और से किसी भी एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच तीसरे सबसे ज्यादा फेंके गए ओवर्स थे। आज भारत की फील्डिंग भी अच्छी नहीं रही। उन्होंने कुल मिलाकर महत्वपूर्ण मौकों पर चार महत्वपूर्ण कैच छोड़े।अन्यथा न्यूजीलैंड की पारी पहले ही सम्मत हो गई होती।

ब्लैककैप्स के खिलाफ 252 रनों का पीछा करते हुए  भारत ने भी शानदार शुरुआत की। उन्होंने बिना विकेट खोए 100 रन बनाए। न्यूजीलैंड की तरफ से भी के तेज गेंदबाज ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाए। लेकिन जैसे ही स्पिनर्स परिदृश पर आए उन्होंने ना केवल भारत की रंगती पर अंकुश लगाया बल्कि  जल्द जल्द तीन विकेट लेकर मैच में वापसी की। पहले शुभमन गिल गए। फिर एक रन बनाकर कोहली भी आउट हो गए। उसके बाद जल्द ही रोहित शर्मा के 76 रनों की शानदार पारी खेलकर बड़ा हिट लगाने के चक्कर में आउट हो गए। तीन विकेट लेकर न्यूजीलैंड ने मैच में वापसी की। लेकिन श्रेयस अय्यर और अक्षर पटेल ने 61 रनों की एक अच्छी साझेदारी की और भारत की वापसी करा दी। लेकिन मैच खत्म हो पाता कि 183 रनों के कुल स्कोर पर 48 रनों की महत्वपूर्ण पारी खेलकर श्रेयस अय्यर आउट हो गए। इस पूरी प्रतियोगिता में श्रेयस ने शानदार बल्लेबाजी की और रचित रविन्द्र के बाद सांसे अधिक रन बनाए। पहले अक्षर पटेल के साथ और फिर हार्दिक पंड्या के साथ महत्वपूर्ण के एल राहुल साझेदारी की और  नाबाद 34 रनों की महत्वपूर्ण पारी की बदौलत भारत को चार विकेट से जीत दिला दी।

मैन ऑफ द मैच का खिताब रोहित शर्मा को और मैन ऑफ द टूर्नामेंट का खिताब न्यूजीलैंड के के रचिन रविन्द्र को मिला। रचिन ने टूर्नामेंट में सर्वाधिक 263 रन बनाए और पांच से भी कम की औसत से गेंदबाजी करते हुए तीन विकेट भी लिए।

प्रतियोगिता का आरंभ 19 फरवरी को मेजबान पाकिस्तान और न्यूजीलैंड  के बीच ग्रुप ए के मैच से हुआ था। इस मैच में न्यूजीलैंड ने पाकिस्तान को 60 रनों से हरा दिया। इस ग्रुप की दो अन्य टीमें भारत और बांग्लादेश की थीं। भारत ने अपने सभी मैच दुबई में खेले। अपने पहले ग्रुप मैच में भारत ने बांग्लादेश को छह विकेट से हराकर साहंदार शुरुआत की। उसके बाद दूसरे मैच में पाकिस्तान को भी आसानी से छह विकेट से हरा दिया। तीसरे और अंतिम ग्रुप मैच में न्यूजीलैंड को 44 रनों से हराया और इस प्रकार भारत ने अपने तीनों मैच जीतकर अपने ग्रुप में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। जबकि न्यूजीलैंड ने दो मैच जीतकर दूसरा स्थान प्राप्त किया। 

ग्रुप बी में ऑस्ट्रेलिया,दक्षिण अफ्रीका,अफगानिस्तान और इंग्लैंड की टीम थीं।  ग्रुप स्टेज में दक्षिण अफ्रीका ने बेहतरीन खेल दिखाते हुए पहले स्थान पर और ऑस्ट्रेलिया दूसरे स्थान पर रहीं और सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई किया। इस ग्रुप में अफगानिस्तान की टीम ने भी शानदार खेल दिखाया और इंग्लैंड को हरा दिया लेकिन ऑस्ट्रेलिया से पीछे रहकर नॉकआउट के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकी।

पहला सेमीफाइनल भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ। ऑस्ट्रेलिया की टीम पहले बैटिंग करते हुए 49.3ओवर में  264 रनों पर आउट हो गई। 265 रनों का पीछा करते हुए कोहली के शानदार शतक की बदौलत 11गेंदे शेष रहते हुए 6विकेट पर 267 रन बनाकर मैच चार विकेट से जीतकर फाइनल में प्रवेश किया।

दूसरा सेमीफाइनल न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेला गया। इस मैच में  पहले बल्लेबाजी करते हुए न्यूजीलैंड ने  06 विकेट खोकर 362 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया। इस लक्ष्य को पाने की कोशिश में दक्षिण अफ्रीका की टीम निर्धारित 50 ओवरों में  09 विकेट पर 312 रन ही बना सकी और न्यूजीलैंड ने 50 रनों से शानदार जीतकर फाइनल में प्रवेश किया।

इस तरह फाइनल में न्यूजीलैंड को हरा कर रोहित शर्मा की कप्तानी वाली भारतीय क्रिकेट टीम रविवार 09 मार्च को इतिहास रच दिया है। भारत 12 साल बाद आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी फाइनल जीतकर अपने नाम लगातार दो आईसीसी खिताब अपने नाम किए। 10 महीने पहले भारत ने रोहित  की ही कप्तानी में आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप अपने नाम किया था। 

इस प्रतियोगिता की भारत सबसे सफल टीम है जिसने ये तीन बार जीती है। ऑस्ट्रेलिया ने इसे दो बार जीता है। इसके अलावा श्रीलंका,दक्षिण अफ्रीका,पाकिस्तान और वेस्टइंडीज ने एक एक बार जीत हासिल की है।

Thursday, 6 March 2025

अलविदा प्रिय पैडी

 



सुनील गावस्कर ने अपनी किताब 'आइडॉल्स' में अपने पसंदीदा क्रिकेटर्स के बारे में लिखा है। इनमें से 22वें नंबर पर पद्माकर शिवालकार और 23वें नंबर पर राजेंद्र गोयल हैं। इन दोनों को ही उन्होंने बहुत ही शिद्दत से याद किया है। राष्ट्रीय फलक पर अपने हुनर से चमक बिखेरने वाले ये दोनों ऐसे हुनरमंद सितारा स्पिनर्स थे जिन्हें नियति ने क्रिकेट के अंतर्राष्ट्रीय फलक पर अपनी जवांमर्दी दिखाने से महरूम कर दिया।

ये वो समय था जब स्पिन गेंदबाजी की कला अपने चरम पर थी। बेदी, प्रसन्ना,चंद्रशेखर और वेंकट राघवन की चौकड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी घुमावदार और उड़ान वाली गेंदों से स्पिन गेंदबाजी की वेस्टइंडीज,इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की खौफनाक तेज गेंदबाजी के बरक्स एक अलहदा छवि बना रही थी। वे चारों खौफ के बजाए ललचा-ललचा कर बल्लेबाजों को छका रहे थे। 

और जिस समय ये चौकड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर ये काम कर रहे थे,ठीक उसी समय भारत के दो और गेंदबाज पद्माकर शिवालकर और राजिंदर गोयल का युग्म राष्ट्रीय स्तर पर उसी काम को अंजाम दे रहे थे। दरअसल उस महान चौकड़ी के समानांतर स्पिन गेंदबाजी के एक प्रति संसार की निर्मिति कर रहे थे। इस युग्म द्वारा रचा जा रहा संसार योग्यता और स्पिन कला कौशल में चौकड़ी द्वारा निर्मित दुनिया की आभा से ज़रा भी कम ना था। बस कुछ कम था तो नियति के साथ का अभाव भर था। योग्यता और प्रतिभा की आभा दोनों जगहों पर एक सी थी। पर एक में खुशकिस्मती की चमक थी दूसरे में बदकिस्मती की छाया। एक प्रसिद्धि से गमक गमक जाता। दूसरा कुछ ना मिल पाने की उदास छाया से आच्छादित रहता। 

उन दोनों को देखकर समझा जा सकता है कि एक मौका मिलने और ना मिलने भर से जीवन में कितना बड़ा अंतर आ जाता है या आ सकता है। कई बार होता है आप एक गलत समय पर पदार्पण करते है। शायद उन दोनों की ये बदकिस्मती थी कि वे बिशन सिंह बेदी के समकालीन थे। अगर नियति उन दोनों पर मेहरबान हुई होती तो हम एक दूसरा इतिहास पढ़ रहे होते। प्रभूत क्षमता और प्रतिभा होने के बाद भी भारत की ओर से खेलने का उन्हें एक मौका नहीं मिला। दोनों की नियति एक थी। दोनों की त्रासदी एक थी। दोनों यूं ही बीत गए,रीत गए,जाया हो गए।

पर वे दोनों घरेलू क्रिकेट के उस्ताद खिलाड़ी थे। दोनों वामहस्त धीमी गति के ऑर्थोडॉक्स लेग स्पिनर। ये उन चार खिलाड़ियों में से थे जिन्हें बिना टेस्ट खेले बीसीसीआई के सी के नायडू लाइफ टाइम पुरस्कार से नवाजा गया। दो ऐसे खिलाड़ी जिन्हें बिना भारत की ओर से खेले गावस्कर की किताब  'आइडॉल्स' में जगह मिली।

राजिंदर गोयल का निधन 2020 में हुआ और अब 03 मार्च 2025 को 84 साल की उम्र में शिवालकर ने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा।

पद्माकर शिवालकर क्या ही प्रतिभाशाली रहे होंगे कि जब पहली बार उन्होंने ट्रायल दिया तो उन्होंने क्रिकेट की गेंद को छुआ भी नहीं था। वो उस समय तक केवल टेनिस बॉल से खेला करते थे। उन दिनों उन्हें काम की जरूरत थी और बीनू मांकड़ को अपनी फैक्ट्री टीम के लिए खिलाड़ियों की। उन्होंने शिवालकर को चुना और कहा 'मेरी या किसी और की शैली की नकल ना करना।' उस युवा ने इस बात की गांठ बांध ली। अपनी खुद की शैली ईजाद की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उन्होंने 1961-62 में पहली बार प्रथम श्रेणी मैच खेला और 1987-88 तक 48 वर्ष की उम्र तक खेलते रहे। उन्होंने इस दौरान कुछ 124 मैचों में 19.69 की औसत से 589 विकेट और 16 विकेट लिस्ट ए मैचों में लिए।

एक गेंदबाज के रूप में पलक झपकते विपक्षी टीम को ध्वस्त करने की अद्भुत क्षमता थी उनमें। उनकी सबसे शानदार गेंदबाजी का उदाहरण 1973 का रणजी फाइनल है। ये फाइनल मैच चेन्नई के  चेपॉक स्टेडियम में मुंबई और तमिलनाडु के बीच खेल गया था। पिच वेंकटराघवन और वी वी कुमार के अनुकूल थी। मुंबई की पहली पारी 151 रन पर सिमट गई और तमिलनाडु ने पहले दिन के खेल की समाप्ति पर दो विकेट पर 62 रन बना लिए थे और बड़ी बढ़त लेने के लिए तैयार दिख रहा था। उस समय माइकल दलवी और अब्दुल जब्बार की साझेदारी ने 56 रन बनाए थे। पर अगले दिन शिवालकर जब गेंदबाजी करने आये और पहली गेंद तेजी से घूमी और उछली तो उस टीम के सदस्य कल्याण सुंदरम बताते हैं कि उस गेंद को देखते ही तमिलनाडु टीम को आभास हो गया था कि जल्द ही सभी का बैटिंग नंबर आने वाला है। और ये आशंका सही साबित हुई। बाकी के आठ विकेट केवल 18 रन जोड़ सके और तमिलनाडु की टीम 80 रन पर ऑल आउट हो गई। उस इनिंग में शिवालकर ने 16 रन पर 08 विकेट लिए और दूसर पारी 18 रन देकर 05 विकेट। पांच दिन का मैच दो दिन में खत्म हो गया।

एक स्पिन गेंदबाज के दो प्रमुख विशेषता होती हैं। एक, हवा में उड़ान और लूप। दूसरी, पिच से गेंद का घुमाव। वे फ्लाइट और लूप के मास्टर गेंदबाज थे। वे एक और तो हवा में गेंद की उड़ान से बल्लेबाज को भरमाते,तो दूसरी और वे अपनी गेंद की गति और लंबाई से बल्लेबाजों को परेशान करते। बल्लेबाजों को स्टंप आउट कराना उनका सबसे प्रिय शगल था और खासियत भी।

वे एक शानदार और सफल गेंदबाज थे। उन्होंने 13 बार दस या दस से अधिक विकेट लिए और 42 बार एक पारी में पांच या पांच से अधिक विकेट लिए। इस सब के बावजूद वे भारतीय टीम के लिए नहीं चुने जा सके। इसका उन्हें हमेशा मलाल रहा। और इसे हमेशा उन्होंने बहुत शिद्दत से महसूस किया।

एक कहावत है 'सफलता से अधिक सफल कुछ नहीं होता'। इस बात को सबसे ज्यादा वही समझ सकता है जिन्हें सफलता नहीं पाई हो। वे अपनी सारी योग्यता और प्रतिभा के बावजूद भारतीय टीम में जगह ना बना पाने की असफलता और उससे उपजी निराशा को और सफलता की ऊष्मा को और उसके महत्व को शिवालकर से बेहतर भला और कौन समझ सकता है। 


और उनकी इस निराशा और उदासी को सबसे अधिक उनके गायन में महसूस की जा सकती है। 

वे एक शानदार प्रोफेशनल गायक भी थे। पक्के गायक। अगर वे क्रिकेटर ना होते तो शायद वे एक सफल और शानदार गायक होते। उन्होंने अपने कुछ गीतों में कहा है कि कैसे एक व्यक्ति का भाग्य  उसके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है रूप से 'हा चेंदु दैवगतिचा......' गीत में। जब वे ये गीत गाते तो अहसास होता है कि मानो वे अपना जीवन गा रहे हों। कितनी शिद्दत से उनका दर्द उस गीत में छलक छलक जाता है। जब वे गाते हैं तो लगता है उसमें उन्होंने अपनी आत्मा का समावेश कर दिया है। ये उनके जीवन का मानो थीम गीत हो - 


"भाग्य का यह चक्र निरंतर घूमता रहता है, 

कभी ऊँचाइयों तक ले जाकर तो 

कभी किसी का जीवन बिखेरकर। 


यह समय की चाल कैसी है, 

इसे कोई नहीं समझ पाया। 

जब भी कुछ होता है, 

लोग बिना सोचे-समझे दोषारोपण करने लगते हैं और हज़ारों ज़ुबानें बड़बड़ाने लगती हैं।


इस भाग्य के खेल को ज़रा करीब से देखो

जिस तरह समुद्र में नावें छोड़ी जाती हैं 

और लहरों की मार से उनकी परीक्षा होती है, 

वैसे ही जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं। 

जो इन लहरों से लड़ने की ताकत रखते हैं,

 वे विजयी होते हैं, 

तो कुछ लोग इन्हीं लहरों में समा जाते हैं।


परंतु यह सब तो जीवन का स्वाभाविक क्रम है, फिर दुखी होने से क्या लाभ?

जो भी सुख के पल हमारे पास बचे हैं, उन्हें प्रेम और सहेज कर रखो।

इन्हीं सुखद पलों से जीवन का मधुर संगीत बनता है, जो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।"


बाद में उन्होंने 'हा चेंदु दैवगतिचा' (समय का ये चक्र) नाम से किताब भी लिखी। सच में वे समय के चक्र में फंसे थे और नियति का शिकार थे। वे इसे जानते समझते थे और इसको शिद्दत से महसूस करते थे। एक उदास संगीत हमेशा उनके जीवन के पार्श्व में बजता था। उसकी लय पर उनका जीवन थिरकता था।

क्या ही विडंबना है कि जिसने गेंद की उड़ान को साध लिया हो, जो गेंद की उड़ान का जादूगर हो,उसका साधक हो,नियति ने उसे उड़ने न दिया। उसे उन ऊंचाइयों से महरूम कर दिया जिन ऊंचाइयों का वो हकदार था और जिन ऊंचाइयों को वो छूना चाहता था।

पर कुछ जीवन अपूर्ण इच्छाओं को लिए ही पूर्ण हो जाते हैं। पद्माकर शिवालकर भी गेंदबाजी के एक ऐसे ही साधक थे जिनकी बहुत सी इच्छाएं अपूर्ण ही रहनी थी।  शायद उनकी महानता इस अपूर्णता से ही बनती है और वे इसीलिए याद किए जाते रहेंगे।

अलविदा प्रिय पैडी।


Monday, 3 March 2025

रोहित द हिटमैन

 

कई बार आपको किसी विषय की सही जानकारी नहीं होती या बिल्कुल नहीं होती। 'मोटा होने' और 'फिट होने' में अंतर करना आपको आना चाहिए। 

जब आप रोहित को मोटा कहकर फिट ना होने की बात करते हैं तो उस पूरे सिस्टम को प्रश्नांकित करते हैं जिसके तहत उनका टीम में चयन किया जाता है। और तब सवालों के घेरे में चयन समिति, कोच और टीम के फिटनेस ट्रेनर और समूचा स्टाफ भी आता है और बीसीसीआई भी।

आपको पता होने चाहिए बीसीसीआई का फिटनेस टेस्ट बहुत कठिन होता है।

जहां तक एक कप्तान के रूप में उनकी सफलता की बात है वे सबसे सफल कप्तानों में से एक हैं।

अगर कोई मोटा होने को एक खिलाड़ी का अवगुण मानता है तो उन्हें महिला टेबल टेनिस की महिला खिलाड़ियों को देखना चाहिए जिन्होंने हाल के वर्षों में इस खेल में भारत के लिए असाधारण उपलब्धियां हासिल की हैं। और हां सरफराज खान को भी ध्यान में रखना चाहिए जिन्होंने घरेलू क्रिकेट में सफलता के नए मानदंड स्थापित किए हैं।

रोहित एक शानदार खिलाड़ी और एक सफल कप्तान हैं। और रहेंगे। लव यू रोहित।

नागोया एशियाड:उल्लेखनीय प्रदर्शन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी एक जीत,कोई भी एक पदक जीत लेना मायने रखता है। ये उस टीम या उस एथलीट की योग्यता,प्रतिभा और उसके कठिन पर...