उसे सांझ उदासी से भरती, मुझे सांझ उम्मीद से लबालब करती। उसे लगता ये दिन का अंत है। मुझे लगता ये रात का आरंभ है,रात की सुबह है। उसे लगता दिन का उल्लास और स्पंदन खत्म होने को है। मुझे लगता रात का एकांत और संगीत शुरू होने को है। दोनों खयालों से भरे थे। कितने जुदा जुदा पर कितने एक थे हम।
Sunday, 12 April 2020
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फुटबॉल नर्सरी मिनर्वा अकादमी और रंजीत बजाज
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