Thursday, 14 July 2022

दादा की दादागिरी और क्रिकेट



                                                 (गूगल से साभार)

खेल मैदानों पर कुछ ऐसे दृश्य बनते  हैं जो अपनी अंतर्वस्तु में इतने शक्तिशाली होते कि वे खेल प्रेमियों के दिलों पर हमेशा  के लिए अंकित हो जाते हैं और अविस्मरणीय बन जाते हैं। एक ऐसा ही दृश्य 13 जुलाई 2002 को लॉर्ड्स के मैदान पर बना था।

उस दिन नेटवेस्ट सीरीज का फाइनल मैच खेला गया। इंग्लैंड ने भारत को 326 रनों का मुश्किल लक्ष्य दिया था। लेकिन मो.कैफ और युवराज ने शानदार बल्लेबाजी की जिससे अंतिम 4 गेंदों में जीत के लिए भारत को 2 रन की दरकार थी। फ्लिंटॉफ के अंतिम ओवर की तीसरी गेंद ज़हीर खान ने  शार्ट कवर की ओर हल्के से पुश की और बराबरी के रन के लिए दौड़ पड़े। क्षेत्ररक्षक  रन आउट करने के प्रयास में ओवर थ्रो कर बैठे। कैफ और ज़हीर ने जीत के ज़रूरी एक रन भी बना लिया। भारत दो विकेट से जीत गया और क्रिकेट के मक्का लॉर्ड्स के पवेलियन की बालकॉनी में खड़े कप्तान सौरव गांगुली ने जीत की खुशी में अपनी शर्ट उतारकर हवा में लहरा दी।

गांगुली द्वारा शर्ट उतार कर हवा में लहराने का ये दृश्य अब ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुका है। दरअसल गांगुली का शर्ट उतारकर हवा में लहराना  बंगाल के 'भद्रलोक' के बाबू मोशाय की इमेज और लॉर्ड्स की क्रिकेटिंग परंपराओं से ही विचलन नहीं था बल्कि ये क्रिकेट के भद्रलोक की 'जेंटलमेन्स  खेल' इमेज और भारतीय खिलाड़ियों में मारक क्षमता और आक्रामकता ना होने वाली इमेज का ध्वस्त होना भी था। ये भारतीय क्रिकेट इतिहास की एक विभाजनकारी घटना थी। इससे आगे की भारतीय क्रिकेट आक्रामकता और जीत से लबरेज क्रिकेट थी।

क्या ही संयोग है कि भारतीय क्रिकेट इतिहास के दो सबसे बड़े और मील के पत्थर कहे जाने वाले दृश्य लॉर्ड्स के मैदान पर ही बनते हैं। पहला, 1983 में कपिलदेव द्वारा विश्व कप ट्रॉफी को हाथ में लेने वाला दृश्य और दूसरा, गांगुली द्वारा शर्ट लहराने वाला दृश्य। ये दो घटनाएं(1983 में विश्व कप जीतना और 2002 में विदेशों में जीतने का सिलसिला और विरोधियों को उन्हीं की भाषा में उनकी आंखों में आंखें डालकर जवाब देना) भारतीय क्रिकेट इतिहास की युगान्तरकारी घटनाएं हैं। कपिल देव और सौरव गांगुली दो ऐसे क्रिकेटर हैं जिहोंने भारतीय क्रिकेट को ना केवल सबसे अधिक प्रभावित किया बल्कि उसके चरित्र को बदल दिया। भारतीय क्रिकेट की दिशा और दशा को बदलने की दृष्टि से कपिल और सौरव देश के सबसे बड़े क्रिकेटर ठहरते हैं।

1983 में विश्व कप में जीत और एक क्रिकेटर के रूप में कपिल के व्यक्तित्व का भदेसपन क्रिकेट के इलीट चरित्र को मास में रूपांतरित कर देते हैं। अब क्रिकेट लोकप्रियता की सोपान चढ़ने लगता है। क्रिकेट मेट्रोपोलिटन क्लबों से निकलकर छोटे छोटे शहरों और कस्बों की गली कूंचों तक पहुंच जाता है। और इस दृष्टि से कपिल भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े खिलाड़ी ठहरते हैं।

अब भारत में क्रिकेट अपूर्व लोकप्रियता तो धारण करता है लेकिन विश्व कप में जीत और लोकप्रिय होने के बाद भी भारत विश्व क्रिकेट का सिरमौर नहीं बन पाता। विदेशों में जीत का कोई सिलसिला नहीं बनता। खिलाड़ियों के कंधे अभी भी अक्सर झुके रहते।

तब 1992 में भारतीय क्रिकेट परिदृश्य पर सौरव गांगुली का पदार्पण होता है। लेकिन एक मैच के लिए। एक ओडीआई के बाद ही उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। उनसे अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने की अपेक्षा की जाती है। दरअसल वे बंगाल के भद्रलोक से आते थे और उनका व्यक्तित्व आभिजात्य से लबरेज था। लेकिन गांगुली ने बदलने से इनकार कर दिया। महान व्यक्तित्व ऐसे ही होते हैं। वे स्वयं नहीं बदलते बल्कि अपने समय और समाज को बदल देते हैं। गांगुली भी ऐसा ही करते हैं। वे स्वयं नहीं बदलते बल्कि भारतीय क्रिकेट और उसके चरित्र को ही बदल देते हैं।

उन्हें भारतीय टीम में रेगुलर जगह बनाने के लिए अगले चार साल इंतज़ार करना पड़ता है। ये वर्ष 1996 की बात है। अज़हरुद्दीन के नेतृत्व में भारतीय टीम इंग्लैंड के दौरे पर जाती है। वहां से ओपनर नवजोत सिंह सिद्धू कप्तान पर खराब व्यवहार करने का आरोप लगाकर भारत लौट आते हैं। तब सौरव की किस्मत पलटा खाती है और भारतीय क्रिकेट की भी। सौरव को भारतीय टीम में जगह मिलती है।

पहले टेस्ट मैच में सौरव को पहले 11 खिलाड़ियों में जगह नहीं मिलती। लेकिन दूसरे टेस्ट में सौरव को टीम में जगह मिलती है और वे सैंकड़ा ठोंक देते हैं। फिर अगले मैच में एक और शतक बनाते हैं। टीम में अपनी जगह पक्की कर लेते हैं। उसके बाद साल 2000 आता है। फिक्सिंग को लेकर भारतीय क्रिकेट में एक भूचाल आता है। कई खिलाड़ियों पर आरोप लगते हैं। उधर व्यक्तिगत कारणों से सचिन कप्तानी से हाथ खींच लेते हैं। ऐसे में टीम के उपकप्तान गांगुली को कप्तान बनाया जाता है। फिक्सिंग और बेटिंग से आक्रांत भारतीय क्रिकेट में ये  एक नए युग की शुरुआत थी।

गांगुली में टीम का नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता थी। दरअसल वे जन्मना लीडर थे। उन्होंने कप्तान बनते ही भारतीय क्रिकेट में बड़े बदलाव ला दिए।

पहला,उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम का नए सिरे निर्माण किया। इसमें अनुभव और युवा जोश का अद्भुत समन्वय था। एक तरफ सचिन, द्रविड़, कुंबले और लक्ष्मण थे। दूसरी तरफ तमाम नए खिलाड़ियों को टीम में जगह दी,उन्हें ग्रूम किया और उन्हें भरोसा दिया। सहवाग ,ज़हीर,हरभजन नेहरा,युवराज उनमें से कुछ नाम हैं। 

दूसरे, टीम को आक्रामकता प्रदान की जो अब तक टीम में अनुपस्थित थी। उनका मानना था आक्रमण श्रेष्ठ रक्षण है। वे खुद भी आक्रामक खेल के हिमायती थे और टीम को भी इस भावना से अनुप्राणित किया। अब टीम स्लेजिंग से घबराती नहीं थी बल्कि मैदान में विपक्षियों की ईंट का जवाब पत्थर से देना शुरू किया। इतना ही नहीं टीम हित में ऐसे निर्णय लिए जो और कोई नहीं ले सकता था। जैसे ओडीआई में राहुल से विकेटकीपिंग कराना,सहवाग मध्यक्रम से प्रोमोट करके ओपनिंग कराना। कोलकाता के ऐतिहासिक टेस्ट में लक्ष्मण को नंबर तीन पर भेजना भी एक साहसिक जोखिम भरा निर्णय था।

तीसरे,विदेशों में जीत का सिलसिला शुरू करना। सौरव ने अपनी कप्तानी की शुरुआत ही जीत से की और लगातार इस क्रम को बनाए रखा। कप्तानी में पहली ओडीआई सीरीज दक्षिण अफ्रीका से खेली और जीती। उसी साल आईसीसी नॉकआउट प्रतियोगिता में भारत को फाइनल में पहुंचाया जहां वे न्यूज़ीलैंड से हारे। ये 1983 के बाद पहला फाइनल था भारतीय क्रिकेट टीम का। भारत में ऑस्ट्रेलिया को टेस्ट सीरीज में 2-1 से हराया। 2002 में इंग्लैंड को नेटवेस्ट सीरीज में हराया।  2003 के विश्व कप में भारत को फिर फाइनल तक पहुंचाया जहां वे ऑस्ट्रेलिया से हारे। उसके बाद 2004 में पाकिस्तान को पाकिस्तान में ही टेस्ट और ओडीआई में हराया। 2004 तक आते आते वे भारत के सर्वश्रेष्ठ कप्तान के रूप में स्थापित हो चुके थे। वे अपनी कप्तानी में 49 में से 21 टेस्ट मैच में जीत दिलाते हैं जिसमें से 11 विदेशी धरती पर जीतते हैं,जबकि 15 ड्रा होते हैं। वे 146 एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में कप्तानी कर 76 मैचों में जीत दिलाते हैं।

कई बार महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली को एक कप्तान के रूप में उनसे अधिक सफल और बड़ा क्रिकेटर के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। ये सही है कि धोनी  और कोहली ने भारत को कहीं अधिक सफलता दिलाई। लेकिन भारतीय क्रिकेट के चरित्र को बदलने और भारतीय क्रिकेट को दिशा देने का काम गांगुली ने ही किया। धोनी और कोहली ने गांगुली द्वारा बनाए गए आधार  पर इमारत खड़ी करने का काम किया। गांगुली ने जिस रास्ते का निर्माण किया वे दोनों उस पर आसानी से आगे बढ़ सके। इन दोनों ने उस तरह से टीम का नवनिर्माण करने और भारतीय क्रिकेट को नई दिशा देने का काम नहीं किया जैसा सौरव ने किया। यही सौरव की महानता है और भारतीय क्रिकेट को देन है। दरअसल सौरव जिस नई राह का निर्माण करते हैं, धोनी और कोहली उस पर चलकर ही भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाते हैं।

सौरव अपने समकालीन सचिन,द्रविड़,कुंबले और लक्ष्मण के साथ मिलकर 'फेबुलस फाइव' की निर्मिति करते हैं। ये चारों क्रिकेटर भारत के महानतम खिलाड़ियों की श्रेणी में आते हैं। उनकी वैयक्तिक उपलब्धियां सौरव से कहीं अधिक हैं।उन्होंने क्रिकेट को अपने व्यक्तिगत प्रदर्शन से बहुत अधिक प्रभावित और समृद्ध किया है। लेकिन उन सबमें लीडरशिप का अभाव था। एक कप्तान के रूप में ये सभी असफल रहे या कोई उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं कर सके। भारतीय क्रिकेट को एक दिशा देने और उसके चरित्र को बदल देने का काम सौरव ही कर पाते हैं और इसी कारण  भारतीय क्रिकेट में कपिल के बाद दूसरे सबसे बड़े खिलाड़ी सौरव गांगुली ही ठहरते हैं। 

कपिल क्रिकेट के आभिजात्य को मास में रूपायित करके उसे लोकप्रियता के रथ पर सवार कर देते हैं तो गांगुली एक रक्षात्मक और हारों से सहमे क्रिकेट को हद दर्ज़े की आक्रामकता और सेल्फ बिलीफ के रथ पर सवारकर विजयपथ पर अग्रसारित कर देते हैं। बाकी सब खिलाड़ी इन दोनों का अनुगमन करते हैं।

इतना ही नहीं एक खिलाड़ी के रूप में भी सौरव महान ही ठहरते हैं। वे 113 टेस्ट मैच खेलते हैं जिसमें 16 शतकों की सहायता से 7212 रान्त और 311 एक दिवसीय मैचों में 22 शतकों की सहायता से 11373 रन बनाते हैं। वे मध्यम गति के उपयोगी गेंदबाज भी थे जिन्होंने टेस्ट में 32 और ओडीआई में 100 विकेट लिए।

 वे दाएं हाथ से गेंदबाजी करते और बांए हाथ से बल्लेबाजी। खब्बू खिलाड़ियों के खेल में एक खास तरह की मोहकता,एक एलिगेंस होती है,फिर वो चाहे जो खेल हो। सौरव की बल्लेबाजी में भी कमाल की मोहकता थी। ये अलग बात है वो उतनी और उस तरह की मोहक नहीं थी जैसी युवराज की बैटिंग थी। लेकिन थी तो अवश्य ही। इसका कारण शायद ये हो कि वे उस तरह के स्वाभाविक खब्बू खिलाड़ी नहीं थे जैसे जन्मना खिलाड़ी होते हैं। वे मूलतः दाएं हाथ के खिलाड़ी थे और उन्होंने सायास बाएं हाथ से खेलना सीखा। उनका फुटवर्क कमाल का था और वे समान अधिकार से फ्रंटफुट और बैकफुट पर खेलते। उनकी टाइमिंग लाजवाब थी और हैंड-आई कॉर्डिनेशन भी कमाल का था। ऑफ साइड में क्षेत्ररक्षकों के बीच गैप ढूंढने में वे माहिर थे। उनके ऑफ साइड पर स्कवायर कट और ड्राइव दर्शनीय होते थे। वे इसके मास्टर थे। तभी द्रविड़ उनको 'गॉड ऑफ ऑफ साइड' जैसे विशेषण से नवाजते हैं। और गेंद को बाउंड्री से बाहर मारने में तो उनका कोई सानी नहीं था।

        फिर भी, बिला शक सौरव गांगुली एक अद्भुत नेतृत्वकर्ता थे, एक शानदार बल्लेबाज थे और उपयोगी गेंदबाज तो थे ही। वे एक महान क्रिकेटर थे। आप उनके प्रशंसक हो सकते हैं या आलोचक भी हो सकते हैं। आप उनसे प्यार कर सकते हैं या घृणा भी कर सकते हैं। आप उनके खेल पर फिदा हो सकते हैं या उनकी उपेक्षा भी कर सकते हैं। आप उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ सकते या या उन्हें गालियों से भी नवाज सकते हैं। पर एक बेहतरीन बल्लेबाज, शानदार कप्तान और भारतीय क्रिकेट को आक्रामक तेवर देने के उनके योगदान को नहीं नकार सकते। वे एक सम्पूर्ण क्रिकेटर थे।  वे भारतीय क्रिकेट के मील के पत्थर हैं।

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लव यू दादा।

Monday, 27 June 2022

भारत का दिल,क्रिकेट का सिरमौर


                                                   (गूगल से साभार)

        जीवन बहुत बार एक ही मौका देता है। लेकिन कई बार किस्मत आप पर मेहरबान होती है और आपको दूसरा मौका भी देती है। अब ये व्यक्ति पर  निर्भर करता है कि वो इन मौकों को किस तरह से लेता है। किस्मत ने चंद्रकांत पंडित को एक दूसरा मौका दिया और इस बार उन्होंने चूक नहीं की। चंद्रकांत पंडित ने 1998-99 में कप्तान के रूप में पहली खिताबी जीत के जिस मौके को खो दिया था,उसे 2021-22 सत्र में एक कोच के रूप में पूरा कर रहे थे। 

आज बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में खेले गए फाइनल मैच में मध्यप्रदेश की टीम ने 41 बार की चैंपियन मुम्बई टीम को 6 विकेट से हराकर पहली बार रणजी ट्रॉफी जीत ली। आदित्य श्रीवास्तव इस टीम के कप्तान थे और चंद्रकांत पंडित कोच। 

1951 से रणजी खेल रही मध्य प्रदेश की टीम पहली बार 1998-99 सत्र में पहली बार फाइनल में पहुंची थी। तब चंद्रकांत पंडित मध्यप्रदेश टीम के कप्तान थे। उनका मुकाबला कर्नाटक से था। लेकिन टीम चूक गयी। शायद ये एक बेहतर और नामी गिरामी टीम कर्नाटक के सामने एक युवा टीम की अनुभवहीनता थी कि बेहतर स्थिति में होते हुए भी मध्यप्रदेश की टीम पहली बार चैंपियन नहीं बन सकी। उस बार मध्यप्रदेश की टीम ने पहली पारी में 75 रनों की बढ़त ले ली थी और अंतिम दिन उन्हें जीत के लिए केवल 249 रनों का लक्ष्य मिला। लेकिन टीम चूक गयी और पूरी टीम 150 रनों पर ढेर हो गयी।

इस बार मध्यप्रदेश की टीम ने शानदार प्रदर्शन कर एक बार फिर से फाइनल में प्रवेश किया। लेकिन फेवरिट पृथ्वी शॉ की कप्तानी वाली मुम्बई की टीम ही थी। 41 बार की चैंपियन टीम मुम्बई। पर इतिहास मध्यप्रदेश की टीम को बनाना था। 

टॉस मुम्बई ने जीता और पहले बल्लेबाजी करते हुए 374 रन बनाए। पिछले सत्र से ही शानदार बल्लेबाजी कर रहे सरफराज के 134 रनों और यशस्वी जायसवाल के 78 रनों की मदद से। जवाब में मध्यप्रदेश की टीम ने एक बड़ा स्कोर खड़ा किया। 536 रनों का। इसमें तीन शतक बने। यश दुबे ने 133,शुभम शर्मा ने 116 और रजत पाटीदार ने 122 रन बनाए। चौथे दिन की समाप्ति पर मुंबई के 2 विकेट पर 113 रन बने थे और अभी भी वो मध्यप्रदेश से 49 पीछे थी। मध्यप्रदेश की टीम बहुत बेहतर स्थिति में थी। लेकिन उन्हें कहीं ना कहीं 1998-99 की स्मृति हॉंट कर रही होगी। लेकिन उन्होंने शानदार गेंदबाजी की और मुम्बई को 249 रनों पर आउट कर दिया। उसने 108 रनों  के लक्ष्य को आसानी से 04 विकेट खोकर पा लिया।

अब मध्यप्रदेश की टीम पहली बार रणजी चैंपियन थी और प्रदेश के क्रिकेट इतिहास की नई इबारत  लिखी जा रही थी।

 आखरी ओवर इस सत्र के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी सरफराज़ कर रहे थे जिन्होंने इस सत्र में सर्वाधिक 983 रन बनाए थे। इस समय जीत के लिए टीम को केवल 05 रन चाहिए थे। सरफराज के सामने इस सत्र में दूसरे सर्वधिक 658 रन बनाने वाले रजत पाटीदार थे। टीम के कप्तान आदित्य श्रीवास्तव सामने के छोर पर अपनी कप्तानी में इस नए इतिहास के लिखे जाने के गवाह बन रहे थे। रजत ने सरफराज के इस ओवर की पहली ही गेंद पर चौका लगाया। अब स्कोर बराबर था। उसके बाद अगली दो गेंद डॉट बॉल थीं। उसके बाद रजत ने सामने की ओर बॉल को टैप किया और एक रन ले लिया।

टीम मध्यप्रदेश जीत चुकी थी। सारे खिलाड़ी दौड़ कर मैदान में आ गए। उनके पीछे धीरे धीरे चंद्रकांत पंडित आए और पूरी टीम ने उन्हें कंधों पर उठा लिया।

ये 1998-99 में होना था,नहीं हो सका था,अब हो रहा था। 1998-99 में अधूरा छूट गया सपना साकार रूप ले रहा था। एक टीम की अपने कोच को इससे बेहतर गुरु दक्षिणा और क्या हो सकती थी कि वे उसके अधूरे छूट गए कार्य को पूरा कर रहे थे। 

जीत के बाद पंडित भावुक थे। वे कह रहे थे'लोग कहते हैं जो पिता नहीं कर सका वो बेटे ने कर दिखाया। आदित्य श्रीवास्तव ने ये कर दिखाया।'

                                                      (गूगल से साभार)

अब मध्यप्रदेश की टीम राष्ट्रीय चैंपियन है। रणजी क्रिकेट की राष्ट्रीय प्रतियोगिता है। हर क्रिकेट खिलाड़ी का राष्ट्रीय टीम में खेलने का सपना रणजी ट्रॉफी से होकर ही गुज़रता है। आज भले ही इसकी अहमियत आईपीएल के चलते थोड़ी कम ज़रूर हुई है। लेकिन एक समय था जब इसमें किया गया खिलाड़ी का परफॉर्मेंस उसके राष्ट्रीय टीम में प्रवेश का टिकट हुआ करता था। आज भी है। हर खिलाड़ी का पहला सपना रणजी में खेलना होता था। जैसे आज आईपीएल खेलना है। आज उसकी अहमियत आधी आईपीएल ने बांट ली है। इसके बावजूद आज भी रणजी में खेलना कम गौरव की बात नहीं है और रणजी चैंपियन होना भी।

हर उस खिलाड़ी ने जिसने रणजी में परफॉर्म किया,भारत के लिए खेला। लेकिन इस सब के बावजूद क्या ही कमाल है कुछ ऐसे खिलाड़ी हैं जो रणजी के अद्भुत परफॉर्मर रहे हैं, वे रणजी के चमकते सितारे रहे,पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं खेल सके और अगर एक आध मौका भी मिला तो चल ना सके। हांलाकि उनमें प्रतिभा कूट कूट कर भरी थी। वे क्रिकेट जीनियस थे। याद कीजिए राजेन्द्र गोयल, राजिंदर सिंह हंस, आशीष विंस्टन जैदी, पद्माकर शिवालकर, जलज सक्सेना, वसीम जाफर या फिर अमोल मजूमदार जैसे खिलाड़ियों को। यही नियति है।

वे सभी जिन्होंने 1983 से पहले क्रिकेट को फॉलो किया है,जानते हैं कि ये वो समय था जब रेडियो कमेंट्री क्रिकेट को धीरे धीरे लोकप्रिय बना रही थी। लेकिन अभी भी क्रिकेट बड़े नगरों तक सीमित था। तब क्रिकेट और रणजी विजेता का मतलब मुम्बई,दिल्ली और कर्नाटक हुआ करता था। और तब आता है साल 1983। क्रिकेट विश्व कप भारत क्या आता है,क्रिकेट भारत के हर छोटे बड़े शहर की गलियों तक पहुंच जाता है। अब  इन टीमों को जबरदस्त चुनौती मिलती है। अब उत्तर प्रदेश, हरयाणा,पंजाब से लेकर सौराष्ट्र गुजरात और बंगाल तक चैंपियन बनते हैं और कर्नाटक और दिल्ली के ही नहीं बल्कि मुम्बई के वर्चस्व को भी पूरी तरह समाप्त कर देते हैं।

क्रिकेट के तीन फॉर्मेट की टीम घरेलू प्रतियोगिताएं है- टेस्ट फॉर्मेट की रणजी ट्रॉफी,एक दिवसीय फॉर्मेट की विजय हज़ारे ट्रॉफी और टी-20 फॉर्मेट की मुश्ताक़ अली ट्रॉफी।  वर्तमान सत्र की रणजी चैंपियन मध्य प्रदेश की टीम है तो विजय हज़ारे चैंपियन हिमाचल प्रदेश और मुश्ताक़ अली ट्रॉफी चैंपियन तमिलनाडु है।  धुर उत्तर से सुदूर दक्षिण तक क्रिकेट के चैंपियन मौजूद हैं। दरअसल खेल की सबसे खूबसूरत बात यही वैरायटी और लोकप्रियता है।

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फिलहाल तो रणजी के नये चैंपियन को बहुत बधाई। एक ऐसी टीम को उसके खिलाड़ियों को बहुत बधाई, जिसमें कोई बड़ा नामी गिरामी खिलाड़ी नहीं, पर हर खिलाड़ी चैंपियन है।

Monday, 20 June 2022

बॉलीवुड गीत_09







एक पल तुमको जो ना देखें

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सूरज दहक रहा है। ताप से सारी कायनात झुलसी जाती है।


लेकिन जीवन है सुर्ख हुआ पलाश में गमका जाता है। बासंती सा अमलतास पर खिलखिलाता जाता है। मुस्कान सा हरसिंगार से झरता जाता है।


वो इश्क़ से क्या मिला कि फूलों से उड़कर पर्वतों पर हिम सा बिखरने लगा । नदी में पिघलकर पानी सा बहने लगा। चांदनी सा कायनात पर फैलने लगा।


जीवन है कि हुलस हुलस जाता। पर मोहब्बत है कि कुछ उदास उदास हुई जाती है।


जीवन ने मोहब्बत को हौले से छुआ और खुद में समेट लिया। उसकी उदासी अब किसी जादू सी छूमंतर हुई जाती है।


जीवन ने मोहब्बत से कहा 'तेरे होने से कुछ ना होने का ग़म ज़रा सा लगे। कि घर भरा भरा सा लगे।'


जीवन और मोहब्बत हौले हौले एक दूसरे में घुल रहे हैं। वे कहे जाते हैं-'जो इक पल तुमको ना देंखे तो मर जाये हम'।


इरशाद कामिल अपने शब्दों से इक जीवन बुनते हैं और संदेश शांडिल्य संगीत से इश्क़ का इक दरिया बहाते हैं। श्रद्धा मिश्रा और पापोन अपने सुरों की किश्ती में जीवन को पनाह दे उसे इश्क़ के दरिया में क्या उतारते हैं कि लब गुनगुना उठते हैं-


'खो गई है तू मुझमें आ गई तू वहां

मिल रहे हैं जहां पे ख्वाब से दो जहां'



Sunday, 5 June 2022

एक खबर:एक पाती

                                                    (गूगल से साभार)


खबर

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 ये 28 मई 2022 का दिन था। पेरिस के स्टेडियम फ्रांस में चैंपियंस ट्रॉफी का फाइनल लिवरपूल और रियाल मेड्रिड के बीच खेला जा रहा था। उस मैच में रियाल ने लिवरपूल को  1-0 से हराकर 14 वीं बार चैंपियंस ट्रॉफी जीती थी। रियाल राफेल नडाल की पसंदीदा टीम है और उस दिन राफा अपनी पसंदीदा टीम का समर्थन करने के लिए वो मैच देख रहे थे। ठीक आठ दिन बाद अपनी पसंदीदा टीम की तरह वे भी 14वीं बार मस्केटियर ट्रॉफी जीत रहे थे। संयोग ऐसे ही होते हैं।

आज शाम रोलां गैरों के फिलिप कार्टियर अरीना में  36 वर्षीय राफेल नडाल अपने से 13 साल छोटे 23 वर्षीय नॉर्वे के कैस्पर रड को बहुत आसानी से 6-3,6-3,6-0 से हराकर अपना 22वां ग्रैंड स्लैम खिताब जीत रहे थे। रड अपना पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल रहे थे। वे राफा की टेनिस अकादमी के पूर्व छात्र थे। यानी ये गुरु शिष्य के बीच मुकाबला था। और गुरु ने बताया कि गुरु गुरु ही होता है।

इस साल जब जनवरी में राफा ऑस्ट्रेलियाई ओपन खेल रहे थे तो 21 नंबर की चर्चा सबसे ज़्यादा थी। उन्होंने वो नंबर अविश्वसनीय ढंग से प्राप्त किया। लेकिन इस बार 22 से ज़्यादा 14 नंबर महत्वपूर्ण था। 2005 में उन्होंने पहला फ्रेंच ओपन जीता था और वे ग्रैंड स्लैम जीतने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी थे। इन 18 सालों में वे 14वां फ्रेंच ओपन जीत रहे थे तो वे सबसे अधिक उम्र फ्रेंच ओपन जीतने वाले खिलाड़ी बन रहे थे। ये अविश्वसनीय है। लेकिन महान खिलाड़ी वही होता है जो असंभव को इतना आसान बना देता है कि अविश्वसनीय उपलब्धि भी साधारण प्रतीत होने लगती है। 

दरअसल एक प्रतियोगिता को 18 में से 14 बार जीतना  उन्हें टेनिस का 'गोट'नहीं बनाई बल्कि सम्पूर्ण खेल जगत का 'गोट'भी बनाती है। ये असाधारण उपलब्धि है।

दरअसल लाल मिट्टी पर राफा खेलते नहीं बल्कि वे अपने खेल से किसी राग की बंदिश रचते है,कोई प्रेम में पगा पत्र लिखते है,जादू का कोई खेल दिखाते है और आप हैं कि उसके खेल के सम्मोहन में पड़ जाते हैं। 


आज राफा पर क्या लिखना बल्कि राफा को लिखना है। एक पत्र। राफा के नाम।

                                       (ट्विटर से साभार)

पाती

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प्रिय राफा,

      मैं जानता हूँ कि तुम 'मस्केटियर ट्रॉफी' के अनन्य प्रेम में हो। और मैं तुम्हारे खेल के प्रेम में आपादमस्तक डूबा हूँ।

शायद तुम जानते हो प्रेम में दो चीजें सबसे अनोखी और ज़रूरी होती हैं जिनकी वजह से प्रेम में सघनता और तरलता दोनों एक साथ बनी रहती है? 

एक प्रतीक्षा! 

और दूसरा प्रेम पत्र!

प्रेम में प्रतीक्षाएँ होती हैं। और खूब होती हैं। प्रतीक्षाएँ बेचैनियां पैदा करती हैं। और इन बेचैनियों में अलग सुख है। अपने यथार्थ को तसव्वुर में जीने का सुख। लोग जो प्रेम में हैं,वो समझते हैं कि तसव्वुर में जीना यथार्थ को कितना बेहतर,कोमल और खूबसूरत बना देता है। ये प्रेम को घनीभूत करता। सघन बनाता है।

और प्रेम में पत्र भावनाओं की अभिव्यक्ति को उड़ान देता है। प्रेम में पत्र मन की अंतरतम भावनाओं को जुबान देता है। पत्र जिसमें भावनाएं किसी नदी की तरह बह निकलती हैं, बारिश की तरह बरसने लगती हैं,खुशबू की तरह महकने लगती हैं,धूप की तरह चमकने लगती हैं। पत्र जो अंतर्मन को भिगो भिगो  देता है। प्रेम में पत्र प्रेम को सूखने से बचाते हैं। उसे बदरंग होने से बचाते हैं। दरअसल 'प्रेम पत्र' प्रेम को तरल बनाये रखते हैं।

हम जानते हैं , तुम चाहे दुनिया के किसी भी कोने में खेलते रहो, किसी भी मैदान पर अपने खेल सेसम्मोहित करते रहो, तुम प्रतीक्षारत रहते ही हो कि कब वो घड़ी आए कि तुम रोलां गैरों की लाल मिट्टी पर अपने प्रेम के सुर छेड़ सको,'मस्केटियर' को रिझा सको और उसका स्पर्श पा सको। अपने हाथों में उठाकर अपने अंक में समेट सको, उसको चूम सको,उसके प्रेम में रो सको,अपने आंसुओं से बहे प्रेम से उसे सराबोर कर सको। कितनी खूबसूरत होती है ना ऐसी प्रतीक्षाएं। तुमसे बेहतर और कौन जान सकता है।

और फिर प्रतीक्षा खत्म होती है। तुम किसी पागल दीवाने से रोलां गैरों चले आते हो, अपने रैकेट और बॉल से लाल माटी पर एक ऐसा खूबसूरत प्रेम में पगा पत्र लिखते हो कि उसे बांचने 'मस्केटियर' किसी दीवानी सी तुम्हारे पास चली आती है। यूं उसे  रिझाने तो ना जाने कितने चले आते हैं। पर तुम सा संगीत कौन छेड़ पाता है। तुम सा पत्र लिखने  की सलाहियत किसी में कहां आ पाती है। तुम सा प्रेमी कौन हो पाता है। साल दर साल यही चला होता चला आता है। हैं ना।

तुम्हारी तरह हम भी साल भर प्रतीक्षारत रहते हैं।  तुम्हारे खेल को जीने की प्रतीक्षा में, लाल मिट्टी पर तुम्हारे खेल के जादू से सम्मोहित होने प्रतीक्षा में, तुम्हारे रैकेट से निकले संगीत को सुनने की प्रतीक्षा में, तुम्हारे प्रेम पत्र को पढ़ने की प्रतीक्षा में, 'मस्केटियर' को तुम्हारे हाथों में देखने की प्रतीक्षा में,उसके मिलन से निकले खुशी के आंसुओं में डूब जाने की प्रतीक्षा में,तुम्हें उसे चूमता हुए देखने की प्रतीक्षा में। ये तुम्हारी जीत की गंध इतनी मादक होती है ना कि साल भर मदहोशी बनी रहती है।

तुम साल दर साल आते हो और एक प्रेम पत्र लिख जाते हो। तो तुम्हारे खेल के प्रेम में पड़कर इस बार मैंने भी एक चिट्ठी तुम्हारे नाम लिखी है। जानते हो पहली बार बचपन में पहले क्रश को लिखा था 'तुम बहुत ख़ूबसूरत हो'। दूसरी बार, जवानी में प्रेमिका को लिखा 'तुम मुझे खत लिखना'। तीसरा,जीवन के तीसरे पहर तुम्हारे खेल की दीवानगी में,तुम्हारे नाम 'तुम सा कोई नहीं'।

पर इस बार ये दीवानगी चार शब्दों में कहां समा पाएगी। और इस लंबी पाती में भी कहाँ समा पाएगी भला।

तुम जानते हो कितने ही लोग दुनिया भर में कितनी कितनी जगहों पर जाते हैं किसी खास मकसद से। राहुल सांकृत्यायन खोए ज्ञान को खोजने के लिए दुनिया भर की यात्रा करते हैं। असगर वजाहत अपनी जड़ों को खोजने और पांच सौ साल पहले भारत आए अपने पूर्वजों के निशान ढूंढने ईरान के दुर्गम इलाकों की यात्रा करते है। अमृत लाल बेगड़ भक्ति भाव से नर्मदा के सौंदर्य लोक में अवगाहन करने के लिए नर्मदा परिक्रमा करते हैं। ओमा शर्मा अपने अनन्य प्रेरणा स्रोत और गुरु स्टीफेन स्वाइग की आत्मा को महसूसने को ऑस्ट्रिया के चप्पे चप्पे को छान मारते हैं। मानव कौल खुद को ढूंढने यूरोप की खाक छानते हैं। उधर अनिल यादव पूर्वोत्तर भारत को पूर्वोत्तर भारत में खोजने में बरसों बिता देते हैं। एक अकेली लड़की अनुराधा बेनीवाल 'एकला चलो' की तर्ज़ पर बिना संसाधनों के यूरोप भर में भटकती है और  दुनिया भर की लड़कियों से घुमक्कड़ बन जाने का आह्वान करती है। 

जानते हो राफा ऐसे ही मैं भी दुनिया भर की अनेकानेक जगहों पर जाना चाहता हूँ,उन्हें महसूसना चाहता हूँ।  मैं हिसार की उन गलियों को देखना चाहता हूँ जिनमें साइना ने सारे बंधनों को तोड़कर आकाश में उन्मुक्त उड़ान सीखी।  पयोली की मिट्टी को छूकर धन्य होना चाहता हूँ जिसने उषा के पैरों को असीमित गति और शक्ति भरी। मणिपुर के गांव कंगथेई की उस हवा को महसूस करना चाहता हूँ जिसमें मैरी कॉम के मुक्कों को फौलादी ताकत मिली। मैं पाकिस्तान में लाहौर के उस ट्रैक को अपनी आंखों से देखने का सुख चाहता हूँ जहां मिल्खा 'उड़न सिख' बने थे।  

और इंग्लैंड में लॉर्ड्स के मैदान के पवेलियन में भी तो एक बार बैठना बनता है जिसमें 1983 जीत ने भारत में एक खेल को धर्म बना दिया और कुआलालंपुर के मरडेका स्टेडियम का एक चक्कर लगाकर दो आँसू भी तो बहाने हैं जहां भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी का सितारा अंतिम बार चमका। 

और जर्मनी में बर्लिन के ओलंपिक स्टेडियम जाकर एक बार गर्व करना चाहता हूँ जहां ध्यानचंद ने हिटलर के ऑफर को ठुकराया था।

मैं अर्जेंटीना के सांता फे प्रान्त में पारणा नदी के पश्चिमी तट के उस सौंदर्य को निहारना चाहता हूँ जहां मेस्सी और रोजुक्के कि प्रेम कथा ने जन्म लिया और अर्जेंटीना के शहर लानुस को भी तो देखे बिना कैसे रहा जाएगा जहां माराडोना जैसा खिलाड़ी जन्म लेता है। ब्राजील के साओ पाउलो प्रांत के कस्बे बोरु में चाय की चुस्कियों के साथ महसूस करना चाहता हूँ कि कैसे चाय की दुकान पर काम करते हुए पेले ने फुटबॉल के गुर सीखे और दुनिया का महानतम फुटबॉलर बना। और अमेरिका के कैलिफोर्निया के जंगलों में जाकर एक बार ज़ार ज़ार रोकर कोबे को श्रद्धांजलि देना चाहता हूँ।

दिल मे ऐसी ही हज़ारों ख्वाहिश हैं जिन्हें पूरा होना है। पर जानते हो राफा अगर ये ख्वाहिश ना भी पूरी हों तो बस एक ही ख्वाहिश रहेगी फ्रांस के शहर पेरिस को देखने की। इसलिए नहीं कि सीन नदी के किनारे बसा पेरिस दुनिया का सबसे सुंदर शहर है,कि वो दुनिया की फैशन राजधानी है,कि रोमन सभ्यता की विरासत के सबसे खूबसूरत अवशेष इस शहर में हैं,बल्कि इसलिए कि ये दो 'लिविंग लीजेंड' का शहर है। ये मेस्सी शहर है, राफा का शहर है। इस शहर में 'पार्क द प्रिंसेस'है इस शहर में 'रोलां गैरों' है। और इन दो जादू घरों में अनंत काल तक के लिए दो जादूगरों के जादू के तिलिस्म में खो जाने की ख्वाइश से इतर और कोई क्या ख्वाईश हो सकती है।

 और ये भी कि अगर इन दोनों में भी किसी एक को चुनना हो तो 'फिलिप कार्टियर अरीना' से खूबसूरत चयन क्या हो सकता है। फिलिप कार्टियर अरीना, मैं और तुम्हारे खेल का जादू। इससे बेहतर दुनिया में और क्या हो सकता है।

विंसेंट नवार्रो अपरिसिओ हो जाने की चाहत के अलावा और क्या चाहा जा सकता है।

नवार्रो, सुपर फैन नवार्रो। जानते हो ना। वही नवार्रो जो स्पेनिश फुटबॉल क्लब वेलेंसिया का अनोखा फ़ैन था। वेलेंसिया क्लब का मेम्बर नंबर 18,  जो  साठ के दशक से अपनी मृत्यु तक लगातार वेलेंसिया के हर मैच में उपस्थित रहा था। सबसे बड़ी बात तो यह कि 54 साल की उम्र में दृष्टिहीन हो जाने के बावजूद  उसने वेलेंसिया का कोई भी मैच नहीं छोड़ा। वेलेंसिया के घरेलू मैदान मेस्तला स्टेडियम के ट्रिब्यूना सेंट्रल सेक्शन की 15वीं पंक्ति की सीट न.164 पर बैठकर अपनी दृष्टिहीनता के बावजूद स्टेडियम के वातावरण और बेटे के आंखों देखे हाल से हर मैच का आनंद लेता। 2017 में वेलेंसिया के उसकी मृत्यु हुई।और तब क्लब ने उसके सम्मान में 2019 में उसकी उस सीट पर उसकी कांसे की मूर्ति स्थापित कर दी।

 दस मार्च 2020 को चैंपियंस लीग के प्री क्वार्टर फ़ाइनल मैच के दूसरे चरण के मैच में वेलेंसिया क्लब अतलांता क्लब को अपने घरेलू मैदान मेस्तला स्टेडियम में होस्ट किया। कोरोना के कारण ये मैच बिना दर्शकों के आयोजित करने का निर्णय लिया गया। लेकिन यह कैसे संभव हो सकता था कि मेस्तला स्टेडियम में नवार्रो उपस्थित न हो. सेंट्रल ट्रिब्यूना सेक्शन की 15वीं पंक्ति की सीट नंबर 164 पर वेलेंसिया टीम का अनोखा दीवाना नवार्रो  इस बार भी बैठा था। सच में क्या ही कमाल है उस मैच का नवार्रो एकमात्र दर्शक था, जो अकेले किसी राजा की तरह उस मैच का आनंद ले रहा था।

मैं भी नवार्रो की तरह एकांत में उस अद्भुत संगीत का आनंद लेना चाहता जो तुम अपने खेल से रचते हो। जब तुम लाल बजरी पर लय में खेलते हो तो वो किसी राग की बंदिश से कम कहाँ होता है। ऐसी बंदिश जिसके सम्मोहन में एक बार बंध जाएं तो फिर कभी मुक्त ही ना होना चाहें। कितनी बंदिशें तुमने उस अरीना में बिखरे दी है जो अब हमेशा के लिए रोलां गैरों में कोने कोने में व्याप गयी होंगी जिन्हें आने वाले अनंत काल तक सुना जा सकता है।

इस बार तुम यहाँ आये तो आये। आगे शायद तुम ना आ पाओ। समय हाथों से फिसल जो रहा है। जब तुम कहते हो कि 22वां खिताब कुर्बान करके तुम नया पैर लेना चाहोगे तो समझ में आता है तुम्हारी चोटों का क्या हाल है।

तुम्हें तुम्हारा ये प्यार मुबारक। ये जीत मुबारक।

राफा तुम खिलाड़ी कहां तुम तो कमाल हो।

                                              


                                                     तुम्हारा प्रशंसक

Saturday, 28 May 2022

खेल भावना

 



'कोई भी जीत आपके आशीर्वाद के बिना अधूरी है।'

 निखत ज़रीन के ये शब्द उनके हाल में जीते स्वर्ण पदक की चमक को इस कदर बढ़ा देते हैं कि उसकी चमक में सारे गिले-शिकवे,अहम, ईर्ष्या,राग-द्वेष सब घुल जाते हैं।

निसंदेह निखत की जीत बड़ी है। लेकिन निखत के ये शब्द उसकी जीत को बहुत बहुत बड़ा बना देते हैं।

दरअसल ये खेल ही है जो खिलाड़ी को थोड़ा ज्यादा विनम्र बनाते हैं,उसे कुछ और ज़्यादा झुकना सिखाते हैं,उसे थोड़ा अधिक मनुष्य बनाते हैं।

इन शब्दों ने एक बार फिर सिद्ध किया कि हमारे जीवन के सद्भावना, मैत्री, प्रेम और सहयोग के सबसे ख़ूबसूरत दृश्य खेल मैदानों से ही आते हैं।

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निखत को और उसकी खेल भावना को सलाम।


Wednesday, 18 May 2022

'पहली जीत' की त्रयी



ऐसा कई बार होता है कि कोई खास क्षण, कोई दिन या फिर समय का कोई खास काल खंड खास आप के लिए बना होता है। आज का तो हर क्षण, आज का पूरा दिन और 09 से 15 मई,2022 का काल खंड केवल और केवल भारतीय पुरुष बैडमिंटन टीम के लिए ही बना था। एक ऐसा क्षण,एक ऐसा दिन और एक ऐसा काल खंड जिसने भारतीय खेल पटल पर एक नए इतिहास को


लिख देना था। नहीं तो 09 मई से पहले किसने सोचा था कि टीम इंडिया 'टीम चैंपियन' बनने जा रही है।

थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक के उपनगर नॉनताबूरी के इम्पैक्ट अरीना में थॉमस कप में आज पहली बार फाइनल खेल रहा भारत, 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया पर 2-0 की बढ़त बना चुका था। अब तीसरे मैच में भारत के. श्रीकांत इंडोनेशिया के जोनाथन क्रिस्टी के विरुद्ध दूसरे गेम में 22-21 के स्कोर पर चैंपियनशिप के लिए सर्विस कर रहे थे। उन्होंने सर्विस की। एक छोटी रैली हुई। क्रिस्टी के एक डीप हाई रिटर्न पर श्रीकांत ने ऊंची छलांग लगाई और शानदार क्रॉस कोर्ट स्मैश लगाया। इस स्मैश का क्रिस्टी के पास कोई जवाब नहीं था। दरअसल श्रीकांत का ये  स्मैश ना केवल बैडमिंटन की चैंपियन टीम का मानमर्दन कर रहा था बल्कि पूर्व विजेता इंडोनेशिया पर  3-0 की जीत दिला कर भारत को नया चैंपियन भी बना रहा था। श्रीकांत की ये छलांग सही मायने में भारतीय टीम की बैडमिंटन के आसमां पर शोहरत की नई उड़ान थी जिससे भारत के बैडमिंटन को नई बलन्दी पर पहुंच जाना है।

जैसे ही किदाम्बी श्रीकांत ने विजयी स्मैश लगाया,सबसे पहले दौड़कर लक्ष्य सेन कोर्ट पर आए और किदाम्बी से लिपट गए। उसके पूरी टीम कोर्ट पर थी। वे जीत का जश्न मना रहे थे। तिरंगा लहरा रहे थे। भारत की जीत और खुशियों के रंग से पूरा इम्पैक्ट अरीना सराबोर था। 

इस बार भारत की टीम सफेद और काले रंग की पोशाक में खेल रही थी। मानो वे इस बार ये निश्चय करके आएं हो कि या तो चैंपियन बनना है या तो हार जाना है। कोई आधी अधूरी जीत नहीं। श्वेत या स्याह। बीच का कोई ग्रे शेड नहीं। खिलाड़ियों के जोश,जज़्बे और हुनर से उनके हिस्से सुफेद रंग आया जिसमें जीत के चमकीले रंग भर जाने थे,तिरंगे के रंग बिखर जाने थे।

ऐसा नहीं है कि भारतीय बॅडमिंटन का ये कोई पहला स्वर्णिम क्षण था। प्रकाश पादुकोण, सैय्यद मोदी,पुलेला गोपीचंद,साइना नेहवाल,पीवी सिंधु और के. श्रीकांत ने विश्व पटल पर भारत को स्वर्णिम उपलब्धियां दिलाईं हैं। भारत को एक पहचान दी। लेकिन ये सब खिलाड़ियों की वैयक्तिक उपलब्धियां थी। एक टीम के रूप में भारत कहां ठहरता था। ये पहली बार है टीम में इतनी गहराई है कि भारत के नंबर एक खिलाड़ी लक्ष्य सेन के क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल मैच हारने के बाद भी टीम पहली बार फाइनल में पहुंचती है और जीत हासिल करती है।

आज फाइनल में पहला मैच लक्ष्य सेन और एंथोनी जिनटिंग के बीच था। पहला गेम वे 08- 21 से हार गए। लगा सेन अपने पहले दो मैच का परफॉर्मेंस दोहराने वाले हैं। लेकिन बड़ा खिलाड़ी वही होता जो ऐन बड़े मौके पर परफॉर्म करता है। आज लक्ष्य ने ऐसा ही किया। उन्होंने अगले दो गेम 21-17 और 21-16 से जीतकर भारत को 1-0 की बढ़त दिला दी। ये मैच 65 मिनट चला। अगला युगल मैच  भारतीय नंबर एक जोड़ी चिराग शेट्टी और सात्विकसाइराज रैंकिरेड्डी का इंडोनेशियाई जोड़ी अहसान और सुकोमुलजो से था। भारतीय जोड़ी इस समय ज़रबर्दस्त फॉर्म में थी और इस बार भी उसने निराश नहीं किया। 70 मिनट चले संघर्षपूर्ण मैच मैच में भारतीय जोड़ी ने 18-21, 23-21 और 21-19 से जीत हासिल कर भारत को 2-0 की बढ़त दिला दी। अब भारत का खिताब लगभग तय हो गया था। क्योंकि अगला मैच किदाम्बी श्रीकांत का था  जो इस समय शानदार फॉर्म में थे और अभी तक अजेय थे। उन्होंने केवल 48 मिनट में जोनाथन क्रिस्टी को 21-15 और 23-21 से सीधे सेटों में हराकर भारत को अविस्मरणीय जीत दिला दी।

भारत की इस जीत में एक नाम और लिया जाना बाकी है जिनकी फिनाले में ज़रूरत ही नहीं पड़ी। और वो नाम है एच एस प्रनॉय का। सेमीफाइनल में भारत ने डेनमार्क को 3-2 से हराया था। पहला मैच लक्ष्य सेन हार गए। इसके बाद चिराग और सात्विक की जोड़ी और किदाम्बी ने अपने मैच जीतकर भारत को 2-1 की बढ़त दिला दी। लेकिन भारत की दूसरी युगल जोड़ी कृष्णा प्रसाद और विष्णुवर्धनमैच हार गए। अब निर्णायक मैच में सारा दारोमदार प्रनॉय पर था। प्रनॉय ने रासमस गेमके को 13 -21,21-9,21-12 से हराकर फाइनल में पहुंचाया। ठीक यही परफॉर्मेंस प्रनॉय ने क्वार्टर फाइनल में दी थी। लक्ष्य और  प्रसाद कृष्णा की जोड़ी अपने मैच हार गए। जबकि किदाम्बी और चिराग सात्विक की जोड़ी ने अपने मैच जीते थे। 2-2 की बराबरी पर प्रनॉय ने निर्णायक मैच लोंग जुन हाओ को 21-13 और 21-08 से हराकर भारत को सेमीफाइनल में पहुंचाया।

इस प्रतियोगिता में भारत को चीनी ताइपे ,जर्मनी और कनाडा के साथ ग्रुप सी में रखा गया था। ग्रुप स्टेज में भारत ने कनाड़ा और जर्मनी को 5-0 से हराया, जबकि चीनी ताइपे से करीबी मुकाबले में 2-3  से हार गया। इस प्रकार भारत ने अपने ग्रुप में दूसरे स्थान पर रहकर क्वार्टर फाइनल के लिए क्वालीफाई किया।

यदि भारतीय खेलों में टीम गेम की बात की जाए तो हॉकी में ओलंपिक में स्वर्णिम जीत के अलावा उसके खाते में केवल दो अविस्मरणीय जीत हैं। एक,1975 में कुआलालंपुर में फाइनल में एक बेहद संघर्षपूर्ण मैच में पाकिस्तान को 3-2 से हराकर पहली बार हॉकी विश्व कप जीतना। दो, 1983 में लॉर्डस, इंग्लैंड में दो बार की विश्व चैंपियन लगभग अजेय टीम वेस्टइंडीज को 43 रन से हराकर पहली बार क्रिकेट विश्व कप जीतना। अब बॅडमिंटन टीम ने पहली बार थॉमस कप जीतकर 'पहली जीत' की त्रयी की निर्मिति की है।

यदि हॉकी और क्रिकेट में पहली  विश्व कप जीत की बात करें तो जीत के प्रभाव की दृष्टि से ये दोनों जीत भारतीय खेलों के लिए एकदम विपरीत प्रभाव वाली परिघटनाएं सिद्ध हुईं। हॉकी की ये जीत अभी हाल के हॉकी के पुनरुत्थान से पहले की आखरी बड़ी जीत साबित हुई। इस जीत के बाद का भारतीय हॉकी का सफर गर्त में जाने का सफर था। जो  2008 में ओलंपिक में क्वालीफाई ना कर सकने पर पूर्ण हुआ। दूसरी तरफ  क्रिकेट में जीत  भारतीय क्रिकेट की प्रगति और लोकप्रियता के शिखर पर जाने की कहानी है।

तो बैडमिंटन में इस पहली जीत का भारतीय बैडमिंटन में क्या प्रभाव होगा ये देखा जाना रोचक और ज़रूरी होगा। ये इसलिए भी ज़रूरी है कि प्रभाष जोशी के शब्दों में कहें तो 'खेल केवल खेल नहीं होते।' भारत के बैडमिंटन में बढ़ते प्रभाव को अन्य महारथी खेल शक्तियां इसे किस रूप में लेती हैं और आगे खेल नियमों में किस तरह के बदलाव होंगे और भारत किस तरह से इस पर प्रतिक्रिया करेगा,ये सबसे महत्वपूर्ण होगा। हॉकी की तरह या क्रिकेट की तरह।

खैर इस प्रश्न को भविष्य पर छोड़ देना बेहतर। फिलहाल ये जीत सेलिब्रेट करने का समय है। ये जो पहली जीत की खुश्बू है ,उसका रोमांच है ,उसका रोमान है,उसका नशा है बिल्कुल पहले प्यार का सा होता है।

०००००

तो भारतीय बैडमिंटन टीम को ये पहली जीत,ये रोमांच,ये रोमान और ये नशा बहुत बहुत मुबारक।

बुक मार्क_मारीना

 



'...कोई ऐसा जो मेरे झरते हुए जीवन में वसंत की तरह था...'

एक किताब के भीतर की यात्रा के दौरान जो भी सहायक उपकरण होते हैं,उनमें बुकमार्क मुझे सबसे अहम और आकर्षक  लगता है।
मेरे जाने ये एक अभिनव प्रयोग है। जब आप 'मारीना' पढ़ते हैं तो आपको कहीं बाहर से बुकमार्क नहीं जुगाड़ना पड़ता। ये कहन में 'इन बिल्ट' हैं। ऐसे खूबसूरत बुकमार्क जो पढ़ते हुए शायद ही कभी आपके हाथ लगे हों। ये मारीना की जीवन यात्रा से होकर गुजरने वाले पाठक के लिए ठहरने के ठिकाने हैं। अगले पड़ाव के प्रस्थान स्थल हैं। ये आपको यात्रा के एक हिस्से को पूरा करने का सुकून ही नहीं देते,  बल्कि एक व्यग्रता, एक बेचैनी,छटपटाहट भी पैदा करते हैं और आगे जाने की,ज़ियादा और ज़ियादा  जानने की। ये दिमाग को मथते जाते हैं और दिल को सहलाते भी चलते हैं, एक साथ।
अगर इस किताब में सिर्फ और सिर्फ बुकमार्क होते और कुछ भी ना होता तो भी ये अपने आप में मुकम्मल किताब होती। 
आप पूछेंगे ऐसे खूबसूरत बुकमार्क भी होते हैं क्या? 
मैं कहूंगा मारीना पढ़ो ना।
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एक बुकमार्क की इबारत है-
'वापसी शब्द अजीब है। वापसी देह की संभव है,लेकिन वापसी पर सब कुछ वैसा ही हो-जैसा हम छोड़कर गए थे,ऐसा कहां होता है।' मारीना ने अपने कटे हुए बालों की लटों को कान के पीछे अटकाते हुए कहा।
'हां, जीवन की तरह।'बेसाख्ता मेरे मुंह से निकला।
'बिल्कुल।' उसने मेरी और देखते हुए कहा
'जीवन की ही तरह। हम आते हैं एक तरह से ही दुनिया में,लेकिन वापसी तक सबकी अलग अलग यात्रा होती है। जीवन यात्रा।'
'निर्वासन भी यात्रा ही थी।' मैं कहती हूँ। इस कहन में सवाल भी है।
'हां, निर्वासन भी यात्रा रही,कठिन बीहड़ यात्रा,बचपन से निर्वासन,देश से निर्वासन,जीवन से निर्वासन।'
हम दोनों खामोश हो गए। सूरज हमारे सामने ढल रहा था। ढल रहा था हमारे भीतर भी बहुत कुछ।

फुटबॉल नर्सरी मिनर्वा अकादमी और रंजीत बजाज

  एक बड़ी चकाचौंध में छोटी सी कोई गहमागहमी अनदेखी रह जाती है। बड़े इवेंट के बीच छोटा सा इवेंट अनचिह्ना रह जाता है। बड़े बड़े संघर्षों के बी...