Wednesday, 7 September 2016

ये कुश्ती वो कुश्ती तो नहीं

                                                

         सुशील कुमार -नरसिंह विवाद और और उसका सीक्वल नरसिंह डोप टेस्ट विवाद भारतीय खेल इतिहास का एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक घटना है जिसके निश्चित ही दूरगामी परिणाम होंगे। सबसे दुखद तो ये है कि नेपथ्य में बैठे कुछ लोगों की महत्वकाक्षांओं और उनके स्वार्थों की कुश्ती देश के दो सबसे होनहार पहलवान रेसलिंग एरीना में बिछे गद्दों पर नहीं बल्कि उससे बाहर लड़ रहे हैं। पहले दौर की लड़ाई हाई कोर्ट में जाकर समाप्त होती है तो दूसरे दौर की लड़ाई नरसिंह के प्रतिबन्ध पर जाकर। लड़ाई शुरू हुई रियो ओलम्पिक में जाने के दावे को लेकर लेकिन अंत हुआ दोनों में से किसी के भी ओलम्पिक में जाने की किसी भी संभावना के समाप्त होने पर। 25 जून और 5 जुलाई को डोप टेस्ट के लिए नरसिंह के लिए गए दोनों नमूने पॉजिटिव पाए गए। नमूने पॉजिटिव पाए जाने की खबर के तुरंत बाद एक आरोप रचा गया कि ये उनके यानी नरसिंह के विरुद्ध षड़यंत्र है। इशारा निश्चित ही उनके प्रतिद्वंदी खिलाड़ी की तरफ था। आनन् फानन में एक रसोइया सामने आता है,प्रतिबंधित सप्लीमेंट मिलाने वाला पहचाना जाता है और नाड़ा के सामने पेश होने से एक दिन पहले पुलिस में एफआईआर दर्ज़ करा दी जाती है। साथ ही कुश्ती संघ द्वारा क्लीन चिट दे दी जाती है कि नरसिंह ऐसा नहीं कर सकता है। 
               लेकिन यहाँ ये आरोप कि उसे फ़साने का षड़यंत्र प्रतिद्वंदी पहलवान खिलाड़ी द्वारा किया गया,खुद अपना एक प्रतिपक्ष रचता है। वो ये कि क्या प्रतिद्वंदी पहलवान सबसे सॉफ्ट टारगेट नहीं है अपनी गलती का दोष उसके मत्थे मढ़ कर उसे बदनाम करके सहानुभूति खुद बटोर लो। इससे अपनी बचत होती है तो ठीक वरना प्रतिद्वंदी के रियो जाने का रास्ता तो बंद होना तय है ही। डोप टेस्ट के परिणाम आने के तुरंत बाद जिस तरह से षड़यंत्र थ्योरी सामने आई और जिस तरह से कुश्ती संघ द्वारा उसे क्लीन चित दी गयी (आमतौर पर ऐसे मामले में जांच की रिपोर्ट आने तक इंतज़ार किया जाता है) से पता  असली कुश्ती कहाँ लड़ी जा रही है। 

          दरअसल इस पूरे मामले को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इस मामले के कुछ सूत्र हाथ आ सकते हैं। फ़ूड सप्लीमेंट और शक्तिवर्धक दवाईयों का प्रयोग विश्व व्यापक है। इससे शायद ही कोई देश या कोई खिलाड़ी अछूता बचा हो। डोप टेस्ट में पकड़े जाना या उससे बच निकलना इस बात पर निर्भर करता है कि इनका सेवन आपने कितने सुनियोजित ढंग से किया है।डोप टेस्ट के मामले में भारत का रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। भारत में शक्तिवर्धक दवाईयों और फ़ूड सप्लीमेंट के प्रयोग की भयावहता का अंदाज़ा दो उदाहरणों से लगाया जा सकता है। एक,बकौल पत्रकार मित्र जो खेल कवर करते रहे हैं,प्रदेश स्तर तक के खेल आयोजन स्थल के वाश रूम में पड़ी सिरिंजों से इन दवाओं के प्रयोग के वॉल्यूम का अनुमान किया जा सकता है। दूसरे,अभी हाल ही में एक राज्य की पुलिस भर्ती में फिजिकल टेस्ट में अभ्यर्थियों के डोप टेस्ट कराये जाने से इस समस्या की गम्भीरता को समझा जा सकता है। लोग ये सोचते हैं कि एक खिलाड़ी और विशेष रूप से एक पहलवान गाय भैंस के घी दूध और बादाम पिस्ते से अपनी शारीरिक ज़रूरतें पूरी कर लेता है वे बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। स्वयं नरसिंह ने अपने फ़ूड सप्लीमेंट जाँच के लिए नाड़ा को सोंपे। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2014 से 2016 के मध्य भारत में डोप टेस्ट के 98 मामले सामने आए और वो इस मामले में विश्व में तीसरे स्थान पर है। रूस 111 मामलों के साथ पहले नंबर पर है। डोप के मामले में सोवियत रूस से बने राष्ट्र और उसके पूर्व सहयोगी पूर्वी यूरोपीय देश अधिक बदनाम रहे हैं। 
                              अस्सी नब्बे के दशकों में जब इन देशों में साम्यवादी शासन दरक रहा था तो इन देशों की आर्थिक बदहाली विश्व के सामने आ रही थी।  समय था जब भारत में खेलों का स्तर ऊंचा उठाने के लिए विदेशी कोचों की ज़ोरदार वकालत की जा रही थी। समय तमाम खेल संघों ने कोचों को ढूँढने के लिए इन देशों का रुख किया। यहां से दोयम दर्ज़े के सस्ते कोच लाकर देश में खूब वाहवाही लूटी। इन कोचों के भारत में आने पर अच्छे परिणामों की उम्मीदें  परवान चढ़ने लगी। इससे इन विदेशी कोचों पर अपनी नौकरी बचाने और संघों पर अपनी साख बचाने के लिए सकारात्मक परिणाम दिखाने का अतिरिक्त दबाव था। क्या इसे एक संयोग भर मना जाए कि अधिकांश डोपिंग के मामले इसी समय से और इन्हीं खेलों में आने शुरू हुए।  
              दूसरी ओर  शक्तिवर्धक दवाईयों और फ़ूड सप्लीमेंट्स का दुनिया भर में बड़ा बाज़ार है। हमारे देश में सारे अच्छे फ़ूड सप्लीमेंट बाहर से आते हैं जो खासे महंगे होते हैं। जो खिलाड़ी इन महंगे सलिमेंट्स को अफोर्ड नहीं कर पाता वो देश में बने सस्ते मगर घटिया सलिमेंट्स को प्रयोग करता है। इन सभी देसी विदेशी फ़ूड सलिमेंट्स और शक्तिवर्धक दवाईयों के जांच और क्वालिटी कंट्रोल की कोई व्यवस्था देश में नहीं है। और प्रोफेशनल सपोर्टिंग स्टाफ  अभाव में खिलाड़ी वही सब खा रहे हैं जो कंपनियां उन्हें परोस रही हैं। या फिर कोच और सपोर्टिंग स्टाफ उन्हें कह रहा है। वाडा और नाडा भी केवल प्रतिबंधित सप्लीमेंट्स और दवाईयों की बात करते हैं। वे ये नहीं बताते कि क्या खाना है। फलतः बाजार की बेलगाम दौड़ ने इस समस्या को विकराल बना दिया है। 
        खेल दो व्यक्तियों या दलों के मध्य शारीरिक और मानसिक क्षमताओं की ज़ोर आज़माइश है। इसमे इससे इतर  चीज की घुसपैठ होगी तो खेलों की मूल भावना आहत होगी ही होगी। मसलन खेल में उग्र राष्ट्रवाद की घुसपैठ होगी तो खिलाडियों को वैसे अमानुषिक अत्याचार झेलने पड़ सकते हैं जैसे चीन ने खेल महाशक्ति बनने के उपक्रम में अपने खिलाडियों पर किए बताए जाते हैं या फिर वैसी हिंसा झेलनी पद सकती है जैसी यूरोपीय  देशों के बीच फुटबॉल मैचों के दौरान होती है।  यदि खेलों में बाज़ार की एंट्री होती है तो निश्चित ही खेलों को  फिक्सिंग और डोपिंग जैसी समस्याओं से कोई नहीं बचा सकता। शायद भगवान् भी नहीं। तो दो  पहलवानों के इस विवाद को इस नज़रिये से भी परखने  कोशिश कीजिये।  




दाना मांझी


                         
                
               दाना मांझी द्वारा अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर रख कर की गई 12 किमी की उस यात्रा को कई दिन बीत गए हैं.... लेकिन अभी भी लग रहा है कि मानों वो यात्रा जारी है...... अंतर्मन में गहरे कहीं .....बार बार भीतर के मनुष्य को परखने की कोशिश में .....कि अगर वो कही तुम्हारे रास्ते में आता तो तुम क्या करते। क्या उसी तरह एक फोटो खींच कर तमाशा देखते रहते या मुँह फेर कर आगे बढ़ जाते। हर बार जवाब हाँ में ही आता है। आखिर हम रोज यही तो करते हैं.... दाना  मांझी की घटना पहली नहीं है और आख़िरी भी नहीं ... ऐसी कितनी ही घटनाएं हमारे आस पास घटती जाती हैं और हम उन्हें बस देखते जाते हैं। दरअसल ये घटना आदिम समाज से लेकर पूंजीवाद तक की मनुष्य की विकास यात्रा में मनुष्य के धीरे धीरे 'हम' के 'मैं' बदल जाने को और मरती जाती संवेदना को अपनी पूरी विद्रूपता के साथ प्रस्तुत करती है।इसका होना कोई आश्चर्य नहीं है। आश्चर्य तो तब होता जब उस 12 किमी यात्रा के बीच में कहीं कोई पीछे से आता और धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखता और कहता मेरा कंधा भी तुम्हारे साथ है,फिर कोई और आता,फिर एक और आता और फिर 'चले थे जानिबे मंज़िल अकेले,लोग आते गए कारवाँ बनता गया' की तर्ज़ पर एक बड़ा कारवाँ बन गया होता। तब होता आश्चर्य .....तब होता अजूबा।  
                    दाना के लिए कोई दया या सहानुभूति नहीं उपजती क्योंकि वो हीरो हैं दशरथ मांझी की तरह। 12 साल की अबोध बालिका के साथ कंधे पर अपनी मृत अर्धांगिनी को उठाए दीना एक अद्भुत कारुणिक दृश्य पैदा करता करता है जिसकी पृष्ठभूमि में करुणा का सागर लहरा रहा है। दाना एक ऐसा मनुष्य जिसके पास अपराजेय साहस और अकल्पनीय होंसला है,जिसके मन में प्रेम की अजस्र धारा बह रही है।सरकारी उपेक्षा,उदासीनता और असंवेदनशील रवैये से उपजी उसकी पीड़ा को समझा जा सकता है कि सरकारी वाहन आने का इंतज़ार किये बिना अपनी मृत पत्नी को अपने कंधे पर उठा कर अबोध बालिका के साथ चल देता है।एकदम अकेले.... कंधे पर मृत पत्नी....12 किमी दूरी .... .अद्भुत जीवट है,साहस है,होंसला है और अदुर्दमनीय जिजीविषा है। उस यात्रा के बीच हज़ारों लोग और साथ में मीडिया उसे देखते जाते हैं फोटो खींचते है वीडियो बनाते हैं। हमारे जैसे उन हज़ारों नपुंसकों के बीच वो अकेला है अविचल,अटल,निष्पृह भाव से चला जा रहा है। ऐसा साहस बिरला होता है। वो उसके सुख दुःख की संगिनी थी,एक लंबा समय साथ बिताया था,नेह का अटूट बंधन। उसे अंतिम विदाई उसकी अपनी माटी में देना चाहता था उसके अपनों के बीच। चाहता तो वहीं अंतिम संस्कार कर सकता था। कोई साधन न होने पर खुद के कंधे पर उठा लेता है। उसने प्रेम के ढाई आखर को सही मायने में गुना था। वो जानता था प्रेम की डगर आसां नहीं होती। वो कठिन राह चुनता है।  दरअसल उसकी ये यात्रा ताजमहल से बड़ा शाहाकार है। ये दशरथ मांझी की २२ बरसों की लंबी यात्रा से आगे की यात्रा है। 






फुटकल_2




गागर जितने मन में 
सागर के पानी जितनी हसरतें 
फिर भी मन कितना 
रीता रीता 
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Sunday, 24 July 2016

उड़ान होंसले की



                 
           
 86.48 मीटर की एक छोटी सी उड़ान आपको आसमां पर बिठा सकती है। वो एक उड़ान आपकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उड़ान हो सकती है। वो उड़ान आपको वो सब दे सकती है जिसकी कि  आपने सिर्फ और सिर्फ कल्पना की हो। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका और नाज़ियों के अत्याचारों के मूक दर्शक उत्तरी पोलैंड के एक छोटे से  खूबसूरत से शहर बिदुगोष्ट में 23 जुलाई की रात में हरयाणा के पानीपत जिले के एक छोटे से गाँव के एक दुबले पतले लेकिन मज़बूत कन्धों वाले 18 साल के नीरज चोपड़ा ने जब अपनी पहली थ्रो में 79.66 मीटर जेवलिन फेंका तो ये दक्षिण अफ्रीका के जोहान ग्रोबलर की 80.59 से एक मीटर कम दूरी थी। उस समय नीरज सहित किसी को ये अनुमान नहीे  होगा कि उसकी अगली थ्रो एक नया इतिहास बनाने जा रही है।अपनी दूसरी थ्रो के लिए लगभग ढाई मीटर लम्बे और 800 ग्राम वजन वाले फाइबर के जेवलिन को जब नीरज के मज़बूत कंधे हवा में  उड़ान भरने के लिए फेंक रहे थे तो वे केवल एक जेवलिन नहीं फेंक रहे थे बल्कि उस प्रतियोगिता के नए विश्व रेकॉर्ड को भी उड़ान दे रहे थे जिस पर खुद नीरज के गौरव का और साथ साथ देश के गौरव का परचम लहरा रहा था।जब उनके भाले की नोक ने ज़मीन को छुआ तो स्कोर बोर्ड पर 86.48 अंकों के साथ नया 'विश्व रिकॉर्ड' शब्द  चमक रहे थे। उन्होंने दो मीटर से 2011 में लातविया के सिरमेस द्वारा 84.69 मीटर के रिकॉर्ड को ध्वस्त किया।
वे किसी  भी आयु वर्ग में ट्रैक एंड फील्ड प्रतियोगिता को जीतने वाले और विश्व रिकॉर्ड बनाने वाले पहले भारतीय एथलीट बन गए। इस प्रदर्शन की अहमियत को इस बात से समझा जा सकता कि ये इस वर्ष का आठवां  सबसे अच्छा प्रदर्शन है और ये ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता त्रिनिदाद के वाल्कोट के इस साल के 86.35 मीटर से भी बेहतर है और 2012 के लन्दन ओलम्पिक में वाल्कोट द्वारा स्वर्ण जीतने वाली 84.58 मीटर फेंक से कहीं अधिक है। भले ही उनकी ये उपलब्धि अंडर 20 में हो और वे मिल्खा सिंह,पीटी उषा,अंजू बॉबी जॉर्ज,श्रीराम जैसे एथलीटों वाली ऊंचाईयों पर अभी नहीं पहुंचे हो पर उनकी ये उपलब्धि आश्वस्तकारी ज़रूर है।  

अलविदा नीलाभ सर


      

                    नीलाभ सर का यूं चले जाना अप्रत्याशित भी है और दुखद भी।उनका बहुआयामी व्यक्तित्व था।वे बेहतरीन अनुवादक थे,कवि थे,आलोचक थे,संपादक थे और इन सबसे ऊपर बिंदास जीवन जीने वाले जिंदादिल इंसान थे।लेकिन मेरे मन में उनकी जो पहली और सबसे बड़ी तथा महत्वपूर्ण छवि थी वो एक आला दर्जे के रेडियो प्रसारणकर्ता की थी।बात 1984 में इलाहाबाद आने से तीन चार साल पहले की है।उस समय बीबीसी पर कैलाश बुधवार,रमा पांडेय,अचला नागर की आवाज़ गूँजा करती थीं।अचानक एक दिन एक नई आवाज़ सुनाई दी।धीर गंभीर सी,ठहराव वाली,साफ़ शफ्फाक।मानो लय ताल में निबद्ध हो।कानों से होकर दिल में उतर जाने वाली।ये नीलाभ की आवाज़ थी।ये नीलाभ से पहला परिचय था।विवेचना हो,पत्रोत्तर हो,बच्चों का कार्यक्रम हो,खेल कार्यक्रम हो,वे हर कार्यक्रम को बड़ी संजीदगी से करते थे ।उन्होंने बीबीसी के लिए बहुत से बेहतरीन कार्यक्रम किए ।पर जैज संगीत पर किया गया उनका श्रृंखलाबद्ध कार्यक्रम अद्भुत था जिसमें जैज संगीत के उद्भव से लेकरउस समय तक के उसके विकास के बहाने अफ्रीकी अमेरिकनों के दुख दर्दको बड़ीही बारीकीऔर मार्मिकता से रेखांकित किया था।उसके बाद तो मैं उनके कार्यक्रमों का मुरीद हो गया।इलाहाबाद आने के बाद पता चला वे यहीं के हैं और अश्क जी के पुत्र हैं।लेकिन उनसे मिलना 1994 में आकाशवाणी में आने के बाद हुआ।वे स्वरबेला कार्यक्रम के लिए कविता पाठ करने आए थे।उनसे बीबीसी पर बात हुई।उसके बाद वे जब भी आकाशवाणी आते रेडियो प्रसारण पर बातें होती रहती।उन्होंने आकाशवाणी में कार्य नहीं किया पर उन्हें प्रसार भारती की कार्य प्रणाली की गहरी समझ थी।अभी कुछ दिन पहले अपने ब्लॉग पर लघु उपन्यास हिचकी में प्रसार भारती पर छोटी लेकिन अर्थपूर्ण टिप्पणी की थी।उनसे अंतिम मुलाकात दो ढाई साल पहले हुई थी जब वे आकाशवाणी इलाहाबाद द्वारा आयोजित 'शहर और शख्सियतें' विषयक संगोष्ठी में भाग लेने आए थे।अपने लेक्चर में उन्होंने अपने इलाहाबाद प्रवास के दिनों को और शहर को शिद्दत से याद किया।वेकाफी नोस्टेल्जिक हो गए थे।वो याद मन में कहीं अटकी है।पर बीबीसी स्टूडियो से निकल कर ट्रांज़िस्टर सेट से हम तक पहुँचीउनकी सदाबहार आवाज़ और कार्यक्रम सदैव उनकी याद दिलाती रहेंगी।अपने सबसे पसंदीदा ब्रॅाडकास्टर को विनम्र श्रृद्धांजलि।










Wednesday, 20 July 2016

सच में तुम्हारा यूँ असमय चले जाना बेसबब है

        


         मोहम्मद शाहिद का चला जाना केवल एक खिलाड़ी का चला जाना भर नहीं है। एक पूरे युग का चला जाना है।ये हॉकी की एक पूरी शैली का चले जाना है।ये भारतीय हॉकी के गौरव के प्रतीक का चला जाना है।  क्रिकेट से पहले भारत की खेलों में पहचान हॉकी थी। हॉकी की पहचान खिलाड़ियों के कलात्मक खेल से थी। ये कलात्मकता खिलाड़ी के गेंद पर अद्भुत नियंत्रण से आती थी और ये अद्भुत नियंत्रण ड्रिब्लिंग से आता था। जिसमें भारतीय खिलाड़ी माहिर माने जाते थे।ध्यानचंद से लेकर धनराज पिल्लई तक। शाहिद उसी परम्परा के खिलाड़ी थे। उनका गेंद पर अद्भुत नियंत्रण था और गज़ब की तेजी भी। ये दोनों विशेषता मिलकर उन्हें एक लीजेंड बनाती थी। दरअसल वे हॉकी में दो युगों की संधिकाल के खिलाड़ी थे। उनके पहले का काल भारतीय हॉकी का स्वर्णिम युग  और बाद का उसके पतन का।  1975 में भारत ने विश्व कप जीता था। उसके बाद भारतीय हॉकी का पतन शुरू होता है और 1980 में ओलिम्पिक जीत शानदार तरीके से जलते दिए की अंतिम भभक भर थी जिसे शाहिद और जफ़र की  प्रतिभा और मेहनत ने संभव बनाया था। 1975 तक गोविंदा और अशोक की जोड़ी जिस शानदार आक्रमण पंक्ति का निर्माण करती थी, गोविन्द और अशोक के जाने के बाद खाली हुए उस स्थान को शाहिद और ज़फर की जोडी ने भरा था। दूसरी और वे  उस संधि काल के खिलाड़ी थे जहां हॉकी विशुद्ध खेल से व्यवसायिकता में रूपांतरित हो रहा थी,जहां से हॉकी प्राकृतिक घास के मैदान से कृत्रिम घास के मैदान की ओर संचरण कर रही थी.जहां से हॉकी की कलात्मकता शक्ति में तब्दील हो रही थीऔर जहां से विशिष्ट हॉकी टोटल हॉकी की ओर बढ़ रही थी। ऐसे संधि काल में खेलना और उसमें सर्वाइव करना सबसे कठिन होता है। जाते हुए और आते हुए के बीच सामंजस्य बिठाना बहुत ही दुष्कर कार्य  होता है।ऐसे समय में खेल के उच्च्तम स्तर तक पहुंचने का काम कोई लीजेंड ही कर सकता था।ये मो.शाहिद ने कर दिखाया था। सच में तुम्हारा यूँ असमय चले जाना बेसबब है।अलविदा।  

Friday, 1 July 2016

मेस्सी

           
         
            ऊँचाई कितना सकारात्मक शब्द है ! हर आदमी उस बुलंदी,उस ऊंचाई पर पहुंचना चाहता है जहाँ अब तक कोई ना पहुंचा हो। लेकिन शब्द की भावाभिव्यञ्जना निरपेक्ष नहीं होती। अलग अलग सन्दर्भ एक ही शब्द को  अलग अलग तासीर में आपके समक्ष ला खड़ा करते हैं। 'ऊंचाई' एक ऐसा शब्द जो हमेशा  आपके कानों में सकारात्मक प्रतिध्वनि उत्पन्न करता है,जो हमेशा आपको कुछ बेहतर करने की प्रेरणा देता है,आपको सुनने में अच्छा लगता है, वही शब्द आपके दिमाग में एक विलेन की तरह चस्पा हो सकता है,आपको अवसाद में डुबो सकता है,आपको निराशा और अन्धकार के गहनतम धरातल पर ला पटक सकता है। ये बात मेस्सी के दुनिया भर के उन लाखों करोड़ों चाहने वालों से बेहतर कौन जान सकता है जो रविवार की रात को कोपा अमेरिका कप का फाइनल देख रहे थे। मेस्सी की पेनाल्टी किक की उस थोड़ी सी अतिरिक्त ऊंचाई ने बिना आवाज़ किये ही अजेंटीनावासियों के उनकी टीम द्वारा कोपा अमेरिका कप जीतने के स्वप्न को ही चूर चूर नहीं किया था बल्कि मेस्सी के फैंस के दिलों को भी तार तार कर  दिया।मेस्सी एक बार फिर खाली हाथ रह गए। ये चौथी बार हो रहा था कि मेस्सी फाइनल में अपने देश को जीत नहीं दिला सके। इन चार फाइनल में 2014 का विश्व कप का फाइनल  भी शामिल था। वे एक बार फिर अपने देशवासियों सहित करोड़ों लोगो की भरी उम्मीदों के बोझ तले दब कर रह गए। वे अपने ही देशवासी माराडोना या पेले की तरह महानतम नहीं बन पाए क्योंकि वे कोई ख़िताब नहीं जीत पाए। रविवार की रात को उस पेनाल्टी किक को बाहर मारने का असहनीय दर्द बच्चे सी मासूमियत वाले मेस्सी के चेहरे की उदास सूनी आँखों से होता हुआ उनके हर चाहने वाले के सीने  पर नुमाया हो रहा था।बॉल की उस अतिरिक्त ऊंचाई ने हमारे समय के सबसे सच्चे खिलाड़ी के खेल से पूरी दुनिया को महरूम कर दिया क्योंकि अब वे अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए उपलब्ध नहीं रहेंगे और किसी भी खिलाड़ी का सर्वश्रेष्ठ  अपनी राष्ट्रीय टीम के लिये ही होता है। 
                                             
     हो सकता है वे अपने समकालीन रोनाल्डो क्रिस्टियानो की तरह परफेक्ट ना हो या फिर वे माराडोना की तरह ईश तुल्य भी न हो जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपना सम्पूर्ण झोंक देने के अतिरिक्त  ज़रुरत पड़ने पर बेईमानी भी कर सकता हो जैसे कि हमारी पौराणिक कथाओं में तमाम चरित्र मिलते हैं या फिर पेले की तरह महानतम भी ना हो जिसने अपने देश ब्राज़ील को सफलता की बुलंदियों पर पहुंचाया हो। दरअसल वो अपूर्णताओं का खिलाड़ी था। वो एक ही समय में अविश्वसनीय किक से गोल कर सकता था और अगले ही क्षण पेनल्टी को जाया कर सकता था।  वो एक ही समय में दुनिया भर  श्रेष्ठ रक्षकों को छका सकता  था और साधारण से गोलकीपर से मात खा सकता था।  अपने खेल के दम पे  अपनी टीम को उस समय  जीता सकता था जब कोई उम्मीद नहीं कर रहा हो और जब उससे सबसे ज़्यादा उम्मीद हो तो सबको नाउम्मीद भी कर सकता था।नाउम्मीदी में शानदार खेल दिखा सकता था और उम्मीदों के बोझ से ढेर भी हो सकता था।  वो मैदान में हर क्षण  खेल को जीता था। जब वो ये कहता है कि 'उसे खेलने में जब तक गली मोहल्ले में खेलने वाले लडके की तरह आनंद आता रहेगा वो खेलता रहेगा' तो उस समय उसके भीतर का सच्चा खिलाड़ी बोल रहा होता है। दरअसल उसके खेल की यही अनिश्चितता और अपूर्णता उसे सच्चा खिलाड़ी बनती है और  विशेषता उसे औरों से अलग ही नहीं करती बल्कि एक खिलाड़ी के रूप में महानतम बनाती है।  वो असाधारण प्रतिभा वाला खिलाड़ी था लेकिन उसमें साधारण खिलाड़ी वाली कमजोरियां भी थीं गली में खेलने वाले लडके की तरह। यही साधारणता उसे असाधारण बनाती है। याद कीजिये सचिन तेंदुलकर को ना तो वे लॉर्ड्स के मैदान पर शतक बना सके और ना ही कोई टीहरा शतक लगा सके। ये असफलता उनकी महानता को काम नहीं कर सकती। कोई भी असफलता मेस्सी की महानता को भी कम नहीं कर सकती। वो असफलता पर दुखी हो सकता है और संन्यास लेने की घोषणा कर सकता है,लेकिन असफलताओं से अविचलित होने का दिखावा नहीं कर सकता। ये एक सच्चा खिलाड़ी ही कर सकता है। एक 'सच्चे खिलाड़ी' को एक सलाम तो बनता है।  

















ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल 2026

एक : फीके फीके से खेल इस बार के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ खेल बहुत फीके फीके से हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया द्वारा मेजबानी...