Friday, 3 May 2019

भोर

   

ये तो तय है कि दिन के सारे निश्चय जो सांझ की संभावनाओं में डूब रहे हैं,वे अंततः रात्रि की अनिश्चितताओं में घुल जाएंगे।बस देखना ये है कि उम्मीद के जुगनू,तारे और एक चाँद सारे मिल के अनिश्चितताओं का भार भोर के नए स्वप्नों के उगने तक ढो पाते हैं कि नहीं।
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"चल ए नज़ीर इस तरह से कारवाँ के साथ।
जब तू न चल सके तो तेरी दास्ताँ चले।"
                                           नज़ीर
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तो ये भी तय रहा कि सकारात्मक सोच हमें मानुस बनाए रखेगी।





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