Wednesday, 31 July 2024

पोडियम पर दो नहीं तीन खिलाड़ी थे

 






खेलों की कोई भी तस्वीर केवल खेलों से कहां मुकम्मल होती है,जब तक कि इसमें खेलों से इतर किस्से कहानियों के रंग ना भरे जाएं। किस्से कहानियां जो इन खेलों के संघर्ष की कठोर धरातल को मुलामियत देती हैं। उसकी शुष्क भूमि को तरल कर देती है। उसके परिश्रम के स्वेद को सुकून की मंद बयार से आवृत्त कर देती हैं। खेल की भूमि को बहुरंगी बना देती है।

पेरिस ओलंपिक में मिस्र की फेंसर(तलवार बाज) हादा हाफिज तीसरी बार ओलंपिक खेलों में भाग ले रही थीं। वे चिकित्सा में स्नातक हैं और 2019 के अफ्रीकी खेलों में व्यक्तिगत और टीम स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। महिला एकल सेबर स्पर्धा में उन्होंने पहले दौर का मैच 10वीं वरीयता प्राप्त खिलाड़ी यूएसए की एलिजाबेथ टार्टाकोवस्की के खिलाफ म15/17 से जीत लिया। लेकिन अगले दौर के  मैच में दक्षिण कोरिया की जियोन हायोंग से 07/15 से हार गईं। इसके बाद इंस्टा पर उन्होंने लिखा-

 'आपको पोडियम पर दो खिलाड़ी दिखलाई दे रहे थे,असल में वे तीन थे। मैं,मेरी प्रतिद्वंदी और मेरा दुनिया में आने वाला छोटा बच्चा। मेरे और मेरे बच्चे के सामने कई चुनौतियां थीं,चाहे शारीरिक हो या मानसिक।...मैं ये पोस्ट यह कहने के लिए लिख रही हूं कि राउंड ऑफ 16 में अपनी जगह पक्की करने पर मुझे गर्व महसूस हो रहा है।'

यानी वे इस प्रतियोगिता में अकेले भाग नहीं लिया बल्कि उनके साथ था उनका सात माह का गर्भस्थ शिशु।

ये खेल की दुनिया में कुछ अस्वाभाविक सी बात थी। पूरा खेल जगत उनके खुलासे चकित था। पर इन सबसे अलग वे एक साथ मातृत्व सुख और अपने खेल के पैशन को एंजॉय कर रहीं थीं। मातृत्व सुख के साथ अपने पैशन का आनंद उनके साहस का बायस है। 

एक खिलाड़ी के खेल के प्रति प्यार और जुनून का खूबसूरत निदर्शन हैं। एक खिलाड़ी का ऐसा साहस वो ज़ुनून भरा जेस्चर कितने ही किताबी स्त्री विमर्शों पर भारी है।

ऐसे किस्से ही तो खेलों की दुनिया में कुछ गाढ़े रंग भर देते हैं उसे थोड़ा और खूबसूरत कर जाये हैं।




पेरिस ओलंपिक 2024_10:चौथा दिन



कल पेरिस ओलंपिक का चौथा दिन। जैसे जैसे प्रतियोगिता आगे बढ़ रही है खिलाड़ियों के बीच संघर्ष कुछ और सघन होते जा रहे हैं,श्रेष्ठता के पैमाने ऊंचे होते जा रहे हैं,खेल प्रेमियों की भावनाएं हिलोरें मारने लगी हैं। सफलताओं की नई इबारतें लिखी जाने लगी हैं। कुछ इतिहास मिटा दिए गए, कुछ नए सिरे से लिखे गए। सफलता की नई इबारतें लिखी गई, पुरानी मिटा दी गईं।


निशानेबाजी
में कल सफलता की एक नई इबारत भारतीय खिलाड़ियों ने भी लिखी। भारतीय खेल इतिहास में एक नया सफा जोड़ा भारतीय निशानेबाजों ने। कल भारत के लिए एक पदक दांव पर था 10 मीटर एयर पिस्टल की मिश्रित टीम स्पर्धा में। टीम में मनु भाकर और सरबजोत सिंह थे और उनका सामना दक्षिण कोरिया की ली वोन्हो और ओ ये जिन की जोड़ी से था। ओ ये जिन वही खिलाड़ी हैं जिन्होंने रिकॉर्ड के साथ एक दिन पहले ही महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता था। लेकिन यहां भारतीय जोड़ी ने शानदार शूटिंग की और दक्षिण कोरियाई जोड़ी को 16-10 से हराकर भारत को कांस्य पदक दिला दिया। भारत का और मनु का ये दूसरा पदक था।

जहां ये जोड़ी ओलंपिक में टीम स्पर्धा का पदक जीतने वाली पहली भारतीय जोड़ी बन गयी है,वहीं मनु एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय। सरबजोत ने ये पदक जीतकर अपनी पुरुष स्पर्धा के फाइनल में ना पहुंच पाने की निराशा को दूर किया। उस स्पर्धा में वे प्रतिद्वंदी खिलाड़ी के साथ समान स्कोर पर थे,लेकिन कम इनर 10 लगाने के कारण फाइनल की दौड़ से बाहर हो गए थे। उधर इस बार दो पदक जीतकर मनु ने टोक्यो ओलंपिक की निराशा को दूर किया।

इस स्पर्धा का  स्वर्ण पदक सर्बिया के जोराना अरुनोविक और दामिर मिकेक ने और रजत पदक तुर्की के सेवल इलैदा तारहान और यूसुफ डिकेक ने जीता।

लेकिन  निशानेबाजी की ट्रैप स्पर्धा में भारतीय शूटरों ने निराश किया। पुरुष स्पर्धा में क्वालिफिकेशन राउंड के दूसरे दिन पृथ्वीराज टोंडाइमान 21वें स्थान पर रहे और फाइनल में नहीं पहुंच सके। 37 वर्षीय भारतीय निशानेबाज ने पांच राउंड में 22, 25, 21, 25 और 25 का स्कोर दर्ज किया। टोंडाइमन इस बार पुरुषों की ट्रैप स्पर्धा में डेब्यू करने वाले एकमात्र भारतीय निशानेबाज थे। उन्होंने अपने करियर में एक बार विश्व कप जीता है। तीन साल पहले नई दिल्ली में ट्रैप टीम में स्वर्ण पदक जीता था।

महिला वर्ग में पहले दिन तीन राउंड के बाद राजेश्वरी सिंह 21वें और श्रेयसी सिंह 22वें स्थान पर हैं। शेष दो राउंड आज होंगे।

हॉकी में भारतीय पुरुष टीम ने यवेस-डु-मनोइर स्टेडियम में पूल बी के एक मैच में आयरलैंड के खिलाफ 2-0 से शानदार जीत हासिल की। तीन अंकों के साथ भारत अब पूल बी में शीर्ष पर पहुंच गया। दोनों गोल भारत के कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने किए। पहला गोल  11वें मिनट में पेनाल्टी स्ट्रोक से और दूसरा गोल  19वें मिनट में पेनल्टी कॉर्नर से आया। अब पेरिस ओलंपिक में उनके गोलों की संख्या चार हो गई। पिछले कांस्य पदक विजेता भारत का पहले हाफ में दबदबा रहा। दूसरे हाफ में संघर्ष करने के बावजूद आयरलैंड वापसी करने में विफल रहा। भारत की क्वार्टर फाइनल में जगह पक्की हो गई है।

तीरंदाजी में भारत का खराब प्रदर्शन चौथे दिन भी जारी रहा। महिलाओं की व्यक्तिगत स्पर्धा में अंकिता भकत पहले दौर में ही बाहर हो गईं। 26 वर्षीय 11वीं रैंकिंग वाली भकत पोलैंड की 54वीं रैंकिंग वाली वियोलेटा मैसजोर से 6-4 से हार गईं।

भजन कौर ने उम्मीद जगाई रखीं। उन्होंने अपने पहले दौर के मैच में  इंडोनेशिया की सईफा नूरफीफा कमल के खिलाफ 7-3 से जीत हासिल की। इंडोनेशियाई तीरंदाज ने दो सेटों के बाद 3-1 की बढ़त ले ली थी लेकिन भजन लगातार तीन सेट जीतकर वापसी की और मुकाबला जीत लिया। उसके बाद दूसरे दौर के मैच में पोलैंड की वियोलेटा मैसजोर को 60 से हराकर प्री क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया।

उधर पुरुषों की व्यक्तिगत स्पर्धा में धीरज बोम्मादेवरा दूसरे दौर के मैच में कड़े मुकाबले में  कनाडा के एरिक पीटर्स से शूट ऑफ में हार गए।

बैडमिंटन में भारत के तीसरी वरीयता प्राप्त सात्विकसाईराज रेंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी की जोड़ी ने अपने अंतिम ग्रुप सी मैच में इंडोनेशियाई जोड़ी फजर अल्फियान और मुहम्मद रियान अर्दियांतो को सीधे सेटों में  21-13, 21-13 से हरा दिया। इस जोड़ी ने अब क्वार्टरफाइनल में जगह पक्की कर ली है और ऐसा करने वाली ये पहली भारतीय जोड़ी है। सात्विक-चिराग दो मैचों में दो जीत के साथ ग्रुप सी स्टैंडिंग में शीर्ष पर रहे।

लेकिन महिला युगल स्पर्धा में तनीषा क्रेस्टो और अश्विनी पोनप्पा की भारतीय बैडमिंटन जोड़ी ग्रुप मैच में ऑस्ट्रेलिया की सेत्याना मापसा और एंजेला यू की जोड़ी से  खिलाफ 21-15, 21-10 से हार गईं। भारतीय जोड़ी की ये लगातार तीसरी हार थी। ग्रुप में सबसे नीचे रहते हुए उन्होंने अपना अभियान समाप्त किया। 

मैच के बाद पोनप्पा ने घोषणा की कि उन्होंने अपना आखिरी ओलंपिक मैच खेल लिया है।

तीन बार की ओलंपियन पोनप्पा ने कहा, "यह भावनात्मक और मानसिक रूप से बहुत बड़ी बात है, मैं दोबारा इससे नहीं गुजर सकती। यह आसान नहीं है, अगर आप थोड़े छोटे होते हैं तो आप इन सब चीज़ों से गुजर सकते हैं। इतने लंबे समय तक खेलने के बाद , मैं इसे अब और नहीं सह सकती।"

अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में, पोनप्पा ने छह कॉमनवेल्थ गेम्स पदक जीते हैं, जबकि विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेलों के पोडियम पर भी जगह बनाई है।

मुक्केबाजी में भी भारतीय मुक्केबाजों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। अमित पंघल पुरुषों के 51 किग्रा वर्ग में  राउंड ऑफ 16 में हार गए। एशियन गेम्स के चैंपियन पंघल एक करीबी मुकाबले में जाम्बिया के तीसरी वरीयता प्राप्त पैट्रिक चिनयेम्बा से 4:1 से हार गए।महिलाओं के 57 किग्रा वर्ग के राउंड ऑफ 32 में भारत की जैस्मीन लम्बोरिया फिलिपींस की नेस्टी पेटेसियो से 50 से हार गईं। प्रीति पवार भी महिलाओं के 54 किग्रा वर्ग के राउंड ऑफ 16 मुकाबले में कड़े संघर्ष के बाद कोलंबिया की येनी एरियास से 3:2 से हार गईं। 

रोइंग में एकमात्र भारतीय रोवर बलराज पंवार कल पुरुष एकल स्कल्स स्पर्धा के क्वार्टरफाइनल-4 में पांचवें स्थान पर रहे। 25 वर्षीय आर्मी मैन ने 7:05.10 का समय दर्ज किया और मौजूदा ग्रीष्मकालीन खेलों में पदक की दौड़ से बाहर हो गए।

ब्रिटेन के नाथन हेल्स ने अपने ओलंपिक डेब्यू में  पुरुषों की ट्रैप शूटिंग प्रतियोगिता नए ओलंपिक रिकॉर्ड के साथ जीत ली। 28 वर्षीय ब्रिटिश निशानेबाज ने फाइनल में 48 का स्कोर बनाया। उन्होंने डेविड कोस्टेलेकी के टोक्यो में बनाए गए  43 के स्कोर का रिकॉर्ड तोड़ा। हेल्स ने जुलाई 2023 में 49 के स्कोर के साथ विश्व रिकॉर्ड भी बनाया है। इस स्पर्धा का रजत पदक चीन की क्यूई यिंग ने  और ग्वाटेमाला के जीन पियरे ब्रोल कर्डेनस ने कांस्य पदक जीता। यह चाइना का पुरुष ट्रैप स्पर्धा का पहला ओलंपिक पदक था जबकि ग्वाटेमाला ने ग्रीष्मकालीन खेलों के इतिहास में अपना दूसरा पदक जीता।

टेनिस की महिला एकल स्पर्धा में दूसरी वरीयता प्राप्त अमेरिका की कोको गफ क्रोशिया की वेकिक से सीधे सेटों में हारकर प्रतियोगिता से बाहर हो गई।

चौथे दिन की समाप्ति के बाद पदक तालिका में जापान 07 स्वर्ण,02 रजत और 04 कांस्य पदक सहित कुल 13 पदकों के साथ शीर्ष पर बना हुआ है। चीन नंबर दो पर आ गया है। उसने अब तक 06 स्वर्ण,06 रजत और 02 कांस्य पदक जीते हैं। तीसरे स्थान पर ऑस्ट्रेलिया है। उसने 06 स्वर्ण,04 रजत और 01 कांस्य पदक जीता है। भारत दो कांस्य पदक जीतकर 33वें स्थान पर है।

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और चलते चलते ये कि मिस्र की तीन बार की ओलंपियन फेंसर नादा हफीज ने इस प्रतियोगिता में अकेले भाग नहीं लिया बल्कि उनके साथ था उनका सात माह का गर्भस्थ शिशु।

उन्होंने पहले दौर के मैच में 10वीं वरीयता प्राप्त खिलाड़ी एलिजाबेथ टार्टाकोवस्की के खिलाफ मैच 15/17 से जीत लिया।लेकिन अगले दौर के  मैच में दक्षिण कोरिया की जियोन हायोंग से 07/15 से हार गईं। इसके बाद इंस्टा पर उन्होंने लिखा-

 'आपको पोडियम पर दो खिलाड़ी दिखलाई दे रहे थे,असल में वे तीन थे। मैं,मेरी प्रतिद्वंदी और मेरा दुनिया में आने वाला छोटा बच्चा। मेरे और मेरे बच्चे के सामने कई चुनौतियां थीं,चाहे शारीरिक हो या मानसिक।...मैं ये पोस्ट यह कहने के लिए लिख रही हूं कि राउंड ऑफ 16 में अपनी जगह पक्की करने पर मुझे गर्व महसूस हो रहा है।'

ये एक खिलाड़ी के खेल के प्रति प्यार और जुनून का खूबसूरत निर्देशन हैं। मातृत्व सुख के साथ अपने पैशन का आनंद उनके साहस का बायस है। एक खिलाड़ी का जेस्चर कितने ही स्त्री विमर्श पर भारी है। ऐसी भावना और कहानियां ही खेलों और दुनिया को थोड़ा और खूबसूरत कर जाती है।

Tuesday, 30 July 2024

प्रतिभा उम्र की मोहताज कहां





 हम अपने जीवन में कितनी बार कहते हैं कि उम्र एक नंबर मात्र है। और कितनी बार इसको सच होते भी देखा है। अब इन बालाओं को देखिए ना।

कल पेरिस ओलंपिक में महिलाओं की स्ट्रीट स्केटबोर्डिंग स्पर्धा में पदक जीतने वाली तीनों प्रतिभागी टीन एजर हैं और उनकी टोटल उम्र 45 वर्ष है। इस स्पर्धा का स्वर्ण जापान की 14 वर्षीय कोको योशीजावा ने,रजत पदक जापान की ही 15 वर्षीय लिज अलामा ने और कांस्य पदक ब्राजील की 16 वर्षीय रायसा लील ने जीता। 


उधर 10 मीटर एयर राइफल की महिला स्पर्धा में  स्वर्ण जीतने वाली दक्षिण कोरिया की बान ह्यू जिन मात्र 16 वर्ष की हैं और चीन की रजत पदक जीतने वाली हुआंग यूतिंग मात्र 17 वर्ष की। पदक के रंग का फैसला टाई ब्रेक से हुआ। दोनों ने ओलंपिक रिकॉर्ड ब्रेक किया।

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प्रतिभा उम्र की मोहताज कहां होती है।




ये माफीनामा नहीं प्रेम का दीवान है

 




टोक्यो ओलंपिक की ऊंची कूद की स्पर्धा में इटली के जियानमार्को तंबेरी और कतर के मुताज बर्शिम दोनों ने 2.37 मीटर ऊंची छलांग लगाई और अंततः स्वर्ण पदक साझा करने को सहमत हो गए। ये अपने आप में अभूतपूर्व घटना थी। इसके बाद वे दोनों खिलाड़ी गले मिलकर रो रहे थे। ये टोक्यो ओलंपिक का सबसे खूबसूरत दृश्य था किसी सुंदर कविता जैसा। 

वही जियानमार्को पेरिस ओलंपिक में भी एक कविता रच रहे थे। इस बार सचमुच की कविता।

वे इस बार इटली के ध्वज वाहक थे। ओपनिंग सेरेमनी के दौरान उनकी वेडिंग रिंग उनकी उंगली से गिरकर सीन नदी में गिर गई।

इस पर क्षमा मांगते हुए उन्होंने अपनी पत्नी चियारा बॉमटेंपी तांबेरी के लिए इंस्टा पर एक पोस्ट लिखी - 

'मुझे दुख है प्रिय, बहुत दुख । 

बहुत ज़्यादा पानी, पिछले कुछ महीनों में बहुत अधिक परिश्रम से वजन का कम होना और परेड का अत्यधिक उत्साह, शायद ये ही तीन तथ्य हैं। वो (वेडिंग रिंग) फिसली। परेड करते हुए मैंने उसे उड़ते देखा। मैंने उसको नज़र भर देखा, जब तक वो नाव में गिरकर उछल नहीं गई। उम्मीद की एक किरण जैसी। लेकिन दुर्भाग्य से उछाल गलत दिशा में था। वह केवल वहीं जाना चाहती थी। मैं उसके लिए इससे बेहतर स्थान की कल्पना नहीं कर सकता।

 अगर मुझे सचमुच इसे खोना पड़े तो मैं इससे बेहतर जगह की कल्पना नहीं कर सकता। यह प्यार के शहर की नदी के तल में हमेशा के लिए रहेगी। जब मैं दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण खेल आयोजन के उद्घाटन समारोह के दौरान इतालवी तिरंगे को जितना संभव हो उतना ऊपर ले जाने की कोशिश कर रहा था, वह उड़ चली। 

मुझे लगता है कि कल की गलती का एक काव्यात्मक पक्ष हो सकता है। तुम चाहो तो हम तुम्हारी रिंग भी उसी नदी में फेंक देंगे ताकि वे दोनों हमेशा साथ रहें। तब हमारे पास एक और बहाना होगा,जैसा तुमने हमेशा कहा है कि हम कुछ नई प्रतिज्ञा करें और फिर से शादी करें। 

इसका खोना शुभ संकेत भी हो सकता है कि हम और अधिक स्वर्ण (पदक) लेकर घर लौटें।'

ये माफीनामा नहीं। ये प्रेम का दीवान है।

जितनी खूबसूरत उनकी सूरत है उतनी ही खूबसूरत उनकी सीरत है।

क्या ही कमाल है कि जब वे मैदान में होते हैं केवल तब ही ऊंची उड़ान नहीं भर रहे होते हैं बल्कि जब वे जब प्यार में होते हैं, तब भी कल्पना की ऊंची उड़ान भरते हैं। वे ऊंचे बार को पार करने में अपने शरीर से ही कविता नहीं लिखते,वे कागजों पर सचमुच की कविता भी लिखते हैं।

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ऐसे ही लोगों से खेल ही नहीं दुनिया भी कुछ और खूबसूरत बनती है।



पेरिस ओलंपिक 2024_09:तीसरा दिन

 



बहुत सारे देश जिस तरह से पदक अपने खाते में डाल रहे हैं और जिस तरह से उनकी पदक तालिका के अंक बढ़ते जाते हैं उससे लगता है कि पदक जीतना कितना आसान होता है। बस मैदान में उतरो और पदक जीत लो। लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। इसमें वर्षों की हाड़तोड़ मेहनत और त्याग होता है, केवल खिलाड़ी का ही नहीं बल्कि उससे जुड़े बहुत सारे लोगों का भी। एक पूरी उम्र लग जाती है ओलंपिक तक पहुंचते पहुंचते। जब एक खिलाड़ी मैदान में उतरता है तो वो जीतने के लिए ही खेलता है और अपनी तरफ से जीतने का हर संभव प्रयास करता है। पर जीतेगा तो एक ही खिलाड़ी ना। हां, कमरे में बैठकर किसी भी खिलाड़ी को ट्रॉल करना बहुत आसान होता है। एक बार आप खुद मैदान में उतरकर देखिए ना।

खैर ये बात इसलिए निकली कि दूसरे दिन तीरंदाजी में महिला टीम हार गई तो चौथी बार अपना ओलंपिक खेल रही दीपिका को सबसे ज्यादा ट्रॉल किया जाने लगा। ये दीपिका का दुर्भाग्य है कि वे ओलंपिक में कोई पदक भारत के लिए नहीं जीत सकीं बावजूद इसके कि अन्य बहुत से प्रतियोगिताओं में उन्होंने भारत के लिए बहुत पदक जीते हैं। 

तीरंदाजी में हार का सिलसिला तीसरे दिन भी जारी रहा। महिलाओं की तरह पुरुष टीम से भी बेहतरीन प्रदर्शन और पदक की होड़ में शामिल होने की उम्मीद थी। धीरज बोम्मादेवरा,तरुणदीप राय और प्रवीण रमेश जाधव की तिकड़ी से भारत को बहुत उम्मीदें थीं। पर ऐसा हो ना सका। पुरुष टीम भी क्वार्टर फाइनल में तुर्की की टीम से 2-6 सेटों से हारकर पदकों की दौड़ से बाहर हो गई।

दरअसल तीरंदाजी में महिला पुरुष दोनों वर्गों में हार इसलिए साल रही है कि दोनों टीमें अपने से कहीं नीची रैंकिंग वाली टीमों से हारी। ओलंपिक में केवल रिकर्व वर्ग में प्रतियोगिता होती है,जबकि कंपाउंड वर्ग में भारत के पास अभिषेक वर्मा, ज्योति वेनम और ओजस देवताले जैसे शानदार तीरंदाज मौजूद हैं। पर वे ओलंपिक में नहीं खेल पाते।

यहां उल्लेखनीय है कि दक्षिण कोरिया की महिला टीम ने लगातार दसवीं बार तीरंदाजी का स्वर्ण पदक जीता। वो 1988 से अब तक अपराजेय है। दक्षिण कोरिया ने फाइनल में एक संघर्षपूर्ण मुकाबले में चीन को 5-4 सेटों से हराया।

एथलेटिक्स के बाद दूसरा सबसे बड़ा दल शूटिंग का है। इसमें कुल 21शूटर्स गए हैं। अब तक लगभग आधी स्पर्धाएं समाप्त हो गई हैं और भारत के हिस्से केवल एक कांस्य पदक आया है। तीसरे दिन भारत की उम्मीद दो फाइनल्स पर टिकी थी। 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धाओं के महिला और पुरुष फाइनल में रमिता जिंदल और अर्जुन बतुता थे।

महिलाओं में रमिता फाइनल के दूसरे एलिमिनेशन में बाहर हो गईं और सातवें नंबर पर रहीं। उनके लिए बस यही दिलासा है कि इस स्पर्धा में पिछले 20 सालों में फाइनल पहुंचने वाली वे दूसरी महिला शूटर हैं। इस स्पर्धा का मुकाबला बहुत ही रोचक रहा। स्वर्ण पदक के लिए मुकाबला दक्षिण कोरिया की हो जिन बान और चीन हुआंग यू टिंग के बीच टाई रहा। दोनों ने ओलंपिक रिकॉर्ड ब्रेक किया। टाई ब्रेक में कोरिया की बान ने स्वर्ण पदक जीता। कमाल की बात ये कि ये दोनों ही टीनएजर हैं।

पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में भारत के अर्जुन का दुर्भाग्य रहा कि वे पदक से चूक गए और अंतिम चौथे नंबर पर रहे। इससे पहले लगातार दूसरे व तीसरे स्थान पर चल रहे थे। एक बहुत छोटी सी चूक या गलती जीवन से कितना कुछ छीन लेती है, ये अर्जुन के अलावा मिल्खा सिंह,पी टी उषा और वे तमाम लोग ही जान सकते हैं जो स्पर्धाओं में चौथे स्थान पर रह जाते हैं। कल 20वें शॉट में उनसे ज़रा सी चूक हुई और उनका ये शॉट  9.5 का रहा,जबकि इससे पहले वे सारे शॉट 10 से ऊपर मार रहे थे। इस कमजोर शॉट से उबरने की बहुत कोशिश की,पर सफल नहीं हुए। लेकिन वे क्या ही शानदार स्पोर्ट्स पर्सन हैं। एक समय वे चोट के चलते कुछ देर बिना सहारे के खड़े नहीं हो सकते थे और खेल कैरियर की कोई संभावना ही नहीं दीखती थी। लेकिन ये उनका संघर्ष था,जिजीविषा थी और कठोर परिश्रम था, वे ओलंपिक में पदक जीतते रह गए।  

जहां इन दोनों फाइनल में भारत को पदक ना मिल पाने से निराशा हाथ लगी,वहीं भारत को पहला व  एकमात्र पदक दिलाने वाली मनु भाकर ने एक बार फिर भारतीयों के लिए उम्मीद जगाई।10 मीटर एयर पिस्टल की मिश्रित युगल स्पर्धा में सरबजोत सिंह के साथ वे तीसरे स्थान पर रहीं और आज कांस्य पदक के लिए ये टीम कोरिया की ओ ये जिन व ली वोन हो की जोड़ी से खेलेगी। इस स्पर्धा में भाग ले रही दूसरी भारतीय जोड़ी रिदिमा सांगवान और अर्जुन चीमा 10वे स्थान पर रहे और क्वालीफाई नहीं कर सके।

पुरुषों की ट्रैप स्पर्धा के पहले दिन 3 राउंड के बाद भारत के पृथ्वीराज तोंदईमान तीसवें स्थान पर चल रहे हैं। शेष दो राउंड आज पूरे होंगे।

बैडमिंटन में भारतीय शटलर अभी तक अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। लक्ष्य सेन ने कल बेल्जियम के जूलियन केरेगी को 21-19,21-14 से हराकर महत्वपूर्ण जीत हासिल की। दरअसल ग्वाटेमाला  के केविन कार्डन पर उनकी जीत अब काउंट नहीं की जायेगी क्योंकि उन्होंने प्रतियोगिता से अपना नाम वापस ले लिया है। उनका महत्वपूर्ण मुकाबला आज जोनाथन क्रिस्टी से होगा। लेकिन अश्विनी पोनप्पा और तनिषा की जोड़ी अपने ग्रुप का दूसरा मैच भी जापान की शिदा और मात्सुयामा से 11-21 09-21 से हारकर पदक की होड़ से बाहर हो गई।

हॉकी में कल भारत अपने पूल का दूसरा मैच खेल रही थी अर्जेंटीना के विरुद्ध। भारतीय कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने एक बार फिर अपने गोल से भारत को संकट से उबार लिया और भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अंक जुटाया। इस मैच में अर्जेंटीना ने 22वें मिनट में एक गोल से बढ़त ले ली और ये बढ़त 58वें मिनट तक कायम रही। जब ये लगने लगा कि भारत हार जायेगा तब पेनाल्टी कॉर्नर पर गोल कर हरमनप्रीत ने मैच ड्रॉ करा दिया। इससे पहले मैच में भी भारत और न्यूजीलैंड की टीम दो दो गोल से बराबरी पर थे लेकिन अंतिम मिनट में हरमनप्रीत ने गोल कर भारत को जीत दिलाई। भारत का अगला मुकाबला आयरलैंड से होगा।

टेबल टेनिस में विश्व 86वीं रैंक वाले हरमीत देसाई विश्व नंबर 05 लेबरुन से सीधे सेटों में 0-4 से (8-11, 8-11, 6-11, 8-11) हार गए।
लेकिन इतिहास रचा मोनिका बत्रा ने। वे ओलंपिक के प्री क्वार्टर फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं। उन्होंने कल शानदार खेल दिखाया और भारतीय मूल की फ्रांस की 12वीं वरीयता वाली फेवरेट प्रिथिका पावड़े को सीधे सेटों 4-0 से हरा दिया।

तीसरे दिन के मुकाबलों की समाप्ति पर पदक तालिका में जापान सबसे ऊपर था। उसने 06 स्वर्ण,02 रजत और 04 कांस्य पदक सहित कुल 12 पदक जीते हैं। दूसरे स्थान पर मेजबान फ्रांस था जिसने 05 स्वर्ण,08 रजत और 03 कांस्य पदक सहित कुल 16 पदक जीते हैं। जबकि चीन 05 स्वर्ण,05 रजत और 02 कांस्य सहित कुल 12 पदक जीतकर पदक तालिका में तीसरे स्थान पर है। भारत 01कांस्य के साथ 26वें स्थान पर है।
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और चलते चलते ये कि प्रतिभा उम्र की मोहताज कहां होती है। 10 मीटर एयर राइफल की महिला स्पर्धा में चीन की रजत पदक जीतने वाली हो हुआंग यू टिंग मात्र 17 वर्ष की और स्वर्ण जीतने वाली दक्षिण कोरिया की जिन बान मात्र 16वर्ष की हैं और दोनों ने ओलंपिक रिकॉर्ड ब्रेक किया। लेकिन कमाल ये भी है कि महिलाओं की स्ट्रीट स्केटबोर्डिंग स्पर्धा में पदक जीतने वाली तीनों प्रतिभागी टीन एजर हैं और उनकी टोटल उम्र 45 वर्ष है। इस स्पर्धा का स्वर्ण जापान की 14 वर्षीय कोको योशीजावा ने,रजत पदक जापान की ही 15वर्षीय लिज अलामा ने और कांस्य पदक ब्राजील की 16 वर्षीय रायसा लील ने जीता। जबकि भारत के युगल टेनिस स्पर्धा में भाग ले रहे रोहन बोपन्ना 44 वर्ष के हैं।

और ये कि टेनिस की दुनिया का बहुप्रतीक्षित मैच भी दो दिग्गजों नोवाक जोकोविच और राफेल नडाल मध्य कल रोलां गैरों की लाल मिट्टी पर खेला गया। ये दोनों के बीच 60वां मैच था। नोवाक ने राफ़ा पर 6-1,6-4 से एक आसान जीत हासिल की।

Monday, 29 July 2024

पेरिस ओलंपिक 2024_08: दूसरा दिन







क्रिकेट के संदर्भ में दक्षिण अफ्रीका की टीम को चोकर्स कहा जाता है। आरंभिक दौर में  बेहतरीन प्रदर्शन करने और एक अच्छी टीम होने के बावजूद वो कोई बड़ी प्रतियोगिता आज तक नहीं जीत पाई है।

ये बात यहां इसलिए प्रासंगिक है कि क्या भारतीय ओलंपिक दल भी उनकी तरह चोकर्स तो नहीं है।भारतीय खिलाड़ियों का दल जब भी ओलंपिक में भाग लेने जाता है तो उसके इर्द गिर्द एक बड़ा हाइप खड़ा कर दिया जाता है। हर बार भारतीय खेल प्रेमी खिलाड़ियों से पदकों की बौछार की उम्मीद करते हैं। लेकिन उसके हिस्से दो चार बूंदें टपक कर इतिश्री हो जाती है। मानो भारतीय दल का प्रदर्शन आजकल के मौसम के मिज़ाज़ का सा गया हो।

गर हम उम्मीद की बात करें तो टोक्यो ओलंपिक  में जितने पदक भारत के हिस्से आए उतने तो सिर्फ शूटिंग से आ जाने चाहिए थे,लेकिन नहीं आए। हालांकि टोक्यो में ये अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। उसी से उत्साहित होकर पेरिस ओलंपिक के लिए इस बार स्लोगन आया 'अबकी बार दस पार'। लेकिन दो दिन के भारतीय दल के प्रदर्शन से क्या ये संभव लग रहा है। क्या इस स्लोगन का हश्र भी भाजपा के लोकसभा चुनाव के स्लोगन 'अबकी बार चार सौ पार' वाला तो नहीं होने जा रहा है। ये देखना निश्चित ही रोचक होगा।

न दो दिनों में भारत का प्रदर्शन मिला जुला रहा है। जिन दो खेलों में भारतीय टीम से सबसे ज़्याद उम्मीद होती हैं, वे हैं शूटिंग और आर्चरी। ये उम्मीद  किसी हाइप की वजह से नहीं बल्कि भारतीय खिलाड़ियों के विश्व तथा महाद्वीपीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन की वजह से आती है। यहां पर पुरुष और महिला टीम ने क्वालीफिकेशन दौर में तो ठीक किया। लेकिन आज महिला तीरंदाजी टीम ने क्वार्टर फाइनल मैच नीदरलैंड से खेला। भारतीय टीम की प्रतिष्ठा और प्रदर्शन के अनुसार ये मैच भारत को बहुत आसानी से जीत लेना चाहिए था लेकिन हुआ इसका उल्टा। भारतीय टीम सीधे तीन सेटों में 0-6 से आसानी से हार गई। चिंता की बात हार नहीं बल्कि भारतीय लड़ियों का बेहद लचर प्रदर्शन है जिसमें उन्होंने  6 और 4 अंकों तक के शॉट्स लगाए।

हॉकी में भारत ने कल 27 जुलाई को अच्छी शुरुआत की। अपने पहले मैच में एक गोल से पिछड़ने के बाद 3-2 से हरा दिया।  टोक्यो ओलंपिक में भी भारत ने 27 जुलाई 2021 को ही न्यूजीलैंड को 3-2 से हराकर अपने अभियान की शुरुआत की थी और 41 साल बाद भारत को कांस्य पदक दिलाया था।

बैडमिंटन में भारत ने उम्मीद के अनुरूप अच्छी शुरुआत की। सिंधु,प्रनॉय और लक्ष्य सेन ने एकल में और रेंकी रेड्डी और चिराग की जोड़ी ने डबल्स में अपने प्रारंभिक दौर के मैच आसानी से जीत लिए। केवल अश्विनी पोनप्पा और क्रिस्टा अपना महिला युगल का पहला मैच हार गई।

टेबल टेनिस में महिला में श्रीजा अकुला ने क्रिस्टीना कालबर्ग को 4-0 से और मनिका बत्रा ने ब्रिटेन की अन्ना हर्से को 4-1 से हराकर और हरमीत देसाई ने पुरुष एकल के अगले दौर में प्रवेश किया लेकिन वेटरन शरथ कमल पुरुष एकल के पहले ही राउंड डेनी कोज़ुल से हार गए। 

टेनिस में सुमित नागल स्थानीय खिलाड़ी कोरेंटीन मोटेट से एक संघर्षपूर्ण मैच में 2-6, 6-2,5-7 से हार गए।

रोइंग में बलराज पंवार पुरुष एकल स्कल्स स्पर्धा के रेपेचेज 2 में दूसरे स्थान पर रहे और क्वार्टरफाइनल में पहुंच गए हैं।

बॉक्सिंग में पदक की प्रबल दावेदार निखत जरीन ने पहले राउंड में 2-3 से पिछड़ने के बाद जर्मनी की मैक्सी करीना कोईट्जर को सर्वसम्मति से 5-0 से हरा दिया। लेकिन वे यहां गैर वरीयता प्राप्त खिलाड़ी के रूप में हैं और उन्हें कठिन ड्रॉ मिला है। उनका अगले दौर में वर्तमान फेदरवेट चैंपियन चीन की वू यू से होगा।

शूटिंग में भाकर के अलावा पहले दिन भारत के अन्य निशानेबाजों ने निराश किया। भारतीय पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल और 10 मीटर एयर राइफल मिश्रित टीम स्पर्धा के क्वालीफिकेशन चरण से ही बाहर हो गए। 10 मीटर एयर पिस्टल में रिदम सांगवान 573 के स्कोर के साथ 15वें स्थान पर रहीं। सरबजोत सिंह का दुर्भाग्य रहा कि समान स्कोर रहने पर भी कम 10 स्कोर करने के आधार पर 10 मीटर एयर पिस्टल के फाइनल में जगह बनाने से चूक गए।  डेब्यू कर रहे सरबजोत और अर्जुन चीमा ने टुकड़ों में अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन क्रमश: 577 और 544 के स्कोर के साथ नौवें और 18वें स्थान पर रहे। भारतीय निशानेबाज 10 मीटर एयर राइफल मिश्रित टीम क्वालीफिकेशन चरण में बाहर हो गए। भारत की दो जोड़ियां इस स्पर्धा में भाग ले रही थी। रमिता जिंदल और अर्जुन बबूता 628.7 के कुल स्कोर के साथ छठे, जबकि इलावेनिल वलारिवन और संदीप सिंह 626.3 के कुल स्कोर के साथ 12वें स्थान पर रहे। लेकिन आज भारत ने शूटिंग में बेहतरीन प्रदर्शन किया। रमिता जिंदल 10मीटर एयर राइफल स्पर्धा में क्वालीफाइंग दौर में 631.5 अंकों के साथ पांचवे स्थान पर रहकर फाइनल के लिए क्वालीफाई कर लिया है। इसके अलावा अर्जुन बटुता ने पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल क्वालिफिकेशन राउंड में सातवें स्थान पर रहकर फाइनल में पहुंच गए हैं। लेकिन इलावेनिल वलारिवान महिलाओं के 10 मीटर एयर राइफल में और संदीप सिंह पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल पहले ही दौर में बाहर हो गए।

ज भारत के लिए इतिहास रचा 21 वर्षीया निशानेबाज मनु भाकर ने। उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में कांस्य पदक जीत कर ना केवल इस ओलंपिक में भारत का पदकों का खाता खोला बल्कि शूटिंग स्पर्धा में पदक जीतने वाली पहली महिला शूटर बन गई हैं।

नु का ये पदक तीन साल देरी से आया है। आप इसे यूं भी कह सकते हैं कि आपको समय से पहले और किस्मत से ज्यादा कुछ नहीं मिलता। पर मनु का मामला सिर्फ किस्मत का खेल भर नहीं है। ये मानवीय अहंकार,ईर्ष्या,पक्षपात और कुप्रबंधन की वजह से भी है। टोक्यो ओलंपिक में शूटर्स का खराब प्रदर्शन उनका चोकर्स होना नहीं था,बल्कि खिलाड़ियों और स्टाफ के बीच में सब कुछ ठीक नहीं होना था।

नु लगातार पक्षपात का शिकार रही है और दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम में उसके साथ क्या कुछ हुआ था,टोक्यो को उसी क्रम में संज्ञान में लेना चाहिए। इस बात को समझना चाहिए कि ओलंपिक जैसे इवेंट में पिस्टल का जाम हो जाना एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना भर ही थी क्या? 

हिंदुस्तान में खेल प्रबंधन दंभी और अहंकारी लोगों का मजमा है जिसके खिलाफ बोलने वालों का हश्र दुनिया में देश का सीना गर्व से ऊंचा करने वाले श्रेष्ठ पहलवानों जैसा हो सकता है और भारतीय जनता इसे राजनीति कहकर विरोध कर सकती है। इसीलिए हर कोई खुलकर सच्चाई बयान नहीं कर पाता बल्कि वो मनु की तरह खेल क्विट करने का निर्णय भी कर सकते हैं।

लेकिन ये लड़कियां आंसू बहाने वाली और खुद को विक्टिम दिखाने वाली नहीं बल्कि खुद को प्रूव करने वाली हैं। वे प्रतिभाशाली भी हैं और हिम्मती भी।

स ओलंपिक का पहला पदक जीता कजाकिस्तान ने निशानेबाजी की 10 मीटर एयर राइफल मिक्स्ड स्पर्धा में जीता। कजाकिस्तान की इस्लाम सेटपायेव और एलेक्जेंडर ले की जोड़ी ने जर्मनी की जोड़ी को हराकर ये पदक जीता। पदक तालिका में दक्षिण कोरिया,चीन और ऑस्ट्रेलिया का दबदबा है। पदक तालिका में अभी तक 03 स्वर्ण,02 रजत और 01 कांस्य सहित कुल 06 पदकों के साथ पहले स्थान पर है। ऑस्ट्रेलिया 03 स्वर्ण और 02 रजत सहित कुल 05 पदकों के साथ दूसरे स्थान पर और 03 स्वर्ण 01 रजत और 01 कांस्य पदक सहित कुल 05 पदक जीत कर तीसरे स्थान पर है। भारत एक कांस्य पदक के साथ 19वें स्थान पर है।
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र चलते चलते ये कि विकासशील देशों को चोरी या लूटपाट जैसी घटनाओं पर इसलिए शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है कि ऐसा विकसित देशों में तो होता नहीं है या बहुत कम होता है। ऐसा पेरिस में भी खूब हो रहा है। ऑस्ट्रेलियाई ओलंपिक साइकिलिंग टीम के सदस्य लोगन मार्टिन का चोरों ने उनकी वैन की यात्री सीट की खिड़की तोड़कर न केवल एकबटुआ चुराया बल्कि फिजियोथेरेपिस्ट की मसाज टेबल सहित कई उपकरण भी चुरा लिए। इसके अलावा अर्जेंटीना की फुटबॉल टीम भी लूटपाट का शिकार हो गई है।चोर अर्जेंटीना के ट्रेनिंग कैंप में घुस गए और उसके खिलाड़ी थियागो अल्माड़ा का सामान, महंगी घड़ी और गहने चोरों ने लूट लिए। इतना ही नहीं खेल शुरू होने से पहले ही इन खेलों की सुरक्षा योजनाएं पेरिस के गारे डू नॉर्ड रेलवे स्टेशन से चोरी हो गईं। 




पेरिस ओलंपिक 2024_07:पहला पदक

मनु का ये पदक तीन साल देरी से आया है। आप इसे यूं भी कह सकते हैं कि आपको समय से पहले और किस्मत से ज्यादा कुछ नहीं मिलता। पर मनु का मामला सिर्फ किस्मत का खेल भर नहीं है। ये मानवीय अहंकार,ईर्ष्या,पक्षपात और कुप्रबंधन की वजह से भी है। टोक्यो ओलंपिक में शूटर्स का खराब प्रदर्शन उनका चोकर्स होना नहीं था,बल्कि खिलाड़ियों और स्टाफ के बीच में सब कुछ ठीक नहीं होना था।

नु लगातार पक्षपात का शिकार रही है और दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम में उसके साथ क्या कुछ हुआ था,टोक्यो को उसी क्रम में संज्ञान में लेना चाहिए। इस बात को समझना चाहिए कि ओलंपिक जैसे इवेंट में पिस्टल का जाम हो जाना एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना भर ही थी क्या? 

हिंदुस्तान में खेल प्रबंधन दंभी और अहंकारी लोगों का मजमा है जिसके खिलाफ बोलने वालों का हश्र दुनिया में देश का सीना गर्व से ऊंचा करने वाले श्रेष्ठ पहलवानों जैसा हो सकता है और भारतीय जनता इसे राजनीति कहकर विरोध कर सकती है। इसीलिए हर कोई खुलकर सच्चाई बयान नहीं कर पाता बल्कि वो मनु की तरह खेल क्विट करने का निर्णय भी कर सकते हैं।

लेकिन ये लड़कियां आंसू बहाने वाली और खुद को विक्टिम दिखाने वाली नहीं बल्कि खुद को प्रूव करने वाली हैं। वे प्रतिभाशाली भी हैं और हिम्मती भी।
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जियो मनु। हमें गर्व है आप पर।



Friday, 26 July 2024

पेरिस ओलंपिक 2024_06: भारत का प्रदर्शन और संभावनाएंदुजार्दिन






 दुनिया का सबसे बड़ा खेल मेला 33वां ओलंपिक आज फ्रांस की राजधानी पेरिस में विधिवत उद्घाटन के बाद औपचारिक रूप से आरंभ हो जाएगा। अब अगले 17 दिन दुनिया के 200 से भी अधिक देशों के सर्वश्रेष्ठ 10500 एथलीट 329 से  पदकों के अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए जी जान लगा देंगे। इस प्रक्रिया में आएंगे हैरतअंगेज परिणाम और अविश्वसनीय प्रदर्शन। दुनिया की नज़रें इन सारे एथलीटों के प्रदर्शन पर तो होगी ही,लेकिन हर देश के खेल प्रेमियों की नज़रें अपने देश के एथलीटों के प्रदर्शन पर विशेष रूप से लगी होगी। भारत के 1.4 बिलियन लोगों की उम्मीदें 117 एथलीटों और उनके प्रदर्शन पर होंगी।

तो आज एक नजर ओलंपिक में भारत के अब तक के प्रदर्शन पर और इस ओलंपिक में भारत की संभावनाओं पर।

लंपिक खेलों में भारत ने अब तक कुल 35 पदक जीते हैं जिनमें 10 स्वर्ण,09 रजत,16 कांसे के पदक शामिल हैं। सबसे अधिक हॉकी में 08 स्वर्ण,01 रजत और 03 कांसे सहित कुल 12 पदक जीते हैं। शेष दो स्वर्ण अभिनव बिंद्रा ने 2008 में शूटिंग में और नीरज चोपड़ा ने 2021 में टोक्यो में जीते। इसके अलावा रेसलर सुशील कुमार और शटलर पी वी सिंधु दो ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने दो दो पदक जीते हैं। पिछले ओलंपिक में भारत ने कुल 07 पदक जीते जिनमें एक स्वर्ण,02 रजत और 04 कांसे के पदक शामिल हैं। ये भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।

कुल मिलाकर देखा  जाए तो भारत का प्रदर्शन हॉकी को छोड़कर बहुत ही साधारण रहा है। छिटपुट प्रदर्शन को छोड़ कर। इसीलिए भारत के ओलंपिक में प्रदर्शन को लेकर जो स्मृतियां बनती हैं वे मुख्यता दो तरह की हैं। मोटे तौर पर,एक 2000 से पहले की और दो, उसके बाद की।

पिछली शताब्दी में हम जब भी ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन को लेकर बात करते हैं तो हम हॉकी की स्वर्णिम सफलता की याद करते और मिल्खा सिंह और पीटी उषा की असफता को भी।  इन दोनों की स्मृति पदक को बहुत ही मामूली अन्तर से चूक जाने की स्मृति है। और ये स्मृति आज भी बहुत चमकीली है। ये भी तय है कि अगर उनमें से किसी ने पदक जीता होता तो उन्हें इतनी शिद्दत से ना याद किया जाता जितनी शिद्दत से अब किया जाता है। ये बात कहती है कि आपकी जीत से ज्यादा आपका प्रयास बोलता है,मेहनत बोलती है,आपकी प्रयासों की संजीदगी बोलती है,आपकी प्रतिभा बोलती है। ये इस बात की भी ताईद करती है कि हमारे पास प्रतिभा तो थी पर उस प्रतिभा को पदक जीतने वाले खिलाड़ियों में तब्दील करने वाला आधारभूत खेल ढांचा और सुविधाएं ना थीं।

1980 में स्वर्ण पदक जीतने के बाद हॉकी नेपथ्य में चली जाती है। और 2000 के आस पास से भारतीय खिलाड़ी व्यक्तिगत स्पर्धाओं में पदक जीतना शुरू कर देते हैं। यहां से हमारी हॉकी के स्वर्णिम काल की और मिल्खा व उषा के प्रयासों की स्मृति धुंधली पड़ने लगती है और उभरते नए सितारों को अपनी पलकों पर बैठाने लगते हैं।  यहां उल्लेखनीय है अब जो भी सफलताएं आती हैं वे टीम गेम में नहीं वैयक्तिक स्पर्धाओं में आती हैं।

सकी शुरुआत 1996 के अटलांटा ओलंपिक में लिएंडर पेस टेनिस पुरुष एकल कांस्य पदक जीतकर करते हैं। उसके बाद 2000 सिडनी में कर्णम मल्लेश्वरी भारोत्तोलन में कांस्य जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनती हैं। 2004 में एथेंस में राज्यवर्धन सिंह राठौर शूटिंग में चांदी का पदक जीतते हैं। 2008 में बीजिंग में 1952 के दो पदकों के बाद पहला अवसर था जब भारत ओलंपिक खेलों में एक से अधिक पदक जीतता है। अभिनव बिंद्रा पहली बार व्यक्तिगत स्पर्धा का स्वर्ण जीतते है। इस बार भारत ने कुल तीन पदक जीते। 2012 के लंदन ओलंपिक में भारत उस समय तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन करता है और कुल 06 पदक प्राप्त करता है। लेकिन 2016 में रियो में एक बार फिर 02 पदकों पर सिमट जाता है।

र तब आता है 2021 का साल। टोक्यो ओलंपिक में भारत अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करता है और कुल सात पदक जीतता है। टोक्यो खेलों के अंतिम दिन नीरज चोपड़ा जेवलिन थ्रो में स्वर्ण पदक जीतकर एथलेटिक्स में ना केवल पदक ना जीत पाने के जिंक्स को तोड़ते हैं और एक नए युग की शुरुआत करते हैं।


2024 के पेरिस ओलंपिक में नीरज चोपड़ा ठीक वहीं से शुरू करेंगे जहां टोक्यो में उन्होंने छोड़ा था। ये यहां भारत के लिए पदक की सबसे बड़ी उम्मीद हैं और आश्वस्ति भी। उन्होंने टोक्यो के बाद लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है। उन्होंने विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीते हैं। लेकिन वे अभी तक 90 मीटर का बैरियर पार नहीं कर पाए हैं। अपना स्वर्णिम प्रदर्शन दोहराने के लिए उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ देना होगा उनके जो भी प्रतिद्वंदी हैं, वे उनसे कम नहीं हैं। चेक गणराज्य के जैकब वाडलेश का सर्वश्रेष्ठ 90.88 मीटर है। जर्मनी के जूलियन वेबर की बेस्ट थ्रो 89.54 की है। इसके अलावा एक और युवा जर्मन मैक्स देहिंग हैं जिनका बेस्ट 90.20 मीटर का  है। इन तीनों के लिए अलावा पाकिस्तान के अरशद नदीम की चुनौती से भी पार पाना होगा। वे भी 90 मीटर के बैरियर को पार कर अपनी बेस्ट थ्रो 90.18 की कर चुके हैं। इस साल नीरज की तैयारी बहुत अच्छी नहीं रही हैं। उन्होंने केवल तीन प्रतियोगिताओं में भाग लिया है और सीजन की बेस्ट थ्रो में वे नंबर चार पर हैं। 

एथलेटिक्स का दल सबसे बड़ा है जिसमें 29 एथलीट शामिल हैं। नीरज के बाद अगर किसी की थोड़ी बहुत पदक जीतने की संभावना है तो वे हैं अविनाश सांबले। बाकी सब का स्तर अंतरराष्ट्रीय स्तर से काफी पीछे है। ऐसे में उनसे पदक जीतने की उम्मीद रखना बेमानी होगा।

बैडमिंटन में भारत की सबसे बड़ी आशा चिराग शेट्टी और सात्विक साईराज रैंकी रेड्डी की जोड़ी है। वे इस समय नंबर तीन हैं और विश्व नम्बर वन रहा चुके हैं। वे 2023 की एशियाई चैंपियनशिप,2022 के एशियाई खेल, 2022 के कामनवेल्थ खेलों में डबल का स्वर्ण पदक जीत चुके हैं साथ ही थॉमस कप में भारत को स्वर्ण पदक जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। वे इस समय फॉर्म में हैं और शानदार खेल रहे हैं। इस जोड़ी से भी पदक की उम्मीद बेमानी नहीं हैं। सिंधु ओलंपिक में दो पदक जीत चुकी हैं। लेकिन इस समय वे फॉर्म में नहीं हैं। उनका  ड्रा  भी कठिन है। पदक जीतना इस बार उनके लिए कठिन लगता है। हाँ, लक्ष्य सेन और एच एस प्रणय दोनों अच्छी फॉर्म में हैं और अच्छा खेल रहे हैं। दोनों ही उलटफेर करने में सक्षम हैं और कोई पदक जीत ले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

शूटिंग में भारत ने अब तक एक गोल्ड और एक सिल्वर पदक जीता है। शूटिंग में पिछले कुछ सालों से पदकों की उम्मीद सबसे ज़्यादा रहती है क्योंकि शूटर विश्व स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे होते हैं। लेकिन निराश भी सबसे ज़्यादा वे ही करते हैं। टोक्यो ओलंपिक में उनसे बहुत अधिक संभावना थी, लेकिन दल के खिलाड़ियों और स्टाफ़ में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। उनका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। इस बार भी शूटिंग से बहुत उम्मीद हैं। एथलेटिक्स के बाद सबसे बड़ा 21 सदस्यों का दल शूटर्स का ही है। मनु भाकर दो इवेंट्स  10 मीटर और 25 मीटर एयर पिस्टल में भाग ले रही हैं और पदक जीतने बड़ी की दावेदार हैं। उनके अलावा 50 मीटर थ्री पोजीशन में सिफ़त कौर, 10 मीटर एयर राइफल में संदीप सिंह और 50 मीटर राइफल में ऐश्वर्य प्रताप सिंह तोमर,25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल में अनीश भानवाला से पदकों की सबसे ज़्यादा उम्मीद है।

कुश्ती में कुल 06 पहलवानों ने अहर्ता प्राप्त की। कुश्ती में भारत में  हाल के दिनों में जिस तरह का माहौल रहा है वो बहुत ही निराशाजनक था। कुश्ती संघ और पहलवानों के बीच हुए विवाद ने कुश्ती की ओलंपिक तैयारियों को खासा प्रभावित किया। पहलवान प्रतिगोगिताओं में भाग नहीं ले सके। कोई राष्ट्रीय कैम्प तक नहीं लग पाया। इस सबके बावजूद अहर्ता प्राप्त करने वाले सभी पहलवानों ने अच्छा प्रदर्शन किया है और उन सभी से पदक की उम्मीद की जा सकती है। एकमात्र पुरुष पहलवान अमन सहरावत हों,विनेश फोगाट हो या फिर अंतिम पंघाल और अंशु मलिक हों,सभी पदक जीतने में सक्षम हैं।

टेबल टेनिस में हालांकि इस साल खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है,लेकिन उनसे पदक की उम्मीद नहीं की जा सकती।

भारोत्तोलन में मीराबाई चानू ने टोक्यो में रजत पदक जीता था। लेकिन उसके बाद से वे अपनी चोट और फर्म से जूझ रहीं हैं। ऐसे में वे इस बार अपना प्रदर्शन दोहरा पाएंगी,इसमें संदेह है।

तीरंदाजी में कुल छह तीरंदाज हैं। निश्चित रूप से इनके अन्य विश्व प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन के मद्देनज़र पदकों की उम्मीद की जा सकती है,विशेष रूप से बहुत ही अनुभवी और सीजंड दीपिका कुमारी से।

गोल्फ में दीक्षा डागर और अदिति अशोक ने पिछली बार अच्छा प्रदर्शन किया था। अदिति अशोक तो अंतिम दिन तक पदक की दौड़ में थीं और बस कांस्य पदक चूक गईं। उनके प्रदर्शन पर निगाह रखनी चाहिए। वे पदक की दावेदार हो सकती हैं।

बॉक्सिंग में भी कुल छह बॉक्सर हैं। पिछली बार की सिल्वर मेडल विजेता लोवलीना बोरगोइन और दो बार की विश्व चैंपियन और ओलंपिक डेब्यू करने वाली ज़रीन निखत भारत की पदक की बड़ी उम्मीद हैं। बाकी बॉक्सर में अमित पंघाल भी पदक की होड़ में आ सकते हैं।

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कुल मिलाकर पिछले प्रदर्शन  को देखकर ये बात की जा रही है कि क्या इस बार भारत दहाई के अंकों में पदक जीत सकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि भारतीय दल के लिए पिछली बार की बराबरी कर लेना भी पेरिस ओलंपिक में भारत की बड़ी चुनौती सिद्ध होगी। हाँ अगर शूटिंग में प्रदर्शन अच्छा रहा तो दहाई के अंक में पहुंचना संभव हो सकता है।

गुड लक टीम इंडिया।




पेरिस ओलंपिक 2024_05:चार्लोट दुजार्दिन





र इसे क्रिकेट की भाषा में कहना चाहें तो ओलंपिक खेलों के शुरू होने से पहले ही एक विकेट गिर गया। ये विकेट ब्रिटेन के मशहूर घुड़सवार चार्लोट दुजार्दिन का है।

 दुजार्दिन से बेहतर अब भला कौन समझ सकता है कि भावावेश के किसी एक क्षण में या अनजाने में कई गई एक छोटी सी भूल भी किसी के हाथ से इतिहास बनाने का मौका छीन सकती, उसे  अर्श से फर्श पर ला सकती है,उसके सपनों को चूर चूर कर सकती है।

लंपिक खेलों के शुरू होने से पहले ही उनका एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें उन्हें एक व्यक्तिगत घुडसाल में प्रशिक्षण के दौरान अपने घोड़े के साथ दुर्व्यवहार करते हुए देखा जा सकता है। इसे अंतरराष्ट्रीय घुड़सवार संघ ने  आपत्तिजनक और जानवरों के प्रति गलत व्यवहार मानते हुए उन्हें जांच पूरी होने तक छह महीने के लिए निलंबित कर दिया है। निलंबन के बाद चार्लोट ने ओलंपिक से नाम वापस ले लिया है।

वे ब्रिटेन की जानी मानी घुड़सवार हैं जिन्होंने अब तक छह ओलंपिक पदक जीते थे और इस बार उनके एक भी पदक जीतने पर वे लौरा केनी को पीछे छोड़कर सर्वाधिक ओलंपिक पदक जीतने वाली ब्रिटिश हो जातीं।

न्होंने  2012 के लंदन ओलंपिक में घुड़सवारी की ड्रेसेज स्पर्धा में व्यक्तिगत और टीम का स्वर्ण पदक जीता था। उसके बाद 2016 के रियो ओलंपिक में एक स्वर्ण व एक रजत और 2021 के टोक्यो ओलंपिक में दो कांस्य पदक जीते थे।

हार्ड लक चार्लोट।




Wednesday, 24 July 2024

पेरिस ओलंपिक खेल 2024_04:नवाचार और चुनौतियां





पेरिस शहर। दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर। सपनों का शहर। प्रेम का शहर। रोशनी का शहर। फैशन का शहर। कला और साहित्य का शहर। स्थापत्य का शहर। एक शहर जिसने इतिहास मिटते देखा और इतिहास बनते देखा। शहर जिसके चप्पे चप्पे में आर्थिक और सांस्कृतिक वैभव के निशान बिखरे पड़े हैं। एक शहर जो आर्थिक वैभव की रोशनी से नहाया हुआ है। एक शहर जो सांस्कृतिक वैभव की रोशनी से गुलज़ार है। एक ऐसा शहर कला, साहित्य व अन्य क्षेत्रों में ना जाने कितने नवाचारों का, नए नए आंदोलनों का साक्षी रहा,केन्द्र रहा। स्वप्न सरीखा शहर। स्वप्नों का शहर। शहर जिसने उत्कृष्टता के नए शिखर बनाए,नए पैमाने गढ़े।

सपनों के इसी शहर में 26 जुलाई से 11 अगस्त तक दुनिया के कोने कोने से 10500  खेल कलाकार 32 खेलों की 329 स्पर्धाओं में अपने कौशल और प्रतिभा की रोशनी से ना केवल इस शहर को बल्कि विश्व भर को चकाचौंध कर देंगे। यहां 19 दिनों तक वे अपने सपनों को साकार करेंगे और रचेंगे उत्कृष्टता के नए पैमाने। और इसके लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा देंगे। वे सब 'सिटियस,अल्टियस,फोर्टियस ' के इस महायज्ञ में अपने कला कौशल और योग्यता की आहुति देंगे और करेंगे खुद को साबित कुछ और अधिक तेज, कुछ और अधिक ऊंचा, कुछ और अधिक शक्तिशाली

फ्रांस की राजधानी पेरिस ठीक सौ साल बाद फिर से ओलंपिक खेलों की मेजबानी कर रही है।

यहां इससे पहले 1924 में  ओलंपिक खेल हुए थे। वो इन खेलों का 07वां आयोजन था और ये 33वां।

ये शहर बना ही नए पयोगों और नवाचारों के लिए। कला से लेकर साहित्य तक और अर्थ से लेकर राजनीति तक नए प्रयोगों और नवाचारों का शहर है ये। फिर ऐसा कैसे ही सकता है कि इस शहर में इतना बड़ा खेल आयोजन हो और उनमें कुछ नवीनता ना हो। नए प्रयोग ना हों। 

1924 के ओलंपिक खेलों में भी इस शहर ने कुछ नवीन परंपराएं स्थापित की और पुरानी को छोड़ा था। और इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है।

1924 में जब पेरिस में ओलंपिक खेल आयोजित किए जा रहे थे तो ये दूसरा अवसर था कि पेरिस में ओलंपिक खेल हो रहे थे। इससे पहले 1900 में दूसरे ओलंपिक खेल भी पेरिस में ही हुए थे। इस प्रकार 1924 में पेरिस दुनिया का पहला शहर बन रहा था जिसे दो बार इन ओलंपिक खेलों के आयोजन का गौरव प्राप्त हुआ।

1924 के पेरिस ओलंपिक में पहली बार रेडियो रेडियो पर इन खेलों का सजीव प्रसारण किया गया था।

इतना ही नहीं इन खेलों में  पहली बार खेल गांव बनाया गया था और सारे खिलाड़ी एक साथ इस खेल गांव में रुके थे।

समापन समारोह के आयोजन की परंपरा भी इन्हीं खेलों से आरम्भ हुई जिसमें ओलंपिक कमेटी के अलावा मेजबान और अगले मेजबान देश का ध्वजारोहण किया गया था।

इन खेलों में पहली बार आयरलैंड को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता और भाग लेने की अनुमति दी गई थी और आयरलैंड ने पहली बार ओलंपिक खेलों में भाग लिया।

और ये भी कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी के पियरे दी कुबर्टीन के निर्देशन में ये अंतिम ओलंपिक खेल थे।

नवाचारों की ये परंपरा ये शहर अभी भी बदस्तूर निभा रहा है। बहुत कुछ इस बार भी नया होने जा रहा है।

इस बार के खेलों का सबसे बड़ा प्रयोग उद्घाटन समारोह में होने जा रहा है। इस बार का उद्घाटन समारोह स्टेडियम में ना होकर सीन नदी पर होगा। इसमें दर्शकों पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं होगा। प्रत्येक देश की टीम एक बोट पर होगी जिस पर कवरेज के लिए कैमरे लगे होंगे। ये बॉड लगभग 6किमी का फासला तय करेंगी।

 ये अब तक के पहले खेल होंगे जिसमें पुरुष और स्त्री खिलाड़ियों की संख्या एकदम बराबर होगी। पचास पचास फीसद।

एक बात ये भी कि ये खेल बहुत अधिक सस्टेनेबल होंगे। इसके लिए नए ढांचों का निर्माण नहीं किया गया है। बल्कि पहले से स्थापित स्ट्रक्चर्स को ही सुदृढ़ कर उन्हें प्रयोग में लाया जा रहा है। या फिर कुछ अस्थायी ढांचों का निर्माण किया गया है जिन्हें इस आयोजन के लिए ही बनाया जा रहा है।

जिस समय पेरिस को खेल आयोजन का अधिकार मिला था उस समय उसने चार नए खेलों को शामिल किए जाने का प्रस्ताव किया था। ये खेल थे-स्केटबोर्डिंग,सर्फिंग, स्पोर्ट्स क्लाइंबिंग और ब्रेकिंग (ब्रेक डांस)। इनमें से पहले तीन तो टोक्यो में ही शामिल कर लिए गए थे और इस बार भी इन्हें शामिल किया गया है। जबकि ब्रेकिंग पहली बार ओलंपिक खेलों में शामिल किया जा रहा है।

ज्यादातर खेल तो पेरिस और उसके उपनगरों वर्साइल,सेंट डेनिस,ले बोर्गेट, नैनटरे,वेरेस सुर मोर्ने में आयोजित किए जाएंगे। लेकिन कुछ खेल पेरिस से काफी दूर स्थित जगहों पर भी आयोजित किए जाएंगे। मसलन बास्केटबॉल और हैंडबॉल का आयोजन पेरिस से 225 किमी दूर लिली में होगा जबकि नौकायन प्रतियोगिता और कुछ फुटबॉल मैच भूमध्यसागरीय शहर मार्साइल में खेले जाएंगे जो पेरिस से 777 किमी दूर है। फुटबॉल के मैच पांच अन्य शहरों में भी आयोजित किए जाएंगे जिसमें लीग क्लब के गृह मैदान नीस,बोर्डो, लियोन,सेंट एटीन और नैनटेस ।

सर्फिंग की प्रतियोगिता तो पेरिस से 15717 किमी दूर फ्रेंच पोलिनेशिया के गांव ताहुपोहो में होंगी।

इन खेलों के आयोजकों का दावा है कि ये खेल अधिक हरित,अधिक स्वच्छ और अधिक सुरक्षित होंगे। लेकिन इसी के चलते ही शायद एक बड़ा विवाद भी खड़ा हो गया है।  तमाम मानवाधिकार संगठन और एनजीओ ये आरोप लगा रहे हैं कि सुरक्षा और साफ सफाई की बिना पर उन क्षेत्रों से अस्थाई रूप से निवास कर रहे निर्धन लोगों को जिनमें से आधे से अधिक शरणार्थी हैं और जो सड़कों पर रहते हैं,को बेदखल किया जा रहा है जहां पर्यटकों के आने की संभावना है और जो क्षेत्र खेल आयोजन स्थलों के आसपास हैं। हालांकि आयोजकों ने इन आरोपों का खंडन किया है। 

विवाद और चिंताएं और भी है। इजरायल और हमा युद्ध के चलते इजरायल को भाग लेने की अनुमति विवाद का एक बड़ा मुद्दा है और रूस यूक्रेन युद्ध के चलते रूस और बेलारूस की टीमों को तटस्थ दल के रूप में अनुमति दिया जाना भी विवाद का विषय है। इसके अलावा पर्यावरण संबंधी मुद्दे, खिलाड़ियों और दुनिया भर से आने वाले खिलाड़ियों के लिए मूलभूत ढांचे और सुविधाओं की उपलब्धता जैसे मुद्दे और चिंताएं मौजूद हैं। एक बड़ा मुद्दा सड़कों पर सदियों से सड़क पर सामान बेचने वाले विक्रेताओं को खेलों के शुरू होने से पहले हटाने का मुद्दा भी है और गर्म मौसम भी खिलाड़ियों और आयोजकों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है।

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चुनौतिया और चिंताएं चाहे जैसी हो,इन खेलों के भव्य और सफल आयोजन के बारे में शायद ही किसी को संदेह होना चाहिए।




Tuesday, 23 July 2024

आकाशवाणी संकेत धुन का रचयिता:काफमैन






ज 23 जुलाई को जब हम भारत में रेडियो का स्थापना दिवस मना रहे हैं, तो हमारा एक व्यक्ति को बहुत शिद्दत से याद करना बनता है। ये व्यक्ति है वाल्टर काफमैन। इस व्यक्ति ने अपनी एक असाधारण कंपोजिशन से  रेडियो को एक अलग पहचान दी। ये कंपोजिशन थी ए 'आईआर सिग्नेचर ट्यून' जो राग शिवरंजनी में निबद्ध थी।

वाल्टर काफमैन चेक मूल के यहूदी थे और होलोकास्ट के चलते एक शरणार्थी के रूप में 1934 में भारत आए और अगले 14 वर्षों तक भारत में रहे। वे संगीत के विद्यार्थी थे और प्राग के जर्मन विश्वविद्यालय से संगीत में पीएचडी की थी। लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके सुपरवाइजर गुस्ताव बेकिंग स्थानीय युवा नाज़ी संगठन का लीडर हैं तो उन्होंने डिग्री लेने से इंकार कर दिया। 

भारत आने से पहले वे रेडियो प्राग में काम कर चुके थे। भारतीय संगीत में उनकी विशेष रुचि थी और उन्होंने सामवेद के संगीत तत्वों और गोंड व बैगा लोक गीतों,उत्तर भारतीय रागों और दक्षिण भारतीय रागों पर विशेष काम किया था। भारत में रहते हुए उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में यूरोपियन ब्रॉडकास्टिंग निदेशक के रूप में कार्य किया। भारत आने के थोड़े दिनों के भीतर ही उन्होंने बॉम्बे चैंबर म्यूजिक सोसायटी की स्थापना की और हिंदी फिल्मों में भी काम किया।

सी दौरान उन्होंने 'आकाशवाणी संकेत धुन' कंपोज करने के अविस्मरणीय कार्य को अंजाम दिया।

नकी पत्नी गेरटा प्रसिद्ध लेखक फ्रांज काफ्का की भांजी थीं और सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एलबर्ट आइंस्टीन उनकी संगीत प्रतिभा से बहुत ज्यादा मुत्तासिर थे और उनकी प्रसंशा में उन्हें एक पत्र भी लिखा था।

भारत की आजादी के समय वे वाया ब्रिटेन कनाडा गए और अंततः अमेरिका में बस गए जहां 1984 में वे इस फ़ानी दुनिया से रुखसत हुए।

पेरिस ओलंपिक 2024 _03:तचलोविनी मेलाके गैब्रिएसोस





 ऐसा माना जाता है कि मानव का उद्भव अफ्रीका महाद्वीप में हुआ और वहां से दुनिया भर में उसका संचरण हुआ। ये संचरण आज तक जारी है। पूर्व काल में अफ्रीका से बाकी दुनिया तक का संचरण बहुत ही सहज और स्वाभाविक रहा होगा,लेकिन आज के दौर में ये पलायन में तब्दील हो गया है और बहुत ही त्रासद भी।

फ्रीका एक बहुत ही दुर्गम भौगोलिक पहचान है और प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर भी।लेकिन संसाधनों का दोहन पश्चिमी  विश्व ने किया और यहां के मूल निवासियों के हिस्से आई घोर निराशा, अवसाद,गरीबी और उससे निजात पाने के रूप में कड़े जीवन संघर्ष। इस सबकी परिणति हुई थोड़े से बचे संसाधनों पर अधिकार के लिए होने वाले अनवरत गृहयुद्ध और भीषण संघर्षों में।

हां की कठिन परिस्थितियों ने यहां के निवासियों में अदम्य साहस और संघर्ष करने का ज़ज़्बा और हौंसला तो भरा ही लेकिन साथ ही इन परिस्थितियों से छुटकारा पाने की अदम्य लालसा भी भरी। इस लालसा के कारण सैकड़ों हजारों लोग इस महाद्वीप के अलग अलग हिस्सों से विश्व भर में पलायन करते है और इस पलायन से जन्म लेती हैं बेशुमार प्रेरणादायी कहानियां।

 ये कहानी भी एक ऐसी ही कहानी है जो अफ्रीका के पूर्वी हिस्से में स्थित छोटे से निर्धन देश इरिट्रिया के एक गांव से शुरू होती है और वाया इथियोपिया, सुडान, मिस्र और सिनाई प्रायद्वीप होती हुई इजरायल के तेलअवीव में जाकर ठहरती है। एक ऐसी कहानी जो मृत्यु के भय से शुरू होती है और दुनिया जीत लेने के जज्बे पर आकर रुकती है। एक ऐसी कहानी जो नाउम्मीदी व आंसुओं से शुरू होती है और उम्मीद पर जाकर खत्म होती है। ये कहानी लंबी दूरी के ऐसे धावक की है जो केवल रहने के लिए मानवीय परिस्थितियों कीभखोज में घर से भाग निकलता है और दौड़ते दौड़ते प्रसिद्धि को पा लेता है। 

ये साल 2010 था। अफ्रीका के पूर्वी हिस्से में स्थित आंतरिक अव्यवस्था और अशांति से जूझ रहे देश इरिट्रिया में हथियारबंद सैनिक घर घर जाते हैं और युवाओं को जबरिया सेना में शामिल करते हैं। एक बारह साल का युवा इससे बेतरह डर जाता है। वो सेना में भर्ती नहीं होना चाहता और ना लड़ना चाहता है। उसकी आंखों में कुछ और सपने थे और मन में कुछ चाहतें। वो अपने एक साथी के साथ देश छोड़कर भाग निकलता है। 

सके पास कुछ नहीं होता है। बस होता है तो बहुत थोड़ा सा धन और एक बेहतर भविष्य का सपना और कुछ कर गुजरने की इच्छा।

न्हीं संसाधनों के सहारे वो बालक कई दिन की यात्रा के बाद पहले इथियोपिया पहुंचता है और अपनी एक रिश्तेदार जो पहले से ही इजरायल में शरण ले चुकी है,के निर्देश पर वहां से सुदान पहुंचता है इजरायल जाने के लिए। यहां वो बेदु मानव तस्करों के संपर्क करता है और इजरायल के लिए यात्रा शुरू होती है। दरअसल ये एक दुस्वप्न की शुरुआत थी। वे बेदु मानव तस्करों के अत्याचार और यात्रा की कठिनाइयों के  बाद मिस्र पहुंचता है। उसके बाद कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद सिनाई रेगिस्तान को पारकर इजरायल बॉर्डर पर पहुंचता है।

क दुस्वप्न का अंत होता है। एक नया सवेरा आता है। उस 12 साल के बालक को इजरायल में शरण मिल जाती है और तेलअवीव के हादसाह नेरीम (hadassah neurim) बोर्डिंग स्कूल में जगह मिलती है। ये ऐसे ही बालको के लिए बना है।

हां उसकी स्कूली शिक्षा पूरी होती है और खेलों और विशेष रूप से दौड़ में रुचि देखते हुए 'रनिंग प्रोग्राम' में शामिल किया जाता है। यहां उसके कोच बनते हैं अलेमायु फ्लोरो जो उस बालक को एक बेहतरीन लंबी दूरी के धावक में तब्दील कर देता है।

ये बालक कोई और नहीं इस बार के पेरिस खेलों के लिए ओलंपिक शरणार्थी टीम का सदस्य तचलोविनी मेलाके गैब्रिएसोस हैं जो मैराथन दौड़ में हिस्सा लेंगे। 

वे पहली बार चर्चा में तब आए जब उन्हें 2019 में दोहा में आयोजित विश्व चैंपियनशिप एथलेटिक रिफ्यूजी टीम में चुना गया। यहां उन्हें पांच हजार मीटर दौड़ में भाग लेना था। उसके बाद उन्होंने एथलेटिक रिफ्यूजी टीम के सदस्य के रूप में 2020 में पोलैंड में आयोजित हॉफ मैराथन में हिस्सा लिया। फिर  2021में टोक्यो ओलंपिक खेल आए। वे एक टोक्यो ओलंपिक रिफ्यूजी टीम के लिए चुने गए और यहां पर 106 प्रतिभागियों में वे 16वें स्थान पर रहे। साथ ही ओपनिंग सेरेमनी में टीम के ध्वज वाहक होने का सम्मान भी मिला।

वे इस बार फिर पेरिस ओलंपिक शरणार्थी टीम के सदस्य हैं और मैराथन में भाग लेंगे।

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क दौड़ जो उन्होंने 12 साल की उम्र में एक 'बेहतर जिंदगी के लिए शुरू की थी जहां वे मानवीय परिस्थितियों में रह सकें',उनके हौसलों जज्बे और सफलता की दौड़ में तब्दील हो गई है। लेकिन वे अपने अतीत को भूले नहीं हैं। वे कहते हैं 'उन्हें उस अतीत से हिम्मत मिलती है और शक्ति भी'।

ब आप पेरिस ओलंपिक में अपने प्रिय खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर नजर गड़ाए हुए होंगे तो इस पर से भी अपनी दृष्टि ओझल मत होने दीजिएगा।



पेरिस ओलंपिक 2024 _02:शुभंकर

 




जिन लोगों की खेलों में जरा भी रुचि रही है और उनकी स्मृति के किसी भी कोने में दिल्ली में 1982 में आयोजित एशियाड खेल विश्राम कर रहे होंगे,उनकी स्मृति में रंग बिरंगा गोल मटोल हाथी का बच्चा 'अप्पू' भी जरूर जगमग जगमग कर रहा होगा। ये दिल्ली एशियाड खेलों का शुभंकर था। जो अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था।

भी खेल आयोजनों में शुभंकर जारी किया जाना अब इन खेलों का एक अनिवार्य हिस्सा है। ये इन खेलों की जरूरी रवायत बन गई है। ओलंपिक खेलों में भी इसका प्रयोग ओलंपिक ब्रांड के एक अनिवार्य तत्व के रूप में उसके प्रचार प्रसार और इसे लोकप्रिय बनाने के लिए किया जाने लगा है। विशेष रूप से शुभंकर को बच्चों व युवाओं को ओलंपिक खेलों और उसकी भावना के प्रति जागरूक करने और उनमें रुचि जगाने के माध्यम के तौर पर किया जाता है।

विभिन्न आकार और रूपों वाले ये शुभंकर ना केवल ओलंपिक खेलों की थीम को अभिव्यक्त करते हैं,बल्कि मेजबान देश और शहर की सांस्कृतिक,ऐतिहासिक और भौगोलिक विशिष्टताओं के वाहक भी होते हैं।

लंपिक खेल आयोजन अपनी जिन कुछ खास विशेषताओं के लिए जाने जाते हैं,उनमें एक शुभंकर भी है। पेरिस ओलंपिक अन्य बातों के अलावा अपने शुभंकर की विशिष्टता के लिए याद किया जाएगा।

स बार पेरिस ओलंपिक का शुभंकर फ्रीज़ (phryge)को बनाया गया है। फ्रीजियन टोपी दरअसल फ्रांस की एक पारंपरिक टोपी है। ये शुभंकर लाल,नीले और सफेद रंग की टोपी है जिस के सीने पर सुनहरे रंग का पेरिस ओलंपिक को लोगो अंकित है। ये तीन रंग फ्रांस के राष्ट्रीय ध्वज के रंग भी हैं। इस टोपी में पैर लगाकर इसे सजीव आकार दिया गया है। ओलंपिक और पैरालंपिक दोनों के लिए यही फ्रीज़ शुभंकर है। बस पैरालंपिक शुभंकर में प्रोस्थेटिक पैर लगाए गए हैं।

फ्रीजियन कैप फ्रांस में प्राचीन काल से प्रयोग में लायी जा रही है। पूरे फांसीसी इतिहास के दौरान ये 'स्वतंत्रता' का प्रतीक रही है। शुभंकर को जारी करते समय कहा गया कि इसके 'नाम और डिजायन को स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में और फ्रांसीसी गणराज्य के प्रतीकात्मक आंकड़ों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है'।

स शुभंकर की सबसे विशिष्ट बात ये है कि पहली बार शुभंकर किसी वस्तु (टोपी) को बनाया गया है। इससे पहले तक ये शुभंकर जानवर या मानव होते थे। यही इस बार के शुभंकर की विशिष्टता है।

स्कट या शुभंकर के प्रचलन का श्रेय खेलों को ही दिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में खेल आयोजनों के दौरान टीमें लोगों को आकर्षित करने और 'लकी चार्म' के रूप में सजीव जानवरों का शुभंकरों के रूप प्रयोग करते थे। टीमों द्वारा सजीव शुभंकरों के प्रयोग की ये परंपरा बीसवीं सदी के आरंभिक दो दशकों में उस समय तक जारी रही जब तक कि तक पशुप्रेमियों द्वारा इसके प्रयोग पर आपत्ति करना शुरू नहीं कर दिया गया।

सके बाद सजीव शुभंकरों की परंपरा भले ही खत्म हो गई हो लेकिन उसके बाद कपड़ों के तथा अन्य रूपों में शुभंकर बनाए जाने लगे। सजीव शुभंकरों से लेकर आज के आभासी शुभंकरों तक का शुभंकरों का लम्बा इतिहास रहा है।

हां तक महाद्वीपीय या वैश्विक खेल आयोजनों के शुभंकर की बात है तो 1966 में इंग्लैंड में आयोजित विश्व कप फुटबॉल प्रतियोगिता में पहली बार शुभंकर जारी किया गया माना जाता है। ये स्थानीय शेर 'विली' था जो यूनियन जैक वाली जर्सी पहने था और उस पर 'वर्ल्ड कप' लिखा था। इसको बच्चों की पुस्तकों के रेखाचित्र तैयार करने वाले एक फ्रीलांस कलाकार रेगे होए ने तैयार किया था। बहुत से लोग इसे अब तक का सर्वश्रेष्ठ शुभंकर मानते हैं।

हां तक ओलंपिक खेलों की बात है तो 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में पहली बार आधिकारिक रूप से शुभंकर बनाया गया था। इसका नाम 'वाल्डी' था जर्मनी के कुत्ते की लोकप्रिय नस्ल 'देश्चु' (dachshund) था। ये एक एथलीट के लिए आवश्यक दृढ़ता,चपलता और प्रतिरोध जैसे गुणों का प्रतिनिधित्व करता है।

लेकिन यहां ये उल्लेखनीय है कि अनौपचारिक रूप से सबसे पहला शुभंकर 1968 में फ्रांस के ग्रेनोबल में आयोजित शीतकालीन ओलंपिक के लिए जारी किया गया था जिसका नाम 'शुस' (shuss) था। 1968 में मैक्सिको में आयोजित ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भी शुभंकर बनाया गया था 'जगुआर'।

सामान्यतया एक खेल आयोजन में एक ही शुभंकर जारी किया जाता है। लेकिन 1998 के नागानो शीतकालीन ओलंपिक में  चार शुभंकर थे,2000 के सिडनी ओलंपिक में तीन,2004 के एथेंस ओलंपिक में दो और 2008 के बीजिंग ओलंपिक में पांच शुभंकर थे। लेकिन 2012 के लंदन में एक ही शुभंकर जारी किया गया था।

अस्तु।



पेरिस ओलंपिक 2024_01:ओलंपिक खेल और शरणार्थी

 




खेलों पर कितना भी बाजार का प्रभाव हो, उनमें कितनी ही राजनीति हो और खेल कितने भी टेक्निकल हो गए हो,लेकिन खेल अभी भी अपने मूल स्वरूप में मानवीय मूल्यों और मानवीय गरिमा के सबसे बड़े पहरुए हैं। और फिर एक नेक काम के लिए खेल को राजनीति के टूल के रूप में उपयोग किया भी जाए तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है।

हम जानते हैं कि विस्थापन कितनी बड़ी त्रासदी है। और ये भी कि दुनिया में ना जाने कितने लोग गृह युद्धों और आतंकवाद के कारण अपनी मातृभूमि से बेदखल हो शरणार्थियों के रूप में घोर यातनापूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

 2016 में ओलंपिक खेल समिति ने सौ मिलियन से भी अधिक ऐसे ही अभागे शरणार्थियों में उम्मीद की एक किरण जगाने के लिए पहली बार रियो ओलंपिक में एक अलहदा टीम के निर्माण और उसके प्रतिभाग की घोषणा की। और तब पहली बार शरणार्थी ओलंपिक टीम ने ओलंपिक ध्वज तले इन रियो ओलंपिक 2016 में भाग लिया। उस बार कुल 10 एथलीटों ने भाग लिया था। 

उसके बाद टोक्यो ओलंपिक में कुल 20 एथलीटों ने भाग लिया। हालांकि इनमें से कोई भी पदक नहीं जीत सका है। लेकिन ये ओलंपिक मोटो है कि ' जीतने से महत्वपूर्ण भाग लेना है'।

इस बार पेरिस ओलंपिक में इस टीम में 11 देशों से संबंधित कुल 37 खिलाड़ी 12 खेलों में प्रतिभाग करेंगे। इनमें सबसे अधिक 14 ईरान के हैं। अफगानिस्तान में जन्मी मासोमा अली ज़ादा इस दल की चीफ द मिशन होंगी। वे टोक्यो ओलंपिक में साइकिलिंग में इस टीम के सदस्य के रूप में प्रतिभाग कर चुकी हैं।

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तो अगले हफ्ते से जब आप अपनी टीम और अपने चहेते खिलाड़ियों का समर्थन कर रहे होंगे तो इन खिलाड़ियों पर, इनके प्रदर्शन पर और इनके हौंसलो व ज़ज्बे पर भी नज़र रखियेगा।




Tuesday, 16 July 2024

ये रोमांच से भरा खेल रविवार था





14 जुलाई 2024, रविवार का दिन। एक ऐसा दिन जिसे नियति ने मानो खेल और केवल खेल के लिए निर्धारित किया हो। मानो उसने कहा हो इस दिन बस खेल होंगे और कुछ नहीं। यूरोप से लेकर अमेरिका तक खेल थे,खिलाड़ी थे और रोमांच में डूबते उतराते दुनिया भर में फैले लाखों या फिर करोड़ों दर्शक थे। कहां और कब ऐसा संयोग हुआ होगा जब दुनिया की तीन इतनी बड़ी और लोकप्रिय प्रतियोगिताओं के फाइनल आधे दिन के भीतर सम्पन्न होने जा रहे हों। ये दिन जीत-हार और बनते टूटते रिकॉर्डों के अलावा इसलिए भी याद रखा जाना चाहिए और खेल इतिहास में दर्ज़ होना चाहिए।

ये दो खेलों की तीन प्रतियोगिताएं थीं और उनके फाइनल थे। दुनिया के दो सबसे लोकप्रिय खेल-टेनिस और फुटबॉल।

टेनिस-सबसे एलीट खेलों में एक। अभी भी बहुत कुछ सामंती हनक लिए हुए। और उसकी सबसे प्रतिनिधि प्रतियोगिता विंबलडन। एक ऐसी प्रतियोगिता जिसे देखने के लिए दुनिया भर के सितारे दर्शक दीर्घाओं में दिखाई देते हैं। प्रतियोगिता जो अभी भी अपनी परम्पराओं को संजोए हुए। प्रतियोगिता जिसका अपना ड्रेस कोड है। और जिसका पूरी कड़ाई और निष्ठा से पालन होता है। खिलाड़ी केवल और केवल सफेद पोशाक पहनेंगे। पिछले साल लड़कियों को केवल इतनी छूट की वे रंगीन इनरवियर पहन सकती हैं। शाही संरक्षण प्राप्त। कल इस प्रतियोगिता का पुरूष एकल फाइनल खेला गया। 

दूसरा खेल था फुटबॉल। टेनिस के एकदम विपरीत आम जन का खेल। दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल। ये टेनिस की तरह सिर्फ शौकिया खेल भर नहीं है। ये बहुतेरों की दुनिया है,उनका जीवन है। उनके दुखों और संघर्षों में समय की आश्रयस्थली है। टेनिस का ऐसा कौन सा खिलाड़ी आपको याद है जिसने गुरबत में रहते हुए दुनिया में नाम कमाया। लेकिन फुटबॉल तो ऐसे ही लोगों से बना है। ये ऐसे लोगों की ही दुनिया है। ऐसे लोगों की भी दुनिया है। पेले और माराडोना से लेकर सदियो माने,एम बापे, निको विलियम्स और लामीने यमाल तक ऐसे ही खिलाड़ी हैं जिन्होंने घोर अभावों और गुरबत की गलियों से लाखों करोड़ों लोगों के दिल तक का लंबा रास्ता तय किया है। स्लम्स में खेलते खेलते दुनिया के विश्व प्रसिद्ध खेल मैदानों तक पहुंचते हैं और दुनिया की आंख के तारे बन जाते हैं।

कल ऐसे ही दुनिया के लोकप्रिय खेल फुटबॉल की दो सबसे लोकप्रिय प्रतियोगिताओं के फाइनल भी खेले गए। एक, विश्व कप फुटबॉल के बाद दूसरी सबसे लोकप्रिय प्रतियोगिता यूरो कप का फाइनल और दो, कोपा कप प्रतियोगिता का फाइनल। यूरो कप का फाइनल जर्मनी की राजधानी बर्लिन के ओलम्पियास्टडियन मैदान पर खेला गया तो कोपा कप का फाइनल अमेरिका में मियामी के हार्ड रॉक स्टेडियम में।

यूं तो ये फुटबॉल की दो सबसे बड़ी और लोकप्रिय प्रतिगोगिता थीं। लेकिन ये दोनों अलग अलग मिज़ाज की,अलग अलग शैली की फुटबॉल है। एक गति,शक्ति,लंबे पास,हिट एंड रन वाली परिणामोन्मुखी तो दूसरी छोटे छोटे पास,ड्रिबल और कलात्मकता लिए आनंदोन्मुखी फुटबॉल। नितांत विपरीत शैली की दो फुटबॉल और उनकी प्रतियोगिताएं हैं ये।

आखिर ये विभाजन आता कहां से है। ज़ाहिरा तौर पर जातीय और नस्लीय विशेषताओं, भौगोलिक संरचनाओं के प्रभाव और सामजिक व सांस्कृतिक विशेषताओं की विभिन्नताओं और स्थानिकता के आधार पर। खेलों का एक बहुत ही प्रचलित सिद्धांत है जो कहता है कि टीमों की विशेषता उनके राष्ट्रीय चरित्र के अनुरूप ही होती हैं। 

लेकिन आज के इस आधुनिक युग में विश्व एक ग्लोबल विलेज बन गया है। माइग्रेशन की प्रकिया चरम पर है। किसी एक देश की टीम में अनेक देशों के और अलग अलग नस्लों के खिलाड़ी शामिल होते हैं। इस हद तक विभिन्न पहचान वाले खिलाड़ी कि वे एक राष्ट्रीय टीम न होकर सार्वभौमिक टीम लगती है। फ्रांस और स्पेन सहित यूरोप के अनेक देशों में अलग-अलग राष्ट्रीय पहचान वाले और नस्ल के खिलाड़ी खेलते हैं। ऐसे में क्षेत्रीय या स्थानीयता के आधार पर खेल शैली का विभाजन मायने नहीं रखता। खेल शैली और टेक्नीक का अधिक तार्तिक आधार कोच और उसकी प्रबंधन टीम की रणनीति है। उदाहरण के तौर पर शक्ति और गति के लिए जाने जाने वाले यूरोप के ही देश स्पेन छोटे छोटे पासों वाला कलात्मक खेल की रणनीति अपनाता है।


रविवार के इन तीन फाइनल्स में सबसे पहले शुरू हुआ विम्बलडन। ये सर्बिया के 24 ग्रैंड स्लैम विजेता 37 वर्षीय अनुभवी नोवाक जोकोविच और स्पेन के 21 वर्षीय युवा कार्लोस अलकराज के बीच था। दरअसल 2023 का फाइनल एक बार फिर अपने को दोहरा रहा था। पिछली बार 5 सेटों के संघर्षपूर्ण मुकाबले में कार्लोस अलकराज ने नोवाक को हराकर उनकी जीत के अश्वमेध यज्ञ के अश्व को थाम लिया था। 

पिछली बार की तरह द्वंद्व का स्थान भी वही था, पात्र भी वही थे और नतीजा भी वही रहा। अलकराज ने नोवाक को 6-2,6-2,7-6(7-4) हरा  दिया। बस मैच की गति बदल गई थी। पिछले साल का एक संघर्षपूर्ण मुकाबला एकतरफा मुकाबले में बदल गया था। एक बढ़ते बिरवै ने विशाल वट वृक्ष की छाया से निकलकर अपना स्वतंत्र आकार ग्रहण कर लिया था। इतना बड़ा कि वो वट वृक्ष के अस्तित्व को सफलतापूर्वक चुनौती दे सके।

इस फाइनल मैच में नोवाक के बस दो मौके थे। एक, मैच का पहला गेम। टॉस जीतकर अलकराज ने अप्रत्याशित रूप से सर्विस रिसीव करना चुना। नोवाक की सर्विस वाला ये गेम लगभग 14 मिनट तक चला और और सात बार ड्यूस हुआ। इस गेम में अंततः अलकराज ने नोवाक की सर्विस ब्रेक कर मैच की टोन सेट कर दी थी। 

नोवाक का एक महीने पहले ही टखने का ऑपरेशन हुआ था और शायद वे सौ फीसदी फिट नहीं थे। वे अलकराज के बेसलाइन के खेल का मुकाबला करने में खुद को असमर्थ पा रहे थे। इसमें उन्हें अधिक कोर्ट कवर करना पड़ रहा था और अधिक परिश्रम भी। उन्होंने रैलीज को छोटा करना चाहा और इसके लिए उन्होंने नेट पर खेलने का प्रयास किया। लेकिन अलकराज ने शानदार पासिंग शॉट्स से उनकी रणनीति असफल कर दी। नोवाक ने पहले दो सेट आसानी से गंवा दिए।

दो,उनका एक और मोमेंट तीसरे सेट में तब आया जब अलकराज 5-4 की बढ़त और 40-0 पर तीन पर तीन चैंपियनशिप पॉइंट के साथ सर्विस कर रहे थे तो नोवाक ने ना केवल ड्यूस किया बल्कि अलकराज की सर्विस ब्रेक भी की। सेट टाई ब्रेक में गया और अलकराज ने अपना संतुलन बनाये रखकर नोवाक को कोई मौका नहीं दिया। उन्होंने टाई ब्रेक 7-4 से जीतकर एक और ऐतिहासिक जीत अपने नाम की।

पिछले एक साल में अलकराज कुछ अधिक अनुभवी हो चुके थे। और फ्रेंच ओपन की जीत का उत्साह उनके साथ था। अपनी गति,शक्ति और मानसिक दृढ़ता,शानदार सर्विस और शक्तिशाली पासिंग और ग्राउंड स्ट्रोक्स के बल पर अर्जित की गई ये जीत उम्रदराज होते नोवाक पर शायद ये उनकी निर्णायक जीत साबित हो। 

ये युवा जोश की अनुभव पर जीत थी। अलजराज की ये जीत फेबुलस फोर के युग की समाप्ति की घोषणा भी सिद्ध हो सकती है। फेबुलॉस फोर के वे एकमात्र स्तंभ बचे हैं जो अभी भी चुनौती पेश कर रहे हैं। अपने कंधे पर ये बोझ कब तक उठा पाएंगे,ये देखना निसंदेह रोचक होगा। वे नए के आगमन का रास्ता आखिर कब तक रोक पाएंगे। नया पानी की तरह अपना रास्ता बना ही लेता है। शायद उसने बना लिया है।

स्पेन के अलकराज मेड्रिड फुटबॉल क्लब के दीवाने हैं। प्रेजेंटेशन सेरेमनी के उद्बोधन में जब उनसे पूछा गया कि यूरो कप के फाइनल में आप किसी जीतते देखना चाहेंगे,तो उनका स्वाभाविक उत्तर स्पेन था।

अब यूरो कप का फाइनल उनका इंतजार कर रहा था।


यूरो कप का ये फाइनल बर्लिन में स्पेन और इंग्लैंड के मध्य खेला जाना था। इस मैच में स्पेन की साख दांव पर थीं तो इंग्लैंड की उम्मीदें दान। स्पेन चौथी बार जीतकर एक नए रिकॉर्ड के साथ अपनी साख बनाए रखना चाहता था,तो इंग्लैंड पिछले यूरो के फाइनल की हार को जीत में बदलकर ना केवल 1966 के गौरव को पुनरप्रतिष्ठित करना चाहता था जब उसने विश्व कप जीता था,बल्कि 58 साल के जीत के सूखे को भी खत्म करना चाहता था। ये मुकाबला अलग अलग शैली और रणनीति का भी था। स्पेन ने पूरी प्रतियोगिता के दौरान छोटे छोटे वन टच पासों के साथ कलात्मक और सुंदर फुटबॉल खेली थी,जबकि इंग्लैंड ने नीरस लेकिन शक्तिशाली फुटबॉल का प्रदर्शन किया था।

ये मैच भी बिल्कुल ऐसे ही खेला गया। स्पेन ने शानदार और सुंदर खेल दिखाया और मैच 2-1 से जीत लिया। इसमें कोई शक नहीं है कि इंग्लैंड बहुत ही प्रतिभाशाली खिलाड़ियों वाली टीम है जो साउथगेरेट  के निर्देशन में बेहतरीन करती रही है। वे बैक टू बैक दो यूरो कप के फाइनल में पहुंचे। इसके अलावा एक विश्व कप के क्वार्टर फाइनल और एक के सेमीफाइनल में पहुंची। इंग्लैंड की टीम के साथ समस्या ये है कि वो प्रतिभाशाली खिलाड़ियों का एक ऐसा समूह है जिसे एक टीम के रूप में संगठित होना बाकी है। जिस दिन ऐसा होगा वो एक अजेय टीम बन सकती है।

लेकिन स्पेन ने इस पूरी प्रतियोगिता में शानदार और सुंदर खेल का प्रदर्शन किया। वे जीत के हकदार थे और जीते।



जिस समय यूरोप में फुटबॉल की ताकतों की ज़ोर आजमाइश खत्म हुई,उसके कुछ समय बाद ही वहां से दूर एक दूसरे महाद्वीप की धरती पर एक और फाइनल खेला जाने वाला था। ये कोपा कप का फाइनल था। यहां मुकाबला केवल कोलंबिया और अर्जेंटीना के बीच भर नहीं था बल्कि अर्जेंटीना के मार्टिनेज और अकेले अपने दम पर अपने देश कोलंबिया को फाइनल तक पहुंचाने वाले के जेम्स रोड्रिग्स के बीच मुकाबला भी था।

मैच रेगुलर समय में गोलरहित रहने पर अतिरिक्त समय मे गया। जब ये लगा कि मैच पेनाल्टी शूट आउट में जाने वाला है तभी मार्टिनेज के बूट से एक और गोल आया। अर्जेंटीना रिकॉर्ड 16 वीं बार कोपा कप जीत रही थी।

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खेलों की सबसे खूबसूरती उसकी अनिश्चितता में है। कमजोर पक्ष के या जिनकी जीतने की कम संभावना होती है वे भी जीत सकते हैं। इन तीनों फाइनल में एक बात समान थी कि जिनके पहले से जीतने की संभावना अधिक थी,जो बेहतर पक्ष थे,वे ही जीते। वे चाहे अलकराज हों, स्पेन हो या अर्जेंटीना। ऐसा नहीं है कि नोवाक या इंग्लैंड या कोलंबिया नहीं जीत सकते थे। वे भी जीत दर्ज़ करने में सक्षम थे। लेकिन ऐसा हो ना सका। जो भी हो तीनों ही फाइनल में बेहतर पक्ष की जीत हुई।

अलकराज,टीम स्पेन और टीम अर्जेंटीना को जीत मुबारक।




राकेश ढौंडियाल

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