Tuesday, 31 December 2013

उम्मीद के गीत





1. 

आशा भरी सुबहें 
विश्वास से लिपटी शामें 
मस्ती भरे दिन 
चैन से कटती रातें 


2. 

उम्मीदों की नदी 
दुखों के पहाड़ का सीना चीर कर 
सुखों के मैदानों को सींचती 
जा मिलेगी  
आनंद के असीम सागर में !

3. 

यूँ ही नहीं कहा शैली ने 
कि सर्द हवाओं के बाद 
बहेगी बासंती बयार 
इसलिए मेरे दोस्त
मत होना निराश . 

दुखों के काले बादल  
तो बरस कर चले जाएंगे 
और रह जाएगी सिर्फ सुख की रोशनी 

मत घबराना 
निराशाओं की स्याह रात से   
आशाओं का सवेरा सोख लेगा इस स्याही को   
और रह जायेगी उम्मीदों की सुर्ख सफ़ेद चादर 

मत घबराना अपने भीतर की कायरता से
तुम्हारे हौसलों की ऊष्मा 
जलाकर  कर देगी राख़
सारी कायरता को 
और निर्मित कर देगी तुम्हारे भीतर एक ऐसा संसार  
जहाँ होंगे
बिंदास ठहाके 
खनखनाती हसीं  
मंद मंद मुस्कान 
उम्मीद ही उम्मीद 
आशा का सागर 
रोशनी का सूरज

और कहीं दूर खड़े दुःख  
उस पर कर रहे होंगे रश्क़ !





4.

क्या दूँ दोस्त तुम्हें
इस नए साल के मुबारक मौके पर

थोड़ी सी धूप कड़कड़ाती सर्दी के लिए
थोड़ी सी छाँव चिलचिलाती गर्मी के लिए
थोड़ी सी छत घनघोर बारिश के लिए
थोड़ी सी बूंदे तपते रेगिस्तान के लिए
थोड़ी सी नींद बेचैन रातों के लिए
थोड़ी सी फुर्सत दौड़ते भागते दिन के लिए
थोड़ी सी आस निराश जिंदगी के लिए
थोड़ी सी हँसी उदास लम्हों के लिए
थोड़ी सी खुशी ग़मों के सागर के लिए
थोड़ा सा प्यार नफरतों की बारिश के लिए
थोडा सा साहस अन्याय से लड़ने को 
थोड़ी सी रोशनी घोर अंधेरे के लिए 

ये 'थोड़ा थोड़ा' सा ही 'बहुत सा' वाले समय में 
ये थोड़ा तुम्हारे पास रहे 
ये थोड़ा मेरे पास रहे 
बस इस थोड़े से ही अच्छे से उम्र कटे।  



Wednesday, 18 December 2013

लोकपाल बिल






46 सालों से लटका  लोकपाल बिल आखिर पास हो ही गया। अण्णा जी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया।वे खुश हो रहे हैं कि उन्होंने बिल पास करा दिया। उनके समर्थक जश्न मना रहे हैं। तमाम राजनीतिक दल इसे पास कराने का श्रेय भी उन्हें दे रहे हैं। लेकिन बिल पास होने की जो टाइमिंग है और जो परिस्थितियाँ हैं उसके हिसाब से इसका श्रेय अण्णा को देना बेमानी है। 
           इसमें कोई संदेह नहीं कि इसे पास कराने के लिए उन्होंने लगातार आंदोलन किया। पिछली बार जब उन्होंने आमरण अनशन किया था तब उनका जीवन भी खतरे में पड गया था। उस समय अण्णा और टीम अण्णा को जो जन समर्थन मिला था वो अभूतपूर्व था। देश भ्रष्टाचार के गम्भीर और बड़े घोटालों से जूझ रहा था। जन समर्थन को देख कर सारी राजनीतिक पार्टियां ही नहीं सरकार भी सकते में आ गयीं थी। सरकार को झुकना पड़ा। उसे अण्णा के पास आना पड़ा और लोकपाल बिल पास करने का वायदा करना पड़ा। 
          हालाँकि  इसे राजनितिक पार्टियों ने संसद की गरिमा पर हमला बताया। लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर में अविश्वास बताया। पर तमाम विरोध के बावजूद दिखावे को ही सही संसद में बिल प्रस्तुत किया गया। पर पास नहीं हो सका होना भी नहीं था। रामलीला मैदान का अनशन इस बिल को लेकर किये जाने वाले आंदोलन का चरम था। यदि अण्णा की वजह से ये बिल पास होना था तो उस समय ही हो गया होता। लेकिन नहीं हुआ। बिल संसद में पेश जरूर किया गया पर उसे तमाम पेचीदगियों और अरंतु परन्तु में उलझा दिया गया। कोई भी राजनीतिक दल इस बिल को पास नहीं करना चाहता था।  क्योंकि इसे पास करने का मतलब था अपनी जड़ों पर ही प्रहार करना जिसके बल पर वे खड़ी हैं। फिर चाहे सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस हो या पार्टी विथ डिफरेन्स बी जे पी हो। सभी पार्टियों की सरकारों पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप हैं। और फिर क्यों नहीं कोई भी पार्टी अपने को सूचना के अधिकार के अंतर्गत नहीं आने देना चाहती। 
                   अब जब अण्णा दिल्ली से हज़ारों मील दूर  बैठे अपने गाँव में थोड़े से लोगों के साथ अनशन पर बैठे तो सरकार ने उनके आंदोलन के डर से या प्रभाव से बिल पास कर दिया? आखिर क्या बात है कि संसद सत्र शुरू होने के साथ अण्णा अनशन शुरू करते हैं और आनन् फानन में बिल पास हो जाता है। क्या इसमें कांग्रेस और अण्णा में  सांठ गाँठ की बू नहीं आती। एक तरफ चौतरफ़ा घोटालों से घिरी कांग्रेस की साख बचाने की जरूरत और दूसरी और केजरीवाल की आशातीत सफलता के बाद अपने अप्रासंगिक हो जाने की अण्णा की दुविधा। 
             दरअस्ल इसका श्रेय उस वैकल्पिक राजनीति को दिया जाना चाहिए जो हालिया दिल्ली विधानसभा चुनाव की देन है। इस चुनाव ने भारतीय राजनीति को कई तरह से बदला है। इस चुनाव ने परम्परागत राजनीति करने वाले दलों पर संकट खड़ा कर दिया। इस चुनाव ने जनता को इन दलों के अलावा भी एक विकल्प दिया है। और यहीं से राजनीतिक दलों में घबराहट का दौर शुरू होता है। अपनी विश्वसनीयता पर आये संकट से उबरने की चुनौती प्रस्तुत होती है। और यहीं से जनता की आकांक्षाओं को मान देने का महत्व समझते हैं। और लोकपाल बिल का पास होना उसकी परिणति बनती है। 
     ये ही वे राजनितिक दल हैं जिन्होंने इस बिल को पास होने से 46 साल रोके रखा। बड़ा आंदोलन खड़ा किया हुआ तो राजनीति में आकर क़ानून बनाने की चुनौती दी। दल बनाया तो मजाक उड़ाया। लेकिन चुनाव ने सभी दलों की बोलती बंद कर दी। क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि इस चुनाव में एक नया विकल्प नहीं होता तो अब तक दिल्ली में सरकार नहीं बनती। जिस राजनीति में कुछ दल के नेता  30 या 40 सांसदों के बल पर  पी.एम. बनने के सपने देखते हो, वहाँ एक राजनीतिक दल सबसे अधिक सीट जीत कर भी दूसरी पार्टी से सरकार बनाने को कहे। जहाँ दल  बदल क़ानून की धज्जियां उड़ाई जाती हो वहाँ दल दूसरे दल को बिना शर्त समर्थन करें। ये सब इसी वैकल्पिक राजनीति की दें है। 
                     भ्रष्टाचारों के आरोपों से त्रस्त कांग्रेस और सरकार तो पहले से ही बैकफुट पर थी। उसके सामने अपनी साख बचाने का बड़ा संकट पहले से मौज़ूद था। तमाम सर्वे भाजपा की जबर्दस्त बढत बता रहे थे। और ये लगभग तय था कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप ना होती तो भाजपा को बड़ी आसानी से बहुमत मिल जाता। लेकिन इस पार्टी ने जनता को जो विकल्प दिया उसने भाजपा की भी नींद उड़ा दी। आखिर कैसे बिल पर एकाएक सहमति बन गयी। 
                                निसंदेह लोकपाल का बन जाना बड़ी बात है। सूचना के अधिकार के क़ानून की तरह इसके भी दूरगामी सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं और होने भी चाहिए। पर इसके पास होने का श्रेय कम से कम तात्कालिक कारण होने का श्रेय तो इसी वैकल्पिक राजनीति के उदय को दिया जाना चाहिए। 











Saturday, 30 November 2013

कलंक गाथा







                              तेजपाल प्रकरण से अब सारा हिंदुस्तान अवगत हो चुका है। तहलका पत्रिका ने नवंबर में गोआ में एक अंतरराष्ट्रीय महोत्सव थिंक फेस्ट आयोजित किया। इस आयोजन के दौरान पत्रिका के एडिटर इन चीफ और प्रख्यात पत्रकार ( अब कुख्यात ) तरुण तेजपाल ने अपनी सहयोगी पत्रकार का यौन उत्पीड़न किया। और ऐसा उन्होंने एक बार नहीं दो दिन किया। वो पत्रकार उनकी बेटी की उम्र की, उनकी बेटी की दोस्त और खुद उनके मित्र की बेटी है।
                              पहले मामले को उन्होंने अपने आप समेटने की कोशिश की।पीड़ित महिला पत्रकार को इस नसीहत के साथ कि 'ये नौकरी चलाने का सबसे आसान तरीका है' जब लड़की ने हिम्मत जुटाई और इस सम्बन्ध में पत्रिका की मैनेजिंग एडिटर शोमा चौधरी को मेल भेज कर घटना की सारी जानकारी दी। उन्होने इस मामले को पत्रिका के अंदर दबाने की कोशिश की। लेकिन जब जानकारी लीक हो गयी तो मामले को दूसरी तरीके से निपटाने की कोशिश की गयी। तेजपाल ने कहा कि उन्होंने पीड़िता से बिना शर्त माफी मांग ली है और प्रायश्चित करने के लिए अपने पद से 6 माह के लिए हट गए। इसे पत्रिका अन्दुरुनी मामला बताया गया। 
                                इस केस की सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि तेजपाल महोदय ने स्वयं को दोषी मानते हुए खुद को सजा भी दे डाली। उनकी इस अदा पर तमाम लोग फ़िदा हो गए और इसे साहसिक कदम बताया जाने लगा। पर मामला और तूल  पकड़ता गया। तब इसे बी जे पी का षड़यंत्र बताया जाने लगा ,कुछ ने उनके पुराने कार्यो का वास्ता दिया। एक महोदय ने पीड़िता की तुलना मोनिका लेविंस्की तक से कर दी। जब और आगे बात बढ़ी तो तेजपाल महोदय ने आरोप  को झूठा बता दिया। जिन महाशय ने पहले अपना अपराध मानते हुए खुद को सजा देने की घोषणा कर दी थी अब वो उस पापकर्म को बेशर्मी से नकार रहा है। इससे हास्यास्पद और क्या हो सकता है। यहाँ पर फेसबुक पर तेजपाल के बचाव में दिए कुछ टीप प्रस्तुत हैं। उल्लेखनीय है कि  ये सब बड़े और समाज के सम्मानित लोगों की टीप हैं तथा ऐसी और भी बहुत सी टीप होंगी …
                            1.   ".... yes, the question stands.but the lady journalist has still not filed any fir.we will talk of her when it comes up.but what makes those enthusiasts go out of their body to get tejpal arrested --isn't it a politico-communal design?
                            2. "… but I still feel that the fall of an angel should not be equated with the habitual acts of any devil." 
                           3. "..Think about a scientist, working 40 years in a laboratory, in absolute confinement, forgetting food, family, pleasures ..just to find a cure of a fatal decease, killing millions of people....think of those long fourty fifty years ...and one day, in fraction of moment...in a spurt of impulses he commits something wrong....and he admits it, confessing it in public....will you all erase all those contributions..
                            4 " ...."क्या आप अपना पक्ष तय कर चुके हैं ? मुझे याद आता है कारंत जी के साथ घटी घटना. जब आप सब लोग उनको फ़ांसी दिलाने के पक्ष में थे..शायद मैं अकेला था जब 'दिनमान' में उस घटना के विवेकपूर्ण, संयत और न्यायिक तरीके से देखने के पक्ष में लिखा था"
                                पिछले दिसम्बर में राजधानी दिल्ली में निर्भया काण्ड हुआ  था। पूरा देश आंदोलित हुआ। वो एक गंभीर अपराध था। हालांकि तेजपाल काण्ड की तुलना करना बेमानी है, पर इस मामले को उसके परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की जा सकती है क्योंकि ये दोनों ही मामले नारी के यौन उत्पीड़न से जुड़े हैं। ये सही है इस मामले में दरिंदगी उस हद तक नही हुई है पर कुछ मायने में ये उससे ज्यादा गम्भीर अपराध भी है और गम्भीर निहितार्थ लिए हुए है 
                         निर्भया कांड के दोषियों की पृष्ठभूमि देखिये तो पता चलेगा कि सारे अपराधी निम्न मध्य वर्ग के थे ,कम पढ़े लिखे थे ,अपने घरों से दूर जीविका अर्जित करने आये थे ,उनकी अपनी कुंठाए रही होंगी। उन्होंने एक अनजान लड़की को देखा और उसके साथ घोर निंदनीय दरिंदगी कर डाली। ऐसा अपराध जिसके लिए मृत्यु दंड भी छोटा लगने लगा। 
                           इसके विपरीत तेजपाल समाज के सबसे सपन्न और प्रबुद्ध वर्ग से आते है। समाज इनसे न केवल नेतृत्व की अपेक्षा करता है बल्कि अपेक्षा करता है कि वे समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत कर मार्गदर्शन भी करेंगे।ये वो वर्ग है जिसे हर तरह की सुविधाएँ उपलब्ध है ,ऐशो आराम से रहते है। निश्चय ही तेजपाल का मन किन्ही चिंताओं से कुंठित नहीं रहा होगा और उन्होंने जो कुछ भी किया वो सोच समझ कर किया। उन्होंने स्वीकार भी किया है कि 'उनका कृत्य परिस्थितियों का गलत मूल्यांकन था'। यानि जो किया सोच समझ कर  किया और सोच समझ कर किया जाने वाला अपराध अचानक हो जाने वाले अपराध से बड़ा होता है। इस दृष्टि से तेजपाल का कृत्य  एक बड़ा अपराध है और संपन्न वर्ग के आदर्शो से च्युत होने की कलंक गाथा है। 
                              वे पढ़े लिखे बुद्धिजीवी वर्ग से आते हैं। बुद्धिजीवी वर्ग ही अपने ज्ञान के प्रकाश से समाज का मार्गदर्शन करता है। उनसे सबसे ज्यादा विवेकवान  होने की अपेक्षा की जाती है। उनसे हर कार्य विवेकसम्मत तरीके से करने की भी अपेक्षा की  जाती है।ऐसे में उनका अपराध कम पढ़े लिखे विवेकहीन लोगों की तुलना में अधिक बड़ा है। और उनका कृत्य बुद्धिजीवी वर्ग की प्रतिष्ठा को धूल धुसरित करने की कलंक गाथा है। 
                                    वे पत्रकार थे। पत्रकारिता के शिखर पर थे। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है। पत्रकार की समाज में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उससे अपेक्षा होती है कि समाज में और विशेष रूप से महिलाओं पर हो रहे अन्याय, अनाचार, अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करेगा। इसके विपरीत तेजपाल का अपने साथी पत्रकार के साथ ये कृत्य पत्रकारिता पेशे के उसूलों को बदनाम करने की कलंक गाथा है। 
                               उन्होंने जिस लड़की के साथ ये कृत्य किया वो कोई अनजान नहीं थी। उनकी माहतत कर्मचारी थी,उनकी साथी पत्रकार थी,उनके द्वारा सेवायोजित थी। सेवायोजकों का कर्त्तव्य है वो ना केवल अपने कर्मचारियों से बेहतर सम्बन्ध बनाए बल्कि उसके हितो की रक्षा भी करे। इस तरह से तेजपाल का ये कृत्य सेवायोजकों के मूल्यो से विचलन की कलंक गाथा है। 
                                    वो लड़की उनके अपने साथी और दोस्त की बेटी थी। वो दोस्त अब इस दुनिया में नहीं है। ऐसे में तेजपाल का ये गुरुतर दायित्व बनाता था कि वो उसकी हर तरीके से रक्षा करे। उसे हर मुसीबत से बचाये। लेकिन उसने अपनी बेटी की उम्र की उस लड़की का बेजाँ फ़ायदा उठाना चाहा। इस दृष्टि से उसका ये कृत्य दोस्ती को कलंकित करने की कलंक गाथा है।
                            वो लड़की केवल तेजपाल के दोस्त की बेटी ही नहीं थी बल्कि उसकी खुद की बेटी की भी दोस्त थी। वो बचपन से उसकी बेटी के साथ रहती आयी थी। उसके दोस्त की बेटी और उसकी बेटी की दोस्त और उसकी हमउम्र होने के कारण उसकी बेटी की तरह थी। इस दृस्टि से उसका कृत्य स्थापित बाप बेटी के पवित्र रिश्ते को बदनाम करने की कलंक गाथा है।  
                                 दरअस्ल ये इस बात कि अभिव्यक्ति है कि समाज के सुविधा संपन्न वर्ग के लिए, शीर्ष पर बैठे सत्ता और अधिकारों से लैस मुट्ठी भर लोगों के लिए उनकी अपनी इच्छा,अपनी सनक ही क़ानून है। वे जब चाहे जो चाहे कर सकते हैं।विधि स्थापित क़ानून सिर्फ आम आदमी के लिए हैं। वे स्वयं क़ानून से ऊपर है।असल में ये लोकतंत्र नहीं कुछ प्रभावशाली लोगों का उनके अपने हितो को साधने का तंत्र है और इस तंत्र में ऐसी कलंक गाथाओं से आपका वास्ता पड़ता ही रहेगा !!!  

Friday, 15 November 2013

विदा सचिन !!!




15 नवम्बर 2013। मुम्बई का वानखेड़े स्टेडियम। समय दिन के लगभग दस बजकर चालीस मिनट।ड्रिंक्स के बाद का पहला ओवर। देवनारायण की गेंद। सचिन के बल्ले का एज लगा। कप्तान सैमी ने कैच पकड़ने में कोई गलती  नहीं की। सचिन आउट। सचिन की आखिरी इनिंग समाप्त। पूरा स्टेडियम स्तब्ध। सचिन वापस पवैलियन लौट रहे हैं। पूरा स्टेडियम खड़े होकर उन्हें विदा कर रहा था। 24 साल पहले 1989 को करांची से जो कहानी शुरू हुई थी आज उसका समापन हो रहा था। सचिन ने 12 चौकों की मदद से 118 गेंदों में 74 रन बनाये।

                   सचिन ने अपनी  इनिंग कल शुरू की थी। कल 38 बनाकर नॉट आउट थे। आज जिस तरह से खेल रहे थे लगा बड़ा स्कोर करेंगे। आज का खेल पुजारा ने शुरू किया। सिंगल लेकर स्ट्राइक सचिन को दी। अब पूरा स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा था।  जल्द ही सचिन ने शिलिंगफोर्ड को दो चौके मारे। स्कोर 47 हुआ। फिर शिलिंगफोर्ड पर सिंगल लिया। स्कोर 48 हुआ। इसके बाद टीनो बेस्ट की गेंद पर अपना ट्रेडमार्क स्ट्रेट ड्राइव कर चौका लगाकर अपना 68 वाँ अर्ध शतक पूरा किया।

                     सचिन जबर्दस्त क्रिकेट खेल रहे थे। वे जानते थे कि वे 40 हज़ार दर्शक स्टेडियम में और करोड़ों टी वी पर उन्हें आखिरी बार खेलते देख रहे हैं। वे अपना बेस्ट देना चाहते थे। वे एक एक क्षण को जी लेना चाहते थे। ठीक वैसे ही जैसे दर्शक इस इनिंग को हमेशा हमेशा के लिए यादगार बना लेना चाहते थे। अपने 24 साल का सारा अनुभव इस इनिंग उड़ेल दिया था। 24 सालों के सारे खेल को इस एक इनिंग में भर देना चाहते थे। दर्शकों की दीवानगी के बीच एकाग्रचित होकर अपनी पारी को आगे बढ़ा रहे थे। 60 पार किया। 70 पर पहुँचे। अब लगने लगा था सचिन की 101वीं सेंचुरी बना लेंगे। पर विधान को कुछ और ही मंजूर था। 74 पर देवनारायण ने 24 साल पुरानी लम्बी यात्रा पर आखिरकार विराम लगा दिया। ये वकार युनुस से करांची में शुरू हुए दुनिया भर के गेंदबाजों के लिए दुःस्वप्न का अन्त था।

  सचिन आज के बाद तुम मैदान पर क्रिकेट खेलते नज़र नहीं आओगे। अब तुम्हारा नए सिरे से मूल्यांकन   होगा। तुम्हारे कैरियर की चीर फाड़ होगी। तुम्हे भगवान बताया जायेगा। तुम्हे महान बताया जायेगा। तुम्हारी आलोचना भी होगी। पर इन सब से तुम वापस खेलने मैदान पर तो  नहीं आओगे। और अगर तुम मैदान पर नहीं भी दिखाई दोगे तो भी क्रिकेट तो चलता ही रहेगा ना। भारत जीतता भी रहेगा,हारता भी रहेगा। किसी के खेलने या न खेलने से क्रिकेट पर क्या फ़र्क़ पड़ता है। हाँ फर्क़  पडेगा तो तुम्हारे उन चाहने वालों पर पड़ेगा जिनके लिए क्रिकेट का मतलब ही सचिन होता था। अब उनके लिए क्रिकेट अब वो क्रिकेट नहीं होगी जो तुम्हारे खेलने पर होती थी। अब तुम उनके लिए सिर्फ याद बन कर रहोगे। अब जब भी क्रिकेट की बात होगी तो तुम्हारी याद आएगी। तुम अब उन सब के लिए मानक बन कर उनकी स्मृतियों में बस जाओगे हमेशा के लिए। अब तो जब भी कोई  … 
 _  रन बनाएगा तो याद आयेगा  तुमने टेस्ट मैचों में सबसे ज्यादा 15921 रन बनाये हैं। 
             … तो याद आयेगा  तुमने एकदिनी मैचों में सबसे ज्यादा 18426 रन बनाये हैं.
             … तो याद आयेगा  तुमने दोनों में मिलाकर सबसे ज्यादा 34347 रन बनाये हैं
 _  सेंचुरी बनाएगा तो याद आयेगा तुमने शतकों का शतक बनाया है। 
             …  तो याद आयेगा तुमने टेस्ट मैचों में सबसे ज्यादा 51 शतक बनाए है।                 
             …  तो याद आयेगा तुमने एकदिनी मैचों में सबसे ज्यादा 49 शतक बनाए है।
 _  टेस्ट कैप मिलेगी तो तुम याद आओगे तुमने 16 साल की उम्र में पहला टेस्ट खेला।
 _  संन्यास लेगा तो याद आयेगा कि तुमने 200 टेस्ट खेले
 _  याद आयेगा एकदिनी मैचों में पहला दोहरा शतक तुमने ही मारा।
 _  सिक्स मारेगा तो याद आयेगा तुमने शोएब अख्तर को थर्ड मैन के ऊपर सिक्स मारा था।

सिर्फ इतना ही नहीं अब जब भी …
 _  कप्तान किसी खिलाड़ी को कोई नसीहते देगा तो याद आओगे कि साथी खिलाड़ी सचिन जैसा हो
 _  कोई बच्चा क्रिकेट का बात पकड़ेगा तो उस याद आयेगी वो सचिन जैसा बने।
 _  कोच ट्रेनिंग देगा तो उसे तुम याद आओगे कि सचिन जैसा शिष्य हो।

          सच तो ये है तुम्हारी हर बात याद आयेगी ! सचिन भले ही तुम मैदान में ना दिखो। पर अपने फैन्स के दिलों में हमेशा रहोगे। हमेशा उनके दिलों पर राज़ करोगे।विदा सचिन !खेल के मैदान से !! विदा सचिन !!!

(चित्र गूगल से साभार )

Thursday, 7 November 2013

प्रेम



आओ साथी आओ
डाले हाथ में हाथ
चले साथ
और प्रेम के विरोधियो को
सिखाएं प्रेम का पाठ


आओ चलें चाँद पर
समेट कर वहाँ से लाएँ
ढेर सारी शीतलता
और उससे कर दें शांत
प्रेम विरोधियों की सारी घृणा


 आओ चले सूरज के पास
 माँग कर वहाँ से लाएँ
 ढेर सारी ऊष्मा
 और भर दे
 प्रेम विरोधियों में प्रेम की गर्मी


आओ चले बृहस्पति के पास
बटोर कर वहाँ से लाएँ
ज्ञान का भण्डार
और सिखा दे
प्रेम विरोधियों को प्रेम के मायने

आओ चलें शुक्र के पास
उतार ले आएं वहाँ से
प्यार की गंगा
और तर्पण कर दे
प्रेम विरोधियों के सारे पूर्वाग्रह और कुंठाएं


आओ चले शनि के पास
सीख कर आएं वहाँ से
थोड़ा सा जादू
और दूर कर दे
प्रेम विरोधियों के मन की सारी कलुषता


आओ चलें तारों के पास
भर कर लाएं वहाँ से
रोशनी की झोली
और उतार दे उसको
प्रेम विरोधियों के दिमाग में
(ताकि देख सकें प्रेम को साफ़ साफ़ )


आओ सिखा दे
प्रेम विरोधियों को
स्वयं सैनिकों को
धर्म विद्यार्थियों को
खाप पंचायतों को
प्रेम करना


और बता दे उन्हें
कि वे भी तो किसी के प्यार की उपज हैं।








Sunday, 27 October 2013

मैंने शिव को देखा है


मैंने शिव को देखा है 

गली, चौराहों, सड़को और घरों में 

यहाँ तक कि लोगों की जेबों में देखा है। 

कभी सर्जक 

तो कभी विध्वंसक होते देखा है।

कभी जमींदारों का  हथियार 

और पूंजीपतियों का कारखाना होते देखा है 

तो कभी  मजदूरों की बंदूक होते देखा है।  

कभी सभ्यताओं को  विकसित करते 

और आज उन्हें विनाश के मुहाने खडा करते देखा है  

मैंने आदमी को देखा है। 


खेल



कंचे गुल्ली डंडे से लेकर फुटबॉल क्रिकेट तक
सभी खेल हो चुके है पुराने
और इन्हें खेलते खेलते ऊब चुके है हद तक
क्योंकि इनमे नही होते धमाके
नहीं बहता खून
नहीं मचती चीख पुकार
नहीं उजड़ते मांगो के सिन्दूर
नहीं होते बच्चे अनाथ
नहीं नेस्तनाबूत होते घर परिवार
और पल भर उजड़ता संसार

तो आओ खेले एक ऐसा खेल
जिसे कभी सिखाया था हमारे आकाओं ने
और हमने भी सीखा अच्छे शिष्यों की तरह
और खेले जिसे हम आजादी पाने के उन्माद में
खेले भागलपुर में
भिवंडी में
मलियाना में
दिल्ली में
गुजरात में
आसाम में
और मुज़फ्फरनगर में भी तो


तो शुरू करें खेल - "धरम गरम"
तू तू तू हिन्दू हिन्दू हिन्दू ऊ ऊ  ऊ ऊ.।
ये मारा एक लोना
गुजरात मेरा
तू तू तू तू मुस्लिम मुस्लिम म म म म म …
वो मारा एक लोना
और ये हुआ उत्तर प्रदेश मेरा
तू तू तू बांग्ला बंगला ला ला ला ला
वो मारा एक और लोना
हुआ आसाम मेरा

कितना आनन्द आ रहा है
एक के बाद एक लोना जीतते जा रहे है
तो फिर रुकना क्यों
लगातार खेलते जाना है
कब्जे में पूरा हिन्दुस्तान जो लाना है
क्रिकेट में तो विश्व चैंपियन है
इसका भी तो ताज पहनना है।

(लोना =कबड्डी में एक टर्म जो विपक्षी टीम के सभी खिलाडियों को आउट करने पर मिलता है और कुछ एक्स्ट्रा पॉइंट मिलते हैं )  

फुटबॉल नर्सरी मिनर्वा अकादमी और रंजीत बजाज

  एक बड़ी चकाचौंध में छोटी सी कोई गहमागहमी अनदेखी रह जाती है। बड़े इवेंट के बीच छोटा सा इवेंट अनचिह्ना रह जाता है। बड़े बड़े संघर्षों के बी...