Thursday, 29 November 2018



सुख दुःख से बनी
इस उबड़ खाबड़ दुनिया के
ठीक ऊपर
ख्वाबों  के आसमान में
खुशियों का जो चाँद लटका है
वो 
हाड तोड़ मेहनत की डोर के सहारे
शर्मसार सा होकर
इतना सा नीचे आए
कि हमारे भीतर कुछ उजास हो
कि औरों के हिस्से के दुःख का एक टुकड़ा
हमारा हो और
हमारे हिस्से के सुख का
एक टुकड़ा औरों का
कि हमारे भीतर का जानवर कुछ मर सके 
हम कुछ थोड़ा और मानुस बन सकें। 

Monday, 26 November 2018

मैरी कॉम


 मैरी कॉम

विश्व चैंपियनशिप में 1 चांदी और 6 सोने के तमग़े जीतने,अपने मेल काउंटरपार्ट क्यूबा के महानतम मुक्केबाज़ फेलिक्स सवोना की  बराबरी करने और एक शानदार बायोपिक अपने खाते में दर्ज़ कराने जैसी असाधारण उपलब्धियों के बाद भी मैरी कॉम आधी आबादी की खेल दुनिया की सानिया या सिंधु या गुट्टा या मिताली या फिर साक्षी या फोगट बहनों जैसी ग्लैमरस आइकॉन नहीं बन पायी हैं। इसका कारण शायद उनकी सहजता,सरलता और साधारण चेहरा मोहरा बाजार और मीडिया के लिए उतना सेलेबल ना होना हो पर अदम्य उत्साह,इच्छा शक्ति,धैर्य,लगन और परिश्रम से बना उनका खूबसूरत सहज और सरल व्यक्तित्व दरअसल भारतीय समाज के आधे हिस्से की खेल दुनिया का सबसे सच्चा और वास्तविक प्रतिनिधि है,उसका है। 
           उन्होंने 2001 में विश्व प्रतियोगिता में पहला रजत पदक जीता। उसके बाद 2002,2005 2006,2008 के बाद 27 साल की उम्र में 2010 में अपना पाँचवा स्वर्ण पदक जीता। उसके 8 साल बाद अब 2018 में 35 वर्ष की उम्र में अपना छठा सोने का तमगा हासिल कर ये विशिष्ट उपलब्धि हासिल की। इस 18 साल के खेल जीवन में विश्व चैम्पियनशिप के अलावा ओलम्पिक,एशियाड और कॉमनवेल्थ खेलों में भी तमगे हासिल किए। 2002 की विश्व मुक्केबाज़ी चैम्पियनशिप में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में वे अकेली हैं जो अभी भी रिंग के भीतर सक्रिय हैं।इतना ही नहीं वे 2020 के ओलम्पिक में भाग लेने के लिए भी आश्वस्त दिखती हैं। ये दिखाता है कि वे किस मिट्टी की बनी हैं। 
 35 साल की उम्र में तीन बच्चों की माँ होकर भी ये असाधारण उपलब्धि हासिल कर उन्होंने दिखाया कि जिस उम्र में महिलाएं अपने परिवार की खातिर अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को पुराने कपड़ों की तरह खूंटी पर टांग देती हैं और अपनी प्रतिभा तथा योग्यता को किसी बक्से में छुपाए गहनों की पोटली की तरह गाढ़े समय के लिए अपने अवचेतन के भीतरी तहों में छुपा देती हैं उस समय भी अपनी इच्छा शक्ति मेहनत और जज़्बे के बुते कोई भी दुनिया जीती जा सकती है। 
    दरअसल जब वे अपने मजबूत हाथों से प्रहार करती हैं तो वे केवल अपने प्रतिद्वंदी पर ही प्रहार नहीं करती बल्कि अपनी सफलता के रास्ते में आने वाले हर बाधा और चुनौती पर प्रहार करती हैं और उसे भी परास्त करती चलती हैं फिर वो बाधा उम्र की हो समाज की हो या अभावों की हो।विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति उन कठिनाइयों को ही अपनी ताक़त और प्रेरणा बना लेता है। ये संयोग ही है कि उन्होंने अपने लिए रिंग को चुना जिसमे चारों और रस्सियां होती हैं। ये वे बंधन होते हैं जिनसे मुक्केबाज़ बाहर नहीं जा सकता है और निश्चय ही इन रस्सियों को वे अपने जीवन के बंधनों की तरह देखती रही होंगी और उन्हीं को अपनी ताकत बना और उनसे प्रेरणा लेकर उन बंधनों से मुक्त होने के लिए विपक्षी पर ज़ोरदार प्रहार करती होंगी और विजयी होकर निकलती होंगी। 
भले  ही वे सेलेबल कोहलियों या धोनियों की तरह सेलेबल ना हों भर सही मायने में पंकज आडवाणी और मैरी कॉम जैसे खिलाड़ियों की उपलब्धियां उनसे बीस  ही ठहरती हैं। 
 मैरी कॉम को इस असाधारण उपलब्धि के लिए सलाम! 

Tuesday, 30 October 2018

आखिर नाम में ही तो सब कुछ है


आखिर नाम में ही तो सब कुछ है 
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किसी जगह का नाम बदलना मेरे लिए किसी बड़ी परिघटना की तरह नहीं होता था। ऐसा होना महज़ शब्द भण्डार में एक और संज्ञा का बढ़ जाना भर था या फिर सामान्य ज्ञान में एक और सवाल का बढ़ जाना भर। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते वक़्त बहुत सारी जगहों के पुराने-नए नाम याद किया करते थे। आखिर किसी जगह के नाम बदलने की परम्परा नयी नहीं थी। देश में ही नहीं विदेशों में भी। तमाम शहरों और जगहों के नाम बदले। क्या फर्क पड़ा। सिवाय इसके कि आपके सामान्य ज्ञान में एक और शब्द का इजाफा हुआ कि बम्बई अब मुंबई हो गया या फिर मद्रास चेन्नई। यहां तक कि जब मुग़लसराय दीन दयाल उपाध्याय नगर हुआ तब भी ये बदलाव महज एक नाम का बदलाव भर था।
                           लेकिन अब जब इस महबूब शहर का नाम बदल गया है। 'इलाहाबाद' जब 'प्रयागराज' हो गया है,तो ऐसा क्यूँ नहीं लगता कि ये भी एक शहर के नाम का सिर्फ एक  बदलाव भर है। निसंदेह प्रयागराज सुन्दर नाम है। बहुत से लोग पहले भी इस नाम का प्रयोग करते रहे हैं। तो क्या फर्क है किसी और जगह के  और इस शहर के नाम बदल जाने में। 
                            दरअसल ये फ़र्क़ जगह का है। जिन जगहों पर आप जीते हैं और जिन जगहों को आप जीते हैं,उन जगहों के नाम बदलने पर फ़र्क़ महसूस होता है और खूब होता है। ये वो जगहें होती हैं जिनमें आप रचे बसे होते हैं और वे आप में रची बसी होती हैं। उन जगहों की पहचान उनके नाम होते हैं और उन जगहों की तरह वे नाम भी आपके भीतर तक गहरे पैठे होते हैं। और इन्हें नयी पहचान देना निसंदेह दुष्कर होता है।
                      जिन जगहों को मैंने शिद्दत से जिया,उनमें से तीन ऐसी जगहें थीं जिनके नाम बदले। पहला मेरा गांव।सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज नाम 'सुंदरा उर्फ़ पूठा'। जो 'पूठा' के नाम से जाना जाता है और बोलचाल में 'पुट्ठा'।किसी भी गाँव की तरह आम गाँव। कच्चे पक्के घर। बड़े बड़े घेर और उसमें ढेर सारे डंगर। ऐसा गांव जिसकी अलमस्त सुबहें खेत दिशा जाती महिलाओं की बातों की गुनगुनाहट,खेत जाते बैलों और हलों की सरसराहट,हाथ में तख्ती और पट्टी लिए बच्चों की खिलखिलाहट और उससे मेल खाती चिड़ियों की चहचहाअट से गुलज़ार रहती। उनींदी सी अलसाई दोपहरें जिसमें नीम के पेड़ों तले बैठे ताश खेलते बेफिक्र किसानों की आवाज़ों की खनखनाहट खलल डालती। सुरमई शामें खुद किसानों के गले से या फिर ट्रांजिस्टर से बजती रागनियों से महकती। और निस्तब्ध नीरव रातें दादुर की टरटराहट,झींगुरों की भनभनाहट और सियारों के रुदन से बेचैन होती और रह रह कर डंगरों के गले में बंधी घंटियों की आवाजों से गमकती।लेकिन जल्द ही विकास की आंधी सब कुछ बहा ले गयी।नाम भी और पहचान भी।शहर सुरसा के मुख की तरह विस्तारित हुआ और आस पास के गॉवों को ग्रसता गया। शहर ने गॉव को चारों और से घेर लिया। उसका जीवन रस चूस लिया। और गला घोंट दिया। ज़मीनों के बदले लोगों को मुआवज़ा मिला। अब घर दबड़ों में बदल गए। हल,बैल और ट्रैक्टरों की जगह मोटर साइकिलों और कारों ने ले ली। अब सुबहें और दोपहरें वाहनों और उनके हॉर्न की चीखों के शोर से आहत होने लगीं तो शामें और रातें रागनियों की जगह आवारा कुत्तों के भोंकने और शराबियों की गालियों से कराहने लगीं।गाँव को नयी पहचान मिली 'वेदव्यास पुरी'।पर आज भी उसकी पहचान 'पुट्ठा'से ही होती है और दिल भी 'वेदव्यास पुरी' में 'पुट्ठा' ही ढूंढता है।
दूसरी जगह एटा जिले की तहसील कासगंज। इसमें कभी रहा नहीं। फिर भी जीवन का अभिन्न हिस्सा। यहां सैकड़ों बार खेलने गया।क्रिकेट पहला प्यार। यही जगह इस प्यार के अलगाव की वजह बनी। कैच पकड़ते समय सीधे हाथ की माध्यिका में चोट लगी।वो उँगली आज भी कुछ टेढी है।क्रिकेट छूट गया और कासगंज याद रह गया। ये जलीस भाई की वजह से भी याद है। उस समय वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज़ों का खौफ हुआ करता था और एटा के क्रिकेट सर्किल में जलीस भाई का।कहते हैं जलीस उस समय के राष्ट्रीय गेंदबाजों जितनी तेज गेंद  फेंकते थे।वे यू पी टीम के प्रबल दावेदार थे।पर उनका कोई माई बाप नहीं था।चयन नहीं हो पाया।उनकी गेंद पर बल्ले के किनारे से लगकर थर्ड मैन और और गली के ऊपर से कई बार छक्के लगते देखे थे और कई बार खुद भी उनकी गेंदों को कान के पास से सरसराते हुए गुज़रते देखा था। उस कहर बरपाती तेज गेंदबाजी का खौफ आज भी दिमाग पर तारी है।भले ही वेस्ट इंडीज़ की पेस बैटरी का खौफ ना देखा हो पर जलीस की गेंदबाजी के उस खौफ से उसका अंदाज़ लगाना मुश्किल भी नहीं। उसके बहुत बाद भी एटा से फरीदपुर जाते हुए कासगंज की सडकों से ही गुज़रते थे।आज भी स्मृतियों में वो शहर कासगंज के नाम से अंकित है। उसका बदला नाम अभी गूगल से जाना काशीराम नगर।
 और अब इलाहाबाद। सपनों का, ख़्वाबों का, सपनों को देखने का और उन्हें हक़ीक़त में बदलने का जो शहर था उसका नाम इलाहाबाद ही था प्रयाग नहीं।जिस सपनीले शहर को सबसे पहले किशोरावस्था में धर्मवीर भारती की नज़र से देखा था वो शहर इलाहाबाद ही था।जिस शहर में ज़िन्दगी के 35 सबसे अहम साल जिए और जिस शहर को 35 साल जिया वो कोई और नहीं इलाहाबाद ही था । 25 पैसे प्रति घंटे की किराए की साइकिल से जिस शहर की तमाम गलियों को दिन रात गहाते हुए मन पर स्मृतियों  की जो अमिट पगडंडी बनी है उस शहर का नाम कुछ और नहीं इलाहाबाद ही है। जिस शहर ने जीवन को जीने की सलाहियत दी और सलाहियत से जीवन जीने दिया वो इलाहाबाद ही है। वो शहर जो आपके दुःख दर्द,सुख दुःख का भागीदार रहा हो,वो शहर जिसने आपको मनुष्य बनने की प्रक्रिया में रत किया हो,वो शहर जिसने मुहब्बत करनी सिखाई हो,वो शहर जिसने आपको आजीविका दी हो,वो शहर जिसमें आपका एक खूबसूरत परिवार बना हो,वो शहर जिसने आपको बेपनाह मोहब्बत करने वाले दोस्त दिए हों,वो शहर इलाहाबाद ही है। गर वो शहर आपकी रग रग ना बस जाता तो क्या होता। उस शहर की पहचान आपके भीतर कहीं गहरे ना पैठ जाती तो क्या होता। 
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अर्से पहले मुझे भी शेक्सपियर की जूलियट की तरह लगता था कि 'नाम में क्या रखा है'। पर अब नहीं। बनिस्बत अब शायर अनजान का गीत याद आता है 'प्यार कागज़ पे लिखी कहानी नहीं'।दरअसल किसी शहर का नाम दस्तावेज़ों में दर्ज़ एक निर्जीव शब्द भर नहीं कि जब चाहो बदल दो बल्कि शहर में जीने वालों और शहर को जीने वालों की संवेदनाओं और संवेगों के रस में पगी सजीव संज्ञा है।  
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बिला शक प्रयागराज एक खूबसूरत नाम है। उसे चाहने वालों को शहर का ये नया नाम मुबारक और हमें अपना !



Sunday, 14 October 2018

एक वो और एक लॉन



एक वो और एक लॉन 

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ये शहर की एक पॉश लोकैलिटी है। इसे कभी अंग्रेज साहबों की रिहायश के लिए बसाया गया था। यहाँ बहुत सी बड़ी बड़ी पुरानी कोठियां हैं।ये कोठियाँ कई कई एकड़ में फ़ैली हैं। ज़्यादातर कोठियां रखरखाव के अभाव में भुतहा जंगल सी प्रतीत होती हैं। हर कोठी में सामने एक भरा पूरा  लॉन है। सामने नीरव शांत सड़कें। सड़क के दोनों और घने छायादार वृक्ष। इन्हीं कोठियों में से एक का बहुत ही खूबसूरत सा 'लॉन' है । उस कोठी की चहारदीवारी बहुत ऊँची नहीं हैं। सड़क से आते जाते ये 'लॉन' सबको दिखाई देता है।


इस 'लॉन' में यूँ तो उस कोठी में रहने वाले लोग अक्सर ही दिखाई देते हैं। खासकर शाम के समय। कई बार उस कोठी में आने वाले लोग भी मेजबानों के साथ बैठे दिखाई देते हैं। कभी कभार बच्चे भी खेलते खालते दीख जाते हैं । पर एक ऐसा व्यक्ति है जो सुबह से शाम तक उस लॉन के किसी ना किसी कोने में हमेशा दिखाई देता है। ये 'लॉन' और 'वो' व्यक्ति दोनों बरसों से ऐसे ही दीख रहे हैं। एक दूसरे के साथ। एक दूसरे से गुंथे हुए। एक दूसरे में समाए हुए। ऐसा लगता है मानो एक दूसरे के लिए ही बने हैं। इतने सालों में बहुत ही कम मौके ऐसे आए होंगे जब 'वो' 'वहां' ना दिखाई दिया हो,बहुत ही कम।
'वो' यानी एक दुबला पतला स्याह सा आदमी। शरीर पर उसी के रंग से मेल खाते मटमैले से कपड़े। हो सकता है वे भी कभी सुर्ख रंगों वाले रहे हों। लेकिन जिसने भी देखा उसे ऐसे ही मटमैले स्याह रंग वाले वस्त्रों में देखा। सच तो ये है कि वस्त्र कहना शायद निर्लज्जता भी मानी जा सकती है। दरअसल वे चिथड़े होते हैं जिन पर कई जगह थेकलियां लगी होतीं हैं। कई जगह सीवन उधड़ी होती। और जिस शरीर पर ये वस्त्र टंगे होते वो शरीर क्या बस समझो अस्थियों का एक जालनुमा कोई चीज़ है। एक ऐसी चीज जिसमें लकड़ीनुमा अस्थियों को बेतरतीब सा एक दूसरे के ऊपर रख ज्यामिति बना दी गई है। हाँ, सर पर बेहिसाब बाल हैं जो बेतरतीब से चारों और बिखरे रहते हैं। पर क्या ही कमाल है कि असंतुष्टि के तमाम उपादानों के बावजूद उसके चेहरे पर एक भोली सी मुस्कान पसरी रहती है।
'उसका' यानी लॉन का और 'वो' के चेहरों का भूगोल लगभग एक सा है। दोनों के चहरे लगभग सपाट और चौकौर। 'उसके' चेहरे पर फूलों की खुशनुमा सी मुस्कराहट हर मौसम में बिखरी रहती है। फ़िज़ा में फ़ैली उन फूलों की सुगंध 'उसके' चहरे की मुस्कान को स्निग्धता से भर देती है। और 'उसकी' इस स्निग्ध मुस्कराहट से 'वो' के चहरे की मुस्कराहट थोड़ी और गोलाई ले लेती है और 'वो' के चहरे के चौकोरपने को थोड़ा ढीला कर देती,उसके चहरे के किनारों की तीक्ष्णता को थोड़ा स्मूद कर देती है। 'वो' के चहरे की मुस्कराहट जितनी गोल होती जाती एक संतुष्टि का भाव सुर्ख से सुर्खतर होता जाता है। ऐसा लगने लगता है कि 'वो' के चहरे की संतुष्टि एक स्थायी भाव है। 'वो' का चेहरा कठोर है। पर ये कठोरता मुस्कराहट की मुलायमियत और बेफिक्री की आभा में हमेशा छिपी रहती है। ठीक वैसे ही जैसे 'उसकी' ज़मीन की कठोरता घास की मुलायमियत से ढकी रहती है। खिलते,महकते,झूमते फूल मंद मंद हवा में जितनी ज़्यादा अपनी सुगंध बिखेरते जाते,उतना ही 'वो' का रूखा सूखा चेहरा लावण्य से भर भर जाता है।
'वो' 'उसके' भीतर हर समय गतिशील रहता है। हर समय। समय के हर अंतराल में 'वो' एक अलग जगह पर दीखता है। अभी यहां तो थोड़ी देर में सरक कर वहां,फिर और आगे,फिर और आगे। मानो ये सरकना ही उसकी जिंदगी हो। 'वो' की गतिशीलता की सीमा 'उसकी' चौहद्दी है। ऐसा लगता मानो 'वो' समय के दायरे में बहता एक पल है। निर्द्वन्द सा। लेकिन उद्दंड नहीं। उसके बहने में एक लय है। किसी राग की बंदिश की तरह। उसके बहाव को देखकर अहसास होने लगता है मानो वो एक हिमखंड है। एक विशाल हिमपिंड से टूटा छोटा सा हिमखंड जो अपार नीली जल राशि में मंद गति से तैर रहा हो। फ़र्क़ रंग का है। वो हिमखंड के शुभ्र रंग की तरह नहीं है। वो स्याह है और घास के हरे समुद्र में दरख्तों और पेड़ पौधों से अठखेलियां करता बहता रहता है। स्याह रंग वाला 'वो' 'उसकी' खूबसूरती पर काला टीका लगा होने का आभास देता है। कभी कपाल पर, कभी गाल पर,कभी भाल पर। आखिर वो उसका टीका हो भी क्यूँ ना। उसने इतने जतन से उसे सजाया जो है। उसके बरसों की पसीने की कमाई है। ऐसे में किसी की नज़र लग गई तो। मखमली हरी घास और दुनिया भर के रंग बिरंगे और महक वाले खूबसूरत फूलों और बहुत सारे दरख्तों के बीच 'वो' टीका ही हो सकता है। उससे कम या ज़्यादा कुछ भी नहीं।
'वो' हमेशा 'उसके' पेड़ पौधों से एक गहरे संवाद में संलग्न रहता है। कई बार लगता वो उनके प्यार में है। उसके हाथ में हमेशा लौह धातु का एक औजार होता है। उसके हाथ में इस औजार को देख कर 'उसके' शत्रु होने का संदेह हो सकता है। पर ऐसा है नहीं। ये कठोर धातु वाला औजार दरअसल 'उसकी' और 'वो' की मुलायम मीठी मुस्कराहट का सबसे बड़ा कारक है। 'वो' के सधे हाथ अपने औजार से मृदा और वनस्पति से संवाद करते हुए इतने नियंत्रित ढंग से चलायमान होते मानो कोई वाद्ययंत्र बजा रहा हो। इस औजार के जरिए ही तो 'वो' ना केवल मृदा से बल्कि 'उसके' सभी रहवासों से भी संवाद करता है। एक ऐसा संवाद जिसमें गजब की लय है जो धीरे धीरे संगीत में रूपांतरित होती जाती और अनगिनत रंगों के रूप में चारों और बिखर बिखर जाता है। 'वो' 'उसके' प्यार में है तो संगीत के रंग बिखरने लाजिमी हैं। इस संगीत को 'वो' के 'उसके' रहवासों के साथ किये जा रहे संवाद को देख कर ही महसूस किया और सुना जा सकता है।
'उसके' प्यार में डूबा 'वो' 'उसको' हर ताप संताप से बचाने का जतन करता है। इस प्रयास में 'वो' पेड़ पौधों और दरख्तों के इर्द गिर्द उग आते अवांछित तत्वों का सफाया करके एक बड़े दरख़्त के नीचे इकट्ठा करता रहता है। शाम होते होते उस ढेर को बाहर फेंक आता है। ये क्रम अनवरत चलता रहता है। ये ढेर सूख कर उसकी तरह स्याह हो जाता है। जब तब 'वो' उस ढेर के पास सुस्ताने बैठता है तो वे एक जैसे दो ढेर लगते हैं। कभी कभी तो वो और ढेर मिलकर एक बड़ा ढेर लगने लगते हैं। 
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क्या पता किसी एक दिन 'वो' को भी उसी ढेर में बदल जाना है।
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क्रिया को बदलते देर नहीं लगती। 'वो' अब 'है' से 'था' में बदल गया। और निपट अकेला 'लॉन' धीरे धीरे जंगल में परिवर्तित हो रहा है।

Tuesday, 2 October 2018

कहानी



वो राजा 
वो रानी
वो चुड़ैलों के किस्से
वो परियों की कहानी
कभी नानी की जुबानी
तो कभी दादी की जुबानी
कहाँ वो दिन अब
कहाँ वो रातें
इन्टरनेट की सर्चें अब
और इन्टरनेट की चैटें।

Wednesday, 26 September 2018

अलविदा जसदेव सिंह!



खेल सिर्फ वो भर नहीं होता जो खिलाड़ी मैदान में खेल रहे होते हैं। खेल मैदान से बाहर जो दर्शक होते हैं वे उस खेल को सम्पूर्णता प्रदान कर रहे होते हैं। और दर्शक मात्र वे भर नहीं होते जो वहां प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होते हैं बल्कि वे दर्शक उसे पूर्णता प्रदान कर रहे होते हैं जो अपने श्रवणेन्द्रियों के माध्यम से मष्तिष्क पटल पर उस खेल की प्रतिकृति को देख रहे होते हैं।मैदान से उन अनुपस्थित दर्शकों के लिए खेल की प्रतिकृति तैयार करके उन दोनों को एक कर देने वाली कड़ी कमेंटेटर होता है। खेल और अनुपस्थित दर्शकों के बीच रागात्मक एकता उत्पन्न करने वाली सबसे मज़बूत कड़ी आज टूट गई और खेलों की प्रतिकृति तैयार वाली सबसे बेहतरीन कूंची का स्वामी अंततः चला गया। आवाज़ के जादूगरों-मर्विन डीमेलो(अंग्रेजी कमेंट्री),देवकी नंदन पांडेय(समाचार वाचन),अमीन सयानी(मनोरंजन) और जसदेव सिंह(हिंदी कमेंट्री) की जिस चौकड़ी को सुनते हुए हमारी पीढ़ी बड़ी हुई उसका एक और स्तम्भ आज ढह गया। जसदेव सिंह  ने इस नश्वर संसार को अलविदा कहा। अब कमेंट्री चाहे जैसी हो पर वैसी बिलकुल नहीं होगी जैसी उनके होने से होती थी। 

                             दरअसल जसदेव सिंह आवाज के ऐसे जादूगर थे जो अपनी आवाज़ की कूंची से आरोह अवरोह की टेक्नीक और जोश,उत्साह,उमंग,आस,निराश,हर्ष,विषाद जैसे संवेगों  के रंगों से सुनने वाले के मन के कैनवास पर घटनाओं की हूबहू अमिट तस्वीर बना देते थे। सन 1975 में जब मैं 11 साल का था,उन्होंने हॉकी विश्व कप फाइनल की एक ऐसी ही तस्वीर उकेरी थी जो आज भी अमिट है। उनकी वो आवाज़ आज भी कानों में वैसे ही गूंजती है और हमेशा गूंजती रहेगी,चाहे वे रहें या ना रहें।उनका जाना एक व्यक्ति या एक कमेंटेटर का जाना भर नहीं है। ये पूरे एक युग का अवसान है। अलविदा जसदेव सिंह!

Friday, 21 September 2018

'इलीट' और 'मासेस' के खांचे बहुत स्पष्ट हैं



'इलीट' और 'मासेस' के खांचे बहुत स्पष्ट हैं
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               विराट कोहली को 'खेल रत्न' मिला। बिला शक वे इस के हक़दार हैं। उन्हें बधाई।तो क्या बजरंग पूनिया की उपलब्धियां उनसे कम हैं। मेरा जवाब ना। तो उन्हें 'खेल रत्न' क्यों नहीं। और यहीं मेरा संदेह थोड़ा और बढ़ जाता है कि हमारे दिमागों में अभी भी 'इलीट' और 'मासेस' के खांचे बहुत स्पष्ट हैं।यहां बहुधा ऐसा होता है कि सोना कोई 'उगाता' है। सोने की चमक कोई और ले उड़ता है। और उगाने वाले के पास बिना चमक वाली धातु मसलन कांसा बच रह जाता है। 
             इसी समय तरनवा स्लोवाकिया में जूनियर विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप चल रही है। ग्रीको रोमन शैली के 77 किलो भार वर्ग में साजन भानवाला ने रजत पदक जीता। टेम्पेरे में आयोजित पिछली प्रतियोगिता में उन्होंने कांस्य पदक जीता था। इस तरह से वे बैक टू बैक पदक जीतने वाले पहले भारतीय पहलवान बने। इसके अलावा वे एशियाई चैम्पियनशिप में पहले कांसा और फिर स्वर्ण जीत चुके हैं। उनकी ये उपलब्धि बहुत बड़ी है क्योंकि भारत में ग्रीको रोमन शैली बहुत प्रचलित और लोकप्रिय नहीं है। दरअसल इस शैली में पहलवान को कमर से नीचे हाथ नहीं लगाना होता है। साजन हरयाणा के एक साधारण से कृषक परिवार से है। जब उसकी जीत की खबर उनके परिवार को मिली तो उनकी प्रतिक्रिया इतनी ही थी कि  उनके लड़के ने देश के लिए नाम किया है। ये प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी जीवन में आमतौर पर होती है। वे ज़मीन से जुड़े है।वे  धरती पुत्र हैं और धरती उनकी माता है। वे अपनी किस्मत के बीज धरती में बोते हैं,श्रम से निकले पसीने के खाद पानी देकर फसल के रूप में सोना उगाते हैं। लेकिन उसकी चमक  बिचौलिए ले उड़ते हैं। उनके पास बचता है उनकी मेहनत का लोहा और नमक जिससे सहारे वे ज़िंदगी की पहाड़ सी दुश्वारियों का सामना करते हैं और फिर फिर सोना उगाने के कर्म में प्रवृत होते हैं।  
                     आप कुछ दिन पीछे की और घूमे और 18वें एशियाई खेलों में पदक विजेताओं की सूची देखिए उनमे से कितने ही साधारण किसान परिवारों से हैं। फिर और पीछे जाईये। 5 साल,10 साल,15 साल या फिर 20 साल। स्मृति पर ज़ोर डालें और देखें अधिसंख्य पदक विजेता साधारण कृषक परिवारों वाली बैकग्राउंड वाले खिलाड़ी हैं। यानी धरती से सोना उगाने वाली पृष्ठभूमि से। वे जब गांव से निकल कर खेल मैदानों में प्रवेश करते हैं तो ये मैदान ही उनके लिए उर्वर भूमि बन जाते हैं जिसमे वे अपने सपनों के बीज बोते हैं,उम्मीदों और लगन की खाद और श्रम से पैदा पानी लगाते और उससे पदकों की फसल उगाते हैं। ये फसल इतनी ज़्यादा लहलहा सकती है यदि उन्हें तकनीकी सहयोग,कुशल प्रशिक्षण और प्रोत्साहन के न्यूट्रिएंट सप्लीमेंट मिल सकें। लेकिन  उससे भी ज़रूरी है इस फसल को बेईमानी,भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार की कीट-व्याधियों से बचाया जाए और हां उससे भी ज़रूरी उनकी मेहनत के कमाई की चमक लूटने वाले बिचौलियों और परजीवियों से बचाया जाए। अन्यथा लहलहाती फसल को नष्ट होने में भी देर नहीं लगती। 
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एक प्रतिद्वंदिता:दो विदाई

  एक कशमकश है कि अब इख़्तिताम पज़ीर हुआ चाहती है। एक द्वंद्व है जो विराम लिया चाहता है। एक प्रतिद्वंदिता है जो अनिर्णीत समाप्त हुआ चाहती है। द...