Wednesday, 11 July 2018

फुटबॉल विश्व कप 2018_7



जब नीले पानी ने लाल आग को ठंडा कर दिया
--------------------------------------------------- 
याद कीजिये 1998 का विश्व कप। ये फ्रांस की धरती पर खेला जा रहा था। ठीक 20 साल और 2 दिन पहले 8 जुलाई 1998 को फ्रांस की टीम क्रोशिया को 2-1  से हराकर फाइनल में पहुंच रही थी और उसके चार दिन बाद 12 जुलाई 1998 को ब्राज़ील को 3 -1 से हराकर अपना पहला विश्व कप जीत रही थी। तब से लेकर आज तक केवल सीन और सेन नदी में ही बहुत पानी नहीं बह चुका है बल्कि पूरे यूरोप के भू-राजनैतिक दृश्य पटल में भी काफी बदलाव आ चुका है।अगर इस बीच कुछ नहीं बदला है तो एक व्यक्ति फ्रांस के दिदिए डेशचेम्प की भूमिका नहीं बदली है। 1998 में 29 वर्ष की अवस्था में वे अपने नेतृत्व में फ्रांस को विश्व कप दिलवा रहे थे और आज 49 वर्ष की अवस्था में भी वे यही काम कर रहे हैं। बस जगह में परिवर्तन हुआ है। उस समय में वे कप्तान के रूप में मैदान के अंदर थे और अब कोच के रूप में मैदान के बाहर। 1998 का कारनामा दोहराएं जाने में बस एक कदम बाकी है। लेकिन क्या ही विडम्बना है कि 1998 में उनके एक साथी थे 20 वर्षीय युवा थिअरी हेनरी। कल दिदिए डेशचेम्प के साथ वे भी उपस्थित थे। लगभग उसी भूमिका में। लेकिन उनके साथ नहीं थे। उनके सामने खड़े थे। बेल्जियम के सहायक कोच के रूप में।
          जिस समय फ्रांस ने अपना पहला विश्व कप जीता था,उससे कुछ समय पहले ही रूस से एक बयार उठी थी खुलेपन और उदारीकरण की जिसने धीरे धीरे पूरे विश्व को अपने प्रभाव में ले लिया। बाइपोलर विश्व व्यवस्था की जगह यूनिपोलर विश्व व्यवस्था आकार ले रही थी। राज्यों की सीमाओं के बंधन कम होने लगे ,बंधन टूटने लगे,जकड़नें ख़त्म होने लगी और एक ग्लोबल विलेज की संकल्पना जन्म लेने लगी। इस संकल्पना के जो परिणाम रहे हों पर पर जब ये दोनों टीमें कल मैदान में उतरी थीं तो उस भावना की सबसे बेहतरीन नुमाईंदगी कर रहीं थीं। बेल्जियम टीम के मुख्य कोच स्पाहनी थे ,सहायक कोच फ्रेंच और मुख्य स्ट्राइकर अफ्रीकी मूल के खिलाड़ी थे। तो दूसरी तरफ फ्रांस के भी एक दो नहीं बल्कि कई खिलाड़ी अफ्रीकी मूल के थे। दरअसल दोनों टीमों का एक कॉस्मिक चरित्र था  और उस भावना के प्रति शायद एक ट्रिब्यूट भी । लेकिन ये भी विडम्बना ही है कि ऐन उसी वक्त जिस विश्व कप में ये खेल रहीं थीं वो धीरे धीरे स्थानिकता में बदल रहा था। अफ्रीकी टीमें पहले ही दौर में बाहर हो गईं, एक मात्र बची एशियाई टीम प्री क्वार्टर फाइनल में बाहर हो गई,बची दोनों दक्षिण अमेरिकी टीमों ने क्वार्टर फाइनल में विदा ले ली और तब विश्व कप यूरोपीय कप में तब्दील हो गया। और जब ये दोनों टीमें कल मैदान में उतरीं तो लगा कि कोई इंग्लिश प्रीमियर लीग का कोई मैच होने को है क्योंकि कल उस लीग के 13 खिलाड़ी खेल रहे थे। 9 बेल्जियम की तरफ से और 4 फ्रांस की तरफ से।
      'लेस ब्लू' और 'रेड डेविल्स' टीमों के बीच का ये मैच दरअसल नील वर्णी पानी और रक्तिम आग के बीच मुकाबला जैसा था बिलकुल अपने नामों और जर्सी के रंग जैसा। अगर फ्रांस की टीम पानी की तरह पूरे मैदान में बहुत ही सहज और सरलता से  बहती रही और विपक्षी टीम की दरारों के बीच से बहकर गंतव्य पर निशाना साधती रही तो बेल्जियम की टीम बार बार आग सी दहकती हुई विपक्षी गोल पर भड़कती रही। खेल की शुरुआत फ्रांस ने की और पहले तीन मिनट तक गेंद पर इस तरह से कब्जा रखा कि बेल्जियम को गेंद  छूने तक को नहीं मिली मानो पानी आग  का ताप  परख रहा है। लेकिन फ्रांस का ये तीन मिनट का कब्जा किसी ज्वलनशील पदार्थ सा आग को भड़काने के लिए पर्याप्त था।  बेल्जियम की टीम ने अगले 20  मिनट तक खेल पर नियंत्रण रखा और कई बार हमले किए। आक्रमण की धार का इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता कि 21वें  मिनट तक बेल्जियम की टीम ने चार कार्नर अर्जित किए। जबकि उस समय तक फ्रांस एक भी कार्नर नहीं ले पाई थी।बेल्जियम के चौथे कार्नर पर जब बॉल पेनल्टी बॉक्स के ऊपर से डिफेंडर टोरी एल्डरवीराल्ड ने बाएं पाँव से बहुत जोरदार किक लगाई जिसका फ्रांस के गोलकीपर ने शानदार बचाव किया।अगर ये गोल होता तो प्रतियोगिता के बेहतरीन गोलों में से एक होता। इसके बाद मानो पानी को हल्का सा ढलान मिल गया हो।पानी एक बार फिर बेल्जियाई गोल की तरफ बहाने लगा। फ्रांस ने भी प्रत्याक्रमण शुरू किए और 25वें मिनट में पहला कॉर्नर लिया। आक्रमण-प्रत्याक्रमण का सिलसिला जारी रहा। लेकिन आधे समय तक कोई गोल नहीं हुआ। कुछ जानकारों का मानना था कि ये मैच टेक्निकली बेहतर होगा पर नीरस होगा,लेकिन इसके विपरीत ये प्रतियोगिता के सबसे शानदार और रोमांचक मैचों में से एक था। 

दूसरे हाफ में गतिरोध तब टूटा जब 51वें मिनट में फ्रांस के डिफेंडर उमतिति ने कॉर्नर पर हेडर से गोल किया। ये मैच विनर साबित हुआ। इसके बाद आग जैसे एक बार फिर भड़क गयी हो। बेल्जियम ने गोल करने की जोरदार कोशिश की,पर सफलता नहीं मिली। यहां  दोनों गोलकीपर और बेल्जियम के कप्तान हेजार्ड  मैच के हीरो थे। जहां दोनों  गोलकीपरों ने शानदार बचाव किये वहीं हेजार्ड ने बाए फ्लेंक से  जोरदार आक्रमण किये,पर वे फिनिश नहीं कर पाए। दरअसल बेल्जियाई कम्प्लीट टीम के रूप में विख्यात हैं। उनके खिलाड़ी पोजीशन बदल बदल कर खेलते रहे और आक्रमण करते रहे। जहाँ बेल्जियाई  लगातार आक्रमण कर रहे थे वहीं फ्रांसीसी थोड़ा डिफेंसिव खेले। उनकी रणनीति प्रत्याक्रमण की थी। वे बेल्जियम के आक्रमण को निगेट  करते और द्रुत गति से आक्रमण करते। लेकिन बेल्जियाई डिफेन्स ने उन्हें कोई मौक़ा नहीं दिया। वे केवल एक मौक़ा चूके और वही उनके लिए घातक सिद्ध हुआ। दरअसल ये बेल्जियम का दिन नहीं था। उनका बॉल पजेशन 38 प्रतिशत के मुक़ाबले 62 प्रतिशत था। बेल्जियम के खेल पर नियंत्रण को इस बात से समझा जा सकता है कि उनके 91 प्रतिशत पास सही थे। उनकी हार का कारण उनके  हीरो लुकाकू थे जिन्होंने  कई ऐसे मौके गवांए जिनमें से कई को गोल में तब्दील हो जाना चाहिए था।फिलहाल नीले रंग ने लाल रंग को हरा दिया। पानी ने आग को ठंडा कर दिया और उससे पार होकर नए गंतव्य की ओर बढ़ चला।


दरअसल बेल्जियम की इस हार ने फुटबॉल में विश्व को एक नया चैम्पियन मिलने की संभावना को क्षीण कर दिया है। ज़्यादा संभावना है कि आज के मैच में इंग्लैंड जीते। तब दो एक-एक बार के चैम्पियन आमने सामने होंगे और अपना दूसरा खिताब जीतने की कोशिश करेंगे।
-------------------------------
और हाँ आप माने या ना माने दक्षिण अमेरिकी टीमों का अब भी जलवा कायम है। उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। यकीन मानिये कल अगर अर्जेंटीना या ब्राज़ील की टीम में से कोई एक टीम सेंट पीटरस्बर्ग के उस स्टेडियम में खेल रही होती तो स्टैंड्स में इस कदर सीटें खाली ना होती 
--------------------------------- 
विश्व कप फुटबॉल 2018_6 

















Tuesday, 10 July 2018

विश्व कप फुटबॉल 2018_6




विश्व कप फुटबॉल 2018_6 
--------------------------------

ये एक शानदार दृश्य बन पड़ता है कि एक राष्ट्राध्यक्ष अपने देश की जरसी पहने मैदान में अपने खिलाड़ियों की हौसला अफ़जाई करता है और ये दृश्य तब अद्भुत लगने लगता है जब वो विपक्षी टीम के राष्ट्राध्यक्ष की उपस्थिति में ना केवल आम दर्शकों की तरह चीख कर अपनी टीम को चीयर्स करता है,बल्कि खुशी से झूमकर नृत्य करने लगता है।जीत के बाद अपने खिलाड़ियों का ड्रेसिंग रूम साझा करता है और अपनी टीम के साथ सोलिडेरिटी दिखाने के लिए आम समर्थकों के साथ हवाई जहाज में इकोनॉमी क्लास में सफर करके अपने रचे दृश्य को मुकम्मल करता है।दरअसल खेल मुकम्मल ही तब होता है जब आम ओ खास सब अपनी टीम के साथ एकाकार हो जाते हैं।क्रोशिया की माननीया राष्ट्राध्यक्ष कोलिंडा ग्रैबर कितारोविक सोची के स्टेडियम में एक ऐसा ही खूबसूरत नैरेटिव रचती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि जब राष्ट्र की प्रसव पीड़ा में सब साझीदार थे तो यहां भी सबका एकाकार होना बनता है।

--------------------------------------

मैदान में भले ही भौतिक रूप से एक/दो/पांच/छह/सात या ग्यारह खिलाड़ी खेलते दिखाई देते हों लेकिन उनके साथ उनका मुख्य कोच होता है,सहायक कोच होते हैं,सपोर्टिंग स्टाफ होता है,स्टेडियम में उपस्थित समर्थक दर्शक होते हैं,देशवासी होते हैं और पूरे संसार मे फैले उनके समर्थक भी वहां पूरी शिद्दत से उपस्थित होते हैं।तब जाकर टीम बनती है।फिर खेल खिलाड़ी की प्रतिभा,उसकी स्किल,उसकी तकनीक,उसकी मेहनत व लगन और उस खेल के उपकरणों भर से नहीं खेल जाते बल्कि कोच की रणनीति,सपोर्टिंग स्टाफ के सहयोग,उपस्थित समर्थकों के जोश और जूनून,देशवासियों की दुआओं और पूरी दुनिया मे फैले उनके चाहने वालों की उम्मीद से खेला जाता है।शायद माननीया कोलिंडा ग्रैबर इस सच्चाई से वाकिफ थीं,तभी वो ऐसा अनोखा दृश्य रच पाती हैं।
-----------------------------------------
अब आप अपने मन की आंखों से एक स्वप्न रचिए कि माननीय राष्ट्रपति क्रिकेट वर्ल्ड के किसी मैच में नीली जरसी पहने भारत के खिलाड़ियों द्वारा लगाए जा रहे चौके छक्कों पर उन्हें झूमकर चीयर्स कर रहे हैं,माननीय प्रधानमंत्री हॉकी विश्व कप के किसी मैच में भारतीय खिलाड़ियों द्वारा किए गए गोलों पर मुष्टि भींचकर उतेजित हो रहे हैं,माननीय खेलमंत्री बॅडमिंटन एरीना से जीतकर निकल रहे खिलाड़ी को गले से लगाकर झूम उठें या फिर माननीय वित्त मंत्री पंजाब के किसी दंगल में दर्शकों के बीच से अचानक किसी पहलवान को चित कर देने पर जेब से निकाल कर ग्यारह हज़ार एक रुपये न्योछावर कर रहे हैं।
-------------------------------
आप मानो या ना मानो,खेल जितने मैदान में खेले जाते हैं उससे कहीं अधिक मैदान के बाहर से खेले जाते हैं।


Sunday, 8 July 2018

फुटबॉल विश्व कप 2018_5

                             





                              फुटबॉल विश्व कप 2018_5    
               

           कई बार आपकी रूचि टीमों में  सिर्फ खेल के कारण ही नहीं होती,उसके इतर कारण भी होते हैं।विश्व कप फुटबॉल में जो आठ टीमें क्वार्टर फाइनल मेंपहुंचीं उनमें से रूस और क्रोशिया दो ऐसी टीमें थीं जो तमाम संभावनाओं से भरी पर  सबसे ज़्यादा अंडर रेटेड टीमें थीं जिन्हें कप के शुरू होने से पूर्व किसी ने भाव नहीं दिया था। लेकिन प्रतियोगिता शुरू होने के बाद उनके शानदार खेल से वे आपकी सहानुभूति या फिर आपकी चाहत का बायस हो सकती थीं। आप इन दोनों ही टीमों को एक साथ आगे बढ़ने का चाहना से भरे हो सकते थे। इसे आप दुर्भाग्यपूर्ण मान सकते हैं दोनों टीमों को आपस में खेलना पड़ा और एक टीम बाहर हो गयी। लेकिन दूसरी तरह से सोचें तो ये भी कह सकते हैं ये अच्छा ही रहा कि कम से कम आप इनमें से एक टीम को तो आगे बढ़ता देख रहे हैं।

                      क्वार्टर फाइनल के जो चार मैच होने थे उनमें से ये आख़िरी ज़रूर था लेकिन एक ऐसा मैच था जो बहुत से लोगों के लिए ना केवल सबसे ज़्यादा प्रतीक्षित था,बल्कि सबसे ज़्यादा रूचि वाला भी था क्योंकि दोनों ही टीमें बहुत कुछ एक सा साझा करती हैं। दोनों ही पूर्वी यूरोप से और पूर्व के साम्यवादी ब्लॉक से आती हैं। साम्यवादी व्यवस्था ढ़हने के बाद अपने नए स्वरुप/अस्तित्व में आए दोनों ही देश (पूर्व में सोवियत  संघ और युगोस्लाविया) संक्रमण के काल से गुज़र रहे हैं और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में हैं। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि जहां रूस केंद्र में था और उससे से अलग हो कर अनेक राष्ट्र बने,वहीं क्रोशिया अपने केंद्र से अलग होकर अस्तित्व में आया। ये दोनों ही नयी टीमें थीं जिन्होंने 1992 में पहली बार अपने अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल मैच खेले थे और दोनों ही एक तरह की 'आइडेंटिटी क्राइसिस'  गुज़र रहे हैं । अगर क्रोशिया को अपने प्रसव और जन्म के बाद के भीषण संघर्षों के दिनों में मिले जख्मों पर मलहम लगाने  और अपने अस्तित्व को सिद्ध करने को बहुत कुछ करना है तो दूसरी और रूस का अपने पुराने गौरव  को पाने का संकट कहीं बड़ा और गहरा था। अपने विघटन से पहले वो खेलों सहित विभिन्न क्षेत्रों में महाशक्ति था जिसकी कि अब छाया मात्र भी नहीं रह गया है। इससे भी बड़ा संकट खेलों में ईमानदारी और शुचिता का है। पूरी दुनिया में डोपिंग के लिए सबसे बदनाम देश है।खेल अपने को सिद्ध करने का एक बड़ा जरिया होता है या हो सकता है। जब दोनों ही टीमें मैदान में उतरी होंगी ये स्मृतियाँ उनके ज़ेहन में रही होंगी और दोनों ही टीमें इस मैच को और इस प्रतियोगिता को बड़े अवसर के रूप में देख सोच रही होंगी। 

                                         दोनों ही टीमें लीग में शानदार खेल दिखा कर नॉकआउट में पहुंची थी और दोनों ने प्री क्वाटर फाइनल में प्रतिद्वंदियों को पेनाल्टी शूटआउट में हरा कर अंतिम आठ में प्रवेश किया था। अगर रूस के पास चेरीशेव और गोलकीपर अकिनफीव जैसे नए स्टार थे तो थे तो क्रोशिया के पास लुका मोड्रिक जैसा शानदार मिडफील्डर। अगर रूस के पास लेव याशिन जैसे महान गोलकीपर की परम्परा थी तो  क्रोशिया के पास डावर सुकेर जैसे महान खिलाड़ी की थाती थी। हाँ क्रोशिया को एक बढ़त थी। वो अपने पहले ही वर्ल्ड कप में सेमीफाइनल तक पहुंची थी और तीसरे स्थान पर रही थी,जबकि रूस की टीम पहली बार अब क्वार्टर फाइनल खेल रही थी। फिर क्रोशिया की 20 वीं रैंकिंग थी जबकि रूस की 70 वीं रैंक थी। लेकिन रूस की इस कमी को उसके अपने दर्शक पूरी कर रहे थे।   

                             दोनों ही टीमों ने पॉजिटिव नोट पर खेल शुरू किया। लगातार आक्रमण किए और अपने गोल को बचाए  रखे । पहली सफलता रूस को मिली चेरीशेव के शानदार गोल से। उसने पहले एक खिलाड़ी को बीट किया और फिर दो डिफेंडरों के बीच से पेनाल्टी बॉक्स के बाहर से लेफ्ट फुट से शानदार किक लगाई जो गोल के ऊपरी दाएं कोने में धंस गयी। ये किक इतनी शानदार थी कि क्रोशियाई गोलकीपर को रिएक्शन का समय तक नहीं मिला। ये इस प्रतियोगिता के सबसे शानदार गोलों में से एक था। लेकिन रूस की खुशी ज़्यादा देर नहीं टिकी। थोड़ी देर बाद ही क्रोशिया के क्रेमेरिक ने गोल कर  बराबरी पर ला दिया। पहले हाफ का ये स्कोर खेल के अंत तक बना रहा। खेल अतिरिक्त समय में पहुंचा। अब बढ़त क्रोशिया ने ली। गोल विडा ने किया। लगा क्रोशिया जीत जाएगा। तब हीरो की माफिक मारिओ फर्नांडीज आए जिन्होंने खेल समाप्ति से सिर्फ पांच मिनट पहले गोल कर मैच को बराबरी पर ला दिया। इस 120 मिनट में यदि गेंद पज़ेशन को छोड़ दें जो की क्रोशिया के पक्ष में था,मैच पूरी तरह बराबरी पर छूटा। पेनल्टी शूट में अंततः बाज़ी क्रोशिया के हाथ लगी। जो खिलाड़ी कुछ देर पहले हीरो बन गया था वो ही अब विलेन बन चुका था। रूस को बराबरी पर लाने वाले  मारिओ अपनी पेनल्टी शॉट चूक गए और रूस इतिहास रचने से। 

                      ये नियति थी। एक को ही आगे जाना था। एक को वहीं सफर ख़त्म कर देना था। नियति क्रोशिया के साथ थी। वो आगे बढ़ गई। रूस का समय नहीं था। वो रूक गई। आँसू हर किसी की आँख में थे। कुछ थामे थे, कुछ के बह रहे थे।कुछ की आँख से निकला पानी दुःख के नमक से काले सागर के पानी को कुछ और खारा कर रहा होगा और कुछ की आँख से निकला पानी ख़ुशी के शहद सा उनके अतीत के ज़ख़्मों पर मरहम का काम कर रहा होगा। हाँ रूस वासियों को इस बात का संतोष ज़रूर होगा कि वे रैंकिंग में भले ही 70वें नंबर पर हों और वे इस कप में मेज़बानी की वजह  से खेल रहे हों पर वे इसके लिए डिजर्व करते थे। और इस बात का भी कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने विश्व कप का शानदार आयोजन किया है।  
----------------------------------
 वे हार कर भी जीत गए। दरअसल उन्होंने दिलों को जीता है। 

Sunday, 1 July 2018

विश्व कप फुटबॉल 2018_4



              कुछ इच्छाएं अधूरी रहने के लिए अभिशप्त होती हैं 
              --------------------------------------------------------

इस समय दुनिया भर में तमाम खेलों में उम्रदराज़ खिलाड़ी युवा खिलाड़ियों को खेल का ककहरा सीखा रहे हैं और नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। टेनिस में लगभग 37 साल के रोज़र फेडरर और 32  साल के राफेल नडाल अपना सर्वश्रेष्ठ खेल दिखा कर एक और दो पायदान पर बने हैं और सार्वकालिक महान खिलाड़ियों की सूची में अपना नाम दर्ज़ करा रहे हैं तो 34 साल के जेम्स लेब्रोन पिछले चार सालों से एनबीए में कैवेलियर्स की टीम को अपने बूते लगभग अजेय बनाए हुए हैं।  महेंद्र सिंह धोनी 37 साल की उम्र में  क्रिकेट में  भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर में गिने जाते हैं और  लिन  डान तथा साइना बैडमिंटन में रह रह कर शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। और हाँ सरदार सिंह हॉकी में ऐन इस समय अपनी सरपरस्ती में 30 साल की उम्र में भारत को चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल में पहुंचा रहे हैं। तो ऐसे समय में फुटबॉल में एक 31 साल के खिलाड़ी से कुछ वैसी ही उम्मीद रखना बेमानी नहीं हो सकता। वो भी एक ऐसे खिलाड़ी से जो 5 बार 'बैलेन डी ओर' का ख़िताब जीत चुका हो,600 से ज़्यादा  अंतर्राष्ट्रीय गोल कर चुका हो,जो सार्वकालिक महान खिलाड़ी माना जाता हो और लीजेंड का दर्ज़ा हासिल कर चुका हो। 
                      लेकिन कोई नहीं। अक्सर ऐसा होता है। उम्मीदें टूट जाती हैं। सपने बिखर जाते हैं। जिसकी जिस समय सबसे ज्यादा चाहना होती है वो ठीक उसी समय हाथ से रेत की मानिंद फिसल फिसल जाती है। दरअसल कुछ चाहतें अभिशप्त हो जाती हैं जो कभी मुकम्मल होती ही नहीं। शायद मेस्सी की  विश्व कप फुटबॉल का ख़िताब जीतने की और उसके लाखों चाहने वालों के लिए उसके हाथ में फीफा कप ट्रॉफी देखने की इच्छा एक ऐसी ही अभिशप्त इच्छा है जिसे अब कभी पूरा नहीं होना है।
                         याद कीजिए 2016 का  कोपा अमेरिका कप का फाइनल। ये मेस्सी का लगातार तीसरा फाइनल था। इससे पहले 2014 के विश्व कप में जर्मन से और 2015 में कोपा कप में अर्जेंटीना की टीम चिली से हार चुकी थी। इस बार फिर हारी। पेनाल्टी शूटआउट में मेस्सी ने गेंद गोलपोस्ट के ऊपर मार दी थी। निराशा में मेस्सी के आँखों से आंसू बहने लगे थे जिसकी परिणति मेस्सी के अंतर्राष्ट्रीय खेल से संन्यास लेने की घोषणा में हुई। फ़ुटबाल जगत हतप्रभ रह गया। लेकिन कुछ इच्छाएं इतनी बलवती होती हैं वे रह रह कर उफान पाती हैं और उस उफान में सारे संकल्प बह जाते हैं। मेस्सी के साथ भी शायद कुछ ऐसा ही हुआ होगा। दो महीने बाद ही मेस्सी ने खेल  में वापसी की घोषणा की। और उसके बाद मेस्सी ने अपने दम पर अर्जेंटीना को विश्व कप फाइनल्स में पहुँचाया। इक्वेडोर के विरुद्ध निर्णायक मैच में तो मेस्सी ने हैट्रिक लगाई। 
                             और फिर देशवासियों की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैले लाखों प्रशंसकों की उम्मीदों का बोझ उठाए मेस्सी रूस पहुँच गए। पर उम्मीदों का बोझ इतना ज़्यादा था कि खेल का स्तर ऊंचा नहीं रख सके और आयरलैंड जैसी टीम के खिलाफ 1-1 से ड्रा मैच में पेनाल्टी गवाँ बैठे तो क्रोशिया के खिलाफ मैच 3-0 से हार गए। अब लगा अर्जेंटीना पहले ही दौर में बाहर जाने वाली है। लेकिन जब इतिहास की निर्मिति होनी होती है  नियति अपना रास्ता खोज ही लेती है। उम्मीदों के बोझ से मेस्सी उबरे। अपनी रंगत में लौटे।शानदार खेल दिखाया। विश्व कप का अपना पहला गोल किया। तंजानिया को 2 -1  से हराया और अर्जेंटीना को नॉक आउट दौर में पहुँचाया। 
                                  तब एक पूर्व चैम्पियन की दूसरे पूर्व चैम्पियन से भिड़ंत तय हुई। प्री क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना का फ्रांस से खेलना तय पाया गया। शनिवार के दिन दोपहर बाद तातारिस्तान की राजधानी कज़ान के कज़ान एरिना में। ये क़यामत की शाम थी जिसमें लोगों ने एक क्लासिक मैच देखा।उन्होंने उम्मीदों के उफान को देखा और उसे बहते हुए भी देखा। ये दो महाद्वीपों के बीच मुकाबला था। ये फुटबाल की दो अलग शैलियों के बीच मुकाबला था। ये उम्मीदों की विश्वास से टकराहट थी।उम्रदराज़ों का युवाओं से सामना था। अनुभव जोश के मुक़ाबिल था। कलात्मकता रफ़्तार और शक्ति से रूबरू थी। जो मुकाबला मैदान में दो टीमों के बीच हो रहा था वो लाखों लोगों के लिए मेस्सी का फ्रांस से मुकाबला बन गया था। अगर लोग अर्जेंटीना को मेस्सी के लिए जीतता देखना चाहते थे तो खुद मेस्सी अर्जेंटीना के लिए जीतना चाहता था। मेस्सी ने अपना सब कुछ झोंक दिया। उसने कुल मिला कर दो असिस्ट किये। लेकिन अर्जेंटीना और जीत के बीच 19 साल का नौजवान एमबापा आ खड़ा हुआ। उसने केवल दो गोल ही नहीं दागे बल्कि एक पेनाल्टी भी अर्जित की। उसकी गति के तूफ़ान में अर्जेंटीना का रक्षण तिनके सा उड़ गया। मेस्सी का अर्जेंटीना 4 के मुकाबले 3 गोल से हार गया। लोगों की उम्मीदें हार गई। हताश निराश मेस्सी मैदान से बाहर निकले तो एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मानो वे इस असफलता को पलटकर देखना ही नहीं चाहते थे। 
            निश्चित ही उस दिन बहते  आंसुओं से कज़ान के वातावरण में कुछ ज़्यादा नमी रही होगी,कराहों से हवा में सरसराहट कुछ तेज हुई होगी,हार की तिलमिलाहट से सूरज का ताप कुछ अधिक तीखा रहा होगा,दुःख से सूख कर मैदान की घास कुछ ज़्यादा मटमैली हो गयी होगी और कजान एरीना से बाहर काजिंस्का नदी वोल्गा नदी से गले लग कर जार जार रोई होगी। 
-------------------------------- 
और ! 
और बहुत सारे लोगों के लिए फीफा विश्व कप 2018 यहीं समाप्त हो गया होगा !
--------------------------------
विश्व कप फुटबॉल 2018_3 
                                      
















Saturday, 16 June 2018

विश्व कप फुटबॉल 2018_3

कम ऑन मेस्सी!अब तुम्हारी बारी है!हम जानते हैं तुम कर सकते हो! 
-------------------------------------------------------------------------------



फीफा वर्ल्ड 2018 की और विशेष तौर पर एक मेज़बान लिए इससे बेहतर शुरुआत और कुछ नहीं  हो सकती थी। संक्षिप्त  लेकिन शानदार उद्घाटन समारोह के बाद जिस तरह से विश्व रैंकिंग में 70वीं पायदान वाली और इस कप की सबसे निचली रैंकिंग वाली रूस की टीम ने अपने से ऊँची रैंकिंग वाली (67वीं) टीम सऊदी अरब  खिलाफ गोलों की जैसी आतिशबाज़ी की वो ये बताने के लिए पर्याप्त था कि ये विश्व कप कैसा होने जा रहा है। उसने सऊदी अरब को 5-0 से रौंद कर उन आलोचकों को भी करारा जवाब दिया जो कह रहे थे कि ये रूस की अब तक की सबसे कमज़ोर टीम है। लेव याशिन जैसे महानतम गोलकीपर वाली इस टीम में अभी भी बहुत कुछ बचा है। स्थानापन्न चेरीशेव ने दो शानदार गोल कर बताया कि वे चोटिल स्टार प्लेमेकर जागोेव के विकल्प हो सकते हैं,तो गोलोविन ने अंतिम क्षणों में फ्री किक से गोल  चमत्कृत कर डेविड बेकहम और मेस्सी की याद दिला दी। पहले दिन के इस मैच ने जो मोमेंटम बनाया वो अगले दिन उरुग्वे-मिस्र और ईरान-मोरक्को मैच में बना रहा। पर इसका चरम स्पेन-पुर्तगाल मैच में आकर मानो ठहर गया हो। ये एक क्लासिक मैच था जिसमें वैसा फुटबॉल था जिसके लिए वर्ल्ड कप जाना जाता है,जिसके लिए दुनिया दीवानी है। 3-3 की बराबरी पर छूटे इस मैच में वो सब कुछ था जो फुटबॉल में होता है या हो सकता है । 90 मिनट में 6 गोल। वाओ औसतन हर 15 मिनट में गोल। और 4 मैचों में 13 गोल। वाह ये भी शानदार। 
             दरअसल 3-2 से 88वें मिनट तक बढ़त लिए हुए स्पेन की टीम और उसकी जीत के बीच में क्रिश्चियानो रोनाल्डो थे।  उस समय उन्होंने फ्री किक से शानदार गोल करके पुर्तगाल को बराबरी पर ला दिया।रोनाल्डो ने हैट्रिक की। ये उनके अंतर्राष्ट्रीय मैच में 46वें किक पर गोल था। इससे पहले 45 किक जाया गए थे। 
                रोनाल्डो ने तो कर दिखाया। कम ऑन मेस्सी। हम रोनाल्डो से नहीं तुमसे चाहते है वो सब जो और कोई भी कर सकता है और वो भी जो और कोई भी  नहीं कर सकता। जो अब तक बार्सिलोना के लिए किया है वो भी और वो भी जो अभी तक अर्जेंटीना के लिए नहीं कर सके हो। तुम्हारे हाथ में फीफा वर्ल्ड कप ट्रॉफी देखने सुन्दर दृश्य इस वर्ल्ड कप नहीं तो नहीं हो सकता। समय हाथ रेत की तरह फिसल रहा है।  अंतिम मौक़ा है। कम ऑन मेस्सी ! हम जानते हैं तुम कर सकते हो ! 
---------------------------------------------------
विश्व कप फुटबॉल 2018_2 

Tuesday, 12 June 2018

लाल बजरी के चक्रवर्ती सम्राट का अश्वमेध यज्ञ जारी है







लाल बजरी के चक्रवर्ती सम्राट का अश्वमेध यज्ञ जारी है 
----------------------------------------------

                         कई बार किसी व्यक्तित्व और उसकी उपलब्धियों के लिए बड़े शब्द भी अपूर्ण से लगने लगते हैं। जब आप राफेल नडाल को 'किंग ऑफ़ क्ले' कहकर सम्बोधित करते हो तो किंग शब्द ही छोटा महसूस होने लगता है।खेल की दुनिया में और खासकर टेनिस की दुनिया में 'राफा' और 'क्ले' एक दूसरे के पूरक हैं। एक है तो दूसरा है। एक के बिना मानो दूसरे का कोई अस्तित्व ही नहीं।  मोंटे कार्लो से लेकर पेरिस के रोलां गैरों तक लाल /भूरी मिट्टी पर खेल का जो साम्राज्य है,दरअसल राफेल नडाल उसके चक्रवर्ती सम्राट है। एक ऐसा अपराजेय सम्राट जिसकी कीर्ति चारों दिशाओं में फ़ैली है और जिसने अपनी इस कीर्ति को अनंत समय तक बनाये रखने के लिए एक अश्वमेध यज्ञ शुरू किया हुआ है। इस यज्ञ का अश्व यानी उनका खेल निर्मुक्त निर्द्वन्द समय की सीमाओं को लाँघता चला जा रहा है जिसे बांधने की शक्ति या हुनर किसी में है ही नहीं।
                          11 फ्रेंच ओपन,11मोंटे कार्लो ओपन,11 बार्सेलोना,8 रोम मास्टर्स और डेविस कप के क्ले पर खेले हर मैच में जीत। ये आंकड़े अपने आप में अविश्वसनीय लगते हैं। फ्रेंच में उनका रिकॉर्ड 86-2  का है यानी यहां खेले 86 में से केवल 2 मैच हारे। इस रविवार जब वे फिलिप कार्टियर कोर्ट में डोमिनिक थिएम के खिलाफ फाइनल खेलने उतरे तो ये उम्मीद थी कि ये एक ज़ोरदार मुक़ाबला होगा क्योंकि पिछले दो सालों में क्ले कोर्ट में जिस खिलाड़ी से दो बार हारे वो और कोई नहीं थीएम ही थे। पिछले साल रोम मास्टर्स में और इस बार मेड्रिड ओपन में। लेकिन अपने 11वे फ्रेंच आपने ग्रैंड स्लैम के लिए उन्होंने थीएम को 64,6-3,6-2 से लगभग रौंद ही डाला। 

                स्पेन एक ऐसा देश है जिसमें एक लाख से भी ज़्यादा क्ले कोर्ट हैं।वे बचपन से उस पर खेलते आये हैं। आखिर मिट्टी पर खेल नडाल के खून में जो है। वे उस मिट्टी के कण कण से वाक़िफ़ हैं।वे उसमें और मिट्टी उनमे रच बस गयी है। इसीलिए उसके मिज़ाज़ को उनसे बेहतर कौन समझ सकता है। उसका व्यवहार ही उन्हें और उनके खेल को रास आता है। मिट्टी की सतह पर घास या कृत्रिम सतह की तुलना में रूक कर थोड़ा धीमी आती है। जिससे उनकी चपलता और फुर्ती को गेंद पर नियंत्रण बनाने में आसानी होती है और उसके बाद वे अपने ट्रेडमार्क मारक टॉप स्पिन फोरहैंड शॉट खेलते हैं। टॉप स्पिन गेंद टप्पा खाने के बाद तेजी से आगे की ओर स्किट करती है और थोड़ा ज़्यादा ऊंची भी आती है जिसका कोई जवाब विपक्षी खिलाड़ी के पास नहीं होता। वे ना गेंद को और ना खेल को नियंत्रित कर पाते हैं। लाल सतह पर राफा के नियंत्रण को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि 17 और 18  में फ्रेंच ओपन में केवल एक सेट खोया इस साल के क्वार्टर फाइनल में स्वार्त्ज़मान के खिलाफ। दरअसल उनका खेल इतना लयबद्ध होता है मानो अपने इस कभी ना ख़त्म होने वाले अश्वमेध यज्ञ में मंत्रोचार कर रहे हों। उनके खेल की आभा सूरज की तरह इतनी दीप्त होती है कि उसकी रोशनी में बाकी कुछ नहीं सूझता।  
    











Saturday, 9 June 2018

वारियर्स




इस जून आसमान से तो ठीक वैसी ही आग बरस रही है जैसी उम्मीद थी। पर ज़मीन से जिस आग के निकलने की उम्मीद थी,वैसी निकली नहीं। खेल के मैदान में खिलाड़ियों के कौशल,हुनर,जोश और ज़ज्बे की टकराहटों से निकली आग में वो तपिश महसूस ही नहीं हुई। अगर पेरिस के रोलां गैरों की लाल मिट्टी पर नडाल केवल एक सेट की कीमत पर फाइनल में पहुँच गए तो एनबीए का फाइनल 'एंटी क्लाईमैक्स' का और दो देसी कहावतों 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता' तथा 'संगठन में ही शक्ति है' का महज़ एक नैरेटिव बन कर रह गया।


                                                      आज सुबह जब क्वीकें लॉन्स एरिना के सेंटर कोर्ट में लेब्रोन जेम्स की अगुआई में क्लीवलैंड कैवेलियर्स की टीम बेस्ट ऑफ़ सेवन के फाइनल्स के चौथे गेम में खेलने उतरी होगी तो उसके दिमाग में लैरी ओ ब्रायन ट्रॉफी से ज़्यादा अपना सम्मान बचाने की चिंता रही होगी। वे सीरीज में 3-0 से पिछड़ रहे थे।दूसरी और वारियर्स ये गेम जीत कर ट्रॉफी पर पिछले चार सालों में तीसरी बार और लगातार दूसरी बार अपने नाम कर लेने को बेताब होंगे। अंततः बाज़ी वारियर्स ने मारी और 108-85 से जीत कर लगभग एकतरफा मुक़ाबले में कैवेलियर्स को 4-0  से हरा दिया।पिछले चार सालों से एनबीए फाइनल्स का ठिकाना क्वीकें  लॉन्स और ओरेकल एरिना के सेंटर कोर्ट ही होते आये हैं। 2014-15 और 2015-16 के पहले दो मुकाबले जहाँ इन दो टीमों के साथ साथ स्टीफन करी और लेब्रोन जेम्स के मध्य प्रतिद्वंदिता के लिए भी याद किये जाते हैं तो 2016-17 का मुकाबला केविन डुरंट  और लेब्रोन जेम्स की ऐतिहासिक प्रतिद्वंदिता के लिए याद किया जाता है। लेकिन 2017-18 के इस सीजन में ये मुकाबला एनबीए के समकालीन इतिहास की सबसे शानदार टीम गोल्डन स्टेट वारियर्स और महानतम खिलाड़ी लेब्रोन जेम्स के बीच तब्दील हो गया था। 


                             जेम्स का ये लगातार आठवां और कुल मिलाकर नवां फाइनल्स था। उन्होंने अकेले अपने डैम पर कैवेलियर्स को ईस्टर्न कांफेरेंस के फाइनल में ही नहीं पहुँचाया बल्कि उसे जीता कर एक बार फिर फाइनल्स में वारियर्स के मुक़ाबिल कैवेलियर्स को खड़ा कर दिया। फाइनल्स के पहले ही मुकाबले में जब खेल अतिरिक्त समय तक पहुंचा तो लगा मुकाबले की तपिश बहुतों को झुलसा देने वाली है। लेकिन यहां एंटी क्लाइमेक्स होता है और अगले तीन तीन गेम में कैवेलियर्स आत्म समर्पण कर देती है। ऐसा लगने लगा टीम का बोझ अकेले ढ़ोते ढ़ोते मानो लेब्रोन की सांस फूल गयी हो। उनका मुकाबला  करी,थॉम्पसन,डुरंट और ड्रेमोन्ड ग्रीन की अभेद्य दीवार से था और इस दीवार को भेद पाना उनके अकेले के बस की बात नहीं था। वारियर्स ने कैवेलियर्स को हराकर बताया कि टीम गेम में कोई एक खिलाड़ी मायने नहीं रखती बल्कि पूरी टीम का प्रयास मायने रखता है।
फिलहाल इस सुनहरी टीम को सुनहरी सफलता की सुनहरी बधाई।

------------------
 और हाँ, नियति बेजाँ क्रूर भी होती है। 2012 में लेब्रोन मियामी हीट्स के लिए खेल रहे थे और डुरंट ओकलाहामा सिटी थंडर्स के लिए।उस समय लेब्रोन ने डुरंट को अपनी पहली रिंग से वंचित कर दिया था। समय बदला।डुरंट  2016-17 में वारियर्स  की टीम में शामिल हुए और एक बार फिर फाइनल्स में लेब्रोन के मुक़ाबिल हुए। बार नियति डुरंट के साथ थी। उसने रिंग ही नहीं जीती बल्कि फाइनल्स के एमवीपी भी बने।नियति यहीं नहीं रुकी।डुरंट ने पिछले साल वाला कारनामा फिर दोहराया।लेब्रोन के मुक़ाबिल एक और रिंग जीती,एक बार फिर फाइनल्स के एमवीपी करार दिए गए। 
-------------------------
पर ! आह,ये क्या ! रोलां गैरों के फिलिप कार्टियर मैदान पर स्लोअने स्टीफेंस की हार ! इस हार ने तो मानो वारियर्स की जीत की तपिश को मंद ही कर दिया। पर विश्वास है कल नडाल की जीत इस कमी की भरपाई कर पाएगी। और विशवास मानिये नडाल की लाल बजरी पर 11वीं जीत के बाद कल फिर यहीं आपसे मुलाक़ात होगी। 

एक प्रतिद्वंदिता:दो विदाई

  एक कशमकश है कि अब इख़्तिताम पज़ीर हुआ चाहती है। एक द्वंद्व है जो विराम लिया चाहता है। एक प्रतिद्वंदिता है जो अनिर्णीत समाप्त हुआ चाहती है। द...