Friday, 6 June 2014

क्षणिका



ज़िन्दगी में कुछ लम्हें ऐसे आते हैं
जो गुज़र कर भी
गुज़रते नहीं
बल्कि जिन्दगी के साथ
हमेशा के चस्पाँ हो जाते हैं !

Wednesday, 4 June 2014

सच



तुमने प्यार में खुद को 
धरती बना डाला
पर
मैं
खुद को
बादल ना बना पाया
तुम समझी
मैं बरस कर
तुम्हारे मन को प्रेम रस में पगाना नहीं चाहता 
 पर
ये सच नहीं था
सच ये था
 मैं
तुम्हारे अंदर की आग को
बुझते नहीं देख सकता था।


तुमने प्यार में खुद को
नदी बना दिया
पर
मैं
समन्दर  ना बन सका
तुम समझी
मैं
प्रेम का प्रतिदान ना कर सका
पर
ये सच नहीं था
सच ये था
मैं
तुम्हारे वज़ूद को
खत्म होते नहीं देख सकता था।

Tuesday, 8 April 2014

औरत

 औरत : एक   

शहर के पॉश इलाके में साईं बाबा का एक मंदिर है
कहते हैं सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर बनाया गया है
इसके निर्माण में न्याय से लेकर प्रशासन तक सभी ने 
यथा सम्भव योगदान किया है
अब ये हिट है। 

मंदिर में खूब भीड़ भाड़ होती है,
रोज़ भक्तों का बाबा से मिलन होता है,
बाहर भण्डारे चलते हैं,
अंदर चढ़ावे चढ़ते हैं,
और बेशकीमती कपड़ों से बाबा का श्रृंगार होता है। 

पर भक्तों की उस भीड़ में घूमती अधेड़ सी एक औरत है
बेखबर बेपरवाह इस सभी से,
भूख से बिलबिलाती,
झूठे पत्तलों को चाटती,
गर्मी में कुम्हलाती,
और सर्दी में किटकिटाती,
बिना किसी के आगे हाथ फैलाए,
बिना कुछ माँगे,
अनावृत यौनांगों को लिए हुए
वो संवेदनहीन सी।

वो निपट अकेली है क्योंकि वह 
बाज़ार के लिए घाटे का सौदा है
वर्ग संघर्ष के लिए भोथरा हथियार है
आस्तिकों के लिए कर्मों का फल है
नास्तिकों के लिए पाप का निशानी है 
समाज के लिए बोझ है 
शासन के लिए ज़िंदा लाश है 
तो क्या वो .... 
ना ना.…आप गलत सोच रहे हैं 
वो पागल कतई नहीं है 
मैं बताता हूँ 
दरअसल ये वो आईना 
जिसमें हमारा अक्स साफ़ साफ़ दिखाई देता है 
हम में बढ़ती जाती अजनबियत का 
दुगुनी होती संवेदनहीनता
पल पल मरते जाते ज़मीर का



औरत :दो 

शहर के दूसरे पॉश इलाके का ये मंदिर
सरकारी ज़मीन पर खड़ा 
हिस्ट्री शीटर पुजारी बना
गणेश जी ने दूध पिया
तो एक से दो बना
घूमती पगली सी इधर उधर एक नवयौवना का
इसी की छाया में आशियाना बना। 

कभी रेंगे थे आदमी इस शरीर पर
लिजलिजे कीड़ों की तरह
और छोड़ दिया था निर्जीव से शरीर को कबाड़ की तरह
आज वो आड़ कबाड़ को  खींचती है
फिर लाद लेती है अपने ऊपर उसे 
आदमी समझ कर
जैसे लादती आयीं हैं जन्म जन्मान्तर से। 
लेकिन अब एक अंतर आ गया है 
लादने के बाद 
वह उसे पीटती है,घसीटती है, फ़ेंक देती है 
और बार-बार यही प्रक्रिया दोहराती है,
मानो उन्हें दिखा रही हो उनका अक्स
कि तुम सिर्फ और सिर्फ़ कबाड हो
भले ही समाज और चिकित्सा विज्ञान उसे पागल कहे 
वह अब सभी बंधनों से आज़ाद है 
और वही करती है जो सही समझती है। 



औरत :तीन 

शहर के तीसरे पॉश इलाके का ये शानदार अपार्टमेंट
कब्जाई जमीन पर बना है
और  काली कमाई से खरीदे गए फ्लैट में
काम करती एक बाई है
जिसने अपने पेट की आग बुझाने के लिए
नशेड़ी पति की दारु के लिए
और बच्चों के दूध के लिए

बेच दिया
बच्चों के हिस्से का बेशकीमती समय
छोड़ दिया अपने हिस्से में आने वाला बच्चों का दुलार 

अब छूट गया 
बच्चों को बड़े होते देखने का सुख,
उनको दुलारने सहलाने की हूक,
उनको कुछ सिखाने की तमन्ना,
जवान होती बेटियों से राज़ बांटने की इच्छा,
खुद के सजने संवरने की चाह।  

खो गया  
मन का चैन,
और तन का सुख। 

टूट गए 
मन में सजाए सारे सपने,
और उन सपनों के सच होने की उम्मीद। 

अब वह शानदार मॉड्यूलर किचेन में खड़ी हो ढूंढती है
अपने हिस्से का सुख,
हटाती है उम्मीद के जूने से दुःख की झूठन,
जिंदगी के कमरों को झाड़ पोंछ कर
करती है जतन
किस्मत पर पडी धूल को हटाने का,
छींटती पछोटती है जिंदगी के कपड़ों को
और टाँग देती है क्लिप के सहारे रस्सी पर,
फिर देखती है आसमान की ओर इस आस में
कभी तो वो सुबह होगी
जिसकी धूप 
चुपके से सोख लेगी 
उसकी जिंदगी के अभावों के गीलेपन को
और उसकी जिंदगी में भी रह जाएंगे
निरे सुख। 

 



Saturday, 5 April 2014

सड़क




सड़क जिंदगी के समानांतर चलती है
अपने इतने करीब लगती है
जीवन की कहानी बयाँ करती सी लगती है
क्या कभी आपने सड़क को ध्यान से देखा है ?

जी हाँ
सड़क
सुबह सुबह
शांत,निर्मल, पवित्र सी
दूर क्षितिज तक जाती
जिसका कोई अंत नहीं
छोटे से बच्चे की तरह मासूम सी दिखती
अनंत सम्भावनाओं को समेटे
खाली स्लेट सी साफ़ सुथरी
जिस में कुछ भी रच बस सकता है
और पूरा शहर उसके आगोश में समा सकता है। 

सड़क
दोपहर होते होते पूरे जोश से भर जाती है
पूरी क्षमता भर लोगो को ढ़ोती है
और भाग रही होती है
यहाँ से वहाँ
फुर्सत नहीं होती सांस लेने की भी
अपने में मगन
मग़रूर नौजवाँ सी सड़क।

सड़क
साँझ ढलते ही लगने लगती है
थकी-थकी सी
रफ़्तार पड़ने लगती है मद्विम
रौनक भी होने लगती है कम
लोग लगते है साथ छोड़ने।

और
रात बढ़ने के साथ ही
बुढ़ापे की तरह
एकाकी होने लगती है सड़क
एक-एक करके सभी छोड़ जाते हैं साथ
रह जाती है निपट अकेली वो
अन्धकार कुछ इस तरह से लेता है जकड़
कि पैरों के पास ही ख़त्म होती लगती है दुनिया 
उसके आगे सिर्फ रह जाता है अन्धेरा ही अँधेरा 
अकेले जीने को अभिशप्त
कभी कभार इक्के दुक्के भूले भटके आए राहगीर के साथ चलकर कुछ दूर
नई सुबह की इंतज़ार में
अकेले रात काटती सड़क।

कितनी अपनी कहानी सी लगती है सड़क।  (दीपेन )




Wednesday, 29 January 2014

सपने

1. 
सपने काँच की रंग बिरंगी चूड़ियों से नाज़ुक 
अभावों की हल्की सी ठसक से 
किरिच किरिच 
टुकड़ों टुकड़ों में 
बिखर बिखर जाते। 


2. 
सपने मन के आसमान में 
रंग बिरंगी पतंगों से
बिंदास बिंदास से 
ऊँचे ऊँचे उड़ते जाते 
ग़म के हलके से झोंके से 
फटे फटे से काग़ज की तरह 
ज़मीन पर पड़े पड़े 
नज़र आते।  


3. 
सपने  रंग बिरंगे गुब्बारो जैसे 
आशाओं की हवाओं से 
बड़े बड़े हो आसमान की ओर जाते 
रंज़ की हल्की सी नोक से 
बिंध बिंध कर 
ज़मीन पर बिखर बिखर जाते। 


4. 
सपने दुःख के बादलों से 
काले काले होते जाते 
उनके छंटते ही 
आशाओं की बूँदो के पार 
इंद्रधनुष बनाते। 








Tuesday, 31 December 2013

उम्मीद के गीत





1. 

आशा भरी सुबहें 
विश्वास से लिपटी शामें 
मस्ती भरे दिन 
चैन से कटती रातें 


2. 

उम्मीदों की नदी 
दुखों के पहाड़ का सीना चीर कर 
सुखों के मैदानों को सींचती 
जा मिलेगी  
आनंद के असीम सागर में !

3. 

यूँ ही नहीं कहा शैली ने 
कि सर्द हवाओं के बाद 
बहेगी बासंती बयार 
इसलिए मेरे दोस्त
मत होना निराश . 

दुखों के काले बादल  
तो बरस कर चले जाएंगे 
और रह जाएगी सिर्फ सुख की रोशनी 

मत घबराना 
निराशाओं की स्याह रात से   
आशाओं का सवेरा सोख लेगा इस स्याही को   
और रह जायेगी उम्मीदों की सुर्ख सफ़ेद चादर 

मत घबराना अपने भीतर की कायरता से
तुम्हारे हौसलों की ऊष्मा 
जलाकर  कर देगी राख़
सारी कायरता को 
और निर्मित कर देगी तुम्हारे भीतर एक ऐसा संसार  
जहाँ होंगे
बिंदास ठहाके 
खनखनाती हसीं  
मंद मंद मुस्कान 
उम्मीद ही उम्मीद 
आशा का सागर 
रोशनी का सूरज

और कहीं दूर खड़े दुःख  
उस पर कर रहे होंगे रश्क़ !





4.

क्या दूँ दोस्त तुम्हें
इस नए साल के मुबारक मौके पर

थोड़ी सी धूप कड़कड़ाती सर्दी के लिए
थोड़ी सी छाँव चिलचिलाती गर्मी के लिए
थोड़ी सी छत घनघोर बारिश के लिए
थोड़ी सी बूंदे तपते रेगिस्तान के लिए
थोड़ी सी नींद बेचैन रातों के लिए
थोड़ी सी फुर्सत दौड़ते भागते दिन के लिए
थोड़ी सी आस निराश जिंदगी के लिए
थोड़ी सी हँसी उदास लम्हों के लिए
थोड़ी सी खुशी ग़मों के सागर के लिए
थोड़ा सा प्यार नफरतों की बारिश के लिए
थोडा सा साहस अन्याय से लड़ने को 
थोड़ी सी रोशनी घोर अंधेरे के लिए 

ये 'थोड़ा थोड़ा' सा ही 'बहुत सा' वाले समय में 
ये थोड़ा तुम्हारे पास रहे 
ये थोड़ा मेरे पास रहे 
बस इस थोड़े से ही अच्छे से उम्र कटे।  



Wednesday, 18 December 2013

लोकपाल बिल






46 सालों से लटका  लोकपाल बिल आखिर पास हो ही गया। अण्णा जी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया।वे खुश हो रहे हैं कि उन्होंने बिल पास करा दिया। उनके समर्थक जश्न मना रहे हैं। तमाम राजनीतिक दल इसे पास कराने का श्रेय भी उन्हें दे रहे हैं। लेकिन बिल पास होने की जो टाइमिंग है और जो परिस्थितियाँ हैं उसके हिसाब से इसका श्रेय अण्णा को देना बेमानी है। 
           इसमें कोई संदेह नहीं कि इसे पास कराने के लिए उन्होंने लगातार आंदोलन किया। पिछली बार जब उन्होंने आमरण अनशन किया था तब उनका जीवन भी खतरे में पड गया था। उस समय अण्णा और टीम अण्णा को जो जन समर्थन मिला था वो अभूतपूर्व था। देश भ्रष्टाचार के गम्भीर और बड़े घोटालों से जूझ रहा था। जन समर्थन को देख कर सारी राजनीतिक पार्टियां ही नहीं सरकार भी सकते में आ गयीं थी। सरकार को झुकना पड़ा। उसे अण्णा के पास आना पड़ा और लोकपाल बिल पास करने का वायदा करना पड़ा। 
          हालाँकि  इसे राजनितिक पार्टियों ने संसद की गरिमा पर हमला बताया। लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर में अविश्वास बताया। पर तमाम विरोध के बावजूद दिखावे को ही सही संसद में बिल प्रस्तुत किया गया। पर पास नहीं हो सका होना भी नहीं था। रामलीला मैदान का अनशन इस बिल को लेकर किये जाने वाले आंदोलन का चरम था। यदि अण्णा की वजह से ये बिल पास होना था तो उस समय ही हो गया होता। लेकिन नहीं हुआ। बिल संसद में पेश जरूर किया गया पर उसे तमाम पेचीदगियों और अरंतु परन्तु में उलझा दिया गया। कोई भी राजनीतिक दल इस बिल को पास नहीं करना चाहता था।  क्योंकि इसे पास करने का मतलब था अपनी जड़ों पर ही प्रहार करना जिसके बल पर वे खड़ी हैं। फिर चाहे सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस हो या पार्टी विथ डिफरेन्स बी जे पी हो। सभी पार्टियों की सरकारों पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप हैं। और फिर क्यों नहीं कोई भी पार्टी अपने को सूचना के अधिकार के अंतर्गत नहीं आने देना चाहती। 
                   अब जब अण्णा दिल्ली से हज़ारों मील दूर  बैठे अपने गाँव में थोड़े से लोगों के साथ अनशन पर बैठे तो सरकार ने उनके आंदोलन के डर से या प्रभाव से बिल पास कर दिया? आखिर क्या बात है कि संसद सत्र शुरू होने के साथ अण्णा अनशन शुरू करते हैं और आनन् फानन में बिल पास हो जाता है। क्या इसमें कांग्रेस और अण्णा में  सांठ गाँठ की बू नहीं आती। एक तरफ चौतरफ़ा घोटालों से घिरी कांग्रेस की साख बचाने की जरूरत और दूसरी और केजरीवाल की आशातीत सफलता के बाद अपने अप्रासंगिक हो जाने की अण्णा की दुविधा। 
             दरअस्ल इसका श्रेय उस वैकल्पिक राजनीति को दिया जाना चाहिए जो हालिया दिल्ली विधानसभा चुनाव की देन है। इस चुनाव ने भारतीय राजनीति को कई तरह से बदला है। इस चुनाव ने परम्परागत राजनीति करने वाले दलों पर संकट खड़ा कर दिया। इस चुनाव ने जनता को इन दलों के अलावा भी एक विकल्प दिया है। और यहीं से राजनीतिक दलों में घबराहट का दौर शुरू होता है। अपनी विश्वसनीयता पर आये संकट से उबरने की चुनौती प्रस्तुत होती है। और यहीं से जनता की आकांक्षाओं को मान देने का महत्व समझते हैं। और लोकपाल बिल का पास होना उसकी परिणति बनती है। 
     ये ही वे राजनितिक दल हैं जिन्होंने इस बिल को पास होने से 46 साल रोके रखा। बड़ा आंदोलन खड़ा किया हुआ तो राजनीति में आकर क़ानून बनाने की चुनौती दी। दल बनाया तो मजाक उड़ाया। लेकिन चुनाव ने सभी दलों की बोलती बंद कर दी। क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि इस चुनाव में एक नया विकल्प नहीं होता तो अब तक दिल्ली में सरकार नहीं बनती। जिस राजनीति में कुछ दल के नेता  30 या 40 सांसदों के बल पर  पी.एम. बनने के सपने देखते हो, वहाँ एक राजनीतिक दल सबसे अधिक सीट जीत कर भी दूसरी पार्टी से सरकार बनाने को कहे। जहाँ दल  बदल क़ानून की धज्जियां उड़ाई जाती हो वहाँ दल दूसरे दल को बिना शर्त समर्थन करें। ये सब इसी वैकल्पिक राजनीति की दें है। 
                     भ्रष्टाचारों के आरोपों से त्रस्त कांग्रेस और सरकार तो पहले से ही बैकफुट पर थी। उसके सामने अपनी साख बचाने का बड़ा संकट पहले से मौज़ूद था। तमाम सर्वे भाजपा की जबर्दस्त बढत बता रहे थे। और ये लगभग तय था कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप ना होती तो भाजपा को बड़ी आसानी से बहुमत मिल जाता। लेकिन इस पार्टी ने जनता को जो विकल्प दिया उसने भाजपा की भी नींद उड़ा दी। आखिर कैसे बिल पर एकाएक सहमति बन गयी। 
                                निसंदेह लोकपाल का बन जाना बड़ी बात है। सूचना के अधिकार के क़ानून की तरह इसके भी दूरगामी सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं और होने भी चाहिए। पर इसके पास होने का श्रेय कम से कम तात्कालिक कारण होने का श्रेय तो इसी वैकल्पिक राजनीति के उदय को दिया जाना चाहिए। 











फीफा विश्व कप 2026 डायरी 16: ओरलैंडो गिल

ये विश्व कप जितना फॉरवर्ड्स का है,उतना ही गोलकीपर्स का भी है। जितना मेस्सी,क्रिश्चियनों रोनाल्डो,म्बापे,हॉलैंड,विनिसियस जूनियर, उस्मान डेंब...