Saturday, 18 June 2016

फिर दिल दो हॉकी को

2014 में इलाहाबाद में आयोजित मीरा फाउंडेशन पुरस्कार वितरण समारोह में प्रख्यात कहानीकार ज्ञानरंजन ने अपने वक्तव्य में कहा था "मरी हुई चीज़ें भी शानदार हो सकती हैं। ज़रा नालंदा, तक्षशिला,मोहनजोदड़ो,कौशाम्बी,एथेंस की याद कर लें।" यानि मृत्यु ज़िंदगी के जैसी ही शानदार हो सकती है बस शर्त ये है कि मृत्यु किसकी और कैसे होती है। ठीक वैसे ही हार भी जीत जैसी शानदार,गरिमामयी  और  आश्वस्तकारी हो सकती है बशर्ते आप कैसे और किससे हारते हैं।कल रात लंदन में चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में पहली बार खेल रही भारतीय हॉकी टीम की पेनाल्टी शूटआउट में 1-3 से हार जीत जितनी ही आश्वस्तकारी और शानदार थी।  ये हार मन में किसी तरह की पीड़ा पैदा नहीं कर रही थी,कोई टीस नहीं उभर रही थी,कोई मलाल उत्पन्न नहीं हो था,बल्कि भारतीय खिलाड़ियों का हर पास,हर शॉट,हर स्कूप,हर टैकलिंग,उनका हर मूव मन में  आश्वस्ति का भाव पैदा कर रहा था कि भारत में भले ही लोगों के अच्छे दिन आएं या ना आएं पर हॉकी के अच्छे दिन ज़रूर आने वाले हैं।ये प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक सरदार सिंह सहित कई बेहतरीन और वरिष्ठ खिलाडी नहीं खेल रहे थे। 
     आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ज़बरदस्त आक्रामक होते हैं। आक्रामकता उनके रक्त में है। उनके अपने ऐतिहासिक कारण भी हैं। दूसरी और भारतीयों की नियति ही आक्रमणों को झेलना और उनका मुकाबला करते हुए उनके बीच से जीवन का रास्ता बनाने की रही है।इस फाइनल में भी ऐसा ही लग रहा था  मानों भारतीय खिलाड़ी इतिहास जी रहे हों। वे ना केवल ऑस्ट्रेलियाई टीम के ज़बर्दस्त आक्रमण का बहादुरी से मुकाबला कर रहे थे बल्कि उस के बीच से अपने सर्वाइव करने का मार्ग भी  तलाश रहे थे और अपनी मर्यादा की रक्षा भी कर रहे थे।    
          हर खेल के  कुछ मील के पत्थर होते हैं जो उस खेल की उपलब्धियों को याद करते वक्त सबसे पहले ज़ेहन में आते हैं। जैसे क्रिकेट में 1971 में इंग्लैंड पर जीत और 1983 के विश्व कप में जीत मील का पत्थर हैं वैसे ही हॉकी में ओलम्पिक में मिले 8 स्वर्ण पदक और 1975 में विश्व कप में जीत याद आती है। उसके बाद की हॉकी की कहानी दरअसल उसके रसातल में जाने की कहानी है। 1980 में मास्को ओलम्पिक में भारत ने स्वर्ण पदक जीता ज़रूर था पर वो जीत इसलिए कोई मायने नहीं रखती क्योंकि बहिष्कार  के चलते हॉकी खेलने वाले प्रमुख देशों ने इसमें भाग नहीं लिया था। 1980 के बाद से  यादगार प्रदर्शन भारतीय हॉकी टीम ने ज़रूर किये। पर वे अपनी प्रकृति में स्थाई नहीं बल्कि बादलों के बीच चमकने वाली उस बिजली की तरह थे जो चमकते ही ख़त्म जाती है। अज़लान शाह कप में जीत या इंचियोन एसियाड  जीत कुछ ऐसी ही जीत थी। लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग है। पिछले दो साल में कोई बहुत बड़ी जीत हासिल नहीं की है। लेकिन इसके बावजूद भरोसा बढ़ा है कि टीम अब पुनर्निर्माण  के दौर में है और धीरे धीरे मजबूती से आगे बढ़ रही है। उसने पिछले दो सालों में अपने प्रदर्शन में निरन्तर सुधार किया है ,अपनी रैंकिंग में सुधार किया है। ये प्रदर्शन सर्द रातों के घने कोहरे की छाती को चीर कर निकले सूरज की मानिंद है जिसे देर तक ठहरना है। 
हॉकी का जब भी ज़िक्र  आता आता है थोड़ा सा नॉस्टेलजिक हो उठता हूँ। पहला खेल जो ठहरा जिसे मैंने खेला और इस नाते पहले प्यार सा।  1975 का साल था  वो हॉकी के चरमोत्कर्ष का साल। पहली बार औपचारिक रूप से खेल के मैदान में प्रवेश  किया था और हॉकी स्टिक वो पहला उपकरण था जिसे हाथ में पकड़ा था कंचे और गिल्ली डंडे  अलावा। हालाँकि बाद में क्रिकेट और बास्केटबाल में आ गया।फिलहाल एक बार फिर समय आ गया है रियो में पदक की उम्मीद लगाने का। हॉकी को फिर दिल देने का।  
                            जी हॉकी ! जीत हॉकी ! जय हॉकी !















Sunday, 5 June 2016

नामुराद चाहत

          एक ऐसे लम्हे की जिसकी कि ज़िंदगी में सबसे अधिक शिद्दत से चाहत होती है वो अक्सर हाथ में आ-आ कर फिसल  जाता है। वो लम्हा जितना दूर भागता है उसे पाने की चाहत उतनी ही बढ़ती जाती है और उसे पाने के प्रयास भी उसी अनुपात में बढ़ते जाते हैं। अंततः उस लम्हे को आना ही होता है। और जब वो लम्हा आता है तो पूरी कायनात उसे ठहरी ठहरी सी लगती है। आज जब रोलाँ गैरों की लाल मिट्टी पर खेलते हुए नोवाक जोकोविच के प्रतिद्वंदी एंडी मरे ने चौथे सेट के दसवें गेम की उस अंतिम लेकिन लम्बी रैली बॉल को नेट में मार कर ख़त्म किया तो निश्चित ही नोवाक के लिए वो लम्हा थम सा गया होगा और सारी की सारी कायनात ही उन्हें थमी-थमी सी लग रही होगी। 2012,2014 और 2015 के फाइनल के बाद उनकी आँख से निकला नमक का पानी इस बार शहद से मीठे पानी में तब्दील हो गया होगा जो रोलाँ गैरों में अब तक की असफलताओं पर मरहम सा महसूस हो रहा होगा। किसी भी टेनिस खिलाड़ी के लिए चारों ग्रैंड स्लैम-ऑस्ट्रेलियन,फ्रेंच,विंबलडन और अमेरिकन प्रतियोगिता जीत लेना एक सपना होता है।नोवाक का भी था। इन प्रतियोगिताओं में सबसे कठिन फ्रेंच ओपन ही है जो मिट्टी की धीमी सतह पर खेली जाती है।11 ग्रैंड स्लैम जीत चुके नोवाक के लिए मस्केटियर ट्रॉफी बार बार हाथ में आते आते रह जाती थी।यहां वे तीन बार फाइनल में पहुँच कर हार गए। दरअसल ये एक ऐसी जीत है जो अकेले उनके 11 खिताबों के बराबर है।मस्केटियर ट्रॉफी हाथ में लेकर जब वे कह रहे थे कि "ये मेरे कैरियर का सबसे उम्दा क्षण है" तो वे कुछ ऐसा ही कह रहे थे। किसी भी जीत के बाद वे आज सबसे संयत और संतुष्ट नज़र आ रहे थे। बिलकुल ऐसे जैसे ज़िंदगी की सबसे बड़ी मुराद पूरी हो गयी हो। फिलहाल नए फ्रेंच ओपन चैंपियन का स्वागत। 

बाहरी आवरण



हर किसी के बाहरी आवरण में
छिपा हुआ है और भी बहुत कुछ
अक्सर सुनहरी धूप जिस्म को कर देती है काला
और साँवली छाया कर देती है और अधिक उजला
जैसे कुछ बड़े आदमी साबित होते हैं बहुत बौने
और छोटे आदमी उठा लेते हैं अपने को आसमान से भी ऊँचा।
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Tuesday, 24 May 2016

तमन्नाएँ





ये आसमान पर बिखरे तारे हैं

कि हमारी तमन्नाएँ

दिखते तो खूबसूरत हैं

पर हाथ नहीं आते।

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Thursday, 19 May 2016


ये क्या गजब हुआ
कयामत हो गई
और उन्हें पता ही नहीं चला
ना पहले सी नफरत रही
ना पहले सी मोहब्बत
इक वो हैं कि
उन पर कोई असर ही ना हुआ। 
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किसी का भाव निरपेक्ष हो जाना ही तो सबसे  बड़ी सज़ा है 


Sunday, 8 May 2016

टीम लीस्टर सिटी क्लब

                             

                                                                                                (गूगल से साभार)
                                    

 ये किसी परी कथा के किताबों से निकल कर हक़ीक़त में बदल जाने जैसा था। ये रात में देखे स्वप्न के सुबह होते -होते यथार्थ में बदल जाने जैसा था। ये कुछ कुछ अनहोनी के होनी में बदल जाने जैसा था। ये कुछ और नहीं एक क्लब का उसके 132 सालों के इतिहास में सबसे ऊंची पायदान पर पहुँच जाना था। ये विश्व के सबसे लोकप्रिय खेल फुटबाल की सबसे लोकप्रिय और धनी बार्कले द्वारा प्रायोजित इंग्लिश प्रीमियर लीग के 2015-16 के सत्र को एक सबसे कमज़ोर मानी जाने वाली  टीम द्वारा जीता जाना था। ये टीम लीस्टर सिटी क्लब थी। ये टीम थी जिसने अपने 132 वर्षों के इतिहास में कोई ए डिवीजन लीग नहीं जीती थी। ये टीम थी जो पिछले  सत्र में ए डिवीजन से बाहर ही होने वाली थी यदि उसने अपने अंतिम नौ मैचों में से सात ना जीते होते। ये टीम थी जिसकी इस सत्र के शुरू होने पर सट्टा बाजार में बोली 5000 पर 1 थी। ये टीम थी जिसमें एक भी स्टार खिलाड़ी नहीं था। ये टीम थी जिसके ज्यादातर खिलाड़ी बी और सी डिवीज़न से या दूसरी टीमों द्वारा रिलीज़ हो के आए थे। पर ये टीम थी जिसने वो  कर दिखाया  जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। खेल का असली रोमांच ही वही होता है जब अनजानी,अनचीन्ही सी कोई टीम दिग्गजों को धूल चटाते नज़र आते हैं,उन्हें दिन में तारे दिखाते नज़र आते हैं। नीली जर्सी वाले खिलाड़ी कल शनिवार (7मई )की रात किंग पावर स्टेडियम में एवर्टन के विरुद्ध मैच के बाद चमचमाती ट्रॉफी को लेकर मैदान में जो जश्न मना रहे थे उसकी कल्पना उन्होंने खुद भी नहीं की होगी। उस गहराती रात में एक नए स्टार का उदय हो रहा था।एक नए चैंपियन का उदय हो रहा था। 
                           दरअसल ये खेल इतिहास की ये नई इबारत पिछले सोमवार (2मई )को ही लिखी जा  चुकी थी । उस दिन लंदन के स्टैमफोर्ड ब्रिज स्टेडियम में लीग की अंकतालिका में दूसरे स्थान पर रहने वाली टॉटेनहम हॉटस्पर और पिछली चैंपियन चेल्सी के बीच मैच खेला जा रहा था। इससे पहली रात को लीस्टर सिटी और मैनचेस्टर युनाइटेड के बीच 1-1 से ड्रा हुए मैच ने टॉटेनहम की टीम के शीर्ष पर पहुँचने की उम्मीदों को जीवित रखा था। इसी उम्मीद के भरोसे उन्होंने चेल्सी के विरुद्ध शानदार शुरुआत की।पहले हाफ में हैरी केन और सोन एच. मिन के गोलों की बदौलत 2-0 की बढ़त भी ले ली। लेकिन 58वें मिनट में गैरी काहिल ने बढ़त को कम कर दिया।  उसके बाद 83वें मिनट में इडेन हैजर्ड ने गोल कर चेल्सी को बराबरी पर ला खडा किया। ज़बरदस्त उत्तेजना से भरे इस मैच में कुल 12 पीले कार्ड दिखाए गए जिसमें से 9 टॉटेनहम के खिलाड़ियों के हिस्से आए। इस अनिर्णीत नतीज़े वाले मैच ने टॉटेनहम के सपने को तोड़ दिया था। जिस समय टॉटेनहम के खिलाड़ी हताश निराश  से मैदान से बाहर आ रहे थे ठीक उसी समय लीस्टरशायर के एक छोटे से शहर मेल्टेन मोब्रे में अब तक लीग के हीरो बन चुके जैमी वर्डी के घर मैच देखने जमा हुए लीस्टर के खिलाड़ी खुशी से झूम रहे थे।खेल इतिहास में अब तक के सबसे बड़े अपसेट में से एक हो चुका था। उत्सव आरम्भ हो चुका था। लीस्टर के किंग पावर स्टेडियम में हज़ारों लोग इस ऐतिहासिक क्षण को सैलीब्रेट कर रहे थे। 1992 से शुरू हुई इंग्लिश प्रीमियर लीग के  5 फेबुलस-आर्सेनल,मैनचेस्टर सिटी,मैनचेस्टर युनाईटेड,लीवरपूल और चेल्सी- के वर्चस्व को समाप्त करके एक नए और कुल मिला कर छठवें चैंपियन का उदय हो चुका था।

                                                      
                 ये जीत एक टीम की मेहनत,उसके ज़ज़्बे,उसके संघर्ष,उसके होंसले की जीत थी। ये उसके नए मैनेजर क्लॉडियो रेनीरी की जीत थी। जी हाँ ,ये रेनीरी की जीत भी थी।  ये रेनीरी ही थे जिहोंने टीम को पुनर्गठित किया ,टीम को एकजुट किया ,उसे होंसला दिया और जीत के लिए ज़रूरी जोश और ज़ज़्बा दिया। उन्होंने एक हताश निराश पराजित टीम को नए सिरे से संवारा। उन्होंने बी और सी डिवीज़न से अनेक प्रतिभावान खिलाड़ियों को लिया। तमाम दूसरी टीमों द्वारा रिलीज़ खिलाड़ियों का समावेश किया।  जिस समय लीस्टर सत्र की शुरुआत कर रही थी उस  समय उसके पास एक भी नामचीन खिलाड़ी नहीं था। उनके कप्तान वेस मॉर्गन ने 30 साल की उम्र तक एक भी ए डिवीज़न मैच नहीं खेला था। गोलकीपर कैसपर माइकल पिछले 5 वर्षों से बी और सी डिवीज़न लीग के बीच झूलता रहा था। अब तक लीग में 22 गोल दागने वाले  और लगातार 11 मैचों में  गोल करने का रिकॉर्ड बनाकर स्टार बने जैमी वर्डी बी डिवीज़न में खेल रहा था। जबकि डैनी सिम्पसन और डैनी ड्रिंकवाटर मैनचेस्टर यूनाइटेड द्वारा रिलीज़ किये गए थे तथा मार्क अल्ब्राइटन को एस्टन विला  ने रिलीज़ किया था। रेनीरी ने तमाम खिलाड़ियों की प्रतिभा को समझा,परखा और एक संगठित टीम तैयार की। 
                रेनीरी इटली से है। गैरी बाल्डी और मैज़िनी के देश से। दो महा नायक। इन दोनों ने अपनी दूरदर्शिता और योग्यता से 19वी सदी में छोटी छोटी रियासतों और भिन्न भिन्न भौगोलिक इकाइयों में बंटे इटली को एक सूत्र में पिरोया। सशक्त देश का निर्माण किया और  फिर उस को एक महाशक्ति बनाया। दो ऐसी शख्शियत जिनसे हर इटलीवासी आज भी प्रेरणा लेता है। निश्चित ही रेनीरी  ने भी जब लीस्टर के मैनेजर का पद संभाला और एक कमज़ोर हताश बिखरी टीम को देखा होगा तो उन्हें अपने उन दो महान पूर्वजों से प्रेरणा मिली होगी। जिसे लेकर उन्होंने एक नयी टीम का निर्माण किया। 
                             जब टीम में एकता होती है तो शक्ति होती है। शक्ति होती है तो साहस होता है। साहस होता है तो उम्मीदों के पर लग जाते हैं। पर होते हैं तो उड़ान संभव होती है। और जब उड़ान होती है तो सारा आसमाँ  उनका होता है। ये आसमाँ अब टीम लीस्टर का है।  नए चैंपियन का स्वागत। 













   





   

Thursday, 21 April 2016

गुडबॉय माम्बा

                  
(गूगल से साभार)

          







 बीते बुधवार 13 अप्रैल 2016 की गहराती जाती रात में लॉस एंजिलिस के स्टेपल्स सेंटर एरीना में ज़ाहिरा तौर पर तो दो टीमों-उथाह जैज और लॉस एंजिलिस लेकर्स के बीच एनबीए का मैच भर होना था। लेकिन वास्तव में स्टेपल्स सेंटर एरीना एक ऐतिहासिक और अविस्मरणीय  घटना के घटने का साक्षी ही नहीं बन रहा था बल्कि उसका भागीदार  भी बन रहा था। दरअसल वहां उस समय 28 मीटर लम्बे और 15 मीटर चौड़े मैदान, नौ फ़ीट ऊँचे बोर्ड पर टंगी 45 सेंटीमीटर दो रिंग और 39 सेंटीमीटर व्यास वाली एक अदद गेंद के साथ 6 फ़ीट 6 इंच लंबे दुबले पतले एक खिलाड़ी के अटूट सम्बन्धों की कहानी का उपसंहार लिखा जाना था।यहां पर केवल ये इतिहास भर नहीं लिखा जाना था कि अमेरिकी बास्केटबाल खिलाड़ी माइकल जॉर्डन के बाद दूसरा सबसे बड़ा खिलाड़ी खेल जीवन से संन्यास लेने जा रहा था बल्कि उस मैच में खुद उसके द्वारा अपने असाधारण खेल से एक इतिहास रचा जाना था । उसने इस मैच में 60 अंक बनाए और तीसरे क्वार्टर तक 12 अंकों से पिछड़ने के बाद भी लेकर्स को 101-96 से जीत दिला दी। अमेरिकी खेल इतिहास की और विशेष रूप से एनबीए इतिहास में ये किसी भी खिलाड़ी की अब तक की सबसे शानदार विदाई थी। उस एरीना की दर्शक दीर्घा में बैठे  18 हज़ार दर्शक उस खिलाड़ी के जादुई खेल को मंत्र मुग्ध से देख रहे थे और उस अद्भुत खेल की अपने भीतर प्रतिच्छायाएं स्थायी तौर पर बसा रहे थे क्योंकि वे जानते थे कि उस खिलाड़ी द्वारा कोर्ट में जो स्पेस अपने लिए बनाया गया है वो अब  खाली ही रहना है। जब भी उस स्पेस में उस खिलाड़ी को देखना चाहेंगे तो वे प्रतिच्छायाएं ही काम आनी थी जो उन्होंने आज अपने मन में स्थापित की हैं।वो खिलाड़ी  कोई और नहीं बल्कि  कोबे बीन ब्रायंट था जो अपना आखरी मैच खेल रहा था और इस बीस साल लम्बी कहानी का आरम्भ 1996 में उस समय था जब 17 साल के युवा कोबे को एनबीए में ड्राफ्ट किया गया था।


(गूगल से साभार)


          दरअसल कुछ खिलाड़ी  में इतने बड़े हो जाते हैं वे खेल के नाम से नहीं जाने जाते बल्कि खेल उनके नाम से जाना जाता है। फुटबाल में पेले और माराडोना,क्रिकेट में ब्रेडमैन और सचिन,हॉकी में ध्यानचंद,बैडमिंटन में रूडी हार्टोनो और लिम स्वी किंग,एथलेटिक्स में पावो नूरमी और जैसी ओवेन्स,टेनिस में ब्योन बोर्ग,पीट सैम्प्रास या रोजर फेडरर और बास्केटबाल में माइकल जॉर्डन।  निसंदेह कोबे ब्रायंट भी उसी श्रेणी के खिलाड़ी हैं। जिसके हिस्से में 5एनबीए चैंपियनशिप,एक एमवीपी,दो फाइनल एमवीपी,18 एनबीए आल स्टार और दो ओलम्पिक स्वर्ण पदक हो और जिसने 33643 अंक बनाए हो जो एनबीए में तीसरे सबसे ज्यादा पॉइंट हैं, जिसने एक मैच में अकेले 81 अंक बनाए हो जो एनबीए इतिहास में दूसरा सबसे बड़ा व्यकिगत स्कोर है वो महानतम ही हो सकता है। ऐसे खिलाड़ी जब भी अपना बनाया स्पेस खाली करते हैं तो उसे भरना बहुत मुश्किल होता है।  उनका जाना एक ऐसा निर्वात बना देता है जिसकी सीमाओं पर प्रतिभाओं की हवाएं लगातार प्रहार करती हैं लेकिन उसमें प्रवेश नहीं कर पाती,उस स्पेस का अतिक्रमण नहीं कर पाती। कोबे ने भी जो स्पेस खाली किया है उसे भरना असम्भव नहीं भी हो तो भी उसे भरना अत्यन्त दुष्कर अवश्य है। अब खेल के मैदान में तुम खेलते नहीं दिखाई दोगे ,ये तो बस मन में बसी प्रतिच्छायाओं में ही संभव होगा। खेल के  मैदान से अलविदा माम्बा,ब्लैक माम्बा।
(गूगल से साभार)


ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल 2026

एक : फीके फीके से खेल इस बार के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ खेल बहुत फीके फीके से हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया द्वारा मेजबानी...